Prashant Tandon: Modi Not Ruling India, A 'Caucus' Is Running It

Brief Summary

In this video, the discussion revolves around Prime Minister Narendra Modi's extensive foreign tours, especially in the context of pressing national issues that have arisen back home. The speaker highlights the growing frequency of Modi's trips and questions the efficacy and outcomes of these visits in relation to India's diplomatic standing and internal governance.

  • Modi's rapid foreign visits occur amidst significant domestic challenges.
  • Questions are raised about the functioning of the government in Modi's absence.
  • The outcomes of Modi's foreign diplomacy, especially concerning recent conflicts, are critically assessed.

Prime Minister Modi's Foreign Tours

The discussion begins by noting Prime Minister Modi's commitment to international diplomacy. Since assuming office, he has been frequently travelling abroad, particularly in recent months. From May to now, he visited multiple countries including UAE, Netherlands, Sweden, Norway, and Italy, with further trips planned to New Zealand, Australia, and Indonesia. Amidst key domestic issues like the Ram Temple dispute and student protests over exam paper leaks, questions arise about the rationale for heading abroad when national issues are unresolved.

Media Perspective and the Role of Journalism

Journalist Prashant Tandon provides insights into the nature of Modi's visits, suggesting that they are conventional diplomatic engagements akin to those of other global leaders. However, the conversation explores whether any other country’s leader undertakes as many trips as Modi. The discussion leads to concerns regarding who handles the nation’s affairs during Modi's absence, highlighting the complexities of governance and the roles of various officials.

Outcomes of Foreign Diplomacy

The conversation transitions to the effectiveness of Modi's foreign diplomacy. Tandon discusses that despite numerous trips, India's political isolation in crucial geopolitical issues, such as tensions involving Pakistan, is concerning. He questions what these diplomatic missions have achieved, particularly in the face of Pakistan's rising profile as a mediator.

MOU and Diplomatic Agreements

Prashant critiques the frequency and significance of Memorandums of Understanding (MOUs) signed during Modi's travels, dismissing many of them as meaningless without implementation. He compares them to unopened correspondence, suggesting that they often fail to convert into actionable agreements that produce tangible benefits for India.

Media's Role and Changes in Governance

There is a reflection on historical practices of governance and media execution during previous administrations. Facing major challenges and international relations, there is an assertion that today's governmental procedures have become more detached, potentially relinquishing control to a cabal of hidden advisors rather than the elected PM.

Current Political Dynamics

Discussions move towards the ongoing political manoeuvring within the BJP and the emergence of potential rival power centres, particularly focusing on Amit Shah's influence. There's a contemplation of the power dynamics shifting and the implications it may have on Modi’s future, especially with upcoming elections and the evolution of alliances.

Future Speculations on Governance

Speculations are made regarding Modi’s ability to withstand international pressures, especially from the US. The discussion speculates on whether Modi should have engaged more proactively with nations like Iran and questions his absence from critical diplomatic engagements that align with India's historical ties.

Impacts on Domestic Politics

The video concludes with a focus on the ongoing issues in Indian politics that could drastically affect Modi's governance strategy, including deterioration in public support concerning the Ram Temple disputes and other pivotal issues. The urgency of these domestic challenges appears to conflict with Modi's international focus, signalling a potential shift in public perception and responsiveness.

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Transcript

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0:03 दोस्तों आज बात करेंगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेशी दौरों की। ऐसा लगता है नरेंद्र मोदी ने सारी पृथ्वी की परिक्रमा करने का कोई संकल्प कर रखा है। जब से प्रधानमंत्री बने हैं उनका एक पैर विदेश में ही रहता है। अगर 2024 में तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके विदेशी दौरों की बात करें तो उसमें कुछ ज्यादा ही तेजी आ गई है। सिर्फ मई से अभी तक अगर देख लें तो मई महीने में वे पांच देशों की यात्रा पर थे। संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली। उसके बाद जून में वे फ्रांस और स्लोवाकिया होकर आए हैं। और अभी-अभी जुमा जुमा कुछ घंटे पहले वे लौटे

0:49 हैं सेसल्स से और इधर उनके सूटकेस खुल भी नहीं पाए होंगे कि वापस पैकिंग शुरू हो गई है और 5 जुलाई से वे तीन देशों की यात्रा पर फिर से रवाना हो रहे हैं। जिस वक्त देश बड़ी-बड़ी समस्याओं से जूझ रहा है। सबसे बड़ा मुद्दा राम मंदिर का पूरे देश को मथे हुए है। उस पर प्रधानमंत्री मौन है। युवा पीढ़ी सड़कों पर उतरी हुई है परीक्षाओं को लेकर, पर्चे लीक को लेकर। संसद में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के शहादत को छुपाने वाले बयान पर बवाल छड़ा हुआ है। लेकिन नरेंद्र मोदी देश को राम भरोसे छोड़कर एक बार फिर विदेश जाने वाले हैं। तो आखिर उनकी इन विदेश यात्राओं का

1:36 राज क्या है? और जब वे देश में नहीं होते तो देश का कामकाज कौन संभालता है? आखिर कार्यकारी प्रमुख कौन होता है? ऐसे कई सवाल लोगों के जेहन में आते हैं। इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए आज हम बातचीत कर रहे हैं देश के जानेमाने पत्रकार प्रशांत टंडन जी से। तो प्रशांत जी आपका बहुत-बहुत स्वागत है। प्रशांत जी ये जो यात्राएं लगी हुई हैं प्रधानमंत्री की ये सामान्य औपचारिक यात्राएं हैं। हर देश का राष्ट्रपति प्रधानमंत्री दूसरे देशों में जाता रहता है। क्या दुनिया का कोई और देश है जिसका मुखिया इतनी विदेश यात्राएं करता हो? और हमारे प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा के समय में देश किसके भरोसे रहता है?

