अंतर्युद्ध: एक लहूलुहान आत्मसंघर्ष || आचार्य प्रशांत, नाट्य सत्र (2026)

संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो लहरों के राजहंस नाटक के माध्यम से जीवन के द्वंद्वों और आध्यात्मिक खोज पर प्रकाश डालता है। इसमें नन्द के चरित्र के माध्यम से व्यक्तिगत इच्छाओं और आध्यात्मिक मार्ग के बीच संघर्ष को दर्शाया गया है। आचार्य प्रशांत इस नाटक के पात्रों के माध्यम से दर्शकों को स्वयं के जीवन में झाँकने और अपनी वास्तविकताओं को समझने के लिए प्रेरित करते हैं।

मुख्य बातें:

  • नन्द के चरित्र के माध्यम से व्यक्तिगत इच्छाओं और आध्यात्मिक मार्ग के बीच का द्वंद्व।
  • बुद्ध और मोहिनी के प्रतीकात्मक अर्थों की व्याख्या।
  • स्त्री और पुरुष दोनों में मुक्ति की आकांक्षा पर बल।
  • बाहरी दिखावे के बजाय आंतरिक परिवर्तन के महत्व पर जोर।

नन्द का द्वंद्व: इच्छा और वैराग्य

आचार्य प्रशांत "लहरों के राजहंस" नाटक के एक अंश की प्रस्तुति करते हैं, जिसमें नन्द नामक एक व्यक्ति की कहानी है जो बुद्ध के उपदेशों और सांसारिक सुखों के बीच फंसा हुआ है। नन्द, जो एक राजकुमार है, बुद्ध से प्रभावित होकर संन्यास लेने का विचार करता है, लेकिन अपनी पत्नी मोहिनी के प्रति आसक्ति के कारण वह ऐसा करने में असमर्थ रहता है। वह अपने महल और पत्नी के पास लौट आता है, लेकिन उसका मन अशांत रहता है।

बुद्ध का आगमन: करुणा या परीक्षा?

नन्द के द्वार पर बुद्ध भिक्षा मांगने आते हैं, लेकिन बिना कुछ कहे वापस लौट जाते हैं। नन्द इसे अपना सौभाग्य माने या दुर्भाग्य, यह सोचकर व्याकुल हो जाता है। वह बुद्ध के पास जाने का निर्णय लेता है, लेकिन अपनी पत्नी मोहिनी को दिए वचन के कारण तुरंत लौटने का वादा करता है। बुद्ध के विहार में, नन्द को दीक्षा देने का प्रस्ताव रखा जाता है, जिससे वह और भी अधिक दुविधा में पड़ जाता है।

मोह और मुक्ति: नन्द का आंतरिक संघर्ष

आधी रात को नन्द अपने महल लौटता है, जहाँ वह अपनी पत्नी मोहिनी से अपने आंतरिक संघर्ष के बारे में बात करता है। वह बताता है कि कैसे बुद्ध ने उसे दो भागों में विभाजित कर दिया है, एक जो सांसारिक सुखों से जुड़ा है और दूसरा जो मुक्ति की खोज में है। नन्द चौराहे पर खड़े एक नंगे आदमी की तरह महसूस करता है, जिसे सभी दिशाएं अपनी ओर खींच रही हैं, लेकिन उसके पास कोई आवरण नहीं है।

आचार्य प्रशांत का विश्लेषण: नाटक का निहितार्थ

आचार्य प्रशांत नाटक के पात्रों और घटनाओं का विश्लेषण करते हुए बताते हैं कि नन्द का द्वंद्व केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह हर इंसान के भीतर मौजूद है। वे कहते हैं कि स्त्री और पुरुष दोनों में मुक्ति की आकांक्षा होती है, और यह मानना गलत है कि केवल पुरुष ही आध्यात्मिक खोज में रुचि रखते हैं। वे दर्शकों को बाहरी दिखावे के बजाय आंतरिक परिवर्तन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

स्त्री की मुक्ति: एक नया दृष्टिकोण

आचार्य प्रशांत स्त्री मुक्ति के बारे में एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि स्त्री को पुरुष से ज्यादा मुक्ति की आवश्यकता है, क्योंकि वह समाज, धर्म और परंपरा के बंधनों में अधिक जकड़ी हुई है। वे दर्शकों को स्त्रियों को समान रूप से आध्यात्मिक खोज में सक्षम मानने और उन्हें मुक्ति के मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित करने का आग्रह करते हैं।

सत्य की खोज: चुनाव और परिणाम

आचार्य प्रशांत सत्य की खोज के मार्ग पर चलने के चुनाव और परिणामों पर प्रकाश डालते हैं। वे कहते हैं कि सत्य एक आग की तरह है, जिसके पास बहुत देर तक नहीं बैठा जा सकता। या तो हमें उसमें पूरी तरह से डूब जाना होगा या उससे दूर चले जाना होगा। वे दर्शकों को सत्य के मार्ग पर चलने के लिए साहस और स्पष्टता के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं।

