0:00 क्या आपने कभी सोचा है कि इस दुनिया का सबसे बड़ा सस्पेंस क्या है? क्या मोदी जी सच में भगवान है? अंगेन गात्रम नयनेन वक्तम न्यायन राज्यम लवणेन भोज्यम। या फिर ट्रंप वर्ल्ड वॉर तीन करवा के ही मानेगा। नहीं भाई, सबसे बड़ा सस्पेंस यह है कि जब आप रात को चैन से सोते हो, तो अचानक सुबह उठते ही पेट्रोल के दाम ₹2 क्यों बढ़ जाते हैं? या जो चिप्स का पैकेट बचपन में पूरा भरा आता था वो आज सिर्फ हवा का गुब्बारा क्यों बन चुका है? इस पूरे ड्रामे के पीछे एक ही मास्टरमाइंड है जिसे दुनिया इकोनॉमिक्स कहती है। लोग समझते हैं कि यह मोटी-मोटी किताबों और चश्मा लगाने वाले प्रोफेसर्स का काम है। लेकिन सच तो
0:46 यह है कि जब सुबह उठकर आप मम्मी से चाय मांगते हो और मम्मी आगे से कहती हैं कि दूध खत्म हो गया है। आज काली चाय से काम चलाओ। समझो आपकी इकॉनमी वहीं से शुरू हो जाती है। अब सवाल है इकोनॉमिक्स आखिर है क्या? बहुत आसान भाषा में कहें तो इकोनॉमिक्स उस साइंस का नाम है जो यह समझने की कोशिश करती है कि इंसान अपनी अनलिमिटेड इच्छाओं को लिमिटेड रिसोर्सेज के साथ कैसे पूरा करता है और यहीं से शुरू होती है दुनिया की सबसे बड़ी समस्या। देखो, दुनिया की सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि हम इंसानों की ख्वाहिशें अनलिमिटेड है। हमें लेटेस्ट iPhone भी चाहिए, बड़ा घर भी चाहिए, फॉरेन ट्रिप भी चाहिए, बैंक अकाउंट में इतने जीरो चाहिए कि खुद कैलकुलेटर भी
1:33 शर्मा जाए, लेकिन जिस धरती पर हम रहते हैं, वो तो लिमिटेड है ना बॉस। ना तो सबके लिए ताजमहल खड़ा किया जा सकता है, ना ही सबको प्राइवेट आइलैंड दिया जा सकता है और ना ही किसी को 24 घंटे से ज्यादा का समय मिल सकता है। इसी किल्लत को हम इकोनॉमिक्स की भाषा में स्केर्सी कहते हैं। स्केयर्सिटी का मतलब गरीबी नहीं होता। स्केयरसिटी का मतलब है कि रिसोर्सेज लिमिटेड हैं। चाहे आप अरबपति हो या मिडिल क्लास फैमिली से आते हो। स्केयरसिटी सबको अफेक्ट करती है। अब जब रिसोर्सेज लिमिटेड हैं तो सीधी सी बात है कि आपको हर मोड़ पर चॉइस करनी पड़ेगी और जहां चॉइस होगी वहां सैक्रिफाइस भी होगा। मान लो आज शाम को आपके पास सिर्फ 1 घंटे का फ्री टाइम है। अब या तो आप उस 1 घंटे में आराम से सो जाओ
2:20 या फिर अपने दोस्तों के साथ मोमोज खाने निकल जाओ। अगर आप मोमोज खाने चले गए तो आपने नींद छोड़ दी। अगर सो गए तो दोस्तों के साथ समय बिताने का मौका छोड़ दिया। और इसी छोड़ी हुई दूसरी सबसे अच्छी चीज को इकोनॉमिक्स में ओपोरर्चुनिटी कॉस्ट कहा जाता है। यानी जिंदगी में आप जो भी फैसला लेते हो उसकी कीमत सिर्फ पैसे नहीं होते। उसकी कीमत वो अवसर भी होता है जिसे आपने छोड़ दिया। यही प्रिंसिपल बड़े लेवल पर भी काम करता है। जब सरकार एक नया हाईवे बनाती है तो वही पैसा शायद किसी हॉस्पिटल या स्कूल पर खर्च नहीं हो पाता। जब कोई स्टूडेंट इंजीनियरिंग चुनता है तो वह उसी समय डॉक्टर बनने का मौका छोड़ देता है। इकोनॉमिक्स सिर्फ पैसों की नहीं चॉइससेस की साइंस है और यही वजह है कि इकोनॉमिक्स
