0:00 एक पुरानी कहानी है चंगत्त्सु की। चंगत्त्सु जंगल से गुजर रहा था अपने शिष्यों के साथ और उसने देखा एक बहुत बड़ा वृक्ष इतना विशाल कि हजारों बैलगाड़ियां उसकी छाया में खड़ी हो सकती थी। लकड़हारे उस वृक्ष के पास से गुजर रहे थे। पर किसी ने उसे काटा नहीं। चंगत्त्सु ने पूछा ये वृक्ष इतना बड़ा है, इतना पुराना है, फिर भी बचा हुआ है। कारण क्या है? लकड़हारों ने कहा, "यह वृक्ष बेकार है। इसकी लकड़ी से ना घर बन सकता है, ना नाव, ना फर्नीचर। इसकी लकड़ी टेढ़ी है, गांठदार है। किसी काम की नहीं। इसलिए इसे कोई काटता नहीं। चांगत्सु मुस्कुराया और अपने शिष्यों से
0:46 कहा ये वृक्ष अपनी बेकारी के कारण बच गया। अपनी उपयोगिता के कारण नहीं। जो वृक्ष सीधे थे, उपयोगी थे, सुंदर लकड़ी वाले थे। वे कप के कट चुके हैं। यह वृक्ष मूर्ख दिखता है, बेकार दिखता है। इसीलिए जीवित है। यही रहस्य है समझने का। संसार में जो चतुर दिखते हैं, जो हर जगह अपनी बुद्धिमानी सिद्ध करना चाहते हैं, वे अक्सर सबसे पहले कट जाते हैं। और जो मूर्ख होने का साहस रखते हैं, जो अपनी बुद्धिमानी को छिपा लेते हैं, वे बच जाते हैं। वे गहरे में जीते हैं। वे शांति से जीते हैं। ये कोई तरकीब नहीं है जो मैं तुम्हें सिखा रहा हूं। ये कोई चालाकी नहीं है। ये एक गहरी समझ है जीवन की प्रकृति
1:32 की। सुकरात ने कहा था मैं इतना ही जानता हूं कि मैं कुछ नहीं जानता यह वाक्य सुनने में विनम्रता जैसा लगता है पर यह विनम्रता नहीं है यह परम बुद्धिमत्ता है जो व्यक्ति यह कह सकता है कि मैं कुछ नहीं जानता वह वास्तव में सबसे ज्यादा जानता है क्योंकि ज्ञान का पहला कदम है अज्ञान को स्वीकार करना जो अपने अज्ञान को स्वीकार नहीं करता वह कभी सीख नहीं सकता उसका पात्र पहले से भरा हुआ है उसमें उसमें नया कुछ डाला ही नहीं जा सकता और जो अपने को खाली रखता है मूर्ख की तरह अज्ञानी की तरह उसमें अस्तित्व की वर्षा गिरती रहती है। मुल्ला नसरुद्दीन की एक कहानी है। मुल्ला एक दिन बाजार में गया और लोगों से पूछने लगा क्या
2:20 तुमने मेरा गधा देखा? लोग हंसने लगे। उन्होंने कहा मुल्ला तुम तो खुद गधे पर बैठे हो और गधे को ढूंढ रहे हो। मुल्ला ने कहा अगर मुझे पता होता कि मैं गधे पर बैठा हूं तो मैं यह सवाल क्यों पूछता? यह कहानी मूर्खतापूर्ण लगती है। पर इसमें गहरा राज छिपा है। हम सब वही खोज रहे हैं जिस पर हम बैठे हैं। हम परमात्मा को खोज रहे हैं और परमात्मा हमारे भीतर बैठा है। हम आनंद को खोज रहे हैं। बाहर दूर कहीं और आनंद हमारे स्वभाव में ही छिपा है। मुल्ला नसरुद्दीन की मूर्खता असल में सबसे गहरी बुद्धिमत्ता है क्योंकि वह अपने को गंभीरता से नहीं लेता। वह खुद पर हंस सकता है और जो
