0:00 आप बहुत बड़े-बड़े खर्चे ऐसे कर रहे हो जिनसे आपका कोई लाभ नहीं है और आप बहुत सारी ऐसी जगहों पर बहुत कम खर्चा कर रहे हो जहां आपका बहुत लाभ है। सही खानपान उनमें से एक जगह है। हाल ही में सोशल मीडिया पे वायरल एक व्यक्ति वो फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन में कार्यरत है और उन्होंने अभी बहुत सारे रेस्टोरेंट्स और खाद्य पदार्थ वाली कंपनियों पे भी छापा मारा। भारत में प्रतिवर्ष 100 मिलियन लोग वो फूड बोर्न डिजीज से प्रभावित होते हैं। आप खाने जाते हो। आपको पता नहीं होता है आप क्या खा रहे हो। कोई सरकारी ऑफिसर आता बाकायदा इंस्पेक्शन करता और वह बंद कराता। इसमें सरकारी अफसर क्यों जरूरी होना चाहिए? आप तो खुद एकदम सड़ी गली जगहों पर जाकर के स्ट्रीट फूड के नाम पर कुछ भी खा रहे होते हो। आपको नहीं दिख रहा होता नाली के किनारे उसने ठेला लगा रखा है वहां पे वो गोलगप्पा मोमोज कचौड़ी कुछ बेच रहा है
0:47 और जितनी वो सड़ी जगह होती है मक्खी भिनभमिना रही होती है उतना वहां आप और लाइन लगा के खड़े हो जाते हो और कहते हो दो दो बड़ा स्वाद आ रहा है हम वो बकायदा लिख के रखते हैं ₹25 की पनीर वाली थाली स्पेशल पनीर थाली आपको कैसे लग रहा है कि आपको पनीर दिया जाए आप जानते नहीं होंगे पता तो है ही पर अपनी जिंदगी की कोई इज्जत ही नहीं है यही मैटर अभी कोर्ट में भी गया था। जो जज थे उनका एक ये प्रश्न था टू द फूड सेफ्टी अथॉरिटीज। कितने कॉकरोचेस पाए गए हैं? और जवाब में कुछ पता चला था कि सिर्फ वो ग्राहक ही ऐसा है कि वो यहां चाय में देख लेता है। मक्खी पड़ी हुई है। पहली बात तो मैं जो भी बातें बोल रहा हूं मैं उन लोगों से नहीं बोल रहा हूं जो बेचारे सचमुच [संगीत] गरीब हैं। पर जो उस
1:34 वर्ग के नहीं है। माने कि अधिकांश लोग उनसे कह रहा हूं। आप कितना पैसा बचा लोगे खाने में? आपके पास पैसे की उतनी कमी नहीं है जितनी नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम अनंत है। आचार्य जी मेरा सवाल हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल एक व्यक्ति को लेकर है। वो फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन में कार्यरत हैं। और उन्होंने अभी बहुत सारे रेस्टोरेंट्स और खाद्य पदार्थ वाली कंपनियों और सरकारी कैंटीनों पे भी छापा मारा और उसके कारण उन्हें बहुत एक हीरो की तरह भी देखा जा रहा है। तो इससे एक बात मुझे अच्छी लगी कि कोई अपना काम कर रहा है और मुझे भी यह जानने को मिला कि हमारे हम जो खाना खा रहे हैं बाहर वह पूरी तरह
2:21 शुद्ध नहीं है। लेकिन एक प्रश्न ये आता है कि कोई व्यक्ति जो अपना काम कर रहा है वो उनको तनख्वाह भी मिल रही है। उनको एक हीरो की तरह देखना कितना उचित है हमारे लिए। और फिर इसी से यह फूड सेफ्टी को लेकर पता चला कि भारत में प्रतिवर्ष 100 मिलियन लोग वो फूड बोर्न डिजीज से प्रभावित होते हैं। और भारत में फूड सेफ्टी पे जो एक और भारतीय ₹100 खर्च करता है तो उसका दो पैसा फूड सेफ्टी पे खर्च होता है। लेकिन यूएस में यह 10 गुना है। और एक तीसरा आंकड़ा कैग का है। 2023 के रिपोर्ट है। वह कहती है कि जो भी सैंपल में गड़बड़ियां पाई गई उनमें से गड़बड़ी पाने वालों में से 85% पे कोई
3:08 कारवाई ही नहीं हुई। तो जो आम आदमी है उसकी जिंदगी के लिए एक खाना भी सुरक्षित नहीं है। क्या आम आदमी की जिंदगी इतनी सस्ती हो गई है? धन्यवाद। कितनी सस्ती है आपकी जिंदगी? ये तो आप तय करेंगे ना। कोई और क्या तय करेगा? आपकी जिंदगी का क्या मोल है यह तो आपको ही तय करना है। जब आप ही अपनी जिंदगी का मोल नहीं करते तो कोई और क्यों करेगा? फ़ूड सेफ्टी इत्यादि विभागों का कोई कर्मचारी या अधिकारी भी क्यों करेगा? फिर
3:57 कोई नहीं करता। जब कोई अपने कर्तव्य का पालन करता है तो फिर उसको तारीफ मिलती है। उसको हीरो की तरह देखा जाता है। इसमें ताज्जुब की क्या बात है? यह तो अच्छी ही बात है। लोग अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर रहे हैं। आपने एक नौकरी स्वीकार करी है। आप हर नौकरी एक एक अनुबंध होता है ना। एक एग्रीमेंट है, एक करार है कि इतने पैसे अगर मैं सरकार से ले रहा हूं तो बदले में मैं महीने का इतना काम करूंगा ईमानदारी से। ज्यादातर लोग वो काम नहीं करते। कोई अगर कर रहा है और अगर इसमें उसको तारीफ मिल रही है तो अच्छी ही तो बात है। ठीक है।
4:42 हां, यह जरूर है कि शायद यह व्यक्ति कोई पहले अकेले नहीं है जो निष्ठा से अपना काम कर रहे हैं और शोहरत सबको नहीं मिलती। किसी किसी को ही प्रसिद्धि मिलती है। पर चलो जिसको भी मिली अच्छी बात है। है ना? शायद किसी योग्य व्यक्ति को ही प्रसिद्धि मिली है। तो इसमें मैं क्या कह सकता हूं? इसमें मैं यह भी नहीं समझ पा रहा कि आप आपत्ति क्यों कर रहे हैं। ये तो ठीक है। अच्छा है। कैसे-कैसे लोग हमारे यहां पे सेलिब्रिटी बनकर बैठे रहते हैं। किसी आदमी ने अपना कर्तव्य पालन करा और इस वजह से उसको प्रसिद्धि मिल रही है। तो हमें तो सहमत होना चाहिए ना। हम ठीक है।
5:29 अब हमारी जिंदगी कीमत कितनी है? मैं क्या बताऊं कितनी है ये तो भाई आपसे बाहर तो कोई पैमाना नहीं हो सकता ना जो आपकी जिंदगी कीमत तय करे। जीना मरना सब अहंकार को ही है। वही है भीतर जीने वाली इकाई द लिविंग एंटिटी वही तय करेगा कि मूल्य कितना है जीवन में और जीवन को अपने मूल्य आपको ही देना है। आपका जीवन बीत रहा है अपने अंधेरे का ही पोषण करने में तो आपके जीवन का कोई मूल्य
6:14 नहीं है। सचमुच कोई मूल्य नहीं है। और आपके पास एक सार्थक मकसद है जीने के लिए तो आपके जीवन का निसंदेह मूल्य है। ज्यादातर लोगों के पास जीने के लिए कोई ऊंचा उद्देश्य, कोई वाजिब वजह होती नहीं है। वो बस यूं ही जी रहे होते हैं। जैसे कोई बेहोशी में पड़ा हुआ हो, किसी गाड़ी में और गाड़ी लुड़की चली जा रही हो। जैसे कोई नशे में नाव में धुत हो गया हो और नाव ऐसे ही बही चली जा रही हो। ज्यादातर लोग ऐसे ही हैं। उन्होंने तो खुद ही घोषित कर दिया है कि उनकी जिंदगी का कोई मूल्य नहीं है। जब आप ही अपनी जिंदगी का मूल्य ना करें तो कोई और क्या करेगा?
