How to DETOXIFY Your Liver in 7 Days

Brief Summary

ये वीडियो लिवर के हेल्थ के बारे में है और कैसे आजकल ज़्यादातर इंडियंस फैटी लिवर डिजीज से जूझ रहे हैं, भले ही वो शराब ना पीते हों। वीडियो में लिवर को डिटॉक्सिफाई करने के तरीके और लाइफस्टाइल में बदलाव लाने के बारे में बताया गया है जिससे लिवर को हेल्दी रखा जा सके।

  • इंडिया में हर तीसरा इंसान फैटी लिवर से परेशान है, बच्चों में भी ये प्रॉब्लम बढ़ रही है।
  • लिवर हमारे बॉडी में 500 से ज़्यादा ज़रूरी काम करता है, इसलिए इसका ख्याल रखना बहुत ज़रूरी है।
  • पोल्यूशन और मिलावटी खाना लिवर को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं।
  • ऑटोफेजी एक प्रोसेस है जिससे बॉडी खुद को डिटॉक्सिफाई करती है, और इसे फास्टिंग और एक्सरसाइज से एक्टिवेट किया जा सकता है।

लिवर की हालत: एक चौंकाने वाली सच्चाई

आजकल लोगों में ये गलतफ़हमी है कि अगर वो शराब नहीं पीते तो उनका लिवर सेफ है। लेकिन, इंडिया में लिवर की बीमारियाँ बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। हर तीन में से एक इंडियन फैटी लिवर डिजीज से परेशान है, और बच्चों में भी ये प्रॉब्लम आम हो गई है। AIIMS की एक रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 40% इंडियंस का लिवर खराब है, जिसमें वो लोग भी शामिल हैं जिन्होंने कभी शराब नहीं पी। 1990 से 2017 तक के हेल्थ रिकॉर्ड्स बताते हैं कि लिवर की बीमारियों में सिर्फ 2% केसेस ही अल्कोहल की वजह से थे। लिवर हमारे बॉडी का एक बहुत ज़रूरी ऑर्गन है जो 500 से ज़्यादा फंक्शन्स को हैंडल करता है, और ये दिमाग के बाद सबसे ज़्यादा कैलोरीज़ इस्तेमाल करता है।

लिवर का डेली रूटीन: कैसे होता है काम

लिवर हर मिनट 1 लीटर से ज़्यादा ब्लड को फिल्टर करता है। इसे दो जगहों से ब्लड सप्लाई मिलती है: 75% ब्लड पेट और आंतों से आता है, जो खाने से अब्सॉर्ब हुए न्यूट्रिशन को लिवर तक पहुंचाता है, और 25% ब्लड सीधे हार्ट से आता है। आप जो भी खाते-पीते और सांस लेते हैं, वो सब आपके लिवर से होकर गुजरता है। लिवर ब्लड से टॉक्सिन्स और वेस्ट को फिल्टर करता है, और न्यूट्रिएंट्स को एनर्जी में कन्वर्ट करता है। इसके बाद, ब्लड हार्ट में वापस चला जाता है ताकि वो बॉडी के बाकी हिस्सों तक पहुंच सके।

लिवर को नुकसान पहुंचाने वाले दो बड़े कारण

लिवर को नुकसान पहुंचाने के दो मेन कारण हैं: पोल्यूशन और खराब लाइफस्टाइल। इंडिया में हवा में पोल्यूशन बहुत ज़्यादा है, और कई शहरों में तो WHO की सेफ्टी लिमिट से भी सात गुना ज़्यादा हार्मफुल पार्टिकल्स पाए जाते हैं। पोल्यूटेड हवा में मौजूद केमिकल्स और टॉक्सिन्स लिवर को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके अलावा, खानों में भी पेस्टिसाइड्स और मिलावट की वजह से लिवर पर बुरा असर पड़ता है। 40 से 50% फ्रूट्स और वेजिटेबल्स में FSSAI लिमिट से ज़्यादा पेस्टिसाइड्स पाए जाते हैं। पानी में भी फर्टिलाइजर्स और पेस्टिसाइड्स के केमिकल्स मिल रहे हैं, जिससे लिवर पर एक्स्ट्रा लोड आ रहा है।

लाइफस्टाइल डिजीज: फैटी लिवर

आजकल फैटी लिवर एक बड़ी लाइफस्टाइल बीमारी बन चुकी है। हैदराबाद जैसे शहरों में 80% IT प्रोफेशनल्स को ये बीमारी हो रही है। स्टेज वन फैटी लिवर में लिवर पर फैट की लेयर जमने लगती है। हमारे बॉडी में एनर्जी स्टोर करने के लिए तीन फ्यूल टैंक्स होते हैं: लिवर, मसल्स और फैट सेल्स। जब हम खाना खाते हैं, तो शुगर्स और फैट्स ब्लड में मिक्स होकर सबसे पहले लिवर में जाते हैं। इंसुलिन हॉर्मोन शुगर और फैट्स को सही जगह पर डायरेक्ट करता है। लेकिन, अगर इंसुलिन सही से काम नहीं कर रहा है, तो फैट लिवर और पेट के आस-पास जमा हो जाता है, जिससे फैटी लिवर डिजीज हो जाती है।

इंसुलिन रेजिस्टेंस और लिवर पर असर

आजकल की लाइफस्टाइल में लोग ज़्यादा देर तक बैठे रहते हैं और हाई कार्बोहाइड्रेट और सैचुरेटेड फैट्स वाले फूड्स खाते रहते हैं, जिससे इंसुलिन रेजिस्टेंस हो जाता है। इंसुलिन रेजिस्टेंस की वजह से मसल्स और फैट सेल्स एनर्जी लेना बंद कर देते हैं, और एक्स्ट्रा शुगर और फैट लिवर में जमा होने लगता है। इससे लिवर पर स्ट्रेस बढ़ जाता है, और लिवर सेल्स डैमेज होने लगते हैं। जब लिवर में स्ट्रेस होता है, तो वो अपना काम ठीक से नहीं कर पाता, जिससे बॉडी में कई तरह की प्रॉब्लम्स होने लगती हैं।

खराब लिवर के नुकसान: स्किन, हार्ट और थायरॉइड

स्ट्रेस्ड लिवर की वजह से स्किन डल हो जाती है, डार्क सर्कल्स आ जाते हैं, और बाल जल्दी सफ़ेद होने लगते हैं। लिवर डिटॉक्सिफिकेशन का काम करता है, लेकिन स्ट्रेस में होने पर वो टॉक्सिन्स को ठीक से ब्रेकडाउन नहीं कर पाता, जिससे बॉडी में और ज़्यादा टॉक्सिक चीजें बनने लगती हैं। लिवर ग्लटाथायोन नाम का एंटीऑक्सीडेंट भी प्रोड्यूस करता है, जो पोल्यूशन को ब्रेकडाउन करता है, लेकिन अगर लिवर खराब है तो ये एंटीऑक्सीडेंट कम बनता है। इसके अलावा, खराब लिवर कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाकर हार्ट की बीमारियों का रिस्क बढ़ा देता है, और बाइल के प्रोडक्शन को भी अफेक्ट करता है, जिससे फैट्स डाइजेस्ट नहीं होते और ब्लड में इंप्योरिटीज घूमने लगती हैं। वीक लिवर हाइपरटेंशन और एंडोथलियल डैमेज से भी जुड़ा हुआ है, और थायरॉइड हॉर्मोन के एक्टिवेशन को भी अफेक्ट कर सकता है।

