0:02 [संगीत] नमस्कार स्वागत है आप सभी का। आप देख रहे हैं मुद्दा आपका। मैं हूं प्रीति सिंह और मुद्दा आपका में आज का विषय है भारत के ऊर्जा भविष्य का एक हिस्टोरिक टर्निंग पॉइंट शांति बिल 2025 जो एटॉमिक एनर्जी से जुड़ा विधेयक है। एटॉमिक ऊर्जा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र के प्रवेश के लिए सरकार ने सोमवार को इस बिल को लोकसभा में पेश किया। इसका मकसद भारत के नागरिक परमाणु क्षेत्र के कानूनों में व्यापक सुधार करना है। इसे निजी भागीदारी के लिए खोलना और नई देयता प्रणाली स्थापित करना है। यह 1962 के परमाणु ऊर्जा कानून के बाद सबसे बड़ा सुधार होगा। करीब 63 साल पुराने राज्य एकाधिकार को तोड़ते हुए प्राइवेट कंपनियों
0:48 को परमाणु ऊर्जा उत्पादन में हिस्सेदारी मिलेगी। सरकारी एजेंसियां सुरक्षा और संचालन संभालेंगी। लेकिन प्राइवेट प्लेयर्स पूंजी, जमीन और टेक्नोलॉजी लाएंगे। यह कदम जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने और 2047 तक 100 गीगावाट क्षमता हासिल करने के लिए जरूरी माना जा रहा है। सरकार ने इसे बड़े नेशनल इंटरेस्ट की पॉलिसी इनिशिएटिव के तौर पर इसे पेश किया है। जिसे शांति बिल यानी सस्टेनेबल हारनेसिंग एंड एनवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया नाम दिया गया है। इस बिल के जरिए सरकार का स्पष्ट विज़न है कि भारत का न्यूक्लियर एनर्जी सेक्टर अब केवल सख्त सरकारी नियंत्रण तक सीमित ना रहे और प्राइवेट पार्टिसिपेशन पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप और ग्लोबल टेक्नोलॉजी कोलैबोरेशन की राह पर चले। इसका उद्देश्य है क्लीन 247 इलेक्ट्रिसिटी बैकबोन तैयार करना, नेट जीरो और एनर्जी सिक्योरिटी
1:35 गोल्स को मजबूती देना और इनोवेशन इन्वेस्टमेंट और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को एक्सीलरेट करना। आज इस बिल के कोर प्रोविज़ंस, सिग्निफिकेंस और रियल इंपैक्ट को बारीकी से समझेंगे। दो बेहद खास मेहमान मेरे साथ इस विषय पर चर्चा के लिए जुड़े हुए हैं। डॉ. अजय लेले मेरे साथ जुड़े हैं। डीडीजी हैं मनोहर पारिक इंस्टट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस। डॉ. लेले बहुत-बहुत शुक्रिया आपका। मेरे साथ इस चर्चा में जुड़ने के लिए आपका स्वागत है। धन्यवाद। दूसरे मेहमान प्रोफेसर राम प्रसाद प्रजापति मेरे साथ जुड़े हुए हैं। स्कूल ऑफ फिजिकल साइंसेस जेएनयू। प्रोफेसर प्रजापति आपका भी बहुत-बहुत धन्यवाद मेरे साथ इस चर्चा में जुड़ने के लिए। थोड़ा सा डॉ. अजय लेले आपसे शुरुआत। जी जी आपसे शुरुआत करूंगी। जी डॉक्टर ले ले लोकसभा में शांति बिल 2025 अह पेश किया गया। एटॉमिक एनर्जी बिल ये है जिसे लाया गया है। सरकार इसे भारत का जो न्यूक्लियर
2:22 सेक्टर है उसका एक तरह से बिगेस्ट रिफॉर्म मान रही है जो कि छ दशक बाद हो रहा है। अगर देखें तो आज भारत की जो न्यूक्लियर कैपेसिटी है वो 3 फीसदी से भी कम है। जबकि एनर्जी की डिमांड और क्लाइमेट प्रेशर दोनों लगातार बढ़ रहे हैं। फैक्ट यह है कि आज भारत की न्यूक्लियर कैपेसिटी सिर्फ 8 से 9 गीगावाट है। जबकि कोल और रिन्यूएबल्स पर हमारी डिपेंडेंसी लगातार बढ़ती जा रही है और क्लाइमेट कमिटमेंट्स भी जैसा मैंने कहा हमारे सामने है। बुनियादी सवाल यही है कि असल में शांति बिल क्या है आपकी नजर में और सरकार इसे हिस्टोरिक नेसेसिटी क्यों मान रही है? क्या एक तरह से कहें कि मजबूरी में लाया गया रिफॉर्म है या विज़न ड्रिवन ट्रांसफॉर्मेशन के तौर पर आप इसे देखते हैं? मेरे विचार से मैं यह नहीं कहूंगा कि यह मजबूरी में लाया गया रिफॉर्म है। क्योंकि अगर आप सरकार का रवैया देखें तो जो स्ट्रेटेजिक सेक्टर्स है इतने दिन जो