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Transcript

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0:08 इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ जैसे हमारे ऋषि मुनियों ने कभी ऐसा कोई रोल प्ले नहीं किया कि भाई लोगों को समझाना समझ सके। सोच रहे होंगे कि बुद्ध को त्यागने के बाद मैं और कहीं भी चला जाऊं पर अब लौट करके अपने महल तो नहीं आऊंगा। अपनी पत्नी के पास तो नहीं आऊंगा। त्यागा है मैंने बुद्ध को और आया हूं लौट कर अपने महल और अपनी पत्नी के पास। दिस प्ले वास बेसिकली अ समराइजेशन ऑफ़ एवरीथिंग वी नीड टू लर्न इन जस्ट अ ड्यूरेशन ऑफ़ एन एन आवर और सो। मत सुनाओ मुझे कि जीवन दुख है। मत बताओ मुझे आर्य सत्य। मत बताओ मुझे लोक परलोक सत असत। के जो प्ले में जो बात हो रही थी वो ऐसा लग रहा था कि ये मेरे ही भीतर की बात कर रहे हैं आचार्य जी। मैं चौराहे पर खड़ा वो नंगा आदमी हूं। जिसे सारी दिशाएं लीन लेना चाहती है और जिसके पास बचने के लिए आवरण भी नहीं है।

0:59 सर ने जिस तरीके से समझा है ना वो हम खुद तो नहीं समझ पाते कभी भी। सर ने बिल्कुल हमारा आईना दिखा दिया कि तुम ऐसे हो और इन दो चीजों के बीच में फंसे हुए हो। थे बुद्धि तो थे

1:52 मैं मैं नंद ईश्वर का दिया जो मांगा जा सकता है सब है मेरे पास जो जो नहीं था वो वो आज मिल गया या मिलते मिलते रह गया कौन कौन नहीं पहचानेगा उन्हें कौन नहीं पहचानेगा उन्हें स्वयं स्वयं बुद्ध मेरे मेरे द्वार आए

2:38 वही चेहरा वही आंखें अपने निर्वाण के बाद क्षेत्र घूम रहे हैं। आज आज मुझे मुझ अभाग्ये के महल भी आए, मेरे द्वार भी आए। वही आंखें पर वो आंखें पत्थर जैसी क्यों थी? बोले बोले भिक्षाम देही भिक्षाम देही अपना भिक्षा पात्र मेरे आगे फैला दिया। मैं उनके सामने खड़ा हुआ था। करबद्ध मैंने कहा भगवान भगवान पर पर ऐसे देखा उन्होंने मुझे जैसे जैसे देखा ही ना हो जैसे देखा ही ना हो

3:28 दो पलकों पलकें उठाई मेरे मेरे महल को देखा फिर मुझे जैसे मेरे आरपार देख लिया हो मैं हाथ जोड़े उनसे उनसे प्रार्थना ही करता रह गया और वो वो वो वो मुड़ के मुड़ के वापस चले गए। बिना मुझसे कुछ कहे सेवा का मौका देना तो दूर बिना मुझसे भिक्षा भी लिए। क्या कहना चाहते थे तथागत ये क्या हुआ है आज? इसे अपना होभाग्य मानू या परम दुर्भाग्य बुद्ध द्वार आए। मैं उनके चरण तक ना स्पर्श कर सका।

4:16 वापस वापस चले गए। कहां कहां वापस? विहार अपने विहार की ओर गए हैं। मुझे उनके मुझे उनके पास जाना होगा। मुझे मुझे उनके पास जाना होगा। बुद्ध यहां आए तो आवश्यक है कि मैं भी मैं भी उनके पर मोहिनी मोहिनी आज आज रात उपवन में उसने बड़ा उत्सव सजाया है। ओ मेरी प्यारी पत्नी मोहिनी और मैंने मैंने वादा कर बैठा हूं कि उपवन में हम दोनों आज साझ भ्रमण पर चलेंगे।

5:03 गौतम बुद्ध को पसंद नहीं करती। वो भिक्षुओं का दल महल के सामने से निकलता है। भिक्षाम देह भिक्षाम देही कहते तो टोकता आ जाती है। आज उसका विशेष दिवस है और आज ही आज ही बुद्ध प्रकट हो गए मेरे समक्ष। पर पर अभी तो दोपहर ही है ना? अभी तो दोपहर है। जाऊंगा और और तत्काल लौट आऊंगा। भ मोहिनी को दिया वचन नहीं टूटेगा शाम शाम का उत्सव यथावत रहेगा हम भ्रमण पर भी चले जाएंगे मोहिनी मोहिनी मुझे मुझे किसी कार्यवश थोड़ा थोड़ा जाना होगा

