वेदांत के मूल तत्व || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2022)

संक्षिप्त सारांश

इस वीडियो में आत्मा, अहंकार, धर्म और ब्रह्म के तत्वों पर गहराई से चर्चा की गई है। गीता के कुछ महत्वपूर्ण श्लोकों का विश्लेषण करते हुए बताया गया है कि आत्मा अमर है और उसके वध का कोई प्रश्न नहीं है। इसके अलावा, धर्म की सच्ची परिभाषा और उसकी महत्वता को भी उजागर किया गया है। अंत में, स्वाभाविकता के माध्यम से अस्तित्व और प्रेम के संबंध भी परिभाषित किए गए हैं।

  • आत्मा अविनाशी और सत्य है।
  • धर्म का असली अर्थ अहंकार को आत्मा की ओर ले जाना है।

गर्भाधान

वीडियो का प्रारंभ संगीत के साथ होता है। फिर भगवत गीता के दूसरे अध्याय का जिक्र करते हुए बताया जाता है कि आत्मा अमर और अविनाशी है। कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जो आत्मा को जानता है, वह वध नहीं करने का कोई मतलब नहीं समझता है। यहां कन्फ्यूजन का समाधान भी किया गया है कि कैसे धार्मिकता का असली अभिप्राय अहंकार का अंत करते हुए आत्मा की ओर बढ़ना है।

गीता अध्याय 2.21

इस अध्याय में आत्मा के अमर और अविनाशी होने के बारे में विस्तार से चर्चा की गई है। कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि आत्मा नित्य है और जन्म-मृत्यु के चक्र से परे है। यह ज्ञान जीवन में एक प्रमुख भूमिका निभाता है, क्योंकि यह व्यक्ति को सही दृष्टिकोण में लाता है।

आत्मा, सत्य और ब्रह्म

यहां बताया गया है कि आत्मा ही सत्य है और ब्रह्म का भी यही अर्थ है। आत्मा और दुनिया के बीच में एक गहरे संबंध को स्थापित किया गया है। अहंकार और आत्मा का भेद स्पष्ट करते हुए बताया गया है कि कैसे अहंकार हमारी पहचान बन जाता है और हमें बाहरी प्रकृति से जोड़ता है।

धर्म की परिभाषा

धर्म का असली अर्थ समझाया गया है, जिसमें कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन को धर्म का पालन करने के लिए जगाने की कोशिश की गई है। ध्यान दिया गया है कि धर्म का अर्थ केवल रीति-रिवाज नहीं है, बल्कि यह आत्मा की ओर बढ़ाने वाला मार्ग है।

आत्मा और अहंकार का संबंध

यह खंड आत्मा और अहंकार के बीच के जटिल संबंध को छूता है। बताया गया है कि अहंकार हमें बाह्य संसार में बांधता है, जबकि आत्मा हमारी सच्ची पहचान है। यह मुख्यतः आत्मा के ध्यान की आवश्यकता पर जोर देता है।

आत्मा की पहचान

अध्याय में आत्मा की पहचान को स्पष्ट करने पर जोर दिया गया है। कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि आत्मा सर्वथा असंग और असंपृष्ट है, और इसे बाहरी तत्वों से प्रभावित किया जाना लगभग असंभव है।

धर्म और आत्मा का संबंध

यहां धर्म और आत्मा के बीच गहरे संबंध को समझाया गया है। धर्म का असली अभिप्राय आत्मा के मार्ग पर चलना है। इस संबंध में स्वतंत्रता का भी उल्लेख किया गया है।

प्रकृति का खेल और आत्मा

इस खंड में कहा गया है कि आत्मा प्रकृति के खेल से परे है। प्रकृति की उपस्थिति केवल भ्रम की स्थिति है, जबकि आत्मा का असली स्वरूप अज्ञेय और स्थिर है।

गीता अध्याय 2.22 और 2.23

इस श्लोक में प्रतीकात्मक रूप में दर्शाया गया है कि आत्मा न तो जन्म लेती है और न ही मरती है। यथार्थ में आत्मा की स्थिति सिर्फ "है" होने के रूप में है।

आत्मा की अविनाशिता (Indestructibility)

इस अध्याय में आत्मा की अविनाशिता पर जोर दिया गया है। कृष्ण बताते हैं कि आत्मा को किसी भी प्रकार से समाप्त नहीं किया जा सकता है, यह हमेशा विद्यमान रहती है।

आत्मा और शरीर का संबंध

यहां आत्मा और शरीर के संबंध को स्पष्ट किया गया है। शरीर की मृत्यु आत्मा को प्रभावित नहीं करती, क्योंकि आत्मा शाश्वत है। यह स्पष्ट किया गया है कि आत्मा का उद्देश्य केवल सर्वश्रेष्ठता की ओर बढ़ना है।

संसार और आत्मा का दृष्टिकोण

इस खंड में संसार और आत्मा के दृष्टिकोण का विश्लेषण किया गया है। बताया गया है कि संसार एक अस्थायी स्थान है, जबकि आत्मा निरंतरता का प्रतीक है।

प्रकृति और प्रेम

प्रकृति के खेल में प्रेम का उल्लेख किया गया है। प्रेम का व्यक्ति के जीवन में एक अद्भुत महत्व है, और यह आत्मा की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।

आत्मा का शाश्वत स्वरूप

यहाँ आत्मा के निरंतर और शाश्वत स्वरूप पर चर्चा की गई है। आत्मा के अंतर्निहित बोध को महत्वपूर्ण बताया गया है, जिसमें ज्ञान और सत्य की गहराई को समझने पर जोर दिया गया है।

गीता अध्याय 2.24

इस अध्याय में कृष्ण द्वारा आत्मा के अमर और नष्ट न होने की सत्यता को प्रकट किया गया है। यहां शस्त्रों का शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, यह दर्शाता है कि आत्मा स्वयं संरक्षित है।

अहमवृति और पुनर्जन्म

अहमवृति को समझाते हुए कहा गया है कि यह केवल अनुभव का आधार है। पुनर्जन्म का संदर्भ आत्मा के अदृश्य संबंधों पर जोर देता है, जो शरीर से परे है।

अहम की यात्रा

अहम की यात्रा को आत्मा की ओर बढ़ने का एक माध्यम बताया गया है। अहम केवल एक बिंदु है जो आत्मा की ओर अग्रसर होने की दिशा में जाना चाहता है।

सूक्ष्म और स्थूल शरीर

इस खंड में सूक्ष्म और स्थूल शरीर के बीच के संबंधों पर चर्चा की गई है। यह स्पष्ट किया गया है कि कैसे संकेन्द्रित होना आवश्यक है ताकि आत्मा की ओर प्रगति की जा सके।

प्रकृति और लिप्तता

प्रकृति से जुड़े रहना केवल भ्रम पैदा करता है। यहां बताया गया है कि कैसे लिप्तता हमें आत्मा से दूर ले जा सकती है।

शरीर और चेतना

शरीर और चेतना की चर्चा में बताया गया है कि कैसे शरीर हमारी चेतना को प्रभावित करता है और हमें वास्तविकता से विमुख कर सकता है।

अहम की सही दिशा

इस खंड में अहम को सही दिशा में बढ़ाने की आवश्यकता को बताया गया है। ज्ञान और आत्मा की ओर बढ़ने की स्पष्टता आवश्यक है।

चेतना और संसार

चेतना और संसार के संबंध पर चर्चा करते हुए, यह बताया गया है कि कैसे चेतना हमें सही मार्ग पर ले जाती है और संसार के भ्रम से मुक्त करती है।

आत्मस्थ जीवन और श्रद्धा

आत्मस्थ जीवन की आवश्यकता और श्रद्धा का महत्व इस खंड में समझाया गया है। जब हम आत्मा के प्रति श्रद्धा रखते हैं, तब हम आत्मस्थ होते हैं।

समापन

इस खंड में वीडियो का समापन किया गया है, जिसमें आत्मा, धर्म और अहम के संबंधों की संक्षिप्त समीक्षा की गई है और इसके महत्व को दर्शाया गया है।

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Transcript

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0:00 [संगीत] भगवत गीता दूसरा अध्याय सांख्य 21वा श्लोक जो इस आत्मा को अविनाशी नित त्रिकाल में परिणाम शून्य जन्म रहित क्षय शून्य जानता है हे पार्थ वह व्यक्ति किस प्रकार किसका वध कराता है, किसका वध करता है। यह श्लोक और इसके पश्चात तीन चार और श्लोक भगवत गीता के सबसे महत्वपूर्ण और सबसे दुरुपयुक्त श्लोकों

0:48 में से आम भारतीय के जीवन दर्शन में इन श्लोकों की बड़ी आधारभूत भूमिका है। हम जीवन को कैसे देखते हैं? हम संसार को कैसे देखते हैं? वो लगभग पूरी तरीके से इनहीं कुछ श्लोकों से आता है। और भारत का सनातन धर्म का ये बड़ा दुर्भाग्य रहा है कि हमने इन्हीं श्लोकों की बड़ी अनुचित व्याख्या कर ली है। तो हम पूरा ध्यान देंगे। देखिए दो तत्व है बस दो ही तत्व है। ठीक? उन दो

1:37 तत्वों में भी एक तत्व दूसरे का विवर्तन मात्र है या माया मात्र है। इसीलिए उसके होने को ना होने के बराबर गिना जा सकता है। तो ले देकर कितना तत्व बचा? एक और यदि सिर्फ एक ही हो किसी दूसरे के अभाव में द्वितीय नास्तिक तो उस एक की भी कोई सत्ता बचती नहीं। किसी भी संख्या को अर्थ पूर्ण होने के लिए दूसरी संख्याओं की जरूरत पड़ती है। यदि उस एक के अलावा और कोई हो ही

2:24 ना संख्या में अभिव्यक्त होने के लिए तो वो एक भी रह नहीं जाता। इसको अद्वैत कहते हैं। ये एक कौन है जिसकी हम बात कर रहे हैं? आत्मा जो एकमात्र सत्य है जिसको ब्रह्म भी कहते हैं। आत्मा सत्य ब्रह्म एक ही है। उसी को आप परमात्मा भी कह सकते हैं। हालांकि परमात्मा कहना बिल्कुल अनावश्यक है। आत्मा कहना पर्याप्त है। आत्मा ही अपने आप में परम है। तो परम आत्मा जैसा क्या? कुछ भी नहीं। आत्मा है और प्रकृति है। प्रकृति का ही एक तत्व है

3:13 अहंकार और साधक के लिए या जिज्ञासु के लिए वही तत्व व्यक्तिगत रुचि का होता है क्योंकि वही हमें पीड़ा दे रहा होता है। तो हम आत्मा और प्रकृति कहने की जगह कई बार आत्मा और अहंकार भी कहेंगे वो एक ही बात होगी। यह जो अहंकार है यह प्रकृति का ही एक तत्व है और हमारे लिए ज्यादा रुचि का है क्योंकि हमको पीड़ा यह बाहरी प्रकृति बाद में देती है। आंतरिक अहंकार पहले देता है। तो ये दो तत्व है जिसको हम कभी कह देंगे आत्मा और प्रकृति या आत्मा और संसार और कभी कह देंगे आत्मा और अहंकार। ठीक? हम इन श्लोकों में प्रवेश करने जा रहे हैं। उससे पहले हम थोड़ा सा

3:58 बुनियाद खड़ी करना चाहते हैं। कृष्ण समझा रहे हैं अर्जुन को कि देखो धर्म क्या है? अब धर्म किसके लिए है? सबसे पहले तो ये वेदांत में ये बड़ा मूलभूत प्रश्न होता है। क्या किसके लिए? किसके लिए? किसका? कौन अनुभक्ता है? कौन बात कर रहा है? विचार किसको उठ रहा है? किससे कहा जा रहा है? फॉर हुूम? तो अर्जुन को धर्म सिखाना चाहते हैं कृष्ण। कृष्ण यहां अभी किसका प्रतिनिधित्व कर रहे हैं? हमने कहा दो हैं। उन दो में कृष्ण किसके प्रतिनिधि? आत्मा। अर्जुन किसके प्रतिनिधि? अहंकार के। तो धर्म

4:44 किसके लिए होता है? अहंकार मात्र के लिए धर्म होता है। और अहंकार को धर्म सिखाना क्यों पड़ता है? क्योंकि अहंकार अकेला होता है जिसके पास चुनाव का विकल्प चुनाव की शक्ति होती है। तो अर्जुन को धर्म सिखाना है। अहंकार धर्म के रास्ते पर चल भी सकता है और नहीं भी। वो विपरीत भी जा सकता है। अहम आत्मा की ओर बढ़े। इसी को कहते हैं धर्म। धर्म की बस यही परिभाषा है और कुछ नहीं। फस मत

5:30 जाइएगा। बाकी सब आप जो कुछ धर्म के नाम पर करते हैं वह धर्म की बड़ी बाहरी परतते हैं। रीति रिवाज पूजा संस्कार ये सब धर्म की बहुत बाहरी बातें हैं। और उनमें से कई बातों का तो धर्म से बिल्कुल कोई लेना देना भी नहीं है। केंद्र में धर्म का और कोई अर्थ नहीं है। नहीं हो सकता। एक ही अर्थ है अहम का आत्मा की ओर बढ़ना। अगर अहम है तो उसके इर्दगिर्द जो मन होता है वह बेचैन होता है, कलशित होता है, परेशान होता है। और अहम जब आत्मा की ओर बढ़ता है तो मन कैसा होता जाता है? मन शांत होता जाता है,

6:15 मन शुद्ध होता जाता है। हल्कापन रहता है। चिंताएं इत्यादि नहीं रहती। एक सूक्ष्म सा आनंद रहता है। चैन से सो सकते हो। व्यर्थ के फसाद नहीं उठते थे। तो अर्जुन को धर्म सिखाना पड़ता है क्योंकि अर्जुन के पास अधर्म का भी विकल्प उपलब्ध है। ठीक है? आत्मा के बिंदु पर क्या होता है? जहां कृष्ण खड़े हैं वहां उन्हें धर्म का विचार नहीं करना पड़ता। यह वो बिंदु है जो पूर्ण मुक्ति का है। यहां तक कि धर्म से भी मुक्ति का। कृष्ण

7:00 धर्म से भी मुक्त है। कृष्ण इतने मुक्त है उन्हें हम यू ही पूर्ण नहीं कहते। वो धर्म से भी पूर्णतया मुक्त है। वो जो करें वही धर्म है। अर्जुन को धर्म का पालन करना है और धर्म कृष्ण का पालन करता है। अर्जुन को पालन करना है धर्म का और धर्म को पालन करना है कृष्ण का। अर्जुन को कहना पड़ेगा तुम धर्म पर चलो। और धर्म क्या है? ये कैसे जाना जाता है? कृष्ण को देख के। जिस रा कृष्ण चले वही धर्म है। और हम किसी व्यक्ति की बात नहीं कर रहे। हम किसकी बात कर रहे हैं? कृष्ण किसके प्रतिनिधि है?