2:23 जी बड़ा मुश्किल सवाल आपने किया कि देश किसके भरोसे रहता है लेकिन जरा पहले तो इसका असेसमेंट करें डॉक्टर साहब जी इनवि यात्राओं का हासिल क्या है बहुत सही बात है तो जाहिर सी बात है कि कि उसका जो प्रयास है जो उसका ऑब्जेक्टिव है वो भारत का डिप्लोमेटिक प्रोफाइल बनाना हमारे दोस्ती प्रकार हो हम दुनिया िया के अफेयर्स में हमारा दखल हो। बिल्कुल। कम से कम हमारे इलाके में तो हो। और इतना बड़ा युद्ध हुआ ईरान और अमेरिका और इजराइल का हमारे पड़ोस

3:08 में हुआ। हम प्रभावित हुए अभी भी प्रभावित है। उससे हमारी प्रभावित है। और हमसे कोई नहीं पूछ रहा। पाकिस्तान मीडिएटर मीडिएशन कर रहा है। मध्यस्था पाकिस्तान कर रहा है। पाकिस्तान का डिप्लोमेटिक प्रोफाइल ऊपर चला गया। तो ये कैसी विदेश नीति है? आप कहते हैं ट्रंप आपके दोस्त है। सुबह 6:00 बजे वो फोन कर देते हैं आपको। हम हम तो ऐसी दोस्ती है कि वो पाकिस्तान से मेडिएशन करा रहा है। आपसे भी करा रहा है। आप अमेरिका के भी दोस्त हैं। परंपरागत तरीके से ईरान के भी दोस्त ईरान के भी दोस्त हैं।

3:53 और इजराइल को अभी अभी इजराइल होकर आया है। युद्ध से 48 घंटे पहले हम साहब के हत्या के 48 घंटे पहले आप इजराइल में थे। तो उसके पहले आप देखिए कि 7075 देशों की यात्राएं हो चुकी थी जब हमारे यहां ये हुआ युद्ध पाकिस्तान से। बिल्कुल जब पहलगांव हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर हुआ तो कोई 75 से ऊपर देशों की यात्राएं मोदी जी कर चुके थे। तो उसका क्या हासिल हुआ? एक भी देश इजराइल और तालबान शासित अफगानिस्तान को

4:41 छोड़ के हमारे साथ कोई खड़ा नहीं हुआ। नहीं खड़ा था। हमारे सांसद भी भेजे गए अलग-अलग देशों पे भी। उस पे भी आधिकारिक बयान नहीं आए। पाकिस्तान 70 बार ट्रंप ने कह दिया कि सीज पार हमने करवाया। तो ऐसी विदेश यात्राएं किस काम की? ठीक बात ऐसी दोस्ती किस काम की कि जब आपको बताना अमेरिका बता रहा है कि आप रूस से तेल नहीं खरीदेंगे कब खरीदेंगे कब तक खरीदेंगे ईरान से अब खरीद सकते हैं अब नहीं खरीद सकते हमारे देश में मेहमान कौन आना है

5:27 आपको इतना अरसा हो गया हम लोग लगभग एक ही समय के पत्रकारिता शुरू की होगी 35 साल से ऊपर समय हो गया। बिल्कुल हमने नहीं सुना डॉक्टर साहब कभी कि आप केयरटेकर प्राइम मिनिस्टर को नहीं बुलाते जो नाइट वाचमैन है जी जो एक अंतरिम व्यवस्था तक के लिए प्रधानमंत्री है आप उसको नहीं बुलाते उससे क्या वो यू आप साइन करेंगे कौन सी आप एग्रीमेंट साइन करेंगे नहीं और उसके आने की सूचना भी अमेरिका देगा वही तय करेगा कि वेनेजुएला की वेनेजुएला राष्ट्रपति भारत आएंगे तो यह बड़ी मतलब विचित्र स्थिति है। बिल्कुल एक जिसको कहे कि कॉमेडी सर्कस है।

6:14 बिल्कुल निजी जैसा इतना गंभीर विषय अब आप देखिए जा रहे हैं अभी आए फिर जा रहे हैं। हासिल क्या हुआ? कौन से ऐसे एमओयू साइन कर रहे? एमओयू का कोई मतलब नहीं है। अभी दो सप्ताह पहले दो सप्ताह पहले आप ईरान और अमेरिका ने एमओयू साइन किया। उसके बाद भी दोनों तरफ से हमले हो रहे हैं। हमले चल रहे हैं। तो एमओयू जब तक कि एक एग्रीमेंट में कन्वर्ट ना हो तब तक एमओयू का कोई मतलब नहीं है। एमओयू क्या है? मेमोरेंडम अंडरस्टैंडिंग कोई बाध्यता है नहीं।

7:00 अब 12 साल में प्रशांत जी कितने एमओयू पर दस्तखत हो चुके हैं। पर कितने अमली जामा पहन पाए? कितने जमीन पर उतरे किसी को कुछ नहीं पता। एमओयू वो है डॉक्टर साहब कि जब हम लोग अपने दफ्तर जाते हैं बिल्कुल और जब संपादक थे आप भी संपादक रह चुके हो जी तो हमारे ऑफिस के लोग इतना बंडल भर हमको देते हैं डाक उस डाक को हम खोलते भी नहीं थे बिल्कुल सही बहुत जरूरी व्यक्तिगत होती है किसी इंपॉर्टेंट की वही खोलते थे बाकी स्टाफ के लोग खोलते थे तो ये ये एमओयू वैसी डाक है इसको कोई खोलता नहीं है वो पड़ी रहती है। अब ये बार-बार जो विदेश जा रहे हैं देखिए मैंने तो कई कम से कम पांच

