SSC CHSL 2025 | Ancient History | One Shot Session | By Navdeep Sir

SSC CGL Adda247 www.youtube.com

संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो हड़प्पा सभ्यता, वैदिक सभ्यता, महाजनपद काल, जैन धर्म, बौद्ध धर्म और मौर्य साम्राज्य सहित प्राचीन भारत के विकास पर प्रकाश डालता है। यह विभिन्न राजवंशों, उनके शासकों, उनकी राजधानियों और उनके योगदानों पर चर्चा करता है। यह वीडियो कला, साहित्य और धर्म के विकास पर भी प्रकाश डालता है, जो प्राचीन भारत को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

  • हड़प्पा और वैदिक सभ्यताओं के बीच अंतर
  • महाजनपदों का उदय और उनका महत्व
  • जैन और बौद्ध धर्मों का विकास और उनके सिद्धांत
  • मौर्य साम्राज्य और उसके शासकों का योगदान
  • गुप्त काल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग क्यों कहा जाता है

हड़प्पा और वैदिक सभ्यताएँ

हड़प्पा सभ्यता और वैदिक सभ्यता प्राचीन भारत के विकास के क्रम हैं। ऋग्वैदिक काल में लोगों का समुदाय 'जन' कहलाता था, जो एक निश्चित जगह पर रहते थे जिसे 'जनपद' कहा जाता था। कई जनपद मिलकर 'महाजनपद' बनाते थे, और कई महाजनपद मिलकर 'साम्राज्य' बनाते थे। कई साम्राज्य मिलकर एक 'राष्ट्र' का निर्माण करते थे, जिसके स्वामी को 'एकराट' कहा जाता था। वैदिक काल के बारे में जानकारी संस्कृत में लिखे ग्रंथों से मिलती है, जबकि हड़प्पा काल की लिपि ('बूस्ट ट्रॉफेडॉन' या 'भावित्रात्मक शैली') को अभी तक समझा नहीं जा सका है।

महाजनपदों का उदय

लगभग 600 ईसा पूर्व में, महाजनपद अस्तित्व में आए, जहाँ राजाओं द्वारा शासन किया जाता था। इसी समय, 62 धर्म भी अस्तित्व में आए, जिनमें से केवल दो ही बच पाए: जैन धर्म और बौद्ध धर्म। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण और क्षत्रिय अपनी प्रधानता बढ़ा रहे थे, जबकि वैश्य और शूद्रों की सामाजिक स्थिति गिर रही थी। इससे वर्ण प्रथा जाति प्रथा में परिवर्तित हो गई, जिसे वैश्य और शूद्रों ने स्वीकार नहीं किया, और उन्होंने जैन धर्म और बौद्ध धर्म की ओर रुख किया। बौद्ध धर्म के 'अंगुत्तर निकाय' और जैन धर्म के 'भगवती सूत्र' में 16 महाजनपदों का उल्लेख है, जो कश्मीर से बांग्लादेश तक फैले हुए थे।

मगध साम्राज्य

मगध साम्राज्य, जो आधुनिक बिहार में स्थित था, पर सबसे पहले हर्यंक राजवंश ने शासन किया। बिंबिसार ने इस राजवंश की स्थापना की और राजगृह को अपनी राजधानी बनाया। उसके बाद, अजातशत्रु ने बिंबिसार की हत्या कर दी और शासक बना, जिसके बाद उदयन शासक बना, जिसने पाटलिपुत्र को राजधानी बनाया। शिशुनाग ने पाटलिपुत्र से राजधानी को राजगृह और फिर वैशाली स्थानांतरित किया। कालशोक ने फिर से पाटलिपुत्र को राजधानी बनाया, जो लगभग 600 वर्षों तक मगध की राजधानी बनी रही। अवंती साम्राज्य की राजधानी उज्जैनी और माहिष्मती थी, और यह क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे बड़ा महाजनपद था।

महाजनपदों का विस्तार और विशेषताएँ

16 महाजनपदों में, अस्सक दक्षिण भारत में स्थित था, जिसकी राजधानी पोइतान थी। बिंबिसार ने अंग प्रदेश को मगध का हिस्सा बना लिया, जबकि शिशुनाग ने अवंती को जीता। अजातशत्रु ने वृज्जि को जीता। बौद्ध और जैन ग्रंथों में 16 महाजनपदों का उल्लेख है, जिनमें अंग, मगध, काशी, वत्स, कौशल, सुसेन, पांचाल, कुरु, मत्स्य, चेदि, अवंती, गांधार, कंबोज, अस्मक, वज्जि और मल्ल शामिल हैं। प्रत्येक महाजनपद की अपनी राजधानी और विशेषताएँ थीं। वाराणसी का नाम वरुणा और असी नदियों के नाम पर रखा गया है।

जैन धर्म का उदय और सिद्धांत

जैन धर्म 'जिन' शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है इंद्रियों का विजेता। यह 'श्रमण दर्शन' पर आधारित है और 'स्यादवाद' के सिद्धांत का पालन करता है, जो मानता है कि सजीव और निर्जीव दोनों में आत्मा होती है। जैन धर्म 'परस्परोपग्रहो जीवा नाम' पर जोर देता है, जिसका अर्थ है कि आत्माएँ एक दूसरे को सेवा देती हैं। जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए हैं, जिनमें पहले ऋषभदेव और अंतिम वर्धमान महावीर स्वामी हैं। जैन धर्म के ग्रंथ दो भागों में बंटे हैं: श्रुति (सुनकर आगे बढ़ाया गया) और स्मृति (याद करके लिखा गया)।

बौद्ध धर्म का उदय और सिद्धांत

बौद्ध धर्म महात्मा बुद्ध द्वारा शुरू किया गया था, जिन्हें 'एशिया का प्रकाश' और 'शाक्य मुनि' भी कहा जाता है। उनका जन्म 563 ईसा पूर्व में कपिलवस्तु (लुंबिनी, नेपाल) में हुआ था, और महापरिनिर्वाण 483 ईसा पूर्व में कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनके पिता शुद्धोधन शाक्य गण के मुखिया थे, माता महामाया और धाय माँ प्रजापति गौतमी थीं। उनकी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल थे। 29 वर्ष की अवस्था में उन्होंने घर छोड़ दिया और अलार कलमा और रुद्रक रामपुत्र से शिक्षा प्राप्त की। बोधगया में पीपल के पेड़ के नीचे तपस्या करने के बाद उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ, जिसे 'निर्वाण' कहा जाता है।

बौद्ध धर्म की परिषदें और महत्वपूर्ण घटनाएँ

बौद्ध धर्म में चार संगीतियाँ हुईं: पहली 483 ईसा पूर्व में राजगृह में अजातशत्रु के शासनकाल में, दूसरी 383 ईसा पूर्व में वैशाली में कालशोक के शासनकाल में, तीसरी 250 ईसा पूर्व में पाटलिपुत्र में अशोक के शासनकाल में, और चौथी 78 ईस्वी में कुंडलवन में कनिष्क के शासनकाल में। इन संगीतियों में सूतपितक, विनय पितक और अभिधम्म पितक जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों का संकलन किया गया। बुद्ध के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं में गृह त्याग (महाभिनिष्क्रमण), ज्ञान प्राप्ति (निर्वाण), संसार त्याग (महापरिनिर्वाण) और पहला उपदेश (धर्म चक्र प्रवर्तन) शामिल हैं।

जैन धर्म के सिद्धांत और विभाजन

जैन धर्म में पाँच पवित्र प्रतिज्ञाएँ हैं: सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। इनमें से पहले चार पार्श्वनाथ स्वामी ने दिए थे, जबकि पाँचवाँ ब्रह्मचर्य महावीर स्वामी ने दिया था। जैन धर्म में दो प्रमुख विभाजन हैं: दिगंबर और श्वेतांबर। दिगंबर नग्न रहते हैं, जबकि श्वेतांबर सफेद वस्त्र पहनते हैं। श्वेतांबर मानते हैं कि 19वें तीर्थंकर मल्लीनाथ जी एक महिला थीं, जबकि दिगंबर मानते हैं कि सभी तीर्थंकर पुरुष थे।

बौद्ध धर्म के संप्रदाय और ग्रंथ

बौद्ध धर्म में दो प्रमुख संप्रदाय हैं: हीनयान और महायान। महायान मूर्ति पूजा पर विश्वास करते हैं, जबकि हीनयान प्रतीकों की पूजा करते हैं। हीनयान बौद्ध श्रीलंका में पाए जाते हैं। बौद्ध धर्म के महत्वपूर्ण ग्रंथों में त्रिपितक (सुतपितक, विनय पितक और अभिधम्म पितक) शामिल हैं। सुतपितक नैतिकता के बारे में बताता है, विनय पितक भिक्षुओं के लिए नियम बताता है, और अभिधम्म पितक बौद्ध धर्म के अध्यात्मवाद के बारे में बताता है।

महाजनपद काल का पुनरावलोकन

महाजनपद काल में 16 महाजनपद थे, जिनका उल्लेख 'भगवती सूत्र' और 'अंगुत्तर निकाय' में मिलता है। इनमें से सबसे शक्तिशाली महाजनपद मगध था, जो आधुनिक बिहार में स्थित था। मगध पर सबसे पहले हर्यंक राजवंश ने शासन किया, जिसके बाद शिशुनाग राजवंश और नंद राजवंश आए। नंद राजवंश के अंतिम शासक धनानंद को चंद्रगुप्त मौर्य ने हराया, जिससे मौर्य साम्राज्य की स्थापना हुई।

मौर्य साम्राज्य की स्थापना और विस्तार

चंद्रगुप्त मौर्य ने 321 ईसा पूर्व में मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। उन्होंने सेल्यूकस निकेटर को हराया और अपनी शक्ति का विस्तार किया। चंद्रगुप्त मौर्य के समय में, गुजरात के गवर्नर पुष्यगुप्त ने सुदर्शन झील का निर्माण करवाया। चंद्रगुप्त मौर्य जैन धर्म को मानते थे और उन्होंने श्रवणबेलगोला में सल्लेखना करके प्राण त्याग दिए। उनके पुत्र बिंदुसार आजीवक संप्रदाय के उपासक थे, जबकि उनके पौत्र अशोक बौद्ध धर्म के उपासक थे।

अशोक का शासन और बौद्ध धर्म का प्रसार

अशोक ने 261 ईसा पूर्व में कलिंग युद्ध लड़ा और बौद्ध धर्म को अपनाया। उन्होंने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए भेजा। अशोक के शिलालेखों की व्याख्या सबसे पहले जेम्स प्रिंसेप ने की थी। अशोक के समय में न्यायपालिका मजबूत हुई, और उन्होंने सिविल और क्रिमिनल कोर्ट अलग-अलग स्थापित किए। अशोक को 'देवनाम प्रियदर्शी' भी कहा जाता था, जिसका अर्थ है देवताओं का चहेता।

मौर्य साम्राज्य का पतन और शुंग राजवंश का उदय

मौर्य साम्राज्य के अंतिम शासक बृहद्रथ की हत्या पुष्यमित्र शुंग ने की, जिससे शुंग राजवंश की स्थापना हुई। शुंग राजवंश पहला ब्राह्मण राजवंश था। इसके बाद कणव राजवंश आया, जिसे सातवाहनों ने हराया। सातवाहन राजवंश ने दक्षिण भारत में अपनी शक्ति का विस्तार किया।

मौर्योत्तर काल: विदेशी आक्रमण और सातवाहन राजवंश

मौर्योत्तर काल में, भारत पर कई विदेशी आक्रमण हुए, जिनमें इंडोग्रीक, सीथियन, पार्थियन और कुषाण शामिल थे। कुषाण शासकों में कनिष्क सबसे प्रसिद्ध थे, जिन्होंने भारत को सोने की चिड़िया बनाया। सातवाहन राजवंश ने ब्राह्मणों को भूमिदान देने की परंपरा शुरू की।

कुषाण साम्राज्य और कनिष्क का शासन

कुषाण शासक चीन से आए थे। कनिष्क ने पुरुषपुर (पेशावर) और मथुरा को अपनी राजधानी बनाया। उन्होंने सिल्क रूट पर कब्जा किया और भारत को सोने की चिड़िया बनाया। कनिष्क के दरबार में चरक, सुश्रुत, नागार्जुन, वसुमित्र और अश्वघोष जैसे विद्वान थे। अश्वघोष ने 'बुद्ध चरित' और 'सौंदरानंद' नामक पुस्तकें लिखीं।

गुप्त साम्राज्य का उदय और चंद्रगुप्त प्रथम

सातवाहनों की कमजोर पकड़ के बाद, गुप्त साम्राज्य का उदय हुआ। श्रीगुप्त ने इस राजवंश की स्थापना की, लेकिन चंद्रगुप्त प्रथम को गुप्त साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। उन्होंने लिच्छवी राजकुमारी कुमार देवी से शादी की और 'महाराजाधिराज' का टाइटल लिया।

समुद्रगुप्त: भारत का नेपोलियन

समुद्रगुप्त एक महान विजेता थे, जिन्हें 'भारत का नेपोलियन' कहा जाता है। उन्होंने उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम के सभी राजाओं को हराया। समुद्रगुप्त को 'कविराज' भी कहा जाता था, क्योंकि उन्होंने स्वयं को वीणा बजाते हुए सिक्कों पर अंकित करवाया था। उनके दरबारी कवि हरिसेन ने प्रयाग प्रशस्ति में उनकी विजयों का उल्लेख किया है।

चंद्रगुप्त द्वितीय और गुप्त काल का स्वर्ण युग

समुद्रगुप्त के पुत्र चंद्रगुप्त द्वितीय ने 380 ईस्वी से 415 ईस्वी तक शासन किया। उनके शासनकाल में फाहियान नामक एक चीनी यात्री भारत आया। चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में नवरत्न हुआ करते थे, जिनमें कालिदास, धनवंतरी, वराहर और वेतालभट्ट शामिल थे। कुमारगुप्त प्रथम ने नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की। स्कंदगुप्त ने हूणों को हराया। गुप्त काल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है, क्योंकि इस समय कला, साहित्य, विज्ञान और संस्कृति का विकास हुआ।

गुप्त काल: कला, साहित्य और संस्कृति

गुप्त काल में मंदिर बनाने की कला का विकास हुआ, जिसमें नागर और द्रविड़ शैली के मंदिर बनाए गए। इस समय, वेश्यावृत्ति कानूनी थी, और वेश्याओं को गणिका कहा जाता था। महर्षि वेदव्यास ने 'जयसंहिता' लिखी, जो बाद में 'महाभारत' कहलाई। महर्षि वाल्मीकि ने 'रामायण' लिखी, विष्णु शर्मा ने 'पंचतंत्र' लिखा, और आर्यभट्ट ने 'आर्यभट्टीयम' और 'सूर्य सिद्धांतिका' लिखीं। वराहमिहिर ने 'बृहत संहिता' लिखी, और शूद्रक ने 'मृच्छकटिक' लिखी। भारवी ने 'किरातार्जुनियम' लिखी।

Summarize any YouTube video in seconds

Get summaries like this one for any video, in your language, with the free Summ app.