लिवर हेल्थ को कैसे चेक करें: टेस्ट्स

लिवर की हेल्थ को चेक करने के लिए सबसे बेसिक टेस्ट है लिवर का ब्लड टेस्ट, जो लगभग 70% एक्यूरेसी से बता सकता है कि लिवर नॉर्मल है कि नहीं। इस टेस्ट में ALT, AST जैसे मार्कर्स देखे जाते हैं। फैटी लिवर और उसके स्टेजेस के बारे में ज़्यादा एक्यूरेटली जानने के लिए अल्ट्रासाउंड टेस्ट करवाने होते हैं, जिसमें फाइब्रोस्कैन सबसे ज़्यादा एक्यूरेट है। ये टेस्ट फैटी लिवर का स्टेज बता सकता है और ये भी बता सकता है कि लिवर में स्कार टिश्यूज़ तो नहीं बन रहे हैं।

लिवर को डिटॉक्सिफाई करने के तरीके: ऑटोफेजी

लिवर प्रोटेक्शन को प्रायोरिटी बनाना बहुत ज़रूरी है, और ये इतना मुश्किल भी नहीं है। लिवर में खुद को रीजेनरेट करने की पावर होती है। ऑटोफेजी एक ऐसा प्रोसेस है जिससे बॉडी खुद को डिटॉक्सिफाई करती है। इसमें सेल्स अपने अंदर के टॉक्सिन्स, वेस्ट्स और फैट्स को जला देते हैं या रिसाइकल कर देते हैं। ऑटोफेजी को एक्टिवेट करने के लिए बॉडी को कंट्रोल्ड स्ट्रेस देना होता है, जिसके लिए फास्टिंग और एक्सरसाइज सबसे पावरफुल तरीके हैं।

लिवर को हेल्दी रखने के लिए डाइट और एक्सरसाइज

लिवर को हेल्दी रखने के लिए 15 से 18 घंटे की फास्टिंग करना बहुत फायदेमंद है। फास्टिंग में लिवर फैट सोर्सेस को एनर्जी के तौर पर यूज करना स्टार्ट कर देता है, जिससे डिटॉक्सिफिकेशन का प्रोसेस शुरू हो जाता है। रेगुलर एक्सरसाइज भी ऑटोफेजी को एक्टिवेट करती है। कार्डियो और मसल बिल्डिंग एक्सरसाइजेस दोनों ही लिवर के लिए अच्छे हैं। डाइट में कार्बोहाइड्रेट्स को लिमिट करना और शुगर्स को कम करना ज़रूरी है। कीटोजेनिक डाइट भी कुछ समय के लिए फॉलो की जा सकती है, लेकिन मेडिटरेनियन डाइट सबसे आइडियल है। डिनर को जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी करना चाहिए, ताकि सुबह तक 15 घंटे की फास्टिंग हो जाए।

लिवर के लिए स्पेशल न्यूट्रिएंट्स और सप्लीमेंट्स

कुछ स्पेशल न्यूट्रिएंट्स लिवर को प्रोटेक्ट और डिटॉक्सिफाई करने में बहुत पावरफुल हैं। NAC (N-एसिटाइल सिस्टीन) और टुटका प्लस मिल्क थिसल के सप्लीमेंट्स लिवर को 60 से 80% प्रोटेक्शन दे सकते हैं। NAC ग्लूटाथायोन का प्रीकर्सर है और एक सुपर एंटीऑक्सीडेंट है, जो लिवर और किडनीज को प्रोटेक्ट करता है। टुटका एक बाइल एसिड है जो लिवर का लोड कम करता है। करक्यूमिन और ग्रीन टी में मौजूद EGCG भी पावरफुल प्रोटेक्टेंट हैं। बरबरीन भी इंसुलिन सेंसिटिविटी को बढ़ाता है और ऑटोफेजी को ट्रिगर करता है। अगर बजट कम है तो HAL का Liv 52 भी एक अच्छा ऑप्शन है।

पोल्यूशन से बचाव और फाइनल टिप्स

अगर आप पोल्यूटेड सिटी में रहते हैं तो एयर प्यूरीफायर में इन्वेस्ट करना चाहिए। डाइट और लाइफस्टाइल के बारे में डिटेल में जानने के लिए आप वीडियो में दिए गए लिंक्स पर क्लिक करके और जानकारी ले सकते हैं। प्रोसेस्ड फूड्स से बचना चाहिए क्योंकि उनमें खतरनाक इंग्रेडिएंट्स होते हैं जो लिवर को डैमेज करते हैं।

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0:00 ये तीन लिवर्स यानी कलेजी आप स्क्रीन पर देख सकते हो। इसमें से एक है हेल्दी इंसान का लिवर, दूसरा है एक शराबी इंसान का लिवर, और यह आखिरी वाला जो सबसे ज्यादा डैमेज्ड है, यह है एक नॉर्मल नॉन अल्कोहोलिक इंसान का लिवर। वेल एक बहुत बड़ा मिथ फैला हुआ है। लोगों को ऐसा लगता है कि जस्ट बिकॉज़ वो शराब ही नहीं है। या एकदम ना के बराबर ही ड्रिंक करते हैं तो उनका लिवर सेफ है। बट सच्चाई इससे कोसों दूर है। न्यू रिसर्च रिवील्स एन अलार्मिंग फाइंडिंग इन इंडिया। लिवर डिसऑर्डर्स आर रीचिंग एपिडेमिक प्रपोशनस इन द कंट्री। वन इन एव्री थर्ड इंडियन इज सफरिंग फ्रॉम फैटी लिवर डिजीज। इट कुड बी एनी ऑफ़ अस। 35% ऑफ आवर चिल्ड्रन ओर वन आउट ऑफ थ्री चिल्ड्रन इन इंडिया आर अफ्रिक्लेक्टेड विथ सम फॉर्म ऑफ लिवर डिजीज।

0:46 इंडिया की टॉप मेडिकल बॉडी एम्स के एक रिपोर्ट में यह सामने आया कि आज इंडिया में लगभग 40% लोगों का लिवर ऐसा दिखता है इंक्लूडिंग उनका जिन्होंने शराब को तक हाथ नहीं लगाया है। इसे कहते हैं स्टिएटिस। जस्ट इमेजिन हर 10 में से चार लोगों के लिवर का यह हाल हो गया है। इसे जल्दी रोका नहीं गया तो यह लिवर ऐसे से ऐसा बन जाएगा जो है स्टेज फोर सिरहोसिस। देखो 1990 से 2017 तक 195 कंट्रीज के हेल्थ रिकॉर्ड्स पर एक रिपोर्ट बनाया गया जिसमें यह पता चला कि सारी लिवर की बीमारियों के केसेस में अल्कोहल तो सिर्फ 2% केसेस के लिए ही जिम्मेदार था। लिवर एक इतना इग्नर्ड ऑर्गन है कि कईयों को तो यह सुनकर भी शौक लगेगा कि यह अकेला ऑर्गन हमारे शरीर में 500 से

