तुम भेड़ नहीं हो, फिर भीड़ के पीछे क्यों? || आचार्य प्रशांत (2023)

संक्षिप्त सारांश

इस वीडियो में आचार्य प्रशांत ने लोगों की भीड़ का अनुसरण करने के प्रति सतर्कता बरतने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने बताया कि कैसे अहंकार भीड़ से जूड़ा होता है और व्यक्ति की व्यक्तिगत दृष्टि को कमजोर करता है। वीडियो में "The Country Of The Blind" नामक कहानी का संदर्भ देकर उन्होंने यह स्पष्ट किया कि दृष्टि प्राप्त करना और अपनी स्वतंत्रता के लिए संकल्प लेना महत्वपूर्ण है।

  • भीड़ का अनुसरण करना जीवन की संजीवनी नहीं है।
  • सत्य और ज्ञान की पहचान की महत्वपूर्णता पर बल दिया गया है।
  • "The Country Of The Blind" की कहानी के माध्यम से अंधकार और प्रकाश की तुलना की गई है।

Intro

वीडियो की शुरुआत में, आचार्य प्रशांत ने यह स्पष्ट किया कि लोगों को तय करना होगा कि वे भीड़ के साथ चलकर अपनी आंखें कुर्बान करेंगे या अस्तित्व का इंद्रधनुष देखेंगे। वे बताते हैं कि कभी कोई भी ऐसा नहीं हुआ है, जो भीड़ का अनुसरण करते हुए वास्तव में सुख, चैन और आनंद प्राप्त कर पाया हो। उन्होंने बताया कि यह केवल एक औसत जीवन ही देगा, जिसमें कोई वास्तविकता नहीं होती।

अहंकार भीड़ की खुराक से ज़िंदा रहता है (कहानी के द्वारा विश्लेषण)

आचार्य प्रशांत ने बताया कि अहंकार भीड़ के जरिए ही जीवित रहता है। उन्होंने बताया कि जब व्यक्ति अपनी चेतना से निर्णय नहीं लेता है और दूसरों की सहमति पर निर्भर रहता है, तो इसका अर्थ है कि उसके भीतर एक खाली अहंकार है। उन्होंने आज की समाज की प्रवृत्तियों की आलोचना की और बताया कि व्यक्ति को अपनी आत्मा और दृष्टि को पहचानना चाहिए, न कि दूसरों की अंधी दृष्टि को अपनाना चाहिए।

हमें सत्य पसंद नहीं होता है (कहानी के द्वारा विश्लेषण)

इस खंड में, आचार्य ने चर्चा की कि कैसे लोग अक्सर सत्य को पसंद नहीं करते और अंधकार में जीना अधिक सरल मानते हैं। उन्होंने उदाहरण के तौर पर बताया कि कैसे अंधा समाज अपनी सीमाओं में रहकर एक प्रकार की व्यवस्था बना लेता है और सत्य को भूल जाता है। इसके साथ ही, उन्होंने व्यक्तिगत अनुभव और वास्तविकता की अनदेखी करने की प्रवृत्ति को भी उजागर किया।

‘The Country Of The Blind’ किताब से कुछ बातें

आचार्य प्रशांत ने HG वेल्स की किताब "The Country Of The Blind" की कहानी का सार प्रस्तुत किया। कहानी में, एक घाटी में लोग धीरे-धीरे अंधे हो जाते हैं और वे यह भूल जाते हैं कि दृष्टि क्या होती है। जब एक दृष्टिहीन व्यक्ति वहाँ आता है, तो उसे उनकी अंधी व्यवस्था में स्वीकार नहीं किया जाता क्योंकि उसे अपनी दृष्टि का ज्ञान है। यह कहानी यह दर्शाती है कि जो भीड़ का अनुसरण करते हैं, वे अक्सर अपंग होते हैं।

मंज़िल कैसे मिल सकती है?