7:03 कोई और क्या करेगा? हमारे निर्णयों को देखो। उसी से पता चल जाता है हम अपने जीवन का क्या मूल्य करते हैं। हम बहुत सारे लोग कहेंगे कि हम उल्टा पुल्टा इसलिए खाते हैं। खानेपीने के मुद्दे पर बात चल रही है इसलिए कह रहा हूं कि हम उल्टापुल्टा इसलिए खाते हैं क्योंकि हम बहुत गरीब हैं। गरीबी यह जो गरीबी का मुद्दा है, इस पर और ध्यान दिए जाने की जरूरत है। इतनी गरीबी कि इंसान ठीक से खाना ना खा पाए
7:51 कि उसको सड़ा गला भोजन स्वीकार करने पर मजबूर होना पड़े। इतनी गरीबी क्या सिर्फ परिस्थितिजन्य होती है? सिचुएशनल होती है, सायोगिक होती है, एक्सीडेंटल होती है? इतनी गरीबी और अगर वह संयोगिक है भी तो क्या वह परिस्थितियां जिनमें आदमी इतना गरीब रहता है वो किसी के जीवन में क्या 20 साल तक चल सकती हैं मैं युवा की बात कर रहा हूं बच्चे की नहीं कि जो एकदम मजबूर है ना 90 बरस के बूढ़े की कि जिसके पास अब शरीर में ऊर्जा ही
8:36 नहीं एक जवान आदमी बिल्कुल पैदा हो सकता ऐसी स्थितियों में जहां उसको ठीक से पढ़ाई लिखाई नहीं मिली। जहां गरीबी थी, कमजोरी थी, बहुत सारी चीजें थी। पर जवान होने के 20 साल बाद भी अगर वह कह रहा है कि मेरे पास इतने पैसे भी नहीं होते कि मैं ठीक से खाना भी खा सकूं तो यह प्रश्न खुद से पूछना जरूरी है ना कि क्या यह बात सचमुच सिर्फ आपकी परिस्थितियों की है? सचमुच आप खाने जाते हो। आपको पता नहीं होता है आप क्या खा रहे हो। आप कितना पैसा बचा लोगे खाने में।
9:27 आपको अपनी जिंदगी की सचमुच कीमत लग रही होती। तो आप यह नहीं कहते कि मैं महीने का ₹0000 या ₹000 खाने में बचा लूं। किसी तरीके से आप कहते हैं मेरे पास एक ही एक ही उपकरण है। यही है जिसके बूते पर जिंदगी में अच्छे ऊंचे काम करने हैं। जब आदमी पर यह जाहिर होने लग जाता है ना कि जीवन तो व्यर्थ ही कर लिया है। और जब आप जब आदमी खुद से बोल देता है कि जिन फैसलों से मैंने यह जिंदगी बर्बाद करी
10:15 है, मैं अपने वो फैसले बदलने भी नहीं जा रहा हूं। तो उसके बाद एक डेथ विश जीवन पर छा जाती है। सीधे-सीधे फिर हम आत्महत्या तो नहीं कर सकते पर जीने की ऊर्जा भी चली जाती है। जीविष मिटने लगती है। लाइफ फोर्स क्योंकि अहंकार को अब पता है कि उसने अपने लिए लंबे दुख का चयन कर लिया है। जब तक अब रहेगा दुख में ही रहेगा। उसने फैसले ऐसे कर लिए हैं कि जब तक रहेगा दुख में रहेगा। तो कहता है क्यों ना अब अपने रहने की अवधि ही घटा दी जाए। और रहने की
11:02 अवधि घटाने का तरीका क्या है? शरीर को ऐसा कर दो कि बहुत लंबा चले ही नहीं। जिसको अपने जीवन का सम्मान होगा वह सड़ा गला खाना क्यों मंजूर करेगा? जिसको पता होगा कि उसका जीना जरूरी है। जिसको पता होगा कि उसके पास एक सार्थक संघर्ष है। कोई लड़ाई ऐसी है जिसको हारा नहीं जा सकता। वो क्या खानेपीने में पैसे बचाएगा और सड़क किनारे का बिल्कुल सड़ा गला खाएगा? पूछ रहा हूं और मैं क्या पूछ रहा हूं कि वह सचमुच इतना गरीब है कि उसके पास ठीक से खाने के भी
11:47 पैसे नहीं है और कई बार तो ऐसा होता है सब पर इल्जाम नहीं लगा रहा हूं बिल्कुल कई बार तो ऐसा होता है कि वो आदमी जिसने पूरा दिन ₹30-40 के खाने में गुजार दिया होता है। रात में घर जाता है और ₹100 की पी लेता है। क्या सचमुच उसके पास पैसे की कमी थी? हां, गरीब है। मैं बिल्कुल मान रहा हूं और गरीबी नहीं होनी चाहिए दुनिया में। निसंदेह नहीं होनी चाहिए। पर अगर गरीबी है भी तो क्या सचमुच इतनी है कि आप खा भी ना सको। और इतनी भी गरीबी है बहुतों के पास है। जिनके पास इतनी गरीबी है। मैं कह रहा हूं सबसे पहले हमारा प्रयास होना चाहिए कि वह इतने गरीब ना रहे। लेकिन भारत अब इस हालत में नहीं है कि लोग
12:32 इतने गरीब हैं। इतने गरीब हैं कि जो उनकी न्यूनतम शारीरिक आवश्यकताएं हैं उतना भी भोजन वह ना खा सकें। ऐसी गरीबी अब भारत में कम हो गई है। काफी है अभी भी है पर कम है। क्यों जरूरी है कि कोई सरकारी अधिकारी जाए और वह बंद कराए कि इस जगह पर गंदगी बहुत है। इस जगह पर गंदगी बहुत है। तुम यह ईटरी बंद करो। यह ढाबा बंद करो या जो भी आउटलेट बना है बंद करो इसको। इसमें सरकारी अफसर क्यों जरूरी होना चाहिए? आप तो खुद एकदम सड़ी गली जगहों पर जाकर के स्ट्रीट फूड के नाम पर कुछ भी खा रहे होते हो। आपको नहीं दिख रहा होता नाली के
13:19 किनारे उसने ठेला लगा रखा है। वहां पे वो गोलगप्पा मोमोज़ कचौड़ी कुछ बेच रहा है। जितनी वो सड़ी जगह होती है मक्खी भिनभिना रही होती है। उतना वहां आप और लाइन लगा के खड़े हो जाते हो और कहते हो दो दो बड़ा स्वाद आ रहा है। भैया कि इसमें कितने तरह के मसाले डालते हो? वो कैसे बताएं कि मसाले में क्या-क्या है? उस मसाले में कई ग्रहों की मिट्टी मिली हुई है। और कई प्रजातियों की आंतें मिली हुई हैं। पर हमें रोचक लगता है यह सब कुछ। क्यों जरूरत पड़नी चाहिए थी कि कोई इंस्पेक्शन करता कोई सरकारी ऑफिसर आता बाकायदा इंस्पेक्शन करता और वह बंद कराता होना तो
14:04 यह चाहिए था ना कि ग्राहक ही बंद करा देते बोलो होना तो यह चाहिए था ना ग्राहक बंद ग्राहकों के द्वारा बंद कराना बड़ा आसान होता है कैसे जाओ ही नहीं उसकी दुकान अपने आप बंद हो जाएगी सरकारी ऑफिसर की जरूरत ही नहीं पड़ती उसकी दुकान अपने आप ही बंद हो गई होती या तो उसकी दुकान बंद हो गई होती या फिर उसने अपनी दुकान में सफाई का इंतजाम कर लिया होता। आप नहीं जानते हो कि दूध और पनीर का बाजार में भाव क्या है? तो आपको कैसे लग जाता है कि वह आपको पनीर वाले छोले भटूरे सब ₹25 में दे देगा। कैसे लग जाता है? इतनाइतना पनीर मिल रहा है। ₹25 की थाली में। आपको कैसे लग रहा है कि आपको पनीर
14:51 दिया जा रहा? आप जानते नहीं होंगे क्या? पता तो है ही। पर अपनी जिंदगी की कोई इज्जत ही नहीं है। मर भी गए तो क्या होगा? मर ही तो जाएंगे। वैसे भी कौन सा जी रहे हैं भड़ू? अच्छा है पनीर ही खा के मर जाएं। [हंसी] वो बकायदा लिख के रखते हैं ₹25 की पनीर वाली थाली। ₹25 में पनीर वाली थाली कैसे? कैसे हम ये तो अपने ऊपर है भाई। सुनो मैं आपसे कुछ बातें जो बोल सकता हूं
15:38 इसी मुद्दे से संबंधित। पहली बात तो मैं जो भी बातें बोल रहा हूं मैं उन लोगों से नहीं बोल रहा हूं जो बेचारे सचमुच गरीब हैं। और ऐसा वर्ग अभी है भारत में शायद अगले 10 20 साल में ना रहे पर अभी है। सचमुच ऐसा वर्ग अभी है जिनके पास 2 जून की रोटी की भी किल्लत पड़ जाती है। है मौजूद है। खासकर उत्तर भारत में उत्तर में भी थोड़ा और पूर्व की तरफ आप चले जाओ तो वहां भी यह वर्ग है। पर जो उस वर्ग के नहीं है माने कि अधिकांश लोग उनसे कह रहा हूं फालतू के खर्चे रोक दो तुम्हारे पास पैसा ही पैसा है।