1:32 भी ज्यादा वाइटल यानी इंपॉर्टेंट फंक्शंस को हैंडल करता है। यह हमारे दिमाग के बाद दूसरे नंबर पर आता है और आइडल स्टेट में पोटेंशियली दिमाग से भी ज्यादा कैलोरीज कंज्यूम कर लेता है। लिवर हमारे शरीर का वो चौकीदार है। वो साइलेंट रक्षक है जो हर दिन 24 घंटे बिना कोई रेस्ट के 1000 प्लस लीटर्स ब्लड को फिल्टर करता है और वो भी बिना आपको महसूस तक हुए और इसीलिए इसकी सेहत अक्सर नजरअंदाज हो जाती है जब तक कोई सीरियस प्रॉब्लम ना हो जाए या एक साथ 100 बीमारियों का बॉम्ब ना फूटे। पता है अगर आपके चेहरे की चमक चली गई है या आपकी स्किन हेल्दी नहीं है। आपको कास्टेंट लेजीनेस या थकावट फील होती है। आपके बाल समय से पहले सफेद हो रहे हैं। हेड पेन, बॉडी पेन, ब्लोटिंग से लेकर डायबिटीज, कोलेस्ट्रॉल, वेट गेन, क्रॉनिक

2:18 इनफ्लेमेशन और हाइपरटेंशन इन्हें हम डायग्नोस तो इजीली कर लेते हैं। लेकिन कभी इनके रूट कॉज को क्वेश्चन नहीं करते जो कि एक स्ट्रांग चांस है। आपके लिवर से जुड़ा हो सकता है। क्योंकि पूरी दुनिया में लिवर की बीमारियों की वजह से जितनी भी मौतें हो रही है उन सब में सिर्फ इंडिया अकेला ऑलमोस्ट 20% कंट्रीब्यूट करता है। और इंडिया की मेडिकल इंडस्ट्री का हाल तो आपको पता ही है। प्रिवेंशन नहीं बस क्योर पर फोकस किया जाता है। क्योंकि हेल्दी लोगों से आखिर पैसे थोड़ी ना बनते हैं। सो फर्स्ट ऑफ ऑल आवर हेल्थ केयर सिस्टम इजंट हेल्थ केयर। इट्स सिक केयर। आई थिंक डॉक्टर्स ऑलवेज यूज्ड टू बी लुक्ड अप टू वंस अपॉन अ टाइम। ऑल दे केयर अबाउट इज नंबर ऑफ़ बेड्स। एवरेज रेवेन्यू पर बेड, ऑक्यूुपेंसी। सब स्टैंडर्ड हॉस्पिटल का हुआ है। वहां पे भावना यह होती है कि भाई कैसे भी करके मरीज पकड़ो ऑपरेशन कर दो। और इसीलिए हमें खुद ही अपनी हेल्थ को

3:04 प्रायोरिटी बनाकर सही नॉलेज लेना होगा जो कि मैं पूरी कोशिश करूंगा इस वीडियो में आपको देने की सारे रिसर्च लिंक्स के साथ जो डिस्क्रिप्शन में मिल जाएंगे। अपने लिवर को डिटॉक्सिफाई करने से लिटरली आपकी लाइफ चेंज हो सकती है कॉस्मेटिकली और फंक्शनली दोनों तरह से। सो चलिए समझते हैं कैसे। यह है हमारे लिवर की जिंदगी का एक नॉर्मल सा दिन। किसी भी समय, किसी भी पल इस पर नजरें डालो तो यह एक चीज में नॉन-स्टॉप लगा रहता है। ब्लड फिल्ट्रेशन, ऑन एन एवरेज हर मिनट 1 लीटर से भी ज्यादा ब्लड। लिवर काफी यूनिक है क्योंकि अनलाइक अदर ऑर्गन्स इसे दो जगहों से ब्लड सप्लाई मिलता है। 75% ब्लड पोर्टल ग्रेन के जरिए जो यह देखिए हमारे पेट, पैंक्रियाज और इंटेस्टाइन यानी कि आंतों से आता है और जो खाने में मिले अब्सॉर्ब्ड न्यूट्रिशन लिवर

3:51 में ट्रांसपोर्ट करता है। सो यहां पर पॉइंट टू नोट यह है कि आप जो कुछ भी खाते हो, जो कुछ भी पीते हो वो आपके लिवर से होकर ही निकलता है। अब बाकी का 25% ब्लड लिवर को डायरेक्टली हार्ट से मिलता है। यह देखिए हेपेटिक आर्टरी के जरिए। इसे आप लिवर का पावर केबल भी समझ सकते हो क्योंकि इसी के जरिए इसे हार्ट से ऑक्सीजन वाला ब्लड मिलता है। अब यहां पर पॉइंट टू नोट यह है कि आप जो भी हवा सांसों के जरिए अंदर लेते हो उस हवा में जो भी केमिकल्स ऑक्सीजन के साथ लंग से होकर हार्ट के इसी हेपेटिक आर्टरी के जरिए लिवर में एंटर करते हैं। यानी कि कोई भी चीज आपके बॉडी में कहीं से भी घुसे उसे लिवर से होकर ही गुजरना पड़ता है। और फिर फाइनली ये दोनों लिवर के पाइप्स पोर्टल वेन और हेपेटिक आर्टरी से आता ब्लड मिक्स होकर कुछ पतले

4:38 से ब्लड वेसल्स साइनसोइड्स के जरिए लिवर के अंदर चले जाते हैं। लिवर के अंदर फिर लिवर के सेल्स, हेपेटोसाइट्स इसी ब्लड से टॉक्सिंस और वेस्ट को फिल्टर आउट करते हैं। न्यूट्रिएंट्स को एनर्जी में कन्वर्ट करते हैं। जिसके बाद ब्लड इस इनफीरियर वीना कावा के थ्रू हार्ट के पास दोबारा चला जाता है। ताकि हार्ट फिर उस फिल्टर्ड न्यूट्रिशियस ब्लड को सभी बॉडी पार्ट्स तक पंप कर सके। सिंपल, राइट? सो, फिर आखिर इतने सारे इंडियंस का लिवर एग्जैक्टली कैसे और कौन से स्टेप पर डैमेज हो रहा है, यह पहले समझना बहुत जरूरी है। क्योंकि इस बात की नॉलेज से ही हम अपने लिवर को प्रोटेक्ट और डिटॉक्सिफाई कर पाएंगे। वेल, ऑलमोस्ट सारे के सारे केसेस में लिवर को डैमेज करने के पीछे यह दो मेन किलर्स हैं। लेट्स स्टार्ट विद लिवर किलर नंबर वन।

5:25 सिपाही हो जा रहा है शहीद। देखो हमने ऑलरेडी देख लिया कि कैसे हर किसी चीज को हमारे लिवर से होकर ही गुजरना पड़ता है। अब जरा आज के इंडिया के कंडीशन और हमारे लाइफस्टाइल पर नजर डालते हैं। 2023 के ग्रीन पीस इंडिया रिपोर्ट ने इंडिया की हवा में पोल्यूशन एस्पेशली पीएम 2.5 हार्मफुल पार्टिकल्स की मात्रा को WHO सेफ्टी लिमिट से सात गुना ज्यादा बताया। 2024 के इंटरनेशनल एयर क्वालिटी रिपोर्ट में तो दुनिया के मोस्ट पोल्यूटेड शहरों की लिस्ट में टॉप 12 सिटीज एक के बाद एक इंडिया के थे। अब यह एक बड़ी गलतफहमी है कि एयर पोल्यूशन तो सिर्फ हमारे फेफड़ों को ही डैमेज करता है। मगर पोल्यूटेड हवा के जरिए कई सारे केमिकल्स और टॉक्सिंस जैसे ये सारे वीओसीस यानी वोलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स जो ये सारे केमिकल्स