7:47 लेकिन यह सुविधा ये मुक्ति यह जबरदस्त छूट उपलब्ध सिर्फ कृष्ण को है। आपको नहीं उपलब्ध है कि हम जो करें वही धर्म हो गया। हमें तो स्वयं के प्रति सावधान रहना है। हम अर्जुन जैसे हैं। हमारा ज्यादा रुझान तो रहता है अधर्म की तरफ बढ़ने में। ठीक है। कृष्ण आत्मा के प्रति आत्मा क्या है? आत्मा वो तत्व है जो दूसरे से बिल्कुल अछूता है। नहीं तो दो नहीं होते ना। अगर इनमें आपस में कोई संबंध होता या एक दूसरे का ही परिणाम होता या एक दूसरे का रूप होता तो हम ये नहीं कहते ना कि दो तत्व हैं। ये दो तत्व हैं। बिल्कुल अलग एक दूसरे से। ये दोनों एक दूसरे से इतने अलग

8:33 हैं कि जब यहां से अहम आत्मा तक पहुंचता है तो पहुंचते पहुंचते मिट जाता है। ये दो तत्व कभी एक नहीं हो सकते। यह दो तत्व कभी एक नहीं हो सकते। इसी बात का तो हमको बड़ा डर रहता है ना। वो यहां से चलेगा। अगर आत्मा के पास पहुंच गया तो पहुंच तो जाएगा लेकिन मिट जाएगा। तो इनमें बिल्कुल बिल्कुल एक आयामगत भेद है। इनको कभी एक आयाम पर नहीं सोचना चाहिए। ऐसे नहीं कि ये एक ही तल पर तो है। ये प्रकृति है। ये आत्मा है। ऐसे नहीं। प्रकृति का पूरा खेल ही मायावी है और प्रकृति में लगातार द्वैत

9:20 है दो का जोड़ा चलता रहेगा। धूप छांव चलती रहेगी। आत्मा वो अनंत है। प्रकृति में सब कुछ लघु है। शुद्ध है। शांत है। अंत उसमें निहित है। आत्मा के बारे में अगले ही श्लोक में कृष्ण आपको समझाएंगे कि प्रकृति से इतनी अलग है कि आप उसका चिंतन भी नहीं कर सकते। वो अचिंत है। क्योंकि चिंतन भी कौन करता है? मन। चिंतन मन करता है। मन इन दोनों में किधर है? मन प्रकृति के आयाम का। हमने कहा प्रकृति आत्मा को छू भी नहीं सकती।

10:07 तो इसीलिए मन का विचार कभी आत्मा तक पहुंच ही नहीं सकता। आत्मा सर्वथा असंग और अस्पर्शित रहती है। इतनी अस्पर्शित कि आपकी उंगलियां क्या आपका विचार भी उस तक नहीं पहुंचता। उपनिषद कहते हैं वाणी चलती है कि उसकी बात करेंगे और थोड़ी दूर भटक के वापस आ जाती है। नेत्र चलते हैं। हम उसको देख के आएंगे। थोड़ी दूर भटक के वापस आ जाते हैं। कान चलते हैं। हम उसको सुनकर आएंगे। विचार चलता है। हम उसको चिंतन करके लाएंगे। ये सब हार जाते हैं। आत्मा स्थिर है हिलती नहीं। और कुछ भी जो गति करता है उस तक पहुंच सकता नहीं।

10:56 आत्मा को ना आना है ना जाना है। जो कुछ भी आता जाता है उसकी पहुंच और पकड़ से दूर की है आत्मा। बात समझ में आ रही है? आत्मा कहीं से उत्पत्ति नहीं लेती। वो है। आत्मा समय के पार की है। समय आता जाता रहता है। आत्मा नहीं आती जाती। समय रुक भी सकता है। आत्मा है। यह पूरा ब्रह्मांड ही विनष्ट हो जाए तो समय भी नष्ट हो जाएगा। समय और ब्रह्मांड एक है। कुछ नहीं होगा तो समय भी नहीं होगा। आत्मा

11:41 है। आत्मा का अर्थ ही है। आत्मा का नाम ही है। वो जो है उसे आत्मा कहते हैं। वो जो प्रतीत होता है उसे प्रकृति या संसार कहते हैं। जो अनुभव होता है उसका नाम है प्रकृति या संसार। जो है प्रतीत नहीं होता लेकिन उसको कहते हैं आत्मा। हां वो प्रतीत नहीं होता। लेकिन उसके अभाव में जो प्रतीत होता है वो भी प्रतीत नहीं होगा। जितने आपको अनुभव होते हैं उसका आधार है आत्मा। यद्यपि स्वयं आत्मा को अनुभव नहीं किया जा सकता। आत्मा का कोई अनुभव नहीं होता। सत्य का ब्रह्म का कोई अनुभव नहीं। ये बात आप समझ रहे। तो जन्म मृत्यु का सारा खेल कोई आया, कोई गया, कोई पैदा हुआ,

12:29 किसी को चोट लग गई। यह है वो है ऐसा वैसा। यह सब कहां चलता रहता है? यह प्रकृति में चलता रहता है। ठीक है? आत्मा में कुछ नहीं चल रहा होता। ये हुआ सैद्धांतिक आधार। अब कृष्ण कहना क्या चाह रहे हैं? जो इस आत्मा को अविनाशी नित्य त्रिकाल में परिणाम शून्य आत्मा से कुछ उत्पन्न नहीं होता। ना आत्मा किसी का परिणाम है ना आत्मा कोई परिणाम देती है। ना आत्मा का कोई पिता या माता है ना आत्मा किसी की माता है या किसी का पिता है। आत्मा सर्वथा कार्य कारण समस्त कारणता से बिल्कुल अलग है। आप किसी कारणवश आत्मा को नहीं पाओगे।

13:18 कुछ कर करके कोई युक्ति लगा के कारण आत्मा तक नहीं पहुंचा जा सकता। आत्मा अविनाशी नित्य त्रिकाल में परिणाम शून्य जन्म रहित क्षय शून्य जन्म रहित पैदा नहीं होती क्षय शून्य मरती नहीं जो ये जानता है हे पार्थ वह व्यक्ति किस प्रकार किसका वध कराता या किसका वध करता है तब समझिए कौन सा धर्म सिखा रहे हैं अर्जुन को इस पर ध्यान दीजिएगा अर्जुन से कह रहे हैं देखो आत्मस्थ है जो वो तो स्वयं को आत्मा त्मा जानता है तो उसकी तो कोई परवाह करने की आवश्यकता ही नहीं

14:04 है। अब बात करते हैं उनकी जो प्रकृति में है उनके प्रति हमें दृष्टिकोण क्या रखना है अर्जुन समझो इस बात को। वो करो तुम। जो धर्म सम्मत हो और धर्म कहता है कि अहम के लिए आत्मा के अतिरिक्त कुछ महत्वपूर्ण नहीं। अहम के लिए आत्मा के अतिरिक्त कुछ महत्वपूर्ण नहीं। जन्म अगर तुमने किसी का महत्वपूर्ण मान

14:51 लिया अर्जुन तो तुमने किसको महत्वपूर्ण मान लिया? सब जन्म की घटनाएं कहां घटती है? प्रकृति में। और अहम को महत्वपूर्ण मानना किसको है? आत्मा को। इसी तरह मृत्यु को अगर तुमने महत्वपूर्ण मान लिया तो तुमने किसको महत्वपूर्ण मान लिया? तुमने प्रकृति को महत्वपूर्ण मान लिया। यह सांख्य योग सिखाया जा रहा है अर्जुन को। तुम क्यों प्रकृति के चक्करों में फंस रहे हो? तुम तो अपने एक लक्ष्य की ओर बढ़ो। हालांकि सांख्य योग में आत्मा का सिद्धांत नहीं है। लेकिन फिर भी यहां जो बात हो रही है वो मोटे तौर पर सांख्य योग की ही है। तो तुम क्यों यहां पर ये सोच रहे हो कि कौन बचेगा कौन नहीं बचेगा। तुम तो ये

15:37 देखो ना कि इस समय पर धर्म क्या है? मोह किस आयाम पर पाया जाता है? प्रकृति के आयाम में पाया जाता है। क्या तुम्हें मोह को महत्व देना है? सब रिश्तेदारियां और संबंध कहां पाए जाते हैं? क्या उन्हें महत्व देना है? नहीं। तुम्हें महत्व देना है अपनी मुक्ति को। और अपने साथ साथ ही जो पूरी जनता है हस्तिनापुर की जो प्रजा होगी उसके हित को तुम ये देखो ना कि सही क्या है और

16:23 सही मात्र आत्मा है क्योंकि आत्मा सही है इसीलिए युद्ध स्थल पर इतनी बातें आत्मा की हो रही अन्यथा आपको आश्चर्य होना चाहिए ना कि युद्ध स्थल पर सत्य की बातें क्यों हो रही है क्योंकि वो युद्ध अगर सही है तो लड़ा ही सत्य के लिए जाएगा। और जो युद्ध सत्य के लिए नहीं लड़ा जा रहा उस युद्ध में सम्मिलित मत होइए। वहां से तो मैंने कहा नमस्कार करके हट जाइए। पूछिए कि ये जो दो पक्ष है ये किसकी खातिर लड़े हुए हैं आपस में? पता चले कि एक पक्ष का एक स्वार्थ है। दूसरे पक्ष का दूसरा स्वार्थ है। तो आपको दोनों में से किधर जाना है? किधर भी नहीं।

17:09 युद्ध हमें जरूर लड़ना है पर सिर्फ वह युद्ध जिसमें एक तरफ सत्य एक तरफ असत्य एक धर्म अधर्म हो तब तब हमें उसमें सम्मिलित हो जाना है। समझ में आ रही है? अर्जुन यहां पर आवश्यक है कि तुम इस युद्ध को लड़ो। कारण बहुत व्यवहारिक है। दुर्योधन की जैसी मतिगति है। अगर दुर्योधन राज्य पाता है तो अपना अपने भाइयों का तो नाश करेगा ही करेगा। पूरी प्रजा का नाश करेगा। और हम उस समय के भारत के सबसे प्रबल राज्य की बात कर रहे हैं। जैसा हस्तिनापुर हो जाएगा उसका

17:55 प्रभाव पूरे भारत पर पड़ेगा। दुर्योधन का छल से कपट से अधर्म से सिंहासनारूढ़ होना स्वीकार नहीं किया जा सकता। अर्जुन इसलिए लड़ो। यह है अहम की गति आत्मा की तरफ। अगर प्रजा में असंतोष फैलता है। अगर लोगों के साथ अन्याय होता है। अगर राजनैतिक स्थितियां ऐसी बनती है कि एक राज्य सदा दूसरे से भिड़ा हुआ है। तो ये अहम के लिए अच्छा नहीं होगा। और जीवन का एक ही उद्देश्य है आत्मा की ओर बढ़ना। दुर्योधन अगर राज्य पाता है तो आत्मा के सारे रास्ते बाधित होते

18:44 हैं। जीवन का उद्देश्य ही खराब होता है। अर्जुन तुम्हें इसलिए युद्ध करना पड़ेगा। बात समझ में आ रही? आत्मा का उल्लेख बार-बार करना इसलिए जरूरी है। अर्जुन तुम जानो कि महत्वपूर्ण क्या है? प्रकृति के क्षेत्र में जो कुछ भी है महत्वपूर्ण नहीं है। जो महत्वपूर्ण है मैं उसकी बार-बार तुम्हें याद दिला रहा हूं। वो अविनाशी है, वो अजन्मा है, वो अक्षय है। उसको याद करो। वो तुम्हारे लिए भी महत्वपूर्ण है। और सब जनों के लिए महत्वपूर्ण है। सबको वही जाना है। कुछ ऐसा करो ना फिर अर्जुन कि तुम भी उधर पहुंच सको। तुम्हारे पीछे पीछे और भी और लोग उधर

19:29 पहुंच सके। यह तर्क भी आगे देते हैं कृष्ण कि तुम जो कुछ करोगे अर्जुन उसी का अनुगमन दूसरे लोग भी करेंगे क्योंकि यही जगत की रीत है। अग्रणी लोग जो करते हैं उन्हीं का नेतृत्व पीछे वाले मान के वो भी वही कर डालते हैं। तुम स्वयं अगर अहम पर चोट नहीं करोगे, आत्मा की ओर नहीं बढ़ोगे तो तुमने अपना ही नहीं। दूसरों का भी बड़ा अहित कर डाला। यह तर्क है, ये कारण है जिसकी वजह से युद्ध होना चाहिए। तुम नहीं भाग सकते।

20:18 यहां तक स्पष्ट हो रहा है। युद्ध बुरा है पर युद्ध से भी ज्यादा बुरा होगा। यदि दुर्योधन राजा बन गया। तो इसलिए तुम्हें युद्ध करना पड़ेगा। हम भी नहीं चाहते थे अर्जुन। साफ कहते हैं कृष्ण कि युद्ध हो। हम तो स्वयं शांति प्रस्ताव लेकर के गए थे। और दुर्योधन हमें ही बंदी बनाने आ गया। हमने यहां तक कहा था कि तुम रख लो पूरा राज्य थोड़ी सी जमीन दे दो। पांच गांव मांगे थे वो इतना भी नहीं दे पाया। बोलता है सुई की नोक बराबर भी जमीन नहीं दूंगा। युद्ध बुरा है। हम नहीं कह रहे हैं कि युद्धवादी होना चाहिए। युद्ध निसंदेह बुरा