Download on the Apple Store
Get it on Google Play

Transcript

YouTube Transcript Generator

0:00 हड़प्पा सभ्यता या वैदिक सभ्यता यह वास्तव में प्राचीन काल में भारत के विकास का एक क्रम है और भारत का विकास जैसे-जैसे आगे होता गया है वैसे-वैसे धीरे-धीरे राजवंशों की उत्पत्ति हुई है। मैंने एक बहुत बढ़िया सा सिस्टम बताया था आपको कि ऋग वैदिक काल में लोगों का समुदाय जन कहलाता था। और यह जन जिस जगह पर रहता था उसे जनपद कहते थे। जनपद में हमेशा एक राजा होता था। कई सारे जनपद मिलकर के महाजनपद बनाते थे और इस महाजनपद में महाराजा होता था। कई सारे महाजनपद मिलकर के साम्राज्य बनाते थे। इस साम्राज्य में सम्राट होता था। और कई सारे

0:49 साम्राज्य मिलकर के एक राष्ट्र का निर्माण करते थे। और वो जो एक राष्ट्र है अखंड राष्ट्र उस अखंड राष्ट्र का अगर कोई स्वामी हो उस अखंड राष्ट्र का अगर कोई राजा हो तो उसे एकराट कह दिया जाता था। ऐसा चर्चा के दौरान हम लोगों ने पढ़ा और वास्तव में यह जितने भी आप बाद में आने वाले टाइटल्स को पढ़ते हैं। चाहे किसी राजा ने आदिवराह टाइटल लिया हो। अभिनव भोज, आंध्र भोज, यवनराज स्थापनाचार्य, परम भट्ट कारक या आंध्र पितामह या किसी ने आर्यावर्त पितामह, महाराजाधिराज ऐसे कोई भी उपाधियां जो भी ली गई हैं, ये सभी उपाधियों के पीछे वजह सिर्फ और सिर्फ एक कि आखिर वो वैदिक काल से प्रेरित जरूर

1:35 थी। वैदिक काल के बारे में हमें इतनी ज्यादा जानकारी इसलिए भी मिल जाती है दोस्तों क्योंकि इनके लिखे हुए जितने भी ग्रंथ हैं वो सभी के सभी संस्कृत में है और संस्कृत अभी भी बोली जाने वाली पढ़ी जाने वाली और लिपि को समझ करके उस पर जानकारी इकट्ठा कर लेने वाली भाषा है। परंतु अगर हम हड़प्पा काल की स्क्रिप्ट को पढ़ना शुरू करें तो हमें समझ ही नहीं आता कि आखिर वो क्या थी जिसे हम लोगों ने नाम दिया था बूस्ट ट्रॉफेडॉन। मजेदार बात तो यह है कि जब हमें समझ में नहीं आया तो हमने नाम भी ऐसा ही दे दिया जो खुद भी समझ में ना आए। बोस्ट्रोफेडोन क्या कहते हैं इसे दोस्तों? इसे कहते हैं भावित्रात्मक शैली। इसे कहा जाता है भावित्रात्मक शैली या कई बार आप लोग कहते हो कि यह पिक्टोग्राफिक

2:22 है। पिक्टोग्राफिक का मतलब यह कि यह फोटोस हैं। लिखा हुआ है और फिर फोटोस हैं। फिर लिखा हुआ है। इसमें बहुत सारी जानकारियां चलिए अब आगे बढ़ते हैं। आगे बढ़कर के दोस्तों हम थोड़ा वैदिक काल के समय काल की ही बात करें और जनपदों की बात करें जो कि वैदिक काल के अंत में बने भारत में एक बार भारत का मैप देखेंगे तो आपको बहुत सारी जानकारियां धीरे-धीरे पुख्ता होती रहेंगी। हालांकि ये भारत का मैप पूरी तरह से करेक्ट मैप नहीं है। लेकिन फिर भी आप सभी लोगों के लिए मैं बता देना चाहता हूं कि जब वैदिक काल का लगभग अंत हुआ। वैदिक काल यानी कि वैदिक एज जब हम लोग बात करते हैं लगभग

3:10 लगभग हम लोग बात करते हैं 600 ईसवी पूर्व के आसपास तो ये 600 ईसवी पूर्व में दो घटनाएं एक साथ घट रही थी। उन दो घटनाओं में या 600 बीसी में पहली घटना तो यह थी कि जो महाजनपद अस्तित्व में आए थे वो महाजनपद राजाओं द्वारा शासन किए जा रहे थे तो एक तरफ महाजनपदों का निर्माण और दूसरी तरफ बहुत सारे धर्म अस्तित्व में आए और ऐसा कहते हैं कि उस समय पर 62 रिलीजंस अस्तित्व में आए थे और इन 62 रिलीजंस में से ओनली टू टू सर्वाइव्ड। देखिए दोस्तों, ऐसा क्यों हुआ होगा?

3:55 वास्तव में हम लोगों ने चर्चा की थी कि कैसे भारत के अंदर भारत में वर्ण व्यवस्था थी और वर्ण व्यवस्था को अगर हम समझना शुरू करते हैं दोस्तों तो हम पाते हैं कि भारत की वर्ण व्यवस्था बंटी हुई थी चार वर्णों में। एक ब्राह्मण, दूसरा क्षत्रिय तीसरा वैश्य और चौथा शूद्र। अब देखिए ब्राह्मण और क्षत्रिय ब्राह्मण का काम होता था पढ़ाने लिखाने का, पूजापाठ करवाने का, क्षत्रिय का काम होता था प्रोटेक्ट एंड रूल करने का। वास्तव में समाज में यह दोनों लोग धीरे-धीरे अपनी प्रोमिनेंस को और अपनी डोमिनेंस को दोनों

4:41 को बढ़ा रहे थे। अपने महत्व को भी और अपने दबदबे को भी। लेकिन जो वैश्य और शूद्र थे जिनमें से एक का काम होता था अर्थव्यवस्था को संभालना तो दूसरे का काम होता था सर्विस सेक्टर को संभालना या वास्तव में सेवा क्षेत्र में पूरी निगरानी रखना। इन दोनों की सामाजिक स्थिति धीरे-धीरे नीचे जा रही थी। जब वैदिक काल में पहली बार पुरुष सूक्त के अंदर ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र वर्णों की उत्पत्ति की गई। उस समय पर ऐसा नहीं कहा गया था कि कोई क्षत्रिय है तो वह वर्ण से ऊपर होगा या कोई शूद्र है तो वह वर्ण से नीचे होगा। परंतु जैसे-जैसे समाज आगे बढ़ता गया लगभग 6 700 सालों में यह परिवर्तन हमें देखने को मिला कि वैश्य एवं शूद्र इन दोनों की सामाजिक स्थिति इनकी वास्तव में सोशल

5:29 कंडीशन थोड़ा डिग्रेड होती गई और जो ऊपर के दो हैं इनकी सोशल कंडीशन अपग्रेड होती गई। चूंकि इनकी सोशल कंडीशन अपग्रेड हुई और वैश्य एवं शूद्र की सोशल कंडीशन डिग्रेड हुई तो यहीं से यह वर्ण प्रथा वास्तव में कास्ट सिस्टम यानी कि जाति प्रथा में परिवर्तित हो गई। तो अगर वर्ण प्रथा जाति प्रथा में परिवर्तित हो गई है इसका मतलब राजा का पुत्र ही राजा बनेगा। पुजारी का पुत्र ही पुजारी। शूद्र का पुत्र हमेशा शूद्र होगा और वैश्य का पुत्र हमेशा वैश्य। और अगर ऐसा है तो इस प्रथा को वैश्य एवं शूद्रों ने बहुत ओपनली एक्सेप्ट नहीं किया। इनके पास जैसे ही विकल्प आया उन्होंने विकल्प को चेंज करने की कोशिश

6:14 की। और जो दूसरा विकल्प इन लोगों ने चुना दोस्तों वो दूसरा विकल्प क्या था? दूसरा विकल्प था इन 62 रिलीजंस में से ओनली टू रिलीजंस की ओर इनका झुकाव। दोस्तों ये जो दो रिलीजंस थे इन दो रिलीजंस का नाम आप लोग पढ़ते हैं। एक का नाम है जैनिज्म और दूसरे का नाम है बुद्धिज्म। हम लोग जैन धर्म और बौद्ध धर्म के बारे में अभी चर्चा करेंगे। पर उसके पहले आइए थोड़ा सा महाजनपद काल को समझ लिया जाए जहां से इक्का-दुक्का प्रश्न आपको पूछे जाते हैं। बौद्ध धर्म का एक ग्रंथ है दोस्तों बौद्ध धर्म का एक ग्रंथ है जो कि अंगुत्तर निकाय के नाम

7:00 से जाना जाता है। अंगुत्तर निकाय यह वास्तव में सूतपथक के अंदर लिखा हुआ है जिसकी मैं आगे चलकर के चर्चा करूंगा। बौद्ध धर्म के अलावा जैन धर्म में भी एक ग्रंथ है और जैन धर्म के उस ग्रंथ का नाम है भगवती सूत्र। तो जैन धर्म का ग्रंथ भगवती सूत्र और बौद्ध धर्म का ग्रंथ अंगुत्तर निकाय जो कि सूतपथक के अंदर है। इन दोनों के अंदर एक बहुत प्रोफाउंड बात लिखी हुई है और वो है 16 महाजनपदों की। 16 महाजनपद कहां लिखे हुए हैं? जैन धर्म के भगवती सूत्र और बौद्ध धर्म के अंगुत्तर

7:45 निकाय के अंदर। और वो 16 महाजनपद अगर आप पढ़ना शुरू करते हैं दोस्तों तो 16 महाजनपद आपको कश्मीर से लेकर के बांग्लादेश तक मिलेंगे। पूरा जो आर्यावर्त है उस आर्यावर्त में सिर्फ एक ही साउथ इंडियन महाजनपद हुआ करता था जिसका नाम था असक या उसको अस्मक कह दिया जाता है कई बार। वास्तव में अगर हम वैदिक काल की बात करते हैं तो वैदिक काल के बाद इन 16 महाजनपदों का उदय हुआ और इन 16 महाजनपदों को वास्तव में कहा जाता था शोदस महाजनपद इनका नाम हुआ करता था शोदस महाजनपद 16 महाजनपदाज़ तो आइए इन महाजनपदों के बारे में थोड़ी जानकारी इकट्ठा की जाए और समझना शुरू किया

8:32 जाए कि आखिर कश्मीर फिर अफगानिस्तान से लेकर के बांग्लादेश तक फैले हुए इन महाजनपदों में क्या-क्या जानकारियां हमें मिलती हैं? कौन से महाजनपद की क्या राजधानी हुआ करती थी? कौन से महाजनपद की क्या खासियत हुआ करती थी? इन सब के बारे में हमारा एक डिस्कशन जरूर होना चाहिए। देखिए दोस्तों, सबसे पहले अगर चर्चा की जाए मगध की पहली राजधानी कौन सी थी? यह आप लोगों के लिए क्वेश्चन है। तो, आंसर करें। मगध की पहली राजधानी चंपा है, वैशाली है, पाटलिपुत्र है या राजगृह है? और इसका वास्तव में सही उत्तर हो जाएगा आप सभी को पता है राजगृह। राजगृह इसका सही उत्तर है। और आइए मैं अभी

9:19 आप लोगों को राजगृह के बारे में थोड़ा कुछ बताता हूं। कहानी कहां से शुरू होती है? तो देखिए दोस्तों, वैसे तो मगध पर अगर बात करें हम लोग तो मगध बिहार में था और मगध आज के मॉडर्न डे बिहार में है। तो मगध में सबसे पहले शासन करने वाले राजवंश का नाम क्या है? वास्तव में सबसे पहले शासन करने वाले राजवंश का नाम है हर्यंक राजवंश। तो दोस्तों यहां पर आप लोगों को एक नाम मिलेगा जिसका नाम है हरियंक। हरियंक डायनेस्टी। डायनेस्टी का मतलब होता है राजवंश। यह मोनार्की सिस्टम है। यहां

10:07 पर राजा होगा। अच्छा मजेदार सी बात यह थी। हरियंक राजवंश की स्थापना करने वाले व्यक्ति का नाम था बिंबिसार। और बिंबिसार के पिता का नाम था भटिया। भट्टिया कोई राजा नहीं हुआ करते थे। हां, एक शाखा के प्रमुख जरूर थे और एक शाखा के प्रमुख होने की वजह से या एक क्लान के हेड होने की वजह से बिंबिसार को वो एज मिला। बिंबिसार ने मगध की स्थापना की और मगध में स्थापना करने के साथ सबसे पहली राजधानी बनाया उसने राजगृह को जिसे गिरिव्रज के नाम से भी जाना जाता था। और गिरिव्रज के अलावा राजगृह को ही जाना जाता था राजगीर के नाम से। तो यह तीनों नाम अगर आपको देखने मिले तो इसका मतलब यह राजगृह के ही हैं। और राजधानी किसने बनाई थी? तो बिंबिसार ने

10:54 अपनी राजधानी बनाई। अपनी कैपिटल बनाई राजगृह को। उसके बाद बिंबिसार को उसी के पुत्र अजातशत्रु ने मार दिया। और अजातशत्रु अगला शासक बना। अजातशत्रु के बाद अगला शासक बना उदयन। और दोस्तों यह वह व्यक्ति है जिसने अपनी राजधानी का स्थानांतरण किया। यानी कि उदयन के समय पर जो कैपिटल है वो राजगृह ना होकर के बनी पाटलिपुत्र और आप सभी लोगों को इस बात की पूरी जानकारी है कि पाटलिपुत्र आज का पटना है जो कि बिहार की भी राजधानी है। तो भारत के सबसे पुराने शहरों में से एक काशी है और

11:39 वैसे ही पुराने शहरों में से एक पटना भी है। गंगा नदी के किनारे वाले जितने भी शहर हैं वो अपना एक अलग ही महत्व रखते हैं। तो दोस्तों यहां आप समझ पाएंगे कि इसे क्या कहते हैं पाटलिपुत्र। अब देखिए क्योंकि बिंबिसार की हत्या की अजातशत्रु ने। माना जाता है अजातशत्रु की हत्या उदयन के हाथों हुई तो कई बार इसे कहते हैं पितृहंता वंश। पितृहंता वंश कहने का मतलब जो अपने पिता को मार करके शासक बने। लेकिन मजेदार सी बात यह है दोस्तों कि आखिर इसके बाद क्या हुआ? तो सबसे पहले हर्यंक वंश में एक राजा हुए जिनका नाम है उदयन और उदयन ने अपनी राजधानी बनाई पाटलिपुत्र।

12:26 इसके पहले इनके दादाजी राजा हुआ करते थे जिनका नाम था बिंबिसार। और बिंबिसार ने अपनी राजधानी बनाई थी राजगृह। इसके बाद जो अगले शासक हुए उदयन के बाद थे अनिरुद्ध मुंड और नागदशक। अनिरुद्ध मुंड और नागदशक कोई इतने खास शासक नहीं थे। इसलिए उदयन के बाद उदयन के समय पर ही एक व्यक्ति ने इनके राज्य सेवाओं में सर्विस देनी आरंभ की और वो राज्य सेवाओं में सर्विस देने वाले व्यक्ति का नाम हुआ करता था शिशुनाग। तो उदयन के बाद के जो राजा नागदशक हैं उनको शिशुनाग ने मारा और अपना राजवंश स्थापित कर दिया। तो दोस्तों इतिहास में एक नया राजवंश आ जाता है जिसका नाम है शिशुनाग राजवंश और शिशुनाग राजवंश में से पहले राजा