6:12 हैं। फिर एरोमेटिक हाइड्रोकार्बंस जो ये टॉक्सिंस हैं। और ये सारे हैवी मेटल्स तक हमारे शरीर में घुस जाते हैं। याद है? जैसे हमने जाना था हेपेटिक आर्टरी के जरिए। जिन सबको प्यूरिफाई करने का लोड लिवर पर ही आता है। यह रिस्क कहीं ज्यादा बढ़ जाता है अगर आप किसी हाईवे रोड या इंडस्ट्रियल एरिया के करीब रह रहे हो तो या फिर कोई ऐसा काम करते हो जिसमें केमिकल एक्सपोज़र है जैसे पेंटिंग, फर्निशिंग, पॉलिशिंग एटसेट्रा। मगर सिर्फ हवा ही खराब नहीं है। इंडिया में कई सारे रिपोर्ट्स तो यह हाईलाइट करते हैं कि हमारे खानों में भी एफएसएसएआई लिमिट से कई ज्यादा मात्रा में पेस्टिसाइड्स मिल रहे हैं। 40 से 50% फ्रूट्स एंड वेजिटेबल्स में। जस्ट फॉर कॉन्टेक्स्ट बता दूं। एफएसएसएआई के 79 लैब्स में से सिर्फ नौ ही

6:58 नेशनल बोर्ड द्वारा अप्रूव्ड है। और कोई भी इन खानों में से सल्मोनेला, ई कोलाई वगैरह को डिटेक्ट ही नहीं कर सकता। ज़ीरो लैब्स। प्लस फ़ूड सेफ्टी इंस्पेक्टर्स का रेश्यो कितना है पता है? 2.5 लाख पर इंस्पेक्टर। यानी कि एक नाशिक जैसे मीडियम साइज सिटी के लिए सिर्फ एक इंस्पेक्टर जबकि रेश्यो वन इंस्पेक्टर पर रफली 10,000 होना चाहिए। और प्लस एफएसएसआई के टॉप हेड्स के करप्शन केसेस ले लो। इसी वजह से कानून का बड़े पैमाने पर खुलेआम वायलेशन हो रहा है। वो भी रेगुलरली। सेफ्टी लिमिट्स पेस्टिसाइड्स और टॉक्सिंस के बन तो जाते हैं लेकिन इन्हें एनफोर्स कोई नहीं करता। और क्या आपको लगता है एक आम किसान को या सब्जी वाले को कस्टमर की लॉन्ग टर्म हेल्थ दिखेगी या मुनाफा दिखेगा और इसीलिए तो 20 से 25% खानों में खुलेआम

7:45 मिलावट हो रही है। दालों में टॉक्सिक डाइस जैसे मैटेनिल येलो, सुडान, रेड एटसेट्रा जाता है। दूध और पनीर तो लिटरली सिंथेटिक बनाया जा रहा है फॉर्मेलिन जैसे केमिकल्स यूज़ करके। और मार्केट में इतनी मिलावट है कि इस पर तो पूरा का पूरा एक डिटेल वीडियो बन सकता है। अच्छा इतने जो पेस्टिसाइड्स और केमिकल्स फसलों में यूज हो रहे हैं ये सब एट द एंड हमारे लिवर के अलावा और कहां अब्सॉर्ब हो रहे हैं? वेल जमीन पर। और ये है दूसरी बड़ी प्रॉब्लम। क्योंकि आज भी 85% रूरल इंडिया ग्राउंड वाटर पर ही डिपेंडेंट है अपनी जरूरतों के लिए। और इसीलिए खेतों में जो भी भारी फर्टिलाइज़र्स और पेस्टिसाइड्स यूज हो रहे हैं, उन सभी केमिकल्स के अंश हमारे पानी में भी दिख रहे हैं। इंडिया के 56% डिस्ट्रिक्ट्स के पानियों में नाइट्राइट्स के लेवल्स को

8:31 सेफ्टी लिमिट से कहीं ज्यादा पाया गया है जो कि पेस्टिसाइड्स का एक रेसिड्यू है। 27 स्टेट्स के 469 डिस्ट्रिक्ट्स में फ्लोराइड कंटैमिनेशन पाया गया है। इसे द फर्टिलाइजर फैलेसी कहा जाता है। और ये सारे पेस्टिसाइड्स और केमिकल्स का लोड हमारे लिवर पर ही आ रहा है। अब यह सारा जहर तो हमारे शरीर में ना चाहते हुए जा ही रहा है। बट इससे भी एक और एक ज्यादा जहरीला जहर है जो हम अपने अंदर तो शौक से डाल रहे हैं। जो ही है हमारे लिवर का दूसरा किलर। हमने एम्स की रिपोर्ट देखी थी ना कि 40% लोगों का लिवर आज ऐसा हो गया है और अगर रोका नहीं जाए तो जल्दी ऐसा हो जाएगा। इसे कहते हैं स्टिएटिस या फिर स्टेज वन फैटी लिवर और यह एक बड़ी लाइफस्टाइल बीमारी बन चुकी है। आई मीन जरा यह रिपोर्ट देखना। हैदराबाद जैसे सिटी में

9:17 80% आईटी प्रोफेशनल्स को यह लाइफस्टाइल बीमारी हो रही है। जिसमें से मेजरिटी को कोई आईडिया ही नहीं है कि ऐसा क्यों और कैसे हो रहा है। दूसरी बात आप कितने इंडियंस में ये पॉट बेलीज देखते होंगे ना यह एक बड़ा नेशनल एपिडेमिक बन चुका है कि पतले-पतले इंडियंस को तक यह पॉट बेलीज हो रहे हैं। इसका भी एक साइलेंट कॉज हमारे लिवर का किलर नंबर टू ही है। स्टेज वन फैटी लिवर में यहां देखना कैसे लिवर पर एक फैट की लेयर जमने लगती है। बट जरूरी नहीं कि यह सिर्फ मोटे इंसान को ही हो। यह पतले लोगों को भी हो सकता है। बिल्कुल जैसे पतले लोगों को हाई कोलेस्ट्रॉल हो सकता है। बट यह चर्बी की लेयर प्रोग्रेस होने पर आखिर छालों में कैसे बदल जाती है? चर्बी को छालों में बदलते हुए कभी आपने देखा है? यह कैसे होता है और क्यों इसे लाइफस्टाइल बीमारी कहा जा रहा है? तो चलो

10:03 इसे एकदम रूट पर जाकर समझते हैं। तो एकदम बेस से स्टार्ट करते हैं। देखो हमारे शरीर में ना एनर्जी यानी ऊर्जा सिर्फ तीन ही जगहों पर स्टोर हो सकती है। यानी कि हमारे शरीर में सिर्फ तीन ही फ्यूल टैंक्स होते हैं। नंबर वन लिवर। नंबर टू मसल्स और नंबर थ्री बॉडी के फैट सेल्स यानी एडिपोस टिश्यूज़। अब देखो जैसे ही आप खाना खाते हो वो आपकी आंतों में डाइजेस्ट होता है और उसमें से शुगर्स और फैट्स ब्लड में मिक्स होकर सबसे पहले लिवर में जाते हैं। राइट? अब ब्लड में शुगर की मात्रा को भांप कर आपका पनक्रियाज एक्टिवेट हो जाता है और वो इंसुलिन हॉर्मोन रिलीज करता है। यह इंसुलिन एक मास्टर हॉर्मोन है और हमारे आज के वीडियो का एक हीरो भी जिसका मेन काम है शुगर और फैट्स को सही जगह पर डायरेक्ट करना, सही फ्यूल टैंक्स की ओर डायरेक्ट