21:06 है। पर अगर बुराई और बुराई में ही चयन करना है तो युद्ध की बुराई से ज्यादा बड़ी बुराई है दुर्योधन का राजा बन जाना। अच्छाई इसमें होती है कि शांति से ही मन तो दुर्योधन पर शांति से तो माना नहीं है। और किसी की स्वेच्छा पर किसी का नियंत्रण होता नहीं। सब अपनी मर्जी चलाने के लिए स्वतंत्र है। दुर्योधन की स्वेच्छा है। वो कह रहा है नहीं मैं तो लड़ के ही मानूंगा तो अब लड़ना ही पड़ेगा। क्या करें? हम नहीं चाहते थे। वो चाहता है अर्जुन को कृष्ण ने नहीं लड़वाया है। कई बार ऐसे लोग बोल देते हैं कि कृष्ण ने बड़ा गलत किया। अर्जुन को दिया। ये क्या मूर्खता की बात है? अर्जुन को तो

21:52 दुर्योधन ने लड़वाया है। कृष्ण तो शांति करवाने गए थे। अर्जुन को अगर किसी ने लड़वाया है तो वो है दुर्योधन। हां जब युद्ध की स्थिति पैदा हो ही गई तो कृष्ण ने बस ये कहा है कि अगर अभी नहीं लड़े तो लड़ने से भी ज्यादा बुरा कुछ हो जाएगा। इसलिए अब धर्म यही कहता है कि तुम लड़ो। तो आत्मा का वध होता नहीं और प्रकृति में जो कुछ है उसकी एक ही उपयोगिता है कि वो आत्मा की तरफ बढ़े। अगर आत्मा की तरफ वो नहीं बढ़ रहा तो उसका होना ना होना एक बराबर है। तुम उनके लिए शोक मत करो।

22:37 अर्जुन कोई वध नहीं हो रहा। प्रकृति में जो कुछ है वो तुम्हारे लिए मूल्यहीन है। अर्जुन कौन है? अहम। अहम के लिए सिर्फ क्या है मूल्यवान? दोहराते रहिए इस बात को। अहम के लिए मूल्यवान है आत्मा मात्र। प्रकृति में जो कुछ है सब मूल्यहीन है। परंतु उसका एक स्थिति में मूल्य हो सकता है। अगर वो आपकी मदद कर दे आत्मा की ओर बढ़ने में। चाहे वो आपके रिश्ते हो, चाहे आपका ज्ञान हो, चाहे आपके रुपए पैसे हो, सब मूल्यहीन है। पर उनका एक मूल्य हो सकता है। क्या वो मुझे उधर पहुंचाने में मदद करेंगे? तब उनका मूल्य है सिर्फ तब। अभी ये सब जो बैठे हुए हैं ये तो छोड़ दो कि ये किसी को आत्मा की तरफ पहुंचाएंगे।

23:22 इन्होंने तो ऐसी स्थिति बना ली है अपनी कि कोई आत्मा की ओर जा भी रहा होगा तो उसको पकड़ के पीछे खींच लेंगे ये कौरव लोग। तो इनका कोई मूल्य बचा है। आप नहीं समझ रहे। अहम है। अहम को घेरे हुए क्या है चारों तरफ? प्रकृति घेरे हुए। इसको थोड़ा बैठाइए मन में। अहम को जाना कहां है? अहम को आत्मा की ओर जाने में संसाधन कहां से मिलते हैं? प्रकृति से। प्रकृति का बस इतना उपयोग है। अब आप समझ लीजिए कि इस दुनिया का आपकी जिंदगी में क्या महत्व होना चाहिए? अब एक-एक करके बताइएगा। आपके लिए समय का क्या उपयोग होना चाहिए? आपको आत्मा की ओर ले जाए। आपके रुपए का क्या उपयोग होना चाहिए? आपकी रिश्तेदारी का

24:09 क्या उपयोग होना चाहिए? आपका रुपया ही अगर आत्मा की ओर जाने में बंधन बन रहा हो तो कृष्ण आपसे क्या बोलेंगे? रुपए में आग लगा दो। वही यहां पर बोल रहे हैं। कौरवों में आग लगा दो। ये तो छोड़ दो कि ये आत्मा की ओर ले जाएंगे। ये पूरे भारत को आत्मा की ओर जाने से रोक देंगे। दुर्योधन का सलाहकार कौन बनेगा? शकुनी। ये लोगों को धर्म की ओर भेजेगा। यह जीने का तरीका सिखा रहे हैं। कुछ है तुम्हारे जीवन में जो तुम्हें आत्मस्थ होने से रोकता है तो उसको त्याग दो और अगर वो त्यागा ही नहीं जा रहा। वो चिपक ही गया है तुमसे लड़ाई में जैसे दुर्योधन चिपक गया है। तो फिर वध कर दो ना। वो तो वैसे

24:55 ही मूल्यहीन था। उसका जीना ना जीना एक बराबर था। आगे जाकर कृष्ण कहते हैं मरेंगे नहीं। यह मरे हुए हैं। जिस क्षण इन्होंने तय करा था कि यह मेरे विरुद्ध खड़े होंगे, यह मर गए। तुम क्यों ग्लानी ले रहे हो कि मैंने मारा? प्रकृति में जो कुछ भी है वो बिल्कुल त्याज्य है। अगर वो आपकी सहायता नहीं कर सकता। और प्रकृति में जो कुछ भी है वो शिरोधार्य है। अगर वो आपकी सहायता कर सकता है। भारत में ऐसा किया गया है। कहते हैं कि सत्य तक जाना है। सत्य तो निराकार है। निर्गुण है। पकड़ में नहीं आता। क्या आप पूजे भी उसको? लेकिन जो कोई इस प्रकृति के भीतर का मुझे उधर ले जाने

25:40 में मदद करेगा मैं उसको अपने सर पर रखूंगा। वहीं से फिर वो बात आती है कि गुरु गोविंद दो खड़े काके लागो पाए। गोविंद तक जाना है। लेकिन गोविंद तक जाना तो इसी प्रकृति के संसाधनों का उपयोग करके है ना। कैसे जाऊंगा? वरना कैसे जाऊंगा? बोलो। यह प्रकृति ही मेरा मस्तिष्क है। प्रकृति ही मेरे मेरे पाव है। यही मेरी आंख है। यही मेरी बुद्धि है। अहंकार क्या है? अहंकार तो एक बिंदु है। अहंकार की काया तो प्रकृति है। काया का उपयोग करे बिना वो कैसे जाएगा? पांव है। बिना पाव के कैसे जाएगा वहां? जो कुछ आपके पांव बनता हो उसके पांव छू लीजिए। सारी शक्ति कहां निहित है?

26:27 प्रकृति में निहित है। अब यहां से आप शिव और शक्ति वाली बात भी समझ रहे होंगे। शिव माने आत्मा। शक्ति माने प्रकृति। शक्ति की पूजा का अर्थ क्या होता है? कि शक्ति से ही तो संसाधन लेके वरदान लेकर मैं शिव तक पहुंचूंगा। इसीलिए शक्ति की पूजा करते हैं। और भारत में ऐसे भी पंथ है जो शिव से ज्यादा शक्ति को मानते हैं। वो कहते हैं शिव का तो कुछ पता ही नहीं चलता। कौन है ना जाने कहां बैठे हैं। काम तो हमारे शक्ति आती है तो हम तो शक्ति की पूजा करेंगे। बात समझ में आ रही है पूरी चीजें खुल रही है। काम आ जाए पूजनीय है। लेकिन ये जो बैठे हैं काम तो आ नहीं रहे। ये जो काम नहीं आ रहे इनमें क्या जान है? प्राण तो मात्र आत्मा में है। वास्तविक

27:12 प्राण जीवन तो उधर है। ये जो जीवन के विरुद्ध है। तुम इन्हें जीवित क्यों मान रहे हो? जीवन सिर्फ उसका है जो कृष्णमय हो गया है। जो कृष्ण के विरुद्ध है वो तो जीवन के ही विरुद्ध है ना। तुम उसे जीवित मान ही क्यों रहे हो? तो क्यों कह रहे हो कि मैं वध करूंगा गलत हो जाएगा। तुम वध करोगे ही नहीं। ये तो चल फिर रहे हैं। इनमें प्राण नहीं है। जैसे खाल लोहार की सांस लेत बिन प्राण। ये चल फिर रहे हैं। सांस ले रहे हैं। इनमें प्राण है थोड़े ही। जीवित किसको मानते हैं? हमारे जीवित होने का पैमाना क्या है? मानदंड क्या है? चेतना जिसकी चेतना कृष्ण विहीन हो गई है वो जीवित कैसे है? बोल दीजिए। और जब वो जीवित

28:00 है ही नहीं तो मान लो। ये चलता फिरता शरीर है। इसको मारोगे नहीं अगर तो ये न जाने कितनों को अपने समान मुर्दा बना देंगे। पूरा भारत इनके जैसा हो जाए। उससे कहीं बेहतर है कि यह जो चंद लोग हैं भारत की जनसंख्या की तुलना में इनहीं को मार दो अर्जुन। पूरा दर्शन स्पष्ट हो रहा है। हां। अब समझ में आ रहा है कि युद्ध के मैदान पे आत्मा की बात क्यों हो रही है? युद्ध के मैदान पे आम तौर पे क्या बातें होती है? रणनीति की बातें होती है। यहां आत्मा की बात क्यों हो रही है? क्योंकि धर्म युद्ध और धर्म का उद्देश्य मात्र आत्मा है। उसी को ऐसे भी कह देते

28:46 हैं कि धर्म का उद्देश्य है मुक्ति। आत्मा माने अहंकार से मुक्ति। अहंकार जब चलते चलते आत्मा तक पहुंचता है तो क्या हो जाता है? मिट जाता है। तो इसीलिए धर्म को ऐसे भी कह देते हैं। धर्म माने मुक्ति। आत्मा को पाना या स्वयं से मुक्त हो जाना। ये दोनों एक ही वाक्य है। स्पष्ट हो रहा है। जिस प्रकार मनुष्य जीर्ण वस्त्राद का परित्याग कर दूसरे नए वस्त्र ग्रहण करता है। उसी प्रकार शरीरी जीव जीर्ण शरीर को छोड़कर दूसरे नए शरीर धारण करता है। इतना ज्यादा दुरुपयोग हुआ है इस श्लोक का। कोई सीमा नहीं। आगे देखिएगा। शस्त्र इस आत्मा को काट नहीं सकते। यह

29:34 जो मुझे सबसे ज्यादा प्रिय श्लोक है उनमें से शस्त्र इस आत्मा को काट नहीं सकते अग्नि इसको जला नहीं सकती जल गीला नहीं कर सकता वायु नहीं ये क्या कहा गया है यहां पे पहले इसको लेंगे फिर इसके पीछे शस्त्र काट नहीं सकते इसी में रहिएगा आत्मा और प्रकृति इससे बाहर मत जाइएगा बहुत इधर उधर का सोचेंगे अपनी कॉमन सेंस लगाएंगे तो फिर उसमें उलझ जाएंगे शस्त्र काट नहीं सकते अग्नि जला नहीं सकती और जल इसको गीला नहीं कर सकता। वायु सुखा नहीं सकती। शस्त्र अग्नि जल वायु ये चारों कहां पाए जाते हैं? प्रकृति में तो यहां क्या कहा जा रहा है? सिद्धांत बताइए। आत्मा प्रकृति से परे है। बस इतनी सी बात कही जा

30:22 रही है। उसी बात को अर्जुन की भाषा में समझा के बोल दिया। शस्त्र काट नहीं सकते। माने प्रकृति में जो कुछ भी है वो आत्मा तक पहुंचेगा तो काटेगा ना। पहुंच ही नहीं सकते। अग्नि जलाएगी नहीं, जल गीला नहीं करेगा, वायु सुखाएगी नहीं। यह सब यहां होते हैं। यह सारा तुम्हारा सांसारिक झमला है। उधर नहीं होता बाबा ये सब कुछ भी। डरो मत। आत्मा की बात करना आवश्यक क्यों है? इसलिए क्योंकि अहम अगर प्रकृति में ही फंसा रह जाता है तो जीवन भर दुख पाता है। इसलिए आत्मा आवश्यक है। आत्मा सत्य हो ना हो आवश्यक बहुत है। इस बात को समझिएगा। आत्मा आवश्यक बहुत है। जो आवश्यक हो गया वो सत्य भी हो

31:08 गया। आत्मा अगर नहीं है तो जिओगे कैसे? आत्मा नहीं है तो फिर तुम्हें कहां जीना पड़ेगा? प्रकृति में। और वहां पे क्या पाओगे? वही जो सब लेकर के यहां आए हो शिविर में। क्या लेके? यही है। यही है। यही है। प्रकृति में यही है। उलझन लफड़ा झपड़ा उठा दिया गिरा दिया। ₹1 कोई ले गया मेरा फलाने ने मुझे धोखा दे दिया। ये ये प्रकृति में चलता रहता है। वही सब जो तुम जंगल में देखते हो। भ्रम जानवरों को फंसा लेना जाल में कितना आसान होता है। वहां प्रकृति ही प्रकृति है। सब जाल में फंसते रहते हैं दिन रात। और ऐसा नहीं कि मनुष्य ही उन्हें फंसाता है। एक जानवर दूसरे जानवर को ही फंसा रहा होता है। देखा है गिरगिट कैसे रंग बदलता है। देखा है मगरमच्छ कैसे चुपचाप बैठा

