संक्षिप्त सारांश
यह वीडियो आसक्ति के खतरों और स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के गुणों पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि कैसे भोग-विलास में लिप्त व्यक्ति परमात्मा का भक्त नहीं हो सकता, और कैसे आसक्ति मनुष्य को विनाश की ओर ले जाती है। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की तुलना विशाल सागर से की गई है, जो सुख-दुख में विचलित नहीं होता।
- भोग-विलास में लिप्त व्यक्ति परमात्मा का भक्त नहीं हो सकता।
- आसक्ति मनुष्य को विनाश की ओर ले जाती है।
- स्थितप्रज्ञ व्यक्ति सुख-दुख में विचलित नहीं होता।
अर्जुन को बताया जा रहा है कि जो लोग बाहर से भक्ति का दिखावा करते हैं, लेकिन मन से सांसारिक विषयों में आसक्त रहते हैं, वे वास्तव में ढोंगी हैं। ऐसे लोगों को मिथ्याचारी कहा जाता है, क्योंकि उनका मन इंद्रियों के सुखों में डूबा रहता है। स्थितप्रज्ञ मनुष्य वह है जिसकी बुद्धि स्थिर रहती है और अपने मन पर नियंत्रण रखता है। उसे भोग और उपभोग में कोई आसक्ति नहीं होती, और वह शुभ-अशुभ वस्तुओं की प्राप्ति से विचलित नहीं होता। ऐसे महापुरुषों को ईश्वर पर विश्वास होता है और वे किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होते।
अर्जुन को बताया गया है कि भगवत कृपा के बिना कोई भी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। इसलिए, मनुष्य को अपने पुरुषार्थ के साथ-साथ प्रभु की भक्ति का भी आश्रय लेना चाहिए। परमात्मा की भक्ति करने से मन सात्विक हो जाता है और आसक्ति पूर्णतः समाप्त हो जाती है। यदि आसक्ति का नाश नहीं होता, तो मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है।
अर्जुन को बताया जा रहा है कि आसक्ति के कारण मनुष्य किसी भी विषय के आकर्षण और मोह में फंसकर सोते-जागते निरंतर उसी का चिंतन करता रहता है। जैसे कोई मनुष्य किसी सुंदर स्त्री के प्रेम में पड़ जाता है, जो जागते हुए उसी की कल्पना और सोते में उसी के सपने देखता है। इस प्रकार निरंतर चिंतन से आसक्ति की नीव पर काम की भावना उभरने लगती है। काम या वासना में थोड़ी भी रुकावट आने से क्रोध का आगमन हो जाता है।
अर्जुन को बताया गया है कि जहां क्रोध है, वहां समोह अथवा अ विचार अथवा अविवेक भी है। जिस प्रकार प्रचंड वायु के झोके से दीपक की ज्योति बुझ जाती है, उसी प्रकार काम जनित अविवेक की आंधी से मनुष्य की स्मृति नष्ट हो जाती है। जब स्मृति भ्रंश हो जाता है, तब बुद्धि नाश में कितना समय लगता है। चैतन्य का नाश होने पर जो दशा शरीर की होती है, ठीक वही दशा बुद्धि का नाश होने पर मनुष्य की हो जाती है। बुद्धि नाश के कारण मनुष्य का भी सर्वनाश होता है।
अर्जुन को बताया गया है कि आसक्ति सर्वनाश का मूल है। इसलिए, उन्हें निरास होने और स्थितप्रज्ञ होने के लिए कहा जा रहा है, क्योंकि स्थितप्रज्ञ की स्थिति निष्काम कर्मयोग की चरमा अवस्था है।
अर्जुन को स्थितप्रज्ञ का उदाहरण देकर समझाया जा रहा है। विशाल और अथाह सागर का स्वभाव स्थितप्रज्ञ मनुष्य की भांति होता है। नदी में यदि अधिक पानी आ जाए तो उस नदी में बाढ़ आ जाती है और उसकी तूफानी लहरें किनारों को तोड़कर चारों ओर तबाही मचा देती हैं। यह हाल एक छुद्र मन वाले व्यक्ति का होता है। थोड़ा सा धन थोड़ी सी सफलता उसे हजम नहीं होती और धन और सफलता के नशे में चूर वह मर्यादा तोड़कर एक ओछे इंसान की तरह हरकतें करने लगता है। परंतु स्थितप्रज्ञ मनुष्य एक सागर की भांति होता है।
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Transcript
