सच्चा आस्तिक ही ‘नास्तिक’ क्यों कहलाता है? एक प्राचीन राज़! || आचार्य प्रशांत (2025)

संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो आस्तिकता और नास्तिकता के सच्चे अर्थ पर प्रकाश डालता है, जो अक्सर धार्मिक मान्यताओं और ईश्वर में विश्वास के साथ भ्रमित होते हैं। आचार्य प्रशांत बताते हैं कि आस्तिकता का मूल सत्य की खोज और इंद्रियों व मन से परे किसी चीज़ के अस्तित्व को स्वीकार करना है।

मुख्य बातें:

  • आस्तिकता का दार्शनिक आधार सत्य की खोज है, न कि ईश्वर में विश्वास।
  • समय के साथ आस्तिकता की परिभाषा बदल गई है, जो वेदों को मानने से लेकर ईश्वर में विश्वास करने तक सीमित हो गई है।
  • सच्चा आस्तिक वह है जो जानने की इच्छा रखता है और मान्यताओं पर निर्भर नहीं रहता।

परिचय

आचार्य प्रशांत आस्तिकता और नास्तिकता के विषय पर बात शुरू करते हैं, जो सोशल मीडिया पर बहस का विषय बना रहता है। आमतौर पर, आस्तिक उन्हें माना जाता है जो मंदिर जाते हैं, पूजा करते हैं, या किसी धर्म का पालन करते हैं, जबकि नास्तिक वे होते हैं जो ईश्वर में विश्वास नहीं करते। आचार्य प्रशांत इस धारणा को चुनौती देते हैं और आस्तिकता के गहरे अर्थ की खोज करने का प्रस्ताव रखते हैं।

यहीं से धर्म शुरू होता है

आचार्य प्रशांत एक कहानी के माध्यम से आस्तिकता की अवधारणा को समझाते हैं। एक युवक, जो जीवन को पूरी तरह से जीना चाहता है, विभिन्न अनुभवों से गुजरता है, लेकिन हर जगह उसे निराशा और छल मिलता है। वह समाज, शिक्षा, रिश्तों और यहां तक कि ज्ञानियों से भी निराश हो जाता है। अंत में, वह सब कुछ छोड़कर एक सवाल के साथ निकल जाता है: क्या कुछ भरोसे लायक है? क्या इस दुनिया से परे भी कुछ है? यहीं से आस्तिकता की खोज शुरू होती है।

आस्तिक कौन? नास्तिक कौन?

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि आस्तिकता का प्रश्न किसी बाहरी वस्तु या छवि से नहीं, बल्कि जीवन की सार्थकता से जुड़ा है। आस्तिक वह है जो यह मानता है कि इस दृश्यमान जगत से परे भी कुछ है, जबकि नास्तिक वह है जो कहता है कि यही सब कुछ है। आस्तिकता एक अस्तित्ववादी प्रश्न है, जो इंद्रियों और मन से परे सत्य की खोज पर आधारित है।

परिभाषाओं का पतन

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि समय के साथ आस्तिकता की परिभाषा बदल गई है। वेदांत के अनुसार, आस्तिक वह है जो इंद्रियों और मन से परे किसी अज्ञेय और अनिर्वचनीय सत्य को मानता है। लेकिन बाद में, आस्तिक उन्हें माना जाने लगा जो वेदों की सत्ता में विश्वास रखते थे। इस परिवर्तन के कारण, कई दर्शन जो ईश्वर को नहीं मानते थे, उन्हें भी आस्तिक माना जाने लगा।

कहानी आस्तिकता की

आचार्य प्रशांत एक टेबल के माध्यम से आस्तिकता की कहानी को समझाते हैं, जिसमें विभिन्न दर्शनों को दार्शनिक, शास्त्रीय और वर्तमान लोक धार्मिक आधारों पर वर्गीकृत किया गया है। अद्वैत वेदांत और बौद्ध दर्शन, जो सत्य की खोज पर जोर देते हैं, दार्शनिक आधार पर आस्तिक माने जाते हैं। द्वैत भक्ति, जो ईश्वर में विश्वास पर आधारित है, आस्तिक और नास्तिक दोनों हो सकती है। चारवाक दर्शन, जो इंद्रियों से परे कुछ नहीं मानता, नास्तिक है।

थीज़्म और एथीज़्म

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि भारत पर विदेशी प्रभावों के कारण, आस्तिकता का अर्थ ईश्वर में विश्वास (थीज्म) के साथ भ्रमित हो गया। जबकि थीज्म और एथीज्म ईश्वर पर केंद्रित हैं, आस्तिकता और नास्तिकता सत्य पर केंद्रित हैं। आस्तिक वह है जो इस जगत के परे एक अज्ञेय सत्य को मानता है, जबकि नास्तिक वह है जो कहता है कि यही सब कुछ है।

सच्चा आस्तिक आज नास्तिक है

आचार्य प्रशांत कहते हैं कि वर्तमान में आस्तिकता की परिभाषा इतनी विकृत हो गई है कि जो सच्चे आस्तिक हैं, वे नास्तिक माने जाते हैं। अद्वैत वेदांत, जो ईश्वर को भी परमार्थिक नहीं मानता, इस परिभाषा के अनुसार आस्तिक नहीं है। इसलिए, यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि ज्ञान मार्गियों को आस्तिक कहें या नास्तिक।

पश्चिम दार्शनिकों का प्रभाव

आचार्य प्रशांत प्लेटो, कांट, हेडेगर और विटगंस्टाइन जैसे पश्चिमी दार्शनिकों के विचारों पर चर्चा करते हैं। ये दार्शनिक, जो ट्रांसेंडेंस और अनिर्वचनीय सत्य में विश्वास रखते थे, वास्तविक अर्थों में आस्तिक हैं, लेकिन लोक धार्मिक अर्थों में नास्तिक माने जा सकते हैं।

ऋषियों की ओर लौटो

आचार्य प्रशांत कहते हैं कि वास्तविक आस्तिक वह है जो मुक्ति का आकांक्षी है और कल्पनाओं में विश्वास नहीं करता। जो व्यक्ति जानने की इच्छा रखता है और मान्यताओं पर निर्भर नहीं रहता, वही सच्चा आस्तिक है। वे सनातन धर्म को वापस ऋषियों के पास पहुंचाने और आस्तिकता के सच्चे अर्थ को पुनः स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर देते हैं।

Testimonial

अनुराग पांडे नामक एक व्यक्ति आचार्य प्रशांत के साथ अपने अनुभव को साझा करता है। वह बताता है कि आचार्य जी से जुड़ने के बाद उसे जीवन में सही दिशा में चलने की प्रेरणा मिली है और उसकी बेचैनी और भ्रम दूर हो गए हैं।

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Transcript

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0:00 पर आज मौसम अच्छा है। हम आज इसको जरा मजेदार तरीके से समझते हैं। >> इसको लेकर सोशल मीडिया पर भी काफी बहस चलती है। तो आस्तिकता का मतलब समझा जाता है कि जो लोग मंदिर जाते हैं, पूजा पाठ करते हैं या किसी विशेष धर्म का पालन करते हैं और नास्तिकता का मतलब कि जो बंदा कोई ईश्वर में विश्वास नहीं करता है। >> जो कुछ भी मानने से इंकार कर दे वह आस्तिक है। जो किस्से, कहानियों, कल्पनाओं को नमन करके बैठा हो, वह तो नास्तिक है वास्तव में। यहां से खोज शुरू होती है आस्तिकता की कि यही सब कुछ है जैसी दुनिया दिखाई देती है थो से भरा जीवन दुख कष्ट रोग पीड़ा बेहोशी में जन्म बेहोशी में मृत्यु यही सब कुछ है या इसके आगे भी कुछ है दोनों में बहुत अंतर है। दो शब्द हैं बहुत

0:46 अलग-अलग। तो पहले कॉलम की हेडिंग है दार्शनिक अस्तित्वगत आधार जहां से हमारी कहानी की शुरुआत ही हो रही है। पश्चिम में थीस्ट वो है जो गॉड बिलीवर हो और भारत में आस्तिक वो है जो सत्य के प्रति >> नमस्ते आचार्य जी। >> अ सर मेरा सवाल आस्तिकता और नास्तिकता को लेकर है। तो आस्तिकता का मतलब समझा जाता है कि जो लोग मंदिर जाते हैं, पूजा पाठ करते हैं या किसी विशेष धर्म का पालन करते हैं और नास्तिकता का मतलब कि जो बंदा कोई ईश्वर में विश्वास नहीं करता है और सर इसको इसको लेकर सोशल मीडिया पर भी काफी बहस चलती है कि जो नास्तिक लोग हैं वो

