0:00 [संगीत] पटना भारतीय इतिहास में यह नगर अनेक नामों और कारणों से चर्चित रहा है इसकी प्राचीनता का उल्लेख भविष्य पुराण के
0:46 ब्रह्म खंड में मिलता है ईसा पूर्व यह नगर पाटली ग्राम के नाम से जाना जाता था मान्यता है कि कुश नामक महाबली राजा गधी जो महर्षि विश्वामित्र के पिता थे उनकी कन्या का नाम पाटली था उसी कन्या को पुत्र प्राप्ति पर प्रसन्न होकर राजा गधी ने पाटली पुत्र नगर बसाया था दूसरी मान्यता यह भी है कि यहां चह और पाटली वृक्षों की अधिकता के कारण शायद नगर का नाम पाटली पड़ा था कालांतर में यही नगर पाटली पाटली ग्राम पुष्प पुर कुसुमपुर पुष्पावती पुष्प हैपुर
1:33 श्रीनगर पाटलीपुत्र पोली ब्रोत पोलिम ब्रोत पलि फू पली अजीमाबाद और पटना के नाम से प्रसिद्ध हुआ इसकी अधिष्ठात्री देवी पटन देवी [संगीत] हैं तवारीख शेरशाही के मुताबिक सन 1541 ईसवी के बाद इस नगर का नाम पटना पड़ा था लेकिन जब औरंगजेब के पौत्र अजीम उ शन को यहां का सूबेदार बनाया गया तो कुछ वर्षों तक यह नगर अजीमाबाद कहलाया वर्तमान में यह ऐतिहासिक नगर भारत के एक प्रमुख राज्य बिहार की राजधानी [संगीत] है विश्व की सर्वाधिक प्राचीन भाषा
2:19 संस्कृत की व्याकरण के रचयिता आचार्य पाणिनी की जन्मभूमि भी बिहार है उनके प्रसिद्ध ग्रंथ अष्टाध्यायी शब्द का प्रयोग पहली बार मिलता है जिसका व्यापक अर्थ ललित कला ही है [संगीत] यह सर्वविदित है कि मुगल काल में चित्रकला
3:06 अपने उत्कर्ष पर थी लेकिन दिल्ली सल्तनत पर शाहजहां के पुत्र औरंगजेब के गद्दी पर बैठने के बाद सबसे ज्यादा क्षति चित्रकला को हुई मुगल राजाओं का राजा श्रय समाप्त होने के बाद जो शाही मुसर और चितेरे थे वह जीव को पार्जन के लिए मजबूरन दिल्ली दरबार से पलायन कर [संगीत] 17वी शताब्दी के उत्तरार्ध में जब दिल्ली की गद्दी पर औरंगजेब बैठे तो उनका अधिकतर समय लड़ाइयां में बीता और ललित कलाओं के प्रतिव भी वह बड़े उदासीन
3:51 थे चित्रकारों का एक दल उत्तरी भाग की पहाड़ियों की ओर रुख कर गया जैसे बसोहली कांगड़ा बवाल जम्मू चंबा कुल्लू और मंडी दूसरा दल राजस्थान के उदयपुर के अलावा उत्तर प्रदेश के मथुरा फैजाबाद वाराणसी तथा बंगाल के मुर्शिदाबाद जा पहुंचा उन दिनों मुर्शिदाबाद के नवाब मीर जाफर बड़े ही कला प्रेमी थे उनकी कला प्रियता से आकर्षित होकर ही चिते की एक टोली यहां आ पहुंची थी नवाब मुर्शिदाबाद ने उन चित्रकारों को गंगा नदी के तट पर बालू चक नामक स्थान पर बसाया था नवाब मीर जाफर के प्रोत्साहन से
4:37 यहां चित्रकार दल फलने फूलने लगे वह दरबारी चितेरे धीरे-धीरे यहां ईस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेज अधिकारियों और व्यापारियों के भी संपर्क में आने लगे फलतः वह चित्रकार उनके संपर्क में आकर अंग्रेजी में संवाद करने के साथ-साथ उनकी रुचि के अनुसार चित्र भी सृजित करने लगे चित्रकार मनोहर जी उपयुक्त जगह की तलाश में बंगाल गए वहां देखा मुर्शिदाबाद कला संस्कृति का केंद्र है वहां के नवाब कला प्रिय हैं वह व्यवसाय का केंद्र है और अंग्रेज अधिकारी वहां नियमित आते जाते हैं कालांतर में राजनैतिक समीकरण बदल गया
