0:00 साधक ने पूछा है पाप क्या है? इस प्रश्न का सीधा सा उत्तर यह है कि जो अच्छा ना हो वो पाप है। दो चीज होती है। एक अच्छी एक बुरी एक पुण्य, एक पाप, एक शुभ कर्म, एक अशुभ कर्म। तो जो शुभ कर्म ना हो वही अशुभ कर्म है। जैसे दो आदमी आपके सामने हो
0:47 और आपको पता लगाना है कि इन दोनों में से सुश्वरी कौन है तो दूसरे का पता लग जाए अगर तो सिद्ध है कि उससे जो बचा वो सुश्वरी है। यानी अशुभ कर्म क्या है? यह जानने के लिए शुभ कर्म क्या है? यह जानना होगा। तो शुभ कर्म केवल भगवान संबंधी कर्म ही है। प्रत्येक शब्द पर ध्यान दो। भगवान संबंधी
1:37 कर्म ही शुभ कर्म है। शेष सब कर्म अशुभ कर्म है। पाप कर्म है। बड़ी सीधी सी परिभाषा है। भगवान उनका नाम उनका रूप उनका गुण उनकी लीला उनके धाम उनके संत इतने का नाम भगवान है। इतने में कोई छोटा बड़ा नहीं सब में सबका निवास है। तो इतने में अगर आपका
2:24 भाव क्रिया सही है तो आप शुभ कर्म करने वालों में आ गए। अगर इनके प्रति खराब भावना आई, दुर्भावना आई तो वह सबसे बड़ा पाप और इन सब में दो ही प्रमुख है। एक भगवान श्री कृष्ण और एक उनका जन महापुरुष इन दोनों के प्रति अगर हमारे मन का अनुराग हुआ,
3:11 शरणागति हुई तो यह शुभ कर्म है। और इन दोनों के विपरीत अगर हमने कुछ सोचा बोला नहीं सोचा उसको दुर्भावना कहते हैं। तो इस पाप का नाम है नामापराध। यह सबसे बड़ा पाप है। इससे आगे और कोई पाप नहीं। इसके नीचे पांच महापाप होते हैं। ब्राह्मण की हत्या और इसी प्रकार के शराब पीने वाला आदमी
4:00 ये सब महापापी है पांच प्रकार के। और उससे नीचे है वह सब पापी है। पापी महापापी और नामा अपराध के पाप करने वाले ऐसे हैं जिनका कोई प्रायश्चित नहीं। शास्त्र में नहीं लिखा है। आपने एक गाय मार दिया तो शास्त्र में प्रायश्चित लिखा है। वह कर दीजिए। बस पाप से आप बरी हो जाएंगे। आप झूठ बोले हैं तो उसका यह प्रायश्चित तय कर लो। बस पाप से आप मुक्त हो गए। लेकिन नामा अपराध से मुक्त नहीं हो सकता कोई। जब
4:45 तक कि जिसके प्रति नामा अपराध हुआ है वही क्षमा ना कर दे। दुर्वासा इतने बड़े योगेंद्र थे जो सृष्टि कर दे नई पुरुष को पत्थर बना दे इतनी पावर थी तपश्चर्या की लेकिन अंबरीश महापुरुष था श्री कृष्ण का भक्त था एक बार दावत में गए दुर्वासा [संगीत] तो अंबरीश ने पयण कर रखा था व्रत तो उनको
5:34 व्रत तोड़ते समय का उसका मुहूर्त होता है उस समय व्रत तोड़ा जाता है तो दुर्वासा के आने में देर हो गई तो उन्होंने थोड़ा सा पानी पी लिया बस दुर्वासा तो अंतर्यामी थे जान गए उन्होंने कहा क्यों रे तुझे राजा होने का घमंड है बिना हमको खिलाए तूने पानी पी लिया तो एक शक्ति उनके पास जो सबसे बड़ी थी कृत्या वो समस्त ब्रह्मांड में किसी का भी सर काट दे उस कृत्या को बुलाया दुर्वासा ने