3:05 व्यक्ति खुद पर हंस सकता है, वह किसी दूसरे पर कभी क्रूर नहीं हो सकता। अब जरा सोचो हमारा पूरा समाज पूरी सभ्यता किस चीज पर टिकी है? इस बात पर कि हर आदमी दूसरे से ज्यादा बुद्धिमान दिखना चाहता है। दफ्तर में, घर में, बाजार में हर जगह लोग अपनी बुद्धिमानी का प्रदर्शन कर रहे हैं। कोई किसी से कम नहीं दिखना चाहता। यह प्रदर्शन इतना गहरा हो गया है कि लोग अपनी असली राय भी नहीं रखते। वे वो राय रखते हैं जो उन्हें चतुर दिखाए। कोई सिनेमा देखकर आता है और अगर वह फिल्म प्रशंसित है तो वह कहेगा कि यह महान फिल्म है। भले ही उसे भीतर से कुछ समझ ना आया हो क्योंकि अगर वह कहे कि मुझे समझ नहीं आया तो लोग
3:52 सोचेंगे वो मूर्ख है। यह डर मूर्ख दिखने का डर हमारी सबसे बड़ी बीमारी है। मैं तुमसे कहता हूं यह डर छोड़ दो। मूर्ख दिखने का साहस रखो। जब कोई गहरी बात हो, दार्शनिक चर्चा हो और तुम्हें समझ ना आए, तो कह दो मुझे समझ नहीं आया। इसमें कुछ भी शर्म की बात नहीं है। शर्म तो इसमें है कि तुम समझने का दिखावा करते रहो और भीतर से अंधेरे में ही रहो। जो आदमी अपनी अज्ञानता को स्वीकार कर लेता है, उसके भीतर एक द्वार खुल जाता है। [गहरी सांस लेने की आवाज़] और जो आदमी हमेशा जानकार बना रहता है, उसके सारे द्वार बंद हो जाते है। बोधी धर्म की कहानी सुनो। जब बोधि धर्म चीन गया, तो सम्राट व ने उससे मिलने बुलाया।
4:38 सम्राट बड़ा गर्वित था। उसने बहुत मंदिर बनवाए थे। बहुत भिक्षुओं को दान दिया था। उसने बोधि धर्म से पूछा मुझे इससे कितना पुण्य मिलेगा बोधि धर्म ने कहा कुछ नहीं सम्राट चौक गया उसने पूछा तो फिर धर्म का सबसे बड़ा सिद्धांत क्या है बोधि धर्म ने कहा विशाल शून्यता उसमें कुछ भी पवित्र नहीं सम्राट और भी उलझन में पड़ गया उसने पूछा तो मेरे सामने कौन खड़ा है बोधिधर्म ने कहा मुझे नहीं पता और यह कहकर वो चला गया। अब सोचो बोधी धर्म जैसा महान गुरु जिसने चांद बौद्ध धर्म की नीव रखी वो कह रहा है मुझे नहीं पता। यह
5:24 मूर्खता नहीं है। यह परम ज्ञान है। क्योंकि जो व्यक्ति सच में जान चुका है, वह जानता है कि शब्दों में उस जानने को बांधा नहीं जा सकता। इसलिए वह कहता है मुझे नहीं पता। पर सम्राट जैसे लोग जो अहंकार से भरे हैं, वे इसे मूर्खता समझते हैं या अपमान समझते हैं। वे नहीं समझ पाते कि यह उत्तर सबसे गहरा उत्तर था जो दिया जा सकता था। देखो मूर्ख होने का दिखावा और मूर्ख होना इन दोनों में जमीन आसमान का फर्क है। जो सच में मूर्ख है वो अपनी मूर्खता से अनजान है। वो सोचता है कि वह बहुत समझदार है और यही उसकी मूर्खता का प्रमाण है। पर जो व्यक्ति गहरे में जान चुका है, समझ चुका है और फिर भी अपनी समझ