1:32 रैशन होते हैं और साइंटिफिक होते हैं और जो आस्तिक लोग हैं वो अंधविश्वासी होते हैं। तो सर मैं आपसे यह समझना चाह रही थी कि यह जो सच्ची आस्तिकता और नास्तिकता क्या होती है? हम यह तो मुद्दा पेचीदा है पर आज मौसम अच्छा है। हम आज इसको जरा मजेदार तरीके से समझते हैं। ठीक है। चलो कहानी है पूरी। कहानी सुननी है आस्तिकता की।

2:18 ठीक है? कहानी से समझेंगे। एक लड़का है। ठीक है। लड़की भी हो सकती है। पर लड़का ही बोले देते हैं। लड़का है एक। बहुत दिल से जीना चाहता है। बहुत जीवन है उसके भीतर। जोश भरा हुआ है। जगत के प्रति उत्कंठा भरी हुई है। जवान है।

3:04 और एक जवान आदमी की पूरी ऊर्जा, पूरे जोश सब जज्बातों भावनाओं के साथ वह बहुत कुछ करना चाहता है जीना चाहता है। कुछ लोग आते हैं उसको बताते हैं कि वो एक बहुत अच्छा काम कर रहे हैं समाज के लिए। वो उनके साथ चला जाता है। कहता है मैं भी तुम्हारे साथ जुड़ना चाहता हूं। हम वहां कोई संस्था है जो काम कर रही है। कुछ कहते हैं कि हम दुनिया बदल देंगे। कहता है मैं भी तुम्हारे साथ जुड़ूंगा। वो वहां जाता है दो चार महीने रहता है। पता चलता है यहां तो मामला दूसरा है। धोखा चल रहा है।

3:49 उसका दिल सा टूट जाता है। वो वापस आता है। वो कहीं पढ़ने जाता है। जहां पढ़ने जाता है वहां उसको बताया जाता है ये विद्यालय है। ठीक? यहां पर तुम्हें विद्या मिलेगी। और वहां जाता है देखता है कि अरे विद्या तो कुछ नहीं मिल रही है। यहां तो बस समाज में कैसे समायोजित हो जाना है और रोटी कपड़ा कैसे बनाना है इसका प्रशिक्षण मिल रहा है। फिर से उसका दिल टूट जाता है। बुरा लगता है।

4:36 वह जाता है वह ज्ञानियों की संगत में बैठने लगता है। बोलता है आप बताइए आप क्या-क्या मुझे दे सकते हैं। वो जो कुछ भी दे सकते हैं वह उनसे प्रति प्रश्न करता है। और जब प्रति प्रश्न करता है तो कईयों के पास उत्तर नहीं होते और कई तो ऐसे होते हैं जो नाराज ही हो जाते हैं। भीतर की दरार और गहरी हो जाती है उसके। मेरी बात समझ लो। वह अपने कुल कुटुंब रिश्तेदारों पर नजर डालता है। वह पाता है कि सब रिश्ते स्वार्थ के हैं। वो पाता है कि बचपन में उसको बताया गया था कि ये तुम्हारे मामा हैं। ये प्यार करते हैं। वो चाची तुमसे

5:22 प्यार करती हैं। वो ताऊ हैं। ये ये हैं ये दादी हैं। वो बब्बा हैं और ऐसा है वैसा है। और यह सब बहुत प्यार करते हैं। प्यार करते हैं। प्यार करते हैं। और वो बड़ा हो गया है। अपनी दृष्टि से देख पा रहा है कि प्यार तो है नहीं। यहां तो स्वार्थ की डोर है। सब बंधे हुए हैं उससे और वो खींचती रहती है डोर। कठपुतलियां नाचती रहती हैं। फिर उसके जीवन में एक लड़की आती है। और उसको लगता है रोशनी आ गई। शुरू के कुछ महीना ऐसे जैसे कि निस्वार्थ प्रेम मिल गया हो। फूल खिल गए हो बिल्कुल खुशबू ही खुशबूएं

6:09 हम वो बैठा हुआ है उसके साथ बहुत समय तक बात कर रहा है ऐसा है वैसा है ऐसा है जैसे वो उसके साथ बैठकर के आत्मीयता से गंभीरता से बातें करता था वैसे ही एक दिन वो किसी दूसरी लड़की के साथ कुछ बात करना शुरू कर देता है बहुत गहरी बात भी नहीं ऐसे ही वो देख लिया जाता है और आज उसे उस लड़की का कोई दूसरा ही रूप देखने को मिलता है। वो फिर से झना आ जाता है।

6:55 एक ढांचा आकार नहीं लगा था भीतर वो ढांचा चरमराने लग जाता है। इसके एक सवाल उठता है। क्या कुछ है भरोसे लायक? क्या जिंदगी है जीने लायक? पर इसको लगता है नहीं है शायद। यह अपना घर द्वार छोड़कर के दूर निकल जाता है क्योंकि जिस तरफ देख रहा होता है इसको छल ही छल भ्रम ही भ्रम यही दिख रहे होते हैं दूर निकल जाता है और सिर्फ एक सवाल अपने साथ ले जाता है सब छोड़ देता है ना रुपया ले जाता है ना पैसा

7:41 ले जाता है अपने साथ वह यादें भी नहीं ले जाना चाहता अपने साथ एक सवाल ले जाता है अपने साथ क्या कुछ है क्या कुछ है यह जैसा सब दिखाई पड़ता है। आधा अधूरा खंडित टूटा हुआ भ्रामक क्या इसके आगे भी कुछ है जिस पर भरोसा करा जा सके या बस यही यही है सब कीचड़ गंदगी फैलाव क्या कुछ है यही प्रश्न बनता है आस्तिकता का प्रश्न अस्ति माने है यहां यहां से खोज शुरू होती है आस्तिकता

8:28 की कि यही सब कुछ है। जैसे ये दुनिया दिखाई देती है। बनों का समाज धोखों से भरा जीवन दुख कष्ट रोग पीड़ा बेहोशी में जन्म बेहोशी में मृत्यु यही सब कुछ है या इसके आगे भी कुछ है? अगर कुछ है उसने कहा तो मैं कहूंगा कि जीवन जीने लायक है। मूल बात है अस्ति। तो मैं कहूंगा अस्ति हां जीवन जीने लायक है। नहीं तो मैं जीऊं क्यों? आस्तिकता का प्रश्न कोई बाहर की किसी वस्तु या विषय या छवि को लेकर नहीं है।

9:13 आस्तिकता का प्रश्न मूलता यह है कि जीवन जीने लायक भी है क्या? या यही सब कुछ जो हमें दिन रात प्रतीत होता है, यही दृश्य, यही अनुभूतियां, यही जगत, यही प्रपंच यही सब कुछ है। तो यहां से फिर दार्शनिक आधार पर आस्तिकता की बात शुरू होती है। आस्तिकता यहां से शुरू होती है। बड़ी उसकी शुद्ध शुरुआत है। आस्तिकता का प्रश्न अस्तित्ववादी प्रश्न है। ऑनटोलॉजिकल प्रश्न है, एक दार्शनिक प्रश्न है। हम तो आस्तिक इस अर्थ में वो हुआ जिसने कहा कि नहीं यह जो दिखाई दे रहा

10:00 है, इसके आगे भी कुछ है। वो आस्तिक है। यह जो दिखाई दे रहा है, यह जो मैं सोचता रहता हूं, यह जो मेरी भावनाएं हैं, मेरे विचार हैं, मेरी कल्पनाएं हैं, मेरी छवियां हैं। इनके आगे भी कुछ है। क्योंकि यह जो जवान लड़का था इसने इस स्थूल जगत को भी धोखेबाज पाया था और विचारों और भावनाओं का भी छल उसने देखा था। वो इनका किसी का भरोसा करने को तैयार नहीं। ना तो वह इंद्रियों का भरोसा करने को तैयार है ना मन की कल्पनाओं का भरोसा करने को तैयार है। उसके सामने सब खंडित होकर के चूराचुरा टूटे पड़े हैं। उसे नहीं भरोसा करना। वो पूछ रहा है क्या इंद्रियों और मन से आगे कुछ है? अगर है तो