3:08 स्ट्रेटेजिक सेक्टर्स सरकार के पास सीमित थे वो स्ट्रेटेजिक सेक्टर्स ओपन करने की कोशिश चल रही है। इससे पहले हमने एक स्पेस बिल लाया था। जहां पे आपने स्पेस इंडस्ट्री को स्पेस स्टैंडअप्स को स्टार्टअप्स को काफी बढ़ोतरी दी थी। सो सिमिलर में स्पेस के बाद अब न्यूक्लियर वो भी एक स्ट्रेटेजिक सेक्टर है। इसमें हम प्राइवेट इंडस्ट्री प्राइवेट इन्वेस्टमेंट करना चाह रहे हैं। मेरे विचार से हम भारत का पूरा न्यूक्लियर आलेख देखें तो भारत ने शुरुआत से ही मैं कहूंगा होम्योवा से ले आज तक हमने काफी प्रगति की है न्यूक्लियर सेक्टर में। हमारी प्रगति न्यूक्लियर सेक्टर में थोड़ी सी सीमित रही है। क्योंकि भारत सेंशंस के अंडर था। क्योंकि भारत ने जब पहला बुद्धा स्माइल्स वाला जो पहला पोखरण वन न्यूक्लियर टेस्ट किया था
3:54 उसके बाद पूरी दुनिया ने भारत को टेक्नोलॉजिकल सेंशंस के अंदर रखा था। उसके बाद हमने 1998 में पोखरण टू भी किया था। तो सेंशंस का सिलसिला चलता रहा। इंडजस न्यूक्लियर डील जो 2005 2008 के बाद हुआ इसके जरिए हम ये कह सकते हैं कि भारत का जो एक टेक्नोलॉजी सेक्टर था पर्टिकुलरली ऑर्गेनाइजेशन लाइक डीआरडीओ एंड इसरो जो सेंश के अंडर थे वो सेंशन से बाहर आ गए तो अब ये समय आ चुका है कि हम सेंश से ही बाहर हैं। हम फॉरेन इन्वेस्टमेंट ला सकते हैं। भारत का जो अंदरूनी सेक्टर है इंडस्ट्री सेक्टर वो भी काफी प्रगत हो चुका है। तो मेरे विचार से यह राइट टाइम है यह बिल लाने का कि भारत का जो इंडिविजुअल न्यूक्लियर सेक्टर है मैं कहूंगा भारत का जो निजी क्षेत्र है कि
4:41 जहां से एजेंसी लाइक अडानी टाटा और कई सारे एजेंसी है Reliance भी है उसमें जो इन्वेस्टमेंट करना चाह रहा है। सो मैं ये कहूंगा कि भारत का सेक्टर अब ट्रबल हो चुका है और इसीलिए हमें ये रिफॉर्म्स की जरूरत थी। ये रिफॉर्म्स की जरूरत इसलिए थी क्योंकि दो बिल्स थे जिसमें हमें संशोधन करने की जरूरत थी। तो जो शक्ति बिल लाया है वो दो बिल्स को अब निकाल देगा और एक संशोधन करेगा। सबसे पहला जो बिल था वो इंडियास एटॉमिक एनर्जी एक्ट 1962 था और दूसरा बिल सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज जो 2010 में आया था। सो दोनों बिल में हमें प्रेजेंट सरकमस्ट्ससेस के जरिए सुधारना करने की जरूरत थी। जो 1962 एक्ट था वो बेसिकली पूरा गवर्नमेंट कंट्रोल था। तो न्यूक्लियर
5:27 सेक्टर के ऊपर पूरा गवर्नमेंट कंट्रोल था। हमें काफी सारी दिक्कतें आ रही थी लैंड एक्विजिशन में नई टेक्नोलॉजी लाने के लिए प्राइवेट सेक्टर का इन्वेस्टमेंट्स होने के लिए और जो दूसरा एक्ट था उसके जरिए बेसिकली आपके जो सप्लायर्स है आपके जो ऑपरेटर्स है उनके ऊपर बहुत भारी मात्रा में लायबिलिटी दिया गया था अगर खुदा ना खास्ता कोई एक्सीडेंट हो जाए। सो उसके जरिए हो क्या रहा था कि आपके पास इन्वेस्टर्स आ नहीं रहे थे। सो हमें ये दोनों एक्ट्स में सुधारित आवृत्ति निकालने की जरूरत थी। तो शक्ति ये दोनों के ऊपर एक नया एक्ट आ जाएगा जिसमें ये दोनों एक्ट की जो अच्छी चीजें हैं वो ऐड की जाएगी और इंडस्ट्री के लिए जो प्रतिकूल एटमॉस्फेयर चाहिए उसके लिए भी प्रावधान किया जाएगा। तो मेरे ख्याल से ये राइट टाइम में बिल आ
6:13 रहा है। जी जी बिल्कुल और प्रोफेसर प्रजापति आपका नजरिया क्या कहता है? अब तक भारत में न्यूक्लियर एनर्जी क्लोज स्टेट कंट्रोलोल्ड इकोसिस्टम रहा। जहां एंट्री डिफिकल्ट थी, टेक्नोलॉजी लिमिटेड थी और एक्सपेंशन स्लो था। लेकिन अब शांति बिल के जरिए पहली बार प्राइवेट सेक्टर, एडवांस टेक्नोलॉजी और ग्लोबल पार्टनरशिप का दरवाजा खुल रहा है। एक तरह से इस बिल की साइंटिफिक और इंस्टीट्यूशनल सिग्निफिकेंस आपके नजरिए में क्या है? क्या ये भारत के न्यूक्लियर इकोसिस्टम को फंडामेंटली बदल देगा? क्या ये सिर्फ पावर जनरेशन बढ़ाने की बात है? या भारत की जो साइंस, इनोवेशन और स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी है उसको रिीडफाइन करता नजर आ रहा है। यह बिल अगर आज नहीं आता आपकी नजर में तो 10 से 15 साल बाद भारत किस प्राइस को चुका रहा होता? नहीं आपका निश्चित ही बहुत ही महत्वपूर्ण