5:54 आप बुद्ध ही हैं पर मैं अभी गया अभी आया वो यहां तक आए थे। मुझे मुझे नहीं पता यह क्या था। मोहिनी ये बात मुझे बड़े अभाग की अपशकुन की लग रही है। बुद्ध द्वार पर आए और और पर और ऐसे वापस लौट जाए उनकी आंखें कुछ कुछ विशेष कह रही थी मुझसे। मैं नहीं जान मैं मैं जानता हूं क्या कह रही थी उनकी आंखें। मोहिनी तुम प्रतीक्षा करना। मैं मैं संध्या से पूर्व अवश्य वापस आ जाऊंगा। मोहिनी मैं जा रहा हूं। तुम प्रतीक्षा करना। अवश्य अवश्य आऊंगा। अवश्य वापस आऊंगा।

6:59 दूसरे पैर गया था। आधी रात के बाद वापस। आधी रात के बाद वापस आया हूं। कब सोच रहे होंगे? इतनी देर कहां लगा दी? देर लग भी गई। वापस आ गया। यही बड़ी बात है। आज तो शायद वापस आज तो शायद वापस भी ना आता।

7:45 जब मैं वहां पहुंचा तो बुद्ध ना जाने कितने ही लोगों से घिरे हुए बैठे थे। कैसे शांत करुणा नई मूर्ति भागवत बुद्ध की मैं बहुत देर तक बैठा विचल नेत्रों से टकटकी बांधे उन्हें देखता रहा व्यतीत हुआ इस मानव समुद्र में मेरा तो कभी मौका ही नहीं लगेगा जब समय बीतने लगा सांझ की ओर बढ़ने लगा तो मैंने सोचा उठ के वापस आ जाऊं। मोहिनी को वचन दिया है। पर उठने उठने का मुझ में

8:33 साहस ही नहीं हुआ उनके सामने। मैं बैठा ही रह गया उनके। और फिर मुझे उनके सामने जाने का अवसर मिला। मैंने सुबह हुए अपराध के लिए उनसे क्षमा मांगी। मैंने कहा तथागत मेरा मेरा अतिथ्य स्वीकार करें। मेरा मेरा आमंत्रण ना ठुकराएं। पर उनकी आंखों में वही पाषाण सी कठोरता। जैसे देखा उन्होंने मैं और देखकर भी नहीं देखा मुझे।

9:24 मैं निराश हुआ मैं वापस आने लगा कि मेरा आमंत्रण ठुकरा दिया बुद्ध ने। जब वापस आने लगा तो पीछे से उनकी वही शांत गंभीर आवाज आई। मैं मुड़ा जैसे स्वर्ग मिल गया मुझे। उन्होंने मुझे संकेत दिया अपने पीछे आने का। मैं मैं हाथ जोड़े उनके पीछे पीछे चला गया। उनके उनके विहार में वहां बहुत कम लोग थे। अधिकतर उनके भिक्षु बस मुझे उनके मध्य बैठने का मौका मिला। और बुद्ध मुझे लक्ष्य करके बहुत देर तक लोक

10:13 अलोक काम अकाम धर्म अधर्म का उपदेश देते रहे। मैं मंत्रमुग्ध सा सुनता रहा। मेरी जैसी सारी कामनाएं पूरी हो गई। पर फिर अचानक अचानक बुद्ध मुड़े। अपने भिक्षु आनंद की ओर और और कहते हैं नंद को दीक्षा दे दो। दीक्षा दीक्षा के लिए मैं नहीं तैयार था दीक्षा के लिए। मैंने लेकिन ना नहीं कहा। मैंने हां भी नहीं कहा।

11:01 मैंने हां भी नहीं कहा। मेरे मौन को मेरी मूख सहमति समझ लिया। आनंद और अन्य भिक्षु मेरी ओर कैंची कर्तनी लेकर बढ़े मेरे केश काटने के लिए। न जाने क्या उठा मेरे भीतर। मैंने दृढ़ता से रोक दिया उनको। मगर नहीं नहीं और रोक दिया मैंने उनको तो वहां उपस्थित सारे भिक्षुओं ने मुझ पर कामनाग्रस्त होने का आरोप लगाया। बोले तुम पर धन मद यौवन और स्त्री का ज्वर चढ़ा

11:49 है। इसलिए तुम बुद्ध के समीप होकर भी दीक्षा नहीं स्वीकार कर रहे। मैं चुप रहा। मैं चुप रहा। मेरी चुप्पी को देखकर इस बार स्वयं तथागत बुद्ध उठे और उन्होंने अपना भिक्षा पात्र मेरे हाथों में रखना चाहा। मैं किन कर्तव्य मूढ़ खड़ा था। हे ईश्वर मुझे किस परीक्षा में डाल दिया। वो मेरे सामने स्वयं तथागत बुद्ध मेरे सामने अपना ही भिक्षा पात्र लेकर खड़े थे। और मेरे हाथ उसे ग्रहण करने के लिए उठे ही नहीं।