10:48 मैं कहूंगा अस्ति है। यह आस्तिक हुआ। यह शुद्धतम परिभाषा है आस्तिकता की। यह वेदांत की उपनिषदों की परिभाषा है आस्तिकता की। जो कहे कि इंद्रियों और मन से अतीत कुछ है जिसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। जो अज्ञेय है, जो अनिर्व्चनीय है, जो निर्गुण है, निराकार है, जिस तक ना कान जा सकते, ना आंखें जा सकती, ना शब्द जा सकते, ना कल्पना जा सकती, ना जिसका कोई रूप हो सकता, ना जव हो सकती, ना जिसका संबंध संसार की किसी वस्तु, किसी स्थान से लगाया जा सकता। यदि ऐसा कुछ है तो आस्तिकता

11:35 अस्ति शब्द ट्रांसेंडेंस के लिए प्रयोग में आता है। मनातीत सत्य शब्दातीत सत्य इंद्रियतीत सत्य समझ में आ रही है बात तो शुरुआत यहां से होती है आधार दार्शनिक है कि इसी में सड़ के मर जाना है यही सब जो कीचड़ दिखाई दे रही है वस्तुओं की विचारों की भावनाओं की संबंधों की इसी में सड़ के मर जाना है या कुछ और भी है जिसने कह दिया है वह आस्तिक लेकिन जो आगे है वह ऐसा होना चाहिए कि जिस तक जबान ना पहुंच पाए, आंख ना पहुंच पाए, मन ना पहुंच पाए, चित्त ना पहुंच पाए, कुछ ना पहुंच पाए। जिसने उस उस बिय्डनेस को,

12:22 उस ट्रांसेंडेंस को नमन कर लिया मात्र वो आस्तिक है। समझ में आ रही है बात? नास्तिक कौन है? जिसने कह दिया नहीं साहब यही सब जो है ना यही है। या नहीं कुछ है इसके आगे भी। वो क्या है जिसका मैं किस्सा बना सकता हूं। जिसकी मैं कहानी बना सकता हूं। तो वो भी नास्तिक हो गया। जो कह रहा है कि इंद्रियों से, विचारों से, भावनाओं से, कल्पनाओं से आगे और कुछ नहीं है। उसको बोलते हैं नास्तिक। समझ में आ रही है बात? यह कहानी यहां से शुरू होती है। अब समय बदला। यह बात है वेदांत की। और वेदांत अपने आप में

13:10 कोई अलग इकाई नहीं। वेदांत माने वेदों का शिखर। वेदांत माने वेदों का आखिरी और उच्चतम हिस्सा जहां आकर वेद भी समाप्त हो जाते हैं। वेदों की निष्पत्ति को कहते हैं वेदांत। तो मैंने कहा अब समय बदला, बात आगे बढ़ी। तो यह जो बात थी वेदांत की क्योंकि वेदांत वेद का हिस्सा है तो यह बात वेद की मान ली गई। यह वेदों की बात है। आस्तिकता वेदों की बात है। तो अब यह कहा जाने लगा कि जितने भी दर्शन बहुत सारे दर्शन आए। वेद आए और वेदों के बाद फिर बहुत सारे दर्शन आते हैं। बहुत सारे दर्शन

13:57 उन कुछ दर्शनों का भी हम उनको नाम भी लेंगे समझाएंगे आपको तो भी बहुत सारे दर्शन आ गए। तो अब यह कहा जाने लगा कि जो जो दर्शन वेदों की सत्ता में अथॉरिटी में विश्वास रखते हैं उनको हम आस्तिक बोल देंगे। ठीक है? तो अब बात दार्शनिक और अस्तित्ववादी ऑटोलॉजिकल अपने आधार से थोड़ा नीचे गिर गई क्योंकि समय बदला है ना तो विकृत आ गई थोड़ी डिस्टॉर्शन आ गया तो नीचे गिर गई अब बात दर्शन से गिर करके ग्रंथ के स्तर पर आ गई है कह रही है कि जो आकर के बोल देगा कि वेदों को मानते हैं वह आस्तिक हो गया जो आकर बोल देगा वह वेदों को मानते हैं वह आस्तिक हो

14:42 गया तो जिन्होंने भी कह दिया कि हम वेदों को मानते हैं वह सब आस्तिक हो गए। भले ही वो ईश्वर आदि को ना मानते हैं या ईश्वर को लेकर मौन हो वो सब आस्तिक हो गए। तो हमारा षट दर्शन है। आप जानते ही हैं छह दर्शन है। प्रमुख दर्शन वो सब के सब क्या माने जाते हैं? वास्तविक दर्शन है। वास्तविक दर्शन है। जबकि उनमें से कई ऐसे हैं जो ईश्वर को लेकर या तो मौन है या ईश्वर को वह नकार ही देते हैं। आप मीमांसा को ले लीजिए या सांख्य को ले लीजिए। हम वहां ईश्वर के लिए स्थान ही नहीं है।

15:29 लेकिन वो भी आस्तिक दर्शन गिने जाते हैं। क्योंकि वो वेदों को मानते हैं। वेदों को किस अर्थ से मानते हैं? कि वेदांत ने कहा है कि जीवन मुक्ति के लिए है। जीवन मुक्ति के लिए है। इस बात को सांख्य भी मानता है। इस बात को योग भी मानता है। इस बात को न्याय वैशेषिक भी मानते हैं। तो इसलिए यह सब आस्तिक दर्शन माने जाते हैं। वो वेदों को किसी और अर्थ में नहीं मानते। ये दर्शन सिर्फ एक अर्थ में मानते हैं कि वेदांत का लक्ष्य क्या है? वेदांत का लक्ष्य माने वेद का लक्ष्य। वेदांत वेद ही है। तो वेदांत का जो लक्ष्य है वह वेद का लक्ष्य है। वेदांत का लक्ष्य क्या है? मुक्ति। और सांख्य का भी क्या लक्ष्य है? मुक्ति। कि पुरुष है, प्रकृति है इनका द्वैतवादी जोड़ा है। तो पुरुष कैसे मुक्त

16:15 हो पाए? यही बात योग में है। यही बात आगे मीमांसा और बाकी दर्शनों में है। तो इस इस अर्थ में यह सब आस्तिक हो गए। और मीमांसा तो सीधे-सीधे कहता है कि वेद ही परम सत्य है। तो ये आस्तिक है। समझ में आ रही है बात? तो वेद को मानने का भी आशय यही है कि आप मुक्ति को मान रहे हो। लेकिन भाई अब समय बदल चुका है। तीन ऐसे दर्शन आए जो कह रहे हैं हम वेद को नहीं मानते। इसका अर्थ यह नहीं है कि वो मुक्ति को नहीं मानते थे। वह वेद को नहीं मानते थे। वो तीन कौन से दर्शन है जो बहुत प्रसिद्ध है। बौद्ध है, जैन है और लोकायत दर्शन जिसको चारवाक दर्शन कहते हैं।

17:02 ठीक है? इसमें से बौद्ध दर्शन और जैन दर्शन तो खासकर मुक्ति की बात करते हैं। वो दर्शनों का लक्ष्य ही है। मुक्ति निर्माण वहां पर बौद्ध धर्म में लेकिन वह वेदों को नहीं मानते। वो कहते हैं कि वेद को हम नहीं मानते मुक्ति को मानते हैं। क्योंकि वो वेद को नहीं मानते तो उनको कह दिया गया कि यह नास्तिक दर्शन है। वो वेद को नहीं मानते तो उनको कह दिया गया कि ये नास्तिक दर्शन है। ये समझ में आ रही है बात कुछ? एक काम करो। टेबल बनाओ। रोज में लिखो। ऐसे जो पंक्तियां है तुम्हारी उसमें पहली हेडिंग दो। अद्वैत

17:53 रोज रोज रो हेडिंग है। हां अद्वैत उसके नीचे दो अ बौद्ध दर्शन थोड़ी जगह दो ना। इतना इतनी जितनी पासपास लिखोगे जगह। आगे कैसे लिखोगे? अद्वैत के बाद जगह छोड़ के नीचे लिखो बौद्ध दर्शन। अद्वैत फिर जगह छोड़ के लिखो बौद्ध दर्शन। यह रो हेडिंग्स हैं। उसके नीचे और जगह छोड़ के लिखो द्वैत। अद्वैत के साथ लिख दो ज्ञान। अद्वैत ज्ञान। अद्वैत ज्ञान। द्वैत में लिख दो भक्ति। द्वैत भक्ति। और उसके सबसे नीचे लिख दो