16:26 ये दो बहुत अलग-अलग बातें होती हैं। कितना कमाते हो और हाथ में बचता कितना है? ये तो बहुत अलग-अलग बातें होती हैं। ₹10 आप कमाते हो नौ खर्च कर देते हो। कितना बचा? आप उस नौ में से बस एक जो फालतू का था उसको रोक दो। फालतू का तो उस नौ में से पांच होता है। पर उस नौ में से बस एक रोक दो जो फालतू का था। आपका कितना बचने लगा? कितना बचने लगा? दो। आपकी बचत में 100% का इजाफा हो गया।
17:11 आपकी बचत में 100% का इजाफा हो गया। डबल हो गई आपकी बचत। आप जब बोलते हो ना पैसा नहीं है, पैसा नहीं है। और फिर जाकर के बहुत गलत जगहों पर पैसा काटते हो। जिसमें से एक जगह यह भी है सही खानपान। क्योंकि शरीर भी मांगता है कि उसके ऊपर खर्चे करो। उदाहरण के लिए सही कपड़ों से ज्यादा सही जूते जरूरी होते हैं। शरीर मांगता है कि सही जूते तो आपका सारा वजन उन जूतों पर है। अभी आप जवान हो। आपको नहीं पता चल रहा है। आप जैसे-जैसे उम्र होगी पता चलेगा कि शर्ट फटी हो तो भी चल जाता है। पर जूता अगर गड़बड़ था तो आपने अपनी एड़ियों और घुटनों को तबाह कर लिया है।
18:00 और यह सब क्यों हो जाता है? क्योंकि हमें यह पता ही नहीं कि फालतू खर्चे रोकने कैसे हैं। क्यों नहीं पता? क्योंकि हम लोकधर्मी लोग हैं क्योंकि ना जाने कितने खर्चे हम समाज के दबाव में या परंपरा के चलन में बस कर देते हैं। कर देते हैं। कर देते हैं। कर ही देते हैं। जो इंडियन मार्केट है आप किसी भी मार्केट से चले जाइए। वो आपको बताएगा कि जबरदस्त तरीके से सीजनल है। उन्हें पता होता है कि नई गाड़ियां कब ल्च करनी है। उन्हें यह तक पता होता है कि नए शैंपू कब ल्च करने हैं। उन्हें पता होता है कि यहां खर्च करने का एक परंपरागत पैटर्न है। तो इसीलिए
18:47 सेविंग्स का भी एक परंपरागत पैटर्न है। नई गाड़ी का कोई मॉडल दिवाली के बाद नवंबर दिसंबर में ल्च नहीं होगा। लोगों के पास कुछ बचता ही नहीं। कुछ नहीं बचता। इसी तरीके से मई, जून अब शायद अप्रैल इन महीनों में आमतौर पर मार्केटर्स न्यू प्रोडक्ट ल्च से बचेंगे क्योंकि स्कूल की फीस, स्कूल की फीस, इतने सारे बच्चे हैं यह करना है तो कुछ बचता ही नहीं हाथ में और स्कूल पूरे साल की फीस एक साथ ले लेते हैं। और वह भी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग समय पर।
19:40 कोलकाता है तो वहां पर काली पूजा दुर्गा पूजा आप महाराष्ट्र की तरफ चले जाए तो गणेश चतुर्थी स्पेंडिंग के साफ पैटर्न्स हैं और पैटर्न का मतलब यह होता है कि उसमें आपका विवेक शामिल नहीं है। समाज इस समय पर खर्चा करता है तो मैं भी करूंगा। भले उसके बाद खानेपीने को ना बचे कुछ भी। भारत में किसानों की आत्महत्या कितना बड़ा मुद्दा है। जानते हैं ना हम दुनिया भर में कुल मिलाकर के जितने किसान आत्महत्या नहीं करते उससे कई गुना किसान सिर्फ भारत में आत्महत्या करते हैं। सोचो
20:27 कितनी खौफनाक बात है। उसकी दो जो बड़ी वजहें हैं वो क्या हैं? असल में तीन गिनाई जाती हैं। जो पहली गिनाई जाती है वो है मानसून की फेलियर और इरीगेशन का अभाव। तो वर्षा के लिए आप निर्भर हो प्राकृतिक मानसून पर और अगर मानसून फेल कर गए तो कैनाल्स वगैरह है नहीं कि आपको इरीगेशन का पानी मिल जाएगा। पहला यह गिनाया जाता है। यह यह सबसे छोटा कारण है। उसके बाद उससे बड़ा कारण आता है माइक्रो फाइनेंसिंग का भाव। माइक्रो फाइनेंसिंग माने कि किसान को अपने जो जो ऑपरेशनल
21:17 एक्सपेंसेस होते हैं जिसे आप वर्किंग कैपिटल बोलोगे उसके लिए उधार लेना पड़ता है और बैंक्स अभी तक किसानों को उतने छोटे उधार दे नहीं पाते हैं। बैंक ब्रांचेस उतनी अभी फैली नहीं है और फैली भी है तो वह इतनी आसानी से देती नहीं है। हालांकि उस दिशा में कुछ प्रभावी कदम अभी अब उठाए गए हैं। वह स्थिति पहले से बेहतर हुई है। लेकिन फिर भी अभी भी माइक्रोफेंसिंग एक एक समस्या ही है। जो तीसरी जो सबसे गंभीर बात है जिसकी बहुत कम चर्चा होती है। वो मालूम है क्या है? लोक धार्मिक खर्चे और खासकर जब यह तीनों फैक्टर्स एक साथ मिल जाते हैं तो फिर बेचारे किसान की बड़ी दुर्दशा हो जाती है।
22:06 गांव में हैं। बच्चे ज्यादा हैं। किसी का ब्याह करना है, किसी का मुंडन करना है। कोई मर गया उसके मरने का तमाम भोज कराना है। तेरा ही करानी है। कुछ हो गया वो लगातार खर्चे कर ही जा रहा है। और यह सब खर्चे तो अकस्मात होते हैं। कोई ना कोई पैदा हो रहा है। किसी की यह हो रही है। और ब्याह उसको हम कैसे भूल सकते हैं? शादी है तो वह लोन उठाएगा ही उठाएगा और वह जो आसपास किसी साहूकार से उठाएगा। वह मासिक दर पर एक एक खून चूसने वाली दर पर वो किश्तों पर देता है और साथ ही साथ यह हुआ कि उस साल क्रॉप फेलियर हो गई अब वो नहीं चुका सकता। वो नहीं चुका सकता और वहां पर वो जो लोन है उसकी कंपाउंडिंग चल रही है। वो इतना हो जाता है
22:51 कि वो कहता है इससे अच्छा मैं जान ही दे देता हूं। आपके भी इसी तरीके से बहुत सारे खर्चे सिर्फ लोक धार्मिक हैं। यहां कम्युनिटी पर आए हो। आप मेरे साथ हो। आप पूछते हो कि आध्यात्मिक लाभ कब होगा? अरे आध्यात्मिक लाभ जब होगा तब होगा। आपको एक भौतिक लाभ बता रहा हूं। उतना तो कर लो। आप बहुत बड़े-बड़े खर्चे ऐसे कर रहे हो जिनसे आपका कोई लाभ नहीं है और आप बहुत सारी ऐसी जगहों पर बहुत कम खर्चा कर रहे हो जहां आपका बहुत लाभ है। सही खानपान उनमें से एक जगह है। जिम उनमें से दूसरी जगह है और बेशर्म हो के कह देता हूं संस्था को जो आप डोनेशन देते हो वो तीसरी जगह है। यहां पर खर्चे बढ़ाओ। [प्रशंसा]
23:38 और जो यह सब तमाम प्रपंची खर्चे करते हो उनको घटाओ। पड़ोसी की देखादेखी करनी है। इसकी बराबरी करनी है। यह करना है, वह करना है। हटाओ ना। हर खर्चे पर दिमाग लगाया करो कि इसमें मुझे बदले में क्या मिलेगा? पूछा करो। सिर्फ इसलिए कि खर्च करा जाता है। मैं भी कर दूंगा। और खर्च सिर्फ जेब से नहीं करा जाता। खर्च अपने समय का भी होता है। खर्च अपनी ऊर्जा का भी होता है। खर्च अपनी उपस्थिति का भी होता है। हर फिजूल जगह जाकर खड़े मत हो जाया करो। तुम अपने आप को खर्च कर रहे हो उस जगह पर। हर फिजूल बात पर ध्यान मत दिया करो। आप अपनी ऊर्जा,
24:23 अपना दिमाग खर्च कर रहे हो उस जगह पर। अपने आपको महत्व देना सीखो। अपनी कीमत करना सीखो। और आप अपनी कीमत नहीं करोगे तो फिर इंतजार करते रहोगे। सरकार आएगी आपकी कीमत करने। कभी कोई आ जाएगा अच्छा अफसर जो आपके लिए कुछ आपके हित में कुछ कर देगा पर ऐसा अफसर कोई 100 में हजार में एक होगा बाकी समय क्या करोगे किसी का मुंह ताकते रहोगे फालतू के खर्चे बिना बात के सब फिल्म रिलीज हुई है सब देखने जा रहे हैं हम भी जा रहे हैं देखने और पता पहले से है कि उसमें कुछ है नहीं काहे के लिए वहां जा रहे हो ₹2000 लगाने काहे के लिए जा रहे हो थोड़ा सा भी तुमको विवेक नहीं है। किस बात पर वहां जा रहे हो पैसे फूंकने?