आचार्य प्रशांत ने बताया कि मंजिल पाना तब संभव है जब व्यक्ति अपनी आंखें खोने के बजाय सत्य की ओर बढ़े। उन्होंने चेताया कि यदि कोई व्यक्ति अंधों की भीड़ में शामिल होता है, तो उसे केवल दुख प्राप्त होगा जबकि जिसने एक बार प्रकाश को देख लिया, वह अपनी आंखें खोने के लिए राजी नहीं होगा। इस खंड में उन्होंने यह बात दोहराई कि अपनी मौलिक दृष्टि को बनाए रखना और भीड़ का अनुसरण नहीं करना चाहिए।

समापन

वीडियो के अंत में, आचार्य प्रशांत ने दर्शकों को प्रेरित किया कि वे अपनी स्वाधीनता और आत्मा की पहचान को बनाए रखें। उन्होंने समझाया कि एक बार जब किसी ने सत्य और ज्ञान का अनुभव कर लिया, तो उसे अंधेरे में लौटना नहीं चाहिए। उन्होंने इस विचार को मजबूती से रखा कि अंधकार में जीने वाले लोगों से अलग रहना और अपने मार्ग पर चलना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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Transcript

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0:00 तो यह तो आपको तय करना है कि भीड़ के साथ चलकर आपको अपनी आंखें कुर्बान करनी है या आपको अस्तित्व का इंद्रधनुष देखना है आज तक ऐसा हुआ भी नहीं है कि कोई भीड़ के साथ चलता हो वही सब कराओ जो सब कर रहे हैं और जिंदगी में उसको सुख चैन आनंद कुछ भी मिल गया हो ऐसा तो कोई आज तक प्रमाण नहीं है भीड़ में क्या है कुछ नहीं ऐसे ही है उपद्रव जैसे नेताओं की रैलियां होती है उसे भीड़ आ जाती हैं ट्रैक्टर ट्रॉली बस में बैठ बैठ के क्या उनकी योग्यता होती है क्या उनकी गुणवत्ता होती है वैसी होती है उनको बोल दिया गया पाच पाच रुप देक नारे लगाओ नारे लगा दिए ऐसी होती है नमस्कार आचार्य जी जी क हम संसार का अनुसरण करते हुए चलते हैं जो सब कर रहे हैं भीड़ में जो चल रहा

0:45 है हम उसके पीछे चलना चाहते हैं क्योंकि उसमें ही सुरक्षा की गारंटी है और पूरे जीवन में अपना कोई भी निर्णय हम अपनी चेतना से लेना नहीं चाहते अपनी स्वतंत्र चेतना से नहीं ले चाहते जबक हमारे पास वो विकल्प होता है कि हम उसका प्रयोग करें पर पूरा जीवन हम नहीं कर पाते हैं तो यह जो भीड़ के पीछे चलने की प्रवृत्ति है वो भी आचार्य जी आसक्ति का एक कारण है ऐसा है आपने वैसे बताया आचार्य जी वो तो देखिए अहंकार भीड़ से ही बना है ना जी अहंकार तो भीड़ की ही खुराक पर जिंदा रहता है ना

1:31 मैं भाव तो चलिए देह से आ गया पर वो अकेले क्या करेगा मैं तो अधूरा है तो वह भीड़ में कहीं ना कहीं तो सारा दिन जिंदगी भर खोजते ही रहता है इसको पकड़ेगा उसको पकड़ेगा उसी भीड़ से उसको जो खुराक मिली है उससे वह अपने आप को किसी तरह से जिंदा रखता है तो अगर जिंदगी में यह लक्षण मौजूद है कि भीड़ बहुत आवश्यक है दूसरों की सलाह या सहमति के बिना कुछ कर नहीं सकते बार-बार देखते हैं कि जनता का रुझान किधर को है ट्रेंड को फॉलो करना है यह सब अगर कर रहे हैं तो यह तो भीतर एक एकदम चूरा चूरा सा अहंकार है उसी का द्योतक होता है