7:46 प्रधानमंत्रींत्रियों के शासनकाल में देखा है। मैंने पीएमओ कवर किया यानी रोज जाना वहां सुबह सुबह से शाम तक पीएमओ में फोन आना जाना होता जो पीएमओ कवर करता था। मेरे समय जब हम पीएमओ कवर कर रहे थे तब इतनी भीड़ भी नहीं थी। हां तब इतना मीडिया नहीं था। तब इतना मीडिया भी नहीं था। तब सीमित लोग थे। व्यक्तिगत रूप से प्रधानमंत्री पहचानते थे। तो उस वक्त भी हम हमने देखा कि प्रधानमंत्री की दिनचर्या क्या होती है और कभी-कभी हम लोग सोचते थे कि कितना मुश्किल काम है। सुबह इंटेलिजेंस ब्रीफिंग होती है। फिर वो ऑफिसर्स की मीटिंग होती है और दो चीजों की मॉनिटरिंग कोई

8:33 प्रधानमंत्री रहा हो वाजपेय जी रहे हो देवगड़ा रहे हो गुजरातल रहे हो नरसिम्हा राय राव रहे हो या कोई और मनमोहन सिंह मनमोहन सिंह रहे हो इन प्रधानंत्रियों को मैंने देखा कि राउंड द क्लॉक दो चीजों की मॉनिटरिंग इकोनमिक सिचुएशन की और नेशनल सिक्योरिटी आंतरिक सुरक्षा की बिल्कुल ये मॉनिटरिंग हर प्रधानमंत्री 24 * से करता है। बिल्कुल करता है। पार्लियामेंट के सेशन के बीच में विदेश कोई नहीं जाता है। विदेश से विदेश के में यात्रा के दौरान और

9:18 विदेश यात्रा से लौटने के बाद प्रधानमंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस करते थे। मुश्किल कड़े सवाल होते थे। क्या करके आए हैं आप? सर प्रशांत जी ऑन बोर्ड प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है। जब हम लोग साथ जाते थे जहाज में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के एयर इंडिया वन में ऑन बोर्ड प्रेस कॉन्फ्रेंस टेक ऑफ के बाद और वापस इंडिया लौटते समय उसके बाद कैबिनेट कैबिनेट को प्रधानमंत्री बिलीव करता था कि क्या करके आए हैं। राष्ट्रपति भवन जाते थे राष्ट्रपति को बिलीव करते हमेशा परंपरा रही है। तो ये परंपराएं रही है। पार्लियामेंट पार्लियामेंट जब होता था पार्लियामेंट को बताया जाता था कि प्रधानमंत्री किन-किन देशों की यात्रा में गए और क्या-क्या क्या हासिल किया समझौते करके आए क्या अचीवमेंट है कुछ नहीं

10:04 है और दूसरा एक जो परिवर्तन आया है किसी प्रधानमंत्री ने कभी नहीं किया कि विदेश यात्राओं को डोमेस्टिक पॉलिटिक्स के लिए इस्तेमाल किया हो बिल्कुल बहुत सही कहा ये डोमेस्टिक अब एक प्ले बुक बन गई है डॉक्टर साहब प्ले बुक ये है कि आप जाएंगे एनआरआई का हुजूम लगेगा [नाक से की जाने वाली आवाज़] और एनआरआई के हुजूम के बाद जो है वो एक कोई महिला अवतरित होगी एएनआई के कैमरे के सामने और वो रोती हुई कहेगी कि मुझे मोदी जी के दर्शन हो गए। कई बार तो एक ही महिला कई देशों में दिखाई दी है। फिर वो कहेगी कि मैं मैंने मोदी जी का हाथ

10:50 छू लिया। मैं अपना हाथ नहीं धोऊंगी तीन दिन तक। जी। अब उसमें एक नया एडिशन हो गया कि जिस भी देश में जाएंगे तो उसका जो है कोई नागरिक सम्मान भी मिलेगा उनको। उस पर भी हम आने वाले में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बना हुआ एक सम्मान लेकर आ गए। उसमें देश की सेशंस की स्पेलिंग गलत लिखी हुई है। अपने ही देश की। सेस ने ऐसा सम्मान इनको दे दिया कि अपने जज की स्पेलिंग गलत की है और रिपब्लिक की स्पेलिंग गलत रिपब्लिक की गलत वो अवार्ड आप उनको इजराइल में ऐसी अवार्ड मिल गया जो ना इसके पहले कभी दिया गया ना बाद में कभी दिया गया ऐसे कुछ और अवार्ड भी है जो कभी इनहीं को मिले तो ये एक नया आइटम आ गया इनकी प्लेबुक में

11:38 ये मतलब देश के साथ एक तरीके का मजाक है खिलवाड़ हो रहा है ठीक बात है प्रशांत जी थोड़ा थोड़ा सा अवार्ड का चर्चा की का जिक्र चल पड़ा है। थोड़ी सी इस पर बात कर लें। जैसे शेषल्स के अवार्ड की बात हो रही है। ऐसा कहा जा रहा है कि वो तो यहीं से बनकर गया था या हमारा जो विदेश मंत्रालय या प्रधानमंत्री कार्यालय खुद कोशिश करता है। पूरी तैयारी उस देश में जाकर की जाती कि ऐसा कोई अवार्ड दे दीजिए। तो ये सब चीजें प्रायोजित होती है हमारी तरफ से ही। देखिए मैं अभी नाम बताना नाम सामने नहीं आया है। जी लेकिन एक यूरोपियन यूरोपीय देश के राजदूत भारत के उन्होंने किसी से कहा