6:59 प्रश्न है और मैं जो सरकार के द्वारा लाया गया शांति बिल है, इसके पूर्ण समर्थन में हूं। इसका कारण यह है कि एक तरफ जहां हम 2047 तक विकसित भारत बनने की बात कर रहे हैं और 2047 तक हमारी जो जनसंख्या है वो 1.6 से 1.7 बिलियन हो जाएगी और अगर हम हमारी ऊर्जा की आवश्यकता को देखें तो 2047 तक वो लगभग 3500 गीगावाट टेरा वाट आवर्स बन जाएगी। तो इन लक्ष्यों को पूर्ति करने के लिए जो हमारे पास जो ऊर्जा के साधन है बहुत सीमित है और उसमें स्पेशली अगर हम बात करें न्यूक्लियर एनर्जी की तो उसमें हमारा 3% जो एनर्जी का प्रोडक्शन है वो न्यूक्लियर के द्वारा होता है। तो निश्चित ही जो पुराने जो जो प्रावधान थे उनके अंतर्गत ये संभव नहीं था। जैसे डॉक्टर लेन ने भी इनके बारे में
7:45 विस्तार से चर्चा की। अगर आप वही अमेरिका देखें तो अमेरिका में आज वर्तमान में जो उनका जो न्यूक्लियर एनर्जी प्रोडक्शन है वो लगभग 100 गीगावाट है जो हम 2047 तक के लिए लक्ष्य तय कर रहे हैं कि 2047 तक हम हमारा जो न्यूक्लियर एनर्जी प्रोडक्शन है उसको हम 100 गीगावाट कर दे। तो 2047 तक विकसित भारत बनाने के लिए हमें जो हमारी ऊर्जा पे निर्भरता है एक और जहां हमें हमारा जो जीवाश्म ईंधन की खपत को कम करना है क्योंकि वो लिमिटेड रिसोर्सेज है। वहीं हमें न्यूक्लियर एनर्जी बढ़ाने पर जोर देना पड़ेगा। तो इस इस बिल में जो प्रावधान किए हैं उसमें जो महत्वपूर्ण प्रावधान वो ये है कि इसको प्राइवेट सेक्टर के लिए खोला जा रहा है। आजकल प्राइवेट सेक्टर में ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश करने के लिए काफी कंपनियां काफी स्टार्टअप्स जो आना चाहते हैं। हम अगर
8:32 देखें तो हमने रेलवे में किया या अगर हम देख तो टेलीकॉम में किया एिएशन में किया और उसके हमें सफलता पूर्वक परिणाम मिले हैं और काफी इन्वेस्टमेंट हुआ और उससे जॉब अपॉर्चुनिटी क्रिएट हुई है। इसी प्रकार से अगर हम न्यूक्लियर ऊर्जा के क्षेत्र में अगर एटॉमिक एनर्जी के क्षेत्र में हम एफडीआई और प्राइवेट सेक्टर को देते हैं तो निश्चित ही एक बड़ा से एक रिवोल्यूशन आएगा और जॉब अपॉर्चुनिटी बढ़ेगी और हमारी जो ऊर्जा की आवश्यकता है उसको पूर्ण करने में यह एक महत्वपूर्ण एक मील का पत्थर साबित होगा। एक और मैं चीज यहां पर इंपॉर्टेंट ऐड करना चाहूंगा कि जो पुराने जो जो दो बिल थे जिसके बारे में भी चर्चा हुई उसमें बहुत ही सीमित प्रावधान थे और उसमें जोखिम और जो जो मिनरल्स वगैरह प्रोडक्शन लैंड एक्वायरमेंट ये सारी चीजों के लिए काफी
9:17 उसमें जटिल प्रावधान थे। परंतु इस शांति बिल में इन सभी को बहुत सिस्टमेटिक तरीके से इन सभी को ध्यान दिया गया है और जब भी कोई प्राइवेट सेक्टर से कोई अगर न्यूक्लियर एनर्जी में निवेश करना चाहेगा तो उसके लिए बहुत ही एक सुगम प्रणाली का एक व्यवस्था दी गई है। इसमें जो लॉस जोखिम है उस जोखिम का जो उसकी भी रिससिबिलिटी तय करना और प्रत्येक काम को इसमें विस्तृत रूप से बांटा गया। अगर हम बिल के डिटेल्स में जाएंगे तो इसमें काफी डिटेल प्रावधान है। तो मैं यह मानता हूं कि अगर हमें 2043 तक ऊर्जा के क्षेत्र में अगर हमारी निर्भरता को बढ़ाना है तो बिना शांति बिल के ये संभव नहीं है। मेरा ऐसा मानना है। हम हम ठीक है। थोड़ा सा जो आप लोगों ने बात की है उसमें
10:04 और अगर डॉक्टर लेलो को थोड़ा सा और गहराई से अगर हम एनर्जी सिक्योरिटी और क्लाइमेट के बारे में समझे तो आज भारत कोल और रिन्यूएबल दोनों पर हेवली डिपेंडेंट है लेकिन दोनों की अपनी लिमिटेशंस हैं। कोल पोल्यूशन, रिन्यूएबल्स, इंटरमिटेंसी और तो स्ट्रेटेजिक एंगल से अगर दोनों को समझे तो क्या न्यूक्लियर एनर्जी के बिना भारत की जो लॉन्ग टर्म एनर्जी सिक्योरिटी और नेट जीरो कमिटमेंट्स हैं वो कहीं ना कहीं क्या आपको पॉसिबल लगते हैं रियलिस्टिकली अगर इनके बारे में बात की जाए और शांति बिल इनमें कितना डिसीजिव रोल, डिसाइसिव रोल निभा सकता है। एक तरह से अगर इन दोनों पहलुओं पर अगर हम बात करें तो मेरे विचार से शांति बिल ये एक शुरुआत है। सरकार ने एक बहुत महत्वपूर्ण कदम उठाया है। उन्होंने रूल पोजीशन काफी सरल किया
