0:00 इमेजिन करो कि आप एक रेस में दौड़ रहे हो। पूरी ताकत से दौड़ रहे हो। और आपने सेकंड पोजीशन वाले को ओवरटेक करके उससे आगे निकल गए। तो अब आप कौन सी पोजीशन पे आ गए? ऑब्वियस सी बात है फर्स्ट पोजीशन पे ज्यादातर बच्चे यही सोच रहे होंगे कि सेकंड वाली पोजीशन वाले को ओवरटेक करके आप फर्स्ट पे आ गए। बट एक्चुअली में तो आप सेकंड पोजीशन पे ही हो। तो ऐसी छोटी-छोटी पहेलियों के जवाब अगर आप नहीं दे पाते तो इसका सिंपल सा मतलब यह है कि आप क्रिटिकल थिंकिंग और आपके प्रेजेंस ऑफ माइंड के खेल में आप थोड़ा सा पीछे हो। लेकिन बहुत सारे लोग इसे जोड़ देते हैं लो आईक्यू के साथ। अब मुझे पता है कि आप सब कैपेबल हो। सबके पास दिमाग बराबर है। लेकिन गलती कहां पे होती है? आज की इस वीडियो में ऐसे पांच साइंस एक ऐसे पांच मिस्टेक्स के बारे में
0:45 बताएंगे जो आपके आईक्यू को लो कर रही हैं। और सबसे इंपॉर्टेंट बात वीडियो के एंड में उनका सॉल्यूशन भी दूंगा। लेकिन वीडियो में आगे बढ़ने से पहले एक छोटा सा गेम खेलते हैं। मान लो आप एक प्लेन के पायलट हो। आप पहले दुबई जाते हो। फिर आप दिल्ली आते हो और 200 पैसेंजर्स को उतार देते हो। फिर उसके बाद दोबारा दुबई जाते हो और 183 पैसेंजर्स को उतारते हो। तो बताओ उस पायलट की ऐज क्या है? सोचो इसका आंसर आपको देना है कि यार ये पैसेंजर से पायलट की ऐज कैसे पता लगेगी? तब तक आप इसका आंसर सोचो। इसका आंसर मैं आपको वीडियो के एंड में दूंगा। लेकिन आपको इसका आंसर अभी कमेंट सेक्शन पे लिखना है। देखते हैं कितने बच्चे इसे सोच पाते हैं। और तब तक चलते हैं हमारे वीडियो में आगे जहां पे इन पांच साइन में से पहले साइन की बात करते हैं। यानी कि लैक्स ऑफ
1:31 क्यूरियोसिटी। आपके हिसाब से ज्यादा होशियार ज्यादा इंटेलिजेंट कौन है? जो ज्यादा सवाल पूछता है या वो जो सवाल कभी नहीं पूछता है और हर क्वेश्चन का आंसर देना चाहता है। तो मैंने जहां तक समझा है मेरे हिसाब से वो ज्यादा इंटेलिजेंट है जो ज्यादा सवाल पूछता है। इमेजिन करो जब आप छोटे थे या आपके घर में कोई छोटा बच्चा हो तो वो कितने सवाल पूछते हैं अपने आसपास को लेके। क्यों? क्योंकि वो अपने इस जीवन में नए-नए आए होते हैं। उन्होंने इस दुनिया को नया देखा होता है और उनके हर एक चीज को लेके मन में कुछ सवाल चल रहे होते हैं और वो पूछते भी हैं। क्यों? क्यों? क्योंकि वो बहुत ज्यादा क्यूरियोसिटी में रहते हैं। लेकिन प्रॉब्लम क्या होती है कि जब हम धीरे-धीरे बड़े होते रहते हैं और ये दुनिया हमें बोरिंग लगने लग जाती है तो हमारे मन में सवाल आना बंद हो जाते हैं। क्योंकि आप जीवन ही ऐसा जी रहे होते हैं। लेकिन आपने कभी नोटिस करना वो लोग जो बहुत