13:15 पहला राजा शिशुनाग ने राजधानी को चेंज कर दिया। उसने राजधानी सबसे पहले पाटलिपुत्र से चेंज की और पाटलिपुत्र से चेंज करके कर दी राजगृह और उसके बाद राजगृह से भी चेंज की और राजगृह से चेंज करने के बाद कर दी वैशाली। तो सोचिए कि पाटलिपुत्र से एक बार राजधानी राजगृह जाती है और फिर राजगृह से राजधानी हो जाती है वैशाली। ऐसा हुआ है तो शिशुनाग के समय काल में और शिशुनाग के बारे में एक अचीवमेंट ये कही जाती है कि शिशुनाग ने प्रद्योत को खत्म कर दिया था। प्रद्योत राजवंश अवंती पर शासन किया करता था। अवंती मध्य प्रदेश में था। तो दोस्तों ये तो आप समझ गए कि पहला राजा जो शिशुनाग है शिशुनाग राजवंश का उसने पाटलिपुत्र से

14:02 राजगृह राजगृह से वैशाली ट्रांसफर किया। लेकिन इसके बाद शिशुनाग का ही अगला वंशज जिसका नाम है कालशोक जिसके समय पर दूसरी बौद्ध संगीत भी हुई थी। कालशोक को ही कई बार काकवर्ण कहा जाता है। तो आप कालशोक कहें या काकवर्ण कहें। कालाशोक या काकवर्ण के समय पर मगध की राजधानी बनी पाटलिपुत्र और फिर लगभग आने वाले 1000 साल तक यह पाटलिपुत्र ही मगध की राजधानी बनी रही। 1000 साल तो नहीं पर फिर भी 600 सालों तक लगभग पाटलिपुत्र ही राजधानी बना रहा। तो, यह प्रश्न कई बार एग्ज़ाम में पूछा जाता है कि राजगृह को राजधानी बनाने वाला बिंबिसार, पाटलिपुत्र को राजधानी बनाने वाला उदयन, पाटलिपुत्र

14:49 से राजधानी को राजगृह और राजगृह से वैशाली ट्रांसफर करने वाला शिशुनाग और उसके बाद अंत में फिर से पाटलिपुत्र को ही राजधानी बना देने वाले का नाम। तो याद रखें कालशोक या काकवर्ण। यह शिशुनाग का ही वंशज है। शिशुनाग का पुत्र कहा जाता है ये। डन हो गया आप लोगों का यह नॉलेज वाला पॉइंट ऑफ व्यू। अब देखिए वो जो 16 महाजनपद थे उन 16 महाजनपदों की ये लिस्ट है। अभी मैं आपको मैप के माध्यम से दिखाऊंगा। मानचित्र से समझाऊंगा कि कहां पर कहां-कहां पर कौन-कौन से अ महाजनपद शासन कर रहे थे। देखिए दोस्तों एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है जो आप लोग समझेंगे। अवंती साम्राज्य की राजधानी कौन सी हुआ करती थी? और दोस्तों अवंती की दो

15:34 राजधानियां हुआ करती थी। अवंती की राजधानी वैसे तो उज्जैनी थी। यह आप सभी लोगों को पता है क्योंकि अवंती कहां हुआ करता था? तो अवंती हुआ करता था मालवा में। और आप सभी लोग जानते हैं कि मालवा कहां है? तो मालवा है मध्य प्रदेश में। आज का जहां महाकालेश्वर मंदिर है, वह उज्जैन शहर वास्तव में पहले अवंती के आसपास के बीचों-बीच में था। और उज्जैनी के नाम पर ही उज्जैन है। और मजेदार बात बताता हूं दोस्तों आपको। कालांतर में जब चंद्रगुप्त द्वितीय का शासनकाल होता है जिसमें समुद्रगुप्त के बाद उनके पुत्र चंद्रगुप्त द्वितीय शासन करते हैं गुप्त वंश के तो उस समय पर एक राजा के अंडर रहने

16:19 वाले एक कवि थे जिनका नाम था कालिदास। कालिदास की रचनाओं के बारे में हम चर्चा करते हैं। अभिज्ञान शाकुंतलम मेघदूतम मालविकाग्निमित्रम रघुवंश महाकाव्यम ऋतु संहारम कुमारसंभवम विक्रमोरर्वशीयम इतनी सारी सात रचनाएं उन्होंने लिखी हैं। लेकिन इन सात रचनाओं में से कालिदास जब मेघदूतम लिखते हैं तो उसमें उज्जैन का जिक्र करते हैं और बताते हैं कि एक यक्ष जो बैठा हुआ है सरगुजा के पर्वतों पर वह नेपाल में रह रही अपनी प्रियसी को प्रेम पत्र बादलों के माध्यम से लिखकर भेजता है। और तब क्या कभी किसी ने सोचा होगा कि आने वाले समय में वीडियो मैसेजेस मल्टीमीडिया एमएमएस यानी मल्टीमीडिया मैसेजेस के सर्विज के जरिए कभी भेजे जाएंगे।

17:06 दोस्तों तब सोचा भी नहीं गया था। आज वही चीज संभव है। हमारे जो पूर्वज थे वह वास्तव में अगर बात की जाए सोच करके उसे इस धरातल पर लाने की तो इसमें बहुत आगे थे। चलिए तो दोस्तों निम्नलिखित में से कौन अवंती साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी? तो अवंती साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी उज्जैनी और देखिए न सिर्फ कि इसकी एक राजधानी थी उज्जैनी बल्कि इसके साथ-साथ एक और राजधानी हुआ करती थी जिसका नाम था माहिष्मती। अब आपको यह बताना है कि उज्जैनी उत्तरी राजधानी थी माहिष्मती दक्षिणी या महिष्मती उत्तरी राजधानी थी उज्जैनी दक्षिणी। यह आपके लिए प्रश्न है। आगे बढ़ते हैं हम

17:54 लोग। तो यहां पर अवंती और उज्जैन के बारे में कौन से ग्रंथ में लिखा हुआ आपको मिलता है? तो याद रखिएगा उज्जैन के बारे में जो वर्णन है वो मिलता है मेघदूतम में। और मेघदूतम को किसने लिखा है? महाकवि कालिदास ने। कालिदास को क्या कहते हैं? दोस्तों याद रखिएगा कालिदास को कहते हैं शेक्सपियर ऑफ इंडिया। इन्हें कहा जाता है शेक्सपियर ऑफ इंडिया। तो माहिष्मती और उज्जैनी ये दोनों आपको याद रखना पड़ेगा। ठीक है? इसमें से मैं आपको बता देता हूं। उज्जैनी जो थी वो नॉर्थ की राजधानी थी। माहिष्मती जो थी वो साउथ वाले अवंती की राजधानी थी। सबसे बड़ा

18:42 महाजनपद एरिया वाइज अगर कोई था तो याद रखिएगा सबसे बड़ा क्षेत्रफल के रूप में महाजनपद सबसे बड़ा क्षेत्रफल अवंती महाजनपद का ही हुआ करता था। ठीक है? अवंती महाजनपद का ही हुआ करता था। ग्रंथ को इंग्लिश में कहते हैं स्क्रिप्चर। ग्रंथ को स्क्रिप्चर कहते हैं, लिटरेचर कहते हैं। आगे बढ़े तो एक और प्रश्न आप सभी के सामने छोड़ता हूं। व्हिच ऑफ द फॉलोइंग महाजनपदाज वाज़ लोकेटेड इन साउथ इंडिया? अकेला महाजनपद जो हमारे उत्तर भारत में आर्यावर्त वाले हिस्से में ना हो करके

19:29 दक्षिण पथ के हिस्से में था। कंबोज, गांधार, श्रुसेन या असक। और इसका सही आंसर हो जाएगा असक। असक को कई बार अस्मक के नाम से भी जाना जाता है। और अस्मक का अर्थ अगर आप देखोगे तो यह साउथ इंडिया की तरफ था। आप पाएंगे एक प्रश्न पूछा जाता है बहुत ही बढ़िया सा एंशिएंट इंडिया से कि बताइए यह गोदावरी और कृष्णा दोनों नदियों के बीच में कौन सा महाजनपद हुआ करता था? तो गोदावरी और कृष्णा के बीच में एक महाजनपद था जिसका नाम था असक और असक को ही अस्मक नाम से भी जाना जाता है। इसकी राजधानी क्या हुआ करती थी? इसकी राजधानी थी पोइतान। इसकी राजधानी पोइतान हुआ करती थी। दोस्तों कंबोज कंबोज के बाद गांधार कुरु पांचाल

20:19 कौशाल मल वृजजी काशी अंग मगध वत्स चेतीय अवंती मत्स्य श्रुसेन आप पाएंगे ये 16 महाजनपद थे और इन 16 महाजनपदों में महराजा हुआ करते थे। तो अब आप सभी लोगों को यह पूरी तरीके से क्लियर हो गया है कि इन महाजनपदों में क्या खास था। अब दोस्तों अगर शुरुआती महाजनपद काल की बात की जाए तो महाजनपद काल में हर्यंक वंश के बारे में हम लोगों ने चर्चा की। हरियंक वंश में पहला ही राजा जिसका नाम था बिंबिसार। बिंबिसार ने अपने शक्ति का प्रदर्शन किया

21:07 और यह जो अंग प्रदेश था बांग्लादेश और बंगाल के पूर्वी हिस्से में था इस अंग प्रदेश को मगध का हिस्सा बना लिया। तो बिंबिसार ने अंग प्रदेश जीता और यह नाम आपको मिलता है कर्ण के बारे में भी। दोस्तों जब हम महाभारत को पढ़ते हैं तो महाभारत काल में ऐसा कहा जाता है कि अंग प्रदेश का प्रभारी अगर किसी को नियुक्त किया गया था। अंग प्रदेश का राज्य किसी को दिया गया था तो वह था कर्ण और महाभारत में आपने सुना होगा दुर्योधन ने अपनी मित्रता के चलते यह अंग दे दिया था कर्ण को इसीलिए अंगराज कर्ण कहे जाते हैं कर्ण आप सभी लोगों ने सुना होगा उन्हें अंगराज कहा जाता है तो अंगराज इसीलिए क्योंकि वह अंग के शासक बने थे। आगे बढ़ते हैं तो अंग

21:55 प्रदेश को बिंबिसार ने जीता। बिंबिसार के इसे जीतने के बाद शिशुनाग की जब हम लोग बात करते हैं तो आप पाएंगे कि शिशुनाग ने जीता किसे? तो शिशुनाग ने जीता यहां अवंती को। और इस बीच में एक और व्यक्ति है जिसका नाम है बीचों-बीच अजात शत्रु। तो अजातशत्रु ने किसे जीता? अजातशत्रु ने पूरा वृज जीता। वृजजी या वैशाली जो हुआ करता था उसे जीता। आगे बढ़े तो एक और प्रश्न दोस्तों हम लोग करेंगे। प्राचीन भारतीय महाजनपदों के बारे में कौन सा कथन सही है? इसके बारे में बताएं। सभी महाजनपद अल्पतंत्री थे।

22:41 जहां शक्ति का प्रयोग लोगों के एक समूह द्वारा किया जाता था। सभी महाजनपद पूर्वी भारत में अवस्थित थे। महाजनपद कोई सेना नहीं रखते थे। बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में 16 महाजनपदों को सूचीबद्ध किया गया है। इनमें से कौन सा करेक्ट है? तो करेक्ट तो इसमें डी वाला ही है। बुद्धिस्ट में जैसा कि मैंने कहा अंगुत्तर निकाय अंगुत्तर निकाय और जैन धर्म में भगवती सूत्र इन दोनों के अंदर ही 16 महाजनपदों का उल्लेख मिलता है। तो 16 महाजनपदों का नाम आप लोगों ने देखा ही है। इसका उत्तर डी हो जाएगा। अंग मगध काशी वत्स कौशल सुसेन पांचाल कुरु मत्स्य चेदी अवंती गांधार

23:28 कंबोज अस्मक वजी और मल मल की राजधानी हुआ करती थी कुशीनगर कुशीनगर देवरिया और यूपी के पास वैशाली थी राजधानी वृज की जो कि वैशाली बिहार में ही है। प्रतिष्ठान या पथान या गोदावरी के नदी के तट पर महाराष्ट्र में अस्मक की राजधानी कंबोज की राजधानी पूछ राजौरी एवं कश्मीर में गांधार की राजधानी तक्षशिला रावलपिंडी में अवंती की राजधानी उज्जैन और माहिष्मती मध्य प्रदेश एवं मालवा के क्षेत्र में चेद की राजधानी सोथिवती सोथिवती बांदा में है। बांदा बुंदेलखंड में है जहां केन नदी जाकर यमुना से मिलती है। बुंदेलखंड मत्स्य विराट नगर जयपुर पांचाल की अहछत्र और कंपिल्य पश्चिमी उत्तर प्रदेश श्रुसेना

24:14 मथुरा मथुरा में ही कौशाल श्रावस्ती ईस्टर्न उत्तर प्रदेश वत्स की कौशांबी इलाहाबाद के पास जो कि अब प्रयागराज के नाम से जाना जाता है। काशी की राजधानी भी काशी हुआ करती थी और इसका नाम था बनारस। दोस्तों एक बहुत अच्छी सी बात है आप लोग पाएंगे इतिहास में वाराणसी। और ऐसा माना जाता है कि यह वाराणसी जो नाम है वह वास्तव में दो नदियों के नाम से लिया गया है जिसका एक है वरुणा और दूसरा है अस और वरुणा और असी की वजह से इस शहर को वाराणसी के नाम से जाना गया जिसे हम लोग काशी कहते हैं। एक और खास बात जो काशी के बारे में आप सभी को बताना चाहूंगा कि काशी में लोग मरकर स्वर्ग जाते हैं। ऐसा कहते हैं कि जब आप जाप करते हैं

25:01 महामृत्युंजय मंत्र का और उस महामृत्युंजय मंत्र में महामृत्युंजय मंत्र को पढ़ते हुए वहां एक शब्द आता है सुगंधिम पुष्टिवर्धनम तो उसमें जो सुगंधि है उस सुगंधि का मतलब किसी महक से नहीं है। उस सुगंधी का मतलब है जब आप मरने वाले होंगे, उसके कुछ क्षण पहले आपके जीवन के सभी कर्म जो आपने खराब किए है, आपकी आंखों के सामने दौड़ जाएंगे। और उन कर्मों की जो महक है, उन कर्मों की जो महक या गंध दोनों में से कुछ भी हो सकता है। वो जब आपकी आंखों के सामने जाती है तो उस समय सबसे ज्यादा कठिन वक्त हो जाता है जीवन का। मरने के तुरंत पहले-पहले की बात है। इसलिए लोग काशी में आकर मरते थे। कहते थे कि अगर काशी में आकर मरो तो जीवन के पाप और पुण्य बराबर ही हो