10:50 है। जो एक सो कॉल्ड रेड टेपिज्म था वो अब नहीं होगा। अब प्राइवेट इंडस्ट्री को इन्वेस्ट कमेंट्स करने की जरूरत है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 49% एफडीआई भी अलाउड है इस बिल के जरिए। सो कहीं ना कहीं बाहर के देशों से भी इन्वेस्टमेंट्स आने की संभावना है। जैसा हाल ही हमने डिस्कस किया कि हमारे स्टार्टअप्स भी काफी अच्छी तरह से इसमें इन्वेस्ट कर सकते हैं। क्योंकि जब आप इन्वेस्टमेंट की बात करें तो एक फुल ब्लोन रिएक्टर ही नहीं होता। कई सारे आपके छोटे-छोटे रिक्वायरमेंट्स होते हैं जो स्टार्टअप्स आपको इन्वेस्टमेंट करके या इनोवेशन करके मजबूती दे सकता है। दूसरी एक चीज जब हम बजट देखें भारत का तो बजट में ही 20,000 करोड़ मिसेस सीतारमन ने
11:36 न्यूक्लियर सेक्टर के लिए दिए थे। जहां पे एसएमआर जिसको स्मॉल रिएक्टर्स बोलते हैं उसके लिए थे। सो हम यह कह रहे हैं कि आने वाले 5 साल में 2032 2033 तक हमारे पांच इंडीजीनसली बिल्ड रिएक्टर्स भी बन जाएंगे। अगर हम एक रिएक्टर की बात करें तो वो अराउंड 300 मेगावाट्स इलेक्ट्रिसिटी बना सकता है। 300 मेगावाट्स बना सकता है। तो ऐसे पांच रिएक्टर्स होंगे तो डेफिनेटली उसमें बढ़ोतरी होगी। और हम ये भी सोच रहे हैं कि काफी प्राइवेट इंडस्ट्री भी इन्वेस्टमेंट भी हो जाएगा। हम आज का अगर हम जिक्र करें तो हमारे पास 24 ऑपरेशनल रिएक्टर्स है। 17 रिएक्टर्स के ऊपर काम चल रहा है। सो मैं ये कहूंगा कि बहुत भारी मात्रा में इन्वेस्टमेंट आने की
12:22 संभावना है क्योंकि हमारे पास ऑलरेडी इंफ्रास्ट्रक्चर है। दूसरा आपने जो जिक्र किया कि नेट जीरो का हमारा जो लक्ष्य है 2070 का है। अभी इस बिल के प्रावधान में हमने ये कहा है कि हम 100 गीगावाट 2047 तक ले आएंगे। अभी फिलहाल हम हमारा देखें वो बहुत कम 3% ही हम न्यूक्लियर एनर्जी से करते हैं। लेकिन मैं यह नहीं कहूंगा कि हमें खाली न्यूक्लियर एनर्जी के ऊपर ही डिपेंडेंट रहना पड़ेगा। आने वाले दिनों में पर्टिकुलरली अगर नेट जीरो 207 2070 तक हमें प्राप्त करना है तो कई सारे और भी ऑप्शंस है। हमने सोलर मिशन भी निकाला है। तो मैं ये बिल्कुल नहीं कहूंगा कि भारत खाली न्यूक्लियल के ऊपर ही 100% निर्भर रहेगा क्योंकि
13:07 एक ऐसी शक्ति है कि जिसमें काफी सारे सेफ्टी प्रिकॉशंस लेने पड़ते हैं। आपके इंटरनेशनल लेवल पर काफी सारे इंस्पेक्शंस होते हैं। अगर हम भारत का सुरक्षा रिकॉर्ड देखें तो हाल ही में आईएईए जो संस्था एक्चुअली आपकी सेफ्टी रिक्वायरमेंट्स देखती है। आपका इंस्पेक्शंस कर सकती है न्यूक्लियर इंडस्ट्रीज का। उन्होंने कहा है कि भारत का सेफ्टी रिक्वायरमेंट बहुत अच्छा है। तो मैं ये कहूंगा कि भारत के पास इंफ्रास्ट्रक्चर ऑलरेडी है। तो इसको और विकसित करने की जरूरत है। लेकिन न्यूक्लियर एनर्जी एनर्जी का एक मायना है। हमें बाकी सारी चीजों के ऊपर भी लक्ष्य देना पड़ेगा। क्योंकि हमारे कोल के ऊपर ऑलमोस्ट 70% डिपेंडेंस है। वो डिपेंडेंस हमें बहुत जल्दी कम करना होगा। ठीक है। और प्रोफेसर प्रजापति अगर थोड़ा
13:55 सा कुछ जो आशंकाएं रहती हैं उनको लेकर बात करें तो पहली बार प्राइवेट सेक्टर को जनरेशन मैन्युफैक्चरिंग और आरएडी में इस बिल के जरिए एंट्री मिलेगी। तो साइंटिफिक और इकोनॉमिक एंगल से अगर समझें तो क्या प्राइवेट पार्टिसिपेशन न्यूक्लियर इनोवेशन को एक्सीलरेट करेगा या फिर जो प्रॉफिट मोटिव सेफ्टी है और रिसर्च डेप्थ से कहीं ना कहीं टकरा सकते हैं जो प्रॉफिट मोटिव है वो सेफ्टी और रिसर्च डेप्थ से टकरा सकते हैं। थोड़ा सा इसके बारे में अभी डॉक्टर लेले ने बताया है सेफ्टी को लेकर। लेकिन आपका नजरिया इसे लेकर क्या कहता है? जी देखिए शोध की दृष्टि से अगर देखें हम तो जैसा मैंने बताया कि यूएसए यूरोप या जापान ऐसे कई देश है जहां पर जो न्यूक्लियर सेक्टर में जहां पर प्राइवेट भागीदारी वहां पे ना सिर्फ रिसर्च इनोवेशन का स्तर बढ़ा है क्योंकि आपस में सामंजस्य