3:08 हमारी जिंदगी के हर छोटे-बड़े फैसले में मौजूद है। लेकिन जब हर इंसान अपनी-अपनी जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करने लगा तब एक नई समस्या पैदा हुई। अब सवाल है क्या हर इंसान सब कुछ खुद कर सकता है? तो नहीं। और यहीं से शुरू होती है स्पेशलाइजेशन की कहानी। अब जरा इमेजिन करो अगर इस दुनिया में कोई किसी की मदद ना करे और सब कुछ खुद ही करना पड़े तो क्या होगा? सुबह उठकर पहले खुद गेहूं उगाओ। फिर खुद कपड़े बुनो। फिर खुद घर बनाओ। फिर खुद मोबाइल फोन का सॉफ्टवेयर तैयार करो और उसके बाद खुद सेटेलाइट ल्च करके इंटरनेट भी चलाओ। ऐसे में तो फोन बनते बनते हम खुद फोटो फ्रेम में टंग जाएंगे। लेकिन इस समस्या का समाधान इंसानों ने हजारों साल
3:55 पहले खोज लिया था। उन्होंने समझा कि हर व्यक्ति हर काम में एक्सपर्ट नहीं हो सकता। इसलिए हर व्यक्ति वही काम करें जिसमें वह सबसे अच्छा हो। इसी को स्पेशलाइजेशन कहते हैं। यानी कोई किसान बनेगा, कोई शिक्षक बनेगा, कोई इंजीनियर बनेगा, कोई डॉक्टर बनेगा तो कोई सॉफ्टवेयर डेवलपर बनेगा और फिर सब एक दूसरे के साथ एक्सचेंज करेंगे। यहीं से जन्म हुआ ट्रेड का। ट्रेड यानी व्यापार और ट्रेड मानव सभ्यता की सबसे पावरफुल इन्वेंशंस में से एक है। लेकिन यहीं पर एक और मजेदार कांसेप्ट आता है कंपैरेटिव एडवांटेज। इसे ऐसे समझो। मान लो आपके पास गजब का दिमाग है। आप कंप्यूटर पर कोडिंग बहुत धांसू कर
4:41 लेते हो। लेकिन घर की सफाई करना आपको बिल्कुल नहीं आता। दूसरी तरफ आपका दोस्त गोलू कोडिंग में एकदम बुद्धू है। लेकिन सफाई ऐसी करता है कि फर्श में अपना चेहरा दिखाई दे जाए। अब अगर आप कोडिंग छोड़कर खुद पोछा लगाने बैठ जाओगे तो आपका कीमती टाइम भी बर्बाद होगा और कोडिंग से होने वाली इनकम भी। इसलिए बेहतर क्या है? आप कोडिंग करो, गोलू सफाई करें और दोनों एक दूसरे को पेमेंट कर दें। यानी दोनों का फायदा। यही है कंपैरेटिव एडवांटेज। इकोनॉमिक्स का सबसे बड़ा सीक्रेट यही है कि सोसाइटी तब सबसे एफिशिएंट बनती है जब लोग वही काम करें जिसमें वे कंपैरेटिवली बेहतर हो और इसी से प्रोडक्टिविटी बढ़ती
5:26 है। प्रोडक्टिविटी मतलब कम समय में ज्यादा वैल्यू क्रिएट करना। अब यहां पर आपके लिए एक सवाल है। किसी भी देश की अमीरी का सबसे बड़ा कारण क्या होता है? उसके पास मौजूद रिसोर्सेज नहीं। उसकी प्रोडक्टिविटी। इसी वजह से कुछ छोटे देश भी बहुत अमीर बन जाते हैं। जबकि कुछ रिसोर्स रिच देश गरीब रह जाते हैं। और वही जब लाखों लोग अपनी-अपनी जरूरतों के साथ एक दूसरे से जुड़ते हैं तब पैदा होता है मार्केट। मार्केट का मतलब सिर्फ संडे बाजार नहीं होता। मार्केट एक सिस्टम है। एक ऐसा सिस्टम जहां बयरर्स और सेलर्स आपस में इंटरेक्ट करते हैं। और मजेदार बात यह है कि इस पूरे सिस्टम को चलाने के लिए किसी डिक्टेटर की जरूरत नहीं