31:55 रहता है। अचानक छिपकली देखी होगी घर की। कीड़े पर कैसे हमला करती है? प्रकृति में यही सब चलता रहता है। कोई किसी को धोखा दे रहा है, कोई धोखा खा रहा है। सब लगातार मरने के डर से आतंकित है। ऐसे जीना है। ऐसे नहीं जीना तो आत्मा चाहिए। इसलिए आत्मा की बात धर्म में केंद्रीय है। इसलिए आत्मा ही सर्वोपरि है। अगर जीवन वैसे ही नहीं बर्बाद करना जैसे जा रहा है तो आत्मा चाहिए। इसीलिए धर्म का कोई और प्रतिपाद्य विषय है ही नहीं। आत्मा के अतिरिक्त और इधर-उधर की बातें मत करो। उनका धर्म से कोई ताल्लुक नहीं। समझ में आ रही है? हां। तो आत्मा प्रकृति से भिन्न है। ये समझाते

32:42 हुए अब क्या कह रहे हैं? अब आत्मा तो प्रकृति को बिल्कुल छूती नहीं ना। तो यहां किसकी बात हो रही होगी? श्लोक कहता है देही है एक जिसका देह से संबंध है वो ही है जो शरीर बदलता रहता है ठीक उस तरह से जिस प्रकार मनुष्य पुराने जीर्ण माने फटे हुए वस्त्रों का त्याग करके नए वस्त्र पहनता है उसी तरीके से एक देही है जो पुराने जीर्ण फटे हुए कमजोर शरीर को दूसरे नए बच्चे के शरीर में आ जाता है ये किसकी बात हो रही है ये सारा आवागमन कहां होगा यहां होगा तो आपने क्यों मान लिया और क्यों कहना शुरू शुरू कर दिया कि आत्मा इधर से उधर भटकती है, डोलती है या आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती है। यहां किसकी बात हो रही है? ये तो प्रकृति के भीतर की ही बात हो रही है ना। समझ में

33:28 नहीं आया हो तो पूछिए साफ-साफ। ये जिस देह की बात हो रही है। आत्मा की कोई देह होती है। कृष्ण इस श्लोक से पहले भी समझा रहे हैं। श्लोक के बाद भी बता रहे हैं आत्मा की कोई देह नहीं होती। तो यहां पर कहा जा रहा है श्लोक में कि एक देही है जो उसी तरीके से देह बदलता रहता है जैसे मनुष्य कपड़े बदलता रहता है ये आत्मा की बात नहीं हो रही है ये अहंकार की बात हो रही है ये मूल अहम वृत्ति की बात हो रही है इसको इतनी बार मैं समझाने की चेष्टा करता रहता हूं हम समझते नहीं समझाने की चेष्टा इसलिए करता रहता हूं क्योंकि उसी नासमझी के कारण मैं कह रहा हूं भारत ने विश्व में पूरे और विशेषकर सनातनियों ने बहुत दुख झेले जो ऊंची से ऊंची बात थी आत्मा की वो हमने गवा दी। हमने ना जाने

34:13 उसका क्या अनर्थ कर डाला। हमने समझ में ही नहीं आया कि बोला क्या गया और आज भी वही अनर्थ करा जा रहा है। आत्मा हमने कहा कितनी होती है? पहले कहा एक फिर कहा एक भी नहीं। क्या आत्माएं हो सकती है? बहुत सारी। क्या आपके शरीर में आत्मा हो सकती है? यदि अनंत है आत्मा तो आपके हो सकती है क्या शरीर के भीतर की कोई वस्तु हो सकती है आत्मा क्या ये जो भौतिक शरीर है इसके भीतर कुछ भी अभौतिक पाया जा सकता है ये तो प्रकृति का खेल है बाबा पूरा तुमने इसमें कहां आत्मा को शामिल कर

34:59 दिया समझ में आ रही है बात कुछ नहीं हां यहां किस देही की बात हो रही है? आत्मा की नहीं बात हो रही। यहां बात हो रही है कि प्रकृति ही लहराती रहती है और नए-नए शरीर नई नई लहरों की तरह प्रकृति में जन्म लेते रहते हैं। शरीर जड़ होता है। लेकिन उसी जड़ शरीर की संतान होती है चेतना। जिसको हम अभी तक क्या कह रहे थे? अहम इसीलिए हमने कहा प्रकृति का ही तत्व होता है अहंकार क्योंकि उठता वो इसी जड़ प्रकृति से है क्योंकि जड़ प्रकृति से चेतन अहंकार उठाता है। इसीलिए गीता में आगे कृष्ण ये

35:46 भी समझा देते हैं कि तुम कहां जड़ और चेतन को अलग-अलग समझ रहे हो। ये अलग-अलग है ही नहीं। अगर ये अलग-अलग होते तो मिट्टी से फूल कैसे खिल जाता? तो तुम यह जो जड़ अन्न खाते हो उससे तुम्हारी चेतना कैसे विकसित हो जाती है वास्तव में तुम जिसे जड़ समझते हो जिसे चेतन समझते हो वो एक ही है इसका निष्कर्ष समझिएगा जीवित और मृत एक है हम कह देते हैं मिट्टी मुर्दा है और फूल जिंदा है दोनों एक है अगर बहुत रुचि है फूल को जीवित मानने में तो ये भी मानो की मिट्टी भी जीवित है ये बात भी भारत ने मान ली कि कण कण में नारायण है। अब समझ में आ रही है? जड़ और चेतन में भेद नहीं

36:32 है। वास्तविक भेद है जड़ चेतन और आत्मा में। जड़ चेतन को एक तरफ रखो तो उसका सम्मिलित नाम क्या हुआ? प्रकृति। जड़ चेतन को एक तरफ रखा तो उसका नाम है प्रकृति। आत्मा दूसरी तरफ है ना जड़ है ना चेतन है। दोनों से आगे है। इसी को वेदांत ऐसे भी कहता है ना सत है ना असत। ना सत है ना असत है। सत असत दोनों से आगे सत असत दोनों प्रकृति मात्र में पाए जाते हैं। समझ में आ रही है बात? हम तो ये प्रकृति के भीतर चलता रहता है। ये लहरें उठती रहती है। जो मूल अहम वृत्ति है या कह दो कि जो मूल प्राकृतिक वृत्ति है वृत्ति मात्र है। उसमें अपनी कोई सत्यता नहीं। वो

37:18 वृत्ति है। सत्य नहीं। वो एक तरह का झूठ है जो कई तरह के नकाब पहनता रहता है। सत्य तो सत्य उसे कोई नकाब पहनना नहीं पड़ता। इसीलिए वो एक है। चुपचाप ना मस्त मौज में पड़ा हुआ है। झूठ परेशान रहता है। बड़ी गति करता है। लगातार गति गति गति गति वहां बदलाव रहता है। समय टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक वहां बदलाव चल रहा है लगातार। और कभी ये बनता है। कभी वो बनता है। कभी वो बनता है। ये बनता है। ये बनता है। लेकिन जो झूठ है इसकी अपनी कोई हस्ती हो नहीं सकती। क्योंकि झूठ झूठ माने तो झूठ झूठ तो है ही नहीं। झूठ माने जो नहीं है उसे झूठ बोलते हैं। तो ये जो झूठ है अब माया समझिएगा ये वास्तव में सत्य की ही जैसे छाया है जो सत्य को ही पाना चाहती है। ना जाने कैसे

38:04 इसका कोई उत्तर कहीं नहीं है। बस ऐसे ही कहते हैं ना जाने कैसे। जिसको लगता होगा उसको लगता होगा। जिन्हें नहीं लगता वो तो मात्र सत्य देखते हैं और जिन्हें लगता होगा हमें क्या पता उन्हें क्यों लगता है वही जाने उन्हें क्यों लगता है उन्हें ध्यान नहीं है कि इसलिए उन्हें लगता है तो ना जाने कैसे सत्य की एक छाया विकसित हो गई है जिसको संसार कहते हैं लेकिन ये जो छाया है है तो सत्य की तो ये पहुंचना चाहती है उधर सत्य तक वापस इसीलिए अहम में एक आकर्षण बना रहता है लगातार आत्मा के आत्मा तक जाता है समझ में आ रही है तो ये लहराती रहती लहराती रहती है। नए-नए अपने मुखौटे पहनती रहती है। सब मुखौटों का केंद्रीय लक्ष्य एक ही है। उधर किसी तरह पहुंच जाए। पहुंच

38:49 कोई पाता नहीं। इसीलिए मुखौटे बदलने पड़ते हैं। इसीलिए फिर जन्म के बाद जन्म। जन्म के बाद जन्म। कभी यहां बच्चा पैदा हो रहा है, कभी वहां हो रहा है, पेड़ है, पौधा है, पशु है, प्रजातियां आ रही है, विलुप्त हो रही है, ये सब कुछ खेल क्यों चल रहा है? नया शब्द अब एक आ गया उसका नाम है प्रेम। प्रकृति को आत्मा से गहरा प्रेम है। लेकिन वह मूर्ख है। मूर्ख ना होती तो होती क्यों? मूर्ख ना होती तो आत्मा ही होती ना वो। तो वो ऐसी मूर्ख है कि वो आत्मा से छिटक करके अलग बैठी हुई है। लेकिन प्रेम भी उससे छूट नहीं रहा। तो वो तरह-तरह के उपाय करती रहती है। किस तरह से आत्मा तक वापस पहुंच जाऊं। यह हमारे भीतर की बात चल रही है। यह कोई परिकथा नहीं चल

39:36 रही। यह एक एक आदमी का किस्सा है। यह हमारी अंदरूनी कहानी है। समझिए इसको। इसके बिना गीता नहीं समझ में आएगी। ये हर आदमी की कहानी है। हम सच्चाई से छिट के बैठे हैं। हम प्रकृति हैं। हम सच्चाई से छिट के बैठे हैं। लेकिन उसके बिना जी भी नहीं पाते। आप उसके बिना जी सकते तो यहां क्यों आते? आप यहां आए हैं। वही आत्मा का प्रमाण है। हमें वो चाहिए भी। लेकिन हमें अपनी हस्ती भी चाहिए और वहां जाते हुए क्या होता है? वहां जाओ तो हस्ती मिट जाती है। तो हम अजीब विकट हालत फंसे हुए हैं। उधर जाना भी है लेकिन उधर जाओ तो हम जैसे हैं। उसको टूटना पड़ता है। अब खुद को बचाएं कि उधर जाए। शेख फरीद का है। वो कहते हैं पिया

40:21 बुला रहे हैं। पर उनकी तरफ जाते हैं तो रास्ते में कीचड़ बहुत है। अब या तो मैं अपना प्यार पा लूं। या अपने कपड़े बचा लो। प्रेम की ओर जाने में यही समस्या है। गंदे हो जाते हैं। पूरे दुनिया फिर तोते भेजती है। देखो गंदा हो गया। गंदा हो गया। छी कीचड़ लग गया। समझ में आ रही है बात? तो इनहीं दो परस्पर विरोधी सरोकारों के बीच यह संसार लटकता रहता है, झूलता रहता है। एक क्या? इधर जाना है। बड़ा आकर्षण है, बड़ा प्रेम है। नियति तो यही है। दूसरा क्या? खुद को भी बचाना

41:07 है। उसको भी पाना है और खुद को भी बचाना है। यह करके प्रकृति का पूरा तामझाम चलता रहता है। ये बात है। तो यहां जो बात हो रही है जिस प्रकार मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्याग करके बदलता रहता है। उसी प्रकार ये देही पुराने शरीरों को छोड़ के नए शरीर धारण करता रहता है। इसमें आत्मा को मत जोड़ दीजिएगा। आत्मा का इससे कोई संबंध नहीं। कौन है जो नए नए शरीर ले रहा है? मूल अहम वृत्त है जो नए नए शरीर ले रही है। आत्मा यहां है। साक्षी है। आत्मा मुस्कुराती है बस। और एक आत्मा है। वास्तव में उसे देखने और मुस्कुराने से भी कोई मतलब नहीं। जहां आत्मा है। आत्मा की दृष्टि से प्रकृति कोई अस्तित्व ही नहीं

41:52 है। प्रकृति अस्तित्ववान प्रतीत भी किसको होती है? जो प्रकृति के भीतर है। जो प्रकृति के भीतर बैठे हैं उन्हें ही लगता है कि प्रकृति है। जो उधर पहुंच गया उसको कुछ भी दिखना ही बंद हो जाता है। उसको लगता ही नहीं कि है। कुछ नहीं। इसका मतलब ये नहीं कि आप कहानी उड़ाने कर मुझे कुछ दिख ही नहीं रहा। मैं उधर पहुंच गया हूं। इस तरह की बातों का ये भी एक घोर दुष्परिणाम हुआ है। फरेबियों को अनुमति मिल गई है और मसाला मिल गया है। कहानियां उड़ाने का। कहानियां उड़ाते हैं फिर खूब। यही सब पढ़ पढ़ के। कहते मैं था मुझे कुछ प्रतीत नहीं हो रहा मैं आत्मा हो गया और आत्मा तो किसी की नहीं होती ना तो मैं सबका हो गया फिर मैं ऐसे हवा में घूम रहा था उन पगलों को नहीं समझ में आता कि हवा

42:37 तो प्रकृति में होती है तुम हवा में कैसे घूम रहे थे फिर मैं आत्मा हो गया मैं उड़ने लग गया मैंने नीचे देखा सारा संसार है आत्मा की आंखें होती है उड़ने के लिए जगह चाहिए और जगह सारी कहां होती है प्रकृति तुम उड़ कैसे गए अगर आत्मा हो तो लेकिन इतनी बुद्धि नहीं है समझ में आए तो तो इस तरह की फिर माल माल मसालेदार कहानियां उड़ाई जाएंगी और लोग उनको मान भी लेंगे और प्रमाण किसका दे दिया जाएगा? गीता का। गीता इन सब बातों को काटती है। इनका समर्थन नहीं करती। ये समझ में आ रही है बात कुछ? हम कैसे पहुंचे आत्मा तक?