25:11 और नशा ऐसा अपने ऊपर चढ़ने देते हो कि गिनते भी नहीं कि एंड टू एंड मूवी व्यूइंग के मूवी वाचिंग के उस प्रोसेस में आपने एंड टू एंड कितना खर्च किया। वो आप गिनोगे और परिवार गया है तो 2000 5000 से कम का खर्चा आ जाए तो बताइएगा। अगर आप सब कुछ गिनो और अभी मैं उसमें इनटेंजिबल्स नहीं जोड़ रहा। कि अपने समय की भी कीमत तो निकालो वो जोड़ दो तो फिर दस हजार कीमत जो वहां पर आप उस फिल्म को लुटा कर आए वो फिल्म ऐसी जिसने आपका नुकसान ही किया सब्सक्रिप्शंस लगा रखे हैं घर पे। क्यों लगा रखे हैं भाई?
25:56 क्योंकि इन थिंग है। सब करते हैं तो हम भी करेंगे। सब कर रहे हैं हम भी करेंगे। और कुछ खर्चे ऐसे होते हैं जो करने चाहिए। संस्था में लोग आते हैं। विशेषकर जब लड़कियां ज्वाइन करती हैं उनको सबसे पहले एचआर को निर्देश है कि बोलो कि अपने लिए स्कूटी वगैरह ले लें। खासकर ग्रेटर नोएडा जैसी जगह पे जहां पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ठिकाना नहीं कुछ। वो एक खर्चा ही है। पर उस खर्चे के लिए हम प्रेरित करते हैं। हमें यह भी पता है कि आप बोल सकते हो क्लाइमेट चेंज बढ़ेगा, फ्यूल जलेगा, यह सब होगा। बाकी जगहों पर हम बचा लेंगे भाई कार्बन एमिशन। बहुत और जगह हैं। कार्बन एमिशन बचा लेंगे। हम बहुत अच्छे से जानते हैं कि सबसे ज्यादा कार्बन एमिशन कहां होता है। वो होता है औलाद पैदा करने पर।
26:44 वो दिखाया हुआ है ना मैंने आपको पीपीटी में याद है? भूल तो नहीं गए कि तुम ये सब बाकी सब अपने बहाने हटा दो कि एक बल्ब कम जलाएंगे या ईवी यूज़ कर लेंगे या ये कर लेंगे। आपको अगर क्लाइमेट की और कार्बन की परवाह है तो उसका जो सबसे सॉलिड तरीका है कई गुना ज्यादा इफेक्टिव तरीका है वो हैव वन लेस चाइल्ड और उसके द्वारा आपने अपना कार्बन फुटप्रिंट कहीं ज्यादा छोटा कर दिया होगा तो स्कूटी खरीद लो। स्कूटी के द्वारा कार्बन बचाने की कोशिश मत करो। कुछ खर्चे हैं जो करने चाहिए। बंद करो यह फालतू की और जो मेंबरशिप ले रखी हैं कोई ढंग की लाइब्रेरी हो आपके आसपास उसकी जाकर मेंबरशिप लीजिए
27:35 और आप जितना भी अपनी इनकम का जो भी परसेंटेज खाने पर खर्च करते हैं उसको बढ़ाइए अपना ब्लड टेस्ट कराइए और सही सप्लीमेंट्स भी लीजिए। आधी तो कमजोरी आपकी इसलिए है क्योंकि आप शारीरिक रूप से कमजोर हो। आप क्या संघर्ष करोगे? क्या मुकाबला करोगे? विशेषकर महिलाएं आती हैं। उनके शरीर ही ऐसा होता है। वो देख के उसको क्या संघर्ष के लिए बोले? वो गिरने को तैयार है। अभी उसको कम्युनिटी पे आधी महिलाओं को एनीमिया होगा। भारत की यही हालत है। भारत में आधी से ज्यादा महिलाओं को है। कम्युनिटी थोड़ी बेहतर है। तो यहां आधियों को होगा
28:21 एनीमिया। जिसको एनीमिया है मैं उसको बोल रहा हूं कि जाओ मेरे अर्जुन लेडी अर्जुन। वो आगे बढ़ी बहुत जोर से। [हंसी] धाया। और यहां सोना पहन रखा है। गले में सोना लटका रखा है। अरे बेच दे यह सब कुछ। और अपने लिए साल भर का सप्लीमेंट का पूरा भंडार खरीद के रख ले। वो खाया कर। कान में बुंदे लटका के क्या मिलेगा तुझे? हां? [हंसी] आ बैल मुझे मार।
29:07 सब कुछ पहन के मेरा ध्यान खींच रही है। बताइए अभी मुझे मत करो मत करो मत करो। मधुर [गला साफ़ करने की आवाज़] [हंसी] आपके पास पैसे की उतनी कमी नहीं है जितनी विवेक की कमी है। आप अच्छी जिंदगी जिए, सार्थक काम करें। आपके पास और पैसा आए बहुत अच्छी बात है। लेकिन अभी भी जितना है। आप उसका सही उपयोग करना नहीं जानते। आप दुरुपयोग के अपराधी हो। सबने दुरुपयोग कर रखा है। और उसके बाद जब हाथ में कुछ नहीं बचता तो
29:54 फिर जाकर के वो ₹25 की पनीर वाली थाली खाते हो। वो बड़ा कूल लगता है। अरे आपको पता है जो नोएडा कि ये सब कमर्शियल सेक्टर्स हैं। यहां तक कि जहां पर आईटी कंपनीज है आप वहां भी चले जाओ तो लाइन से आईटी कंपनीज के ऑफिस होंगे और नीचे इधर लाइन से चीप फूड स्ट्रीट फूड के ठेले लगे होंगे और वहां से वो सॉफ्टवेयर इंजीनियर उतर रहा है और वो पांचसा वहां पर खड़े हो गए हैं फॉर्मल्स पहन के कई ने तो टाई पहन रखी है और लाइन से वहां खड़े हो के खा रहे हैं आपको क्या लगता है उनको इतनी कम सैलरी मिलती है कि वो अपने लिए ढंग का हेल्दी न्यूट्रिशियस फूड खा नहीं सकते उड़ाना है कहीं जाकर के यही बंदा शाम को जाएगा और और किसी बार में बैठेगा और
30:42 5000 का बिल दे देगा खुशी-खुशी। बाहर में भी बैठ के इसने जहर पिया और दिन में खाने के नाम पर भी इसने जहर खाया। और यही इंसान जब 35 साल का होगा तो हाइपरटेंशन, डायबिटीज जितनी इसको बीमारियां होनी होंगी सब हो चुकी होंगी। स्वार्थी बनिए। स्वार्थी बनिए। अपनी जिम्मेदारियों पर बाद में और अपने ऊपर पहले खर्च करना सीखिए। क्यों बोल रहा हूं? क्योंकि ज्यादातर आपकी जो जिम्मेदारियां हैं वो वैसे भी नकली हैं। आपने जो कुछ कर्तव्य समझ करके पकड़ रखा है वह कभी आपका कर्तव्य था ही नहीं। ना जाने किसने आपको बता दिया कि यह तुम्हारी ड्यूटी है। आपने मान भी लिया।
31:27 जिम्मेदारियां बाद में निभाते रहिएगा। पहले अपने प्रति वफा निभा लीजिए। कितनी ही तो बीमारियां इसलिए लगती हैं क्योंकि चल रहे हो किसी ऐसे मोड ऑफ ट्रांसपोर्ट में जो ठसाठस भरा हुआ है। पसीने से पसीने को रगड़ा जा रहा है। बिल्कुल समुद्र मंथन चल रहा है। [हंसी] 126 लोग हैं उस बस के अंदर [हंसी] और 6 घंटे की यात्रा है। 50 सीटर बस थी जिसमें 126 लोग हैं और 6 घंटे की यात्रा है। एक को भी अगर कोई संक्रामक बीमारी है तो 126 के 126 को होगी कि नहीं होगी
32:16 और ये जानते हो उसके बाद भी चढ़ते हो और दूसरे वाहन उपलब्ध है पर पैसा बचाना है। स्केसिटी माइंडसेट पैसा बचाना है। और करना क्या उस पैसे का वह जाकर के किसी व्यर्थ जगह पर पैसा फूंक देना है। बचाना है और किसी एकदम नकली जगह जाकर के उस पैसे को उड़ा देना है। जाकर जहां दानवान भी कराते हो देखा करो कि वहां की मार्बल फ्लोरिंग कितनी चकाचक है। वो तुम्हारे ही दान के पैसों की है। भारतीय चित्त बड़ा धार्मिक, बड़ा दानी होता है। वेरी पुअर पीपल एंड वेरी वेरी रिच रिलीजियस इंस्टीटशंस।