14:42 होता है टेक्नोलॉजी ट्रांसफर हुआ और जो एक एक कंजिनल एटमॉस्फियर होता है शोध के लिए वो बहुत अच्छा मिलता है और इसमें कहीं कोई दुविधा नहीं आती है। सब कुछ वेल प्लान होता है और रिसर्च के लिए इसमें काफी सहयोग मिल सकता है। इस बिल में एक ये भी प्रावधान है कि किस तरह से आरएडी सेक्टर में जो न्यूक्लियर एनर्जी है उसकी रिसर्च और उसको बढ़ावा देना है। मैं एक महत्वपूर्ण बात बताता हूं। जैसे कि अगर हम भारत में देखा जाए तो हम ना सिर्फ फ्यूजन बेस रिएक्टर बल्कि फ्यूजन बेस रिएक्टर पर भी काम करने के लिए हमारे पास इंस्टट्यूट है जैसे इंस्टट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च है गांधीनगर में जहां पर न्यूक्लियर फ्यूजन बेस रिसर्च हो रही है तो भविष्य में हमारा लक्ष्य ये भी है कि सिर्फ फ्यूजन बेस रिएक्टर पर ही सीमित ना रहे हम
15:27 यानी कि फ्यूजन बेस रिएक्टर पर ही बनाए यानी कि वो अभिक्रिया जो सूर्य के अंदर होती है जिससे हमें असीमित ऊर्जा मिलती है तो इस शांति बिल के माध्यम से हमें उस सेक्टर में न्यूक्लियर फ्यूजन के द्वारा एनर्जी प्रोड्यूस करने में जिसमें हम बहुत आसानी से क्लीन एनर्जी को उसमें प्रोड्यूस कर सकते हैं। दूसरा जो आप जो शोध की दृष्टि से बता रहे हैं तो जो हमारे अनुभव है जिसमें कि बड़े-बड़े इंडस्ट्री और इनसे जब कोलबोरेशन करते हैं तो उसमें शोध टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और प्रोडक्शन सबका एक सिस्टमेटिक तरीका होता है। तो इससे कहीं ना कहीं एक कोलबोरेटिव रिसर्च को बढ़ावा मिलेगा और वो इंटरडिसिप्लिन रिसर्च के क्षेत्र में भी काफी चाहे वो इंजीनियर्स हो साइंटिस्ट हो और उनके लिए काम करने के कई अवसर मिलेंगे और जो हमारा मूल लक्ष्य
16:13 है कि जो हमारी ऊर्जा की जो हमारी निर्भरता है जो हम आज कोल पेट्रोल या बाकी सोलर पे डिपेंडेंस है उसको कहीं ना कहीं अगर हम न्यूक्लियर एनर्जी के थ्रू अगर उसको कंप्लीट फुलफिल कर पाए तो अदर वाइज आने वाली जो हमारे 2047 तक विकसित भारत में जो महत्वपूर्ण एक जो सेक्टर है वो ऊर्जा का सेक्टर है। तो इस पर फोकस करना बहुत जरूरी है। तो ये समस्त जो जितने भी आस्पेक्ट मैंने बताए चाहे वो शोध का हो, इनोवेशन हो, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर हो या जो सोसाइटी तक पहुंचना हो तो वहां तक जाने के लिए इस तरह के बिल जो है वो स्वागत योग्य है। हम हम ठीक है। और डॉक्टर लेय जो न्यूक्लियर लायबिलिटी लॉ है उसकी वजह से इंटरनेशनल और डोमेस्टिक इन्वेस्टर्स कई साल से थोड़ा रेिस्टेंट रहे। थोड़ा
16:58 संकोच उनमें कहीं ना कहीं रहा। अब इस बिल में लायबिलिटी फ्रेमवर्क को काफी सिंपलीफाई किया जा रहा है। तो क्या आपको लग रहा है कि क्या ये जो रिफॉर्म है वो इन्वेस्टमेंट कॉन्फिडेंस के लिए गेम चेंजर है या कहीं ना कहीं जो ट्रस्ट डेफिसिट है वो अब भी बना रह सकता है। आप क्या समझ रहे हैं इसे लेकर? नहीं मेरे विचार से लायबिलिटी एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण मुद्दा था जिसके जरिए हम ये देख रहे थे। लोग इन्वेस्टमेंट करने के लिए हिचक रहे थे। क्योंकि होता क्या था कि इक्विपमेंट कोई बनाएगा, कोई और एजेंसी कुछ और काम करेगी और लायबल कोई थर्ड पार्टी ही रहेगी। सो उसमें वो थोड़ी सी क्लेरिटी लाने की जरूरत थी। इतने दिन हो क्या रहा था कि भारत ने ये एक्ट 2010 में लाया था। उसके बाद 2011 में जापान में कुकुशीमा न्यूक्लियर डिजास्टर हुआ था। तो
17:44 काफी सारी दुनिया भर में काफी सारे लोग भयभीत थे कि अगर न्यूक्लियर ब्लास्ट हो गया कहीं डिजास्टर हो गया ऐसी तरीके से तो डेफिनेटली पूरी दुनिया को खतरा है। पर्टिकुलरली जो एरिया जहां पे वो एक्सीडेंट हुआ वहां पे खतरा है। तो इसलिए लोगों के मन में काफी सारी दुविधा थी कि इसमें इन्वेस्ट करें ना करें अगर हम इन्वेस्ट करेंगे और खुदा ना खास्ता कुछ हो जाए तो हम अननेसेसरीली हमारी चूक भले ही ना हो लायबल रहेंगे। तो इसमें सुधार लाने की जरूरत थी। तो अब मैं कहूंगा 2011 के बाद जो सुधार आए हैं नॉट ओनली इन इंडिया इंटरनेशनलली सुधार आए हैं अबाउट सेफ्टी एंड सिक्योरिटी उससे काफी लोगों को काफी बड़ी मात्रा में मैं ये कहूंगा कि एक कॉन्फिडेंस मिला है। सो ये कॉन्फिडेंस के जरिए अब इंडस्ट्री को भी पता है कि लाइब