2:17 ना आत्मा की तो पहचान यह है कि उसकी अपनी आंखें होती हैं आत्मा की है ना वो साफ देख सकती है हां और अहंकार ऐसा होता है जैसे कि इतने सारे लोगों से पूछ पूछ के किसी तरह रास्ता लेना है और जब इनसे पूछ रहा है मजेदार बात क्या है वो भी सब अंधे हैं तो अंधा अंधे ठेलिया दोनों कप पंत हम अंधा अंधे ठेलिया दोनों कप पंत कंट्री ऑफ द ब्लाइंड है एचजी वेल्स की तो उसमें यही होता है एक एक एक एक घाटी में कुछ पहाड़ों के बीच एक घाटी

3:06 में कुछ लोग बसते हैं जिन पर कोई बीमारी लग गई होती है और उस बीमारी से उनकी आंखें जाती रही है और यह काम जो है यह धीरे-धीरे हुआ है कई कई शताब्दियों में और वह लोग जो है वह शेष दुनिया से संपर्क में नहीं थे तो एक दिन में ऐसी कोई घटना घटती तो म जाता सब अंधे हो गए पर वो लोग धीरे-धीरे करके अंधे हुए और पीढ़ी दर पीढ़ी वो फिर इस बात को भूलते गए कि दृष्टि जैसी कोई चीज होती है व अंधे ही हो गए और फिर उन्होंने ऐसी व्यवस्थाएं विकसित कर ली जिससे अंधे होते हुए भी उनका काम चलता रहे

3:51 जी उनके घरों में कोई खिड़कियां नहीं होती थी उनके यहां पर जितने मोड़ होते थे वह सब 90 अंश पर होते थे और बहुत सारी इस तरह की उन्होंने चीजें बना ली कि हमारा काम चलता रहेगा और फिर भूल ही गए कि वो अंधे हैं वो एक अनुवांशिक चीज थी जिसमें कि अगर मां-बाप अंधे हैं तो बेटा भी अंधे ही पैदा हो रहा था बच्चा तो वह भूल ही गए कि वो अंधे हैं और फिर कहानी आगे बढ़ती है कि एक दिन वहां पर एक आंख वाला आदमी आ जाता है अगर मुझे सही याद है तो उसका नाम था नुनेज तो व वहां आ जाता है तो वह उसको

4:39 पकड़ लेते हैं व उसको पकड़ लेते हैं और बोलते हैं कि तू यहां नाया आया है हम तुझे रास्ता दिखाएंगे तो उनको बोलता है आंख मेरे पास है तुम दोनों अंधे हो आंख मेरे पास तुम दोनों अ तुम दोनों मुझे रास्ता दिखाओगे बोलते हैं पागल आंख जैसा कुछ होता ही नहीं और दोनों उस कि एक-एक बांह पकड़ लेते हैं और उसको खींचने लगते हैं बड़ी हैरत होती है वो कहते है मैंने सुना था कि अंधों के शहर में काना भी राजा होता है और मेरे तो दोदो आंख है और राजा तो छोड़ दो ये मुझे खींच के लिए जा रहे हैं कैदी बना के माने वो पुरानी कहावत गलत है कि अंधों में काना राजा होता है अंधों में काना राजा बिल्कुल भी नहीं हो सकता अंधों में जो सबसे बड़ा अंधा होगा

5:25 वो राजा होगा जी तो हम जिसको कहते हैं ना कि इसको कहते हैं वही लोक सत्य कोलोक अल विजडम वगैरह वो बहुत बेकार की बात है य अच्छे समझ लीजिएगा अंधों में अगर आप काने है तो पीटे जाएंगे और अंधों में अगर आप दोनों आंख वाले हैं तो मारे जाएंगे जी अंधों में राजा बनेगा जो सबसे भयानक अंधा होगा विक्षिप्त जो एकदम अंधा होगा वो उनमें राजा बनेगा तो उसको घसीट के ले जाते हैं और वो बार-बार यही बोल रहा है भाई मुझे दिख रहा है दिख रहा है वो बोलते हैं इसका दिमाग खराब है और इसकी दिमागी खराबी का जो कारण है वो ये जो दो इसके यहां फोड़े हो गए हैं और जो फोड़े हैं ये इसके मस्तिष्क के