12:35 जैसे उनकी आंखें मैंने पत्थर देखी थी। मैं भी पत्थर हो गया। आग सी उठी मेरे भीतर और फिर बिना उन्हें प्रणाम किए यकायक। मैं मुड़कर तेजी से बाहर की ओर निकल गया। बाहर की ओर निकल गया। यहां आने के लिए नहीं। उस वक्त मेरे भीतर दुनिया की हर वस्तु, हर विषय, हर व्यक्ति के लिए बस रोष था, विरक्ति थी, क्रोध था। यहां तक कि स्वयं बुद्ध के लिए भी अपने लिए भी मैं जीना नहीं चाहता था। मैं वन की ओर चला गया। मैं चाहता था कोई हिंस पशु मेरा शिकार कर ले। और जब कोई पशु नहीं आया मेरी ओर तो मैंने स्वयं ही जाकर के जंगली पशु को ढूंढा

13:21 द्वंद करा लेकिन मरा मैं फिर भी नहीं मैं जिंदा हूं और मैं लौट कर आया हूं अपनी पुरानी दुनिया में बुद्ध को छोड़ के ये ये घाव सिर्फ सिर्फ शरीर ही नहीं फाड़ा गया है मेरा। मेरे अंतर जगत के दो फाड़ कर दिए तथागत तुमने आज।

14:11 ईश्वर मैं मैं भीतर से लहलुहान हूं और और तुम उतनी देर से वहां खड़े क्या सुन रहे हो छुप छुप कर भीाराम महात्मा बुद्ध के सहचर भिक्षु और आनंद जब से मैं विहार से निकला मैं जानता हूं तुमने पीछा करा है मेरा। पीछा करा है ना? देखना चाहते थे कहां जाऊंगा। आ गया हूं मैं। अपने ही महल में वापस आ गया हूं। आओ आओ भीतर आओ। आओ भीतर आओ। देखना चाहते थे ना कहां जाऊंगा? आओ आओ हां आओ। ये ये है मेरा स्थान। देखो। देखो

15:01 सुंदर मेरा स्थान। वो प्रांगण वो सुंदर उपवन मेरा जहां मेरी पत्नी मोहिनी आज शाम उत्सव रखना चाहती थी और और वो वो जो सो रही है ना वो वो वो पत्नी है मेरी बहुत बहुत प्रेम करती है मुझसे बहुत प्रेम प्रेम प्रेम तुम समझते हो भिक्षु प्रेम प्रेम जानते हो प्रेम वो मेरी प्रतीक्षा में सोई है उसकी आंखों में अभी भी मेरी व्याकुलता के

15:46 आंसू होंगे स्थान देख लिया स्थान सिर्फ स्थान ही देख सकते हो तुम आनंद यहां पर स्थान के अलावा भी कुछ है। यह घर है मेरा, यह महल है मेरा। यहां जीते हैं हम। यहां, यहां सिर्फ जगह नहीं है। यहां स्थान के अलावा भी कुछ होता है। लेकिन यहां जो होता है वो देखने की तुम्हारे पास आंखें ही नहीं है। जानता हूं किस उम्मीद से तुम पीछा कर रहे थे मेरा। सोच रहे होंगे कि मैं लज्जित होऊंगा बुद्ध को छोड़ के। नहीं मुझे कोई लज्जा नहीं है। सोच रहे होंगे कि बुद्ध को त्यागने के बाद

16:33 मैं और कहीं भी चला जाऊं। पर अब लौट के अपने महल तो नहीं आऊंगा। अपनी पत्नी के पास तो नहीं आऊंगा। त्यागा है मैंने बुद्ध को और आया हूं लौट कर अपने महल और अपनी पत्नी के पास। और और अपनी इच्छा से आया हूं। क्यों चलूं किसी और की इच्छा पर? क्यों चलूं तथागत बुद्ध की इच्छा पर? उन्हें दिखाई नहीं दी थी मेरी इच्छा जब मैंने केश काटने के लिए ही मना करा था सब समझते हैं वो चुप है मौन है इसीलिए सब जानते हैं वो जब सब जानते हैं तो ये भी जान जाते हैं ना

17:19 कि जो अपने केश काटने से मना कर रहा है जो दीक्षा लेने से मना कर रहा है वो उनका भिक्षा पात्र भी तो नहीं ग्रहण करेगा। नहीं जान पाए। उठकर आए मेरी ओर और नहीं किया मैंने उनकी इच्छा का सम्मान। नहीं करूंगा किसी बुद्ध की इच्छा का सम्मान। मेरी अपनी जिंदगी है। मेरी अपनी इच्छाएं हैं। वाणी का छल बहुत खेल चुके हो तुम मेरे साथ। मत सुनाओ मुझे कि जीवन दुख है। मत बताओ मुझे आर्य सत्य। मत बताओ मुझे लोक परलोक