18:31 लायबिलिटी लॉस में भी आप संशोधन किया जा रहा है। उसमें क्लेरिटी आ रही है। आपकी रिस्पांसिबिलिटी काफी हद तक ऐसी फिक्स होगी कि जिसके लिए आप एक्चुअली जिम्मेदार हैं। तो मेरे विचार से इंडस्ट्री को अब थोड़ा आगे आना पड़ेगा। इंडस्ट्री को भी थोड़ा मैं यह कहूंगा एक रिस्क लेना पड़ेगा क्योंकि अब सरकार ने संशोधन किया है। आपके सामने बिजनेस है। आज हम 8000 मेगावाट का जनरेशन कर रहे हैं। हमारा लक्ष्य 100 मे ग मेगावाट तक है। तो इसका मतलब बहुत बड़ा बिजनेस है। तो डेफिनेटली इंडस्ट्री उसके लिए विचार करेगा। ऑलरेडी अगर हम इंडिया की जिक्र करें तो प्राइवेट इंडस्ट्री ऑलरेडी इंटरेस्ट लेना शुरू कर चुके हैं। इंटरनेशनलली भी अगर हम देखें तो रशिया का
19:17 इंडिया के साथ न्यूक्लियर एनर्जी एरिया में कोलबोरेशन है। फ्रांस का भी हमारा कोलबोरेशन है। सो इंटरनेशनलली भी प्लेयर्स ऑलरेडी इंडिया से कोलबोरेट कर चुके हैं और उनको आने वाले दिनों में बिकॉज़ ऑफ़ दिस बिल काफी सारी मात्रा में मैं ये कहूंगा कॉन्फिडेंस मिलेगा और वो ज्यादा इन्वेस्टमेंट करने के लिए प्रवृत्त होंगे। ठीक है? और प्रोफेसर प्रजापति अगर न्यूक्लियर पावर को लेकर कहा जाता है कि ये एक्सपेंसिव है लेकिन जो एसएमआर है अ और 247 जो बेस लोड है इसकी स्ट्रेंथ ये माना जा रहा है कि ये चीजें हैं। तो साइंटिफिक या फिर इकोनॉमिक सवाल के जरिए समझूं कि क्या न्यूक्लियर पावर लॉन्ग टर्म में कॉस्ट इफेक्टिव बन सकती है और क्या जो एसएमआर हैं वो भारत के लिए प्रैक्टिकल सॉल्यूशन नजर आ रहे हैं आपको?
20:06 जी ऐसा नहीं है। न्यूक्लियर एनर्जी अगर देखा जाए तो अभी अभी हमारे पास जो मेन प्रॉब्लम है वो जो हमारे न्यूक्लियर रिएक्टर्स है वो काफी कम संख्या में है। अगर भविष्य में अगर हमारे न्यूक्लियर बेस्ड एनर्जी प्रोडक्शन कैपेसिटी हम बढ़ाते हैं तो ऑब्वियसली जो कॉस्ट इफेक्टिव कॉस्ट है वो उसकी रिड्यूस होगी। और अगर इसको हम कंपेयर करें अगर हमारे फसिल फ्यूल की तुलना में तो काफी उससे चीप रेट पर हमें यह न्यूक्लियर एनर्जी मिल सकती है। क्योंकि अभी हमारे पास सीमित संसाधन है तो संसाधन बढ़ाने के लिए जो जो टेक्नोलॉजी या जो कहना चाहिए कि जो पॉलिसीज है वह पॉलिसीज अभी तक इतनी क्लियर नहीं थी तो शांति बिल के माध्यम से वो जब आ जाएगी तो आसानी से जो नए जब प्लांट जब बनेंगे नए जब जो मॉड्यूलर साइज के जो
20:53 इसमें प्रावधान ये भी है कि छोटे-छोटे मॉड्यूलर टाइप के न्यूक्लियर रिएक्टर भी प्रोपोज्ड है तो वो कई छोटे-छोटे स्थानों पे वो लगाए जा सकते हैं। तो ऑब्वियसली इससे कॉस्ट रिडक्शन आएगा और प्राइवेट सेक्टर को जब हम दे रहे हैं तो इससे जो मिनरल हारनेसिंग और ये सब कुछ तो उनको दिया जाएगा वो करेंगे तो ज्यादा से ज्यादा हम हमारे जो न्यूक्लियर फोर्स है उसका दोहन कर पाएंगे तो इन टर्म्स ऑफ कॉस्ट आई थिंक ये चीप होगी इन कंपैरिजन टू दी अदर जैसा अभी भी हम देखें तो कुछ जो हमारी ऊर्जा पे निर्भरता है न्यूक्लियर रिएक्टर्स भी है तो कॉस्ट का इस कोई इशू नहीं है इशू बस ये है कि जो जो पॉलिसी वाइज जो प्रॉब्लम्स आना थी जो अभी तक आ रही थी उन प्रॉब्लम्स को दूर करना था और उसके लिए एक यूनिफाइड बिल डालना जरूरी था
21:39 जो पुराने दोनों बिल में वो कंप्लीटली गवर्नमेंट सेक्टर के लिए थे और उसमें पूरा कंट्रोल जो है वो डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी का था। तो इसको बजाय वो ना सेंट्रलाइज ना करते हुए इसको प्राइवेट सेक्टर में दे के और ताकि इसको इफेक्टिव तरीके से हम सोसाइटी के बीच में न्यूक्लियर बेस्ड एनर्जी का प्रोडक्शन बढ़ा सके। तो आई थिंक यह कोई इशू नहीं है। इसमें कॉस्ट बेस जो है ठीक है। ठीक है। और एक तरह से डॉक्टर लेले एक्सपर्ट्स ये मान रहे हैं कि शांति बिल जो है वो इंडिया, यूएस और इंडिया, फ्रांस न्यूक्लियर कॉरपोरेशन को रिवाइव कर सकता है। आपकी नजर में क्या यह बिल भारत को ग्लोबल न्यूक्लियर वैल्यू चेन में एक बड़ा और सीरियस प्लेयर बना सकता है और क्या इसका जिओपॉलिटिकल इंपैक्ट भी होगा?