18:41 मजे के लिए चारवाक लिख दो। ठीक है? और कॉलम में ऊपर लिखो सबसे पहले कॉलम की हेडिंग दो। दार्शनिक अस्तित्वत आधार। दार्शनिक अस्तित्वत आधार। इतनी हेडिंग दोगे तो आगे की हेडिंग कहां लिखोगे? यह हेडिंग है। तुमने तो पूरा स्कोप बना दिया। तीन कॉलम बनने हैं। तीन कॉलम बनाओ ना। लाइनें खींचो। तीन कॉलम बनाओ। कॉलम कॉलम। अरे ये जगह है। इसमें तीन कॉलम बनाओ। इधर

19:27 लाओ। हम देखिए सब लोग सबसे पहले लिखेंगे दार्शनिक अस्तित्वगत आधार। कहानी यहां से शुरू हो रही है। तीन कॉलम आपने बनाए हैं। ठीक है? तीन कॉलम है। एक दो तीन। तो अपने पेज को तीन हिस्सों

20:13 में बांट लीजिए और ऐसे तीन कॉलम बना लीजिए। तीन कॉलम और ये चार रोज़। हम चार में नीचे भी कुछ और जोड़ सकते हैं चाहे तो। पर अभी मैंने यहां पे ये चार दर्शन लिए हैं। कुछ और दर्शनों की भी अगर समय रहा तो कर लेंगे बात। तो पहले कॉलम की हेडिंग है दार्शनिक अस्तित्वगत आधार जहां से हमारी कहानी की शुरुआत ही हो रही है। ठीक है? फिर उसके बाद समय बीतता है तो कौन सा आधार आ जाता है? शास्त्रीय आधार। उसमें ब्रैकेट में लिखिए वेद सत्ता। फिर उसके बाद लिखिए आखिरी कॉलम। वर्तमान लोक धार्मिक आधार

20:59 वर्तमान लोक धार्मिक आधार और इस पूरे पेज के ऊपर की हेडिंग दे दीजिए कहानी आस्तिकता की यहां ऊपर सबसे ऊपर जो है हेडिंग दीजिए कहानी आस्तिकता की मेरे पास जगह नहीं बची नहीं तो मैं ही दे देता आप लोग दे लीजिए सबसे ऊपर क्या लिखना है कहानी आस्तिकता की और उसके नीचे यह आपने टेबल बनाया है। ठीक है? पहला था दार्शनिक अस्तित्वगत आधार जहां से कहानी शुरू हो रही है। फिर आता है वहां से थोड़ा सा बदल करके समय से शास्त्रीय आधार जिसमें कहा गया कि आस्तिक वो है जो वेद सत्ता को मानता है। और फिर आगे बात और भी

21:44 ज्यादा बिगड़ गई। संकुचित हो गई। संकीर्ण हो गई और वह हो गया वर्तमान लोक धार्मिक आधार। जिसमें आस्तिक वह माना जाता है जो ईश्वर में विश्वास करता है। वही जो आपने शुरुआत करी थी कि जो ईश्वर में विश्वास करे उसको आस्तिक बोलते हैं। ये वर्तमान लोक धार्मिक आधार है आस्तिकता का कि हम आस्तिक उसको मानेंगे जो ईश्वर में विश्वास करे। तो जब शुरुआत हुई कहानी की जब दार्शनिक आधार पर तय होता था कि कौन आस्तिक है और कौन नहीं। जब दार्शनिक आधार पर तय तो तब अस्ति माने क्या था? जब दार्शनिक आधार पर ऋषियों ने पहले चिंतन करा तो उन्होंने अस्ति का अर्थ क्या कहा

22:29 कि जो बिय्ड में बात करे जो अतीत को नमन करे जो कहे कि परम सत्य के बारे में ना सोचा जा सकता है ना उसकी कोई छवि होती है ना उसकी कोई कहानी होती है ना उसका कोई रूप होता है ना रंग होता है ना कर्म होता है ना क्रिया होती है ना अतीत होता है ना भविष्य होता है ना पसंद होती है ना होती है सिर्फ वो वो आस्तिक हैं। तो जब बात शुरू हुई थी अगर हम उसी आधार पर देखें तो आपकी पहली चीज है अद्वैत वेदांत। तो दार्शनिक आधार पर जो जो अद्वैत दर्शन है जिसको ज्ञान मार्ग कहेंगे आप वो कौन सा मार्ग हुआ? आस्तिकता का। तो वहां लिख लीजिए जो पहली सल है आस्तिकता।

23:19 अगर पूर्णतया दार्शनिक आधार पर देखा जाए तो जो बौद्ध दर्शन है वह भी कौन वह भी क्या हुआ वो भी आस्तिक दर्शन हुआ क्योंकि बुद्ध और विशेषकर जो माध्यमिक शून्यता है वो तो इस पूरे जगत को ही कह देती है कि क्या है यह शून्य है और इससे मुक्त होना ही दुख से मुक्त मुक्ति का मार्ग है। तो वहां भी कहा जा रहा है कि यह सब जो है यह छल प्रपंच है। जो दिखाई दे रहा है यह नकली है। वास्तविकता क्या है? उसके बारे में हम कुछ कह नहीं सकते। तो फिर बौद्ध मत

24:05 भी आस्तिक है। क्योंकि वह भी यह जोड़ा है दृश्य और दृष्टा का इसको प्रपंच मानता है। छल मानता है, धोखा मानता है। समझ में आ रही है बात? इसको क्या कहते हैं बुद्धिज्म में? हां। इसको कहते हैं डिपेंडेंट को ओरिजिनेशन। उसके लिए क्या शब्द है? हां। हां। प्रतीत समुताद। मैं उस पर निर्भर हूं। वह मुझ पर निर्भर है और दोनों एक दूसरे पर निर्भर है। पर हम

24:50 दोनों का ही कोई निजी ठोस स्वतंत्र आधार नहीं है। तो वह भी नहीं है। मैं भी नहीं हूं। वॉइड है। तो इस तरह से देखो तो जो बौद्ध दर्शन है वो भी दार्शनिक आधार पर आस्तिक दर्शन है। फिर आओ जो द्वैत भक्ति है। अब यहां मामला गड़बड़ हो जाता है। कुछ कह नहीं सकते। कहानी रोचक हो जाती है क्योंकि यहां पर कहा जा रहा है कि कोई अतीत सत्य नहीं है। अब द्वैत से आशय कई तरह के द्वैत दर्शन है। द्वैत दर्शन में मधवाचार्य का द्वैत तो है ही है। उसमें

25:36 फिर ऋषष्ट अद्वैत भी है। द्वैताद्वैत भी है और अचिंत भेदभेद भी है। यह सब द्वैत दर्शन ही है। और यही पूरा जो है कुल मिलाकर के इसको भक्ति वेदांत कहा जाता है। जितने द्वैत अर्थ निकाले गए वेदांत के उन सब को मिलाकर के भक्ति वेदांत बोलते हैं। वह सब द्वैतवादी ही है। आपस में उनमें थोड़े-थोड़े फर्क हैं। तो जो द्वैत भक्ति है वहां मामला अब थोड़ा सा रोचक हो जाता है। पता नहीं उसको आस्तिक बोले कि नास्तिक बोले। क्योंकि वहां किसी ईश्वर में विश्वास है और उस ईश्वर को भी गुण और रूप और रंग देकर के बात होती है और तीन सत्ताएं मानी जाती हैं ईश्वर की जगत की और जीव की और जीव के लिए कोई मुक्ति नहीं है।

26:21 जीव को लगातार क्या करना है द्वैत में? जीव को तो बस मुक्ति उसके लिए यही है कि वो ईश्वर की सेवा करता रहे। समझ में आ रही है बात? अब यह सारी बातें तो मनातीत नहीं है ना। आर दे बियों्ड माइंड? नहीं। यह सारी बातें शब्दातीत भी नहीं है। यहां कुछ भी ट्रांसिडेंटल तो है ही नहीं। इसमें बियों्डनेस तो है ही नहीं। तो बड़ा मुश्किल है कि द्वैत भक्ति को आस्तिक बोले कि नास्तिक बोले। तो मैं आप पर छोड़ता हूं। आप जानो। तो मैं अभी यहां पर लिख दूंगा आस्तिक स्लश नास्तिक। दार्शनिक आधार पर अब चारवाक है वह तो बिल्कुल मजेदार नास्तिक है वो तो इस पूरी