6:13 पड़ती। इसे दो भूत चलाते हैं। डिमांड और सप्लाई। मान लो पूरे शहर को अचानक तरबूज खाना है। यानी डिमांड बढ़ गई। लेकिन मंडी में सिर्फ 10 तरबूज बचे हैं। यानी सप्लाई कम है। अब क्या होगा? दाम बढ़ेंगे। तरबूज वाला ₹50 की जगह ₹200 मांगेगा। लेकिन जैसे ही दाम बढ़ेंगे, किसानों को सिग्नल मिलेगा। उन्हें दिखेगा कि तरबूज बेचने में अच्छा प्रॉफिट है। अब वे ज्यादा तरबूज उगाएंगे। ज्यादा ट्रक्स भरकर शहर भेजेंगे। [संगीत] सप्लाई बढ़ जाएगी। और जैसे ही सप्लाई बढ़ेगी, प्राइसेस वापस नीचे आने लगेंगे। अब यहां ध्यान देने वाली बात है कि किसी मंत्री ने ऐसा करने को आदेश नहीं दिया। किसी ऑफिसर ने प्रोडक्शन को कंट्रोल
7:00 नहीं किया। फिर भी मार्केट खुद को बैलेंस करने लगा। यही फिनोमिना एडम स्मिथ ने इनविज़िबल हैंड कहा था। इनविज़िबल हैंड कोई जादू नहीं है। यह लाखों लोगों के इंडिविजुअल डिसीजंस का कलेक्टिव रिजल्ट है। यानी हर व्यक्ति अपने फायदे के लिए काम करता है। लेकिन अनजाने में वो पूरे मार्केट को बैलेंस करने में मदद कर देता है। यही फ्री मार्केट की फाउंडेशन है। लेकिन ट्रेड और मार्केट की इस दुनिया में एक बहुत बड़ी समस्या अभी भी बची हुई थी और उस समस्या का नाम था बार्टर सिस्टम। मान लो आपकी जूतों की दुकान है। आप पूरे साल जूते बनाते हो। लेकिन अब आपको तरबूज खाना है। आप तरबूज वाले के पास जाते हो और कहते
7:46 हो भाई यह शानदार जूते ले लो और बदले में मुझे तरबूज दे दो। लेकिन तरबूज वाला कहता है, "मुझे जूते नहीं चाहिए।" मुझे तो अपने बच्चे के लिए स्कूल बुक्स चाहिए। लो जी, अब आप फंस गए। अब आपको कोई ऐसा किताब वाला ढूंढना पड़ेगा जिसे जूते चाहिए हो। फिर किताब लेकर तरबूज वाले के पास वापस जाना पड़ेगा। यही बार्टर सिस्टम की सबसे बड़ी समस्या थी। इसे डबल कोइंसिडेंस ऑफ वांट्स कहा जाता है। यानी दोनों पक्षों की जरूरतें एक साथ मैच होनी चाहिए। और यही वजह थी कि पुराने समय में ट्रेड बहुत मुश्किल था। फिर इंसानों ने एक ऐसा इन्वेंशन किया जिसने पूरी दुनिया बदल दी और वो था मनी यानी पैसा।
8:33 लेकिन यहां एक मजेदार बात है। मनी [संगीत] की असली ताकत कागज में नहीं होती। उस पर लिखे नंबर में नहीं होती। उसकी ताकत ट्रस्ट में होती है यानी भरोसे में। वो तो अलग बात है कि हम सब कलेक्टिवली यह मान लेते हैं कि इस कागज या डिजिटल नंबर की वैल्यू है। इसीलिए वह वैल्यू रखता है। लेकिन सच्चाई थोड़ी अलग है। मनी तीन बड़े काम करता है। पहला मीडियम ऑफ एक्सचेंज। दूसरा स्टोर ऑफ वैल्यू और तीसरा यूनिट ऑफ अकाउंट। यानी पैसा लेनदेन आसान बनाता है। भविष्य के लिए वैल्यू स्टोर करता है और चीजों की कीमत मापने का कॉमन स्केल देता है। लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती
9:21 क्योंकि पैसे को मैनेज करने के लिए पैदा हुए बैंक्स और यहीं से शुरू होती है मॉडर्न इकॉनमी की सबसे दिलचस्प कहानी। हम आम लोग सोचते हैं कि बैंक सिर्फ हमारी सेविंग सुरक्षित रखता है। लेकिन असलियत में तो बैंक्स उन सेविंग्स को सुरक्षित तो रखते ही हैं। साथ में उन सेविंग्स को इन्वेस्टमेंट्स में भी बदलते हैं। मान लो आपने ₹100 बैंक में जमा किए। अब बैंक उस पैसे को हमेशा के लिए लॉकर में बंद नहीं करता। वो उस पैसे का एक हिस्सा रिजर्व रखता है और बाकी इकॉनमी में लोोंस के रूप में देता है। किसी को घर खरीदने के लिए, किसी को बिजनेस शुरू करने के लिए, किसी को फैक्ट्री लगाने के लिए तो किसी को एजुकेशन लोन के रूप में। और यहीं से शुरू होता है
10:08 क्रेडिट क्रिएशन। क्रेडिट क्रिएशन मॉडर्न इकोनॉमिक ग्रोथ का सबसे बड़ा इंजन है। क्योंकि अगर लोंस ना हो तो ज्यादातर बिजनेसेस कभी शुरू ही ना हो पाएं। अगर क्रेडिट ना हो तो फैक्ट्रीज ना बने। अगर फैक्ट्रीज ना बने तो जॉब्स ना बने और अगर जॉब्स ना बने तो इनकम ना बढ़े। यानी सेविंग्स और इन्वेस्टमेंट के बीच पुल का काम बैंक्स करते हैं। इसीलिए बैंकिंग सिस्टम किसी भी इकॉनमी की बैकबोन माना जाता है। लेकिन इसी क्रेडिट क्रिएशन के साथ एक खतरा भी आता है। अगर इकॉनमी में जरूरत से ज्यादा पैसा और क्रेडिट घूमने लगे तो आगे क्या होता है? इनफ्लेशन। अब सोचो अगर लोनस देने का यह सिलसिला बिना किसी नियंत्रण के चलता रहे और बैंक्स
10:55 इकॉनमी में लगातार पैसा डालते रहे तो क्या होगा? पहली नजर में तो यह बहुत अच्छी बात लगती है। हर किसी के पास पैसा होगा। हर कोई शॉपिंग करेगा। हर कोई नई चीजें खरीदेगा। लेकिन इकोनॉमिक्स में हर अच्छी चीज की भी एक लिमिट होती है। मान लो पूरे शहर में अचानक हर व्यक्ति के अकाउंट में लाखों रुपए आ जाए। अब जब हर किसी के पास ज्यादा पैसा होगा तो लोग ज्यादा सामान खरीदना चाहेंगे। लेकिन दुकानों में मौजूद सामान उतनी तेजी से नहीं बढ़ेगा। यानी बयर ज्यादा होंगे और गुड्स कम होंगे। और जब डिमांड सप्लाई से ज्यादा हो जाती है तो प्राइसेस बढ़ने लगते हैं। इसी फिनोमिना को इनफ्लेशन कहते हैं। इनफ्लेशन यानी महंगाई।
11:42 लेकिन इनफ्लेशन सिर्फ दाम बढ़ने का नाम नहीं है। असल में इनफ्लेशन आपके पैसों की परचेजिंग पावर को कम कर देता है। मान लो आज ₹100 में पांच चीजें मिल रही हैं। अगर अगले साल उन्हीं पांच चीजों के लिए ₹120 देने पड़े तो इसका मतलब है कि आपके ₹100 की ताकत कम हो गई। यानी पैसा वही है लेकिन उसकी खरीदने की क्षमता घट गई। इसलिए इनफ्लेशन को अक्सर एक इनविज़िबल पॉकेट मार्क कहा जाता है। यह आपकी जेब से नोट नहीं चुराता। यह उन नोटों की ताकत चुरा लेता है। अब यहां एक सवाल आता है, क्या इनफ्लेशन हमेशा बुरी चीज होती है? जवाब है नहीं। थोड़ी इनफ्लेशन किसी भी ग्रोइंग इकॉनमी के लिए सामान्य मानी जाती है।