18:04 सत असत। मैं जानता हूं यह सब करके तुम चाहते क्या हो और जो तुम चाहते हो वो मैं कदापि नहीं होने दूंगा। सारे सारे आभूषण उतार करके सोइए मेरी प्रतीक्षा में मेरे प्रेम प्रेम समझते हो

18:53 जगह देखना चाहते थे ना घर देखना चाहते थे ना देख लिया सब मिल गया चैन मिल गया चैन तो तो जाओ यहां से अब निकलो निकलो आ हा हा हा ठहरो ठहरो ठहरो ठहरो जाने से पहले मेरे एक प्रश्न का उत्तर भी देते जाओ आ बड़ी उत्कंठा से मेरी ओर मुड़कर खड़े हो गए उत्तरों से भरे हुए हो पर जो प्रश्न है मेरे पास भिक्षु और आनंद उसका उत्तर तुम नहीं दे पाओगे।

19:39 मेरे भीतर जो अग्नि दहक रही है उसे तुम नहीं शांत कर पाओगे। मेरे प्रश्नों का उत्तर तुम्हारे पास नहीं। इसके पास नहीं। वह मेरे भी पास नहीं। और जिसके पास हो सकता है उसको तो मैं छोड़कर आ गया। जाओ जाओ जाओ मैं मैं मुझे एकांत चाहिए

20:25 मुझे मुझे मुझे मदिरा चाहिए मुझे मुझे नहीं औषधि नहीं उपचार नहीं बहराए रक्त बहे मदिरा जाओ भिक्षु मुझ मुस्कुरा क्या रहे हो? मुस्कुरा क्या रहे हो भिक्षुवर? जानता हूं इस मुस्कुराहट के नीचे तुम्हारी ये आंखें क्या कटाक्ष कर रही हैं। तुम तुम पूछ रहे हो मुझसे कि मेरे पास ऐसा क्या है भुलाने के लिए जो मुझे मदिरा का सहारा लेना पड़ रहा है।

21:11 हां। हां भिक्षुवर हां। मेरे पास निसंदेह कुछ है भुलाने के लिए जिसको मैं इसमें डुबोकर विस्मृत कर देना चाहता हूं। लेकिन फिर भी मैं तुमसे बेहतर हूं क्योंकि तुम्हारे जीवन में तो भुलाने लायक भी कुछ नहीं है। इतना दरिद्र है तुम्हारा जीवन और तुम्हारा मन कि विस्मृत करने के लिए भी तुम्हारे पास कुछ नहीं। जाओ भिक्षु ये मदिरा भी तुम्हारे लिए नहीं। जाओ जाओ यहां से।

22:05 आमा क्षमा मोहिनी क्षमा कोई था मेरे भीतर जो गया था कभी वापस ना आने के लिए और देखो अब लौटा है तुम्हारा नंद के साल में

22:52 तन पर पहले भी घाव खाए हैं मैंने युद्ध में आखेट में लेकिन लेकिन मन जितना रक्त रंजित है मेरा आज उतना कभी नहीं था। तुम कहोगी कि अगर मैं जानता था कि शायद कभी नहीं लौटूंगा तो तुम्हें बता करके वो नहीं गया। मैं क्या बताता तुम्हें? मैं क्या बताता तुम्हें। मुझे नहीं पता था कि वहां वहां क्या हो जाएगा। मुझे मुझे नहीं पता था कि बुद्ध मुझे स्वीकार ही कर लेंगे। मुझे नहीं पता था उन्होंने क्या योग्यता देख ली महल के सामने भिक्षा मांगते हुए

23:38 मेरी आंखों में उन्होंने क्या देख लिया मुझ में जब मैं प्रतीक्षा कर रहा था उनके विहार में मैं नहीं जानता था मोहिनी या ये शायद मैं जानता था मैं यह भी नहीं जानता लेकिन लेकिन छोड़कर आया हूं मैं उनको छोड़ कर आया हूं वो जो भी वो जो भी चाहते थे वो मैंने कदापि होने नहीं दिया। मैं तुम्हारा नंदू मोहिनी मैं किसी बुद्ध का नहीं। मैं बस मोहिनी का हूं। मैं तुम्हारा हूं। मुझे अभी भी पता है तुम। तुमने सब सुना ना मोहिनी। मेरा और आनंद का वार्तालाप भी सुना ना

24:25 मोहिनी। तुम बस क्रोधित हो ना? रुष्ट होकर लेटी हुई हो। कितनी प्रतीक्षा की होगी तुमने। मैं जानता हूं तुम अभी भी जगी हुई हो। पर चलो अभिनय करते हैं दोनों जैसे सोई हुई हो तुम। ताकि कुछ बातें मैं तुमसे वो कह पाऊं जो कभी कह नहीं सकता था। तुम्हारे पास नींद की खुमारी है और मेरे पास मदिरा की। आओ कुछ बातें करें मोहिनी। इस खुमारी में हमारी बातें बेहतर हो पाएंगी। पुत्र क्या टाल चल ली है उन्होंने मेरे