27:08 चर्चा पे हसेंगे जोर से उन्हें कुछ नहीं है कहां बात कर रहे हो बियों्ड ट्रांसडेंटल कुछ ना बियों्ड है ना कुछ ट्रांसेंडेंटल है जो है यही है मौज करो लेकिन सत ही बात नहीं है उनकी बहुत गहरी बात है लेकिन हमारी चर्चा के उद्देश्य से इतना कहना काफी है कि वह इसके बियों्ड जो सेंसुअल वर्ल्ड है जो इंद्रियों को अनुभव में आने वाला जगत है इसके आगे वह कुछ मानते नहीं थे। तो जब दार्शनिक आधार की बात होगी तो नास्तिक हो गए सीधे-सीधे लेकिन हमने कहा हवा चली जमाने बदले कालांतर में आस्तिकता का अर्थ हो गया कि जो वेदों को माने वो आस्तिक है। तो छह दर्शन है वो सब के सब वेद को मानते थे।

27:54 वही शर्त है वेद को मानते थे कि वह मुक्ति की बात करते हैं और वेद में वेदांत है। वेदांत भी मुक्ति की बात करता है। तो माने वेद मुक्ति की बात करते हैं। सब जो तो इस आधार पर देखो तो अद्वैत जो ज्ञान मार्ग है वो क्या हुआ? आस्तिक। क्योंकि भाई वो तो मानता ही है वेदों को तो वो आस्तिक हो गया। अब बौद्ध दर्शन जो वास्तव में अगर तुम देखो दार्शनिक तल पर ऑनटोलॉजिकल तल पर अगर देखो तो बौद्ध दर्शन जो सचमुच आस्तिक दर्शन है जब वेद सत्ता को मानने को शर्त बना दिया गया तो बौद्ध दर्शन फिर कहला गया नास्तिक दर्शन और जो द्वैत वेदांत है भक्ति वेदांत है वो तो

28:40 आस्तिक ही है निश्चित रूप से क्योंकि के वेदों की सत्ता को स्वीकार करता है। और चारवाक तो वेद मानने से रहे। यह बढ़िया लोग हैं। ये इनके साथ कोई चर्चा ही नहीं है। ये सिरे से नास्तिक है। अब समय और आगे बढ़ा। और आगे बढ़ा। और आगे बढ़ा। और जो बात दर्शन से शुरू हुई थी और वेद सत्ता को मानने तक पहुंची थी। वह अब लोक धर्म बन गई। और लोक धर्म बनकर अब आस्तिकता का मतलब क्या हो गया? थिज्म। क्यों हो गया?

29:25 क्योंकि भारत पर विदेशी प्रभाव छा गया। और जो अब्राहमिक धर्म है वहां थीज्म चलता है। थीज्म माने गॉड को मानते हो कि नहीं मानते हो। वहां पर धारणा ये थी कि तुम तुम थीस्ट हो कि एथिस्ट हो। एथिस्ट वो है जो भगवान को मानता है। एथस्ट कौन है जो नहीं मानता है। तो भारत में भी आस्तिक नास्तिक का अर्थ बिल्कुल विकृत हो गया क्योंकि भारत तो अब उनके अधीन आ गया था। जबकि आस्तिकता का भगवान और ईश्वर से कोई लेना देना नहीं है। सांख्य योग आस्तिक दर्शन है ना। उसमें कहीं कोई भगवान ईश्वर नहीं है। पर वो

30:12 आस्तिक दर्शन है। मूल रूप से आस्तिकता का जो रूप आप आज आप देख रहे हो कि जो भगवान जी को मानता है उसको आस्तिक बोल देते हो। यह बात ही गलत है। यह बात ही बहुत विकृत है। और यह विकृत कैसे हुई? यह विकृत हुई अब्राहमिक धर्मों के प्रभाव में। देखिए थीज्म का मतलब होता है ईश्वर में विश्वास। आस्तिकता का मतलब होता है सत्य को नमन। दोनों में बहुत अंतर है। दो शब्द हैं बहुत अलग-अलग। ईश्वर और सत्य अलग बात है और विश्वास और बोध अलग-अलग बात है। थीस्ट थीस्ट पश्चिम में पश्चिम में थीस्ट

30:57 वो है जो गॉड बिलीवर हो। जो गॉड बिलीवर हो और भारत में आस्तिक वो है जो सत्य के प्रति जिज्ञासा रखता हो बोध की उत्कंठा रखता हो मोक्ष हो वो होता है आस्तिक तो एथिस्ट को नास्तिक नहीं बोला जा सकता है। एथिज्म बिल्कुल अलग चीज है। आप उसको ना कंफ्यूज हो रहे हैं। आप उसको नास्तिकता से जोड़ के थिसज्म और एथज्म इनके केंद्र में क्या

31:43 बैठा है? गॉड। लेकिन आस्तिकता और नास्तिकता इनके केंद्र में क्या बैठा है? ट्रुथ। द ट्रुथ बिय्ड सेंसेस एंड मेंटेशन। अगर गॉड को मानो तो क्या कहलाओगे? थीस्ट और गॉड को नहीं मानोगे तो क्या कहलाओगे? एथस्ट। यह पश्चिमी अवधारणा है। यह बात इस्लाम में चलती है, यहूदी धर्म में चलती है और ईसाइयत में चलती है। लेकिन वो लोग जब भारत पे चढ़ बैठे तो यह बात भारत ने भी मान ली और ये भारत के लोक धर्म में घुस गई बात। और अब जितने लोग धर्मी है वो इस बात को मान रहे हैं जैसे यही असली बात हो। तो थीस्म और एथिस्म के केंद्र में बैठा हुआ है गॉड। गॉड।

32:29 लेकिन आस्तिकता और नास्तिकता के केंद्र में गॉड का कोई लेना देना नहीं है। आस्तिकता और नास्तिकता के केंद्र में सत्य है। जो कहे कि इस जगत के पार एक अज्ञेय सत्य है। जहां जाकर मेरी वाणी मूक हो जाती है। वो आस्तिक है। जिसके बारे में कुछ बोलना गुस्ताखी हो जाती है। ऐसा अनिर्वचनीय सत्य है। वो आस्तिक है। है है अस्ति और जो कहे नहीं नहीं नहीं सत्य यही है ये सब जो दिखाई दे रहा है ये जगत सत्य है मैं सत्य हूं जीव सत्य है जगत सत्य है और मैंने कल्पना कर ली है तमाम तरह के लोकों की और ये और वो वो सब भी सत्य है वो

33:15 नास्तिक है ये मूल बात है ये मूल सिद्धांत है तो थीज्म एथीज्म और आस्तिकता नास्तिकता बिल्कुल अलग बातें हैं इन्हें आपस में बिल्कुल नहीं जोड़ा जाना चाहिए इनमें कोई रिश्ता ही नहीं है आपस में लेकिन वो जो थीस में थीस्म की चीज थी वो भारत पर भी फिर हावी हो गई कालांतर में तो अगर आप यह देखोगे जो वर्तमान चल रहा है विकृत लोकधर्म चल रहा है उसमें तो यही है कि जो जो गॉड को मानता है वो आस्तिक है। अगर उस तरीके से देखोगे तो मामला गड़बड़ा जाता है। कहानी जबरदस्त मोड़ ले रही है। अब जो ज्ञान मार्ग है अद्वैत मार्ग है वहां कहना बड़ा मुश्किल हो जाता है कि वह आस्तिकता का है कि नास्तिकता का है क्योंकि अब आस्तिकता नास्तिकता की परिभाषा क्या हो गई

34:02 है ईश्वर को मानना लेकिन जो वेदांत का जो वेदांत का तत्व है जो असली बात है अद्वैत वहां तो यह है कि ईश्वर भी पारमार्थिक नहीं है। व्यवहारिक तल पर तुमको ईश्वर को मानना हो उससे तुम्हें कुछ लाभ होता हो तो तुम मान लो वरना तो सही बात तो यह है कि ब्रह्म के ऊपर जब माया आरोपित हो जाती है तो उसको ईश्वर बोलते हैं तो ईश्वर माया ही है माने अहंकार जब ब्रह्म को नहीं समझ पाता तो ईश्वर ईश्वर करने लग जाता है तो अद्वैत वेदांत में सच पूछो तो पारमार्थिक तल पर