6:13 बिल्कुल पास है तो इस कारण इसकी जो सोचने समझने की शक्ति है वो बाधित हो रही है तोय फोड़े निकाल दो तो ये ठीक हो जाएगा हम लोगों को देखो हमारे तो ये तो है ही नहीं ट्यूमर बीमारी तो हम लोग बिल्कुल ठीक है ये जो आया है ना इसके है और ये ऐसे ऐसे गुल गुल गुल गुल गुलगल लगभग पकपक चलता रहता है इसका और यह फोड़े नाचते रहते हैं इसके उसी से इसका दिमाग जो है वह नाचता रहता है तो किसी तरीके से कहता है कि नहीं नहीं कुछ कुछ करके वोह उनसे समझौता करता कहता है मैं कोई बिल्कुल विक्षित बात नहीं करूंगा मैं हां पागल हो गया था मुझे नशा हो गया था रंग जैसा कुछ होता ही नहीं हम रंग कुछ नहीं होता रूप कुछ नहीं होता आंख कुछ नहीं होती तो बोलते हैं अब इसका

6:58 दिमाग जो है ठीक हुआ तो उसको सुधार ग्रह में डाल देते हैं जेल जैसी चीज में कहते तू यहां रह तो यर फिर तू पूरी तरह ठीक हो जाएगा फिर हम झे अपनों में शामिल कर लेंगे बोलता हां महाराज मैं तो तो उसको रख लेते हैं तो वहां पर एक लड़की आती है उसके पास तो उस लड़की से प्रेम हो जाता है प्रेम माने जो भी तो दोनों में हो जाता है तो लड़की तो वही है अंधों के शहर की है कंट्री ऑफ द ब्लाइंड की तो जब दोनों में प्रेम हो जाता है तो फिर बात शादी तक तो पहुंचेगी पहुंचेगी तो एक शर्त रख देती

7:46 है बोलती देखो कर लेते हैं और इतने ही नहीं मैं यहां के बड़े राजा या मंत्री की बेटी हूं ब्याह कर लोगे तो मैं भी तुमको भी ऊंची जगह दिलवा दूंगी बस मेरी एक शर्त आदमी तुम बहुत बढ़िया हो लेकिन जो लपक झपक करते रहते हो ना यह तुमने पता नहीं कहां से सीख लिया है इससे मुझे बेचैनी होती है तो अपनी जो लपक झपक है यह हटवा दो तो वह भी आशिक हो गया बिल्कुल गिरफ्तार जो नहीं करना चाहिए वह भी कर डालता है तो मान जाता है बोलता है ठीक है बोलता है क्या है एक तो अपनी महबूबा है यह भी मिलेगी दूसरे यहां पर बढ़िया सा सम्मान मिलेगा कोई पदवी मिलेगी

8:32 निकलवा ही देते हैं इतने लोग अंधे होकर मस्त जी रहे तो हम भी तो अंधे होकर जी सकते हैं अहंकार का तर्क होता है जब भीड़ में सब अंधे हैं तो हम ही इतने खास है कि आंख रखेंगे जब सब अंधे होकर मौज में जी रहे हैं और यह तर्क तो आपको चारों और सुनने को मिलेगा जैसे ही आप में थोड़ी दृष्टि आने लगेगी यह अपने आप को बहुत स्पेशल समझती है आय हाय चार क्या कर लिए इन्होंने श्लोक गीता के जब देखो तब ज्ञान देती रहती है हम सब तो बेवकूफ हैं यही एक बुद्धिमान आई है य सुनने को मिल रहा है नहीं मिल रहा है अभी शुरू हुआ कि नहीं बधाई हो इन्हीं को इन्हीं को सारी बुद्धि दे दी है भगवान ने हम तो पागल ही है 60 साल की हमारी उम्र हमारा सारा अनुभव व्यर्थ