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0:00 हे अर्जुन जो भोग विलास का भक्त होता है वह परमात्मा का भक्त कैसे हो सकता है ऐसे मनुष्य जो बाहर से भक्ति का प्रदर्शन करते हैं परंतु मन से विषयों के चिंतन और उनकी आसक्ति में लीन रहते हैं व भक्ति का केवल ढोंग करते हैं [प्रशंसा] [संगीत] वो योगी नहीं ढोंगी होते हैं इन्हें मिथ्या चारी कहते हैं विष विवर्तन निराहार देहि रस वर्ज रसो
0:45 पस परम दृष्ट वा निवत कर्मेंद्रियां याय आस्ते मनसा स्मरण इंद्रिया अथान विम आत्मा मिथ्या चारा स उच्च पार्थ स्थित प्रज्ञ मनुष्य की बुद्धि स्थिर रहती है अपने मन पर उसका नियंत्रण रहता है स्थित प्रज को भोग और उपभोग में रस आसक्ति नहीं होती व शुभ अशुभ वस्तुओं की प्राप्ति होने के बाद भी ना प्रसन्न होते हैं और ना दुखी होते हैं पार्थ ऐसे महापुरुषों को विश्वास होता है कि ईश्वर
1:32 सदा सर्वदा उनके साथ है इसलिए व किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होते यह कहना आसान है केशव साधारण मनुष्य के लिए इस मानसिक स्तर पर पहुंचना बहुत कठिन है इसके लिए सांसारिक मनुष्यों को किसी दवी सहायता की आवश्यकता होगी तुमने ठीक कहा अर्जुन भगवत कृपा के बिना कोई भी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता इसलिए मनुष्य को अपने पुरुषार्थ साथ साथ प्रभु की भक्ति का भी आश्रय लेना चाहिए हे अर्जुन परमात्मा की भक्ति करने से मन सात्विक हो जाता है और विष शक्ति पूर्णत समाप्त हो जाती है और यदि आसक्ति
2:18 का नाश नहीं हुआ तो आसक्ति का नाश नहीं हुआ तो मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है सर्वनाश हां पार्थ सर्वनाश हे अर्जुन आसक्ति के मारे हर मनुष्य किसी भी विषय के आकर्षण और मोह में फंसकर सोते जागते निरंतर उसी का चिंतन करते रहते [संगीत] [प्रशंसा] हैं जैसे कोई मनुष्य किसी सुंदर स्त्री के प्रेम में पड़ जाता है जो जागते हुए उसी की कल्पना और सोते में उसी के सपने देखता
3:04 है इस प्रकार निरंतर चिंतन से आसक्ति की नीव पर काम की भावना उभरने लगती [प्रशंसा] है काम या वासना में थोड़ी भी रुकावट आने से क्रोध का आगमन हो जाता [संगीत] [प्रशंसा] है जहां क्रोध है वहां समोह अथवा अ विचार अथवा अविवेक भी है जिस प्रकार प्रचंड वायु के झोके से दीपक की ज्योति बुझ जाती है इसी प्रकार काम जनित अविवेक की आंधी से
3:55 मनुष्य की स्मृति नष्ट हो जाती है और जब स्मृति भ्रंश हो जाता है तब बुद्धि नाश में कितना समय लगता है [संगीत] पार्थ चैतन्य का नाश होने पर जो दशा शरीर की होती है ठीक वही दशा बुद्धि का नाश होने पर मनुष्य की हो जाती है बुद्धि नाश के कारण मनुष्य का भी सर्वनाश होता है [संगीत] ध्यायतो विषन पुनस संगस तेश उप जायते संगत
4:42 सं जायते काम कामात क्रोधा अभि जायते क्रोधात भवति समोह सम महात स्मृति विभ्रम स्मित बुद्धि नाश बुद्धि नाशा प्रति वाह कितनी महत्त्वपूर्ण बात कही है प्रभु ने इसका अर्थ केशव आसक्ति सर्वनाश का मूल है हा अर्जुन इसलिए तो मैं तुम्ह निरास होने को कह रहा हूं स्थित प्रज्ञ होने को कह रहा हूं क्योंकि स्थित प्रज्ञ की स्थिति निष्काम कर्मयोग की चरमा अवस्था है हे केशव कृपया स्थित प्रज्ञ का कोई स्पष्ट उदाहरण देकर समझाओ
5:30 अर्जुन विशाल और अथाह सागर का स्वभाव स्थित प्रज्ञ मनुष्य की भाती होता है हे पार्थ नदी में यदि अधिक पानी आ जाए तो उस नदी में बाढ आ जाती है उसकी तूफानी लहरें किनारों को तोड़कर चारों ओर तबाही मचा देती है यह हाल एक छुद्र मन वाले व्यक्ति का होता है थोड़ा सा धन थोड़ी सी सफलता उसे हजम नहीं होती और धन और सफलता के नशे में चूर वह मर्यादा तोड़कर एक ओछे इंसान की तरह हरकतें करने लगता [प्रशंसा]
6:22 है परंतु स्थित प्रज्ञ मनुष्य एक सागर की भाति होता है m