34:47 ईश्वर के लिए कोई स्थान ही नहीं है हां व्यवहारिक तल है कि ईश्वर से तुम्हें लाभ होता हो तो तुम ईश्वर को मान सकते हो। मना भी नहीं करा जा रहा। तो अब बड़ा मुश्किल हो जाता है कि अगर अगर अब आस्तिकता का अर्थ है ईश्वर को मानना तो जो ज्ञान मार्गी है जो अद्वैती है उसको आस्तिक कहें कि नास्तिक कहें बड़ा मुश्किल है। क्योंकि परिभाषा ही इतनी गंदी कर दी है कि इस परिभाषा पर जो असली आस्तिक है वो अब नास्तिक हो जाएगा। तुमने परिभाषा यह कर दी है कि अगर आप गॉड को मानते हो तो आप आस्तिक हो और अद्वैत में जो वेदांत का केंद्र है जो वेदांत की एसेंस है अद्वैत उसमें गॉड के लिए कोई बहुत जगह नहीं है। उसमें ट्रुथ के लिए जगह है। वहां

35:35 सत्य की बात होती है। गॉड गॉड थोड़ी करता है अद्वैत। तो अब यहां पर मैं आपके लिए लिखे देता हूं। आस्तिक स्लश नास्तिक अगर पैमाना यह है अगर कसौटी यह है कि तुम्हें गॉड को मानना पड़ेगा तो आस्तिक कहलाओगे तो भाई अद्वैत का पता नहीं मुझे कि अब मैं उनको आस्तिक बोलूं कि नास्तिक बोलूं वो बिल्कुल एकदम बात बीचोंबीच आकर खड़ी हो जाती है। परमार्थिक तल पर जाओगे तो वहां पर तो फिर कोई जगह नहीं है। किसी बाहरी रचयिता ईश्वर के लिए हां व्यवहारिक तल पर ठीक है तुम्हें मानना है मान लो तो मैं इसीलिए कह रहा हूं कि मामला अब बिल्कुल बॉर्डर का हो गया

36:21 फिर आते हो बौद्ध दर्शन तो बौद्ध दर्शन में तो कोई क्रिएटर गॉड है ही नहीं तो वह तो पूरा ही नास्तिक हो गया सब नास्तिक हो गए जो वर्तमान परिभाषा बन गई है जो बाहरी प्रभावों के कारण इस्लाम का प्रभाव, ईसाइयत का प्रभाव। यह सब थिस्टिक रिलीजंस हैं। यहां पर गॉड इज एट द सेंटर ऑफ रिलजन। जो इंडिक रिलजंस है ना बेटा, उसमें गॉड इज नॉट एट द सेंटर रिलजन। ट्रुथ इज़ एट द सेंटर ऑफ रिलजन। और अद्वैत शिखर इसीलिए है वेदांत का क्योंकि वो कहता है कि गॉड से आगे है ट्रुथ। सत्य ईश्वर से आगे की बात है।

37:10 हम हां जो द्वैत भक्ति है वह अब पूरे तरीके से आस्तिक होगी क्योंकि वहां तो ईश्वरवाद पूरे तरीके से है तो वहां पूरी आस्तिकता है। बल्कि उनको ही आस्तिक माना जाएगा। आज के समय में जो भक्त है आप उसको ही आस्तिक मानते हो। उसके अलावा तो सब नास्तिक हैं। चारवाहक हैं उनके बारे में। ये अच्छे लोग हैं। ज्यादा सोचना नहीं पड़ता। कोई बातवत नहीं कहते हैं सीधे लाके लिख दो नास्तिक तो यह है कहानी आस्तिकता की वास्तविक आस्तिकता आपकी कल्पना की बात नहीं है आपके विश्वास की बात नहीं है वास्तविक आस्तिकता आपके बोध की बात है जो कुछ भी मानने से इंकार कर दे वो आस्तिक है जो किस्से कहानियों कल्पनाओं

37:57 को नमन करके बैठा हो वो तो नास्तिक है वास्तव में अगर मैं मूल आधार की बात करूं अगर मैं ऋषियों के तत्व की बात करूं। हां जो वर्तमान में दुनिया में चल रहा है उसको मानो। तो जो बात ऋषियों ने कही ऋषियों की बात नास्तिकता की थी। तो आपको चुनना पड़ेगा कि आप किसको अपना धर्म बोलते हो। वो जो ऋषियों ने दिया वो आपका धर्म है या जो अब ये चलने लग गया है पिछली कुछ शताब्दियों से इसको अपना धर्म मान रहे हो आप। अगर यह आपका धर्म है तो यह वैसा ही है एथिस्टिक एथिस्टिक जैसा पश्चिम में चलता रहा है। तो फिर यहां फिर तो थीज्म और एथिज्म को तय करेगा आपका आपका गॉड में विश्वास। इफ यू आर अ बिलीवर देन यू आर अ थीस्ट। इफ यू आर

38:43 अ नॉन बिलीवर बिलीफ आस्था जिसके पास यह सब कुछ है उसको आप बोल दोगे वो आस्तिक है। यह तब होगा जब आप समाज में जो चल रहा है इसी को पैमाना बना लो। लेकिन जो ओरिजिनल असली परिभाषा थी जो ऋषियों से आई थी उसको मानोगे तो जो किसी बात में विश्वास ना रखता हो वो आस्तिक है। जो विश्वास ही ना रखता हो जिससे पूछोगे क्या आप गॉड में विश्वास रखते हैं? तो बोलेगा मैं विश्वास में ही विश्वास नहीं रखता। क्या आप गॉड में यकीन करते हैं? मैं यकीन करने में यकीन नहीं करता। मैं जानता हूं। मैं एक चैतन्य जीव हूं। मेरा स्वभाव है जानना। मानना नहीं। मैं भी यकीन क्यों करूं? यकीन माने मानना। मैं कुछ नहीं मानता। चेतना का स्वभाव है

39:30 जानना। मैं जानता हूं। जो यह कह दे मात्र वो आस्तिक है। ठीक है? तो यह है बात। जो सब लोकधर्मी हैं। अगर आप सत्य के साधक हो तो वह तुरंत आपको नास्तिक ही घोषित कर देंगे। जबकि असली बात यह है कि यह जो पूरा लोक धर्म है। यह पूरी नास्तिकता चल रही है। यह सब जो अपने आप को आस्तिक बोलते हैं ना अंधभक्ति का प्रदर्शन करके अपने आप को आस्तिक बोलते हैं। सच्चाई ये है कि सब नास्तिक हैं। क्यों? क्योंकि इनका जानने में कोई इनका सारा काम है मानने का। इन्हें कुछ नहीं जानना। ये तो इसी दुनिया को माने बैठे हैं। यही

40:17 है सब कुछ। और इसके आगे अगर कुछ है तो वो क्या है? या तो ये स्थूल जगत को मानते हैं नहीं तो फिर सूक्ष्म जगत को जो मेरी कल्पनाओं का जगत है वहां चला जाऊंगा। स्वर्ग है, नर्क है, यह लोक है, वो लोक है। है तो वो भी तुम्हारे ही मन का उत्पाद ना। मन भी तो एक इंद्रिय ही है। आंखों से दिखाई दे वो भी भौतिक। और जो मन में तुम्हारे भावना उठ रही है वो भी भौतिक। भावना भी भौतिक होती है। कल्पना भी भौतिक होती है। तो ये है कहानी। नहीं अब आप जानो मैं नहीं जानता हूं कि आस्तिक किसको बोलना है नास्तिक किसको बोलना है। आधार की बात है। जो आधार ऋषियों ने दिया था उसको लोगे तो कोई आस्तिक निकलेगा। और जो आधार अभी चल रहा है दुनिया में भारत में क्योंकि भारत बेचारे की त्रासदी ये है कि गुलाम बना रहा

41:03 है। गुलाम बना रहा है। तो भारत जो बाहर की जितनी विचारधाराएं थी वो भारत पर भी हावी हो गई। तो जो वर्तमान में चल रहा है माने जो पूरी आयातित और विदेशी बातें हैं अगर उनको लोगे तो फिर कोई और आस्तिक निकलेगा। आ रही है बात समझ में? पूरा पन्ना भर गया। हां, मैंने कहा था कि इन चार के अलावा और भी हैं जिनकी बात हो सकती है। ठीक है? तो चार रोचक नाम लिए जाते हैं। आमतौर पर आस्तिकता, नास्तिकता का जब मुद्दा आता है पश्चिम की ओर से प्लेटो

41:58 कांट इनकी चर्चा आज सत्र में भी हुई थी एडगर और हल्का ले लो तो विंडगस्टाइन अब प्लेटो देखो क्या कह रहे हैं। प्लेटो कह रहे हैं वो ऑब्जेक्ट्स को देखते थे सारे। ये ऑब्जेक्ट्स हैं दुनिया के। बोलते थे यह सब जो ऑब्जेक्ट है ना यह फॉर्म के इंपरफेक्ट मैनिफेस्टेशंस हैं और फॉर्म ऐसी है जिस तक हम कभी पहुंच नहीं सकते। उदाहरण के