9:20 तो कहता है भाई सबका चल रहा है तो मेरा भी चल जाएगा यही तर्क तो फिर एक दिन उनका जो सबसे खास राजवैद्य होता है वह बुलाया जाता है कि इसकी बीमारी का इलाज करना है और इलाज के बाद अब इसकी शादी कर दी जाएगी और इसको भी मंत्री मंत्री बना देंगे जो भी है तो यह सुबह उठता है आज इसकी आंखें निकालने का काम है तो य सुबह उठता है तो देखता है बाहर इसको इंद्र धनुष दिखाई देता है इसको उगता सूरज दिखाई देता है इसको पेड़ पौधे फूल तितलियां दिखाई देते हैं इतने में लोग आ जाते हैं बोलते चल भाई

10:09 बोलता हां चल ही रहा हूं अब तो मैं दामाद हूं तुम्हारा तोत भी इसको थोड़ा सम्मान से ले जाते हैं बिना हाथ हाथ पकड़े ये भागता है भागता है भागता है इतनी जोर से भागता है कि पहाड़ फंद के भागी जाता है कहते हैं इस कहानी के दो अंत है एक अल्टरनेट एंडिंग भी अल्टरनेट एंडिंग यही है जिसमें य जाता है और अपनी आंखें निकलवा भी देता है यह तो आपको तय करना है कि भीड़ के साथ चल आपको अपनी आंखें कुर्बान करनी है या आपको अस्तित्व का इंद्रधनुष देखना है और उगता हुआ सूरज यह तो आपको देखना है जिन्ह सूर्योदय

10:55 के दर्शन करने हो वह भीड़ का अनुगमन नहीं कर सकते किस सूर्य की बात कर रहे हैं महात्मा को सूर्य की उपाधि भी दी गई है ऋग्वेद में आदित्य सूर्य बहुत बड़े देवता है और प्रकाश को तो हमेशा ज्ञान की उपमा के रूप में प्रयुक्त किया गया है तो जिनको जिंदगी में सूर्योदय चाहिए वह तो भीड़ के पीछे चल नहीं सकते और आज तक ऐसा हुआ भी नहीं है कि कोई भीड़ के साथ चलता हो वही सब कराओ जो सब कर रहे हैं और जिंदगी में उसको सुख चैन आनंद कुछ भी मिल गया हो ऐसा तो कोई आज तक प्रमाण नहीं है भीड़ के साथ चलकर तो वही

11:41 मिलेगा जैसे भीड़ है और भीड़ कैसी होगी भीड़ की तो परिभाषा यही है कि व एक औसत इकाई होगी ना भीड़ माने बहुत बड़ा सैंपल तो वह तो हमेशा एवरेज ही होगा परिभाषा ही यही है तो एक औसत जिंदगी चाहिए जैसे सब चला रहे हैं तो आप भी अपना भीड़ वाला कार्यक्रम करिए और भीड़ में आपको खींच लेने के तरीके बहुत होते हैं एक तो तरीका यह था कि पकड़ लिया गया तो यह भय का तरीका था उसको सिपाहियों ने पकड़ लिया यह भय का तरीका है उसको जेल में डाल दिया यह दंड का तरीका है फिर बोला गया कि तुझे तू अगर मान ले कि

12:27 तेरी आंखें गड़बड़ है तो हम तुझे यहां पर हां कोई पद दे देंगे यह लोभ का तरीका है और लड़की आके बोल रही है कि मैं तुम्हारी हो जाऊंगी बस तुम आंखें निकलवा दो यह वासना का तरीका है तोय इतने तरीके होते हैं जो हम पर लगाए जाते हैं और इन तरीकों के सामने हम कभी ना कभी घुटने टेक ही देते हैं घुटने टेक देते हैं आंखें गवा देते हैं फिर अंधा अंधे ठेलिया समझ में आ रही है बात लेकिन एक बात अच्छे से समझ लीजिएगा वो सब जो वहां लोग थे ना कंट्री ऑफ द ब्लाइंड में उनको अपनी जिंदगी जीने में शायद कोई दुख ना होता हो लेकिन