43:25 कुछ ऐसा होना चाहिए अपने पास भी शस्त्र जिसे काट नहीं सकते आग जिसे जला नहीं सकते बस इसीलिए मुझे श्लोक इतना प्यारा है जब चोट लगे तो भीतर ही गूंज उठे नैनम चिद [संगीत] नैन और अगर आपके पास वो नहीं है तो आपको आत्मा से प्यार नहीं है फिर आप बस पूरी तरह से प्रकृति का कचरा मात्र हो प्रकृति तो कचरा ही होती है ना आप जो कुछ खाते हो वो कीचड़ से ही तो उठता है। कहां से उठा है? हम खुद कहां से उठे हैं? मां के गर्भ में क्या होता है? कीचड़ के अलावा सम्मान वगैरह की बातें एक तरफ रखो थोड़ी देर को। भावनात्मक बातें भी एक तरफ रखो। हम सबका शरीर कहां से आया है? शरीर पिता के कीचड़ और माता के कीचड़ के मिलने

44:12 से आया है। रज बोलते हैं उसको भाषा में। रज माने मालूम है क्या होता है? धूल। पिता की धूल, मां की धूल जब मिलते हैं तो हम खड़े हो जाते हैं। अगर आत्मा नहीं है तो धूल के अलावा क्या है जीवन? और आत्मा के होने का प्रमाण यही है। नमते शस्त्राण कोई आके चोट करे आप पूरी तरह ही ढह जाओ तो कचरा और कचरे के लिए तो अच्छा है ना ढह जाए। यही तो कृष्ण कह रहे हैं। मारना क्या है? मरे हुए हैं। इन पर लालच में चोट कर ये पूरे ढह गए हैं। दुर्योधन को किसने ढ रखा है? लालच ने। तो इन्हें मारना क्या है? ये तो मरे हुए हैं। इनमें तो जान ही नहीं है। हम में भी जान

44:58 नहीं है। अगर हम पर दुनिया चोट करे या हम पर हमारी ही वासनाएं वृत्तियां चोट करें और हम बस गिर गए। डह गए। कुछ होना चाहिए आग जिसे जला नहीं सकती। आग जला नहीं सकती माने क्या? माने क्या? शरीर से कुछ सरोकार है आपके पास जो आपकी जिंदगी से आगे का है निस्वार्थता है कहीं पर निष्कामता है कहीं पर अगर नहीं है तो मरे हुए हो जी थोड़ी रहे हो ये पूछना बहुत जरूरी है बहुत जरूरी पूरी तरह ही संसार का गुलाम हूं क्या मैं जो संसार का पूरी तरह गुलाम है हम उसको जीवित नहीं मानेंगे डॉक्टर कहते जीवित है डॉक्टरों को

45:43 क्या वो खुद जीवित नहीं कुछ बहुत शोभ होता है। जब जो ग्रंथ ऊंचे से ऊंचा ज्ञान देने के लिए है उसी का दुरुपयोग किया जाता है घोर अंधविश्वासों को प्रोत्साहित करने के लिए और दुख की बात ये है कि बहुत बड़े-बड़े नामों ने भी इन पंक्तियों का इन

46:29 श्लोकों का अनर्थ ही करा है। बहुत बड़े-बड़े नाम है। लेकिन जैसे उन्हें समझ में ही ना आया हो कि हां बोला क्या जा रहा है। जैसे वेदांत उनकी समझ से बाहर की बात हो। साधारण बुद्धि लगा के इन ऊंचे श्लोकों का अर्थ कर दिया है। और लोग उनके पीछे पीछे चलकर न जाने कौन सा अर्थ अभी भी पकड़े बैठे हैं। यह आत्मा निरवयव होने के कारण काटा नहीं जा सकता, जलाया नहीं जा सकता, जलाया नहीं जा सकता, सुखाया नहीं जा सकता। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, निश्चल और सनातन

47:18 है। सनातन ही कहना है अपने आप को अगर तो आत्मस्थ हो जाओ। आत्मा ही तो सनातन है। करवा चौथ थोड़े ही सनातन। कृष्ण बता रहे हैं क्या सनातन है? आत्मा सनातन है। ये जो हजार तरह के देवी देवता बना लिए थोड़ी सनातन है। ये जो इतने रीति रिवाज बना लिए हैं और हर गांव में बदलती हुई मान्यताएं बना ली है। इस गांव का फलाना देवता, वहां का फलाना देवता, पहाड़ों का एक देवता, जमीन का एक देवता, मछुआरों का एक यह वो यह थोड़ी सनातन है। यहां पर हो तुम विवाह होता है कहीं और चले

48:03 आते हो नहीं हमारी तरफ तो यह मान्यता है अच्छा पहले बुधवार का व्रत रखते थे नहीं हमारे शुक्रवार का रखते हो शुक्रवार का रख दो इसमें कुछ सनातन है नहीं हमारे यहां कहते हैं चार चूड़ियां पहननी चाहिए अच्छा हमारी तरफ से छह पहनते थे इसका नाम धर्म है ये धर्म है धर्म की क्या परिभाषा है आत्मा की ओर जाना धर्म है किस दिन व्रत रख रहे हो, कितनी चूड़ियां पहन रहे हो, किस पेड़ के चक्कर काट रहे हो, इसमें धर्म नहीं है। हां, इतना जरूर है कि बहुत सारी प्रथाएं सभी नहीं बहुत सारी बहुत सारी प्रथाएं पूरी तरह व्यर्थ। बहुत सारी प्रथाओं में निहित कुछ गढ़ अर्थ भी है अगर उन्हें समझा जा सके। अगर समझ करके उन

48:49 प्रथाओं का पालन करो तो कुछ लाभ हो सकता है। पर पहली बात अधिकांश प्रथाएं या कम से कम बहुत सारी प्रथाएं कोई अर्थ रखती नहीं उन्हें तुरंत त्याग देना चाहिए जिसमें जाति प्रथा भी शामिल है। और दूसरी बात जो प्रथाएं कुछ अर्थ रखती भी है अगर तुम उनका अनुकरण कर रहे हो बिना समझे उनको तो भंडू ही हो। उससे आत्म लाभ नहीं होने वाला। समझ में आ रही है बात कुछ निरवयव अवयव माने क्या होता है हिस्से आत्मा के हिस्से नहीं होते तो तुम्हारी आत्मा मेरी आत्मा नहीं हो सकता

49:36 ना ये हो सकता है कि आत्मा को चोट लग गई यहां तो कह रहे हैं नैन शस्त्र यहां लोग बोलते हैं तेरी बातों से मेरी आत्मा को बड़ी चोट लगती है थप्पड़ पड़ना चाहिए इतना ही बोलने पर बोले अब लगेगी चोट पहले नहीं लगी थी आत्मा को तो चोट लग ही नहीं सकती चोट इसको बोलते हैं जो अभी गाल पर लगी समझ में आ रही है आत्मा को नहीं आत्मा को कुछ नहीं हो सकता आत्मा का नाम बहुत रुक के लिया करो कम लिया करो और जब लो तो बड़ी सतर्कता और सम्मान से भगवान भगवान करते हो भगवान से बहुत ऊपर की चीज है आत्मा वो कोई चीज ही नहीं इसलिए बहुत ऊपर की चीज सनातनी होने का अर्थ

50:22 भगवान का पुजारी होना नहीं है। सनातनी होने का अर्थ है आत्मज्ञानी होना। भगवान को मानने वाला सनातनी नहीं हो गया। आत्मज्ञानी जो है वह सनातनी है। इसी तरीके से नास्तिक और आस्तिक का अर्थ ये नहीं होता कि कौन ईश्वर को मानता है और कौन नहीं मानता। जो आत्मा को बोले अस्ति है वो आस्तिक है। और जो इधर-उधर की सारी बातों को हां बोल रहा है और आत्मा उसको समझ में नहीं आती। वो घोर नास्तिक है। भले ही वो दिन में 10 बार मंदिर जाता हो। मंदिर जाने से आस्तिक नहीं हो जाते आप।

51:08 मंदिर खूब जाने वाले अधिकांश लोग वास्तव में पूरी तरह नास्तिक है। क्योंकि उन्हें आत्मा का कुछ पता नहीं। दो तरह के लोग होते हैं धर्म की दुनिया में। एक जो गॉड को या भगवान को मानते हैं और दूसरे जो आत्मा की तरफ बढ़ते हैं। कहने की जरूरत नहीं इनमें से नास्तिक कौन है? और ये तो बहुत अलग-अलग तरह के लोग हैं। वेदांत में जिसमें गीता भी सम्मिलित

51:55 है। गॉड जैसी कोई चीज नहीं होती। कृष्ण ईश्वर नहीं है। ब्रह्म है, आत्मा है। आप कहते हो भगवान वो जो दुनिया को चलाता है। यह पूरी दुनिया ही किस में आती है? प्रकृति में। और हम कह रहे हैं पूरी दुनिया ही क्या है? मिथ्या। तो मिथ्या को चलाने वाला भी कौन हुआ? मिथ्या। प्रकृति स्वनिर्धारित नियमों पर चलती है। और उन नियमों को भी देखने वाले कौन है? जो प्रकृति के भीतर ही है। तो आप यह भी नहीं कह सकते कि प्रकृति के कुछ नियम है तो बनाए किसने? प्रकृति के कुछ नियम है। यह बात भी किसको प्रतीत हो रही

52:40 है? आपको और आप कौन हो? प्रकृति से बाहर क्यों हो? आप भी तो प्रकृति के अंदर के ही हो। जो प्रकृति के भीतर है उसी को ऐसा लग रहा है कि कोई नियम है। नहीं तो क्या पता नियम है? नहीं है। जब प्रकृति ही नहीं है तो नियम कहां से हो जाएगा? तो ये तर्क भी व्यर्थ है कि कोई ईश्वर है जो प्रकृति को चला रहा है इत्यादि। अगर कोई ईश्वर है भी तो उसका नाम प्रकृति स्वयं है। अगर आप यह भी कहना चाहते हो कि प्रकृति है तो चलाने वाला कोई होगा तो प्रकृति स्वयं अपनी ईश्वर है। और भारत में इस बात को माना ही गया है। देवी या शक्ति या महामां प्रकृति का ही दूसरा नाम है। तो उनको ईश्वर मान के पूजा भी गया है। उनको ईश्वर मान के पूजा क्यों गया है? थोड़ी देर पहले हमने चर्चा करी थी।

53:25 क्योंकि वह अहम की मदद कर सकती हैं। आत्मा की ओर जाने में इस नाते पूजा भी हुई है। पर फिर वो कोई अलग से शक्ति नहीं है जो दुनिया को चला रही है। यह जो पूरी दुनिया के लिए एक संयुक्त शब्द दे दिया गया है शक्ति उस शक्ति मात्र की पूजा है। वो भगवान फिर कोई अलग नहीं बैठा हुआ है। वो फिर इस दुनिया में ही है। वो प्रकृति के नियमों में ही निहित है। यह वेदांत का दृष्टिकोण। समझ में आ रही है बात कुछ आगे सुनिए यह आत्मा वाणी से व्यक्त नहीं किया जा सकता थोड़ी देर पहले मैं बोल रहा था

54:13 रुक के बात करो आत्मा कोई चीज नहीं है कोई सिद्धांत कोई कांसेप्ट नहीं है कि उसके बारे में बक बक बक बक बक बक बक बक मेरी आत्मा तेरी आत्मा आत्मा शुद्ध रखनी चाहिए आत्मा पे संस्कार चढ़ जाते हैं क्या बकवास क्यों जनता को मूर्ख बना रहे हो? यह आत्मा वाणी से व्यक्त नहीं किया जा सकता। मन से इसका विचार नहीं किया जा सकता और यह विकार रहित है। यह विकार रहित तो ये क्या बातें हैं? कि आत्मा अशुद्ध है। उसे शुद्ध करना है। आत्मा अशांत है। भगवान इनकी आत्मा को शांति देना। ये कैसी बातें हैं? तुम्हें कृष्ण का विरोध करने के अलावा कुछ नहीं करना है। इतनी क्या जिद है कृष्ण के विरोध में जाने की? वह बता रहे हैं आत्मा

54:59 में कभी कोई विकार आ ही नहीं सकता। और तुम कह रहे हो आत्मा अशांत हो गई थी। भगवान मृतक की आत्मा को शांति दे। मृतक का आत्मा से क्या संबंध है? ये कैसी बात है? आत्मा को शांति दे। अशांत तो जीवन भर मन रहता है और मन हो गया राख। अब शांति किसको मिले? शांति जो भी मिल सकती थी वो जीते जी मिल सकती थी। तब तुमने मिलने नहीं दी क्योंकि तुम्हें आत्मा कुछ पता नहीं। अब जब वो मर गया तब और बेवकूफी की बातें भगवान इनकी आत्मा को शांति दे। और कृष्ण समझा रहे हैं आत्मा तो कभी अशांत होती ही नहीं। तो शांति की क्या बात है? काश कि हमने कृष्ण को और उनकी गीता को अपने जीवन में उतारा होता। पर हमें तो

55:45 जन्माष्टमी पर उनको खीर चटाने से फुर्सत ही नहीं मिली। कृष्ण का मतलब क्या है? कान्हा और उनकी बाल क्रीड़ा गीता के कृष्ण जो वास्तविक है उनसे हमें कोई प्रयोजन नहीं रहता। कहानियों के कृष्ण हमको बहुत प्रिय है। क्योंकि कहानियां हमारे स्तर की होती है ना। गीता हमसे बहुत ऊपर की है। तो गीता की और हम देखना ही नहीं चाहते। अतः अर्जुन शोक मत करो शोक मत

56:30 करो शोक सिर्फ एक स्थिति में करना अर्जुन जब तुम पाओ कि तुम अपने गंतव्य अपने सत्य अपने प्रेम अपनी आत्मा तक नहीं पहुंच पा रहे हो। सिर्फ तब शोक करना। प्रकृति के लिए शोक नहीं किया जाता। शोक तब किया जाता है जब प्रकृति तुम्हें बांध ले। प्रकृति के मोह में शोक नहीं करना चाहिए। जब प्रकृति तुम्हें बांध ले तब शोक करना चाहिए। बंधो मत खड़े हो जाओ। धनुष उठाओ। जो धर्म है वो करके दिखाओ। बंधो मत।