5:24 जिसका प्रभाव उन चित्रकारों पर भी पड़ा नवाब मीर जाफर ने अपने पुत्र मिरान को गद्दी पर आसीन किया मिरान की रुचि कला में बिल्कुल नहीं थी फल स्वरूप उन चित्रकारों को पुनः विस्थापन का दंश झेलना पड़ा पटना उन दिनों समृद्ध नगर था यहां सूती वस्त्र शक्कर नील अफीम शोरा और मसालों का व्यापार खूब होता था व्यापार का प्रमुख केंद्र होने से डच चीनी और पुर्तगाली व्यापारी भी यहां व्यवसाय के चलते अपने अनुसार आवास बनाकर लंबे समय तक यहीं रहते भी थे बिहार धीरे-धीरे विकास की ओर था यहां पर नई गतिविधियां शुरू हो गई मुर्शिदाबाद
6:15 के कलाकारों को यह बहुत उपयुक्त स्थान लगा और सन 1760 में ये मुर्शिदाबाद से पटना आ गए मुर्शिदाबाद से आए चित्रकारों को पटना हर दृष्टि से उपयुक्त स्थान लगा यह चित्रकार दल पटना सिटी के मच्छर हट्टा लोदी कटरा चौक और दीवान मोहल्ला में आकर बस गए यह चित्रकार यहां के राजाओं नवाबों जमीदारों अंग्रेज अधिकारियों व्यवसायों और अंग्रेज सैनिकों की इच्छा के अनुरूप चित्र सृजित करने लगे पटना परिधि में तत्कालीन दीनापुर यानी
7:01 दानापुर में अंग्रेज सैनिकों की छावनी भी थी स्थानीय नवाब जमीदार और व्यवसाई कला प्रेमी थे जो दूसरे कलाकार थे बिहार की छोटी रियासतों में बेतिया दरभंगा पुणिया गया आरा इन जगहों पर चले गए वहां जाकर यह नवाब जमीदारों के दरबारी चित्रकार हो गए पटना कलम के कलाकार जो हैं आप के वाराणसी में भी जो है राजा ईश्वरी नारायण सिंह के समय में काशी नरेश जो राजा ईश्वरी नारायण सिंह थे उनके समय में उनके दरबार में आश्रय लिए थे और राजा ईश्वरी नारायण सिंह को कला प्रेमी भी थे
7:48 तो उन्होंने इनको आश्रय दिया और बहुत सा काम पटना कलम का उनसे करवाया जिसमें पटना से जो कलाकार गए थे उसमें दल्लू लाल हुलास लाल छगनलाल पटना कलम चित्र शैली का आविर्भाव पर्शियन मुगल और ब्रितानिया शैली के सुमेल से हुआ यह कला शैली पटना की सरजमी पर ना केवल पल्लवित और पुष्पित हुई बल्कि पटना कलम के नाम से विश्व विख्यात भी हुई कोई भी पेंटिंग के की दुनिया में हम लोग जो कलम शब्द का इस्तेमाल करते हैं तो इसका अभिप्राय एक स्टाइल एक इसका एक हैली से होता है इन चित्रों में मुगल शैली के रंगों
8:35 रेखाओं तथा कंपनी शैली यानी ब्रितानिया शैली की प्रकाश छाया स्पष्ट रूप से प्रस्फुटित होने लगी पटना कलम के चित्रों की पृष्ठभूमि अधिकतर सादा है जबकि मुगल शैली के चित्रों में जो बॉर्डर होते थे वो बहुत ही नक्काशी दार कलात्मक होते थे पर पटना कलम के चित्रों में बॉर्डर की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त हो गई और विषय प्रधान होने लगे इस शैली के चित्रकार व्यवसायिक दृष्टि से भी चित्र सृजित करने लगे इसीलिए कुछ कला मर्मज्ञ ने इस चित्र को फिरका और बाजार शैली के भी चित्र