13:13 यह व्यक्ति जिसको प्रकाश का दर्शन हो चुका था जो जिंदगी में एक बार जान चुका था कि सच्चाई कहते किसको हैं जिसको रोशनी की झलक मिल चुकी थी यह व्यक्ति अब अगर उस भीड़ का हिस्सा बनेगा तो यह उम्र भर तड़पेगा आप कृष्ण के पास आ गए हैं आप अष्टावक्र के समक्ष खड़े हो गए हैं अब अगर आप भीड़ के पास गए तो आपको बड़ी सजा मिलेगी अब लौट के मत जाइएगा जिन चमगादड़ ने अपनी काली गुफा के आगे प्रकाश कभी देखा ही नहीं उनको उनके अंधेरे मुबारक पर इंद्रधनुष के नीचे नाचती हुई

14:00 तितलियां इनको अब किसी अंधी गुफा में डालोगे तो बेचारी कैसे जी पाएंगी तो जिसने एक बार प्रकाश देख लिया प्रकाश से हमारा क्या आशय है सत्य ज्ञान जिसने एक बार ज्ञान चख लिया वह अब कभी यह समझौता ना करे कि मुझे भी अब भीड़ के साथ जाना है चाहे आपको जितना लालच दिया जाए या जितना धमकाया जाए कोई बात नहीं सब सह लेंगे लेकिन अब य आंखें नहीं छोड़ सकते मैं आप लोगों के लिए मुसीबतें बढ़ा रहा हूं आप लोगों के लिए लौटना बिल्कुल मुश्किल कर रहा

14:47 हूं आप मेरी तरफ बढ़ रहे हैं मैं पीछे से जाकर आपके लौटने के रास्ते बंद कर रहा हूं लेकिन लौट आप अभी भी सकते हैं लौटेंगे तो बहुत दुख पाएंगे क्यों लौटना है ननेस जैसी नादानी करनी है क्या कैसा पागलपन है ना जिसको कुछ नहीं पता वह फंसा हुआ है दुनियादारी में भीड़ के चाल चलन में उसकी माफी हो सकती है पर आपको तो अब दिन प्रतिदिन बहुत कुछ पता चलता जा रहा है ना तो आप मत आइएगा यह सब जो भी है दुनियादारी सामाजिकता भीड़ भाड़ इनके चक में बताइएगा

15:32 अपनी मौलिक दृष्टि रखिए अपनी चेतना के अनुसार जिए आपके पास सारी सामर्थ है अपनी आंख है अपनी तना है अपनी बुद्धि है अपने पाव है यह रास्ता अपने पाव पर तय करें और अपने हिसा से जब चलेंगे ना अपने हिसाब से मेरा आशय है आत्मा यहां पर मैं मै से ले रहा हूं आत्मा उसके हिसाब से चलेंगे सिर्फ तभी मंजिल मिलती है जिसके लिए जन्मे है भीड़ में क्या है कुछ नहीं ऐसे ही है उपद्रव जैसे नेताओं की रैलियां होती है भीड़ आ जाती है ट्रैक्टर ट्रॉली बस में बैठ बैठ के क्या उनकी योग्यता होती

16:20 है क्या उनकी गुणवत्ता होती है वैसी होती है भीड़ उनको बोल दिया गया पां पाच रुप देके नारे लगाओ नारे लगा दिए ऐसी होती है भीड़ अगली बार नारे बदल दो तो वो बदला हुआ नारा भी लगा देंगे कोई मालिक है वह तय कर रहा है क्या बोलना है अभी यह बोलना यह बोलना है कोई कंसिस्टेंसी नहीं कोई कोई समरसता नहीं कोई लयबद्ध नहीं कोई ईमानदारी नहीं सब टुकड़े टुकड़े बिखरे बिखरे कोई गरिमा नहीं

17:14 धन्यवाद आचार्य जी आपने बहुत अच्छे से समझाया विषय को सर आचार्य जी और मैं आपके आदर्श पर चलती रहूंगी जिस रास्ते को ज्ञान के रास्ते को सत्य और मुक्ति के रास्ते को मैं खोज रही थी जी वो यही आकर मुझे मिला है और मैं इस रास्ते को कभी नहीं छोड़ सकती हूं स्वागत धन्यवाद आचार्य आभार जी धन्यवाद [संगीत]

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