33:09 आजादी के बाद सरकार चक्कर में आ गई। बोली जितना धर्म स्थलों में पैसा जमा है वो तो देश के जीडीपी के टक्कर का है। वो इतना पैसा है जो जमा है कि दैट कैन बी एक्सप्रेस एस अ परसेंटेज ऑफ कंट्रीज जीडीपी। बोल रहे हैं यह पैसा कैसे हम इन लोगों के हाथों में छोड़ दें तो फिर नियम लाना पड़ा और वो नियम लाना जरूरी था वो बात आज की घटनाओं से भी साबित होती है अभी हाल ही में एक प्रसिद्ध मंदिर में बड़ी चोरी का मामला सामने आया और उसमें खूब शोर भी मचा मचा ना सोचो आज ये हो रहा है तो 47 में क्या हो रहा होगा और आज
33:56 जितनी संपदा ज्यादा इकट्ठा है। वह आम आदमी का पैसा है जो उसने वहां जाकर के आज जितनी वहां पर इकट्ठा है। एज अ परसेंटेज ऑफ जीडीपी 47 में उससे कई गुना ज्यादा थी। और फिर आप बोलते हो आपके पास पैसा नहीं है। लोकधर्म बस इसी में नहीं होता कि जाकर के मंदिर में चढ़ा दिया बिना यह देखे कि मेरे पैसे का क्या होगा। लोकधर्म इसमें भी होता है कि जाकर के ब्रांड पर चढ़ा दिया बिना यह देखे कि मेरे पैसे का क्या होगा। पर ब्रांड है भाई। ब्रांड है। अपने विवेक की अपेक्षा जिस भी धर्म का पालन किया जाए वो लोकधर्म ही है।
34:46 बस अच्छा लग रहा है कि मेरे पास यह ब्रांड है। भले ही उस ब्रांड से कोई वैल्यू ना मिल रही हो पर मेरे पास वो ब्रांड है। जाकर पैसा चढ़ाए वहां पर। और सिर्फ पैसा खर्चने में ही हम ब्रांड नहीं देखते। पैसा कमाने में भी देखते हैं। जो भारत की सबसे बड़ी आईटी कंपनीज हैं जो एशिया की बड़ी कंपनियों में गिनी जाएंगी। वो आज भी इन हैंड बोर जैसे शहर में भी एक न्यू जॉइनी को 2025,000 देती हैं। पर ब्रांड की बात है भाई। वहां जॉइ कर लेंगे। आप उसी को बोलिए कि आओ संस्था के आईटी डिपार्टमेंट में काम करो। ज्यादा ऊंचा काम है। ऊंचा सिर्फ इसलिए नहीं कि महान काम है। इवन इन टर्म्स ऑफ टेक्नोलॉजी
35:32 ज्यादा रिगरस काम है। हम स्टेट ऑफ द आर्ट टेक्नोलॉजीस पर काम कर रहे हैं। तुम्हें यहां जो एक्सपीरियंस मिलेगा इवन एट अ टेक्निकल लेवल। वो दूसरी जगहों के एक्सपीरियंस से कहीं ज्यादा वैल्यू रखता है। आओ संस्था में काम करो। हम कहेंगे कि वहां तुम्हें 20 मिलता है। यहां आओ तुम्हें 40 देंगे वो तब भी नहीं आएगा क्योंकि ब्रांड है। ब्रांड है। आपको पैसा समझ में कहां आता है? ना आप पैसा कमाना जानते हो ना खर्च करना जानते हो। दोनों ही जगह आप लोकधर्म के मारे हुए हो। कमा भी इसलिए नहीं पाते क्योंकि लोक धर्म आपको कमाने भी नहीं देता। और जब खर्च करने की बारी आती है तो लोक धर्म आपकी जेबें साफ कर देता है।
36:21 आप अगर बोलो ना कि आप कम्युनिटी में हो और इतने साल से हो तो पहली चीज तो दिखाया करो शरीर वो सज्जन कहां है जिनको कल मैंने बाईसेप्स पूछी थी खड़े हो जाओ बेटा अगली बार आओगे तो यह डबल होना चाहिए ठीक है बैठो आप कम्युनिटी में हैं और नए-नए आए हैं दो चार महीने पुराने कोई बात नहीं पर अगर आपके दो-ती साल हो रहे मैं नहीं कह रहा हूं कि आप यहां पर 50 इंच का खड़ा कर लें कुछ [हंसी] लेकिन शरीर स्वस्थ दिखना चाहिए। मजबूत दिखना चाहिए। बॉडी बिल्डर नहीं बनना है। नुमाइश नहीं लगानी है। पर यह भी नहीं होना चाहिए कि
37:09 किसी ने दो उंगलियों को लेकर के ऐसे आपकी बाईसेप्स तोड़ दी। [हंसी] झाड़ू की सीख देखी है। उसको ऐसे दो उंगलियों के बीच में लो। ऐसे करो तो टूट जाएगी। बहुत सारे घूम रहे हैं भाईजान। लो इधर आना बेटा। ऐसे लोग [हंसी] खर्च करो। खर्च करो। और यह बहुत खर्चा नहीं मांगता। यह प्रकृति का यंत्र है। जंगल में देखा है ना सब स्वस्थ ही होते हैं। वहां तो जिम भी नहीं है। लेकिन सबकी क्या मजबूत मांसपेशियां होती हैं। बहुत खर्चा नहीं लगता। जिम का खर्चा नहीं उठा सकते तो घर में भी हो जाएगा काम।
37:58 क्या मुंह में जा रहा है इसका बहुत ख्याल रखो। क्या आंख से देख रहे हो इसका बहुत ख्याल रखो। क्या सुन रहे हो इसका बहुत ख्याल रखो। हम यहां व्यक्तित्व चमकाने नहीं आए हैं। लेकिन अस यह भी तो बात है ना कि जब भीतर रोशनी आती है तो उसकी चमक फिर चेहरे पर भी तो दिखाई देती है। तो हमारे चेहरे पर हमारे शरीर पर वो ज्ञान की चमक दिखाई देनी चाहिए। प्रदर्शन नहीं करना है पर मजबूती तो होनी चाहिए ना। शरीर की भी मजबूती, विवेक की मजबूती, फैसलों की मजबूती, हर तरह की मजबूती हम में दिखनी चाहिए।
38:44 लुंज पुंज आप बहुत देर तक मेरे साथ चल ही नहीं पाओगे। आपकी कमजोरी ही आपको मुझसे दूर कर देगी। साथ मेरे चलना चाहते हो तो अपनी मजबूती को सम्मान दो और जब सम्मान दोगे तो उस पर खर्च भी करोगे। व्यर्थ खर्चे रोक दो। सही खर्चों के लिए खूब पैसा निकल आएगा। देखा देखी घर खरीदने चले गए। देखा देखी जानते ही हो आम आदमी के बड़े खर्चे क्या
39:31 होते हैं? जो घर खरीदा होता है। जब उसकी आखिरी किस्त चुकाते हो तो कैसे हो जाते हो? और जैसे आप हो जाते हो वैसे ही वो घर हो गया होता है तब तक। [हंसी] काहे के लिए जान झंझट में डाल रहे हो? वो फिल्मी एक्टर्स की फोटो आती है देन एंड नाउ। [हंसी] कि जब वो अपने प्राइम पे होते थे तो कैसे होते थे? फिर अभी आता है ऐसा मुंह पोपला हो गया। [हंसी] तो वैसे ही आपका आना चाहिए कि जब होम लोन लिया था तब कैसे थे और जिस दिन आखिरी
40:18 किस्त भरी उसके नीचे वो होम की भी फोटो होनी चाहिए। जब लिया था तब कैसा था और अब ये आखिरी किस्त जब भरी तो कैसा है? [हंसी] क्यों फंस रहे हो? कोई दहेज के लिए पैसा जोड़ रहा है। पागल हो गए हो क्या? बैठो। और एक बात और बोलता हूं। ऊंची संगति के लिए अगर दाम चुगाने पड़े तो
41:04 चुका देना। [प्रशंसा] सस्ती जगहों से बचना इसलिए नहीं कि वहां सुविधा कम होती है। इसलिए कि वहां संगति खराब होती है। बात सुविधा की नहीं है। बात भोग की कंजमशन की नहीं है। मेरा आशय यह नहीं है कि अमीर लोग बेहतर लोग होते हैं। बिल्कुल भी नहीं। पर यह निश्चित है कि भारत जैसी जगह में
41:51 जो व्यक्ति एकदम ही किसी सस्ती चीज की ओर आकृष्ट हो रहा है। संभावना यही है कि वह व्यक्ति तुम्हें कोई बहुत अच्छी संगति देने योग्य नहीं होगा। संभावना की बात है। इसमें अपवाद हो सकते हैं। आपको कोई अपवाद मिला हो तो मुझ पर आपत्ति मत करने लग जाइएगा। अपवाद हर जगह होते हैं। अच्छे लोगों की बेहतर ऊंचे लोगों की संगति के लिए अगर पैसा खर्च करना पड़े तो कर देना। हम बोलो। इसमें इसमें सर एक और चीज जो सेकंड