25:47 जाते हैं और जीवन के पाप पुण्य बराबर हो जाते हैं तो काशी में मरने पर सीधे स्वर्ग मिलता है। मैं हमेशा कहता हूं कबीर दास जी जिनके बारे में आप लोग पढ़ते हैं। गुरु गोविंद दो खड़े काके लागू पाएं। बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताएं। यह दोहे जो आप कबीर दास जी के पढ़ते हैं। इन दोहो में से एक बहुत इंपॉर्टेंट दोहा है कबीर दास जी का। कबीर दास जी ने अपना पूरा जीवन वाराणसी और काशी में ही गुजारा था। और जब उनके मृत्यु की बारी आई तो उन्होंने कहा कि मैंने राम भक्ति की है। मैं निर्गुण उपासक रहा हूं। मैंने भले ही मूर्ति पूजा को कभी भी अपनाया ना हो लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मेरी भक्ति में कोई कमी है। और मैं भक्त होकर ऐसी जगह मर के स्वर्ग गया जहां मर के हर कोई स्वर्ग चला जाता हो। तो फिर मेरे राम भक्ति का मतलब ही क्या? तो

26:34 वो कहते हैं कि मैं काशी में नहीं मरूंगा। मैं ऐसी जगह जाकर मरूंगा जहां लोग मरने के बाद सीधा नर्क जाते हो और काशी के पास ही एक ऐसी जगह है जिसका नाम है मगहर। मानते हैं कि मगहर में मृत्यु हो तो मगहर में मृत्यु होने के बाद सीधे व्यक्ति नर्क को जाता है। और कबीर दास जी तब कहते हैं क्या काशी क्या ऊसर मघर राम हृदय भय मेरा। जो काशी तन तजे कबीरा राम कौन निहोरा अगर मैं काशी में रहकर के मर गया और स्वर्ग चला गया तो फिर मेरे राम भक्ति का मतलब क्या? तो दोस्तों वाराणसी आप सभी लोग समझ गए हैं। वरुणा एवं असी यह दो नदियों के नाम पर लिया गया है। बहरहाल आगे बढ़े तो आगे बढ़कर के हम इतिहास में और भी चर्चा करते हैं। प्राचीन भारत में

27:20 कितने महाजनपद थे? आप सभी जानते हैं 16। इनका जिक्र कहां है? वह भी मैंने आपको बता दिया। अवंती के साउथ की राजधानी कहां हुआ करती थी? तो दोस्तों अभी हम लोगों ने चर्चा की महिष्मती अवंती के साउथ की और उज्जैनी अवंती के नॉर्थ की। तो यह याद रखेंगे नॉर्थ और साउथ। आगे बढ़े तो फर्स्ट रूलर ऑफ मगध महाजनपद इन सिक्स्थ सेंचुरी बीसी यानी कि छठी शताब्दी ईसावा पूर्व में मगध महाजनपद के पहले शासक कौन थे? तो दोस्तों वह थे बिंबिसार। हम सभी ने चर्चा की। कौन से बुद्धिस्ट स्क्रिप्चर में 16 महाजनपदों के बारे में लिखा हुआ है? तो मैंने अभी-अभी चर्चा की अंगुत्तर निकाय के बारे में। अंगुत्तर निकाय के अलावा अवंती महाजनपद का वर्तमान आधुनिक स्थान क्या है?

28:07 तो आप सभी जानते हैं कि यह कहीं और नहीं यह है मध्य प्रदेश में और मध्य प्रदेश के किस क्षेत्र में? तो याद रखिए यह है मालवा क्षेत्र में। आगे बढ़ते हैं हम। तो पाते हैं कि दोस्तों व्हिच ऑफ द फॉलोइंग लिटरेचर गिव्स अ डिस्क्रिप्शन ऑफ 16 महाजनपदाज़? निम्नलिखित में से कौन सा साहित्य 16 महाजनपदों का वर्णन देता है? भगवती सूत्र, संयुक्त निकाय, धवल टीका या शांतिनाथ चरित? तो इसका सही उत्तर हो जाएगा भगवती सूत्र। लेकिन याद रखें भगवती सूत्र कौन से धर्म का ग्रंथ है? जैन धर्म का। आगे बढ़ते हैं तो एक और प्रश्न हमारे पास आता है। हु डिफिटेड हिज मैटरनल अंकल प्रसंनजीत? द किंग ऑफ कौशल? देखिए प्रसनजीत को किसने हराया जो कि कौशल

28:56 के राजा हुआ करते थे और कौशल के राजा को यानी कि अपने मामा को ही हराया मामा को ही पराजित किया तो यह कोई और नहीं याद रखें अजातशत्रु नाम का एक व्यक्ति हुआ करता था जिसने आगे बढ़कर के कौशल और वृज जी पर कब्जा कर लिया था। एक और प्रश्न आता है कि बताइए मोस्ट ऑफ द महाजनपदास वर फर्टिफाइड बिकॉज़ महाजनपद सबसे दृढ़ थे या उनमें किले बना करके उनकी दीवारों को बहुत अच्छे से सुदृढ़ बनाया गया था और इसके पीछे वजह यह थी कि क्षेत्र में लकड़ी ईंट और पत्थर की उपलब्धता के कारण अपने धन और शक्ति को परिलक्षित करते थे। शासक आक्रमणों से डर गए थे। वे अपना संरक्षण सुनिश्चित करना चाहते थे या वह अमीर योद्धा परंपरा के प्रतीक थे। ऑफ अवेलेबिलिटी ऑफ वुड ब्रिक

29:42 स्टोंस इन द एरिया दे रिफ्लेक्टेड देयर वेल्थ एंड पावर द पीपल वर सैक्रड स्केर्ड ऑफ अटैक एंड वांटेड टू एनश्योर दैट दे वर प्रोटेक्टेड एंड दे वर सिंबल्स ऑफ द रिच वॉरियर ट्रेडिशन और इसका सही उत्तर दोस्तों हो जाएगा एक मिनट कहां गया हां लोगों के ऊपर आक्रमण होते थे इसलिए लोग सुरक्षित नहीं थे। आगे चलें तो एक और प्रश्न है हमारे पास इनमें से कौन सा कौशल महाजनपद की राजधानी हुआ करती थी? तो दोस्तों याद रखिएगा कौशल महाजनपद की राजधानी हुआ करती थी श्रावस्ती। चंपा राजधानी कहां की थी? तो चंपा थी अंग की राजधानी। मथुरा राजधानी कहां की थी? तो याद रखिएगा कि श्रुसेन श्रुसेन की राजधानी मथुरा और उज्जैन किसकी राजधानी हुआ करती थी? तो यह भी याद रखिए अवंती की राजधानी हुआ करती थी उज्जैन। आगे बढ़ते हैं। तो

30:29 इनमें से कौन सा स्टेटमेंट महाजनपदों के बारे में सही है? यह प्रश्न। नॉट ऑल महाजनपदाज़ हैड अ कैपिटल सिटी। ऑल दी राजाज़ ऑफ अ महाजनपदा मेट टुगेदर इन असेंबलीज़ कॉल्ड संघ टू डिसाइड अपॉन इश्यूज़। द आर्मी इन महाजनपदा वाज़ मेंटेंड लार्जली फ्रॉम द गिफ्ट्स मेड बाय द लोकल्स। ईच महाजनपदा वाज़ रूल्ड नॉट बाय वन बट थाउजेंड्स ऑफ रूलर टुगेदर ईच नोन एज राजा। तो इनमें से कौन सा सही सेंटेंस है? और दोस्तों इनमें से जो सही सेंटेंस है वो याद रखिएगा कि सही सेंटेंस हो जाएगा डी। रुकिएगा कहां चला गया? यह ऑप्शन है ईच महाजनपद वाज़ रूल्ड नॉट बाय वन बट थाउजेंड्स ऑफ रूलर्स टुगेदर ईच नोन बाय

31:17 राजा। तो महाजनपद में अलग-अलग राजा हुआ करते थे और इन अलग-अलग राजाओं ने अपने शासन को मेंटेन रखा। महाजनपदों के बारे में कौन सा सही नहीं है? दे हैव कैपिटल सिटी। दे आर 45 टाउंस, दे आर 20 इन नंबर, दे आर मेंशंड इन एंशिएंट लिटरेचर एंड स्क्रिप्चर्स। और इसका सही आंसर क्या हो जाएगा दोस्तों? इसका सही आंसर हो जाएगा दे आर 20 इन नंबर। अब आप सभी से मेरा प्रश्न यह है कि आप बताइए कौन सा महाजनपद था जो रिपब्लिक था? रिपब्लिक का मतलब कौन सा महाजनपद गणतंत्र था? और दूसरा कौन सा महाजनपद गणतंत्र था? सबसे पहला तो

32:02 यही है प्रश्न। आप सभी लोगों को बताना है इसका उत्तर क्या होगा। आगे बढ़ते हैं मित्रों तो आगे बढ़कर के हम लोग पहुंचेंगे बौद्ध धर्म और जैन धर्म की एक विशेष चर्चा पर। देखिए जब-जब हम बौद्ध धर्म की चर्चा करते हैं। जैन धर्म की चर्चा करते हैं। जैन धर्म की उत्पत्ति कुछ इतिहासकार पहले मानते हैं। कुछ इतिहासकार बाद में मानते हैं। परंतु अगर हम थोड़ा सा शास्त्रों से जुड़ना शुरू करें। थोड़ा सा शास्त्रों से जानकारी लेना शुरू करें तो हम ये पाते हैं कि जैन धर्म वास्तव में अगर फैला तो जैन धर्म के फैलने की वजह हुआ करते थे तीर्थंकर। तो आइए सबसे पहले जैन धर्म को पढ़ते हैं। जैन जो शब्द है यह जैन शब्द किससे निकला है? तो दोस्तों याद रखिएगा

32:50 जैन शब्द निकला है किसी और से नहीं जैन शब्द निकला है जिन से। और जिन का मतलब क्या होता है? तो जिन का अर्थ होता है कॉनकरर ऑफ सेंसेस। कॉनकरर ऑफ सेंसेस। इसे कहेंगे ऐसा व्यक्ति जिसने इंद्रियों को जीत लिया हो। इंद्रियों का विजेता कहलाएगा जिन या जैन। अब क्या आपके अंदर इतनी क्षमता है कि आप अपने अंदर वास्तव में सेंसेस को काबू कर सकें? आप अपने अंदर अपने अंदर की इच्छाओं को पूरी तरीके से मारकर अपने कर्मों की बात सुने ना कि अपने मन की। ऐसा बहुत कम

33:37 होता है दोस्तों और बहुत कम इसलिए भी क्योंकि कोई भी व्यक्ति जैन नहीं बन सकता। आइए मैं आपको एक कहानी बताता हूं। उस कहानी के हिसाब से हम इसे समझना शुरू करेंगे। दोस्तों, ऐसा मानते हैं कि यह श्रवण दर्शन से निकला हुआ धर्म है। अब श्रवण दर्शन वास्तव में एक बार प्रश्न पूछा गया है कि वि फिलॉसफी दैट जैनिज्म केटर्स? तो इसको कहते हैं श्रमण। और श्रमण फिलॉसफी के अंदर एक सिद्धांत होता है दोस्तों। और उस सिद्धांत को हम लोग कहते हैं देयर इज अ प्रिंसिपल कॉल्ड स्यादवाद। जैन धर्म स्यादवाद पर आधारित है।

34:25 स्यादवाद पर चर्चा करते हैं। स्यादवाद का मतलब होता है कि हम यह नहीं मान के चल सकते कि किसी में आत्मा नहीं होती। सजीवों में आत्मा होती है लेकिन सजीवों के साथ-साथ निर्जीवों में भी आत्मा पाई जाती है। ऐसा जैन धर्म का मानना है। यानी जैन धर्म वास्तव में एक शब्द जिस पर सबसे ज्यादा फोकस करता है, वह आप पाएंगे उसे कहते हैं परस्परोपग्रहो जीवा नाम। परस्परोपग्रहों परस्पर रोपग्रहों परस्परोपग्रहों जीवा नाम हो सकता है आप में से बहुत सारे लोगों के लिए यह शब्द नया हो लेकिन परोस्परोग्रहों

35:11 जीवा नाम का मतलब आत्मा एक दूसरे को आत्मा एक दूसरे को सेवा देती है। इसका अर्थ है सोल्स रेंडर सर्विस टू वन अनदर सोल्स रेंडर सर्विस टू वन अनदर। परस्पर परस्परोपग्रहों जीवा नाम और फिर परस्परोपग्रहो जी नाम पर पूरी तरह से बेस्ड यह जैन धर्म वास्तव में किसके द्वारा यहां पर लाया गया तो पता है यह कैसे लाया गया यह लाया गया पृथ्वी पर

35:56 तीर्थंकरों द्वारा और मैं आप सभी से यह निवेदन करके कहना चाहता हूं कि जो तीर्थंकर होते हैं हमारे वह तीर्थंकर का अर्थ होता है गुरु गुरु का मतलब जो पाथ दिखाए जो हमारा मार्गदर्शन करें पथ प्रदर्शक हैं ये मार्गदर्शक हैं ये और दोस्तों जब हम बात कर रहे हैं पथ प्रदर्शन करने वाले या मार्गदर्शक की तो हम इन्हें भगवान नहीं मानेंगे। इसलिए तीर्थंकरों के नाम के आगे हमेशा एक शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। इन्हें कहते हैं स्वामी।

36:42 तो अब जैन धर्म जब शुरुआत हुई तो जैन धर्म की शुरुआत ऐसा कहते हैं कि जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ने की और जैन धर्म के पहले तीर्थंकर हुआ करते थे। ऋषभदेव जी जिन्हें आदिनाथ जी के नाम से भी जाना जाता है। तो ऋषभदेव स्वामी या आदिनाथ स्वामी या ऋषभदेव जी आदिनाथ जी के बारे में थोड़ा जानकारियां हम लोग इकट्ठा करेंगे। पहले तीर्थंकर हुए ऋषभदेव जी या आदिनाथ जी ऋषभदेव जी या आदिनाथ जी यह पहले थे और ऐसा करते हुए दोस्तों टोटल 24 तीर्थंकर हुए हैं जैन धर्म में और 24वें तीर्थंकर जो हुआ करते थे उनका नाम था वर्धमान महावीर।

37:33 स्वामी। तो ऋषभदेव जी से लेकर के वर्धमान महावीर स्वामी तक यह जो पूरा डिस्कशन है इस डिस्कशन पर हम लोग हम काफी समय गुजारेंगे। हम जानेंगे इनके बारे में कितना है ना कितना हमारे पास जानकारी हो सकती है कितना हम लोग इनके बारे में समझ सकते हैं जैसे ऋषभदेव जी का जिक्र ऋग्वेद में भी है ऐसा कहते हैं कि ऋषभदेव स्वामी और अरिष्ट नेमी स्वामी इन दोनों को ऋग्वेद के अंदर भी मेंशन किया गया है और बहुत सारे तीर्थंकर ऐसे हैं जो हमारे पुराणों में है जैसे भागवत पुराण में वायु पुराण में इनकी चर्चा मिलती है। वैदिक धर्म की अगर बात करें तो वैदिक धर्म में जितने भी लिटरेचर हैं लिटरेचर का मतलब साहित्य। वह साहित्य दो हिस्सों में बटे हुए हैं। और मैं आपको