10:50 करना। क्योंकि अगर शुगर और चर्बी गलत जगह पर डायवर्ट हो जाए तो यह जहर बन जाते हैं। अब इंसुलिन अगर सही से काम कर रहा है तो वो खाने में शुगर्स और फैट्स को सबसे पहले आपके लिवर में स्टोर करवाएगा जब तक लिवर टनाटन भर ना जाए और फिर जाकर एक्स्ट्रा एनर्जी को आपके मसल्स और फैट सेल्स में भरेगा। बट अगर इंसुलिन फंक्शनिंग में ग्लिच आ जाए तो यह सारा का सारा फैट आपके मसल्स और फैट सेल्स से चूसकर आपके लिवर और पेट के आगे वाले हिस्से में जिसे विसरल फैट कहते हैं वहां पर लेकर जाकर जमा कर देगा और आपको पॉट बेली और फैटी लिवर डिजीज हो जाएगी। अब जरा आज के मॉडर्न लाइफ स्टाइल पर नजर डालते हैं। हैदराबाद के ही उस रिसर्च ने बताया था कि नंबर वन आईटी एंप्लाइजस की लाइफ बहुत ही सीडेंट्री होती है। यानी वो रोजाना 10 से 12 घंटे बैठकर

11:37 काम करते हैं। और नंबर टू वो थ्रूउ द डे कुछ ना कुछ मंच करते रहते हैं। जैसे हाई कार्बोहाइड्रेट और सैचुरेटेड फैट्स वाले फूड्स जैसे चिप्स, फ्राइड फूड्स और शुगरी ड्रिंक्स जैसे कोक एनर्जी ड्रिंक्स एटसेट्रा। अब इन गलत फूड्स के रेगुलर स्नैकिंग से कांस्टेंट और शार्प इंसुलिन स्पाइक्स होते हैं जो हमारे बॉडी में मसल और फैट सेल्स में इंसुलिन को लेकर रेजिस्टेंस लाते हैं। यानी कि इंसुलिन का अब मसल सेल्स और फैट सेल्स के एनर्जी स्टोरेज पर असर खत्म होने लगता है। इससे दो डिजास्टस चीजें होती है। पहला अब हमारे ये दो फ्यूल टैंक्स मसल और फैट सेल्स फ्यूल यानी कि एनर्जी लेना ही बंद कर देते हैं। और दूसरा इनके अंदर जो भी फ्यूल ऑलरेडी है फैट्स और शुगर के रूप में वो भी लीक होने लगता है और फिर यह सारा

12:23 एक्स्ट्रा शुगर और फैट आपके लिवर में स्टोर होने लग जाता है ट्राइग्लिसराइड्स के रूप में। क्योंकि यह फ्रीली आपके बॉडी में फैटी एसिड्स और शुगर्स के रूप में फ्लो हो रहा होता है और इसे अल्टीमेटली लिवर को प्रोसेस करना ही पड़ता है। इस प्रोसेस को जहां पर आपका लिवर एक्स्ट्रा शुगर्स और फैटी एसिड से ट्राइग्लिसराइड मॉलिक्यूल्स को प्रोड्यूस कर रहा है को नोवो लाइपोजेनेसिस कहते हैं। जो अगर प्रोग्रेसिवली होते चला गया जो कि ये होते ही चला जाता है क्योंकि ये एक लाइफस्टाइल बीमारी है और लाइफस्टाइल तो हम चेंज करते नहीं है तो यह टाइप वन फैटी लिवर कॉज करता है। अब इस कंडीशन में ना लिवर पर एक्स्ट्रा स्ट्रेस आना शुरू हो जाता है क्योंकि वो एक रात भर ओवरटाइम काम करते फैक्ट्री की तरह हो जाता है जो अपने 500 अलग-अलग फंक्शनंस को मैनेज करने के साथ अब ये एक्स्ट्रा शुगर और फैट्स को भी ठिकाने

13:10 लगा रहा है। इससे लिवर ओवरवर्क हो जाता है जिससे लिवर सेल्स का माइटोककांड्रिया डैमेज होना शुरू हो जाता है और बहुत ज्यादा आरओएस क्रिएट होता है। रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज जो कि क्रॉनिक इनफ्लेमेशन को ट्रिगर करना स्टार्ट करता है। अब इनफ्लेमेशन में जैसे आपको पता है शरीर के सोल्जर सेल्स हाइपर एक्टिव होकर हमारे ही हेल्दी सेल्स को मारने लगते हैं। जो फिर लिवर के सेल्स में स्कारिंग कॉज करता है। फाइब्रोसिस कॉज करता है। और अंत में अगर इस चीज को तुरंत स्टॉप नहीं किया जाए तो लिवर का हाल कुछ ऐसा हो जाता है। मगर पॉइंट टू नोट यहां पर यह है कि जब भी लिवर में स्ट्रेस होगा लिवर अपना खुद का काम भी ठीक से नहीं कर पाएगा। जैसे फिल्टरिंग, प्यूरिफाइंग, हॉर्मोन रेगुलेशन एटसेट्रा। और इसीलिए आपके बॉडी में अलग-अलग

13:55 कॉम्प्लिकेशंस होने लगते हैं जिनका लिवर से कोई डायरेक्ट कनेक्शन मे बी ना दिखाई दे बट रूट कॉज एक स्ट्रेस्ड ओवरवर्क्ड लिवर होगा। जैसे डैमेज नंबर वन एक स्ट्रेस्ड आउट लिवर आपको डल स्किन, बैड क्वालिटी स्किन, डार्क सर्कल्स, अर्ली रिंकल्स और वाइट हेयर दे सकता है। देखो लिवर का मेन काम है डिटॉक्सिफिकेशन। अब डिटॉक्सिफिकेशन का मतलब जो भी हार्मफुल टॉक्सिंस शरीर में एंटर कर लेते हैं जैसे मान लो हाई एक्यूआई के वजह से अंदर पोल्यूशन सूंघ लिया या फिर खाने में कोई मिलावटी केमिकल खा लिया तो लिवर उन टॉक्सिंस को अपने एंजाइम्स के जरिए ब्रेकडाउन करके बॉडी के बाहर एक्सक्रीट करवा देता है। सो फिल्ट्रेशन का मतलब मेटाबॉलिज्म ऑफ टॉक्सिंस। मगर अगर लिवर स्ट्रेस्ड आउट है तो यही टॉक्सिंस आधे-अधूरे ब्रेकडाउन होकर उल्टा और ज्यादा