57:16 आचार्य जी मेरा प्रश्न है आचार्य जैसे अहम तो अहम में जैसे मेरा अहम वृत्त तो उसमें अहम जैसे अपना मेरा शरीर उसमें सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर का भी जिक्र वो सब इधर ही है सब इधर ही है तो ये जो पुनर्जन्म जो बार-बार जो बदलने का हो रहा है तो उसमें अहम वृत्ति में वो सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर फिर वो कोई मतलब इंडिविजुअलाइज रहता है या मतलब अलग-अलग जैसे आप फिर पुनर्जन्म हुआ फिर दोबारा हुआ। बिल्कुल अच्छा प्रश्न जो व्यक्तिगत होता है वो उतना ही स्थूल होता है। जैसे जैसे गहरे जाते जाएंगे तो चीजें एक जैसी

58:03 होती जाती है। उदाहरण के लिए आपको क्रोध आया सुरेश पर और इनको क्रोध आया रमेश पर। दोनों के क्रोध की पहली बात तो अभिव्यक्ति बहुत अलग तरीके से होगी। हो सकता है आपको क्रोध आया तो आप चांटा मार दे इनको क्रोध आया तो ये बातचीत करना बंद कर दे दोनों बहुत अलग-अलग तरीके हैं क्रोध के भी व्यक्ति को दूसरी बात क्रोध के विषय अलग-अलग है आपका सुरेश है इनका रमेश है लेकिन और गहरे जाएंगे आप सिर्फ क्रोध को देखेंगे तो कहेंगे अब तो बात एक हो गई दोनों को जो आया वो एक ही था क्या क्रोध ठीक है लेकिन अभी भी भिन्नता रहेगी अगर हम देखें कि आपको क्रोध आया और उनको मोह आया अभी भी भिन्नता है और नीचे जाएंगे तो

58:49 पाएंगे वो भिन्नता भी समाप्त हो गई क्योंकि क्रोध और मोह दोनों आए थे अहम वृत्ति की रक्षा करने के लिए तो देखिए एक हो गए। तो इस तरीके से जैसेजैसे आप नीचे जाते हैं और कारण शरीर तक पहुंचते जाते हैं वैसे वैसे आप पाते हैं कि जो भिन्नताएं हैं जगत में इतनी विविधताएं वो विविधताएं समाप्त होती जाती हैं। अहम वृत्ति के तल पर एक बचता है और आत्मा के तल पर एक भी नहीं बचता। आप अहम वृत्ति के तल पर एकत्व बचता है। एकत्व जितना आप ऊपर होते हैं उतना ज्यादा विविधताएं दिखती हैं। जितना आप नीचे जाते हैं उतना आपको एकताएं दिखती हैं। अहम वृत्ति के तल पर सिर्फ एकता बचती है कि जितने लोग बैठे हैं ये सब एक हैं। कैसे एक हैं? अहम वृत्ति

59:35 इनकी साझी है। ऊपर आते जाइए तो अलग है। इतनी देह हैं सब अलग-अलग है। इतनी देह हैं सब अलग-अलग है। थोड़ा नीचे जाएंगे तो आप पाएंगे कि अह वृत्त एक है और फिर है आत्मा जो एक भी नहीं है। इसी का कंटिन्यूस प्रश्न है कि तो ये जो जैसे स्थूल शरीर तो खत्म हो गया तो ये सूक्ष्म शरीर कारण शरीर वो ये सब भी खत्म है। बचती है सिर्फ अहम वृत्ति अहम वृत्ति सिर्फ अहम वृत्ति वो जड़ है वो बची रह जाती है बस जड़ भी छोड़िए वो बीज है बस वो बीज बचा रह जाता है आप कहे कि पत्तियां गिर गई पत्तियों के

1:00:20 बाद क्या टहनियां बची रह जाती है क्या तना बचा रह जाता है बीज भर बचा रह जाता है बीज और वो बीज एकदम अदृश्य एकदम महीन वो जो बीज है वो मिटता नहीं और बीज कहां से आया कुछ पता नहीं इसीलिए माया को अनादि कहते हैं। अनादि अनादि माया ब्रह्म से ज्यादा रुचि ऋषियों ने माया में दिखाई है। क्योंकि वो बड़ी जबरदस्त चीज है। वही उस बीज है। अहम वृत्त माया है। बहुत जबरदस्त है वो। सब कुछ मिट जाता है। अभी हम कह रहे थे ना रूप रंग सारे सब बदलने को तैयार है। वो पत्तियां भी कट जाए, टहनियां कट जाए, तने कट जाए, सब कट जाए, बीज बचा रह जाता है। वो बीज फिर नए नए आकार ले लेता है। इसी को पुनर्जन्म कहते हैं।

1:01:07 तो आचार्य जी जैसे पुनर्जन्म जो तो ये जो बीज हुआ तो वो मतलब वो महज एक जैसे एक ही उसका मतलब दोबारा दूसरे जन्म से उसका कोई संबंध नहीं हो सकता। पूरा संबंध है। बीज ही एक जन्म ले रहा है। बीज ही दूसरा जन्म ले रहा है। पर पिछले जन्म का अच्छा उसके एक जन्म का दूसरे जन्म से नहीं उनमें कोई संबंध नहीं है। उनमें कोई संबंध नहीं है कि श्याम को याद आ गया कि पिछले जन्म में मैं राम था। ना ना। ये भी भारत में एक अच्छा व्यवसाय रहा है। एकदम उद्योग रहा है। बीच-बीच में ऐसे खूब निकल के आते हैं। मुझे ही याद आता है मेरा पिछला जन्म। सबको अपने अपने पिछले जन्म में याद आते

1:01:52 रहते हैं। यह बड़ा बढ़िया व्यवसाय चलता है। तो मतलब मुक्ति का जो भी साधन या उपाय मतलब एक ही जन्म में संभव है। ऐसा नहीं है कि उसका कंटिन्यूशन नहीं है। आप और क्या कर सकते हो? आप बताओ ना। हां। काल करे सो आज कर। काहे के लिए बात भविष्य पे टालते हो? अगला जन्म तो छोड़ दो। मैं तो कह रहा हूं कल पर भी क्यों टाल रहे हो? और एक दूसरा प्रश्न है आचार्य जी कि जो जैसे अहम और आत्मा आत्मा बिल्कुल असंग है उसका इससे प्रकृति से कोई नाता नहीं हो सकता है तो जो अहम को आत्मा से मिलन होगा तो वो

1:02:39 अंत समय तक अहम तो कुछ रह ही जाएगा ना जैसे उसी अहम को वो जितना भी प्रयास करेगा तो अहम से ही प्रयास प्रयास पूरा वहीं पर होता है। प्रयास पूरा अहम ही करेगा। बिल्कुल। लेकिन उस अहम का पहुंच नहीं है आत्मा तक। तो फिर जब पहुंचेगा तो शून्य हो जाएगा। जैसे कि आपकी गाड़ी में बस उतना ही तेल हो कि ठीक मंजिल तक पहुंचेगी। वो मंजिल इस तरीके की है कि वो मिलेगी ही तब जब गाड़ी का तेल खत्म हो गया हो। और जहां आपकी गाड़ी का तेल खत्म हो जाएगा वहां मंजिल खड़ी होगी। पर हम तेल खत्म करने को तैयार नहीं होते। हम डरते बहुत होते हैं। हम कहते हैं तेल बचा के

1:03:25 रखो। तुम बचा के रखे हो इसीलिए मंजिल मिल नहीं रही। इसी का कंटिन जैसे आपका चेतना के तल पे आप एक वीडियो हम सुने थे तो उससे ऐसा आभास हुआ कि अहम का कितना भी प्रयास हो वो आत्मा तक पहुंच नहीं सकता है। वो अहम की अपना उसका इतनी अपना अपना उसका इतना शक्ति नहीं है कि वहां तक पहुंच जाए। उसके लिए किसी आत्मस्थ का मतलब उनके चेतना के द्वारा ही या मतलब उनके द्वारा ही यह संभव है कि वो आत्मा तक

1:04:10 पहुंचे। अपने प्रयास से संभव नहीं। इसका अर्थ ये है कि अहम जैसा है वैसा रहते हुए वो कितना भी प्रयास करेगा तो वो बहुत आगे नहीं बढ़ पाएगा। जब मैं कहता हूं आप अपने प्रयास से नहीं पहुंच सकते। तो मैं आपकी बात कर रहा हूं ना। आपके प्रयास के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है आपका यह हठ कि मैं जैसा हूं ऐसा रहते हुए ही प्रयास करूंगा। उदाहरण के लिए मैं मोटा हूं। मैं कहूं मैं मोटा रहते रहते 40 किलोमीटर दौडूंगा और मंजिल तक पहुंच जाऊंगा तो पहुंच सकता हूं क्या? या तो मैं मंजिल तक पहुंचूंगा या जैसा हूं वैसा रहूंगा। दोनों एक साथ नहीं हो सकते। अगर मंजिल तक पहुंचना है तो मुझे बदलना पड़ेगा। अहंकार कहता है मंजिल भी चाहिए बदलना भी नहीं है। यह नहीं हो पाता। मंजिल जितनी निकट आती है अहंकार पाता है

1:04:57 वह उतना गलता जा रहा है उतना गलता जा रहा है गलता जा रहा है और ठीक मंजिल पर एकदम बचता ही नहीं वो वरना मंजिल मिलेगी नहीं तो वो अपना प्रयास से संभव हो सकता है या किन आप अभी जैसे हैं आप प्रयास जब करते हैं तो आप बदल जाते हैं तो अब जो अगला जो जो इकाई है जो अगला शख्स है वो जो प्रयास कर रहा होता है वो उसका होता है ना आपका थोड़ी थोड़ी होता है। तो आपका प्रयास आपको इतना ही ले जा सकता है। अगला प्रयास किसका होगा? दूसरे का। दूसरे का। आपके मन में दुविधा इसलिए उठ रही हो कि आप कह रहे हैं पर मैं तो वही हूं ना जो आज था जो कल था नहीं। आपकी देह वही है। आप भीतर से पूरी तरह बदल गए।कि हम देहाभिमान में रहते हैं।

1:05:43 इसीलिए हमें नहीं समझ में आता कि हम लगातार बदल रहे हैं। अहंकार अपने प्रयास से नहीं पहुंच सकता। माने अहंकार जैसा अभी है ऐसा रहते हुए नहीं पहुंच सकता। और यह बात हर दिन पर लागू होती है। आप आ जाएंगे तो मैं कहूंगा आप जैसे अभी है ना आप ऐसे रहते वहां नहीं पहुंच सकते। चाहिए मेहनत करिए। आप मेहनत करके आएंगे मेरे पास। मैं आपको फिर क्या बोलूंगा? अब आप बदल चुके हैं। लेकिन इस बदले हुए व्यक्ति से भी मैं यही बोलूंगा कि आप जैसे अभी हैं। पैसे रहते हुए भी नहीं पहुंच सकते। जाइए। फिर आप आएंगे। मैं कहूंगा अब आप बदल चुके हैं। ये तीसरा व्यक्ति है। ये पहला दूसरा गया। अभी तीसरा व्यक्ति है। मैं इस तीसरे व्यक्ति से भी यही बोलूंगा। आप जैसे अभी हैं ऐसे रहते हुए नहीं पहुंच सकते। इसी का कंटिन्यूशन है आचार्य जी। जैसे

1:06:31 मेरा ये मतलब इसका डायरेक्ट क्वेश्चन है कि वो जो मतलब जो सुने हैं या पढ़े हैं कि किसी भी साधक का मुक्ति मतलब बिना गुरु का संभव नहीं है। इसी का मतलब यह जो अपने बदलने का उसका डायरेक्ट ताल्लुक हां तो ये सही बात है ना आप यहां पर हो प्रकृति के बीचोंबीच वहां आपको 100 तरीके से लुभाया फंसाया जा रहा है दो ताकतें आप पर काम कर रही है एक जो आत्मा की ओर खींचती है एक जो आपको संसार में बांधे रखती है जो संसार में बांधे रखती है ज्यादा निकट की लगती है क्योंकि वो इंद्रियों को दिखाई दे रहे हैं लोग हैं चीजें हैं रुपया पैसा ये सब है तो वो आपको पकड़ के रखते

1:07:16 गुरु माने क्या? कोई ऐसी ताकत जो आपको उधर को धकेल दे और वो नहीं होगी ताकत तो आप उधर को नहीं जा पाओगे। आपका मन ही नहीं करेगा जाने का। इधर इतना कुछ है कौन उधर को जाएगा। और इधर जो कुछ है वो प्रमाण के साथ है। उधर जो है उसका कुछ पता नहीं। कुछ है भी कि नहीं है। जाने क्या होता है। बर्बाद ना हो जाए। चोट ना लग जाए क्या हो जाए। कुछ पता नहीं। कुछ होता भी है। हम ही बेवकूफ है उधर को जाए। सब तो यहां मौज कर रहे हैं। तो कोई ऐसी ताकत चाहिए होती है जो आपको धक्का देके उधर को फेंके। उसी को गुरु कहते हैं। भगवान श्री प्रणाम। अभी जो चर्चा चल रही थी अहम वृत्त तो जो बात है स्वर् धर्म

1:08:01 निधन श्रेय तो जो प्रयास है जब सब खत्म ही हो जाएगा उस मुक्ति की तरफ मान लीजिए अहम आत्मा तक जाने का प्रयास कर रहा है बीच में कहीं छूट गया तो इसका कुछ अहम वृत्ति पे जाके जैसे सुख शरीर में कहते हैं वो डीप प्रोग्रामिंग हो जाती है वो उस तरह कुछ रहता है नहीं समझा क्या कह रहे हैं ऐसा ऐसा अहम प्रयास कर रहा है। इस जन्म में जो समय है मेरे पास मैं अब प्रयास कर रहा हूं। ये छूट गया बीच में। आपका यही जन्म है। हां इसमें आप प्रयास कर रहे हैं। आप कहीं तक पहुंचे। जहां तक पहुंचे वहां तक का फल आपको मिल गया। पहुंचने में ही मिल गया। उसका अहमवृत्ति पे कोई मतलब अहम वृत्ति अपनी जगह बैठी हुई है। अहमत्त आप जो हैं आप आप आपको उसका