12:29 क्योंकि जब लोग खर्च करते हैं, बिजनेसेस एक्सपेंड करते हैं तो जॉब्स बनती हैं और इनकम बढ़ती है। लेकिन जब इनफ्लेशन जरूरत से ज्यादा बढ़ने लगे तब समस्या शुरू होती है। इकोनॉमिस्ट्स आमतौर पर इनफ्लेशन के दो बड़े कारण बताते हैं। पहला डिमांड पुल इनफ्लेशन। दूसरा कॉस्ट पुश इनफ्लेशन। डिमांड पुल इनफ्लेशन तब होता है जब लोगों के पास खर्च करने के लिए बहुत ज्यादा पैसा हो और डिमांड तेजी से बढ़ जाए। जबकि कॉस्ट पुश इनफ्लेशन तब होता है जब प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ जाती है। जैसे फ्यूल महंगा हो जाए, इलेक्ट्रिसिटी महंगी हो जाए, ट्रांसपोर्ट कॉस्ट [संगीत] बढ़ जाए, रॉ मटेरियल्स महंगे हो जाए। ऐसी स्थिति में
13:15 कंपनीज अपने प्रोडक्ट्स की प्राइसेस बढ़ा देती हैं और इनफ्लेशन बढ़ जाता है। लेकिन इनफ्लेशन का एक जुड़वा भाई भी होता है जिसका नाम है डिफ्लेशन। डिफ्लेशन यानी कीमतों का लगातार गिरना। सुनने में यह अच्छी बात लगती है। लेकिन इकॉनमी के लिए यह भी खतरनाक हो सकता है। क्यों? क्योंकि अगर लोगों को लगे कि अगले महीने चीजें और सस्ती होंगी तो वे खरीदारी टाल देंगे और जब लोग खरीदारी कम करेंगे तो बिजनेसेस की सेल्स गिरेंगी। फिर सेल्स गिरेंगी तो प्रोडक्शन घटेगा। वैसे ही प्रोडक्शन घटेगा तो जॉब्स कम [संगीत] होंगी और आखिर में पूरी इकोनमी ही धीमी पड़ सकती है। यानी इकोनॉमिक्स में बैलेंस सबसे महत्वपूर्ण
14:02 चीज है। ना बहुत ज्यादा इनफ्लेशन ना बहुत ज्यादा डिफ्लेशन। और यहीं पर एंट्री होती है आरबीआई की यानी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया। भारत की मॉनिटरी अथॉरिटी। इसको ऐसे समझो अगर इकोनमी एक बड़ी कार है तो आरबीआई उसका ड्राइवर है और उसके हाथ में एक बहुत पावरफुल टूल होता है। रेपो रेट। रेपो रेट वो इंटरेस्ट रेट है जिस पर कमर्शियल बैंक्स आरबीआई से शॉर्ट टर्म फंड्स बोरो करते हैं। अब इसे एक आसान उदाहरण से समझते हैं। मान लो आपके मोहल्ले का शर्मा जी बैंक पैसों की कमी में है। वो आरबीआई के पास जाते हैं और कहते हैं थोड़े समय के लिए मुझे पैसे चाहिए। अब आरबीआई जिस ब्याज
14:49 दर पर उसे पैसे देगा वही रेपो रेट कहलाती है। यानी कल को अगर आरबीआई रेपो रेट बढ़ा देता है तो बैंक्स के लिए पैसा महंगा हो जाएगा। और जब बैंक्स के लिए पैसा महंगा होगा तो वे कस्टमर्स को भी महंगे लोनस देंगे। फिर होम लोन महंगा, कार लोन महंगा, बिजनेस लोन महंगा, एजुकेशन लोन महंगा और उसका नतीजा यह होगा कि लोग कम लोन लेंगे, कम स्पेंडिंग करेंगे। डिमांड कम होगी और [नाक से की जाने वाली आवाज़] इनफ्लेशन धीरे-धीरे नीचे आने लगेगी। इसके उल्टा अगर इकॉनमी बहुत धीमी पड़ जाए तो आरबीआई रिपो रेट कम कर सकता है ताकि लोंस सस्ते हो जाए। लोग ज्यादा बोरो करें, बिजनेसेस ज्यादा इन्वेस्ट करें और इकोनॉमिक एक्टिविटी बढ़े। इसी को हम मॉनिटरी पॉलिसी