14:41 टॉक्सिक बायप्रोडक्ट्स बन जाते हैं। इन्हें हम आरओएस यानी रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज कहते हैं। ये बेसिकली सुसाइड बमबर्स की तरह होते हैं जो आपके स्किन पे, आपके ब्लड में, आपके हेयर के मेलानोसाइट्स में जो कि बालों को काला रंग देते हैं। हर जगह पर जाकर चिपकने लगते हैं और उन पर ब्लास्ट हो जाते हैं और उनकी एजिंग को एक्सलरेट करते हैं। इसे ऐसे समझो कि अगर आपके गाड़ी का इंजन ही खराब है जैसे हमारे केस में लिवर तो अंदर पेट्रोल डालने पर काला धुआं ही बाहर निकलेगा जो पोल्यूशन और डैमेज कॉज करेगा। यही आरओएस हमारे शरीर के अंदर पोल्यूशन और डैमेज कॉज करता है। सेकंडली लिवर ग्लटाथायोन नाम का एक मास्टर एंटीऑक्सीडेंट भी प्रोड्यूस करता है जो इसी पोल्यूशन को यानी कि फ्री रेडिकल्स को एज अ सेकंड लेयर डिफेंस ब्रेकडाउन करता है। लेकिन अगर लिवर कॉम्प्रोमाइज्ड है तो

15:26 यही ग्लटाथायोन ना के बराबर ही प्रोड्यूस होगा और रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज को कोई नहीं रोक पाएगा। और इसीलिए आपने देखा होगा जो लोग अक्सर स्मोकिंग करते हैं या अल्कोहल पीते हैं या पोल्यूशन में घूमते हैं उनकी स्किन समय से पहले डल और बूढ़ी दिखने लगती है। डैमेज नंबर टू एक कॉम्प्रोमाइज्ड लिवर कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाकर दिल की बीमारियों का रिस्क सीधा डबल कर देता है। क्या आपको पता है लिवर इकलौता ऐसा ऑर्गन है जो हमारे शरीर का 80 से 90% कोलेस्ट्रॉल प्रोड्यूस करता है और बाकी का हमें फूड से मिलता है। अगर लिवर कॉम्प्रोमाइज की वजह से कोलेस्ट्रॉल के लेवल्स बढ़ गए तो यह हार्ट में जगह-जगह पर ब्लॉकेजेस कॉज करते हैं। डैमेज नंबर थ्री, लिवर बाइल नाम का एक येलो ग्रीन डाइजेस्टिव लिक्विड प्रोड्यूस करता है जो फैट्स को डाइजेस्ट करने में जरूरी है। बाइल ब्लड से एक्स्ट्रा कोलेस्ट्रॉल को भी साफ करता है और साथ ही टॉक्सिंस को भी

16:13 निकालकर ब्लड को प्यूरिफाई करता है। यही बाइल का प्रोडक्शन अगर अफेक्ट हुआ तो अगेन कोलेस्ट्रॉल बढ़ने लगेगा। फैट्स डाइजेस्ट नहीं होंगे और ब्लड में इंप्योरिटीज खुलेआम घूमेंगे और सेल्स और ऑर्गन्स को डिस्ट्रॉय करेंगे। बिलरुबिन एक टॉक्सिन है जो बॉडी में प्रोड्यूस होता है जब ओल्ड रेड ब्लड सेल्स मरते हैं। बाइल इसी बिलरुबिन के लेवल्स को भी मैनेज करता है। वरना अगर बिलरुबिन की मात्रा शरीर में बढ़ गई तो आइज, स्किन, यूरिन, डार्क येलो हो जाएगी। जिस कंडीशन को जॉइंडिस कहते हैं। डैमेज नंबर फोर वीक लिवर का सीधा लिंक है हाइपरटेंशन यानी कि हाई ब्लड प्रेशर और एंडोथलियल डैमेज से यानी कि ब्लड वेसल्स का अंदर से ही डैमेज होना और उनमें क्रैक्स आ जाना। यह बॉडी में क्रॉनिक इनफ्लेमेशंस कॉज करता है। डैमेज नंबर फाइव अगर आप बहुत ही जल्द थक जाते हो या वेट

17:00 तेजी से बढ़ जाता है या घट जाता है तो यह थायरॉइड की प्रॉब्लम की निशानी है जो कि लिवर से भी लिंक्ड हो सकता है। हमारा थायरॉइड ग्लैंड थायरॉइड हॉर्मोन जरूर प्रोड्यूस करता है। मगर यह 90% इनएक्टिव वर्जन टी4 यानी थायरोक्सिन होता है जो लिवर और किडनीज में मेजरली जाकर वहां पर एक्टिवेट होता है। यानी कि एक्टिव फॉर्म में कन्वर्ट होता है जो कि T3 है। ट्रायोडोथायरोनाइन। 2020 के एक रिसर्च ने बताया जैसे आप टेबल में भी देख सकते हो कि लिवर डिजीज पेशेंट्स में फ्री थायरॉइड हॉर्मोन की क्वांटिटी लो हो जाती है जिससे थायरॉइड रिलेटेड कॉम्प्लिकेशंस देखने मिलते हैं। ये सब तो सिर्फ कुछ ही कॉम्प्लिकेशंस है जो हमने डिस्कस किए। ऐसे अनगिनत कॉम्प्लिकेशंस हो सकते हैं जो कि लिवर के 500 प्लस फंक्शन से जुड़े हैं। मगर आपके दिमाग में अब डेफिनेटली ये सवाल

17:45 आ रहा होगा कि पता कैसे लगाया जा सकता है कि हमारे लिवर की हेल्थ कैसी है? क्या वो अच्छी है या फिर वो खराब हो रही है? कौन से टेस्ट्स हैं जो इफेक्टिवली हमारे लिवर की प्रॉपर हेल्थ को बता सकते हैं? तो देखो सबसे बेसिक टेस्ट होता है लिवर का ब्लड टेस्ट जो लगभग 70% एक्यूरेसी से बता सकता है कि लिवर नॉर्मल है कि नहीं। एक बेसिक सा ब्लड टेस्ट जिसमें लिवर के भी बायोमार्कर्स इंक्लूडेड है। जैसे एएलटी, एएसटी और यह सारे मार्कर्स जो लिवर पर स्ट्रेस दर्शाते हैं। मगर यह टेस्ट फैटी लिवर और फैटी लिवर के स्टेजेस के बारे में इतना एक्यूरेटली नहीं बताता। उसके लिए आपको अल्ट्रासाउंड टेस्ट करवाने होते हैं। जिसमें फाइब्रोस्कैन सबसे ज्यादा एक्यूरेट है 90 से 95% एक्यूरेसी के साथ। यह टेस्ट एग्जैक्टली फैटी लिवर का स्टेज बता सकता

18:31 है और यह भी बता सकता है कि लिवर में स्कार टिश्यूज़ या फिर फाइब्रोसिस तो होना स्टार्ट नहीं हो गए हैं। बेसिकली यह लिवर का पूरा स्ट्रक्चरल एनालिसिस कर सकता है। यह दोनों टेस्ट काफी होने चाहिए आपको अपने लिवर के बारे में एक डिटेल्ड आईडिया देने के लिए। और नॉर्मल से ब्लड टेस्ट में बिलरूबिन की भी मात्रा आपके ब्लड में पता चल जाती है जो कि एक्सीड नहीं होनी चाहिए। वो भी आपके लिवर के हेल्थ के बारे में बता सकता है। अब फ्रेंड्स जैसे कि आपने वीडियो में पहले देखा हम चारों ओर से टॉक्सिन से घिरे हुए हैं और इसी वजह से हमें लिवर प्रोटेक्शन को एक बड़ी प्रायोरिटी बनानी ही चाहिए जो कि एक्चुअली में इतना मुश्किल नहीं है। बस आपको कुछ प्रोएक्टिव बदलाव लाने होंगे। मैं आपको ऐसे पावरफुल और इफेक्टिव डिटॉक्सिफिकेशन टेक्निक्स बताऊंगा जो 1% रिसर्च बैक्ड है। यह इतने