6:22 कि काट दो सर इसका अंबरीश का अंबरीश बैठे थे अपना श्री कृष्ण का ध्यान करते हुए अरे काट दो भाई ये शरीर तो गंदा है मिथ्या है नश्वर है एक दिन समाप्त होगा ही अरे जब तक है तब तक भी घोर गंदा है रोम रोम से पसीना निकलता है और पेट में तो गंदगी का भंडार ही है। वह थैला है। थैला पेट तो कोई बात नहीं। ये ब्राह्मण महर्षि है काट दे हमारा सर। वो सिर झुका के बैठ गए।
7:08 भगवान को सहन नहीं हुआ। विष्णु स्थाने कृतम पापम गुरु स्थाने प्रमुच्यते अगर भगवान के प्रति कोई अपराध करे तो महापुरुष क्षमा कर सकता है उसको पावर है लेकिन महापुरुष के प्रति भक्त के प्रति अपराध हो जाए तो भगवान क्षमा नहीं कर सकते कोई भी गति उसकी नहीं है त्रैलोक्य में घूम करें तो जब कृत्या को लगा दिया तो भगवान ने अपना चक्र लगा दिया कृत्या के पीछे दुर्वासा के पीछे अब दुर्वासा भागे
7:57 ब्रह्मा के पास गए शंकर सब जगह उनकी गति थी इतने बड़े तपस्वी थे सब ने कहा भाई ये हमारे बस का नहीं है तुमने भक्त के प्रति अपराध किया है मैं कुछ नहीं कर सकता वरना मैं भी बीच में मारा जाऊंगा क्योंकि तुमने नामा अपराधी का साथ दिया तो तुम भी नाम अपराधी हो। जैसे किसी आतंकवादी को कोई अपने घर में ठहरा ले तो वह भी गुनहगार है। तो आखिरकार फिर उनको राय दी गई कि देखो भाई तुमने जहां अपराध किया है वहीं जाकर क्षमा
8:43 मांगो। अंबरीश से। ब्राह्मण तपस्वी होकर के भी क्षत्रिय राजा के चरण पकड़ कर रोए। तब चक्र पीछे हटा। क्षमा मिली। इतना बड़ा अपराध है। नाम अपराध। एक बार गौरांग महाप्रभु ऐसे बैठे बैठे भक्तों से बोले अरे भाई आज एक बड़े भक्त के पास चलना है मिलने तो सारे भक्तों ने कहा है गौरांग महाप्रभु तो भगवान के अवतार हैं यह किससे जाएंगे
9:31 मिलने अरे जो भी और कोई हो इनके पास आवे लेकिन अब किसी की बोलने की हिम्मत नहीं। अब गुरु जी कह रहे हैं चलना है तो बस चलो भाई। तो एक पुंडरीिक विद्यानिधि थे संत और उनके ठाट बाट सोने के पलंग हीरे जवाहरात लगे हुए। किसी राजा का भी ऐसा ठाट नहीं होगा जैसा ठाट उनका था। अब भक्तों ने देखा कि यह तो घोर संसारी है और इसके लिए गौरांग महाप्रभु स्वयं चलकर आए। बड़ा आश्चर्य है।
10:18 एक के दिमाग में बीमारी पैदा हो गई। औरों को आश्चर्य तो हुआ। लेकिन उन्होंने कहा अरे भाई यह ध्रुव प्रहलाद बड़े-बड़े महापुरुष सारी पृथ्वी के सम्राट रहे हैं भगवत प्राप्ति के बाद में तो ये कोई ऐसा नहीं है कि यहां ऐसा क्यों हो रहा है? दूध में से मक्खन अगर निकाल ले फिर पानी में डाल दे तो कोई डर नहीं। वो मक्खन तैरता रहेगा 10 घंटे लेकिन दूध में पानी मिला दोगे तो वह एक हो जाएगा