38:20 बड़ा बढ़िया सा एक एग्जांपल देकर के बताता हूं दोस्तों। वैदिक धर्म की जबजब हम लोग चर्चा करेंगे वैदिक धर्म में जितने भी साहित्य होंगे उन साहित्यों को या जितने भी ग्रंथ होंगे उन ग्रंथों को दो हिस्सों में बांटा जाएगा। स्क्रिप्चर जब दो हिस्सों में बटेंगे तो एक होंगे श्रुति। श्रुति का मतलब यह है कि जिन्हें सुनकर के आगे बढ़ाया गया है। लिसन एंड फॉललोड। लिसेंड एंड फॉललोड। अच्छा दूसरे तरह के जो स्क्रिप्चर हैं उन्हें कहते हैं स्मृति। स्मृति का मतलब होता है ऐसे जो याद कर करके लिखे गए

39:06 हैं। इसका मतलब रिमेंबर्ड एंड रिटेन। मैं एग्जांपल देता हूं। ऐसे आप समझ पाएंगे कि श्रुति साहित्यों में आमतौर पर आते हैं वेद और वेदों के साथ-साथ उपनिषद। वेद और उपनिषद ऐसे ग्रंथ हैं जिनको सुनकर के आगे बढ़ाया गया है। वेद और उपनिषदों में आप आमतौर पर भगवान के महिमा मंडन को नहीं सुनते। आप यहां कार्मिक या जो कर्म का सिद्धांत है उसको ज्यादा सुनते हैं। ऐसे ही स्मृति साहित्यों की जब बात की जाए तो यहां पुराण, महाभारत, रामायण,

39:52 इन सभी ग्रंथों का हम लोग काफी अध्ययन करते हैं। तो स्मृति में आपको भगवान मिलेंगे, स्मृति में आपको भगवान की कहानियां मिलेंगी। लेकिन अगर बहुत टेक्निकल रूप से समझा जाए और आप लोग इसको समझ सकें, तो बस 2 मिनट में मैं अपनी बात कहना चाहूंगा कि जो जो श्रुति में लिखा हुआ है श्रुति का ही एप्लीकेशन है स्मृति। जैसे मैं एक बहुत छोटी सी बात कहता हूं। कहता हूं आपको कर्म के बारे में। जैन धर्म कहता है सही कर्म कीजिए। जैसे झूठ मत बोलिए। झूठ बोलने का मतलब आपने कर्म गलत कर दिया और जब आप कर्म गलत करते हैं तो आपकी आत्मा को कभी मोक्ष नहीं मिल सकता।

40:39 हिंदू धर्म कर्म के ऊपर तो फोकस करता ही है। कर्म के साथ-साथ यह बात भी कहता है कि आप जो कर्म करते हैं, उस बात से बहुत ज्यादा अंतर नहीं आएगा। आपके कर्मों का रिजल्ट कभी भी नेगेटिव नहीं आना चाहिए। आपके कर्मों का रिजल्ट हमेशा पॉजिटिव ही आना चाहिए। समझने की कोशिश कीजिए। दोस्तों, पुराणों में और महाभारतों में हम कुछ कहानियां पढ़ते हैं। मैं आपको एक छोटी सी कहानी सुनाऊंगा। भगवान शिव आदि हैं, अनंत हैं और भगवान शिव जब जबजब तपस्या में जाते थे तो कई बार तपस्या में लीन होने के बाद उन्हें समय का पता ही नहीं चलता था। समय का पता ना चलने का अर्थ यह है 15 साल बीत जाना, 20 साल बीत जाना या कई बार सहस्त्र वर्षों बीत जाने तक वो गुफा के

41:25 अंदर तपस्या ही करते रहते थे। अपने आप में स्वयं में लीन हो जाते थे। मां पार्वती को एक बार शिव जी को बुलाना था और मां पार्वती ने एक काम सौंपा कामदेव और रति को। कामदेव जी अपने स्टाइल के हिसाब से पहुंचे और उन्होंने गुफा के अंदर कुछ नृत्यिकाओं को लेकर के फूल माला सजा करके और भगवान शिव को तपस्या से उठाने की कोशिश की। कामदेव जी के इस कृत से भगवान शिव क्रोधित हुए और क्रोधित होने के बाद उन्होंने अपनी यह दोनों आंखें ना ओपन करते हुए तीसरी वाली आंख ओपन कर दी और तीसरी आंख ओपन होने का मतलब यह है कि सब कुछ प्रलय में डूब जाएगा। जैसे ही भगवान शिव की तीसरी आंख खुली सब कुछ जलकर भस्म हो गया। मां पार्वती और रति जो गुफा के बाहर खड़ी होकर के भगवान शंकर के बाहर आने की

42:11 प्रतीक्षा कर रही थी उन दोनों को सिर्फ भगवान शंकर ही आते दिखे बाकी और कोई नहीं। तब रति मां पार्वती को श्राप देती हैं और उन्होंने कहा कि जैसे मेरी कोख से कोई संतान नहीं जन्मी वैसे ही आपकी कोख से भी कोई संतान नहीं जन्मेगी। आप सोचें कि इस ब्रह्मांड की या इस ब्रह्मांड के अलावा जितने ब्रह्मांड होंगे उन ब्रह्मांडों में सबसे ज्यादा शक्तिशाली महिला जिसके नौ रूप हैं फ्रॉम द मोस्ट हंबल मां पार्वती टू द मोस्ट लीथल मां काली उनको एक नॉर्मल लेडी श्राप दे रही है और उनको यह श्राप लग भी गया। मां पार्वती को श्राप लगा। कार्तिकेय जी तेज से उत्पन्न हुए हैं। गणेश जी मैल से उत्पन्न हुए हैं। और मां तुलसी वो कहां

42:57 से उत्पन्न हुई दोस्तों? वृक्ष से। लेकिन कोई भी मां पार्वती की कोख से उत्पन्न नहीं हुआ। कर्म कर्म के प्रभाव से भगवान तक नहीं बच पाए। इंसान क्या चीज है? इस बात पर फोकस करता है वास्तव में यह श्रुति साहित्य जो कि स्मृति साहित्यों पर बात करता है। यह बहुत ही गूढ़ बात है वैसे समझी जाए तो। लेकिन बहुत ही आसान शब्दों में मैंने आपको समझाने की कोशिश की है। लेकिन इसी कर्म के सिद्धांत पर जब हमारा जैन धर्म चलता है तो जैन धर्म हमें सीधे-सीधे कहता है कि नहीं सिर्फ एक ही कार्य है आपके पास और एक ही कार्य क्या? वो यह कि आपको सही काम करने हैं और सही काम करने के बाद ही आपको मोक्ष

43:46 मिलेगा क्योंकि वास्तव में करना क्या है? करना है कि आपको मोक्ष मिलना चाहिए। ठीक है? तो देखो दोस्तों, यहां तक तो हम लोगों ने समझा। अब इन्हीं समझने वाली चीजों में हम लोग थोड़ा जैन धर्म के साथ-साथ बौद्ध धर्म की भी चर्चा कर लेते हैं। और दोस्तों बौद्ध धर्म के साथ-साथ हम लोग ये समझेंगे कि क्या प्रश्न आपकी परीक्षाओं में पूछे गए। ये बातें सिर्फ और सिर्फ आपके इंटरेस्ट लेने के लिए और अब आइए बौद्ध धर्म की बात करते हैं। थोड़ा सा बुद्धिज्म की। देखिए दोस्तों बौद्ध धर्म के बारे में ऐसा तो नहीं कहा जाता कि कोई तीर्थंकर थे। बुद्धिज्म या जो बौद्ध धर्म है यह वास्तव में एक ही व्यक्ति द्वारा शुरू किया गया और बौद्ध धर्म को शुरू करने वाले व्यक्ति का नाम है

44:32 महात्मा बुद्ध। वास्तव में महात्मा बुद्ध को अगर कहा जाए महात्मा बुद्ध को अगर कहा जाए तो महात्मा बुद्ध को दो-तीन टाइटल मिले हुए हैं। सबसे पहली बात इन्हें कहा जाता है लाइट ऑफ एशिया। खूब पूछा हुआ प्रश्न है यह कि एशिया का प्रकाश किसे कहते हैं? तो एशिया का प्रकाश कहा जाता है महात्मा बुद्ध को। दूसरी बात इन्हें कहा जाता है शाक्य मुनि। इन्हें शाक्य मुनि से भी संदर्भित किया जाता है। शाक्य मुनि कहने का अर्थ यह है कि वास्तव में इनके पिताजी शाक्य गण के मुखिया हुआ करते थे। शाक्य गण के राजा हुआ

45:17 करते थे। तो जैसे एक कोई कबीला है और वो शाक्य कबीला है तो उस शाक्य कबीले के प्रमुख थे इनके पिताजी क्षत्रिय थे ये और इसलिए इन्हें शाक्य मुनि कहा जाता है। फिलहाल हम आगे बढ़कर के थोड़ा सा गौतम बुद्ध के जीवन परिचय पर एक डिस्कशन करें। अगर गौतम बुद्ध के जन्म की बात की जाए तो जन्म इनका हुआ था 563 ईसवी पूर्व में और इनका जन्म जो हुआ था वह हुआ था कपिलवस्तु। एक जगह है कपिलवस्तु। यह एक जगह है लुंबिनी में और लुंबिनी इस समय पर नेपाल में है दोस्तों। वहीं अगर इनके महापरिनिर्वाण की बात की जाए इनके महापरिनिर्वाण की बात की जाए तो इनका

46:04 महापरिनिर्वाण हुआ था। महापरिनिर्वाण का मतलब होता है इस दुनिया से चले जाना। तो देखो दोस्तों महापरिनिर्वाण इनका हुआ 483 ईसवी पूर्व में और यह महापरिनिर्वाण हुआ था कुशीनगर नाम की एक जगह पर और कुशीनगर कहां है? कुशीनगर उत्तर प्रदेश में है। ऐसा कहते हैं इन्होंने सुक माधव खा लिया था। सुख माधव खाया मतलब सुख माधव कहते हैं कि सूअर का मांस खा लिया था इन्होंने गलती से और उसी वजह से सूअर का मांस खाने की वजह से ग्लानी में इनकी इस दुनिया से विदा हो गई। देखो दोस्तों आगे चलकर के हम इनके बारे में कुछ और बेसिक फैक्ट जाने। इनके पिता का नाम क्या

46:50 था? तो इनके पिता का नाम हुआ करता था शुद्धोधन। इनके पिता का नाम था शुद्धोधन। इनकी जो मां जिन्होंने इनको जन्म दिया उनका नाम हुआ करता था महामाया और इनकी जो धाई मां थी जिन्होंने इनका पालन पोषण किया कहा जाता है कि वो इनकी मौसी भी थी उनका नाम था प्रजापति गौतमी प्रजापति गौतमी के बारे में एक बात कही जाती है। पहली महिला पहली महिला जिन्होंने जिन्होंने संघ जॉइ किया। अभी मैं इस पर आऊंगा कि संघ

47:39 क्या है? बुद्धम शरणम गच्छामि संघम शरणम गच्छामि है ना धम्मम शरणम गच्छामि ऐसी बात कही जाती है तो देखिए दोस्तों इनकी जो मां थी महामाया जी ऐसा कहा जाता है कि इनके जन्म के कुछ ही दिनों बाद चल बसी और चकि इनके जन्म के कुछ ही दिनों बाद चल बसी इसलिए प्रजापति गौतमी जो इनकी धाय मां थी उन्होंने इनका पालन पोषण किया है। इसके अलावा दोस्तों, अगर आप गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सुनेंगे, तो इनके बचपन का नाम हुआ करता था सिद्धार्थ। आप में से बहुत लोग सिद्धार्थ नाम वाले होंगे। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ हुआ करता था और यह भी याद रखें कि इनकी पत्नी का नाम हुआ करता था यशोधरा।

48:29 और इनके पुत्र का नाम हुआ करता था राहुल। इनके एक रथ का घोड़ा था और इनके रथ के घोड़े का नाम हुआ करता था कंटक। और जो इनका चैरियोटीर यानी कि इनका सारथी था उस सारथी का नाम हुआ करता था चन्ना। कुछ यह जानकारियां हैं जो वास्तव में आपको लेनी चाहिए। बौद्ध धर्म की शुरुआत करने वाले हैं गौतम बुद्ध जिन्हें एशिया का प्रकाश और शाक्य मुनि भी कहा जाता है। दोस्तों शुद्धोधन जो थे इनके बारे में याद रखिए कि यह शाक्य गण के मुखिया हुआ करते थे। मुखिया यानी कि यह एक राजा थे। और

49:17 इनके राजा होने की वजह से ही शुद्धोधन को कहा जाता है दोस्तों कि यह शाक्य गण के मुखिया थे। इसलिए गौतम बुद्ध जी या जो महात्मा बुद्ध हैं वह शाक्य मुनि कहे जाते हैं। मां महामाया धाय मां प्रजापति गौतमी पत्नी यशोधरा पुत्र पुत्र है इनके राहुल घोड़ा इनका है कंटक और सारथी है इनका चन्ना अब इसमें एक क्या बड़ी मजेदार सी बात है उस पर हम लोग चर्चा करेंगे। देखो जानते हो दोस्तों ये ऐसा कहते हैं कि बड़े वैभव में पले बढ़े थे और वैभव में पलने बढ़ने की वजह से इनके अंदर हमेशा एक भाव आता रहा कि हम कैसे आने वाले समय में दर्द को दुख को समझेंगे। तो दर्द और दुख को समझने के लिए

50:02 इन्होंने धीरे-धीरे अपने ही अंदर उन सभी चीजों को रखना शुरू कर दिया जो दुख दर्द दे सकती हैं। इनके बचपन से जुड़ी हुई बहुत सारी कहानियां हैं कि इन्होंने एक बार एक बच्चे को रोते हुए देखा। फिर एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति को भी, एक जवान व्यक्ति को भी और एक मरे हुए व्यक्ति की अर्थी भी देखी और उसके बाद इनके जीवन में बहुत सारे परिवर्तन आए। यह अपने ही राजा वाले राजबाग में टहल रहे थे और अचानक से एक हंस आ गिरा जिसको तीर लगा हुआ था और जब इन्होंने तीर निकाला तो उस हंस की मृत्यु हो गई। हंस की मृत्यु होने पर उन्हें यह समझ आया कि क्यों लोग अपनी खुशी के लिए दूसरों की हत्या कर देते हैं। ये सब कहानियां अलग-अलग हैं। अलग-अलग जगह पर हमें मिलती हैं। भगवान जो भी बनेंगे भगवानों के बारे