12:24 जी कि हमारे ऊपर बहुत दबाव था कि हम कोई अवार्ड का इंतजाम करें। हम नहीं कर पाए। उसकी उनको कीमत पता है कि हमको पोस्ट रिटायरमेंट कोई बेनिफिट नहीं मिलेगा। उन्होंने कहा उसकी मुझको इच्छा भी नहीं है। क्या बात है? तो उन्होंने नहीं किया। तो ये दबाव रहता है और हमारे जो सिविल सेवा है उसका सबसे एलिट वर्ग माना जाता है फॉरेन। आईएफएस बिल्कुल आईएफएस और ये प्राइस पोस्टिंग होती है। अब उसमें उनका काम क्या है? भारत के नेशनल इंटरेस्ट को प्रोटेक्ट करना, उसको प्रोजेक्ट करना। अब उनके पास जो नया काम आ गया है कि उनको

13:13 बसों में भर के एनआरआई को लाना है, रैलियां करनी है। अब पुरस्कार आयोजन करना है। नृत्य संगीत का आयोजन है। वो महिला आर्टिस्ट कलाकार ढूंढनी है जो कि वो कैमरे के सामने आके रोए। तो यह काम आप विदेश सचिव, विदेश स्तर के, विदेश सेवा के लोगों से आप ले रहे हो तो बड़ा अजीब सा हाल है। लेकिन हम वहां लौटते जहां से आपने बात शुरू की। जी। देखिए इस बात की दिल्ली में बहुत चर्चा होती है कि लंबे समय तक मैं बता रहा था कि प्रधानमंत्री कितना व्यस्त रहते हैं। सुबह रॉ का चीफ ब्रीफ करता है। शाम को 6:00 बजे फिर ब्रीफ करता है।

14:00 आवश्यकता होती तो बीच में भी ब्रीफिंग होती है। ये ब्रीफिंग अब नहीं होती है। नहीं होती है ही नहीं जब तो कहां होगी किसको बताया जाए किसको तो बहुत चर्चा यहां पे है कि सब कुछ आउटसोर्स हो चुका है। एक फोकस है सरकार कोई और चला रहा है। सरकार कोई और चला रहा है। यह केवल नाम मात्र के लिए आप उनकी दिनचर्या को देख तो पब्लिक इवेंट होता है। बिल्कुल तो कहां मतलब हमने आपने प्रधानमंत्री को देखा है करीब से तमाम तो कहां इतना समय प्रधानमंत्री के पास होता है? वो घड़ी देखता रहते हैं बार-बार

14:46 प्रधानमंत्री। बिल्कुल सही बात है। और किन कामों में बिजी रहते हैं? कई बार हम लोग सुबह 9 बजे प्रधानमंत्री निवास पहुंच जाते थे तो मालूम पड़ता था कि प्रधानमंत्री एक घंटे से अधिकारियों के बीच में बैठे हैं क्योंकि पार्लियामेंट है और पार्लियामेंट में कोई सवाल आए हुए हैं। उसकी ब्रीफिंग चल रही है। यहां तो नए-नई पगड़ियां और नए सजरी और नया इवेंट ये सब प्लानिंग होती है। तो सवाल ये है कि देश चला कौन रहा है? मैं उसी गु्थी को आपसे हल करवाना चाहता हूं। कैसे भी आप थोड़ा सा हमारे दर्शकों को यह तो बता दीजिए संकेतों में ही बता दीजिए कि आखिर देश चला कौन रहा है? कौन है कॉकस में? अमित शाह हैं, एनएसए अजीत डोभाल

15:31 है, विवेकानंद फाउंडेशन है या कहीं कोई सफेद हवेली में बहुत दूर बैठा हुआ कोई ओवल दफ्तर में बैठा हुआ कोई आदमी है। यह हम इसलिए भी पूछ रहे हैं प्रशांत जी थोड़ा सा एक चीज जोड़ दें। इसे भी अपने उत्तर में ले लीजिए। हमारे देश की वाणिज्य व्यापार नीति, हमारी विदेश नीति, हमारी रक्षा नीति इन सबका ऐलान वाइट हाउस करने लगा है। कौन विदेशी मेहमान भारत आएगा इसकी सूचना दूसरे देशों से हमें मिलती है। और अब तो हद यह हो गई है कि हमारा प्रधानमंत्री अमेरिका कब जाएगा इसकी सूचना भी विदेश मंत्रालय या प्रधानमंत्री कार्यालय नहीं दे रहा। सरजी गोर बता रहे हैं कि प्रधानमंत्री दिसंबर में अमेरिका जाने वाले हैं। तो यह फिर इसका अर्थ यह है कि कोई और चला रहा है देश और सरकार। एक कॉकस है वो कॉकस को हैंड ओवर हो चुका

16:19 है सब। जी और वो कॉकस ही सारे फैसले कर लेता है। और ये कॉकस में इंडस्ट्री के लोग भी हैं। इसमें ब्यूरोक्रेट भी हैं। कुछ चहेते वही लोग कर रहे हैं फैसले। और प्रधानमंत्री तो खुद भी कह चुके ऑन रिकॉर्ड कह चुके कि मैं फाइल नहीं पढ़ता हूं। नहीं देखता हूं। तो प्रधानमंत्री अगर फाइल नहीं पढ़ता है तो फिर क्या करेगा? तो चलता है। अभी भी और केवल भारत नहीं अभी भी फाइलों में चलता है। आप देखते होंगे ट्रंप का फोटो वीडियो आता है साइन करते हुए डॉक्यूमेंट। बिल्कुल बिल्कुल आता है। देश तो अभी भी फाइलों से ही चलता है और दुनिया के सारे देश ऐसे चलते हैं। तो ये