42:46 लिए दुनिया भर में ऐसे मग हैं तो कहते थे जितने भी यह मग हैं ये एक परफेक्ट कप के रिप्रेजेंटेशंस हैं। उसको बोलते थे जो परफेक्ट कप है उसको बोलते थे फॉर्म। कहते थे उस तक हम कभी पहुंच नहीं सकते। और सारी फॉर्म्स के ऊपर जो फॉर्म बैठी होती थी उसको बोलते थे द गुड। द गुड गॉड नहीं गुड बोलते तो वहां तक एकदम नहीं पहुंचा जा सकता। भाई इतने सारे कप बनते हैं। पर क्या कोई भी कप परफेक्ट होता है क्या? यह ऐसा बनता है इससे पहले इसकी एक मानसिक छवि होती है। उससे यह निकलता है। तो कह रहे हैं ये उससे निकलता

43:33 है और उसके भी ऊपर कुछ और बैठा है जिससे सारी मानसिक छवियां निकलती हैं। जहां सारी फॉर्म्स निकलती हैं। और जो हाईएस्ट फॉर्म है उसको तो बोलते थे द गुड। तो ट्रांसेंडेंस में यकीन प्लेटो से ही शुरू हो जाता है। ट्रांसेंडेंस की बात क्योंकि वो भी कह रहे हैं कि ये जो है सामने ना ये नहीं है असली चीज असली चीज इसके आगे है। तो ऋषियों के अगर अर्थ में लोगे तो प्लेटो को आप आस्तिक बोलोगे। पर अगर आप कहो कि क्रिएटर गॉड तो क्रिएटर गॉड को नहीं मानते थे प्लेटो उस अर्थ नास्तिक कहलाएंगे।

44:19 हां वो एक प्रिंसिपल की बात करते थे कि जो यहां पर जो केओस सारा है प्रकृति में जिस प्रिंसिपल से वो जो केओस है वो एक शेप लेता है। डेम्यूर्ज बोलते थे उसको। लेकिन वो किसी क्रिएटर गॉड को नहीं मानते थे। तो वो नास्तिक हो जाएंगे। लेकिन आप अगर उपनिषदिक ऋषियों के दृष्टिकोण से देखोगे तो प्लेटो क्या हुए? आस्तिक हुए। इसी तरीके से कांट जिनकी आज हमने बात करी वो भी कहते थे कि शुभ जो दिखाई दे रहा है यह फिनोमिना है। ये नहीं है। इसके पार है असली चीज। असली चीज क्या है? नॉमिना। और पर वो नॉमिना क्या है? वो तुम समझ नहीं सकते। कोई समझ नहीं सकता। तो इस अर्थ में कांट भी आस्तिक

45:06 हुए। वह भी कहते थे यह सब नहीं है और जो असली चीज है उसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। कुछ कहा नहीं जा सकता। तो कांट भी आस्तिक हुए। लेकिन कांट अब लोग धार्मिक आधार पर आस्तिक है कि नहीं यह बड़ा मुश्किल है कहना। बताओ। क्यों? क्योंकि कांट कहते थे ये क्रिएटर गॉड वगैरह का तो पता नहीं। लेकिन समाज में नैतिकता बनी रहे। इसके लिए ठीक है एक गॉड को मानना। फॉर द पर्पस ऑफ एथिक्स। गॉड को मान लो तो कांड का बड़ा रोचक केस हो गया। यह सब वह हैं जिनकी बात कर रहा हूं जो वास्तविक अर्थों में तो आस्तिक है पर लोग धार्मिक अर्थों में फंस जाते हैं। प्लेटो भी वास्तविक अर्थ में आस्तिक है क्योंकि वो कहते हैं कि यह सब जो है इसके आगे कुछ है। प्लेटो की एक है एलगरी ऑफ द

45:53 केव। आप सब पढ़ेंगे और कल कम्युनिटी पर उसके बारे में लिखेंगे। कम्युनिटी पर उसके बारे में लिखेंगे। देखिए यह बातें हैं। आप गीता कम्युनिटी यह सब बातें आपको स्पष्ट होनी चाहिए। आप तक ही अगर स्पष्टता नहीं पहुंचेगी तो आप औरों तक कैसे पहुंचाओगे? वो कहते हैं कि एक गुफा है। उस गुफा में कुछ है। और गुफा की दीवारों पर अब गुफा में बहुत अच्छी रोशनी तो होगी नहीं। गुफा की दीवारों पर उसकी तरह-तरह की परछाइयां पड़ रही हैं। सब परछाइयां उसी चीज की हैं जो चीज उस गुफा में मौजूद है। मान लो ऐसे समझ लो अभी कि कई मशाले हैं और वो मशाले भी ऐसे-से कर रही हैं। है

46:41 ना? स्टेबल सोर्स ऑफ लाइट नहीं है। फ्लिकर कर रहा है। तो जो परछाइयां पड़ रहीोंगी दीवारों पर वो क्या हो रही होंगी? वह भी बदल रही है, विकृत हो रही हैं। तो परछाइयों से इतना तो तुम्हें पता चलेगा कुछ है। पर यह नहीं बता पाओगे ठीक-ठीक कि क्या है और ठीक-ठीक क्या है यह कभी परछाइयों को देख के पता चल भी नहीं सकता। तो यह आस्तिकता की घोषणा है। कुछ है तो पर जैसे केन उपनिषद कहता है ना कि मन से और वाणी से और चक्षु से और श्रोत्र से अतीत है। समझ में आ रही है बात? अब फिर आते हैं हडेगर।

47:26 उन्होंने सीधा ही मना कर दिया। बोले कुछ नहीं यह है जो तुम लेकर के घूमते रहते हो ना। पश्चिमी संदर्भ में यह जो गॉड गॉड करते रहते हो कोई गॉड नहीं है बेकार की बात मत करो वो बीइंग की बात करते थे बीइंग वो बीइंग उनका लगभग वैसा ही जैसा सत ब्रह्म लगभग कहते थे ये गॉड वगैरह कुछ नहीं ब्रह्म सत्य है बीइंग और बीइंग को तुम बीइंग ऑफ द सेल्फ भी कह सकते हो आत्मा तो इस अर्थ में हेडेगर भी एकदम आस्तिक हुए लेकिन लोग धार्मिक नजरिए से देखोगे तो नास्तिक निकलेंगे। फिर विडगंस्टाइन

48:12 इन्होंने भाषा फिलॉसफी ऑफ लैंग्वेज पर बहुत काम किया। तो बोलते थे तुमने ये सब जो गॉड के बारे में चला रखा है ना ये वर्ड प्ले है। यह तुम्हारे ही शब्दों का खेल है जो तुमने चला रखा है और उसको गॉड गॉड कर रहे हो। हालांकि उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से कभी नहीं कहा कि गॉड है कि नहीं है कुछ नहीं और वास्तविक आस्तिक थे। प्रार्थना बहुत करते थे। बहुत करुण व्यक्ति थे। प्रार्थना करते हुए ऐसे आते हैं विवरण कि रो पड़ते थे। लेकिन फिर भी कहते थे लैंग्वेज उनका कार्यक्षेत्र था। लैंग्वेज पर काम करते बहुत कहते थे तुमने यह जो कहानियां बना रखी हैं ये तो सब तुम्हारी ही कहानियां हैं। इनका सत्य से कोई लेना देना नहीं। सत्य क्या है? उसके

48:58 लिए उन्होंने एक शब्द दिया था। बहुत सुंदर अनसेएबल। इसको सुनते ही किसकी याद आती है? अनिर्वचनीय। यह सत्य के लिए विटगस्टाइन का शब्द है। अनसेएबल। और उनकी कुछ उक्ति है कुछ इस तरीके की है जो कि वह जिसको कहा नहीं जा सकता उसे कहा भी नहीं जाना चाहिए। ठीक है? अब इसके ठीक-ठीक शब्द क्या है? आप लोग खोज करके लाएंगे और कम्युनिटी पर लिखेंगे। बोलते थे वो जिसको कहा नहीं जा सकता उसके बारे में कुछ कहा भी नहीं जाना चाहिए। मत उड़ाओ। इतनी कहानियां।