6:11 का प्रदर्शन नहीं करता, वो मूर्ख होने का दिखावा कर रहा है। ये एक कला है, एक साधना है। यह कोई साधारण अभिनय नहीं है। लाओत्सु ने कहा था, महान बुद्धिमत्ता मूर्खता जैसी दिखती है। यह वाक्य बहुत गहरा है। जो व्यक्ति सच में गहराई से जीता है, उसकी उपस्थिति में कोई शोर नहीं होता, कोई प्रदर्शन नहीं होता। वह साधारण दिखता है, सीधा दिखता है। कभी-कभी भोला भी दिखता है। पर उसके भीतर एक सागर की गहराई होती है। जबकि जो व्यक्ति सत ही तौर पर चतुर दिखता है, बातचीत में हमेशा जीतना चाहता है। हर तर्क में अपनी बुद्धिमानी सिद्ध करना चाहता है। उसके भीतर अक्सर एक खोखलापन होता है। वह डरा हुआ होता है कि कहीं कोई
6:58 उसकी असलियत ना देख ले। इसलिए वह हमेशा चतुराई का चोला पहने रहता है। मैं तुम्हें एक और कहानी सुनाता हूं। एक जेन गुरु था जिसका नाम था रियोकान। वो एक पहाड़ी गांव में रहता था। एक छोटी सी झोपड़ी में। लोग उसे मूर्ख समझते थे। क्योंकि वह बच्चों के साथ खेलता रहता था। गेंद खेलता, छुपन छुपाई खेलता, दिनभर हंसता रहता। एक दिन एक चोर उसकी झोपड़ी में घुसा। चुराने के लिए कुछ ढूंढने लगा। रियोकान के पास कुछ नहीं था। बस एक चटाई और कुछ कपड़े। चोर निराश होकर लौटने लगा। तो रियोान ने कहा रुको तुम खाली हाथ मत जाओ। उसने अपने कपड़े उतार कर चोर को दे दिए। और खुद नंगा बैठकर चांद को देखता
7:47 रहा। उसने सोचा काश मैं उसे यह सुंदर चांद भी दे पाता। यह घटना सुनकर लोग कहेंगे यह आदमी मूर्ख है। पर इस मूर्खता में जो करुणा है, जो निर्भयता है, जो त्याग है, वह किसी भी तथाकथित बुद्धिमान आदमी के पास नहीं होगी। बुद्धिमान आदमी सोचेगा यह मेरी संपत्ति है, इसे बचाना है, पुलिस बुलानी है, कानूनी कारवाई करनी है। रियोान जैसा मूर्ख आदमी सीधे प्रेम से जीता है। बिना किसी हिसाब के। यही फर्क है साधारण मूर्खता और साधना से आई मूर्खता में। अब प्रश्न यह उठता है कि यह दिखावा क्यों जरूरी है? क्यों ना सीधे अपनी बुद्धिमानी दिखाई जाए अगर वह सच में है। इसका उत्तर
8:32 समझना जरूरी है। जब तुम अपनी बुद्धिमानी दिखाते हो तो तुम दूसरों में असुरक्षा पैदा करते हो। लोग तुमसे ईर्ष्या करने लगते हैं। तुमसे बचने लगते हैं, तुम्हारे खिलाफ हो जाते हैं। पर जब तुम मूर्ख होने का दिखावा करते हो, विनम्र दिखते हो, साधारण दिखते हो, तो लोग तुम्हारे पास सहज हो जाते हैं। वे तुम्हें अपना समझने लगते हैं और उस सहजता में ही संवाद संभव होता है, प्रेम संभव होता है, गहरा संबंध संभव होता है। एक और पहलू है इसका। जब तुम हमेशा अपनी बुद्धिमानी सिद्ध करने में लगे रहते हो तो तुम्हारा मन कभी शांत नहीं होता। वो हमेशा सतर्क रहता है। हमेशा तुलना करता रहता है। हमेशा जीतने की कोशिश में रहता है। यह मन थक जाता है। यह मन
9:20 बीमार हो जाता है। पर जब तुम मूर्ख होने का साहस रखते हो। जब तुम हार को स्वीकार कर सकते हो। जब तुम कह सकते हो कि मुझे नहीं पता तब तुम्हारा मन विश्राम में चला जाता है और उस विश्राम में ही ध्यान की शुरुआत होती है। ध्यान कोई तकनीक नहीं है। ध्यान एक अवस्था है जिसमें तुम अपनी छवि की रक्षा करना बंद कर देते हो। तुमने देखा होगा छोटे बच्चे कितने आनंदित रहते हैं। उनका आनंद इसलिए है क्योंकि उन्हें कोई फिक्र नहीं होती कि लोग उन्हें बुद्धिमान समझे या मूर्ख। वे बेधड़क सवाल पूछते हैं बेधड़क गलतियां करते हैं बेधड़क हंसते हैं। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, समाज उसे सिखाता है। ऐसे मत बोलो, लोग हसेंगे।