17:06 कॉकस है और पॉलिसी मेकिंग अब सरकार के पास लगता है कि है नहीं क्योंकि पॉलिसी कहीं और से बन के आती है। कोई थिंक टैंक है। वहां से बन के आती है पॉलिसी वो नीति आयोग पहुंचती है। नीति आयोग सरकार के पास कहीं कोई थिंकिंग नहीं है। जैसे एक एग्जांपल मैं आपको दूं मिसाल कि कैबिनेट जब हम लोग पीएमओ कवर करते थे और कैबिनेट कवर करते थे तो कैबिनेट नोट एक शाम पहले कैबिनेट की मीटिंग अगर थर्सडे को है तो कैबिनेट नोट एक शाम पहले चला जाता था वो सीटेट डॉक्यूमेंट होता था कुछ कुछ क्षण के कुछ कुछ इंफॉर्मेशन हम लोग तक पहुंचती थी सोर्सेस के मुताबिक जो सोर्स वाला आजकल

17:52 मामला है तो उसमें हम लोग खबर बनाते थे लेकिन अब क्या होता है? किसी के पास कोई किसी मंत्री के पास कोई कैबिनेट नोट नहीं जाता है। कैबिनेट के कैबिनेट नोट आर्थिक और कानूनी और बहुत सारी चीजें उसकी होती है। अधिकांश आर्थिक फैसले होते हैं। वो लंबा 18 से 20 या 45 पेज का पीडीएफ होता है। आसानी से किसी रे पर्सन को समझ में भी नहीं आएगा। नहीं आएगा। सही बात है। सरकारी भाषा होती है और वो अब क्या सिस्टम है कि किसी मिनिस्टर को पास नहीं मिलता वो तो पहले से वो पढ़ के

18:40 नहीं आ सकता पहली बात उस पर कोई अपना दिमाग अप्लाई नहीं कर सकता अपना कोई डिसेंट नोट डिसेंट की तो अगर कल्पना ही नहीं की जा सकती मोदी कैबिनेट में पर अपनी राय भी नहीं रख सकता क्या नया सिस्टम क्या है तो आप हसेंगे कैबिनेट मीटिंग के लिए जब कैबिनेट मिनिस्टर जाते हैं तो उनको एंट्री के वक्त एक टेबलेट मिलता है। उस टेबलेट में वो कैबिनेट नोट होता है पीडीएफ। उसके तुरंत बाद मीटिंग शुरू हो जाती है। उसी वक्त वो पढ़ सकते हैं। क्या है? उसी वक्त उसको ऑन करना है और एक्सेस करके पढ़ना है। पढ़ना है और वापस जाते वक्त उसको जमा करना पड़ता है।

19:26 ओो तो उनके इसमें दो उदाहरण प्रशांत जी याद दिला देते हैं, जोड़ देते हैं। नोटबंदी का फैसला जब किया गया तो देश के वित्त मंत्री को नहीं मालूम था। ताजा मामला है मनरेगा में से महात्मा गांधी का नाम हटाने का। शिवराज सिंह को पता भी नहीं था बसंत कहां बंधे हैं। उनको तो मालूम पड़ा बाद में कि मनरेगा में से नाम हटा दिया क्योंकि राहुल गांधी ने चेतावनी दी संसद में खड़े होकर कहा कि शिवराज सिंह को तो पता ही नहीं था कि नाम बदला जा रहा है। कोई खंडन नहीं किया शिवराज सिंह ने कभी भी तो पीएमओ चला रहा है पूरा देश और पीएमओ को एक काकस चला रहा है आपके हिसाब से। हां बस सिंपल सी बात ये है। अब दर्शक अपना अंदाज लगाएं। अपने सूत्रों का वो करें। बहुत सी बातें

20:14 जा सकती है। लेकिन इतना इशारा मैं कर रहा हूं कि हां अब उनके हाथ में कुछ बचा नहीं है। दूसरा कि पिटिकल मामला क्या है डॉक्टर साहब? पिटिकल मामला यह है कि बहुत सारी मामलों में जैसे अभी आपने शुरुआत में कहा कि छात्रों पेपर लीक और तमाम राम मंदिर एस्थल भी चल रहा है ये सब कुछ चल रहा है और राम मंदिर का चढ़ावा चोरी का मामला चला हो गया इसी बीच हो क्या रहा है डॉक्टर साहब कि बहुत सारे आरोप लगते थे चाहे गलबन में हमारे सैनिक मारे गए हो चाहे वो ऑपरेशन तंदूर में कोई बुकअप हुआ हो आतंकवादी हमले हो गए हो पुलवामा हो गया

20:59 हो पहलगांव हो गया हो आईएसआई हमारे यहां जांच करने आ गया पठानकोट में प्रधानमंत्री पाकिस्तान चले गए बिना बुलाए चले गए तमाम सारी बातें हुई है लेकिन चिपकता कुछ नहीं था सही बात है आरोप चिपकते नहीं थे अब उसमें तब चिपकते क्यों नहीं थे? क्योंकि इनके पास एक हिंदू मुसलमान पॉलिटिक्स का एक रक्षा कवच था। बिल्कुल सही बात है। तो उस रक्षा कवच का इस्तेमाल होता था। राम मंदिर के चढ़ावे के कांड से चिपक गया है वो। और युवाओं का जो पेपर लीक का जो मामला हुआ