11:03 तो पहले दूध को दही बनाओ फिर जमा करके दही बन गया तो मथो मक्खन निकालो फिर पानी में डाल दो ऐसे ही पहले साधना करो अंत अंतःकरण को शुद्ध करो। गुरु के द्वारा दिव्य प्रेम प्राप्त करो। अब पक्का हो गया तुम्हारा स्वरूप। अब तुम चाहे करोड़ों वर्ष राज्य करो। अब माया तुम्हारा कुछ नहीं कर सकती। तो माया से उत्तीर्ण हो चुके। अब जैसे कमल के पत्ते पर जल रहता है ऐसे
11:51 ही तुम रहोगे। तुम्हारा काम योग माया से होगा। योग माया का मतलब माया का कार्य तो करें। काम का, क्रोध का, लोभ का, मोह का, ईर्ष्या का, द्वेष का। अरे करोड़ों मर्डर किया अर्जुन ने और हनुमान जी ने। कोई मामूली अपराध नहीं। ब्राह्मणों की हत्या। ब्रह्म हत्या किया हनुमान जी ने करोड़ों रावण के खानदान का। लेकिन उनके ऊपर कोई दफा लागू ही नहीं हुई।
12:40 323 भी नहीं लागू हुई। मर्डर की कौन कहे? क्यों? इसलिए कि उनका मन श्री कृष्ण में श्री राम में ही था। इसलिए इंद्रियों के वर्क का कोई फल नहीं। योग माया से वर्क करते हैं भगवान और महापुरुष। तो योग माया का मतलब अपनी पर्सनालिटी में रहे और काम करें माया का। यह रहस्य जब तक कोई नहीं जानता तब तक वो सदा महापुरुषों की और भगवान की बुराई करता फिरता है। भगवान ने 16108
13:28 ब्याह क्यों किया? और एक एक स्त्री के 10 बच्चे और फिर भी आत्माराम है। उनमें ना काम है ना क्रोध है ना लोभ है। अरे उनको पा लेने वाले में नहीं रहता तो उनमें क्या रहेगा? लेकिन कैसे? उसी योग माया शक्ति के कारण। वो पावर है ऐसी जो करतुम अकर्तुम अन्यथा करतुम समर्थ है जो चाहे करे जो चाहे ना करे जो चाहे उल्टा कर दे तो सबसे बड़ा पाप भगवान और महापुरुष के
14:15 प्रति है और वो पाप बाहरी नहीं मन का मन से हमने हमने सोचा बस पाप हो गया। उल्टा सोचा ये हमारी तरह तो खाता है, पीता है, चलता है, फिरता है, सोता है, हंसता है, रोता है, गाता है। ये काहे का भगवान है? बल्कि और अधिक आप लोगों में से किसी का बेटा बेटी किसी का बीवी मां कोई खो जाए तो आप लोग क्या करेंगे? अरे रेडियो से अनाउंस करवाएंगे और टीवी में दे देंगे और 10 20 हजार आदमी
15:03 यहां वहां भेज के पता लगाएंगे रिश्तेदारों में यही तो करेंगे लेकिन राम को देखो पेड़ों से पूछ रहे हैं हां सीता के नन नीता ऐ पेड़ों ऐ पहाड़ों ऐ कंदराओ बताओ मेरी सीता इधर से तो नहीं गई। ये लैला मजनू का जो आप लोग इतिहास पढ़ते हैं भला बताओ इस इतिहास के आगे वो क्या है? अरे कोई पेड़ से पूछेगा। क्या पेड़ बोलेगा? हां हमारी नीचे से होके गई है सीता।
15:49 लेकिन समाधि में इतना स्त्री प्रेम तो यह लीला फैक्ट नहीं है। लीला सर्वव्यापक को क्या नहीं पता है कहां सीता है, कहां कौन है। लेकिन इस लीला को अगर हम अल्पज्ञ देखते हैं तो कहते हैं ये देखो ये देखो और ये वशिष्ठ जी कह रहे थे कि ये भगवान है। ऐसे ही भगवान होते हैं। हम लोगों ने मजाक बनाया था। हम लोग भी थे। राम के जमाने में भी अनंत बार रहे। श्री कृष्ण के अवतार में भी अनंत बार रहे। तुलसी सूर मीरा कबीर नानक तुकाराम शंकराचार्य वल्लभाचार्य निमारकाचार्य सबके