25:11 साथ। जानती हो मोहिनी ये केश तुम्हारे नंद के ये केश ये केश जो तुम्हें कितने प्यारे हैं। बुद्ध ये केश कटवा देना चाहते थे। कह रहे थे भिक्षु जैसे हो जाओ। मैंने तुम्हारे नंद के केशों को स्पर्श नहीं करने दिया उन्हें। यह मेरे नहीं है। यह केश तुम्हारे हैं मोहिनी। उन्हें कैसे ले जाने देता? और और केश कटवा देने से क्या मेरे व्यक्तित्व में सत्य उभर आएगा? और अगर सत्य उभर आता है केश कटवाने से तो जीभ कटवा देते ना मेरी। हाथ पांव कटवा देते। गर्दन ही कटवा देते मेरी। केश ही क्यों कटवाने हैं? मना कर दिया मैंने मोहिनी

26:04 मुझसे मुझसे बोले ना मैं हूं ना तुम हो हम सब जैसे उंगली से आकाश में खींची गई आकृतियां हैं जो बनते ही मिट जाती हैं जिनका होना ना होने के बराबर है। अगर किसी चीज का होना उसके ना होने के बराबर है तो मेरे इन केसों को भी होने दो ना। यह होते हुए भी ना होने के बराबर है। मैं गृहस्थ हूं। मैं धनी हूं। मैं शासक हूं। मैं पति हूं। मुझे यह सब रहने दो ना। अगर किसी वस्तु का होना उसके ना होने के बराबर है तथागत गुतबुत तो मैं जो हूं मुझे वैसा ही रहने दो। वैसा होकर भी मैं वैसा

26:50 नहीं हूं। मोहिनी तुम्हारा मारा नंद ये बातें नहीं कह पाया उनके समक्ष। लेकिन अगर वो सचमुच बुद्ध है तो उन्होंने पढ़ लिया होगा मेरी आंखों में। मोहिनी मोहिनी कैसे स्पर्श करूं तुम्हें? मैं मैं गंदा हो गया मोहिनी।

27:38 मैं मैं गंदा हो गया। अब मैं स्पर्श नहीं करूंगा तुम्हें। मेरी हल्की सी भी आहट पर जग जाने वाली तुम आज उधर मुंह ऐसे मुंह फखेरे लेटी हो। मेरे पूरे शरीर से बहती रक्त की ये बूंदे भी किंचित विचलित नहीं कर रही तुम्हें। मेरे हृदय में तुम्हारे लिए आज भी वही अनुराग है मोहिनी। कहो अपने रक्त से अभिषेक कर दूं तुम्हारा।

28:26 मेरी आंखों में आज भी तुम्हारी वही छाया है मोहिनी। आज भी वही छाया है। मैं किसी दबाव से तुम्हारे साथ नहीं रहा हूं। मैं अपनी इच्छा से, अपनी स्वेच्छा से तुम्हें लाया था। तुम्हारे साथ रहता हूं। लेकिन लेकिन अब जब बात कर ही रहे हैं तो यह भी बता देता हूं कि मेरी ही एक और इच्छा है जो मुझे आज तुमसे दूर तथागत बुद्ध के पास खींच ले गई। मोहिनी मैं कभी भी बोल लेने दो। मुझे अभी ना बोला तो कभी ना बोल पाऊंगा। मैं कभी भी पूरा नहीं रह पाया तुम्हारे साथ। मैं जब भी

29:11 तुम्हारे साथ रहा हूं आधा अधूरा बटा हुआ। मेरा एक हिस्सा है जो अभिन्न है तुमसे। बिल्कुल जुड़ा हुआ है तुमसे। लेकिन एक हिस्सा मेरा ऐसा भी है जो कभी तुम्हारा नहीं हो पाया। तुम सो रही हो या सोने का स्वांग कर रही हो। इसीलिए साहस करके तुमसे यह कह पा रहा हूं। जगी होती तो तुमसे सहन नहीं होता। तुमसे नहीं सहा जाता मेरा यह कहना क्योंकि तुम तुम सोचती हो, तुम चाहती हो कि तुम उस सूर्य की तरह रहो जिसके इर्दगिर्द मैं एक नक्षत्र की तरह चक्कर काटता रहूं।

29:57 नहीं सहा जाएगा तुमसे जब मैं तुम्हें बताऊंगा कि मैं वह टूटा हुआ नक्षत्र हूं। जिसका कोई ध्रुव, कोई कक्षा, कोई दिशा नहीं है। हां, तुम सूर्य हो मेरे जीवन का लेकिन मैं तुम्हारे परितह पूरा नहीं घूम पाता। कौन हूं मैं? कौन हूं मैं मोहिनी? आज की रात यह लेने दो मुझे कल नहीं पता