21:48 है उसमें जो युवा आगे आए इन दो घटनाओं ने क्या किया कि वो जो रक्षा कवच था उसमें छेद कर दिया। बिल्कुल सही। वो अब फट गया है। तो जो राहुल गांधी कह रहे थे अपने सहयोगियों को इंडिया गठबंधन की बैठक में कि अब आपके पुराने तरीके काम करना बंद कर चुके हैं। दरअसल ये नरेंद्र मोदी के लिए भी लागू होता है। अब पुराने काम करना बंद कर चुके हैं। अब वो विदेश यात्रा पे महिला रोती मिलेगी। कहीं आप जाएंगे तो एंबुलेंस के लिए आप रुक जाएंगे। कोई मेडल ले आएंगे कहीं से। ये अब चीजें पुरानी हो गई है और युवा इसको समझ रहा है।

22:35 इनका असर नहीं हो रहा है। उनका असर नहीं हो रहा क्योंकि अब जो रक्षा कवच था उसमें छेद हो गए हैं। प्रशांत जी अंदर कोई खींचतान चल रही है बीजेपी में। क्या इसको भविष्य के सत्ता संघर्ष के रूप में भी देख सकते हैं? क्योंकि ऊन9 अब धीरे-धीरे करीब आया जा रहा है। नरेंद्र मोदी के नरेंद्र मोदी के राष्ट्रपति बनने वाले कयास पर भी आपकी राय चाहिए। जी हां दो तीन बड़े फैक्टर हैं। एक देखिए अभी जब कैबिनेट रिशबल की बात हो रही तो डिप्टी प्राइम मिनिस्टर की चर्चा चल रही है। चलिए और डिप्टी प्राइम मिनिस्टर जाहिर सी बात है कि वो अमित शाह होंगे। तो जैसे ही अमित शाह होंगे तो टू पावर सेंटर्स बन जाएंगे।

23:22 अभी भी वही है। अभी भी सरकारी कामकाज अमित शाह ही करते हैं सारे। बिल्कुल। और लेकिन अमित शाह और अजीत डोबाल में थोड़ा सा अंतर है, खिंचाव है। अजीत डोबाल माने जाते हैं। नरेंद्र मोदी के खेमे के। इनको एनटीआरओ और रॉ रिपोर्ट करते हैं। इंटेलिजेंस ब्यूरो सीधे रिपोर्ट करता है। अमित शाह को तो ये तमाम डायनेमिक्स है सरकार में भी जो अलग-अलग ग्रेविटीज है और एक जो पिछले दो तीन साल से एक नई ग्रेविटी काम कर रही है जी और बहुत इफेक्टिव काम कर रही है वो है लखनऊ और दिल्ली

24:08 हम बिल्कुल इसी सवाल पर आना था योगी आदित्यनाथ और अमित शाह और मोदी और आपने देखा होगा कि मोदी और और योगी जब किसी सार्वजनिक जगह पे मिलते हैं चाहे वो एयरपोर्ट का उद्घाटन हो या कोई और जगह हो हम तो सामान्य शिष्टाचार भी नहीं बचा है। नहीं बचा है। इतनी दूरियां है और जब उत्तर प्रदेश में रिजल्ट बहुत खराब आए और और ये मानते हैं हमारे दोनों गुजराती भाई कि उत्तर प्रदेश की वजह से हम मेजरिटी से दूर रह गए। 240 पर अटक गए। अटक गए। उसका दोष ये योगी आदित्यनाथ को देते हैं।

24:56 और योगी आदित्यनाथ जो है वो दिल्ली का टिकट कटा के बैठे हुए हैं। बिल्कुल। वो 2029 में दिल्ली का भी देख रहे हैं ख्वाब और पूरी तैयारी से हैं। पूरी तैयारी से और उन्हें रोकने के लिए उन्हें रोकने के लिए सारी कवायद मोदी शाह कर ही रहे हैं। हां। उनकी पीआर टीम काम करना बंद कर शुरू कर चुकी है योगी आदित्यनाथ की। इकोनॉमिस्ट मैगजीन में भविष्य का प्रधानमंत्री के तौर पर उनका एक आर्टिकल छप गया। बिल्कुल छप गया। उनके लिए वो उनकी तमाम विदेश यात्राओं पर कैची कर लग जाती है। ऐसी घटनाएं होती है योगी आदित्यनाथ की भी किस्मत बड़ी अच्छी है।

25:43 जो ऐसी घटनाएं हुई है कि जो फिर से कभी होता है कि गेंद नहीं फिल्मों की फिल्म की जो आखरी होती है तौल कभी इसके हाथ में कभी उसके हाथ में तो वो चल रहा है। शुभेंदु अधिकारी के सेक्रेटरी की हत्या हुई और जिन जिन पर हत्या का आरोप है वो उत्तर प्रदेश के निकले बिल्कुल सही प्रदेश और वो प्रोफेशनल किलर बताए जा रहे हैं। सुपारी किलर है। पर सुपारी किसने दी ये आज तक नहीं पता लगा। अब उत्तर प्रदेश की पुलिस की गिरफ्त में है वो। उनका इंटेरोगेशन हो चुका है