2:18 ज्यादा वीडियो गेम्स खेलते हैं मतलब अच्छी वाली वीडियो गेम्स खेलते हैं। जो चेस खेलते हैं, जो सूडोको बनाते हैं या कोई ऐसा सब्जेक्ट पढ़ रहे होते हैं जिसमें क्यूरोसिटी ज्यादा होती है। वो रियल लाइफ में बहुत ज्यादा क्यूरियस रहते हैं। और उनको हर एक क्वेश्चन का आंसर जानने की इच्छा होती है। एग्जांपल के तौर पे जैसे कोई इंसान चेस खेलता है तो वह सिर्फ मूव्स नहीं देख रहा होता है। वो आगे की चीजों को प्रेडिक्ट करता है कि अगर उसने ऐसे चला तो मैं क्या चलूंगा। ये चीजें उसको और ज्यादा क्यूरियस बनाती है। और ये सिर्फ चेस खेलते हुए नहीं फिर उसके डेली लाइफ में भी दिखना शुरू हो जाता है। और यही बात है कि एक्चुअली में खेल सारा इंटेलिजेंस का नहीं है। सोचने के तरीके का है। और यहीं पे हमारा सेकंड पॉइंट भी आता है जो कि है ब्लैक एंड वाइट थिंकिंग। बच्चों आपने मोहम्मद बिन तुगलक जी का नाम जरूर सुना होगा इतिहास की किताबों में। लोग इन्हें
3:03 इतिहास में फुलिश किंग कहते थे क्योंकि इनके दो बड़े डिसीजंस फेल हो गए थे। पहला था दिल्ली से दौलताबाद कैपिटल को शिफ्ट करना और दूसरा था टोकन करेंसी इंट्रोड्यूस करना। अब देखो अगर आप इन दोनों चीजों के आउटकम्स के ऊपर इन्हें जज करोगे तो आपको ये फुलिश लगेंगे। लेकिन अगर आप सोचोगे कि इन्होंने क्या सोचा था उस चीजों को एनालाइज करोगे तो शायद पिक्चर कुछ और भी हो सकती है। बिकॉज़ हर एक आईडिया फेल उस आईडिया की वजह से नहीं होता है। उसके एग्जीक्यूशन की वजह से भी होता था और बहुत सारे फैक्टर्स भी हैं। असल में मोहम्मद बिन तुगलक साउथ इंडिया को बेटर कंट्रोल करना चाहते थे। उस टाइम पे एंपायर काफी बड़ा हो चुका था और साउथ रीजन को मैनेज करना बहुत डिफिकल्ट हो रहा था। इसीलिए उन्होंने कैपिटल को एक ऐसी जगह पर शिफ्ट करने का सोचा जो एंपायर सेंटर के काफी
3:49 ज्यादा क्लोज हो। मतलब आईडिया कोई रैंडम आईडिया नहीं था। बस प्रॉब्लम कहां हुई? एग्जीक्यूशन में। लॉन्ग ट्रैवल, पुअर प्लानिंग और पब्लिक सफरिंग की वजह से पूरा का पूरा प्लान फेल हो गया। अब टोकन करेंसी वाला पॉइंट ही देख लो। उन्होंने सोचा कि क्यों ना सिंबॉलिक कॉइन यूज़ किए जाए ताकि इकोनमी को हैंडल करना, नोट करना, मैनेज करना बहुत आसान हो जाए। लेकिन उस टाइम पे प्रॉपर कंट्रोल सिस्टम नहीं था। लोग फेक कॉइन बनाना शुरू हो गए और पूरा का पूरा सिस्टम कोलैप्स हो गया। अब वो समय उस वक्त सही नहीं था। यानी कि बैड टाइमिंग लेकिन आईडिया तो बहुत अच्छा था ना और आज की डेट में लगभग लगभग हर एक कंट्री इसी तरीके से पैसे को मैनेज करती आ रही है। तो यहां पे प्रॉब्लम बैड टाइमिंग की थी बिकॉज़ अच्छा कंट्रोल सिस्टम नहीं था। लेकिन आज की डेट में जहां पे हमारे पास काफी अच्छा कंट्रोल सिस्टम है वहां पे हम इस पूरे के पूरे