50:48 में हमें हमेशा बहुत सारी प्रेरक कहानियां सुनने को मिलेंगी। परंतु बात यह है कि जब हम बौद्ध धर्म के महात्मा बुद्ध की चर्चा करते ही हैं तो महात्मा बुद्ध के जीवन में 29 वर्ष की अवस्था में एक परिवर्तन आया। 29 वर्ष की अवस्था यानी व्हेन ही वाज़ 29 इयर्स ऑफ़ एज ही सॉ द ट्रेंबलिंग चेंज इन हिस एंटायर लाइफ। इनकी जो जीवन प्रक्रिया थी उसमें बहुत बड़ा परिवर्तन आया। इन्होंने अपना घर छोड़ दिया। 29 वर्ष की अवस्था में जब इन्होंने घर छोड़ा तो इन्होंने अपनी वाइफ को नहीं बताया ना ही अपने पुत्र को। किसी को इन्फॉर्म

51:36 किए बगैर चन्ना और कंटक इन दोनों को लेकर के निकल गए। ऐसा कहते हैं कि जब यह बाहर निकले तो यह भटकते रहे पहले मगध के जंगलों में और मगध के जंगलों में भटकते हुए इन्हें गुरु भी मिले। कौन से गुरु? तो दोस्तों इनके जो दो गुरु हैं उनका नाम पूछा जाता है। एक गुरु हुआ करते थे इनका जिनका नाम था अलार कलमा। यह अलार कलाम भी लिखा हुआ मिलता है कई जगह। तो अलार कलमा और दूसरे गुरु इनके हुआ करते थे जिनका नाम था रुद्रक रामपुत्र। इन दोनों लोगों ने गौतम बुद्ध के जीवन में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। और यह महत्वपूर्ण भूमिका आगे चलकर के

52:21 भगवान बुद्ध के समझ में परिवर्तित हुई और ऐसा कहते हैं कि फिर इन्होंने सात दिन की तपस्या की और यह जो सात दिन की तपस्या इन्होंने की थी, यह की थी इन्होंने बोधगया में। और यह जो बोधगया है आप सभी लोग जानते हैं इसे बोधगया इसीलिए कहा जाता है क्योंकि महात्मा बुद्ध ने यहां पर अपना ज्ञान प्राप्त किया था। दूसरी बात यह जो बोधगया है बोधगया बिहार के अंदर है और बिहार हमारे भारत का एक राज्य है जिसके बारे में आप सभी लोग जानते हैं। मजेदार सी बात यह है कि बौद्ध धर्म धीरे-धीरे जब फैला तो हमारे नॉर्थ ईस्ट में खूब फैला। नॉर्थ ईस्ट कहने का मतलब कि नेपाल के आगे तिब्बत में, तिब्बत से आगे चीन के कुछ भागों में,

53:07 चीन से आगे वियतनाम और थाईलैंड जैसे इंडो चाइना देशों में भी और ऊपर की तरफ जापान तक यह फैला। जापान निश्चित तौर पर आप सभी जानते हैं कि एक बहुत ही विकसित राष्ट्र है। और जापान ने उस समय पर लालू प्रसाद यादव जी को पहले सीएम बनने पर यह ऑफर दिया था क्योंकि हमारे यहां का तीर्थ स्थल बोधगया आपके बिहार में है। आप हमें 3 साल के लिए बिहार दे दीजिए। हम बिहार को जापान बना देंगे। और हमारे लालू जी कहते हैं तुम 3 महीना के लिए हमको जापान दे दो। हम जापान को बिहार बना देंगे। तो लालू जी इज द ग्रेट। बाकी आगे बढ़ते हैं। सात दिनों की तपस्या इन्होंने बोधगया में की। ऐसा कहते हैं कि बोधगया में जब यह तपस्या कर रहे थे तो यह फाल्गू नदी के किनारे बैठे हुए थे। फाल्गू नदी को ही निरंजना नदी भी कहा जाता है। बिल्कुल। तो फाल्गू नदी के

53:54 किनारे बैठकर के इन्होंने पीपल के पेड़ के नीचे पीपल के पेड़ के नीचे तपस्या की और तपस्या करने के बाद इनको आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई। दोस्तों बौद्ध धर्म में आत्मज्ञान को कहते हैं एनलाइटनमेंट को कहते हैं बोधित्व। और बोधित्व प्राप्त होने की जो अवस्था है उस अवस्था को कहते हैं निर्वाण। तो गौतम बुद्ध को या महात्मा बुद्ध को निर्वाण प्राप्ति कब हुई? तो याद रखिएगा महात्मा बुद्ध को निर्वाण की प्राप्ति हुई है 35 वर्ष की उम्र में क्योंकि 29 वर्ष

54:42 की अवस्था में इन्होंने घर छोड़ा और 6 वर्ष तक इस प्रक्रिया में रहे। इस प्रक्रिया में रहे। तो आइए इन्हीं से जुड़े हुए कुछ प्रश्नों को हम लोग हल करना शुरू करें और बहुत अच्छे से हम लोग इस जानकारी को इकट्ठा करें। देखिए दोस्तों आप सभी लोगों को टेंशन लेने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं। मैं आपको इसका पहला पार्ट जो है वो YouTube के नीचे कमेंट सेक्शन में पहला वाला कमेंट के रूप में दे दूंगा। आपको टेंशन लेने की जरूरत नहीं। आगे बढ़ते हैं। इन वि बुद्धिस्ट काउंसिल सूतपथक एंड विनय पितक वर कंपाइल्ड। सुतपिताक और विनय पिथक का संकलन कब किया गया था? सेकंड काउंसिल, थर्ड काउंसिल, फोर्थ काउंसिल या फर्स्ट काउंसिल? और इसका सही आंसर है पहले

55:29 वाले काउंसिल में। अब देखिए दोस्तों, जब भारत में कोई भी राजा जैन धर्म, बौद्ध धर्म की दीक्षा लेता था, तो वह एक संगीति का आयोजन करता था। संगीत ही मतलब वो वास्तव में एक काउंसिल ऑर्गेनाइज करता था और उस काउंसिल के माध्यम से दुनिया भर को पूरे देश को यह बताना चाहता था कि हां मैंने जैन धर्म या बौद्ध धर्म की दीक्षा ली है। अब देखिए मजेदार सी बात यह है कि पहली वाली काउंसिल में सूतपिथक और विनय पिथक को लिखा गया। अब राजाओं के दीक्षा लेने का क्रम है यह। राजाओं के दीक्षा लेने का क्रम मतलब राजा अपने आप को दीक्षा लेते हैं और राजा दीक्षा लेने के साथ-साथ अपने आप को इस बात

56:15 पर जाहिर कर देते हैं कि हां अब मैं ऑफिशियली ऑफिशियली कहने का मतलब अब मैं इस धर्म को पूरी तरीके से मानता हूं। चलिए एक छोटी सी चर्चा को हम लोग यहां पर करते हैं। दोस्तों पहली वाली जो बुद्धिस्ट काउंसिल हुई थी वो हुई थी 483 ईसवी पूर्व में। जब महात्मा बुद्ध का इस जीवन से महापरिनिर्वाण हुआ तो राजगृह में यह 483 ईसवी पूर्व में पहली वाली बौद्ध संगीति हुई। उस समय पर राजा हुआ करता था अजात शत्रु। जिस बौद्ध भिक्षु ने अजात शत्रु को बौद्ध धर्म की दीक्षा दिलाई थी दोस्तों उसका नाम हुआ करता था महाकश्यप

57:05 और महाकश्यप के समय पर क्या-क्या हुआ था तो दोस्तों आप सभी लोगों ने अभी पढ़ा कि सूतपितक और विनय पितक लिखे गए। अभी मैं इनके ऊपर भी एक चर्चा करूंगा कि सूतपथक और विनय पितक वास्तव में हैं क्या? याद आगे बढ़ते हैं। तो दूसरी वाली बौद्ध संगीति जो हुई वह इसी के 100 साल बाद हुई 383 ईसवी पूर्व में और यह वाली जो बौद्ध संगीति हुई थी यह हुई थी वैशाली में। जैसा कि मैंने बताया राजा हुआ करता था कालशोक और कालशोक को कई बार काकवर्ण भी कहा जाता है। तो कालशोक और इस समय पर बौद्ध धर्म के वो भिक्षु जिन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा दिलाई उनका नाम था सबकामी ऐसा कहते हैं कि

57:51 स्थिर वादिन में यह धर्म बटा था। इतना बहुत महत्वपूर्ण बात नहीं है जो दूसरी वाली बौद्ध संगीति में हुई हो। तीसरी बौद्ध संगीति हुई थी 250 ईसवी पूर्व में और यह बौद्ध संगीति हुई पाटलिपुत्र में। पाटलिपुत्र में उस समय पर राजा हुआ करते थे अशोक महान। और अशोक महान के समय पर उनको बौद्ध धर्म की दीक्षा दिलवाने वाले बौद्ध भिक्षु का नाम हुआ करता था मुगालीपुत्र तिस और मुगालीपुत्र तिस के समय पर ही अभिधम्म पितक को लिखा गया दोस्तों अभिधम्म पितक का मतलब है मेटाफिजिक्स ऑफ बुद्धिज्म कहते हैं बौद्ध धर्म का अध्यात्मवाद है यह

58:38 इसे कहते हैं बौद्ध धर्म का अध्यात्मवाद और फिर चौथी चर्चा और वह चौथी चर्चा है कि चौथी वाली बौद्ध संगीति कब हुई? तो ऐसा माना जाता है कि 78 ईसवी में हुई। 78 ईसवी कहने का मतलब तब राजा हुआ करते थे कनिष्क और यह संगीति हुई थी कुंडलवन में। कुंडलवन कश्मीर में है और यहां राजा थे जिनका नाम है कनिष्क और कनिष्क राजा के समय पर ही यहां वासुमित्र जी ने कनिष्क को बौद्ध धर्म की दीक्षा दिलवाई थी और कनिष्क जो राजा थे उसी समय पर यह बौद्ध धर्म हिनयान और

59:24 महायान में बट गया। हिनयान और महायान इन पर हम चर्चा करेंगे अभी आगे चलकर। कई सारी ऐसी जानकारियां हम छोटे-छोटे शॉर्ट वीडियोस के माध्यम से आपको देते हैं। 1 मिनट के शॉर्ट वीडियोस होते हैं। हमारे चैनल पर जाकर के श्स के सेक्शन में एक बार जाइए और मेरे द्वारा जितने भी शॉट्स बनाए गए हैं उन्हें देखिए। आपको काफी कुछ अच्छी जानकारियां एक मिनट के अंदर मिलेंगी जिन्हें आप वास्तव में 10-15 मिनट में सीख पाते हैं। वो आप 1 मिनट के अंदर मेरे शॉट्स के माध्यम से सीख सकते हैं। तो वो भी आपके लिए एक बहुत बढ़िया सा फंडा हो जाएगा। बहुत बढ़िया सा काम हो जाएगा। दोस्तों यहां एक बहुत अच्छी सी

1:00:11 ट्रिक है जिसके माध्यम से मैं आप सभी लोगों को यह याद करवा दूंगा। चलिए तो पहली ट्रिक राजा महाराजा आजा वैश्य सबका काल है। पटाओ मत आशिक। कुंवर जी कंगाल है। कुंवर जी कंगाल है। वैसे ये एक बहुत ही सिंपल सी ट्रिक है और इस सिंपल सी ट्रिक से आप लोग सीख सकते हैं। राजा महाराजा आजा वैश्य सबका काल है।

1:00:57 तो राजा महाराजा आजा मतलब राजगृह अजात शत्रु महाकश्यप तो राजा महाराजा आजा पहली वाली वैश्य सबका काल है तो वैशाली कालशोक सबकामी दूसरी वाली पटाओ मत आशिक पाटलिपुत्र अशोक मतलब आशिक मुगाली पुत्र तिस का मतलब मत और चौथा है कुंवर जी कंगाल है इसका मतलब कुंडलवन कंगाल मतलब कनिष्क और जी मतलब वासुमित्र जी तो इस तरह से आप इसे याद कर सकते हैं। यह एक बहुत ही खूबसूरत सी ट्रिक है जिसके माध्यम से आप यह पूरी चारों बौद्ध संगीतियों को याद कर सकते हैं। यह जो हम चर्चा कर रहे हैं दोस्तों आप सभी लोग जानते हैं यह बुद्धिस्ट काउंसिल्स की हैं। बुद्धिस्ट काउंसिल्स को हम कहते हैं बौद्ध

1:01:42 संगीतियां। तो बौद्ध संगीतियां या बुद्धिस्ट काउंसिल्स यह आप लोगों ने समझा कि इस तरह से चार अलग-अलग भागों में बंटी हुई हैं। वास्तव में इतनी जानकारी इकट्ठा करने के बाद आइए हम थोड़ा सा और आगे बढ़ते हैं और आगे बढ़कर के चर्चा करते हैं कि गौतम बुद्ध को निर्वाण कहां पर मिला। अब गौतम बुद्ध के जीवन की बहुत सारी घटनाएं हैं। जिन घटनाओं को हम लोग यहां पर पढ़ेंगे। जैसे कि गौतम बुद्ध जब अपने घर का त्याग करते हैं। जब उन्होंने गृह त्याग किया तो गृह त्याग को कहते हैं महा भिनिष्क्रमण।

1:02:30 उसे कहते हैं महाभिनिष्क्रमण। ठीक है? जब उन्हें ज्ञान प्राप्ति हुई, जब उन्हें बोधित्व प्राप्त हुआ तो बोधित्व को कहते हैं निर्वाण प्राप्ति। जब महात्मा बुद्ध का देवलोक गमन हुआ। देवलोक गमन का अर्थ उन्होंने इस दुनिया को त्यागा तो इस दुनिया को त्यागने में या संसार त्याग को संसार त्याग को हम कहते हैं महा परिनिर्वाण। जब उन्होंने पहला उपदेश दिया तो उनके पहले उपदेश को उनके

1:03:18 जीवन में कहा जाता है धर्म चक्र प्रवर्तन। धर्म चक्र प्रवर्तन। मेरे ख्याल से प्रवर्तन। इस तरह से यह बहुत सारे अलग-अलग फेसेस हैं। आप सभी को कमेंट करना है कि इनका साइन क्या है? इनका प्रतीक क्या है? जैसे मैं आपको प्रतीक के बारे में बताना चाह रहा हूं। जैसे धर्मचक्र प्रवर्तन है। तो इसका प्रतीक है पहिया व्हील। तो जब धर्म चक्र प्रवर्तन हुआ तो इन्होंने पहला उपदेश कहां दिया? तो इन्होंने पहला उपदेश दिया था सारनाथ में।

1:04:03 और सारनाथ में इन्होंने पहला उपदेश दिया था पांच शिष्यों को। पांच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था। तो यह पॉइंट भी आपके लिए याद होना चाहिए। वास्तव में आगे बढ़े तो गौतम बुद्ध को निर्वाण कहां प्राप्त हुआ था? तो याद रखिए निर्वाण उन्हें प्राप्त हुआ था बोधग गया में। निर्वाण का मतलब भी आप लोग समझ गए हैं। निर्वाण का मतलब बोधित्व की बात कर रहा हूं मैं। यानी कि एनलाइटनमेंट की बात कर रहा हूं मैं। एनलाइटनमेंट बोधित्व गौतम बुद्ध डिलीवर ह फर्स्ट सरमन एट व्हिच ऑफ द फॉलोइंग प्लेसेस कौन से स्थान पर उन्होंने पहली बार उपदेश दिया था? तो दोस्तों इसका सही उत्तर मैंने अभी थोड़ी