16:36 जमाने में हम लोग रहे। लेकिन यह माया वाली बुद्धि लगाया। यह कितने लंबे हैं, कितने चौड़े हैं, काले हैं, गोरे हैं, सुंदर हैं। कुरूप अरे यह क्या देख रहा? अंदर घुस के देख। अंदर तो घुसना आता ही नहीं। तो फिर क्या तू निश्चय करेगा किसी महापुरुष का? अरे भाई अगर किसी एमए के पढ़ाने वाले प्रोफेसर का निर्णय करना है तो कम से कम तुम भी तो बीए पास रहो। ए बी सी डी जानते नहीं हो। तुम निर्णय करोगे कि हमें हमको पढ़ा सकता है कि नहीं।
17:22 तो माइक एरिया में जब अपने से आगे वाली स्टेज पर बिना पहुंचे वहां का अनुभव नहीं हो सकता तो दिव्य जगत में क्या है? उसको तुम क्या जानोगे? इस बुद्धि से काम करोगे तो नष्ट हो जाओगे। जिन जिन लोगों ने बड़े बड़े योग इंद्र मुनि इंद्र ने भगवान की लीलाओं में महापुरुषों की लीलाओं में बुद्धि लगाया सब सर्वनाश हो गया सबका क्योंकि नाम अपराध हो गया। अरे अभी सुनो बहुत दिन की बात नहीं है। 500 वर्ष पहले गौरांग महाप्रभु आए थे। आप लोगों ने पढ़ा होगा निमाई निताई का इतिहास।
18:10 कि एक भक्त 80 वर्ष की बुढ़िया से चावल मांगने गई। एक सन्यासी तो सन्यास धर्म में नियम है कि किसी स्त्री के सामने खड़े भी मत हो। सन्यासी के लिए वो जो दंड कमंडल धारण करते हैं ना वो गौरांग महाप्रभु के लिए ही चावल मांगने गया वो भक्त और महाप्रभु ने त्याग दिया उसको। तुमने गुरु आज्ञा का उल्लंघन किया। अब सारे भक्त हैरान कि 80 वर्ष की बुढ़िया
18:59 वह सबसे बड़ी भक्त गौरांग महाप्रभु और महाप्रभु के लिए ही चावल मांगने गया था और महाप्रभु जी अंतर्यामी अंदर घुस के देख लो ना उल्लंघन किया आज्ञा का बस यह अपराध है गुरु आज्ञा का उल्लंघन करना या उसमें बुद्धि लगाना यह नाम अपराध है। त्याग दिया तो नामा अपराध सबसे बड़ा पाप उसके नीचे पांच महापाप उसके नीचे और सब पाप है। उनकी गिनती नहीं है। लेकिन फार्मूला याद
19:48 रखो कि भगवान उनका नाम उनका रूप उनका गुण उनकी लीला उनके धाम उनके संत इतने में अगर हमारा मन है अटैचमेंट है इनकी शरणागति है तो हम शुभ कर्म कर रहे हैं बस और जब उनका स्मरण छूट गया संसार का स्मरण शुरू हो गया। बस पाप हो गया। देखो आश्चर्य बतावे आप कहेंगे हम अपनी मां से प्यार करते हैं। पाप है। जी बिल्कुल पाप है। अपने बाप से प्यार करते हैं। पाप है। हां