4:35 आईडिया को बहुत अच्छे से एग्जीक्यूट कर पाए हैं। लेकिन इन दोनों आईडिया से आपको एक बात समझनी होगी कि जो इंटेलिजेंट लोग होते हैं वो इसे ग्रे एरिया की तरह देखते हैं। मतलब वो ऐसे ब्लैक एंड वाइट थिंकिंग नहीं रखते हैं कि भैया ये गलत है ये सही है। वो ऐसे सोचते हैं कि इस पूरे प्रोसेस में क्या हुआ? यानी कि अगर मैं आपको बोलूं कि उनके दोनों आईडिया फेल हो गए और आप कहो अरे यार पागल राजा था। तो ये एक ब्लैक एंड वाइट थिंकिंग है। लेकिन अगर आप यह सोचो कि उन्होंने क्या सोचा? फेल कहां पे हुए, कहां पर पास हो सकते थे? ये एक्चुअली में ग्रे थिंकिंग है। तो जब भी आपके सामने ऐसी कोई सिचुएशन आए तो आप भी कैसे ब्लैक एंड वाइट थिंकिंग से ग्रे थिंकिंग की तरफ शिफ्ट हो सकते हो। आपको अपने आप से तीन सवाल पूछने हैं। पहला जो मैं देख रहा हूं क्या सिर्फ वही पूरी रियलिटी है? दूसरा इसके पीछे कोई और रीजन भी हो सकता है क्या? एंड तीसरा अगर मैं उस सिचुएशन में
5:21 होता तो मैं भी क्या सेम डिसीजन लेता? अब आते हैं तीसरे पॉइंट पे यानी कि पुअर इमोशनल कंट्रोल। देखो हम यहां पर बात कर रहे हैं लो आईक्यू की और लोग ज्यादातर गलत डिसीजन जिसको लो आईक्यू का नाम दे दिया जाता है वो इमोशनल हो के ही लेते हैं। इमेजिन करो कि आपने रात भर बैठ के नोट्स बनाए और सुबह-सुबह उन्हें पैक करते हुए बैग में उन नोट्स के ऊपर चाय या कॉफी गिर गई। आपने इंस्टैंटली गुस्सा किया आसपास की चीजों को आपने फेंकना शुरू कर दिया। बचे हुए नोट्स जो बच गए थे उनको फाड़ दिया। इसको बोलते हैं रिएक्ट करना। एक्चुअली में रिएक्ट करना और रिसोंड करने में फर्क होता है। अगर आप देखें तो आपने वहां पर इमोशनल कंट्रोल को लूज किया और आपने अपने बचे हुए नोट्स को भी खराब कर दिया। आपके आधे नोट्स बच गए थे लेकिन आपने उन्हें भी गुस्से में
6:07 आकर फाड़ दिया और दूर से देखने वाला कोई भी इंसान यही कहेगा कि आप पागल हैं। इसका आईक्यू कितना लो है कि इसने अपने ही काम को बढ़ा दिया है। तो इसलिए आपको अपने इमोशंस पे कंट्रोल करना सीखना होगा। ऑब्वियस सी बात है कम नींद, ज्यादा स्ट्रेस से इमोशनल कंट्रोल और लूज होता है। यह एक एक दिन का काम नहीं है। लेकिन आपको अपने डिसीजन उस वक्त तो बिल्कुल नहीं लेने जब आप बहुत ज्यादा इमोशनल हो। इमोशनल का मतलब जब आप चाहे बहुत ज्यादा गुस्सा हो रखे हो या बहुत ज्यादा प्यार में हो। दोनों ही केसेस में अपनी लाइफ के बड़े या छोटे डिसीजन नहीं लेने हैं। अब आते हैं फोर्थ पॉइंट पे यानी कि लैक ऑफ क्रिटिकल थिंकिंग। इमेजिन करते हैं कि आपके सामने YouTube पे कोई वीडियो आती है। उस वीडियो के थंबनेल पर लिखा होता है कि मैं आपको 15 दिन में टॉप करवा दूंगा। या फिर लिखा होता है कि ये ट्रिक आपके एग्जाम में फुल