1:08:51 अच्छा फल मिल जाएगा अगर आप आगे बढ़ रहे हैं। अहम वृत्ति जो है वह तो स्वयं इनहीं से आ रही है। कृष्ण कहते हैं ना मम माया वो उनहीं की है तो वो क्यों मिट जाएगी? वो तो रही आएगी। हां आप जो है आपकी जो इकाई है जिसका जीवन खराब हो रहा था जिसके लिए सारा अध्यात्म है। आपके लिए है ना सारा अध्यात्म। अह वृत्ति के लिए थोड़ी अध्यात्म है। आपके लिए व्यक्ति के लिए अध्यात्म है। कृष्ण ये थोड़ी कह रहे हैं कि अर्जुन का अहंकार अगर नष्ट हुआ है तो अह वृत्ति नष्ट हो गई। अगर अहम वृत्ति नष्ट हो गई होती तो दुर्योधन का भी नष्ट हो गया होता। अहम वृत्ति तो हमने क्या कहा सबकी एक है। अर्जुन को पूरा गीता ज्ञान दे दिया। लाभ किसको हुआ? अर्जुन को हुआ ना दुर्योधन को थोड़ी लाभ हो गया। तो पूरे अध्यात्म से जिसको लाभ होता है वो है

1:09:38 व्यक्तिगत अहंकार। अहम वृत्ति को लाभ वगैरह नहीं होता। उसे कोई लाभ चाहिए भी नहीं। वो तो कृष्ण की माया है। उसे आप क्या लाभ देंगे? वह तो अपना पड़ी हुई है। अध्यात्म अहम वृत्ति को लक्ष्य करके नहीं है। अध्यात्म का लाभ किसको होना है? आपके व्यक्तिगत जीवन को। आपके इस जीवन को आपके व्यक्तिगत अहंकार को। यह बात स्पष्ट रखिए। ये मूल सिद्धांत है। इनमें चूक नहीं होनी चाहिए। अध्यात्म आपके इस जीवन को लाभ देने के लिए है। आपके इस जीवन के बाद भी पहले भी जो दूसरे लोग हैं उनको अपना जीवन स्वयं निर्धारित करना है। कृष्ण उपलब्ध हैं। यह फैसला दुर्योधन को करना है कि उनसे लाभ

1:10:24 लेना है या नहीं लेना है। अर्जुन ने निर्णय लिया लाभ लेना है। अर्जुन को लाभ हो गया। दुर्योधन को नहीं लेना है। दुर्योधन को नहीं हुआ। जो मेन संशय है ऐसे बाहर के विचार से अहम व्यक्तिगत अहम परिवर्तित हो जाता है। तो जो जो भी कर्म किए प्रयास किए तो जो कहते हैं सूक्ष्म शरीर वाली प्रकृति की ही बात है। वो सूक्ष्म शरीर में प्रोग्राम हो जाता है। तो वो आगे यात्रा करता है। कुछ नहीं ऐसा है। मतलब वो सूक्ष्म शरीर आगे यात्रा करता है। सूक्ष्म शरीर कुछ नहीं होता। शरीर ही है। शरीर के ही कई तल बता दिए गए हैं। कुछ आगे नहीं यात्रा करता। स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर यह सब राख हो

1:11:09 जाने हैं। शरीर ना हो तो कोई सूक्ष्म शरीर होता है क्या? सूक्ष्म शरीर आप कहना भी चाहते हैं तो मन है सूक्ष्म शरीर। मन है बिना मस्तिष्क के। मस्तिष्क नहीं है तो मन है। तो जब मस्तिष्क को आग लगा दी, जल गया तो मन कहां बचा? यह कौन सी बात है कि स्थूल शरीर जला है। सूक्ष्म शरीर अभी यात्रा करेगा। जिसको आप सूक्ष्म शरीर कहते हैं। वो शरीर ही है जो सूक्ष्म है। जो इंद्रियों को दिखाई नहीं देता। लेकिन हां उपकरणों को वो भी दिखाई देता है। आप जिसको मन बोलते हैं वो विचारों के अतिरिक्त कुछ है। और अभी बहुत सारे ऐसे उपकरण हैं जो

1:11:54 आपके विचारों को तरंगों की तरह वेव्स की तरह पकड़ लेते हैं। आप उन्हें देख नहीं सकते। पर उपकरण देख लेगा। इंस्ट्रूमेंट रखा होगा। वो बिल्कुल देख लेगा। आपकी ब्रेन वेव्स क्या चल रही है। आप सपना देख रहे हैं या नहीं देख रहे हैं ये बात भी इंस्ट्रूमेंट बता देगा। आपके बगल में रख दिया जाए तो। तो वो जो इंस्ट्रूमेंट है वो किसी पारलौकिक चीज को पकड़ रहा है क्या? वो भी एक मटेरियल चीज को पकड़ रहा है। तो जिसको और इंस्ट्रूमेंट किसको पकड़ रहा है? सूक्ष्म चीज को पकड़ रहा है। माने जो सूक्ष्म चीज है वही मटेरियल है। अगर मटेरियल है तो आग लगने के बाद बचेगी क्या? तो ये सारी बातें मन से निकाल दीजिए कि स्थूल शरीर या सूक्ष्म शरीर या कोई शरीर मरने के बाद बच जाता है। वो सब इसी देह की उत्पत्ति है। आपके स्थूल शरीर पर कोई हथौड़ा मारता है।

1:12:41 उसका आपके मन पर असर पड़ता है कि नहीं पड़ता है? पड़ता है कि नहीं पड़ता है? तो वही तो बोल रहा हूं। मस्तिष्क के बिना कौन सा मन होगा? और जब मस्तिष्क जल गया तो मन कहां से बचेगा? आपकी जितनी स्मृतियां होती हैं आपको पता है ना वो कहां बैठी होती हैं? वह मस्तिष्क के तंतुओं में बैठी होती हैं। इसीलिए आपको अगर जरा सा कोई हथौड़ा मार दे सर पर या कुछ भी हो चोट लग जाए, कुछ भी हो जाए या कोई आप उल्टी पुल्टी दवाई खा ले तो आपकी स्मृति उड़ जाती है। इतना ही नहीं आप बूढ़े होने लगे तो भी स्मृति उड़ने लग जाती है। स्मृति तो इतना सा झटका नहीं बर्दाश्त कर सकती कि उस पर जरा सी चोट लग गई मस्तिष्क पर। मस्तिष्क पर जरा सी चोट भी लग जाए तो स्मृति चली जाती है। तो जब मस्तिष्क में आग ही लग जाएगी तो स्मृति बचेगी

1:13:26 क्या? तो जब जल गया मस्तिष्क तो किसको याद रहेगा अगला पिछला? नहीं समझ में आ रही बात? थोड़ी सी आप शराब पी ले। आप चीजें भूल जाते हैं। मस्तिष्क पर जरा सा रासायनिक हमला हो गया है। शराब पी ली है आपने तो भी स्मृति उड़ जाती है। बेचारे डॉक्टर लगे हुए हैं। लोगों की याददाश्त चली गई है। वापस नहीं आ रही है। याददाश्त भी मटेरियल चीज होती है। वह मस्तिष्क की सेल्स में बैठती है। जैसे एक हार्ड डिस्क होती है। हार्ड डिस्क होती है। उसमें मेमोरी कहां है? मेमोरी कोई सल चीज है। मेमोरी क्या चीज है? हार्ड डिस्क में मेमोरी कहां होती है? मटेरियल चीज है ना? मटेरियल है बिल्कुल।

1:14:12 इसीलिए आपको पता है कि कितनी है? आप क्वांटिफाई कर सकते हो। आपको पता है आप अपनी मेमोरी भी क्वांटिफाई कर सकते हो। करी जा चुकी है। ह्यूमन ब्रेन कितनी मेमोरी रख सकता है उसका भी क्वांटिफिकेशन है हार्ड डिस्क की तरह। हार्ड डिस्क में आग लगा दो। बताओ मेमोरी कहां गई? हार्ड डिस्क में आग लगा दो। मेमोरी में जो कुछ था वो कहां गया? तो आपकी हार्ड डिस्क में जब आग लग जाएगी तो मेमोरी कहां से बचेगी बाबा? दोनों का प्रोसेस बिल्कुल एक है। उसमें भी मटेरियल में मेमोरी स्टोर होती है और आपके मस्तिष्क में भी मटेरियल में ही मेमोरी स्टोर होती है। दोनों बिल्कुल एक है। तो मरने के बाद मेमोरी बची रहने का क्या सवाल है? यह तक तय है कि मस्तिष्क के किस हिस्से

1:14:58 में किस तरह की मेमोरी स्टोर होती है। यह तक तय है। इसीलिए कई लोग जिनकी मेमोरी जाती है उनकी बस कुछ खास तरह की मेमोरीज जाती है। बाकी याद रह जाती है। क्योंकि उनके मस्तिष्क के एक खास हिस्से में चोट लगी होती है। मस्तिष्क भी हार्ड डिस्क की तरह ऑपरेट करता है। तो मेमोरी बची रह जाएगी और यह सब है बेकार की बात। आचार्य जी मेरा यह सवाल था कि जैसे अभी शोक की बात हो रही थी कि अर्जुन से कहा जा रहा है कि तुम शोक ग्रस मत रहो। तो अगर कोई व्यक्ति प्रकृति से मोहित है तो उस वक्त तो उसे यह याद नहीं होगा कि मुझे

1:15:45 आत्मा की तरफ बढ़ना है क्योंकि वह तो प्रकृति से अभी पूरा घिरा हुआ है और उसी में लिप्त है तो उस पल में उसको कैसे याद आए कि यह प्रकृति से परे भी कुछ है से मिल नहीं रहा ना उसी बात से याद आ जाएगा तुम एक तुम्हें दर्द हो रहा है ठीक है हाथ में और तुम एक बहुत बड़े मेगा स्टोर में हो बहुत बड़ा मेगा मार्ट है बिल्कुल वहां सब कुछ है और जो कुछ है तुम्हें मोहित कर रहा है

1:16:31 खूब मोहित कर रहा अब बताओ तुम्हें कैसे याद आएगा कि तुम्हें डॉक्टर के पास जाना है? मैं तुमसे पूछ दर्द वो दर्द याद आएगा। यही जवाब है। जो कुछ भी तुम्हें मोहित कर रहा है उससे दर्द चला गया क्या? तो बस याद आ जाएगा। लेकिन जो मोहित करता है उससे दर्द तो नहीं गया या शायद दर्द बढ़ भी गया। लेकिन वो साथ-साथ बेहोशी भी डाल दिया। तो बेहोशी भी बढ़ा और दर्द भी बढ़ा। फिर दर्द पता ही नहीं चला। बेहोश भी और ज्यादा होने के लिए थोड़ा होश चाहिए। मान लो बेहोश हो रहे हो, शराब पी रहे हो, बोतल खत्म हो गई। अगली बोतल मंगाने के लिए भी थोड़ा होश चाहिए ना। हां। जिस होश का इस्तेमाल करके और बेहोश होना चाहोगे। वही होश याद दिला देगा कि

1:17:17 दर्द हो रहा है और बढ़ रहा है। अगर इतने होश में हो कि एक बोतल और मंगाओगे, तो इतने होश में भी हो अभी कि दर्द का अनुभव कर पाओगे। और जब दर्द का अनुभव होगा तो अपने आप नशा गिरेगा। कहोगे यह पी पी करके तो दर्द मिट नहीं रहा। कुछ और करना पड़ेगा। अच्छा अच्छा आपने अभी थोड़ी देर पहले बताया कि ये जो संसार है ये प्रकृति है यह आत्मा का विवर्तन है। तो यह विवर्तन हुआ कैसे? नहीं हुआ। जिनको लग रहा है हुआ बस उन्हीं के लिए हुआ। हुआ कैसे? तो ऐसे पूछ रहे हो जैसे विवर्तन सचमुच हुआ। हुआ थोड़ी है। तुम्हें लग रहा है कि हुआ

1:18:07 है। तुम जब तक प्रकृति के भीतर हो तुम्हें लगेगा प्रकृति है इसलिए तुम कहोगे विवर्तन हुआ। उस पल के लिए जीना है जब कोई कहे कि विवर्तन हुआ तो तुम कहो हुआ ही नहीं। सत्य मात्र है कौन सी प्रकृति? और प्रकृति यदि है भी यह शरीर तो कहता रहेगा कि है क्योंकि आंखें देखेंगी उनको दिखाई देगा अभी ऊपर छत है, दीवार है, रोशनी है। तुम कहोगे है भी तो इनके लिए है, मेरे लिए नहीं है। कोई विवर्तन नहीं हुआ। अच्छा अभी जैसे आप मौत की बात कर रहे थे

1:18:52 जैसे पिछले श्लोक में गीता में बताया गया कि ना ह्यते हन्यमान शरीर तो जब मेरे शरीर की मृत्यु हो गई लेकिन तब ये बोलने के लिए बचा कौन कि शरीर मर गया लेकिन आत्मा भी आत्मा नहीं मरी ये बोलने वाला भी तो मन था लेकिन मन तो मर गया तो वो मन नहीं बोल रहा किसी और का मन बोल रहा है ये ना हते माने शरीर से आशय है कि शरीर से जुड़ी हुई नहीं है। शरीर आते रहते हैं, जाते रहते हैं। शरीर आते रहते हैं, शरीर जाते रहता है। ठीक है? शरीरों से आगे सत्य है। इसीलिए शरीर को गंभीरता से नहीं लेना है बल्कि शरीर का इस्तेमाल करना है सत्य

1:19:41 तक पहुंचने के लिए और इस्तेमाल जरा जल्दी जल्दी करना है क्योंकि शरीर जल्दी ही गिर जाता है। ठीक है? शरीर महत्व का नहीं है। लेकिन इतना महत्व जरूर है शरीर का कि वो हमें परेशान करके रख देगा। शरीर के भीतर जो चेतना बैठी है वो शरीर से ही परेशान है। तो और शरीर बिना वो चेतना है भी नहीं। अभी हम कह रहे थे स्थूल शरीर बिना सूक्ष्म शरीर है भी नहीं। शरीर बिना चेतना होती है कुछ। छोटा बच्चा भी जब गर्भ में होता है ना तो डॉक्टर बोलते हैं कि धीरेधी करके उसमें चेतना विकसित होती है। इसी बात को आधार