20:34 पाप है। भाई से प्यार करते हैं, बीवी से, किसी से, अपने परिवार में सब करते ही हैं। उसको तो कोई बुरा नहीं कहता। हां वेद कहता है वेद कहता है देखो भाई ऐसा है कि भगवान से प्यार करने में एक शर्त है कि अन्य से प्यार ना हो अनन्य प्रेम करो भगवान और महापुरुष से अन्य से प्यार ना हो देखो जैसे कपड़ा गंदा तो उसको निर्मल जल से धोते हो तो मैल धुल जाता है।
21:21 अगर तुमने उस गंदे कपड़े को गंदे पानी में डुबो दिया तो और गंदा होगा। तो हमारी मां हो, बाप हो, भाई हो, बहन हो, बेटा बेटी कोई हो वो माया के अंडर में है या महापुरुष है? एक क्वेश्चन माया के अंडर में है। महापुरुष तो नहीं है तो फिर उसमें तुमने जो मन का अटैचमेंट किया तो तुम्हारा मन तो गंदा हो गया और क्योंकि वो माया के अंडर में है तुमने भगवान से भी प्यार किया मान लिया एक घंटे भगवान से प्यार किया 23 घंटे संसार से प्यार किया तो क्यों जी वही खाते में
22:07 मुनिम लोग जो लिखते हैं ₹1 की इनकम हुई 1000 घाटा हो गया तो फिर क्या होगा परिणाम उसका तो अगर कहीं भी हमारा प्यार होगा तो अनन्य शरणागति नहीं होगी द्रोपदी ने दांत से साड़ी दबाया तो भगवान नहीं आए उन्होंने कहा लगा ले अपनी ताकत को और जब साड़ी दांत से छूट गई दुशासन के झटके से तो द्रोपदी ने आंख बंद कर लिया और हा द्वारिका वासिन बस आ गए अंबरा अवतार हो गया
22:57 यद्यपि वो गंदी बात है द्रोपदी और गजराज जो है सकाम भक्त हैं शरीर के लिए भगवान को नहीं बुलाना चाहिए अरे ये तो मिट्टी का पुतला है जीवात्मा निकल गई तो जो बड़े-बड़े प्यार के दावा करने वाले बाप मां बेटा बीवी पति है सब कहे घर से बाहर बाहर बाहर निकालो अरे एक दिन तो रहने दो अरे ना ना दुर्गंध आएगी अजी उसी के पीछे तो तुम लट्टू हो रहे थे अरे वो और बात थी अब वो कहां है वो तो चला गया तो इसलिए हमको बस इतने समझना है कि भगवान में
23:43 महापुरुष में जितनी देर आपके शरणागति हो बस वही उतना आपका सही जीवन है और सही कर्म है। बाकी सब गलत। अब गलत में अनेक क्लासेस हैं। जैसे आपने एक चींटी को मार दिया। उसका पाप थोड़ा सा एक गाय बैल को मार दिया उसका पाप उससे बड़ा एक मनुष्य को मार दिया उससे बड़ा पाप मनुष्यों में भी एक ब्राह्मण को मार दिया उससे बड़ा पाप
24:29 ब्राह्मणों में भी एक वेद के ज्ञाता ब्राह्मण को मार दिया उससे बड़ा पाप और वेद के जानने वाले से भी अधिक जो भगवान को प्राप्त कर चुका है उसके प्रति दुर्भावना भी कर दिया अगर मैंने कुछ कहा नहीं उस महात्मा से अरे कहा नहीं सोचा भगवान तो अंदर बैठे नोट करते हैं तुम्हारा सोचना करना नोट नहीं करते अर्जुन से भगवान ने कहा मन मुझ में रख दे मार सबको अर्जुन ने कहा ठीक है भगवान ने मन रख दिया और सबको मारा। अब भगवान जिम्मेदार है।