22:26 मेरे विचार से इसका जियोपॉलिटिकल इंपैक्ट डेफिनेटली होगा। अगर हम थोड़ा सा इतिहास में जाए और इंडोस न्यूक्लियर डील को देखें तो बेसिकली उसी समय ये लोगों का मानना था कि अगर ये बिल सक्सेसफुल हो जाए उस समय ये कहा जा रहा था कि भारत एक प्रकार के टेक्नोलॉजिकल एपरथाइट में है कि भारत को कोई टेक्नोलॉजी दे नहीं रहा है। सो खाली यूएस टेक्नोलॉजी नहीं दे रहा था। यूएस ने जो प्रेशर डाला था इसके वजह से बाकी और कंट्रीज भी हमें टेक्नोलॉजी नहीं दे रहे थे। जब हमने यूएस के साथ ये डील साइन किया उसके बाद हमारी टेक्नोलॉजी कोलैबोरेशन के लिए दरवाजे खुले हो गए और काफी सारे एजेंसीज हमारे पास आ गए। सो आने वाले दिनों में डेफिनेटली यूएस का जो पावर सेक्टर है उसको भी बिज़नेस चाहिए। सो कहीं ऐसा नहीं है कि वो भारत की जरूरत के लिए
23:13 आएंगे। उनको भी एक अच्छा बिज़नेस मिलेगा। सिमिलरली फ्रांस के साथ भी सेम चीजें हैं। सो उसका इंपैक्ट एक तो हमारी एनर्जी सिक्योरिटी पे पड़ेगा और मोटे तौर पर कहे जाए तो जियोपॉलिटिकल इंपैक्ट भी होगा। अगर दो देशों में कोलैबोरेशन होता है इन न्यूक्लियर एरियाज तो डेफिनेटली ये महत्वपूर्ण बात है। अगर हम देखेंगे तो पूरी दुनिया में भारत ऐसा देश है कि जिसने एनपीटी साइन नहीं किया है। फिर भी ये कंट्रीज भारत के साथ कोलैबोरेशन कर रहे हैं। इसका मतलब भारत का जो न्यूक्लियर पावर सेक्टर है उसमें बहुत भारी मात्रा में ट्रांसपेरेंसी है। सो हम एक ट्रांसपेरेंट ट्रांसपेरेंसी के जरिए ये लोगों को आकृष्ट कर रहे हैं। इसीलिए ऑलरेडी फ्रांस के भारत के साथ अच्छे संबंध है न्यूक्लियर सेक्टर में भी। तो मेरे विचार से आने वाले दिनों में यह बहुत
23:59 महत्वपूर्ण होगा। अभी हम खाली 3% न्यूक्लियर एनर्जी से बिजली तैयार कर पा रहे हैं या हमारी एनर्जी जनरेशंस ले रहे हैं। सो आने वाले दिनों में अगर हमें इसको बढ़ा के 100 गीगावाट पे जाना है तो मेरे विचार से हमारे पास टाइम बहुत कम है। हमारा लक्ष्य थोड़ा एंबिशियस है और उसके लिए हमें इंटरनल इंडस्ट्रीज की, भारतीय इंडस्ट्रीज की और इंटरनेशनल प्लेयर्स की भी जरूरत पड़ेगी। हम हम ठीक है। और एक बार फिर से मैं जो सेफ्टी और रेगुलेशन है उस पर आ रही हूं प्रोफेसर प्रजापति क्योंकि जो पब्लिक कॉन्फिडेंस है वो जीतना सबसे बड़ा कहीं ना कहीं पहलू भी है। न्यूक्लियर एनर्जी पर सबसे बड़ा कंसर्न जो मैंने कहा कि सेफ्टी रहा है और जैसा आप लोग भी कह रहे हैं कि जो रेगुलेटरी ओवरसाइड को मजबूत
24:45 किया जा रहा है इस बिल के जरिए और एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड को ज्यादा पावर्स मिल रही हैं। तो एक तरह से क्या इंडिया का जो सेफ्टी फ्रेमवर्क ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के बराबर माना जाए? हम ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के बराबर हैं और क्या ये जो तमाम चीजें हैं वो पब्लिक कॉन्फिडेंस जीतने के लिए काफी लग रही हैं आपको? जी देखा जाए तो हमारे जो जो पब्लिक जो स्टैंडर्ड है वो सेफ्टी के मामले में जैसा कि डॉक्टर लेले ने भी कहा कि सेफ्टी के मामले में जो अभी हमारे जो न्यूक्लियर रिएक्टर्स है वो काफी सेफ है और जापान जैसे देश में हम देख चुके हैं कि वहां किस तरह से न्यूक्लियर पावर प्लांट में वहां पर केसेस हुए हैं। तो ऐसा कोई हमारे यहां संभावना नहीं है। पर अह इसमें अगर हम देखें तो और अगर सेक्टर की तुलना
25:31 में अगर कंपैरिजन करूं देखा जाए तो चाहे वो स्पेस सेक्टर हो या इसमें तो इसमें भी हमने प्राइवेट सेक्टर का वहां पर एफडीआई खोल रखा है। तो हमारे यहां की जो जो पॉलिसीज है जो पॉलिसीज वो बड़ी क्लियर और बहुत ही एक कॉम्प्रहेंसिव वर्क के बाद में पॉलिसी क्लियर होती है। तो सेफ्टी रेगुलेशन और पब्लिक का जो उसमें इंटरेस्ट है उसको काफी ध्यान रखा जाता है और कहीं ना कहीं इन सारे इश्यूज पर पब्लिक डोमेन में जाकर के उनसे राय लेकर के वो सब वहां की लोकल कंडीशंस क्या है? लोगों को उसको लेकर के भय नहीं हो। इन सभी चीजों को लोकल गवर्नमेंट के थ्रू इसको दूर किया जाता है। तो ये ऐसे इश्यूज है जिस पर गवर्नमेंट आई थिंक बहुत ही डिटेल में जाकर के और बहुत