19:17 पावरफुल है कि यह विद इन अ वीक आपके लिवर के लोड को 50% कम कर सकते हैं लिवर के सारे टॉक्सिंस को फ्लश आउट करके। इससे आप अपने एनर्जी लेवल्स में और अपने हेल्थ में लॉन्ग लास्टिंग बदलाव एक्सपीरियंस कर पाओगे। तो देखो लिवर की बेस्ट बात क्या है पता है? लिवर इकलौता ऐसा ऑर्गन है जिसे अगर 70% भी काट दिया जाए ना तो वह दोबारा से रीजेनरेट हो जाएगा। इतनी चमत्कारी इसकी हीलिंग पावर है और आपके शरीर में एग्जैक्टली एक और एक ऐसी ही चमत्कारी हीलिंग पावर है एक ऐसा बटन है जिसे अगर आपने दबा दिया तो बॉडी में डिटॉक्सिफिकेशन और हीलिंग चालू हो जाता है। इस बटन का नाम है ऑटोफिजी। सो हमारे हर एक सेल में ना एक छोटा सा हिस्सा होता है जो कि एक भट्टी की तरह होता है। एक फर्नेस की तरह जहां पर हमारे

20:04 सेल्स अपना सारा कचरा एक साथ जला देते हैं। इस पार्ट को कहते हैं लाइसोजोम्स। अब ऑटोफेजी शब्द में ऑटो का मतलब होता है खुद को और फेजी का मतलब है खाना यानी कि खुद को ही खाना। इसमें सेल्स अपने अंदर के टॉक्सिंस, वेस्ट्स और फैट्स को एक बड़े से पैकेट में भर के जिसे ऑटोफिजिसोम कहते हैं। को लाइसोजोम्स में जलाने के लिए भेज देते हैं। जहां पर उन्हें या तो डिस्ट्रॉय कर दिया जाता है या फिर रिसाइकल कर दिया जाता है। अब सैकड़ों रिसर्चेस के हिसाब से यही ऑटोफजी लिवर डिटॉक्सिफिकेशन का रामबाण इलाज है। जैसे यह देखना चाहे टॉक्सिंस का एलिमिनेशन हो, फैट का क्लीयरेंस हो या इवन फौल्टी माइटोकांड्रिया को एलिमिनेट करना हो, ऑटोफजी हर प्रकार का डिटॉक्सिफिकेशन

20:50 करता है। इंटरेस्टिंग राइट? सो ऑटोफेजी का बटन आखिर दबाया कैसे जाता है? वेल, इसका एक ही जवाब है, बॉडी को कंट्रोलोल्ड स्ट्रेस देना, स्ट्रेस का ट्रिगर देना। अब इसके कुछ लिमिटेड पावरफुल तरीके हैं, जिन्हें हम डिस्कस करेंगे। स्टार्टिंग वि वन ऑफ दी मोस्ट पावरफुल वन जो है फास्टिंग फॉर एटलीस्ट 15 टू 18 आवर्स। फास्टिंग में बेसिकली लिवर अपना सारा ग्लाइकोजन यूज कर लेता है और मजबूरन फैट सोर्सेस को एनर्जी के तौर पर यूज करना स्टार्ट कर देता है। लिवर सेल्स में एक स्ट्रेस रिलेटेड ऑटोफजी का पाथवे जो कि एएमपी के पाथवे है वो भी ट्रिगर हो जाता है जो डिटॉक्सिफिकेशन का प्रोसेस शुरू कर देता है। नंबर टू रेगुलर एक्सरसाइज का स्ट्रेस भी बहुत ही स्ट्रांगली लिंक्ड है एटोफजी के साथ।

21:36 अच्छा फास्टिंग और एटोफजी दोनों इंसुलिन सेंसिटिविटी को भी नॉर्मलाइज करते हैं। जिससे डिटॉक्स के साथ फैटी लिवर रिवर्स और साथ में वेट मैनेजमेंट भी होता है। क्योंकि ओबेसिटी काफी स्ट्रांगली लिंक्ड है फैटी लिवर डिजीजसेस के साथ। अब इंटरेस्टिंग चीज यह है कि कार्डियो एक्सरसाइजज़ तो अच्छे हैं ही बट मसल बिल्डिंग एक्सरसाइजेस भी एक्सट्रीमली पावरफुल है लिवर से स्ट्रेस निकालने के लिए। जितना ज्यादा आपका मसल मास होगा उतना अच्छा। क्योंकि याद है मसल्स खुद ग्लूकोस को स्टोर करते हैं और उन्हें फैट्स के रूप में लिवर में स्टोर करने से रोकते हैं। सो इसे अगर एक प्रैक्टिकल रूटीन बनाना हो तो बेसिक सा रूटीन कुछ ऐसा दिखेगा। अर्ली मॉर्निंग 8:00 am वन ऑवर कार्डियो प्लस वेट ट्रेनिंग एक्सरसाइज एटलीस्ट फोर टू फाइव डेज अ वीक। फिर आपने सुबह के 10:00 बजे ब्रेकफास्ट कर लिया जिसमें एक मीडियम

22:23 कार्ब हाई प्रोटीन डाइट प्रेफरेबल है। बेसिकली कार्बोहाइड्रेट्स को 150 से 200 ग्राम्स तक लिमिट करना है आपको थ्रूउ द डे और शुगर्स को स्पेशली सिर्फ 20 से 25 ग्राम तक। इसका ट्रैकिंग करना स्टार्ट कर दो और आप सरप्राइज हो जाओगे। हम इंडियंस अनजाने में खानों में कितना ज्यादा कार्बोहाइड्रेट्स खा लेते हैं। ट्रैकिंग इज द की क्योंकि हमारा बॉडी हाई कार्ब डाइट्स के लिए बना ही नहीं है। अब अगर लेट्स से आपको स्ट्रांग डिटॉक्स के साथ वेट लॉस भी करना है तो कुछ समय के लिए आप कीटोजेनिक डाइट को भी फॉलो कर सकते हो। सिर्फ टेंपरेरी लिया हम क्योंकि यह सस्टेनेबल नहीं है। मगर पे या मेडिटरेनियन डाइट फॉर्मेट वि लिमिटेड शुगर एंड कार्ब्स हमारा आइडियल डाइट है। इस पर मैंने एक डिटेल वीडियो ऑलरेडी बनाया है कि हम इंसानों को प्रकृति ने एक्चुअली में क्या

23:10 खाने के लिए बनाया है। वो सारे फूड्स आपके लिवर के लिए हेल्दी होंगे। उस वीडियो का लिंक यहां पर मिल जाएगा जो आप इस वीडियो के बाद देख सकते हो। अब थ्रूआउट द डे आप हेल्दी न्यूट्रिशियस अनप्रोस्ड वेरीेंट हां अनप्रोस्ड और मॉडरेट कैलोरी वाले फूड्स खाओगे। मगर डिनर को जितना जल्दी हो सके उतना आपको करना है। अगर 7:00 बजे लेट्स से आप डिनर कर लोगे तो सुबह के 10:00 बजे तक ऑटोमेटिकली आपका 15 घंटे का फास्टिंग हो जाएगा। यह वेट लॉस और डिटॉक्स दोनों के लिए सुपर पावरफुल होगा। अच्छा अब आप अपने डाइट में और अपने ईटिंग हैबिट्स में कुछ सिंपल से एडिशंस कर सकते हो। जैसे सबसे पहले तो आप अपने खाने का ग्लाइसेमिक इंडेक्स देखना स्टार्ट कर दो। यानी कि वो खाना कितना जल्दी ब्लड शुगर को स्पाइक कर देता है। तो जो कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं अपने कार्बोहाइड्रेट सोर्स के लिए इन्हीं