25:17 मजिस्ट्रेट कहता है पुलिस से गोली चलाओ पब्लिक में चला दिया। अब वो कोई पूछे तुमने गोली चलाया? हां। तुमको फांसी होनी चाहिए। चार आदमी मर गए। जी नहीं वो मजिस्ट्रेट हमने आर्डर दिया। उससे कहो। क्यों आर्डर दिया उसने? मजिस्ट्रेट से पूछा गया। उसने कहा साहब यह तो चार ही मरे हैं। अगर हम गोली ना चलवा दे तो 400 मर जाते। तो उसी प्रकार हमको ये समझे रहना है। बस उतना ही हमारा जीवन है। उतने ही सेकंड उतने ही घंटे जब तक हमारा मन हरि और हरिजन में लगा रहे।
26:08 उसके बाद जहां कहीं जाए देवताओं में गया तो भी गलत वो सतगुणी है वो भी माया के अंडर में है और मनुष्यों में गया वो भी गलत वो रजोगुणी है राक्षसों में गया वो तो और ही गलत वो तमोगुणी है तो सतगुण रजोगुण तमोगुण तीनों माया के अंदर में है इनसे प्यार करो करोगे तो जिससे प्यार करोगे उसी की प्राप्ति होगी। बड़ी सीधी सी फिलोसफी है। चार क्लास चार सामान है। एक तमोगुणी, एक रजोगुणी,
26:55 एक सतोगुणी और एक गुणातीत। तो तीन तो माया के अंडर में है। सत्वगुणी, रजोगुणी, तमोगुणी, देवता, मनुष, चराक्षस इनको तो आनंद मिला नहीं बेचारों को। 84 लाख में घूम रहे हैं। देवता भी। अब दो बचे भगवान और महापुरुष। ये संसार से परे हो गए। इनको परमानंद मिल चुका। इसलिए अगर उनसे प्रेम करेंगे तो उनकी प्रॉपर्टी मिलेगी। परमानंद
27:41 देखो आपके मान लो तीन चार लड़कियां हैं। उन चारों का आपने ब्याह कर दिया चार लड़कों से। अब एक लड़का आईएएस में आ गया। तो उसकी बीवी मेम साहब कहलाएगी। कलेक्टर बनाओ आगे कमिश्नर बनेगा, गवर्नर बनेगा। दूसरे लड़की का पति कंपटीशन में नहीं आया। क्लर्क रह गया तो उसकी बीवी बबू आइन हो गई। तीसरी लड़की का पति शराबी निकल गया। और साहब घर का सामान बेच बाच करके भिखारी हो गया तो उसकी बीवी भिखारिन हो गई।
28:28 यानी हम जिस लड़की को जिससे ब्याह करते हैं, दान देते हैं, उसी की प्रॉपर्टी उस लड़की को मिल जाती है। ऐसे ही यह मन है। तमोगुणी से प्यार किया, मरने के बाद नरक मिलेगा। रजोगुणी से प्यार किया, मरने के बाद फिर इसी मृत्यु लोक में आएंगे। सतोगुणी से प्यार किया तो कुछ दिन स्वर्ग में रहेंगे। फिर लौट के आएंगे संसार में और भगवान और महापुरुष से प्यार किया तो माया से परे होकर परमानंद पा लेंगे। तो अब आप समझ गए पाप क्या है? पाप यही है भगवान और महापुरुष को छोड़कर कहीं भी मन का अटैचमेंट हो तो वो पाप है। क्योंकि
29:17 उसका परिणाम बंधन। 84 लाख में घूमना। अरे हम देवता के लोक में गए थे। अरे गए तो थे चार दिन भोगा और चले आए। हां जब उस पार्टी की गवर्नमेंट ने तुमको मिनिस्टर बना दिया। हां बन गए। अब पार्टी भंग हो गई तो अब मिनिस्टर साहब अपने घर में बैठ के मक्खी मारो। यानी स्वर्ग में जितने दिन का आपका पुण्य है बस उतने दिन तक आप रहेंगे। उसके बाद मृत लोकम बसंत ये छोटी मोटी मैंने पाप की परिभाषा बताई। बहुत लंबी चौड़ी है। आपके काम की बात
30:04 मैंने बता दी। जय