49:44 समझ में आ रही है बात? तो दुनिया भर में जिन्होंने सचमुच जानना चाहा है, समझना चाहा है, आज वो सब बेचारे एक अजीब दुविधा में फंसे हैं। ऋषियों की तरफ से देखें तो वो सब के सब आस्तिक हैं। पर प्रचलित यह जो लोक धर्म है और अंधभक्ति है इसकी ओर से देखें तो सब नास्तिक हो जाते हैं। ये कहते हैं साहब हम आस्तिक मानेंगे ही उसी को जो गॉड बिलीवर है। वरना हम आस्तिक नहीं मानेंगे। औरकि ये बहुत पढ़े लिखे नहीं होते। इसीलिए ये एक बहुत सीधे प्रश्न का जवाब भी नहीं दे पाते कि ये तो बता दो कि इतने सारे हमारे दर्शन है षड दर्शनों में आस्तिक

50:30 दर्शनों में जहां गॉड ईश्वर जैसी कोई चीज नहीं है। फिर उनको आस्तिक दर्शन क्यों बोलते हैं? वो इसलिए बोलते हैं क्योंकि आस्तिकता का गॉड से कोई लेना देना है ही नहीं। आस्तिकता का लेना देना ट्रुथ से है। जो मुक्ति चाहता हो वो आस्तिक है। वास्तविक मुक्ति ये नहीं कि इस दुनिया से हटके किसी और दुनिया में पहुंच जाऊं। जो स्वर्ग चाहता हो वो आस्तिक नहीं है। क्योंकि वो एक दुनिया से हटकर दूसरी दुनिया चाहता है। जो मृत्यु लोक से हटकर कोई और लोक चाहता हो वो आस्तिक नहीं है। क्योंकि वो अभी भी चाहता है। वह इस दुनिया की अपेक्षा कोई दूसरी दुनिया चाहता है। जो ऐसी पूर्ण मुक्ति चाहता है कि वह बचे ही ना किसी लोक में रहने के लिए। मात्र वह आस्तिक है। हम तो अभी आप पर निर्भर करता है आप आधार

51:17 कौन सा लेना चाहते हैं जो आधार आपको ऋषियों ने दिया था वो आधार लोगे तो एक आदमी आस्तिक निकलेगा और आज के समाज में लोक धर्म में जो आधार चल रहा है उस आधार को लोगे तो कोई बिल्कुल दूसरा उल्टा आदमी आस्तिक निकलेगा अभी आप जानो आ रही है बात समझ समझ में हम बताइए कहानी लंबी चली >> रोचक थी हम सर जैसे आपने उनकी बात करी कि वास्तविक अर्थों में जो नास्तिक थे वो आस्तिक थे उनको आजकल नास्तिक समझा जाता है तो इससे मेरे जेहन में दो नाम आए एक तो जीसस

52:03 क्राइस्ट और भगत सिंह तो एक तरह से भगत सिंह हां हां हां हां देखो जो भी व्यक्ति मुक्ति का आकांक्षी है और कल्पनाओं में विश्वास नहीं करता उसको आस्तिक कहेंगे ऋषि इस अर्थ में भगत सिंह ने बिल्कुल ठीक लिखा है व्हाई एम आई एन एथिस्ट वो एथिस्ट है पर नास्तिक नहीं है वो एथिस्ट है और आस्तिक है बल्कि और बताता हूं तुमको अब कान खड़े कर लो जो वास्तविक आस्तिक होगा उसे एथस्ट होना पड़ेगा और जो थीस्ट है ज्यादा संभावना है कि वो नास्तिक है।

52:49 ऋषियों ने जो बात दी है और जो बात पश्चिम में चली है और अब्राहमिक धर्मों की ओर से आई है वो बात उल्टी है। बिल्कुल हम सोचते हैं आस्तिक माने एथिस्ट और नास्तिक माने एथिस्ट। उल्टा है। ज्यादा संभावना यह है कि भगत सिंह जैसा कोई जो वास्तविक आस्तिक है। उसे एथिस्ट होना पड़ेगा। तीन तल है आस्तिकता नास्तिकता का निर्णय करने के। ये समझ में आ गई है ना बात? पहला तल है दार्शनिक अस्तित्ववादी तल। हम जो पूछता है कि तुम सिर्फ इस दुनिया को मानते हो या इसके बियों्ड कुछ है उसको उसके

53:35 तो ये ये पहला और वास्तविक तल है। और दूसरा तल है जिस पे तुम निर्णय कर सकते हो कि आस्तिक या नास्तिक वो क्या है कि जो वेद को माने वो आस्तिक और जो वेद को ना माने वो नास्तिक। और फिर जो तीसरा तल है उसमें वेद के लिए भी जगह नहीं है। वहां पर कहते हैं जो भगवान को माने वो आस्तिक जो भगवान को ना माने नास्तिक। तो आस्तिकता नास्तिकता की परिभाषा ही बिल्कुल एकदम उलट के रख दी है। जो ऋषियों ने दी थी और जो आज चल रही है वो बिल्कुल 180 डिग्री हो गई है। ऋषियों से पूछोगे तो कहेंगे कि यहां तुम्हारी संस्था में हम आस्तिकता का सबसे बड़ा यज्ञ चल रहा है।

54:24 बहुत आनंदित होंगे ऋषि देख के यहां जो हो रहा है गीता कम्युनिटी पर वह कहेंगे आस्तिकता का यज्ञ है यह और बाहर निकलोगे लोकधर्मियों से पूछोगे तो कहेंगे कि आचार्य सबको नास्तिक बना रहा असल में

55:15 अब हम इतनी नास्तिकता की बातें कर रहे हैं। गॉड गॉट एंग्री। कहां है? आ गई। हां जी। हुआ क्या है? अगर आप इस पूरी कहां गई? जल्दी-जल्दी हाथ चलाओ ना। तुम भी आराम से धीरे-धीरे यहां हम अधीर हो रहे हैं। अगर पूरी कहानी समझ में आई होगी तो दिखाई दिया होगा कि जिसको आप सनातन धर्म कहते हो

56:01 ना उसका अपहरण हो गया है। वो हाईजैक कर लिया गया है। वह ऋषियों का धर्म नहीं है। वो लोग धार्मिक बाबाओं का धर्म हो गया। अंधभक्ति का धर्म हो गया है। पर वह कहते हैं कि बस जो हमारे हिसाब से चले वह आस्तिक है। तुम्हें हमारी मान्यताएं माननी होंगी। तुम्हें हमारी कहानियां माननी होंगी तो तुम आस्तिक हो। बहुत जरूरी है कि सनातन धर्म को रिक्लेम किया जाए। उसको वापस ऋषियों के पास पहुंचाया जाए। नहीं तो यह जो उल्टा पुल्टा अर्थ चल गया है आस्तिकता नास्तिकता का। अभी तो चलिए फिर भी मेरे जैसे कुछ हैं जो बता देंगे।

56:46 काल की धार आगे बढ़ेगी। यह बताने वाला भी कोई नहीं रहेगा। आने वाली पीढ़ियों को यही लगेगा कि यही होती है आस्तिकता कि जैसे पश्चिम में गॉड बिलीवर और गॉड फियरिंग होता है। इसी को आस्तिक बोलते हैं भारत में। वो यही मानने लग जाएंगे। जबकि भारत का दर्शन बहुत आगे की और बहुत ऊंची बात करता है इससे। यह बहुत छोटी बात है कि गॉड बिलीवर हो तो तुम आस्तिक हो। बहुत छोटी बात है यह। भारत ने इससे बहुत आगे की ऊंचाइयां छई हैं। पर वह सारी बातें एकदम खो जाएंगी। >> धन्यवाद आचार्य जी।

57:32 >> मेरा नाम अनुराग पांडे है। मैं छ महीने से आचार्य जी से जुड़ा हुआ हूं। पहले मैं मुझे बहुत चीजों की क्लैरिटी नहीं होती थी। लेकिन अब मुझे जीवन में कुछ वजह आचार्य जी की वजह से सही दिशा में चलने की एक प्रेरणा मिली है। पहले मैं सिर्फ अपने जीवन में पूरी तरीके से डूबा रहता था। दुख भी थे। बेचैनी थी बहुत ज्यादा हमेशा कंफ्यूजन के स्टेट में रहता था। लेकिन अब जब हुआ है एक रास्ता मिला है और एक जानकारी हुई है और यह सिर्फ गीता सत्रों की नहीं बल्कि पूरे व्यापक जानकारी हुई जिसमें क्लाइमेट चेंज एक लक्ष्य का जो जरूरत होती है वो भी एक समझ आई है। ऐसा लग रहा है कि अब आचार्य जी को छोड़ना मुश्किल

58:17 है। [संगीत]

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