1:20:26 बनाकर बहुत सारे देशों में गर्भपात के लिए भी सीमा तय की जाती है। वो कहते हैं इतने महीनों तक उसमें चेतना एकदम शून्य बराबर है। तो इतने महीनों तक गर्भपात कर सकते हो। उसके बाद उसमें चेतना बढ़ने लगती है। तो शरीर पहले है फिर चेतना है। शरीर एक तरह से चेतना की मां है। तो शरीर जब नहीं तो चेतना भी नहीं। साथ ही साथ ये जो चेतना है जो उठी शरीर से ही है। वो परेशान भी शरीर से ही है। आई तो वो शरीर से है। पर वो परेशान भी शरीर से है। शरीर से परेशान है। इस्तेमाल भी उसे शरीर का करना है। चेतना और शरीर का रिश्ता थोड़ा जटिल है। शरीर से आई है। शरीर से ही परेशान है। लेकिन उस चेतना को अगर मुक्त

1:21:14 चाहिए तो उसे इस्तेमाल भी किसका करना है? शरीर का ही करना है। अब शरीर चीज ऐसी है जो जल्दी ही हो जाएगी। खत्म हो जाएगा। तो उससे पहले कि वो खत्म हो उसका इस्तेमाल कर लो। नहीं तो जब तक शरीर रहेगा चेतना भी रहेगी और परेशान रहेगी। परेशानी से आगे निकलना हो तो समय खराब मत करो। ठीक है समझ गए। धन्यवाद। नमस्कार जी। ये जो चर्चा हो रही थी के हम जो संचालित है वो अहम से और संसार से। तो जो हमारे कर्म निकलते हैं वह या तो

1:22:00 हम से निकलते हैं या संसार से निकलते हैं। तो जिसे हम आत्मा होना बोलते जो आत्मा की तरफ यात्रा करना होता है तो अगर हमारे वो हम वो कर्म उस तरह के हो जाए जो अहम से भी ना निकले और वो संसार से भी प्रभावित ना हो तो क्या यही आत्मस्त होना होगा? क्योंकि हम नहीं कर्म सारे अहम के ही होते हैं। अहम ही कर्ता होता है। कर्ता और अहम एक ही चीज है। प्रश्न यह है कि वो कर्ता किसकी तरफ जाने के लिए पांव बढ़ा रहा है? उसकी चेतना क्या किधर को है? कहिए कि उसका रुझान किधर को है या उसका प्रेम किधर को है आत्मस्त होने

1:22:47 का मतलब है कर्ता कहे कि मुझे बाकी सरोकारों से मतलब नहीं इधर हानि होगी उधर लाभ होगा क्या मिलेगा क्या नहीं मिलेगा एक लक्ष्य है उधर कोई बढ़ते जाना है बाकी सब अधिक से अधिक ईंधन का काम कर सकता है आकर्षण का नहीं पेट्रोल पंप पे घर बनाना है जल्दी बोलो और पेट्रोल पंप जितने भी मिलेंगे सड़क पर उनकी उपेक्षा करनी है। तो आपका और संसार का रिश्ता गाड़ी और पेट्रोल पंप का होना चाहिए। क्या आप संसार की पूरी तरह उपेक्षा कर सकते हो? क्या गाड़ी पेट्रोल पंप की लगातार उपेक्षा कर सकती है? नहीं। क्या गाड़ी पेट्रोल पंप पर ही जाकर के चुपचाप पड़ी रहे? घर बना ले। ना उपेक्षा

1:23:34 कर सकते हैं ना वहां घर बना सकते हैं। आदमी का और संसार का बड़ा महीन रिश्ता होना चाहिए। इस संसार में रहकर भी नहीं रहना है। ना तो हम यह कर सकते हैं कि इसमें नहीं रहे कि हम कभी पेट्रोल पंप जाएंगे ही नहीं। नहीं जाओगे तो खत्म हो जाओगे। ना यह कर सकते हैं कि पेट्रोल पंप से ही प्यार कर लिया है। जाना है ईंधन लेना है। मंजिल की तरफ आगे बढ़ना है। असली चीज मंजिल है। दुनिया पेट्रोल पंप है। उससे बस ईंधन लेते हैं हम और अपनी मंजिल की ओर बढ़ते जाते हैं। जिसे श्री कृष्ण कह रहे हैं कि हमारा जो पहला धेय है वो अपनी मुक्ति और दूसरा संसार का कल्याण। हां। तो वही कर्म जो हमें उसकी तरफ ले जाएगा।

1:24:22 बिल्कुल प्रणाम आचार्य जी। मुझे ऐसा समझ में आया है कि अहम वृत्ति की वजह से अगर कोई आदमी कुछ भी करेगा तो वह गलत है। अहम वृत्ति को केंद्र में रखकर। तो साधक जो कि साधना के प्रयास कर रहा है उस दौरान भी तो वो प्रयास अहम वृत्ति से ही आ रहे होंगे। सब कुछ अहम वृत्ति ही करती है। अभी मैंने क्या बोला? एकमात्र करता कौन है? अहम प्रश्न ये नहीं है कि अहम कर रहा है, कोई और कर रहा है और कौन कुछ करेगा? जब आप साधारण भाषा में बोलते हैं कि देखो ये काम मत करो। तुम्हारे अहंकार से आ रहा है। यह कोई समझदारी का वक्तव्य नहीं है। क्योंकि हर काम अहंकार से ही आता है। मैं आपसे बोल रहा हूं। मैं कहां से बोल रहा हूं? अहंकार से बोल रहा

1:25:09 हूं। आप मुझे सुन रहे हैं। आप कहां सुन रहे हैं? अहंकार से सुन रहे हैं। प्रश्न ये नहीं है कि अहंकार से करा की नहीं करा? क्योंकि करने वाला अहंकार के अतिरिक्त और कोई हो ही नहीं सकता। प्रश्न यह है कि अहंकार ने जो करा किस दिशा में करा? मुक्ति कि दिशा में करा या और बंधन की दिशा में करा? सब कुछ करने वाला अहंकार ही है और कोई नहीं होता। तो साधक के साधना के दौरान किए गए प्रयास क्योंकि सत्य की दिशा में है तो वो अहम कोई जरूरी नहीं होता कि सत्य की दिशा में है। ज्यादातर साधक जिस तरह की साधना करते हैं वो उन्हें और बंधन में ही डालती है। ज्यादातर गुरु लोग आजकल जो साधना के नाम पर बेच रहे हैं वो बंधन में ही डालेगा। तो अगर ऐसा माने भी कि वह सही दिशा में अगर है भी जिस जिस दिशा में उन्हें सही

1:25:54 माना माना गया है तो वह अहम वृत्ति से होते हुए भी गलत नहीं माने जाएंगे मतलब क्योंकि वो अरे अहम वृत्ति से होते हुए भी गलत क्या माने? अह वृत्ति के अलावा और कुछ होता ही नहीं और आप कहां से कर्म आप कह रहे हैं अहम से होते हुए भी गलत नहीं माने जाएंगे। अहम से ना होने का कोई विकल्प ही नहीं होता। सब कुछ अहम ही करता है और कोई कुछ नहीं करता। कौन सा अहम है बस यह देखा जाता है। वो अहम जिसे आत्मा से प्रेम है या वो अहम जिसे अपनी सुरक्षा से प्रेम है। जो अपने आप को बचाए रखना चाहता है। अगर कोई आपसे बोले कि तुमसे मेरी आत्मा प्यार करती है तो फंस मत जाइएगा।

1:26:41 प्रेम करने वाला भी सिर्फ और सिर्फ कौन है? घृणा करने वाला भी सिर्फ और सिर्फ कौन है? सब कुछ करने वाला सिर्फ और सिर्फ कौन है? आत्मा अकर्ता है। उसे कुछ नहीं करना। क्योंकि कुछ करने के लिए कोई होना चाहिए ना जिस पर करो। आपको कुछ करना है तो जमीन चाहिए। खड़े होके तभी तो कुछ करोगे। आत्मा के अतिरिक्त तो कुछ है ही नहीं। तो आत्मा कुछ करे कैसे? प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी अभी आपने जैसे कहा कि ये अहम होता है जो अपने आप को बार-बार बचा लेता है तब से शुरू है जब से घड़ी स्टार्ट हुई फिर ये बीज रूप में अपने को बचा लेता है फिर वापस नए-नए आकार ले लेता है तो इसे ही

1:27:30 आपने माया भी बताया भगवान श्री कृष्ण जैसे श्री भगवत गीता में कहते हैं कि मेरी माया दुरत्य है सिर्फ मेरी शरण में आने वाला ही इससे बच सकता है तो वो कैसे है यही है उधर को बढ़ते रहना या कृष्ण की शरण में जाना बस वही और दूसरा यह था कि आपने बताया कि मस्तिष्क को अगर जैसे जला दिया जाए तो मन भी नहीं रहेगा। यह प्राकृतिक ही रहा एक तरह से मनो मस्तिष्क प्राकृतिक तो जो शांति और आनंद का अगर होता है वह भी क्या है यही है मतलब मन माने चेतना जब ऐसा हो जाए कि उसे शरीर से माने मस्तिष्क से कोई लेना देना ना रहे उसको

1:28:19 कहते हैं आनंद। मस्तिष्क से उठता है मन और मन व्याकुल रहता है मस्तिष्क से आजाद होने को। मन की सारी बेचैनी ही यही है कि वो नीचे से मस्तिष्क से जुड़ा हुआ है। इसी को देहाभिमान बोलते हैं। मस्तिष्क माने देह। मस्तिष्क से उठा है मन। पर वो नीचे से हम जैसे बच्चा नाभि से जुड़ा रहता है। अंबेलिकल कॉर्ड नीचे से किससे जुड़ा हुआ है? देह से माने मस्तिष्क से। सारा अध्यात्म इसलिए है कि मन मस्तिष्क से किसी तरह ऊपर उठ सके और मन का मस्तिष्क से ऊपर उठना उसी को दूसरे शब्दों में कहते हैं मन का विलोप मन अब बचा ही नहीं मन अब बचाइए तो मस्तिष्क में जो विचार आते हैं वो जब

1:29:05 आना बिल्कुल शांत हो जाए उसे ही नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं मस्तिष्क में विचारों का शांत होना लगभग वही बात हो गई कि अहम के कर्म बंद हो जाए विचार कर्म होते हैं विचार सूक्ष्म कर्म होते हैं ठीक है? हाथ से जो करो वो स्थूल कर्म है। विचार से जो करो वो सूक्ष्म कर्म है। तो विचारों का रुकना ऐसा ही है कि हाथ पाव रुक गए। विचारों का रुकना हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता आवश्यक नहीं है। प्रश्न यह है कि जो विचार आ रहा है किस दिशा में आ रहा है? वो विचार मुक्ति की दिशा में आ रहा है तो बहुत शुभ होता है। वही विचार ऐसा उठ रहा है कि और बंधन में पड़ जाओ तो महा अशुभ होता है। जो मुक्ति की ओर विचार ले जाता है उसके लिए एक विशेष नाम होता है। आत्मविचार वो आपको कहता है देखो कहां फंसे

1:29:51 हुए हो। तो आत्म विचार शुभ होता है और साधारण जो संसार मुखी विचार होता है वो फसाता ही है। नमस्कार आशा जी मेरा प्रश्न थोड़ा सा असमंजस में हो गया कि अहम और चेतना के बीच में कंफ्यूजन है। मुझे अब तक समझ में आता था कि अहम अपने आप को बचाने की कोशिश करता है। जब और चेतना अपने आप को ऊपर उठाने की कोशिश करती है। आत्मा अहम क्या है? चेतना क्या है? चेतना वो जिसमें दो होते हैं। अहम उन दो का एक सिरा है। अहम माने मैं चेतना में दो होते हैं।

1:30:36 चेतना आप कब कहते हैं आप चेतन है जब आपको दुनिया दिखाई दे रही है। दुनिया माने दूसरी। जब दो हैं तो उनमें एक होता है देखने वाला और एक होता है दृश्य। जो दृष्टा है उसका नाम अहम है। जो दुनिया है वो है दृश्य। चेतना माने जिसमें यह दोनों है। दृश्य दृष्टा तो चेतना का ही हिस्सा है अहम। चेतना के केंद्र पर अहम बैठा होता है। मैं बैठा हूं यहां पर। मेरे इर्द-गिर्द चारों तरफ क्या है? बहुत सारी चीजें। मैंने देखा इस रोशनी को। मैंने देखा गमले को। मैंने देखा स्क्रीन को। यह सब घटनाएं चेतना में घट रही है। धन्यवाद सर। नमस्ते आचार्य जी। अहम को लेकर और अहम वृत्ति को जो अभी तक समझ आया है आपसे

1:31:24 पूछना चाहूंगी कि मेरी समझ ठीक है या नहीं। जैसे किचन में हम लोग फ्यूल यूज़ करते हैं कुकिंग के लिए। सिलेंडर है उसमें जो फ्यूल है वो अहम है। उसको बर्न होना ही होना है। अगर हम उसको सही डायरेक्शन में उससे खाना बना लेंगे तो वो उसका चैनलाइज हो गया। ठीक डायरेक्शन में और अगर आग लग गई तो वो गलत डायरेक्शन में लाइफ जा रही है। तो क्या ये अंडरस्टैंडिंग वो संसाधन है। वो संसाधन है। अहम वो है जो तय करता है कि उससे रोटी बनानी है या घर जलाना है। अहम कौन है? निर्धाता। जो ईंधन है सिलेंडर में वो क्या है? वो सारे संसाधन जो आपको जीवन ने माने प्रकृति ने दे रखे हैं। जिसमें समय भी आता है, बल भी आता है, धन भी आता है। वो सब कुछ उस सिलेंडर के अंदर

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