10:07 ऐसा मत पूछो। लोग समझेंगे तुम्हें कुछ नहीं पता। और धीरे-धीरे बच्चा अपने भीतर के उस निर्दोष मूर्ख को दबा देता है और एक चतुर सतर्क डरा हुआ वयस्क बन जाता है। मैं तुमसे कहता हूं अपने भीतर के उस बच्चे को फिर से जगाओ। उस मूर्खता को जो असल में निर्दोषता है। फिर से जीने दो। मुझसे लोग अक्सर पूछते हैं ओशो हम ध्यान करना चाहते हैं। पर हमें डर लगता है कि लोग क्या कहेंगे। हम आंख बंद करके बैठना चाहते हैं भीड़ में पर लगता है लोग हमें पागल समझेंगे। मैं कहता हूं समझने दो। पागल दिखने का साहस रखो। दुनिया की हर महान खोज हर महान क्रांति हर महान आध्यात्मिक
10:54 यात्रा उन लोगों ने की है जिन्होंने पागल दिखने का जोखिम उठाया। बुद्ध ने राजमहल छोड़ा। लोगों ने उसे पागल कहा। महावीर नग्न घूमे। लोगों ने उन्हें पागल कहा। जीसस ने कहा, "मैं ईश्वर का पुत्र हूं। लोगों ने उसे सूली पर चढ़ा दिया। पागल और विधर्मी कहकर। पर आज वही लोग पूजे जाते हैं और जिन्होंने उन्हें पागल कहा था। वे इतिहास में कहीं खो गए। तो मूर्ख होने का दिखावा करना कोई कमजोरी नहीं है। यह सबसे बड़ी शक्ति है। यह अहंकार को चुनौती देना है। अहंकार हमेशा चाहता है कि तुम श्रेष्ठ दिखो, ऊंचे दिखो, दूसरों से बेहतर दिखो। और जिस दिन तुम कह देते हो ठीक है मैं मूर्ख दिखूंगा मुझे परवाह नहीं उस दिन
11:40 अहंकार की जड़े हिल जाती हैं। यह कोई एक बार में हो जाने वाली बात नहीं है। यह रोज-रोज की साधना है। हर बार जब तुम्हारे भीतर यह इच्छा उठे कि लोगों को दिखाओ कितने बुद्धिमान हो। उस इच्छा को देखो और चुपचाप बैठ जाओ। मैं एक और कहानी याद दिलाता हूं। यह जापान की है। एक बूढ़ा जैन गुरु था, जो हमेशा एक ही जवाब देता था हर सवाल का। चाहे सवाल कुछ भी हो, वह बस अपनी उंगली उठा देता था। उसके पास एक छोटा शिष्य था जो यह देखकर सीख गया। जब भी कोई मेहमान आता और ज़ैन गुरु से पूछता कुछ। गुरु के जवाब देने से पहले ही वह छोटा बच्चा उंगली उठा देता। नकल करते हुए। गुरु ने यह देखा और एक दिन उस बच्चे की उंगली
12:27 काट दी। बच्चा दर्द से चिल्लाया भागने लगा गुरु ने उसे पुकारा बच्चा पलटा तो गुरु ने फिर वही सवाल पूछा जो मेहमान पूछते थे बच्चे ने आदतन अपना हाथ उठाया उंगली दिखाने के लिए पर उंगली तो थी ही नहीं उस खालीपन में उस झटके में बच्चा जाग गया यह कहानी क्रूर लगती है पर इसका सार यह है कि नकल की गई बुद्धिमानी उधार का ज्ञान किसी काम का नहीं असली जागरण तभी होता है जब तुम अपनी सारी उधार ली हुई चतुराई गवा देते हो और खाली रह जाते हो। यही खालीपन है जो मैं तुमसे मांग रहा हूं। मूर्ख होने का दिखावा करने का मतलब है अपनी उधार ली हुई चतुराई को उतार फेंकना। तुमने जो