1:04:49 देर पहले ही आपको बताया सारनाथ। व्हिच स्टेट इज कॉल्ड एस द क्रेडल ऑफ बुद्धिज्म। क्रेडल ऑफ बुद्धिज्म मतलब बौद्ध धर्म का पालना किसे कहा जाता है? और इसका सही उत्तर होगा बिहार। बिहार को कहेंगे बौद्ध धर्म का पालना। याद रखिएगा। आगे चलें तो वि आर द फाइव होली वोज़ ऑफ जैनिज्म। जैनिज्म के पांच पवित्र प्रतिज्ञाएं कौन-कौन सी हैं? अब यही बहुत मजेदार सी बात है दोस्तों। अहिंसा, सत्य, आस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। यानी कि ये पहला वाला ही ऑप्शन आप लोगों के लिए सही है। आइए मैं आपको बता देता हूं। पहला यहां पर है सत्य दूसरा यहां पर है अहिंसा तीसरा है यहां पर आस्तेय चौथा यहां पर है

1:05:39 अपरिग्रह और पांचवा यहां पर है ब्रह्मचर्य देखिए दोस्तों जब आप चर्चा करोगे इन सभी की तो सत्य का मतलब होता है ऑलवेज स्पीक ट्रुथ अहिंसा का मतलब होता है नॉन वायलेंस और नॉन वायलेंस का मतलब यह नहीं है नॉन वायलेंस इंटेंशनल नॉन वायलेंस होनी चाहिए। अब आप यह सोच रहे होंगे इंटेंशनल नॉन वायलेंस का मतलब क्या? विचारों में भी कभी हिंसा ना हो। विचारों में भी कभी ऐसा ना सोें आप कि किसी को मार देंगे। और वास्तव में नॉन वायलेंस यानी विचारों में भी कभी हिंसा ना आना ऐसा पालन कर पाना बड़ा मुश्किल है। क्योंकि हमारे आसपास हो रही गतिविधियों को देखते हुए कई बार हमें

1:06:25 लगता है कि अगर हम इस गतिविधि में होते तो शायद अपना आपा खो बैठते। परंतु फिर भी अगर उस समय पर आप अपने चित्त को शांत रख सकते हैं तो वो चित्त को शांत रखने वाली स्थिति का नाम है नॉन वायलेंस। वो भी इंटेंशनल यानी कि विचारात्मक अहिंसा। आस्तेय का मतलब होता है नॉन स्टीलिंग। किसी प्रकार की चोरी ना करना। अपरिग्रह का मतलब होता है किसी प्रकार की संपत्ति ना रखना। नॉन पजेशन ऑफ प्रॉपर्टीज। नॉन पजेशन ऑफ प्रॉपर्टीज। किसी प्रकार की संपत्ति ना रखना। और फिर आता है ब्रह्मचर्य। ब्रह्मचर्य का मतलब होता है दोस्तों कॉन्टिनेंस। कॉन्टिनेंस या इसे कहेंगे सेलिब्रेसी।

1:07:13 ऐसा करने वाले लोग बहुत कम हैं। दोस्तों सत्य, अहिंसा, आस्तेय और अपरिग्रह यह 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ स्वामी ने दिया था। 23वें तीर्थंकर जो हुआ करते थे उनका नाम था पार्श्वनाथ स्वामी। और पार्श्वनाथ स्वामी के द्वारा दिए हुए यह चार वोज़ हैं। लेकिन ये पांचवा जो है यह 24वें तीर्थंकर द्वारा दिया गया। और दोस्तों आप सभी लोग जानते हैं जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर हुआ करते थे महावीर स्वामी। तो ये जो ब्रह्मचर्य है ना ब्रह्मचर्य का पालन कर पाना बड़ा मुश्किल है अपने आप से।

1:07:58 और ब्रह्मचर्य के पालन को किसने दिया है? तो यह 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने दिया है। ठीक। तो यहां आप लोग इतनी सारी जानकारियां वैसे इकट्ठा कर चुके हैं। ट्रुथ, नॉन वायलेंस, नॉन स्टीलिंग, नॉन पजेशन ऑफ प्रॉपर्टीज और कॉन्टिनेंस या जिसे कहते हैं सेलबेसी। पर देखिए बड़ी मजेदार सी बात यह है कि आगे बढ़े हम लोग तो हमें मिलेगा कि इन वि जैन काउंसिल 12 अंगाज़ वर कंपाइल्ड। किस जैन सभा में 12 अंगों का संकलन किया गया? तो वैसे इसका सही उत्तर हो जाएगा पहली जैन काउंसिल में ही। अब देखिए दोस्तों जो जैन संगीतियां हैं वो दो ही

1:08:44 हैं जिनके बारे में हम पढ़ते हैं। जैन काउंसिल या इन्हें हम कहते हैं जैन संगीति और ऐसी दो ही जैन संगीतियां हैं। पहली वाली जो जैन संगीति है वह कब हुई थी? तो वो हुई थी 300 ईसवी पूर्व में और 300 ईसवी पूर्व में यह जैन संगीति हुई थी पाटलिपुत्र में। इस जैन संगीत में दीक्षा लेने वाले राजा का नाम हुआ करता था चंद्रगुप्त मौर्य। चंद्रगुप्त मौर्य। और यहां पर जो व्यक्ति ने दीक्षा दिलवाई थी उनका नाम था स्थूलभद्र। इन्हें स्थूलभद्र कहा जाता है। दोस्तों

1:09:31 स्थूल वृद्ध भद्र यह जैन धर्म के बड़े ही प्रमुख गुरु हैं। क्योंकि स्थूलभद्र के ही जितने फॉलोअर्स हैं इन्हीं को मानने वाले जो लोग हैं वही श्वेतांबर जैनी हैं। यह बात आप याद रखें। दूसरी वाली जो बौद्ध काउंसिल जो जैन काउंसिल हुई थी वो हुई थी 612 ईसवी में और यह जो काउंसिल हुई यह हुई थी गुजरात में, वल्लभी में और देवर्धि क्षमा श्रमण इसमें प्रमुख थे। उनका नाम था देवधि क्षमा श्रमण।

1:10:23 देवधि क्षमाश्रमण। आगे बढ़ते हैं। तो एक और चर्चा इनमें से कौन सी बौद्ध संगीति में हिनयान एवं महायान में यह धर्म दो हिस्सों में बटा? तो दोस्तों इसका सही उत्तर आप सभी लोग जानते हैं कि यह चौथी वाली बौद्ध संगीति है और इसमें भी बड़ी मजेदार सी बात बताता हूं आपको। देखिए जब हम हिनयान की बात करते हैं तो हिनयान के अंदर ही एक और शाखा है और यह बौद्ध धर्म की सबसे ज्यादा साफ और पवित्र शाखा मानी जाती है। इसे ही कहते हैं थेरवाद। थेरवाद और जो यह महायान है इस महायान के अंदर एक शाखा है और महायान के अंदर जो शाखा है उसे अगर आप लोग समझें

1:11:12 तो उस महायान के अंदर वाली शाखा को हम लोग कहते हैं वज्रयान। और यह वज्रयान अजीब किस्म की शाखा है यार। वज्रयान जो वज्रयानी है वो वज्रयानी बड़े ही सुपरस्टीशियस हैं। बड़े अंधविश्वासी किस्म के लोग हैं और ये लोग पता नहीं दुनिया भर की अलग-अलग चीजों में विश्वास करते हैं। जो वास्तव में एक सामान्य व्यक्ति द्वारा कभी भी स्वीकार नहीं की जा सकती। हम और आप मिलकर के जिस चीज को एक्सेप्ट ना कर पाएंगे हमें जो महायान के अंदर वज्रयानी हैं वज्रयानी उन चीजों पर विश्वास रखते हैं। मैं आपको छोटी सी एक चर्चा के तौर पर बता देता हूं। वज्रयानी लोग ऐसे होते हैं जो विश्वास करते हैं कि इन्हें सेक्स करने के

1:11:57 लिए हर बार एक वर्जिन लड़की चाहिए। ऐसे टाइप से बहुत सारे इनके अंधविश्वास हैं जिन अंधविश्वासों पर इनका विश्वास है। परंतु आगे बढ़ते हैं और आगे बढ़कर के हम लोग चर्चा करते हैं हु वाज़ द ऑथर ऑफ कल्पसूत्र? कल्पसूत्र के लेखक कौन थे? तो दोस्तों कल्पसूत्र के लेखक भद्रबाहु, महावीर स्वामी, महात्मा बुद्ध या पार्श्वनाथ और इसका सही उत्तर हो जाएगा भद्रबाहु। भद्रबाहु ने कल्पसूत्र लिखी है और इसमें सभी जैन तीर्थंकरों की सभी जैन तीर्थंकरों की जीवनी लिखी गई है यानी कि बायोग्राफी लिखी गई है। तो यह पॉइंट भी आप सभी लोगों को याद रखना है कि जैन तीर्थंकरों की जीवनी के बारे में हमें कहां मिलता है? तो वो है कल्पसूत्र के

1:12:43 अंदर। अब आगे चलते हैं कि एक और चर्चा है हमारे पास। जैन आर्किटेक्चरल पीस द स्टैच्यू ऑफ़ गोमतेश्वर इज़ लोकेटेड इन एक जैन धर्म के एक जैन धर्म के बहुत ही इंपॉर्टेंट टेंपल की बात कर रहे हैं। स्टैचू ऑफ़ गोमतेश्वर की यह कहां पर है? और अभी मैं इससे ही जुड़ी हुई एक चर्चा करना चाहूंगा। इससे जुड़ी हुई चर्चा के अंदर बात यह है कि यह है कर्नाटक में। और गोमतेश्वर मंदिर बड़ा ही महत्वपूर्ण मंदिर है। गोमतेश्वर मंदिर में जो आपको प्रतिमा मिलेगी वो प्रतिमा या स्टैच्यू की बात कर रहा हूं मैं। कई बार आप लोग प्रतिमा शब्द को उल्टा ले लेते हैं। तो प्रतिमा नहीं मिलेगी।

1:13:29 स्टैच्यू वाली प्रतिमा मिलेगी यहां पर। और प्रतिमा मिलेगी यहां पर भगवान बाहुबली की। बाहुबली भगवान हैं और बाहुबली भगवान यह पहले तीर्थंकर ऋषभदेव स्वामी के बेटे हैं। और ऋषभदेव स्वामी के बेटे बाहुबली भगवान बहुत लंबी सी मूर्ति है इनकी और बहुत लंबी सी मूर्ति बहुत लंबी सी स्टैचू में इसका किया जाता है महामस्तका अभिषेक। जैसे कि हम शिव जी का अभिषेक करते हैं और शिव जी का हम जो अभिषेक करते हैं, जलाभिषेक करते हैं, रुद्राभिषेक करते हैं, वैसे ही यह जो

1:14:16 बाहुबली भगवान हैं, यहां गोमतेश्वर मंदिर में महामस्तका अभिषेक किया जाता है। महामस्तका अभिषेक किया जाता है। तो यह भी आपको याद रखना है। फिलहाल इससे जुड़ी हुई बातों को मैं अभी और आगे चलकर के जानकारी के रूप में शेयर करता हूं आपके साथ। दोस्तों, जैन धर्म वास्तव में दो हिस्सों में बट गया। जैसे हिणनयान और महायान दो हिस्से हैं बौद्ध धर्म के वैसे ही जैन धर्म के भी दो हिस्से बने। और ऐसा कहा जाता है कि जब चंद्रगुप्त मौर्य शासन कर रहे थे। चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल के दौरान ही एक बार मगध में अकाल पड़ा। तो जब

1:15:02 अकाल पड़ा तो उस समय पर भद्रबाहु जिन्होंने कल्पसूत्र की रचना की है उनके साथ चंद्रगुप्त मौर्य मिलकर चले गए कर्नाटक में श्रवण बेलगोला नाम की एक जगह पर और कर्नाटक में जब यह श्रवण बेलगोला पहुंचे तो इन्होंने वहां पर सल्लेखना कर लिया सल्लेखना एक शब्द है सल्लेखना का मतलब होता है भूखे रहकर के प्राण त्याग देना फास्टिंग के प्रोसेस में अपने प्राण को त्यागना कह कहलाता है सल्लेखना करना। तो दोस्तों कर्नाटक में श्रवण बेलगोला में चंद्रगुप्त मौर्य ने कर लिया सल्लेखना। और फिर वही गोमतेश्वर के मंदिर और बाकी सब की स्थापना नॉर्थ इंडिया की अगर हम लोग बात

1:15:48 करें तो नॉर्थ में उस समय पर बचे भद्रबाहु के ही शिष्य जिनका नाम था स्थूलभद्र। अब दोस्तों वास्तव में अगर फॉलोअर्स की बात की जाए तो भद्रबाहु के जो भी फॉलोअर्स हैं वो सभी कहलाए दिगंबर जैनी। उनको हम दिगंबर जैन कहते हैं और जितने भी स्थूलभद्र के फॉलोअ नॉर्थ में कहलाए उनको हम श्वेतांबर जैन कहते हैं। उन्हें कहा जाता है श्वेतांबर जैन। श्वेतांबर और दिगंबरों में वैसे तो अंतर यह है कि दिगंबर जैन थोड़ा सा हार्ड प्रैक्टिस करते हैं। यानी कि यह नेकेड भी

1:16:35 रहते हैं। और नेकेड मतलब कि यह अपने शरीर पर वस्त्र धारण नहीं करते। श्वेतांबर जो हैं यह सफेद वस्त्र धारण करते हैं और यह सफेद वस्त्र धारण करने की वजह से ही श्वेतांबर हैं। बाकी श्वेतांबर जैनों के पालन करने की परंपरा में और दिगंबर जैनों के पालन करने की परंपरा में भी थोड़ा-थोड़ा अंतर है। और एक बहुत और अलग सी बात अगर हम लोग समझें तो हम पाएंगे कि जो श्वेतांबर जैन हैं वो यह विश्वास करते हैं कि 19वें विश्वास है इनका कि 19वें तीर्थंकर जिनका नाम था मल्लनाथ जी।

1:17:21 इनका यह मानना है श्वेतांबरों का कि मल्लीनाथ जी वास्तव में एक फीमेल तीर्थंकर थे। फीमेल कहने का मतलब कि ये एक स्त्री थे। क्योंकि इनका नाम मल्लीबाई से लिया गया है। इनका नाम लिया गया है मल्लीबाई से। जबकि दिगंबर यह मानते हैं कि सभी तीर्थंकर सभी तीर्थंकर मेल यानी कि सभी तीर्थंकर पुरुष थे। कोई भी तीर्थंकर स्त्री नहीं थी। तो ये एक बहुत बेसिक सा प्रश्न बन जाता है। कई बार परीक्षाओं में पूछा जाता है कि श्वेतांबरों के हिसाब से कौन से नंबर के तीर्थंकर फीमेल माने जाते हैं? आप सभी को बताना है कि मल्लनाथ जी जो थे वह