42:38 ऑब्जरवेशन था कि यही मैटर अभी कोर्ट में भी गया था तो उसमें जो जज थे जो भी उनका एक यह प्रश्न था टू द फूड सेफ्टी अथॉरिटीज कुछ कॉकरोच इनफेस्टेशन की बात थी तो यह था कि कितने कॉकरोचेस पा गए पाए गए हैं और जवाब में कुछ पता चला था कि सिर्फ दो-तीन ही है तो उसमें कुछ ऐसा जवाब दिया गया था कि इंडिया की रियलिटी कंसीडर करते हुए आप इसको को मतलब इवैलुएट करिए। इतना स्ट्रिक्ट होना भी ठीक नहीं है। तो आपने जो अभी समझाया क्योंकि हम खुद की जिंदगी का मूल्यांकन इतने टाइम से कम करते हैं तो वो चीज सिस्टमिक हो जाता है। वो वहां पे भी रिफ्लेक्ट करता है। देखो अल्टीमेटली कोई भी बिजनेस आपको वही वैल्यू देता है जिसको एक्सेप्ट करके आप उसे पैसा
43:25 दे दोगे। आपके ऊपर है। आपके जो स्टैंडर्ड्स होते हैं ना बिजनेस उन्हीं स्टैंडर्ड्स को कैटर करता है। बिजनेस को अगर पता है कि मैं अपने ग्राहकों को एक स्तर से नीचे का खाना दूंगा तो मेरे ग्राहक भाग जाएंगे तो बिजनेस को सुधरना पड़ेगा। वह ग्राहक ही ऐसा है कि वह यहां चाय में देख लेता है मक्खी पड़ी हुई है तो भी पैसा बचाने के लिए पी जाता है। तो बिजनेस को ये बात पता है। बिजनेस कहता है यार तू घर में तो पी लेता है मक्खी वाली चाय। तो यहां भी मैं तुझे चाय बना रहा था किचन में मक्खी गिर गई तो मैं अपना खर्चा क्यों बढ़ाऊं? नई चाय क्यों बनाऊं? क्योंकि मुझे पता है
44:10 तू वही बंदा है जो घर में भी मक्खी वाली चाय पी लेता है। तो यहां भी मक्खी वाली चाय पी ले ना। बल्कि घर में तो तेरे ऊपर थोड़ा लोड आता होगा कि तूने देख लिया कि मक्खी गिरी थी। मैं तो तुझ पे एहसान कर रहा हूं। तुझे बता भी नहीं रहा कि इस चाय में मक्खी गिरी थी। बढ़िया वेटर आएगा आपके सामने चाय रख देगा और आप पर एहसान ये करेगा कि बताएगा भी नहीं कि मक्खी वाली है। बल्कि ये और बता देगा कि वैल्यू एडेड [हंसी] एक्स्ट्रा न्यूट्रिशन उसको आप आप अपना स्तर बढ़ाओ ना। आप खुद ही उन जगहों पर जाना बंद कर दोगे जहां मक्खी वाली चाय मिलती है। क्योंकि भीतर ही भीतर बैक ऑफ योर माइंड आप जानते हो वो जगह कौन सी हैं। फिर भी आप
44:59 वहां जानते जाते हो क्योंकि आपको अपनी ही कदर नहीं है। जिसको अपनी कदर होगी वो यह नहीं कहेगा कि ₹15 बचाने के लिए मैं 126 लोगों वाली बस में ठुस के जाऊंगा। पैसे तो बचेंगे ना। वो यह नहीं करेगा। वह यह नहीं कहेगा कि एक ऑटो है जिसमें छह जने बैठे हैं। मैं भी उसमें किसी तरीके से ऐसे धक्का मार के घुस जाऊंगा कि पैसे तो बचेंगे ना। वह यह नहीं करेगा। और अगर उसको कुछ समय के लिए करना पड़ रहा है तो वो इसी बात से प्रेरित होकर कहेगा कि नहीं मेरी जो भी नाकामियां है भीतरी जो भी मेरी हदें हैं भीतरी मैं उनको चुनौती दूंगा और कमाऊंगा। इसलिए नहीं कि मुझे कंजमशन करना है। इसलिए क्योंकि मुझे जिंदगी में डिग्निटी चाहिए। मैं नहीं बर्दाश्त कर
45:45 सकता आठ लोगों वाले ऑटो में नौवा पैसेंजर बनकर घुसना कमाना है क्योंकि एक गरिमामई जीवन पर एक डिग्निफाइड जीवन पर सबका हक है वो प्राकृतिक बात है जंगल तक में सबके पास डिग्निटी होती है तो मैं तो इंसान हूं मेरे पास क्या बेसिक डिग्निटी नहीं होनी चाहिए और उतनी डिग्निटी के लिए आपको महीने के लाखों नहीं कमाने होते एक साधारण आय कमानी होती है वह आप कमा सकते हो वह अपना फैसला होता है। हम में से हम लोग कई बार सोचते हैं कि अरे जब चाय ₹15 की भी मिल सकती है तो मैं वो उस जगह पर क्यों बैठ रहा हूं जहां ₹85 की मिलती है। तो कुछ बात होगी। कुछ बात होगी।
46:33 अब मैं जो आपसे बोलूंगा वो आपको बहुत अजीब लग सकता है। बहुत अजीब लग सकता है। पर उसको थोड़ा सा सही केंद्र से सुनिएगा। अपने इन्वेस्टमेंट पर मोटा रिटर्न निकालना कौन जानते हैं? अमीर लोग या गरीब लोग? अमीर लोग जानते हैं ना कि अगर वो ₹1 भी खर्च करें तो उस ₹1 पे अठन्नी वापस कैसे निकाल लेनी है? एस रिटर्न वो जानते हैं ना। और गरीब आदमी ₹1 खर्च करता है तो उसमें कुछ नहीं निकाल पाता। कई बार नेगेटिव रिटर्न होता है। ₹1 खर्च करा वो ₹1 भी डुबो दिया। अमीर एक खर्च कर रहा है तो डेढ़ वापस निकाल लेगा। यह आरओआई बेहतर अमीर निकालता है। आमतौर पे जनरल बात कर रहा हूं। ठीक है?
47:19 माने अमीर जहां भी खर्च करेगा उसको पता होता है कि यहां पे मैं बेहतर रिटर्न निकाल रहा हूं इसलिए यहां खर्च कर रहा हूं। ठीक है ना? जिनको हम आमतौर पर बेकार की चीजें, महंगी चीजें और फिजूल खर्ची बोल के डिस्कार्ड कर देते हैं। वहां खर्चा कौन कर रहा होता है? फिजूल खर्ची बोल के गरीब डिस्कार्ड कर देता है। वहां खर्चा कौन कर रहा होता है? अमीर। और हम यह भी जानते हैं कि अमीर आरओआई निकालना जानता है। तो आप जिस जगह को सस्ता बोल रहे हो अच्छा आरओआई वहां है या आप जिस जगह को महंगा बोल रहे हो अच्छा आरओआई वहां है। आरओआई जानते
48:05 हो ना? रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट। बोलो। या तो यह बोल दीजिए कि जितने अमीर हैं सब बेवकूफ हैं। वो महंगी जगहों पर जाकर के बस अपना पैसा गवा देते हैं। ऐसा हो रहा है क्या? अगर वह वहां खर्च कर रहा है तो इसका मतलब वहां आरओआई है। अमीर जाकर के 85 की नहीं 485 की चाय पी रहा है। आप बोलते हैं फिजूल खर्चा बेकार है। पागल आदमी है। मैं ज्यादा होशियार हूं। मैं 15 वाली चाय पीऊंगा। मक्खी वाली। मैं ज्यादा होशियार हूं। मैं 15 वाली मक्खी वाली चाय पऊंगा। वो अमीर आदमी है। वो 185 वाली चाय पी रहा है। वो वो वो बेवकूफ है। पर हमें तो यह भी पता है कि आरओआई निकालना वो जानता है। आप नहीं जानते हो। इसका मतलब उसको पता है कि अगर वह
48:50 मक्खी वाली चाय पी के साल में दो दिन के लिए भी बीमार पड़ गया तो उसका भारी घाटा हो जाएगा। वह अपनी जिंदगी की अपने समय की कदर करना जानता है। और आप कह रहे हो ठीक है महीने में 15 दिन भी बीमार पड़े रहे तो वैसे भी मेरी जिंदगी बेकारी है। ला मक्खी वाली। ऊपर से दो चार और डाल दे। दिख नहीं रही है। सस्ता रोए, महंगा रोए एक बार। यह सस्तेबाजी के चक्कर में आप बार-बार रोते हो। हर जगह खर्च नहीं करते और सही जगह पर खर्च
49:36 करने से पीछे नहीं हटते। हर चीज में जुगाड़बाजी नहीं करी जाती कि सस्ते में काम चला लो। इस जुगाड़बाजी ने भारत का बहुत नुकसान करा है और कम से कम खानेपीने की चीजों में जुगाड़बाजी मत करो। वहां पर पैसा लगता है तो लगने दो। समझ रहे हो? वैसे ही गाड़ियों में नकली पार्ट्स लगवा रहे हैं। जिस गाड़ी के स्पेयर पार्ट्स तुम अफोर्ड नहीं कर सकते। तुमने खरीदी क्यों?