13:14 किताबों से पढ़ा है जो दूसरों से सुना है जो समाज ने तुम्हें सिखाया है कि यह बुद्धिमानी की निशानी है उस सब को एक तरफ रख दो और सीधे सरल निर्दोष होकर जीवन का सामना करो इसमें शुरू में डर लगेगा लगेगा कि लोग तुम्हारा मजाक उड़ाएंगे। तुम्हें कमतर समझेंगे। पर धीरे-धीरे तुम पाओगे कि यही निर्दोषता तुम्हारी सबसे बड़ी शक्ति बन जाती है। लोग तुम्हारी उपस्थिति में सुरक्षित महसूस करने लगते हैं क्योंकि तुम उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश नहीं कर रहे। अब एक और गहरी बात समझो। जब तुम मूर्ख होने का दिखावा करते हो तो तुम असल में अपने अहंकार को एक चाल दे रहे हो। तुम कह रहे हो ठीक है अहंकार। तू सोच कि मैं
14:03 मूर्ख हूं। पर भीतर से मैं जानता हूं कि मैं कौन हूं। यह जो भीतर की शांति है, यह किसी को दिखाने की जरूरत नहीं। सूफी परंपरा में एक शब्द है मलामती। यह वो सूफी संत होते थे जो जानबूझकर ऐसे काम करते थे जिनसे लोग उनकी निंदा करें, उन्हें बुरा समझें, मूर्ख समझें ताकि उनके भीतर अहंकार पैदा ना हो सके। क्योंकि जैसे ही लोग तुम्हारी पूजा करने लगते हैं, तुम्हें संत समझने लगते हैं। वैसे ही तुम्हारे भीतर एक सूक्ष्म अहंकार पैदा हो जाता है। मैं संत हूं, मैं पवित्र हूं। मलामती संत इस खतरे से बचने के लिए जानबूझकर मूर्खता या यहां तक कि निंदनीय व्यवहार का दिखावा करते थे। यह गहरी साधना है। यह हर किसी के लिए नहीं
14:50 है। पर इसका सार समझना जरूरी है। तुम्हें मलामती बनने की जरूरत नहीं। पर तुम इतना तो कर सकते हो कि अपनी बुद्धिमानी का प्रदर्शन बंद करो। जब कोई बहस हो तो हर बार जीतने की जिद मत करो। कभी-कभी हार जाने दो। भले ही तुम सही हो। इससे तुम्हारा कुछ नहीं घटता। बल्कि तुम्हारे भीतर एक हल्कापन आता है। जब कोई तुमसे कोई प्रश्न पूछे जिसका उत्तर तुम्हें पता हो तो जरूरी नहीं कि हर बार अपना ज्ञान बघारो। कभी-कभी चुप रह जाओ या कहो मुझे नहीं पता तुम बताओ तुम क्या सोचते हो। इससे सामने वाले को सम्मान मिलता है और तुम्हारे भीतर अहंकार की जगह विनम्रता आती है। एक शिष्य ने एक गुरु से पूछा गुरुदेव
15:35 ज्ञान क्या है? गुरु ने कहा ज्ञान यह जानना है कि तुम्हें कुछ नहीं पता। शिष्य फिर पूछा तो अज्ञान क्या है? गुरु ने कहा अज्ञान यह सोचना है कि तुम्हें सब पता है। यह छोटा सा संवाद पूरी बात कह देता है। जो व्यक्ति सोचता है उसे सब पता है। वह सबसे बड़ा अज्ञानी है। चाहे वह कितनी भी डिग्रियां ले ले, कितनी भी किताबें पढ़ ले। और जो व्यक्ति स्वीकार करता है कि उसे कुछ नहीं पता। वह ज्ञान के द्वार पर खड़ा है। मैं तुम्हें अपने अनुभव से कहता हूं जितना मैंने जाना है, उतना ही मुझे यह एहसास हुआ है कि जानने को कुछ खत्म नहीं होता। अस्तित्व इतना विशाल है, इतना रहस्यमय है कि कोई कितना भी जान ले, वह