1:18:06 एक फीमेल तीर्थंकर ऐसा श्वेतांबर मानते हैं। दिगंबर नहीं मानते। दिगंबर सभी को पुरुष ही मानते हैं। किसी को है ना किसी को भी वो फीमेल नहीं मानते। आइए एक जानकारी। कनिष्क वाज़ दी पैटर्न ऑफ वि सेट ऑफ बुद्धिज्म? तो कनिष्क कौन से सेक्ट का कौन से सेक्ट का उपासक हुआ करता था? तो कनिष्क दोस्तों याद रखिएगा महायान सेक्ट का। महायानों के बारे में बौद्ध धर्म में एक खास बात यह है कि महायान लोग जो थे यह मूर्ति पूजा पर विश्वास रखते थे और आज भी पूरे विश्व में इसी तरह के

1:18:52 पूरे विश्व में इसी तरह के बौद्धिस्ट पाए जाते हैं। हिनयान जो हैं हिनयान मूर्ति पूजा पर विश्वास नहीं करते। यह प्रतीकों की पूजा करते हैं। प्रतीकों की पूजा और मूर्ति पूजा नहीं करते। मूर्ति पूजा नहीं करते। वैसे आप लोगों को अगर कहीं देखने हो इस तरह के हिनियान तो ये हिनियान बुद्धिस्ट आपको मिलेंगे सेलोन में। सेलोन दोस्तों आज श्रीलंका के नाम से जाना जाता है। पर पहले इसे सेलोन कहा जाता था। और यह जो सेलोन स्टेट है उसके बारे में यह जानकारी आपको होनी चाहिए कि अशोक के पुत्र और पुत्री अशोक ने जब बौद्ध धर्म की

1:19:37 दीक्षा ली तो अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करने के लिए महेंद्र व संघमित्रा महेंद्र इनके पुत्र का नाम था संघमित्र इनकी पुत्री का तो अशोक के पुत्र और पुत्री ये श्रीलंका गए थे और श्रीलंका में दो ग्रंथ भी लिखे गए हैं। जे जिनमें से एक ग्रंथ का नाम है दीपवंश और दूसरे ग्रंथ का नाम है महावंश। यह दीप वंश और महावंश यह दोनों सेलोनीज स्क्रिप्चर्स हैं। कहने का मतलब यह श्रीलंका के धर्म ग्रंथ हैं जिनमें बौद्ध धर्म के बारे में हमें जानकारी मिलती है। तो दोस्तों, श्रीलंका

1:20:24 में हिनियान शाखा के उपासक आपको मिलेंगे। महेंद्र और संघमित्रा द्वारा फैलाया गया यह बौद्ध धर्म आज भी श्रीलंका के अंदर मिलता है। सेलोनीज स्क्रिप्चर्स यानी कि दीप वंश और महावंश में आपको जानकारी मिलती है कि बिंबिसार के 100 पुत्र हुआ करते थे और बिंबिसार के 100 पुत्रों में से अशोक ने 99 को मार दिया था। 98 को मार दिया था। सबसे छोटे वाले तिस को बचा दिया था। ऐसी एक जानकारी अशोक के बारे में इन दीप वंश और महावंशों से मिलती है। आइए इससे जुड़े हुए और भी फैक्ट्स को हम लोग जाने तो हमें और भी जानकारी मिलेगी। अंडर हूस लीडरशिप जैनिज्म स्प्रेड इन साउथ इंडिया? तो भाई इसका सही उत्तर होगा भद्रबाहु। भद्रबाहु ने ही साउथ इंडिया में दिगंबर जैन शाखा को फैलाया। आप देखें कि

1:21:13 पूरी दुनिया में जितने भी धर्मों को आप पढ़ेंगे वो धर्म दो-दो भागों में जरूर डिवाइड हुए। जैसे आप क्रिश्चियनिटी को पढ़ते हैं तो उसमें रोमन कैथोलिक्स अलग हैं और प्रोटेस्टेंट अलग हैं। आप इस्लाम को पढ़ते हैं तो उसमें से शिया अलग हैं और सुन्नी अलग हैं। आप बौद्ध को पढ़ते हैं तो उनमें हिनयान अलग, महायान अलग। आप जैन को पढ़ते हैं उनमें श्वेतांबर अलग, दिगंबर अलग। हिंदू धर्म में भी ऐसा ही था। हिंदू धर्म में भी शैविज्म और वैष्णविज़्म के उपासक अलग-अलग हुआ करते थे। लेकिन धन्य है यहां के राजाओं का कि उन्होंने उनको अलग होने ही नहीं दिया। सबके मंदिर बनाए और सबके मंदिरों में सब जाने लगे। तो वास्तव में शैव परंपरा को मानने वाले लोगों को वैष्णव परंपरा से कोई दिक्कत नहीं थी और वैष्णव परंपरा को मानने वाले को शैव परंपरा के साथ कोई दिक्कत नहीं थी। इस तरह से आना जाना एक तरह से संस्कृति को मिलाने

1:21:59 का कार्य कर गया। आगे बढ़े तो एक और प्रश्न है हमारे पास। वेयर वाज़ द फर्स्ट कॉन्फ्रेंस ऑफ़ जैनिज्म ऑर्गेनाइज्ड? तो मैंने कहा अभी आपको कि उस समय पर हुआ करते थे एक राजा चंद्रगुप्त मौर्य और चंद्रगुप्त मौर्य के समय पर स्थूलभद्र ने पाटलिपुत्र में ये ऑर्गेनाइज की थी। द कोर ऑफ जैनिज्म फिलॉसफी इज कॉल्ड जैनिज्म फिलॉसफी का जो कोर है तो उसे हम लोग क्या कहते हैं? अनेकांतवाद, एकवाद, द्वैतवाद या अद्वैतवाद। तो वास्तव में अगर आप पढ़ेंगे तो इसे अनेकांतवाद कहते हैं। जिसको हम लोगों ने अभी स्यादवाद के बारे में भी जानने की कोशिश की। अद्वैतवाद या अद्वैत वेदांत फिलॉसफी जो है यह आदि गुरु शंकराचार्य की फिलॉसफी है।

1:22:47 आदि गुरु शंकरा आचार्य की फिलॉसफी। चलिए आगे बढ़ते हैं। आगे चलकर के एक और प्रश्न है जिस पर हम लोग चर्चा करेंगे और वो यह है हु वाज़ द सेकंड तीर्थंकर ऑफ जैन? जैनों के दूसरे तीर्थंकर कौन हुआ करते थे? तो इसमें सही उत्तर हो जाएगा अजीतनाथ स्वामी। दूसरे तीर्थंकर हुआ करते थे। प्रियदर्शन द डॉटर ऑफ महावीर स्वामी वाज़ मैरिड टू हुम। तो उनका नाम हुआ करता था अनोज प्रियदर्शनी और अन्नोज प्रियदर्शनी जो थी उनकी शादी किसके साथ हुई थी? तो दोस्तों याद रखिएगा जमाली के साथ। ये जमाली जो थे ये महावीर स्वामी के पहले

1:23:33 शिष्य थे। महावीर स्वामी के पहले शिष्य तो मतलब ससुर जी के पहले शिष्य अगर कोई बने तो वह दामाद जी। यह आपको याद रखना है। महावीर स्वामी के पहले शिष्य हैं उन्हीं के दामाद जमाली। तो आइए महावीर स्वामी के बारे में थोड़ी एक चर्चा कर लें। जिस पर थोड़ा विवाद भी है वह भी हम लोग यहां पर देख लेंगे। जब आप वर्धमान महावीर के बारे में बात करते हैं। तो दोस्तों आप पाएंगे कि महावीर स्वामी में हम लोग चर्चा करेंगे सबसे पहले इनके जन्म की। इनका जन्म ऐसा बताया जाता है कि हुआ था 599 ईसवी पूर्व में और इनकी

1:24:22 इनका देवलोक गमन हुआ था 527 ईसवी पूर्व में। एक तो यह फैक्ट भी है कि इनका जन्म और इनकी जो अ इनका जो देहावसान है वो दोनों ही कहा जाता है 599 बीसी और 527 बीसी। साथ ही साथ इनके जन्म की एक और चर्चा है जो इतिहास में हमें मिलती है वो है 540 ईसवी पूर्व में इनका जन्म हुआ और 468 ईसवी पूर्व में इनकी इनका इस दुनिया से देवलोक गमन हुआ। तो जब जन्म ये बताया जाता है कि 599 ईसवी पूर्व में हुआ तो ऐसा मानते हैं कि इनका संसार त्याग

1:25:07 इनका संसार त्याग हुआ था। 527 ईसवी पूर्व में और जब यह चर्चा की जाती है कि इनका जन्म हुआ था 540 ईसवी पूर्व में तो ऐसा माना जाता है कि इनका संसार त्याग हुआ था 468 ईसवी पूर्व में। वैसे यह बड़ा ही डिस्कशन का सब्जेक्ट है क्योंकि इनका जन्म जो हुआ था दोस्तों तो इनका जन्म आप सभी लोग जानते हैं कि इनका जन्म कहां हुआ था? तो इनका जन्म हुआ था वैशाली में। एक जगह हुआ करती थी जिसे हम लोग कहते थे कुंडलग्राम। तो दोस्तों यह पॉइंट भी आपको याद होना चाहिए कि कुंडलग्राम वैशाली में इनका जन्म हुआ था। और जो इनका

1:25:54 देवलोक गमन हुआ वो हुआ था पावापुरी। और पावापुरी जो है पावापुरी कहां है? तो याद रखिएगा पावापुरी भारत में है। मतलब बिहार में ही है पावापुरी। ठीक? अब देखिए बड़ी मजेदार सी बात यह है यहां पर कि अगर आप कुछ इतिहासकारों की मानें जैसे रामशरण शर्मा हैं। रामशरण शर्मा के अलावा कुछ और इतिहासकार हैं तो वो ये मानते हैं कि यहां पे 540 ईसवी पूर्व और ये 468 ईसवी पूर्व वाला सही है। आर एस शर्मा जैसे इतिहासकार इसको सही मानते हैं। इसको परंतु अगर आप विकपीडिया वगैरह पर डाटा देखोगे तो विकिपीडिया पे ऊपर वाला डाटा माना जाता है। मेरा जो आप लोगों से एक विशेष अह रिक्वेस्ट है वह यह है कि आप यह मान करके चलिएगा कि उनका जन्म और उनका

1:26:39 संसार त्याग 468 ईसवी पूर्व ही माने। इससे ज्यादा है ना इस पर आपको कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। फिर आते हैं इनके ऊपर कि इन्हें और क्या कहा जाता था? तो जैसे इनके बचपन का नाम पूछा जाता है कई बार तो इनके बचपन का नाम ऐसा कहते हैं कि हुआ करता था वर्धमान। वर्धमान और देखिए इनके जो पिता थे इनके पिता का नाम हुआ करता था सिद्धार्थ और यह सिद्धार्थ का गौतम बुद्ध के बचपन वाले नाम से कोई लेना देना नहीं है सिर्फ नाम समान है बाकी कुछ नहीं ये कौन से गण के मुखिया हुआ करते थे तो याद रखिएगा नातिक गण के मुखिया

1:27:26 ऐसा कहते हैं कि नात्रिक गण के मुखिया हुआ करते थे ये इनकी माताजी जो थी इनकी माता का नाम क्या था? तो इनकी माता का नाम हुआ करता था त्रिशला। ये भी पॉइंट याद रखें। इनकी जो बेटी थी अच्छा इनकी जो पत्नी थी उनका नाम क्या था? तो इनकी पत्नी का नाम था यशोदा। इनकी जो बेटी थी पुत्री। पुत्री का नाम हुआ करता था अनुज प्रियदर्शनी। अनुज प्रियदर्शनी और जो इनके दामाद थे उनका नाम हुआ करता था जमाली और जैसा कि

1:28:11 मैंने कहा यह पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने महात्मा महावीर स्वामी की बातों की आईडियोलॉजी को फॉलो करना शुरू कर दिया था। तो यहां आप लोगों को यह याद हो जाएगा ऐसे। तो ये थोड़ा सा महावीर स्वामी के बारे में एक इंफॉर्मेशन है। उस इंफॉर्मेशन को आप लोग थोड़ा सा यहां पर स्क्रीनशॉट लेकर के लिख सकते हैं। चलिए आगे बढ़ते हैं और बहुत सारी चर्चाएं करते हैं जो कि हमें अभी आगे चलकर के और भी करनी है। दोस्तों जब हम जब हम इतने जैन धर्म और बौद्ध धर्म को पढ़ते हैं तो यहां पर कुछ फैक्ट जिनके बारे में जैन धर्म और बौद्ध धर्म बात करते हैं वहां पर थोड़ा जरूर हमें चर्चा करनी है। देखिए बौद्ध

1:28:58 धर्म के बारे में बौद्ध धर्म के बारे में जब हम पढ़ना शुरू करते हैं ना दोस्तों तो यह बौद्ध धर्म एक ऐसा धर्म है जो चार नोबल ट्रुथ के बारे में बात करता है और चार नोबल ट्रुथ क्या है चार नोबल ट्रुथ है दुख दुख समुदय दुख निरोध और दुख निरोध गामिनी प्रतिपदा

1:29:43 तो अब ये नंबर वन नंबर टू नंबर थ्री एंड नंबर फोर वास्तव में यह दुख दुख निरोध दुख समुदय या दुख निरोध गामिनी प्रतिपदा क्या है? दुख का मतलब है द वर्ल्ड इज फुल ऑफ सोरो। संसार दुखों से भरा पड़ा है। द वर्ल्ड इज फुल ऑफ सोरो। दूसरा दुख समुदय। इसका मतलब है एव्री सोरो हैज़ अ कॉज। यानी कि हर दुख का कोई ना कोई कारण है। दुख निरोध का मतलब है सोरो कैन बी स्टॉप्ड दुख को खत्म किया जा सकता है। यह हैं

1:30:29 चांसेस और दुख निरोधगामिनी प्रतिपदा का मतलब यह है पाथ लीडिंग टू द सी सेशन ऑफ सोरो। सीसेशन ऑफ सोरो। तो पाथ लीडिंग टू द सीसेशन ऑफ सोरो। यह एक ऐसी चर्चा है दुख निरोध गामिनी प्रतिपदा की जो कि बौद्ध धर्म के चार बेसिक चार नोबल ट्रुथ्स में आती है। बौद्ध धर्म से संबंधित एक और फैक्ट है दोस्तों। एक राजा हुआ करते थे। हिंद यूनानी शासक एक इंडोग्रीक किंग हुआ करते थे। एक हिंद यूनानी शासक उनका नाम था मिनांडर। नाम हुआ करता था दोस्तों

1:31:18 मिनांडर। और जब मिनांडर ने एक बार एक बौद्ध भिक्षु नागसेन के साथ अपनी चर्चा की तो इनके पूरे दिमाग का मिलिंद पानो हो गया। अब आप सोचें कि इनके

…

Share

YouTube Video Summaries