26:17 ही ग्रास रूट लेवल पर जाकर काम करती है। तो कहीं अगर इस प्रकार के कोई संशय भी होते हैं तो उन संशय को दूर करने के लिए जो भी सरकारी प्रयास किए जाएंगे शासन की तरफ से वो निश्चित ही किए जाएंगे। परंतु पॉलिसी वाइज अगर देखें हम तो यह बहुत ही एक रिगर प्रोसेस होती है जो कि जो कि इनहेरेंटली सेफ होती है न्यूक्लियर फ्यूजन एनर्जी इसमें ग्रीन एनर्जी और आप ये कहें कि पूरा नो पोल्यूशन नो हार्मफुल गैसेस नो रेडियोएक्टिव फोर्सर्सेस तो इट्स अ काइंड ऑफ क्लीन एनर्जी है तो उसका कोई हार्मफुल इफेक्ट आसपास नहीं दिखाई देता ठीक है डॉक्टर एले आखरी सवाल आपसे अब जातेजाते भारत 2047 तक डेवलप नेशन बनने की बात कर रहा है। नेशनल इंटरेस्ट के नजरिए
27:03 से थोड़ा आप बताइए कि शांति बिल भारत के फ्यूचर एनर्जी आर्किटेक्चर का बैकबोन बन सकता है या यह एक जरूरी लेकिन कहीं ना कहीं क्या आप इसे कुछ कमी या चैलेंज से भरा भी मान रहे हैं? मेरे विचार से दो तीन इश्यूज है। सबसे महत्वपूर्ण इशू यह है कि भारत कमिटेड है क्लाइमेट चेंज के चैलेंजेस को एड्रेस करने के लिए और बाय 2070 नेट जीरो तक जाने के लिए। सो अगर हमें ये कमिटमेंट दिया है तो हमें हमारा जो पूरा आलेख है वो कमिटमेंट की तरफ पहुंचने के लिए तो हमें कहीं ना कहीं ये दिखाना पड़ेगा कि हम काफी सीरियस है और मेरे विचार से ये बिल और भारत का आने वाले दिनों में इंक्रीजिंग इन्वेस्टमेंट इनू न्यूक्लियर एनर्जी सेक्टर ये दर्शाता है कि भारत क्लाइमेट
27:49 चेंज के इश्यूज के लिए अपने नेट जीरो कमिटमेंट के लिए कार्यरत है और राइट ट्रैक पर है। दूसरी चीज यह बिल यह दिखाता है कि हम एक इन्वेस्टमेंट लाने की जरूरत महसूस करते हैं बोथ इंटरनली और एक्सटर्नली जिसके जरिए हमारे पास आर्थिक सुधार आ जाएंगे। काफी सारे जॉब क्रिएट्स भी हो जाएंगे। तीसरी चीज ये है कि हमें क्लीन एनर्जी देश के डेवलपमेंट के लिए चाहिए। अगर आप देखेंगे तो गवर्नमेंट ने काफी सारे महत्वपूर्ण कदम उठाए। वो क्वांटम टेक्नोलॉजीस में हो, नैनो टेक्नोलॉजीस में हो, सेमीकंडक्टर्स में हो, ऑल दीज़ टेक्नोलॉजीस आर एनर्जी गज़लर्स। सो आपको बेसिकली उनको एनर्जी प्रोवाइड करना पड़ेगा उनका रिसर्च डेवलपमेंट, इनोवेशन और सब्सक्वेंटली प्रोडक्शन के लिए। तो भारत
28:35 को एनर्जी की जरूरत है। आने वाले दिनों में अगर हमें विकसित राष्ट्र बनना है तो हमें काफी सारे साइंटिफिक एक्सपेरिमेंट्स करने पड़ेंगे, इंडस्ट्री को बढ़ावा देना पड़ेगा। उसके लिए एनर्जी की जरूरत रहेगी। ठीक है तो हम ये चाहते हैं कि हमें क्लीन एनर्जी की जरूरत हो तो मेरे विचार से यह सब अगर हम लक्ष्य देखें तो क्लीन एनर्जी की रिक्वायरमेंट डेफिनेटली है और न्यूक्लियर एनर्जी उसका एक जरिया है ठीक है इसी के साथ समय चर्चा का यहीं पूरा हो गया है डॉक्टर लेले आपका प्रोफेसर प्रजापति आप दोनों मेहमानों का बहुत-बहुत शुक्रिया मेरे साथ आज मुद्दा आपका में इस चर्चा में जुड़ने के लिए तो इस चर्चा से कहीं ना कहीं साफ है कि शांति बिल 2025 को सिर्फ एक टेक्निकल रिफॉर्म के रूप में नहीं देखना चाहिए बल्कि भारत की जो एनर्जी आर्किटेक्चर है उसकी दिशा बदल सकता है। यह प्राइवेट सेक्टर को रेगुलेटेड न्यूक्लियर
29:21 स्पेस में क्यों इनवाइट कर रहा है और यह कि हमारे 2047 के विज़न को कैसे शेप दे सकता है। ये सब हमने देखा समझा। हमने देखा कि ये बिल 60 साल पुराने लॉस को नई एनर्जी नीड्स के अनुरूप रिप्लेस कर रहा है और ये प्राइवेट पार्टिसिपेशन टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप्स और रेगुलेटरी क्लेरिटी को आगे बढ़ाता है और ये एनर्जी सिक्योरिटी क्लाइमेट गोल्स और इनोवेशन इकोसिस्टम को एक स्ट्रक्चरर्ड रोड मैप दे रहा है। और जैसा कि चर्चा में साफ हुआ है हमारे एक्सपर्ट्स ने जो इनसाइट्स दी हैं उससे ये साफ है कि ये अब सिर्फ अभी के हम देखें तो एनर्जी चैलेंजेस का जवाब कहीं ना कहीं इस बिल के जरिए नहीं है। बल्कि भारत का जो एनर्जी फ्यूचर है उसका ब्लूप्रिंट भी यह बिल यह सुधार साबित हो सकता है। मुद्दा आपका में फिलहाल इतना ही नमस्कार। [संगीत]
30:15 संसद टीवी के और भी प्रोग्राम्स देखने के लिए सब्सक्राइब करें हमारा YouTube चैनल और हां इन्हें लाइक और शेयर करना ना [संगीत] भूलें।