50:21 तब खरीदी इसलिए थी कि चाचा के लड़के ने भी खरीद रखी है तो उसको दिखानी है। तब तो खरीद ली। अब किश्तें भी नहीं भरी जा रही। बैंक वाले आके कभी गाड़ी लेके तुम्हारी भाग रहे हैं [हंसी] और गाड़ी की मरम्मत कराने के पैसे नहीं है तो उसमें नकली स्पेयर लगवा रहे हो नकली सिलेंडर लगा के पीछे से चला रहे हो फिर गाड़ी फट रही है हवा में उछल रही है लोग सोच रहे शूटिंग हो रही है [हंसी] छोटी गाड़ी खरीद लेते छोटी गाड़ी खरीद लेते। क्या जा रहा था? इतनी बड़ी काहे के लिए खरीदी? अगर उसको अफोर्ड नहीं कर सकते थे तो।
51:19 अहंकार ही सारे फैसले करता है ना। और अगर वह भ्रमित हो तो फाइनेंशियल फैसले भी कैसे करेगा? सारे भ्रमित फैसले करेगा। इसलिए आपसे बोलता हूं गुड स्पिरिचुअलिटी इज गुड इकोनॉमिक्स जो भीतर से सही है वह पैसा कहां खर्च करना है यह भी जानेगा वो यह भी जानेगा खर्च कैसे करना है वो यह भी जानेगा खर्च कैसे नहीं करना है और जो जो एकदम भीतर से नशे में है होश ही नहीं उसको फिर अपने बैंक अकाउंट का अपने एसेट्स का भी कोई होश नहीं वो कहीं भी खर्च करेगा करेगा और जहां खर्च करना चाहिए वहां खर्च नहीं करेगा क्योंकि फैसला तो फैसला है चाहे पर्सनल हो
52:07 और चाहे फाइनेंशियल फैसला तो फैसला ही है ना सेंटर तो एक ही है दो चार कैटेगरीज हैं जहां खर्च करना एकदम जीरो कर दो सबसे पहला ज्वेलरी दूसरा कॉस्मेटिक्स तीसरा जिसको आप बोलते हो जनरल रिकक्रिएशन लाइफस्टाइल प्लेजर
53:03 कितनों के घरों में किसी ना किसी के दहेज के लिए पैसा जोड़ा गया है या जोड़ा जा रहा है? ये लो। ऐसे क्या जोड़ रहे हो? बंद कर दो। यह सब एकदम बंद कर दो। पाओगे कि हाथ में काफी स्पेंडिंग पावर आ गई है। किसी फिजूल के एसेट में फंस गए हो तो इसको लिक्विडेट कर दो। किश्ते बंद करा दो। काहे के लिए अगले 10 साल का झंझट पाल रखा है? इससे अच्छा उसको बेच दो। खत्म करो और किश्तबाजी बंद हो। अच्छा है। भला हुआ मुरीब।
53:51 बैठिए। थैंक यू। प्रणाम आचार्य जी। हमने बात की एक्सप्लइटेशन की हिस्ट्री में और एक ऑनेस्ट ऑफिसर की भी बात की जो अपनी ड्यूटी अपराइट वे में करते हैं। तो मुझे याद आया कि एक ऑफिसर इंडियन डिप्लोमा एट कुछ साल पहले वहां यूएस में शी वाज़ रिप्रेमामेंडेड कि उन्होंने अपनी मेड को बहुत लो वेज दिया था। एक्सप्लइट किया था एक तरह से। तो और उस तरह के और भी इंसिड्स आते हैं। जैसे अभी दो दिन पहले गुड़गांव में जो सबसे रिच और एफ्लुएंट सोसाइटी कही जाती है विद 100्स ऑफ करोड़ के फ्लैट्स। वहां पे समबडी फिल्म कि एक मेड को बहुत पीटा जा रहा था गंदे तरीके से।
54:36 अभी एकद दिन पहले एक स्विगी के पर्सन की लेट डिलीवरी हुई तो उनको ऐसे मतलब ड्रैग करके अंदर लेके पीटा गया। तो इस तरह के केसेस आते रहते हैं। तो मेरा क्वेश्चन था कि एक तो जैसे यूएस का एग्जांपल मैंने दिया कि वहां पे दे वेयर लॉस इसलिए एक डिप्लोमेट लेवल पे के भी पर्सन पे एक्शन हो सका। लेकिन जैसे इंडिया में हम देखते हैं कि अगर कोई केस वायरल हो जाए, बहुत फेमस हो जाए, न्यूज़ में आ जाए तो एक्शन होता है। बट अदरवाइज देयर आर नो लॉज़ कि वेज मिनिमम होना चाहिए या इंश्योरेंस होना चाहिए। इस तरह की चीजें नहीं होती है। तो आई वांटेड टू अंडरस्टैंड कि क्या ये लॉज़ सोसाइटल लेवल्स पे, लीगल लेवल पे फ्रेमवर्क बना के इस चीज को सॉल्व किया जा सकता है। जैसे वर्कर्स का, गिग वर्कर्स
55:23 का, मेड्स का यह सब का जो एक्सप्लॉयटेशन केसेस देखते हैं इंडिया में। लॉस बना के नहीं हो पाएगा। जब आपको अपनी कदर नहीं होती तो आप अपनी कद्र करते हो उन चीजों के माध्यम से जो आपके पास होती हैं। आत्मसम्मान नहीं है। तो अपना इवैल्यूएशन कैसे करूंगा मैं? अपनी तो कोई वैल्यू करता नहीं ना मैं। अपनी वैल्यू करता नहीं।
56:11 तो मैं वैल्यू फिर किसकी करता हूं? मैं कैसे कह देता हूं कि कोई रिस्पेक्टेबल है, वैल्यूुएबल है। कैसे कह देता हूं? इंसान को तो मैं जानता नहीं। ना खुद को जानता ना खुद की कदर करता ना दूसरा वास्तव में कैसा है उसको जानता ना उसकी कदर करता तो मैं सिर्फ किस चीज की कदर करता हूं उसके पजेशंस कि उसके पास क्या है आप अगर वाइज होते आध्यात्मिक होते तो आपके पास किसी को भी नापने के जांचने के कुछ आंतरिक पैमाने होते, इनेट स्टैंडर्ड्स होते। वो आपके पास है नहीं।
56:57 ऐसे समझिए कि यह बैठे हुए हैं, यह बैठे हुए हैं। मेरे सामने दो लोग। मैं अपने आप को भी कुछ नहीं जानता कि भीतर कौन सी चीज होती है जिसकी कदर होनी चाहिए और भीतर कौन सी चीज होती है जो दो कौड़ी की होती है जिसकी अवमानना होनी चाहिए जिसकी कोई वैल्यू नहीं है मैं यह सब नहीं जानता तो यह बैठे हैं और यह बैठे हैं मैं इनका असेसमेंट इनका मूल्यांकन वैल्यू्यूएशन कैसे करूंगा मैं कहूंगा अच्छा इनके कपड़े देख रहा हूं और इनके इनके चेहरे पर देख रहा हूं कितना मेकअप है और इनकी घड़ी देख रहा हूं इनका यह सब देख रहा हूं चश्मा देख रहा हूं ये सब देख रहा हूं और थोड़ा पता कर लूंगा हां जी आप कहां काम करती हैं आपके पास कितना पैसा है आपके
57:44 पास कितना पैसा है कितनी गाड़ी है कितना मकान ये सब मेरे पास फिर किसी को भी इज्जत देने के लिए सिर्फ एक क्राइटेरिया बचेगा उसके पास क्या है व्हाट डस दैट पर्सन पज़ेस एंड इफ दैट पर्सन डजंट पज़ेस मच आई एम नॉट गोइंग टू रिस्पेक्ट हिम मच। वो जो फूड डिलीवरी वाला बंदा था उसकी बस यह गलती थी कि उसके पास पजेशंस नहीं है। नहीं है और वो एक ऐसे सामने के आदमी के सामने खड़ा हो गया है जो पजेशंस के अलावा किसी चीज को वैल्यू दे नहीं सकता। तो उसने हाथ उठा दिया। बस इतनी सी बात थी। मेड की भी बस यही गलती थी कि उसके पास पोजेशंस नहीं है।
58:31 और अगर आपका कल्चर ऐसा है जो सिर्फ पोजेशंस को वैल्यू देता है तो जिसके पास पोजेशंस नहीं है वो पिटेगा। इतना ही नहीं जो पिट रहा है उसको कुछ हद तक वो जस्टिफाइड भी लग सकता है। वो कहेगा अब जब मेरे पास पजेशंस नहीं है और उसके पास हैं तो वो तो मुझे पीटेगा ही ना। बिकॉज़ इट्स अ शेयरर्ड स्टैंडर्ड ऑफ वैल्यूस। जो गरीब है वह भी अपना असेसमेंट अपने विषयों अपने पोजीशंस से ही कर रहा है। तभी तो अपने आप को कह रहा है। अपने आइडेंटिफाई अपनी आइडेंटिटी स्टेटमेंट को क्या बोलता है? मैं कौन हूं? मैं गरीब हूं। गरीब किस अर्थ में है? वो यही तो बोलता है। मेरे पास चीजें नहीं है इसलिए मैं गरीब हूं। जो अमीर है वो भी अपने आप