30:44 तुम होगी कि नहीं मैं होऊंगा कि नहीं कौन हूं मैं कौन कौन हूं मैं मैं मोहिनी का हूं। मैं बुद्ध का हूं। मैं कौन हूं? मैं चौराहे पर खड़ा वो नंगा आदमी हूं जिसे सारी दिशाएं ली लेना चाहती है। और जिसके पास बचने के लिए आवरण भी नहीं है।

31:33 मैं कभी इस दिशा बढ़ता हूं। मैं कभी उस दिशा बढ़ता हूं। पर मैं जिस भी दिशा बढ़ता हूं मैं पाता हूं वो दिशा खुद डोल रही है। वो दिशा अपने ही ध्रुव पर कांप रही है और फिर मैं वापस लौट आता हूं। मैं कहीं का नहीं हूं। मैं मैं तुम्हारे साथ हुआ करता था। तो ना जाने कौन सी पुकार पुकारती थी मुझे।

32:19 आज मैं चला गया बुद्ध के पास। तू नहीं बैठ पाया वहां क्योंकि तुम पुकारती थी मुझे और अब वापस लौट आया हूं आधी रात तुम्हारे पास। तो ना जाने कौन फिर से पुकार रहा है मुझे। मैं वापस आकर भी तुम्हारा नहीं हो सकता मोहिनी। कुछ पुकार रहा है, कुछ सुनाई दे रहा है। तुम्हें नहीं सुनाई दे रहा मोहिनी। तुम सचमुच सो रही हो। सोना अच्छी बात है। जो लोग सोते हैं उन्हें कुछ सुनाई नहीं देता। पर मुझे हमेशा कुछ सुनाई देता रहता है। सुनो सुनो

33:06 सुनो दूर से। बुद्धम शरणम गच्छा अमम चरणम गच्छामि गच्छामि नहीं कहीं नहीं जाऊंगा मैं कहीं कहीं नहीं जाऊंगा मैं। कहीं नहीं जाऊंगा। यही जिऊंगा यह आधा अधूरा फटाफटा चिथड़ा

33:53 जीवन। क्योंकि क्योंकि ना मैं इधर का हूं, ना मैं उधर का हूं। ना मैं इधर का हूं, ना मैं उधर का हूं। क्यों? क्यों? ना मैं यहां का हूं, ना वहां का हूं। क्यों?

35:00 वहिनी चली गई बुद्ध रह गए एप्टेशन था। बहुत प्रसिद्ध कृति है। आप लोगों ने कईयों ने पढ़ा होगा यह नाटक या देखा होगा। लहरों के राजहंस तो वही अप्ट किया था

35:50 हम बताइए नमस्ते आचार्य जी आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं सर जैसे अभी जो आपने प्रदर्शित करा नाटक तो इसी से रिलेटेबल लगता है अपना पूरा जीवन तो फिर मतलब दो फाड़ में बटे रहते हैं हमेशा हां तो मेरे लिए नाटक था आपके लिए थोड़ी है। ये क्या बोलता हूं बार-बार? शिक्षक का काम होता है आईना बनना। तो ये तो मैंने आपको आपकी जिंदगी दिखाई है। सबकी ऐसी मेरी भी ऐसी है। ये बर्दाश्त नहीं हो रहा अब।

36:55 ठीक ठीक बैठो बैठो नाटक है प्रणाम आचार्य जी बहुत-बहुत धन्यवाद इस हमारे जीवन को आईना दिखाने के लिए लेकिन अब तो उलझ चुके हैं क्या जो साथ है उसे भी कैसे ले जाएं? क्योंकि वो भी साथ नहीं छोड़ सकता। उन्हीं से पूछो वो बैठे हुए हैं। जो साथ है वो भी इंसान है ना? जी। इंसान है ना? उसको इंसान देखने में दिक्कत इसलिए होती है क्योंकि हम अक्सर देह देखकर लिंग देखकर लाए होते

37:42 हैं। साथ बनता ही ऐसा ही है। प्रकृति यही चाहती है कि साथ ऐसा ही बने विपरीत लिंगियों में। तो इसलिए यह बहुत-बहुत साधारण सी बात बहुत साधारण सी बात कि वह जो साथ है आपके मोहिनी वह भी इंसान है। यह कौंधती ही नहीं। इतनी साधारण सी बात है। वह भी इंसान है। मेरे मेरे मन में था पर फिर मैंने कहा कि पता नहीं तैयारी का समय भी नहीं था। जितनी तैयारी थी ज्यादातर आज सुबह ही हुई है। तो यह भी सब अभी-अभी लाया गया आधे 1 घंटे पहले। नहीं तो इसमें रोल रिवर्सल भी हो सकता था।