6:55 मार्क्स लेके आएगी। या चलो ये तो बहुत जनरिक टाइटल्स हो गए। लेट अस सपोज कि टाइटल में लिखा होता है कि आप इस ऐप को डाउनलोड करोगे तो आप दिन के ₹5,000 कमा सकते हो। फिर आप उसके कमेंट सेक्शन पे जाते हो और वहां पे लिखा भी हुआ होता है कि हां यार यह तो मेरे लिए वर्क किया। बिकॉज़ वो पेड कमेंट्स भी हो सकते हैं। तो आप क्या करोगे? क्या आप उस पे इंस्टेंटली बिलीव कर लोगे या फिर आप सोचोगे कि ये कैसे पॉसिबल है? और उसे अलग-अलग सोर्सर्सेस से वेरीफाई करने की कोशिश करोगे? तो आपके मन में आएगा कि हां यार सर कॉमन सेंस है कि मैं उसे वेरीफाई करूंगा कि अगर उसमें कोई पैसा इनवॉल्वड है तो या फिर कोई रिस्क इनवॉल्वड है तो। इसको एक्चुअली में क्रिटिकल थिंकिंग कहते हैं। जहां पे आपका पैसा या रिस्क इनवॉल्वड होता है वहां पे तो आप क्रिटिकल थिंकिंग दिखाते हो। लेकिन मैंने नोटिस किया है कि रोजमर्रा के जीवन में बहुत सारे काम करते हुए आप कभी भी कोई क्रिटिकल थिंकिंग
7:40 दिखाते ही नहीं हो। एग्जांपल के तौर पर कि अगर एक बच्चे की आंखों की रोशनी कमजोर हो गई तो मैंने एक YouTube वीडियो पे देखा कि वहां पर बोला गया था कि कुछ कालख जो हमारे तवे पर लगी होती है उसको बच्चे की आंख में लगाया जाए। और जब यह बात मैंने देखी तो मेरे घर के कई लोग इस बात पे यकीन करते आए बहुत टाइम से। लेकिन क्या आपको इस पूरे के पूरे सिनेरियो में कुछ गड़बड़ नहीं लग रही है? जब यह बात मैंने मेरे बेटे के जो आए डॉक्टर है, जो आंखों के डॉक्टर है उनसे कंफर्म की तो उन्होंने साफ-साफ मना कर दिया कि यह और ज्यादा रिस्की है। इन श मैंने उस वीडियो को देखने के बाद सिर्फ उस पे बिलीव नहीं किया। मैंने उस पे क्रिटिकली सोचा कि यार यहां पे कुछ तो गड़बड़ लग रहा है। आओ वेरीफाई कर लेते हैं। और आज की डेट में डॉक्टर के पास जाने के बजाय मेरे पास बहुत सारे और तरीके हैं किसी भी चीज को वेरीफाई करने के। और यहां पर सिर्फ बात हेल्थ की नहीं हो रही है।