16:21 हमेशा एक बूंद ही रहेगा सागर के सामने। पर जो व्यक्ति अपने को सब कुछ जानने वाला समझता है, वह उस सागर से मुंह मोड़ लेता है। वह अपनी बूंद में ही कैद हो जाता है। इसलिए मैं कहता हूं अपने अज्ञान को गले लगाओ। अपनी मूर्खता को स्वीकार करो। यह कोई हार नहीं है। यह द्वार है असीम की ओर। अब मैं तुम्हें एक व्यवहारिक बात बताता हूं। यह मूर्ख होने का दिखावा यह सिर्फ किसी दार्शनिक विचार तक सीमित नहीं है। इसे तुम अपने दैनिक जीवन में उतार सकते हो। जब तुम अपने परिवार के साथ हो जब तुम्हारे बच्चे कोई सवाल पूछे जिसका जवाब तुम्हें नहीं पता तो बेझिझक कह दो मुझे नहीं पता। चलो साथ में खोजते हैं। इससे
17:06 बच्चे में जिज्ञासा बढ़ेगी और तुम्हारे और उसके बीच एक सच्चा रिश्ता बनेगा। जब तुम अपने दफ्तर में हो और कोई गलती हो जाए तो उसे छुपाने की कोशिश मत करो। खुलकर स्वीकार करो। मुझसे गलती हुई। यह कमजोरी नहीं दिखाती। यह साहस दिखाती है। लोग तुम्हारा सम्मान और बढ़ाएंगे। कम नहीं करेंगे। जब तुम किसी नए विषय को सीख रहे हो। चाहे वह कोई भाषा हो, कोई कला हो, कोई खेल हो, तो शुरुआत में मूर्ख जैसा महसूस करना स्वाभाविक है। बहुत से लोग इसी डर की वजह से नई चीजें सीखना छोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है लोग हसेंगे मुझ पर, मैं गलतियां करूंगा। मैं तुमसे कहता हूं, गलतियां करने का साहस रखो। जो
17:52 व्यक्ति गलतियां करने से डरता है, वह कभी कुछ नया नहीं सीख सकता। बच्चे जब चलना सीखते हैं तो सैकड़ों बार गिरते हैं पर वे शर्मिंदा नहीं होते वे फिर उठते हैं। यही भाव तुम्हें जीवन भर रखना है। अब जरा गहरे में उतरो। यह मूर्ख होने का दिखावा अंततः अहंकार [गला साफ़ करने की आवाज़] के विसर्जन की एक साधना है। अहंकार का सारा खेल इसी बात पर टिका है कि मैं कुछ हूं। मैं विशेष हूं। मैं दूसरों से बेहतर हूं। जिस पल तुम कहते हो ठीक है। मैं साधारण हूं। मैं मूर्ख भी हो सकता हूं। मुझे कोई फिक्र नहीं। उस पल अहंकार को सांस लेने की जगह नहीं मिलती। और जहां अहंकार नहीं होता, वहीं परमात्मा का प्रवेश होता है।
18:38 यह कोई तकनीक नहीं है जिसे तुम एक बार सीख लो और हमेशा के लिए इस्तेमाल करो। ये एक जीवन शैली है। एक निरंतर सजगता है। मुझे एक और घटना याद आती है। एक सम्राट था जो बहुत घमंडी था अपने ज्ञान पर। उसने एक फकीर को बुलाया अपने दरबार में और उससे पूछा तुम मुझे बताओ ईश्वर कहां है? फकीर ने कहा पहले तुम मुझे बताओ ईश्वर कहां नहीं है? सम्राट चुप हो गया। उसके पास कोई उत्तर नहीं था। फकीर हंसा और चला गया। ये जो चुप्पी थी सम्राट की, यही उसकी सच्ची शुरुआत थी सीखने की। पर सम्राट का अहंकार