26:30 तो तो जिसके बाद उत्तर प्रदेश की पुलिस उसको तो मालूम है। उसको तो मालूम है। बिल्कुल सही बात है। प्रशांत जी एक सवाल और है कि इस वक्त अमेरिका का जो दबाव है जो हमने शुरू में कहा कि मार्को रूबियो कुछ कह देते हैं। सरियो गोर भारत की तरफ से ऐलान कर देते हैं। हमारे वेस्टर्न कमांड के मुख्यालय में जाकर ऑपरेशन सिंदूर की ब्रीफिंग लेते हैं। अमेरिका यूएस इंडोपेसिफिक कमान में से इंडो शब्द हटा देता है। ऐसी स्थितियों में अमेरिका के दबाव को नरेंद्र मोदी कब तक झेल पाएंगे और कितना राष्ट्रीय हितों पर समझौता उन्हें करना पड़ेगा? और अंतिम सवाल उसी में कि क्या नरेंद्र मोदी को ईरान

27:16 जाना चाहिए था। अब वे नहीं जा रहे। हमें मालूम है सैयद अता हसनैन जा रहे हैं और वह एक मंत्रणी जिनका नाम कल ही देश को अचानक पता लगा कि इस नाम की भी कोई मंत्री है मोदी सरकार में वे जा रही हैं। लेकिन क्या नरेंद्र मोदी को जाना चाहिए था और क्या इजराइल या अमेरिका के दबाव के चलते हुए नहीं गए? निश्चित तौर पर आप सोचिए कि जिनकी अंतिम यात्रा में वो शामिल होते हैं उनकी हत्या के 48 घंटे पहले जिन्होंने हत्या की उसके साथ थे वो बिल्कुल सही बात वहां पुरस्कार ले रहे थे उनकी पार्लियामेंट को बात कर रहे थे तो हमारे

28:01 ईरान से सांस्कृतिक संबंध है सैकड़ों साल और पुराने संबंध हैं। मोदी जी के शब्दों में प्रशांत जी मोदी जी के शब्दों में इतिहास से पुराने रिश्ते हमारे हमारी दोस्ती इतिहास से पुरानी है। 2016 में इन्हीं अली खमनई के बगल में बैठकर कहा था नरेंद्र मोदी ने। कुरान शरीफ बैठ के आए थे सातवीं शताब्दी की। तो अब सवाल ये है कि ये जाएंगे जाएंगे किस मुंह से? बिल्कुल सही बात। तो यह यह भी एक वो है और दूसरा कि इनको विदेश नीति भाई जब आपके घर में कोई आ रहा है वो फैसला भी आप नहीं कर पा रहे हो कोई और उसकी घोषणा कर रहा है आप कहीं जाओगे वो

28:48 कैसे हो सकता है और वो भी ऐसी जगह जहां जहां पे युद्ध हो रहा है तो इसलिए मुझको लगता नहीं कि मोदी साहब ने कभी सोचा भी होगा वहां जाने का अशोक तक जता नहीं पाए। अभी तक श्रद्धांजलि भी नहीं दी उन्होंने। आज की तारीख तक नहीं दी। अभी तक नहीं दी है। तो कैसे जाते हो? तो ये ये सब बातें दूसरी एक जो बात है देखिए योगी आदित्यनाथ की बात हो रही है। एक पॉइंट रह गया था। जी जी बिल्कुल। देखिए जो राम मंदिर का एसआईटी बनाने का मामला है बीजेपी और आरएसएस दिल्ली वाले लोग और आरएसएस दोनों नहीं चाहते थे कि एसआईटी बने। बिल्कुल

29:33 दोनों नहीं चाहते थे कि एफआईआर हो। ये तो योगी आदित्यनाथ ने बढ़ के कर दिया। गिरफ्तार भी कर दिया। और एक बात मैं आपको और बता दूं कि योगी आदित्यनाथ कभी हाल में गए थे एफआईआर से पहले वो गए थे अयोध्या गए थे और अधिकारियों को उन्होंने कहा था अयोध्या में और अपने अधिकारियों को भी कि मेरे आसपास चंपत राय दिखने नहीं चाहिए दिखने नहीं चाहिए बिल्कुल सही है और उसके बाद चंपत राय का हो जाता है उनको मैसेज मिल गया चंपत राय को तो चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा हो गया। तो और

30:19 दूसरी बात जो बहुत महत्वपूर्ण है। देखिए योगी आदित्यनाथ हम उनसे सहमत हो ना सहमत हो। बिल्कुल। लेकिन जो जो फैक्ट है वो फैक्ट है। फैक्ट क्या है कि जब 23 24 दिसंबर की रात 1949 में मूर्तियां रखी गई तो गोरख धाम के पीठ के लोगों का हाथ था। उसमें शामिल थे। बिल्कुल जो महंत वैद्यनाथ के पहले थे। अभी मुझको उनका नाम याद नहीं आ रहा। लेकिन वो पहले से उसके बाद महंत अवैद्यनाथ ने इस पूरे को पूरे आंदोलन को आगे बढ़ाया। बाबरी मस्जिद के गिरने में भी उनका पूरा

31:05 प्लानिंग उनहीं की थी और उनहीं वही लोग थे। महेंद्र आदित्यनाथ के बाद जब योगी आदित्यनाथ बने तो इन्होंने उसको आगे बढ़ाया। तो यानी गोरखधाम पीठ का एक रोल रहा। इंपॉर्टेंट रोल रहा। बिल्कुल रहा। और जब यह सुप्रीम कोर्ट से फैसला आ गया और सुप्रीम कोर्ट से फैसले के बाद जब ट्रस्ट बना तो पहली बात कि वो जब प्राण प्रतिष्ठा हो रही थी तो योगी आदित्यनाथ प्रेम में ही नहीं थे। इनको प्रेम के बाहर रखा गया। मुख्यमंत्री गोरख धाम पीठ के सर्वे सर्वा महंत और मुख्यमंत्री भी