9:22 कहा उनकी उपयोगिता अंग्रेज लोग यहां की यादगार के रूप में करते [संगीत] थे विश्व भर की ललित कलाओं के इतिहास में यह पहली घटना थी जब राजाओं नवाबों राज दरबारों और हरम से इतर आम जनजीवन पर आधारित पटना कलम चित्र शैली चरमोत्कर्ष पर पहुंची 1760 ईसवी में पटना कलम चित्र शैली की पहली शुरुआत हुई थी और कहा जाता है कि पटना कलम की शुरुआत मुर्शिदाबाद से ही शुरू हुई पटना कलम के चित्रों के माध्यम से तत्कालीन आम परिवेश परिधान रहन सहन जीवन यापन तीज त्यौहारों और पशु पक्षियों
10:08 के अंदाज का सहज ही अनुमान किया जा सकता है भाती यानी ढोकनी चलाता लोहार तिलंग यानी पतंग बनाने वाला मछली बेचने वाली बाल दाढ़ी बनाता नाई भिस्ती पानी ले जाते हुए ढोलकिया ठठेरा शादी ब्याह त्यौहारों मेलों नाचने गाने वालों हाट बाजारों जैसे जन विषयक चित्र इसे अन्य शैलियों से भिन्न और विशिष्ट करते हैं एक जो सबसे बड़ी खासियत मैं यह देखता हूं पूरे भारतीय चित्रकला के इतिहास में कि पटना कलम कहीं न कहीं से जनता की अभिव्यक्ति थी मने जन कला थी जो कहीं भी पूरे भारतीय चित्रकला में हम
10:53 लोग को यह बात नहीं दिखती है यानी कि इसके बनाने वाले भी आम लोग थे जिनको कोई राज्या आश्रय नहीं था और इसमें जो लोग चित्रित हुए वो भी आम लोग [संगीत] थे इस शैली के अधिकतर चित्रों में पृष्ठभूमि का अभाव रहता था यानी चित्रों के पीछे सफेद धरातल छोड़ा जाता था ताकि चित्र का अवलोकन करने वाले कला प्रेमी विषय पर ही केंद्रित रह सके [संगीत] पटना कलम लघु चित्र शैली के चित्र मुख्य रूप से कागज अभ्रक हाथी दांत सिल्क और
11:40 तांत के कपड़ों पर मिलते हैं जो चित्र कागज पर सृजित मिलते हैं वह बसली यानी बांस के कागज और नेपाल से प्राप्त कागजों पर बनाए जाते थे तूतिया मिश्रित मैदे की लेई से इन्हें एक के ऊपर एक चिपकाया जाता था और इसे अकीक पत्थर से घिसकर बनाया जाता था कागजों के छोटे-छोटे टुकड़े को लोग इस्तेमाल में लाते थे यह कागज मूल रूप से नेपाल से आयातित होता था कागज बनाने के एक दूसरे और तरीके थे जिसमें लुग दियों को भो के फिर उससे कागज तैयार किया जाता था इस शैली के जो चित्र हमें अभ्रक पर बने मिलते हैं उनमें अभ्रक की पतली परत
12:27 जो पारदर्शी हुआ करती थी उस समुद्री फेन या झाक के माध्यम से इसकी परत को रू खड़ा बनाया जाता था वो भी इसलिए कि उस पर आसानी से जल रंग चढ़ाया जा सके अबक पर जो चित्रकारी हुई है पटना कलम की उसका उपयोग उस समय लाइटिंग के लिए किया गया यानी प्रकाश के साथ उसको देखने का एक अलग और अद्भुत आनंद था खास करके तजिया सजाने के लिए उसका उपयोग हुआ घरों को लोग सजाने में उसका उपयोग किए हाथी दांत पर चित्र बनाने के लिए हाथी दांत की पतली 1 इंच से 3 इंच की परिधि या चौकोर आकृति पर चित्र अंकित किए जाते
13:15 थे जो हाथी दांत पर जो चित्र बनाए गए हैं पटना कलम के उसकी विशेषता यह है कि वह खास करके अंग्रेजों के लिए कलाकारों ने उसको तैयार किया हाथी दांत को की गोल आकृतियों पर वो चित्रकारी की जाती थी जिसको लोग बुच के रूप में इस्तेमाल करते थे बुच मींस मतलब उस समय के जो लंग कोट हुआ करते थे उसमें वह लगाया जाता था पटना कलम शैली के कुछ चित्र सिल्क और तांत के कपड़ों पर भी उपलब्ध है जिनमें कपड़े के ऊपर अंडे की जर्दी या चावल की माड़ में तूतिया मिलाकर लेप चढ़ाया जाता था इसके बाद उसे अकीक पत्थर से घिसकर चिकना बनाया जाता था और उस पर चित्र सृजित किए जाते थे इस शैली के