59:18 को अमीर किस अर्थ में बोल देता है। मेरे पास चीजें हैं तो मैं अमीर हूं। दोनों का वैल्यू सिस्टम एक है। आप यह देख पा रहे हो। इसीलिए जब वह हाथ उठाता है, उसको मारता है तो वह विरोध करेगा। बिल्कुल करेगा। पर कहीं ना कहीं वो अपने पिटने को धीरे से स्वीकार भी कर रहा है। ठीक वैसे जैसे जब जाति प्रथा चलती है और चलती रही इतने हजारों सालों से तो जिन पर अत्याचार हो रहा था। उन्होंने उस अत्याचार को कहीं ना कहीं स्वीकार भी किया। क्योंकि उनको यह बता दिया गया था कि यह तुम्हारा कर्म फल है। जो अत्याचार कर रहा था उसको बता दिया गया कि तुम प्रिविलेज्ड हो। तुम कर सकते हो शोषण। क्योंकि वो तुम्हारा कर्म फल है। इसी तरह
1:00:05 से जो यहां था जिसके ऊपर शोषण हो रहा था। उसको बता दिया गया कि तुम्हारा कर्मफल है भाई। तुम्हें झेलना पड़ेगा। तो झेलता भी गया। इस तरीके से दोनों के पास एक शेयरर्ड वैल्यू सिस्टम था। तब वह शेयरर्ड वैल्यू सिस्टम क्या था? पिछले जन्म से जो कैरी फॉरवर्ड हुआ है तुम्हारा कर्म और अभी आज तुम जिस घर में पैदा हुए हो जिस जाति में पैदा हुए हो ठीक है ना इस बात को वो भी मानता था द ऑप्रेसर और वो भी मानता था द ऑप्रेस्ड तो दोनों में एक इक्वेशन बनी आज का वैल्यू सिस्टम क्या है कि तुम्हारी आईडेंटिटी कहां से आनी है पहले उसकी आईडेंटिटी कहां से आ रही थी कास्ट से इसकी भी आइडेंटिटी कहां से आ रही
1:00:51 थी? आज उसकी आइडेंटिटी कहां से आ रही है? पोज़ेशन से। इसकी भी आइडेंटिटी कहां से आ रही है? पोज़ेशन से। और ये दोनों की शेयरर्ड आइडेंटिटी है। दोनों की शेयर्ड आइडेंटिटी है। गरीब आदमी को गरीब आदमी टोंट मारे। वो बर्दाश्त नहीं करे शायद। पर गरीब आदमी को अमीर आदमी टोंट मारे तो शायद हंस के बर्दाश्त कर ले। हो सकता है कि वह खुश भी हो जाए कि चलो अमीर ने टोंट तो मारा कम से कम कुछ तो उसने हमको एकनॉलेज किया क्योंकि उसका भी यही वैल्यू सिस्टम है कि वो बड़ा आदमी है क्योंकि उसके पास पोजीशंस हैं।
1:01:38 हर वह व्यक्ति जो इस वैल्यू सिस्टम में पार्टिसिपेट कर रहा है। वह इस ऑपरेसिव सिस्टम में पार्टिसिपेट कर रहा है। और यह वैल्यू सिस्टम तब तक नहीं हटेगा जब तक लोकधर्म की जगह वास्तविक धर्म नहीं ले लेता। क्योंकि लोकधर्म का ही सीधा-सीधा संबंध आपके पजेशंस से है। विषयों से है। तुम्हारे पास यह होना चाहिए, तुम यह करो। ऑल द ऑब्जेक्ट्स। श्रुति आपसे नहीं कहेगी कि जाओ और और संपन्नता हासिल करो। पर लोकधर्म आपसे कहता है कि दूधो नहाओ पूतो फलो आप देखिएगा कि सोने
1:02:24 स्वर्ण सोना सोने से संबंधित कितनी कहावतें हैं लोक धर्म में देखिएगा सोना चांदी हीरा इनसे देखिएगा या रुपया पैसा धनधान्य देखिएगा यह है लोकधर्म जिसमें पज़ेशंस का बहुत महत्व है जिसमें में कोई छोटी बात नहीं है कि आपके पास पैसा है। जहां पर सीधे कह दिया जाता है कि चार पुरुषार्थ है धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। जहां पे धर्म, मोक्ष के सामने ही रख दिया जाता है। अर्थ और काम को भी। जैसे धर्म है, जैसे मोक्ष है, वैसे ही अर्थ और काम भी है। अर्थ माने क्या?
1:03:09 पज़ेशंस और क्या? यह गजब बात है। काम और मोक्ष एक साथ एक सांस में यह लोक धर्म है। ये ये बात इसलिए भी आचार्य जी रेलेवेंट लगती है क्योंकि इन सबके दोनों ही केसेस में कंप्लेन ही नहीं किया उन्होंने जिनका हरासमेंट हुआ और जब ये वीडियोस वायरल हो गए तो सुमोटो पुलिस को लेना पड़ा। महिलाएं कंप्लेंट कर रही हैं क्या? उनके साथ घरों में रोज जो हो रहा है। नहीं हो गया। बच्चे कंप्लेंट कर रहे हैं क्या? मां-बाप मिलकर के उनके साथ जो रोज कर रहे हैं क्योंकि शेयरर्ड वैल्यू सिस्टम है ना। उस बच्चे को भी तो यही बोल दिया गया है मां-बाप भगवान है। उस नारी को भी तो यही बोल दिया गया है पतिदेव परमेश्वर है। अब कंप्लेंट कौन करेगा? कौन करेगा?
1:03:57 आप पढ़िएगा। आपको मजा आएगा। दासों का एक वर्ग ऐसा भी था जो दास प्रथा जारी रखना चाहता था। अमेरिका की बात कर रहा हूं। क्योंकि उनके भीतर यह बात डाल दी गई थी कि तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम गोरे आदमी की दास्ता करते रहो। इसमें एक और चीज पूछना था आचार्य जी कि जैसे अनटचेबिलिटी के खिलाफ कानून बना या दास प्रथा के खिलाफ कानून बना तो प्रॉब्लम सॉल्व तो नहीं हुई बट एटलीस्ट बिकॉज़ ऑफ द लॉ प्रेशर 100 साल की परंपरा रही है वो कब शुरू हुआ था वो राममोहन रॉय के समय से और वो भी आज तक चल रहा है वो कानूनी काम
1:04:44 तो इतनी आसानी से नहीं होता कि आप गिग वर्कर्स के फेवर में कानून बना दोगे तो उनकी कंडीशन सुधर जाएगी। कानून वाला रास्ता और ज्यादा लंबा होता है। मैं जब बोलता हूं कि मास बेस्ड एजुकेशन ऑफ द सेल्फ तो आरोप यह लगता है कि आप बहुत लंबा रास्ता बता रहे हैं। लेट्स टेक द लीगल रूट, द पॉलिसी रूट, द टेक रूट। मुझे यह तो बता दो कि लीगल रूट जो तुम लेते हो वह कितना लंबा रास्ता होता है। तुमने कास्ट हटाने के लिए इतने कानून बना लिए। हट गई। लीगल रूट कहां सक्सेसफुल होता है?
1:05:30 और होता भी है तो कितना धीरे धीरे धीरे-धीरे असर करता है। तो जो रूट मैं बोल रहा हूं उसको भी आजमा के देख लो। हो सकता है तुम्हारे रूट से ज्यादा डीपर भी हो और फास्टर भी हो। हम थैंक यू सर। आपको खुशी होगी इस नाते जो हमारी अपनी ऐप है जिसमें हमारे गीता और बाकी सब कार्यक्रम चलते हैं। यहां पर बुद्ध हैं, गीता है, उपनिषद है, अष्टावक्र हैं। यह मुझे मिले, मेरी जिंदगी बदली। यह तुम्हें मिलेंगे तुम्हारी जिंदगी भी बदलेगी। सच पूछिए तो मतलब लाखों नहीं तो कम से कम
1:06:16 हजारों जिंदगियां तो हैं जो बिल्कुल बदली हैं। 2 लाख से अधिक गीता प्रतिभागियों के साथ जुड़े आचार्य प्रशांत [संगीत] ऐप पर। पहला महीना बिल्कुल फ्री गीता मिशन का पूरा एक्सेस। ऐप पर आपको मिलेंगे नियमित लाइव सत्र। हर दिन आचार्य प्रशांत के विशेष संवाद। गीता कम्युनिटी का एक्सेस, गीता परीक्षा, चयनित समाचार, ऑडियो बुक्स, कोर्ट्स और भी बहुत कुछ। Google Play स्टोर या Apple ऐप स्टोर पर आचार्य प्रशांत सर्च करें और अभी डाउनलोड करें।