15:36 कहते हैं। यानी इकॉनमी में मनी सप्लाई और क्रेडिट फ्लो को मैनेज करने की कला। लेकिन दोस्तों किसी भी देश की असली सफलता सिर्फ इनफ्लेशन कंट्रोल करने से नहीं मापी जाती। उसके लिए हमें देखना पड़ता है कि पूरा देश मिलकर कितना उत्पादन कर रहा है और यहीं से शुरू होती है जीडीपी की कहानी। मान लो अगर आपको किसी इकॉनमी की साल भर की मेहनत का रिपोर्ट कार्ड बनानी हो या फिर पता करना हो कि कोई देश आगे बढ़ रहा है या पीछे जा रहा है तो इसके लिए इकोनॉमिस्ट्स एक मैट्रिक का इस्तेमाल करते हैं जिसका नाम है जीडीपी यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट। जीडीपी का मतलब है एक साल के दौरान किसी देश की सीमाओं के भीतर पैदा
16:22 किए गए सभी फाइनल गुड्स और सर्विज की टोटल मार्केट वैल्यू। यानी अगर पूरे देश में बनने वाली चीजों और दी जाने वाली सर्विसेज की वैल्यू को जोड़ दिया जाए तो हमें जीडीपी मिलती है। यही कारण है कि जीडीपी को अक्सर इकॉनमी का स्कोर बोर्ड कहा जाता है। जब जीडीपी बढ़ती है तो आमतौर पर इसका मतलब होता है कि प्रोडक्शन बढ़ रहा है। बिजनेसेस एक्सपेंड कर रहे हैं, जॉब्स बन रही हैं, इनकम बढ़ रही है। लेकिन जीडीपी की भी अपनी लिमिटेशंस हैं। और यही इकोनॉमिक्स दिलचस्प हो जाती है। एग्जांपल के लिए हम अपने मम्मीियों को ले लेते हैं। वो सुबह जल्दी उठती हैं, खाना बनाती हैं, बच्चों को पढ़ाती हैं, घर संभालती हैं।
17:08 बीमार होने पर नर्स की तरह देखभाल करती हैं। अगर यही सारे काम मार्केट से करवाए जाए तो उनकी मॉनिटरी वैल्यू काफी बड़ी हो सकती है। लेकिन क्योंकि यह अनपेड हाउसहोल्ड वर्क है इसलिए जीडीपी में सीधे काउंट नहीं होता। अब यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इन सब का मतलब यह नहीं कि उसकी वैल्यू जीरो है। उसकी वैल्यू बहुत बड़ी है। बस जीडीपी उसे मेजर नहीं करती और यही जीडीपी की सबसे बड़ी लिमिटेशंस में से एक है। अब दूसरी तरफ एक रेस्टोरेंट में जाकर खाना खाना जीडीपी में काउंट हो जाता है। हॉस्पिटल बिल जीडीपी में काउंट हो जाता है। लेकिन घर के भीतर किया गया अनपेड वर्क नहीं। इसलिए जीडीपी यूजफुल जरूर है
17:54 लेकिन परफेक्ट नहीं। अब यहां एक और इंपॉर्टेंट कांसेप्ट आता है इनकम और वेल्थ। बहुत लोग इन दोनों को एक ही चीज समझते हैं, लेकिन वास्तव में दोनों अलग है। देखो इनकम वो पैसा है जो आप कमाते हैं। सैलरी, प्रॉफिट, फीस, रेंट और इन सबको इनकम कहा जा सकता है। लेकिन वेल्थ कुछ और है। वेल्थ वो एसेट्स हैं जो समय के साथ वैल्यू क्रिएट करते रहते हैं। जैसे प्रॉपर्टी बिजनेसेस इन्वेस्टमेंट्स स्टक्स, बॉन्ड्स और म्यूच्यूल फंड्स। यानी इनकम आपको पैसा कमाने में मदद करती है। लेकिन वेल्थ आपको लंबे समय तक फाइनेंशियल सिक्योरिटी देती है। इसीलिए दो लोगों की