14:02 चित्रकार अपनी तूलिका का निर्माण भी स्वयं किया करते थे इसके लिए वह चित्रकार गिलहरी के बालों या घोड़े की गर्दन के बालों को पानी में उबालकर नर्म करते थे और फिर कबूतर या चील के पंख की डंठल में बांधकर या घुसा करर अलग-अलग मोटाई की तूलिका का निर्माण करते थे पक्षियों को खास करके देखें तो उनके जो पंख होते हैं तो उन पंखों के बीच वाले एरिया को जो वाइट रहता है सरफेस वो अंदर से खोखला होता है वो बाल को गिलहरी के बाल को पहले बांध देते थे एक कॉर्नर पर ले जाके जहां बाल इंड करता था वहां पर बांधने के बाद फिर उसको क्विल के अंदर डालते थे पटना कलम के चित्रकारों में एक सबसे बड़ी
14:50 खासियत यह थी उनका जो स्टेपलिंग है वो कभी-कभी एक बाल का स्टेपलिंग है मतलब एक बाल का उन्होंने प्रयोग किया अपने चित्रों में अपने रेखांकन में वो चित्रकार रंगों का भी स्वयं निर्माण किया करते थे वह ज्यादातर खनिजों से या प्राकृतिक माध्यमों से रंग बनाते थे कुछ रंग फूल फल तथा विभिन्न वृक्षों की छाल के रस से प्राप्त किए जाते थे हड़ताल पत्थर को घिसकर पीला रंग तैयार किया जाता था नीले पत्थर से नीला और गेरू मिट्टी सिरक से लाल रंग प्राप्त करते थे तेल के दीपक की फुलिया से काला रंग और सीप को जलाकर सफेद रंग तैयार किया जाता
15:37 था चटकदार पीला रंग बनाने के लिए गाय को हल्दी खिलाई जाती थी उसके मूत्र को कई दिनों तक रखा जाता था जिससे हल्दी निचली सतह पर बैठ जाती थी फिर उसे महीन कपड़े से छानकर उसमें बबूल की गोंद मिलाकर खरल में पीसकर चटकदार पीला रंग तैयार किया जाता था वनस्पतियों से जो रंग इसमें उपलब्ध हुए हैं पटना कलम में तो उसके लिए फूलों का उन्होंने प्रयोग किया कुछ पत्थरों से उन्होंने तैयार किए कुछ रंग कुछ चित्र जो पटना कलम के हैं उसमें बॉर्डर्स भी है आप उसमें देखेंगे कि वह बॉर्डर सुनले हैं या चांदी का के तबक का
16:22 उसमें उपयोग हुआ है उसके लिए शहद में वह शहद का उपयोग करते थे और शहद में वह तबक चांदी का या सोने का रख के उसको काफी देर तक मिलाते थे वो लोग जब तक वह मिल नहीं जाता था कला परंपरा में पटना चित्र शैली में जिन शब्दावली का प्रयोग हुआ है वह कुछ मुगल शैली के करीब है और यूरोपियन शैली से तो एकदम अलग है जैसे सफेद रंग को यहां उदया सफेद कहा जाता था हरे रंग को हरा माटा कलर कहा जाता था और बादामी रंग गुल गुफ तोत फक्ता भूरा
17:08 फक्ता एक चिड़िया है हरका सोना सोने के रंग को हरका सोना कहा जाता था और रो पहरी इन सब रंगों को बनाने की जो परंपरा थी वो अलग थी पटना कलम के चित्र ज्यादातर बरसात के दिनों में रंग बनाने का कार्य करते थे इसका मुख्य कारण था बरसात के दिनों में हवा में नमी के कारण धूल कण की मात्रा कम हो जाती है रंगों की घुटाई अक्सर सुबह की जाती थी गर्मी के दिनों में चित्रों का रेखांकन पूरा हो जाने के बाद उन चित्रों पर बकरी के दूध से स्प्रे किया जाता था और उसे