31:50 और उनको फ्रेम के बाहर रखा गया। उनसे पूछा भी नहीं गया कि ट्रस्ट में किसको किसको रखा जाए। उनके किसी एक भी आदमी को लिया नहीं गया। नहीं रखा गया। तो अब एफआईआर है, एसआईटी है। अब योगी आदित्यनाथ का समय है। तो लगता है इसकी आंच राम मंदिर की जो डकैती या चोरी जो भी कहना चाहे चढ़ावे पर इसकी आंच ऊपर तक पहुंचेगी दिल्ली नागपुर तक। उसकी लपटें पहुंच रही थी। देखिए बड़ा सेटबक क्या हुआ है? जी। बड़ा सेटबक ये हुआ है कि एक तो काशी मथुरा का वाला जो पूरा मामला था उसको सेटबक हुआ है और उससे भी बड़ा उससे भी बड़ा देखिए विश्व हिंदू परिषद एक मुहिम चला रहा था अभी भी चला रहा है। देश

32:38 में हजारों लाखों जो मंदिर है सब किसी ना किसी प्रकार से गवर्न होते हैं। किसी कहीं कुछ कुछ मंदिर जो है वो वहां के पारिवारिक हैं। कुछ जो है गद्दियां हैं। एक एक जाता है तो उत्तराधिकारी है। जैसे गोरख धाम पीठ भी एक गद्दी है। गद्दी है। गए तो उनके उच्चाधिकारी आदित्यनाथ थे तो वो बन गए। तो मंदिरों की गवर्नेंस का एक सिस्टम है हमारे और उसमें ट्रस्ट होता है। जो बड़े मंदिर है उसमें गवर्नमेंट के ट्रस्ट है। ये अंग्रेज कानून बनाए गए थे वो अलग-अलग राज्य सरकारों के तो वैष्णो देवी गवर्नमेंट का ट्रस्ट है।

33:28 पूरी जगन्नाथ पुरी गवर्नमेंट का ट्रस्ट है। सोमनाथ मंदिर गवर्नमेंट का ट्रस्ट है। तो तमाम जो बड़े-बड़े मंदिर है जहां हजारों करोड़ के चढ़ावे आते हैं ये गवर्नमेंट के ट्रस्ट है। गवर्नमेंट उसमें सीओ अपॉइंट करती है। गवर्नमेंट की देखरेख में वो चलता है। इसीलिए आपने इन मंदिरों में चढ़ावे की चोरी के की चर्चा नहीं सुनी होगी। दक्षिण में तो प्रशांत जी जोड़ दें। दक्षिण में तो कई मंदिरों में प्रतिदिन अनाउंसमेंट होता रहता है और परिसर में कोई भी जो श्रद्धालु होते हैं उनमें से दो श्रद्धालुओं को ऐसे ही फरी तौर पर बुलाकर नोटों की गिनती में बिठाला जाता है सामने कोई भी दो श्रद्धालु आ जाए और आपके सामने ये गिनती हो रही है चढ़ावे कि आपके सामने तिजोरी में जमा हो गए या बैंक में चले गए

34:15 ये दक्षिण के कई मंदिर सारे मंदिर सारे मंदिर सरकार से गवर्न हो गए सारे सारे मंदिर सारे बिल्कुल 10,000 से ऊपर मंदिर मंदिर तमिलनाडु सरकार गवर्न करती है। इसलिए आप देखिए कि वहां पे एक कल्याणकारी काम भी होता है। यूनिवर्सिटी भी चलती है। तमाम बातें होती है। अस्पताल चलते हैं। तो आरएसएस जो है ये मुहिम चला रही है बहुत लंबे समय से कि ये जो सरकारी ट्रस्ट है इसको हटा के हिंदुओं की बॉडीज को दिया जाए। हिंदू बॉडीज हिंदू संस्थान क्या हो गए? आरएसएस आरएसएस के होंगे स्वाभाविक है। तो ये जो चंपत राय बिजनेस मॉडल है इसको वैष्णो देवी जगन्नाथ पुरी जैसे बड़े

35:02 मंदिरों में आरएसएस चाहती थी। उस पूरी मुहिम को इस चंपत राय कांड से बहुत बड़ा झटका लग गया है। बिल्कुल बहुत सही बात कही आपने। बहुत अच्छी बात। प्रशांत जी बहुत-बहुत धन्यवाद। आज हम लोगों ने प्रशांत जी के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं उनके पीछे जो मंतव्य हैं वे जब वे देश में नहीं रहते तो सरकार कैसे चलती है देश किसके भरोसे रहता है प्रशांत जी का मानना यह है कि कॉकस इस वक्त देश चला रहा है सरकार की कमान बजाय नरेंद्र मोदी के आउटसोर्स होकर कुछ लोगों के हाथ में है वे कौन लोग हैं हो सकता है भविष्य में कभी सामने आए कभी नरेंद्र मोदी जब सत्ता में ना रहे तब उनके असली चेहरे सामने आए।

35:48 लेकिन देश धीरे-धीरे समझ रहा है कि देश भगवान भरोसे है। नरेंद्र मोदी राम भरोसे छोड़कर इस देश को अगले चार दिनों बाद फिर से विदेश यात्रा पर जा रहे हैं। न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया की यात्रा के लिए उनके बैग तैयार हो चुके हैं। बहुत-बहुत धन्यवाद प्रशांत जी इस सार्थक बातचीत के लिए। बहुत धन्यवाद।

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