18:39 इनकम समान हो सकती है। लेकिन उनकी वेल्थ बिल्कुल अलग हो सकती है। अब आते हैं जॉब्स और सैलरीज पर। बहुत लोग कहते हैं मैं दिन भर मेहनत करता हूं फिर भी कम कमाता हूं। जबकि कोई दूसरा व्यक्ति कम फिजिकल मेहनत करके ज्यादा कमा लेता है। ऐसा क्यों? क्योंकि मार्केट आमतौर पर आपकी मेहनत की नहीं आपकी वैल्यू क्रिएशन की कीमत देता है और उससे भी ज्यादा आपकी स्केयरसिटी की। यानी आपकी वैल्यू इस पर डिपेंड करती है कि आपकी स्किल्स कितनी रेयर हैं। अब मान लो कोई काम 2 दिन की ट्रेनिंग में सीखा जा सकता है। ऐसे में मार्केट में उसकी सप्लाई बहुत ज्यादा होगी और उसकी अर्निंग पावर सीमित रहेगी। लेकिन अगर कोई व्यक्ति ऐसी
19:25 प्रॉब्लम सॉल्व कर सकता है जिसे बहुत कम लोग सॉल्व कर पाते हैं तो उसकी मार्केट वैल्यू ज्यादा होगी। यही कारण है कि ह्यूमन कैपिटल किसी भी इकॉनमी की सबसे महत्वपूर्ण एसेट माना जाता है। ह्यूमन कैपिटल का मतलब है लोगों की नॉलेज, स्किल्स, एजुकेशन, एक्सपीरियंस और प्रोडक्टिविटी। कोई देश सिर्फ रोड्स और बिल्डिंग से अमीर नहीं बनता। वो अपने लोगों की कैपेबिलिटीज से अमीर बनता है। इसीलिए एजुकेशन, ट्रेनिंग और स्किल डेवलपमेंट इकोनॉमिक ग्रोथ के [संगीत] सबसे बड़े इंजंस माने जाते हैं। और आखिरकार इकोनॉमिक्स हमें यही सिखाती है कि रिसोर्सेज लिमिटेड है। चॉइसेस जरूरी हैं। ट्रेड महत्वपूर्ण है। मार्केट्स पावरफुल
20:12 है। मनी ट्रस्ट पर चलता है। बैंक्स ग्रोथ [संगीत] को फ्यूल करते हैं। इनफ्लेशन परचेसिंग पावर को प्रभावित करती है। आरबीआई बैलेंस बनाए रखने की कोशिश करता है। जीडीपी इकोनमी की तस्वीर दिखाती है और स्किल्स तथा प्रोडक्टिविटी भविष्य की वेल्थ बनाती हैं। कंक्लूजन तो मेरे दोस्तों अगली बार जब आप अपनी जेब से ₹10 का नोट निकालो, ऑनलाइन पेमेंट करो, पेट्रोल भरवाओ, रेस्टोरों में खाना खाओ या बैंक अकाउंट का बैलेंस देखो, तो यह मत समझना कि आप सिर्फ एक नॉर्मल कस्टमर हो। आप दुनिया के सबसे बड़े इकोनॉमिक सिस्टम का हिस्सा हो। एक ऐसे इनविज़िबल नेटवर्क का हिस्सा जहां हर सेकंड डिमांड, सप्लाई,
20:59 ट्रेड इनफ्लेशन प्रोडक्टिविटी इन्वेस्टमेंट, वेल्थ क्रिएशन और ओपोरर्चुनिटी कॉस्ट का खेल चल रहा है। इकोनॉमिक्स सिर्फ किताबों का सब्जेक्ट नहीं है। यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी की ऑपरेटिंग सिस्टम है। और इस सिस्टम का सबसे बड़ा नियम बहुत सीधा है। या तो आप इसके नियमों को समझकर इसके खिलाड़ी बन जाओ या फिर बिना समझे इसके प्रभाव को झेलते रहो। अगर आज की इस मास्टर क्लास में आपको इकोनॉमिक्स का यह असली चेहरा समझ आया हो तो नीचे लाइक का बटन दबाने की अपॉर्चुनिटी कॉस्ट बिल्कुल जीरो है। कमेंट में जरूर बताइए कि अगली मास्टर क्लास आप किस टॉपिक पर देखना चाहते हैं। मिलते हैं अगले वीडियो में।