17:55 सुखाकर रख लिया जाता था चित्रों में रंग भरने का काम चित्रकार जाड़े के दिनों में करते थे इस शैली के चित्रकार चित्रों में छाया प्रकाश के लिए इलायची के दाने जैसा और बारिश के तिरछे रेखांकन जैसे तूलिका घात का चित्र सृजित करते [संगीत] थे इस तरह पटना कलम के चित्रकार सालों समर्पित भाव से सृजन प्रक्रिया में जुटे रहते थे [संगीत] तकनीकी रूप से जितना समृद्ध हम लोग हो चुके हैं प्रिंटिंग को लेके तो डॉट्स की
18:42 कल्पना आज उसमें है नई जो तकनीक हमारी प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी आई है उसमें डॉट्स बहुत महत्त्वपूर्ण है आप सोचे कि उसी डॉट्स को मतलब कलर का एक एक डॉट्स डाल के एक पेंटिंग को बनाना यह बहुत बड़ी बात है जो पटना कलम के कलाकारों ने किया है सन 18611 ईसवी में अंग्रेज व्यापारी और उच्च स्तर के कला प्रेमी चार्ल्स डी आयली ने पटना के गुलजार बाग इलाके में लिथो प्रेस की स्थापना की जहां पटना कलम की प्रतिकृति की छपाई होने लगी बिहार में यह पहली लिथो प्रेस थी इस लिथो प्रेस की स्थापना से विदेशों में इन चित्रों की भारी मांग सहजता से पूरी होने लगी
19:29 पटना कलम चित्र शैली में महिला चित्रकारों का भी जिक्र है जिसमें सोना बीवी और दक्ष बीवी का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है यह दोनों महिला कलाकार पटना कलम के चित्र घर पर रहकर बनाती थी पटना कलम चित्र शैली के समाप्त होने के स्पष्ट कारण कि इस शैली के चित्रों की पुनरावृत्ति होने लगी और तकनीकी विकास अवरुद्ध हो गया बाद के दिनों में विदेशी सैलानियों और व्यापारियों का पटना आवागमन कम होता गया लिथो प्रेस की बढ़ती संख्या ने भी इन चित्रकारों को ज्यादा प्रभावित किया कैमरे
20:17 के आविष्कार ने भी इस विधा के चित्रकारों पर प्रतिकूल असर [संगीत] डाला पटना कलम के की जो सीमा यह रही कि जब फोटोग्राफी का यहां आगमन हुआ और लिथो प्रेस का जब आगमन हुआ पटना तो पटना कलम पर बहुत उसका सीधा प्रभाव पड़ने लग गया और लोग सीधे-सीधे पटना कलम को की पेंटिंग को खरीदने के बजाय लोग प्रिंट्स को खरीदना पसंद करने लग गए यह वही दौर था जब राजा रवि वर्मा के चित्र भी बिक रहे थे लिथो प्रेस के जो बनाए जाते थे तो इस इसलिए हमारे चित्रकार उसको कंपीट नहीं कर पाए पटना की धरती पर जन्म पटना कलम चित्र शैली ने अपना सुरम काल भी
21:03 देखा और अपने उत्कर्ष की गाथा भी लिखी सन 1760 ईसवी से सन 1950 ईसवी तक फली फूली पटना कलम के अंतिम चित्रकार ईश्वरी प्रसाद वर्मा के सन 1949 में निधन के साथ ही अपनी सरजमी पर यह कला धराशाई हो गई पटना कलम से जुड़ा हुआ काफी संग्रह आपके पास रहा था पटना शैली के मशहूर चित्रकार ईश्वरी प्रसाद वर्मा का बनाया हुआ हमारे ग्रैंडफादर राधा लाल गोस्वामी का चित्र बनाया था उन्होंने वाइल पेंटिंग वो और पटना शली के बहुत चित्र थे जन जीवन के बारे में चित्रण लेकिन इत्तफाक ऐसा कि एक बार चोरी हुई