8:27 बहुत सारी और चीजों की हो रही है। कोई सवाल आपके सामने आता है। आप क्रिटिकली सोच सकते हैं। कोई कोर्स आपके सामने आता है जो आपके जीवन के लिए बहुत इंपॉर्टेंट है। उसके लिए आप क्रिटिकली सोच सकते हैं। ये वीडियो ही है। इसी के बारे में भी आप क्रिटिकली सोच सकते हो कि मैं आपको जो बता रहा हूं उसमें कोई लॉजिक भी है या नहीं। और प्रॉब्लम यहां पर सबसे बड़ी यह है कि स्क्रॉलिंग करते-करते हम लोगों ने क्रिटिकली सोचना ही बंद कर दिया है। मैंने बहुत बार लोगों को देखा है कि वो स्क्रॉल करके एक वीडियो देख रहे होते हैं और एक पर्सपेक्टिव बनाते हैं। फिर वो कमेंट सेक्शन पे जाते हैं। वहां पे कुछ नेगेटिव लिखा होता है। उनका पर्सपेक्टिव ही बदल जाता है। मतलब आपकी खुद की कोई सोच ही नहीं है। आपको रील या फिर उसका कमेंट सेक्शन कैसे इन्फ्लुएंस कर देता है। क्यों? क्योंकि आपने क्रिटिकली सोचना ही बंद कर दिया है। अब बात करते हैं पांचवें साइनी हैबिट के बारे में जो कि है अवॉयडिंग डिसकंफर्ट। अब मान लेते हैं कि आपका 5 दिन बाद एग्जाम है और दो-तीन
9:14 चैप्टर्स पेंडिंग हैं। तो कौन सा रास्ता अपनाओगे? क्या आप उसके वन शॉट्स देखोगे? या फिर आप उसको डिटेल में देखोगे और नंबर ऑफ आवर्स स्टडी के बढ़ा लोगे और ज्यादा क्वेश्चन बनाओगे। अब यहां पे बोलने को आप ये रास्ता बोल सकते हो। लेकिन मुझे पता है ज्यादातर बच्चे वन शॉट वाला रास्ता ही लेंगे क्योंकि हम YouTube पे काफी साल से पढ़ा रहे हैं। तो हमें वो जर्नी पता है। क्यों? क्योंकि हम हमेशा कंफर्ट की तरफ यानी आसान रास्ते की तरफ भागते हैं। डिसकंफर्ट को अवॉइड करते हैं। लेकिन ब्रेन की रियल ग्रोथ कंफर्ट में नहीं डिसकंफर्ट में ही है। और मैं यहां पे सिर्फ फिजिकल डिसकंफर्ट की बात नहीं कर रहा हूं। मेंटल डिसकंफर्ट की भी बात कर रहा हूं। अगर आप हमेशा ऐसी चीजों पे फोकस करोगे जहां पे ब्रेन को चैलेंज नहीं होगा। तो आपका ब्रेन ग्रो ही नहीं करेगा। लेकिन अगर आप हमेशा या फिर मोस्टली ब्रेन को वो चैलेंजिंग
10:00 टास्क दोगे कि भाई पूरे दिन में पूरा चैप्टर डिटेल में पढ़ना है। भाई ये पूरी स्क्रिप्ट लिखनी है भाई एक्स भाई वाई भाई जेड। लेकिन अगर आप अपने ब्रेन को बार-बार चैलेंज करोगे तो उसको मजबूरन ग्रो करना पड़ेगा। और यही कारण है कि जो मेंटली स्ट्रांग लोग होते हैं ना वो हमेशा एक चैलेंजिंग टास्क ही चुनते हैं। एग्जांपल के तौर पर कोई वीडियो को बनाने के लिए कोई कोई कांसेप्ट को दिखाने के लिए मैं स्मार्ट बोर्ड पे कोई भी चीज वीडियो फॉर्म में चला के या फिर एआई की मदद से लेके आ सकता हूं। लेकिन मैं अपनी साइंस एंड फन के एक्सपेरिमेंट्स की वीडियो की बात कर रहा हूं। मैं वहां पे हमेशा चैलेंज ढूंढता हूं। मैं वहां पे हमेशा किसी भी चीज को करके दिखाने के बारे में सोचता हूं। भले मुझे उसमें बहुत ज्यादा टाइम लग जाए। एग्जांपल के तौर पे मेरे मन में एक सवाल आया कि घोड़े बैठते क्यों नहीं है? मैंने उसके पीछे रिसर्च करी। अब मैं इसके ऊपर इस