23:56 कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट्स को चुनो। और जब भी आप कभी हाई शुगर या हाई कार्बोहाइड्रेट मील खाते हो तो उसके साथ ऑलवेज ट्राई टू हैव सम फाइबर। जैसे कि सैलेड हो गया। क्योंकि यह आपके ब्लड शुगर को हमेशा स्टेबल रखेगा। स्पाइक्स क्रिएट नहीं करेगा व्हिच कॉसेस इंसुलिन सेंसिटिविटी। इसी के साथ हमें बेफिजूल के स्नैकिंग्स एस्पेशियली हाई शुगर कंटेंट वाले स्नैक्स को रोकना चाहिए और वेट मैनेजमेंट पर भी फोकस करना है। अब कुछ स्पेशल न्यूट्रिएंट्स है जो लिवर को प्रोटेक्ट और डिटॉक्सिफाई करने में एक्सट्रीमली पावरफुल है अकॉर्डिंग टू रिसर्चेस। यह लिवर की ढाल बनेंगे। दो मैं आपको रेकमेंड करूंगा। नंबर वन एनएसी एन एसिटाइल सिस्टीन। और नंबर टू टुटका प्लस मिल्क थिसल का कोई भी सप्लीमेंट। यह दोनों मिलाकर लिवर को 60 से 80% प्रोटेक्शन दे

24:42 सकते हैं। क्योंकि याद है लिवर का सबसे बड़ा दुश्मन आरओएस यानी रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज है जो कास्टेंटली पोल्यूशन और बैड डाइट लाइफस्टाइल से डैमेज कर रहा है। एनएसी ग्लूटाथायोन का एक प्रीकर्सर है और एक सुपर एंटीऑक्सीडेंट है जो इसी आरओएस से स्पेशली लिवर और किडनीज को प्रोटेक्ट करता है और तुडका यानी कि टोरसो डीऑक्सीकोलिक एसिड एक बाइल एसिड है जो अगेन लिवर का लोड कम करता है। ट्रांसडर्मल ग्लटाथायन भी इफेक्टिव हो सकता है बट वह थोड़ा एक्सपेंसिव होता है। करक्यूमिन जो हल्दी में होता है और ग्रीन टीम में ईजीसीजी यानी एपीगैलो कैटचिन गैलेट। यह कई रिसर्चेस के अनुसार यह भी एक्सट्रीमली पावरफुल प्रोटेक्टेंट है क्योंकि ये पावरफुल एंटीऑक्सीडेंट्स हैं। बट इन्हें सही मात्रा में लेना जरूरी है एटलीस्ट 500 टू 750 मिलीग्राम्स। और कर्क्यूमिन

25:28 स्पेसिफिकली ईजीली अब्सॉर्ब नहीं होता और इसीलिए ज्यादा हल्दी खाने से जरूरी नहीं है कि आपको करक्यूमिन मिले। इसे बायोपन के साथ यूजुअली लिया जाता है जो कि उसके अब्सॉर्प्शन को 10x बढ़ा देता है। यह सप्लीमेंट्स के फॉर्म में इजीली मिल जाता है। बरबरीन भी एक ऐसा ही पावरफुल सप्लीमेंट है जो इंसुलिन सेंसिटिविटी को भी बढ़ाता है और एएमपी के पाथवे के जरिए ऑटोफिजी को भी ट्रिगर करता है। यह सारे पावरफुल एंटी इनफ्लामेटरी एंटीऑक्सीडेंट्स हैं और यह आपके लिवर को तो स्ट्रांग प्रोटेक्शन देंगे ही बट साथ ही आपके ओवरऑल हेल्थ को भी एनहांस करेंगे। अगर आपका बजट कम है तो HAL का Liv 52 भी एक डिसेंट ऑप्शन है। मैं सारे सप्लीमेंट्स के लिंक्स आपको स्क्रीन पर दे दूंगा और नीचे डिस्क्रिप्शन में भी उनके आइडियल क्वांटिटी के साथ। मैं खुद ये सारे सप्लीमेंट्स लेता हूं और पर्सनली मुझे लिवर प्रोटेक्शन के साथ और भी कई

26:14 बेनिफिट्स मिले हैं। जैसे फॉर एग्जांपल इनफ्लेमेशन रिडक्शन, मेंटल क्लेरिटी हो गया या फिर हाई एनर्जी लेवल्स एटसेटरा। मगर इट ऑलवेज हैज़ टू बी अकंपनीड बाय लाइफस्टाइल, डाइट चेंज एंड आल्सो प्रॉपर रेस्ट। अच्छा अब फाइनली अगर आप किसी हाईवे के सामने रहते हो या फिर एक पोल्यूटेड सिटी में रहते हो तो आपको एक एयर प्यूरीिफायर में बिल्कुल इन्वेस्ट करना चाहिए क्योंकि एयर पोल्यूशन आपके बॉडी पर बहुत ज्यादा स्ट्रेस क्रिएट कर ही रहा है। या फिर आप अगर पोल्यूशन में बहुत ट्रैवल करते हो तो N95 मास्क आपको बहुत काम में आएंगे। मैंने भी पर्सनली बस दो-ती महीने पहले एक एयर प्यूरीिफायर परचेस किया और उससे ओवरऑल लाइक मतलब हवा ही एकदम लाइट फील होती है। सो इट्स डेफिनेटली वन ऑफ द बेस्ट इन्वेस्टमेंट दैट यू कैन मेक अप। अब डाइट लाइफस्टाइल वाइज हम इंसान एग्जैक्टली क्या खाने के लिए बने और कैसे जीने के लिए

26:59 बने? जब हम जंगलों में छोटे-छोटे कबीलों में रहा करते थे, उस समय हमारा डाइट क्या हुआ करता था, यह अगर आपको डिटेल में जानना है तो यहां पर इस वीडियो पर क्लिक करके आप वो देख सकते हो। इस वीडियो के बाद आपको कभी भी डाइट को लेकर कोई कंफ्यूजन नहीं होगा। क्योंकि डाइट को लेकर 100 एक्सपर्ट 100 राय देते हैं। मगर इतिहास और साइंस कभी भी झूठ नहीं बोलता। और अगर फाइनली आपको यह जानना है कि प्रोसेस्ड फूड्स में क्या-क्या खतरनाक इंग्रेडिएंट्स होते हैं जिससे आपको बच के रहना है जो आपके लिवर को डैमेज कर रहे हैं जो प्रोसेस्ड शुगर्स हैं या फिर प्रोसेस्ड इंग्रेडिएंट्स जिनके नामों को घुमा फिराकर न्यूट्रिशन लेवल में डाला जाता है। तो यहां पर आप क्लिक कर सकते हो। सो स्टे फिट एंड हेल्दी फ्रेंड्स। जय हिंद।

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