21:49 और सारे चित्र यहां से गायब हो गए स्वर्गीय वर्मा के बाद कुछ चित्रकार पटना कलम के अधता जरूर हुए लेकिन इसके स्थापित कलाकार नहीं हो सके अब वैसी प्रवृत्ति लोगों की नहीं रही है कि वाटर पेंटिंग में काम करें और वाटर पेंटिंग में परिश्रम ज्यादा है समय ज्यादा लगता है जोकि बारीकियां उसमें दर्शाने पड़ती है पटना कलम में जो एलिमेंट्स था वह पटना कलम की बहुत बड़ी खूबी है वो उसका जुड़ाव था आज के आज की तारीख में भी पटना सम भारत की समकालीन कला में सब्जेक्ट नहीं है तो इन इनको चुन कर के इनको लेकर के अगर भारतीय समकालीन कलाकार या बिहार के
22:35 समकालीन कलाकार कुछ काम कर सके और वह एलिमेंट्स इस रूप में लाए जाए और उसमें वह कलाकार बोल्डली उस बात को रखें कि हमने पटना कलम से एलिमेंट्स लिए हैं और तब जाकर उसको पेंट करें तो इससे पटना कलम भी स्थापित होता है और हमारी समकालीन कला भी रहती है पटना कलम चित्र शैली आज भी पटना सं लय जालान संग्रहालय पटना सिटी चैतन्य पुस्तकालय गायघाट पटना खुदा बख पब्लिक ओरिएंटल लाइब्रेरी अशोक राजपथ पटना बिहार राज्य कला दीर्घा कला एवं शिल्प महाविद्यालय परिसर पटना राष्ट्रीय संग्रहालय कोलकाता और विक्टोरिया पैलेस कोलकाता के
23:20 अतिरिक्त बिहार के अन्य राज परिवारों एवं कला पार्किंस संग्रह में संग्रहित होने के साथ-साथ विटोरिया एल्बर्ट संग्रहालय लंदन में भी पटना कलम चित्र संरक्षित एवं सुरक्षित हैं जो आज भी इस शैली के स्वर्णिम अतीत और बिहार की कला कौशल की थाती को संपूर्ण विश्व के समक्ष प्रदर्शित कर रहे हैं हम लोगों ने सर्वे करवाया कि पटना कलम की कितनी कलाकृतियां हमारे स्टोरेज में यह हमारे डिस्प्ले में रखी हुई है तो लगभग 172 जहां तक मुझे याद है संख्या चित्र हमारे पास है जिसको हम लोगों ने एक कॉफी टेबल बुक के रूप में लोगों के सामने
24:07 लाना लाने का निर्णय किया और उसका ही प्रतिफल है कि हम लोगों ने यह संकलन जो आप देख रहे हैं बिहार की विरासत पटना कल यह बनी सरकार का यही प्रयास था कि हम इस विधा के छुए अनछुए पहलुओं को लोगों के सामने लाए और इसी कड़ी में इस पुस्तक का हम लोगों ने प्रकाशन करवाया पटना कलम के लगभग प वर्क छोटे और बड़े जिस पर की कलाकार क्या सही तरीके से उसमें लिखा नहीं है उस सूची में कि किस कलाकार ने इसको बनाया है लेकिन पटना कलम के प कलाकृतियां यहां पे छोटी बड़ी मिलाकर
24:53 के रखी हुई है किसी खास शैली का अपना एक वक्त होता है और हमें इस बात से कोई तराज नहीं होना चाहिए कि पटना कलम शैली का भी 200 वर्षों का लगभग एक वक्त था जिसमें पटना कलम ने बहुत ही ऊंचाई हासिल की यह दुर्भाग्य की बात है कि पटना कलम को वह स्थान नहीं मिल पाया भारतीय चित्रकला के इतिहास में या भारतीय कला इतिहासकारों ने इसको बहुत तवज्जो नहीं दिया जो इसको मिलना चाहिए था मुगल काल के कलाकार वो शाही मुसव्विर और चितेरे चित्र केरे जन जीवन के वो पटना कलम के चित्रकार थे नट मदारी मछली वाली भिस्ती बढ़ई और कसाई नाई धुनिया पान वाला
25:42 चर्मकार को विषय बनाया लालित्य की लाली खूब लुभाए वो पटना कलम के चित्रकार थे मुगल काल के कलाकार वो शाही मुसब्बर और चितेरे चित्र उके जन जीवन के वो पटना कलम के चित्रकार थे वो पटना कलम के चित्रकार थे