10:46 कुर्सी पे बैठे-बैठे भी वीडियो बना सकता था। साफ पता था कि घोड़ा क्यों नहीं बैठता है और बहुत सारे वीडियोस ला सकता था। लेकिन मैंने अपने आप को चैलेंज किया। मैं एक रियल घोड़ा लेके आया। हमने उसे बैठाने की कोशिश की। बहुत मुश्किल के बाद हमने उसे बैठाया भी और उसको वीडियो को अपलोड भी किया। इस पूरे प्रोसेस में मुझे एक तो खुशी मिली। सेकंडली मैंने अपने दिमाग को चैलेंज किया और मैं उस घोड़े वाले भैया और घोड़े से बहुत कुछ सीखा भी और सबसे इंपॉर्टेंट बात दो दिन तक मैं इस दुनिया के डिस्ट्रैक्शन से दूर रहा। आपको पता है दिमाग की असली ग्रोथ कहां पे है? जब आप दिमाग से एक ऐसा काम करवाएं जिसमें एक्चुअली उसे काम करना पड़ रहा है। लेकिन आज की डेट में हम लोग स्क्रॉलिंग, आज की डेट में हम लोग एक दूसरे की बुराई इन सबको करने में इतने ज्यादा बिजी हो चुके हैं। और सच्ची बात तो यह भी है कि जब आप एक दिन
11:32 पीछे जाकर देखते हो तो आपको समझ में आता है कि मैंने तो उसका कोई यूज़ भी नहीं किया। बहुत सारे बच्चे बहुत सारी ऐसी वेब सीरीज देखने में पूरा का पूरा हफ्ता लगा देते हैं और एक हफ्ते के बाद उन्हें रियलाइज़ होता है कि एक्चुअली में उन्होंने कुछ सीखा भी नहीं। अब मैं यहां पर यह नहीं कह रहा हूं कि इंटरनेट चलाना या फिर वेब सीरीज देखना कोई गलत बात नहीं है। मैं भी देखता हूं। लेकिन मैं हमेशा ट्राई करता हूं कि मैं कोई ऐसी वेब सीरीज या फिर कोई ऐसी रील स्क्रॉल करूं जिससे मेरी लाइफ में कुछ फायदा हो। हां, ठीक है। कभी कबभार मैं कुछ चीजें अपनी फैमिली के साथ मस्ती करने के लिए भी करता हूं जो कि बहुत जरूरी है। लेकिन मेजरली जब मैं इंटरनेट पे स्क्रॉल कर रहा होता हूं, तो मैं यूज़फुल चीजों पे ज्यादा फोकस करता हूं। ऑलदो इन सबका एल्गोरिथम ऐसा है कि आपकी फील्ड में कुछ ना कुछ गलत तो आ ही जाता है। बट मैं हमेशा उन चीजों को अवॉइड करने की कोशिश करता हूं। और यह कोशिश ही धीरे-धीरे आपके फोकस को इंक्रीस करेगी। पांच साइन को अवॉइड करने में मदद करेगी और
12:20 आप खुद देखोगे धीरे-धीरे आपका दिमाग बहुत मैच्योर तरीके से सोचना शुरू कर देगा। क्रिटिकल थिंकिंग में आप बहुत अच्छे हो जाओगे और बहुत जल्दी चीजों पे रिएक्ट करोगे वो भी इन अ गुड वे। और हां, अगर बात रही उस पायलट वाले क्वेश्चन के सवाल की तो उस पायलट की उम्र उतनी ही होगी जितनी आपकी है। क्योंकि मैंने उसके पहले लाइव में बोला था कि मान लो कि आप पायलट हो। बाकी मिलते हैं ऐसी और वीडियोस में। तब तक के लिए, बाय बाय।