38:28 मैं नंद को यहां सुला देता, मोहिनी को खड़ा कर देता। क्योंकि इंसान इंसान है। इंसान की छटपटाहट तो उसकी चेतना में है। लिंग कोई भी हो। मुझे खतरा यह लग रहा था कि ऐसे प्रदर्शित करने में वही पुरानी भावना और ज्यादा दृढ़ होती है। रिइंफोर्स होती है कि सत्य साधु धर्म की ओर जाने में स्त्री बाधा बनती है। पर नाटक लिखा ही ऐसा गया है तो फिर शरीर पुरुष का है तो मैं खुद मोहिनी बनूं यह थोड़ा सा मुश्किल हो जाता। समय भी नहीं था नहीं तो

39:17 नहीं सचमुच समय हो तो मैं बहुत अच्छी मोहिनी बन के दिखा सकता हूं। तो जो आकुलता नंद में थी वही उस दूसरे इंसान में जो सो रहा था वो भी इंसान है। जैसे ये भीतर से बिलख रहा है कि पैसा मिला हुआ है। युवा है। ताकत है। जाकर जंगल ना जाने किस जानवर से खुद ही भिड़ गया था। सुंदर पत्नी है। फिर भी व्याकुलता है। उसी तरीके से वो जो स्त्री होती है ना उसमें भी बराबर की व्याकुलता होती है। वो भी इंसान है। उसको भी युवा शरीर मिला हुआ है। पति मिला हुआ

40:04 है। उसके पास भी रुपया पैसा नौकर चाकर ये सब कुछ है। पर बराबर की बेचैनी उसके अंदर भी होती है। जो पुराना मॉडल चला है और जो कुछ हद तक इस नाटक से भी शायद प्रदर्शित हो गया हो वो यह है कि व्याकुलता तो साहब बस पुरुषों का विशेषाधिकार है जो एकिस्टेंशियल एंगस्ट है वो स्त्री को तो उठती ही नहीं उसका क्या काम है अगर बढ़िया रुपया पैसा मिल गया है तो आभूषण गहने वगैरह पहनो खाओ पियो बच्चे पैदा करो सोए पड़े रहो बुद्ध के यहां भी हमने यही तो सुना अभी नाटक में कि सब कौन बैठे हुए थे? भिक्षु

40:51 ही बैठे हुए थे वहां। भिक्षुणी की तो हमने सुनी नहीं बात। तो उससे भाव ऐसा आता है जैसे कि सारी अस्तित्वगत बेचैनी हम कि जैसे मुक्ति की सारी अभिप्सा बस पुरुष को ही उठती हो। स्त्री तो माया की बच्ची है। उसको बड़ा अच्छा लगता है कि मैं बंधन में ही पड़ी रहूं। वह चाहती ही नहीं मुक्त होना। और जब आप ऐसा दिमागी मॉडल बना लेते हैं ना तभी आपको समझ में नहीं आता कि उसको कैसे समझाऊं क्योंकि आप ये मान कर बैठे हो कि मुक्ति बस आपको चाहिए उसको थोड़ी चाहिए। आप ये मान कर बैठे हो कि मुक्ति बस आपको चाहिए। उसको तो चाहिए नहीं। तो फिर आपको

41:37 बड़ी तकलीफ उठती है। फिर आप जो अभी सवाल कर ऐसा सवाल करते हो कि अब तो हमारी शादी हो गई। हमारे जीवन में कोई है तो अब हम उसको कैसे समझाएं? उसको कैसे समझाया माने क्या जैसे तुम समझे हो वैसे ही वह समझेगी जो आग तुम्हें लगी हुई है वो उसको भी लगी हुई है जिन भ्रमों में तुम जी रहे हो उन्ही में वो भी जी रही है तो उसको समझाएं माने क्या दूसरी प्रजाति है ऐसी क्या विशेष समस्या आ जाती है किसी स्त्री को समझाने में और अध्यात्म के पूरे इतिहास में हमने इस समस्या को लगातार वैध घोषित किया है लगातार हमने यही दिखाया है कि पुरुष सन्यासी होना चाहता है। पुरुष सब कुछ त्याग करके बाहर निकलना चाहता है। पीछे से स्त्री आकर के उसको ऐसे पकड़ लेती है। कभी याचना करती है। कभी अपना रूप यवन

42:24 दिखाती है। कभी बच्चों का बंधन डालती है। कभी कुछ करती है। और स्त्री ही बेड़ी है। पुरुष तो पंछी की तरह आधा धो के उड़ना चाहता है। स्त्री पिंजरे की तरह उसे पकड़ लेना चाहती है। क्या ये मॉडल सचमुच ठीक है? क्या ये ठीक है मॉडल? मुझे तो उल्टा लगता है। मुझे तो लगता है स्त्री में मुक्ति की आकांक्षा पुरुष से ज्यादा होती है। एक आप लोग बार-बार उसको कोट करते हो, उसका पोस्टर बनाते हो कि जब गुलामी चुभ ही नहीं रही तो आजादी लेकर क्या करोगे? गुलामी जिसको ज्यादा मिली हुई है, वही आजादी के लिए ज्यादा फड़फड़ाएगा ना। तो गुलामी किसको ज्यादा मिली हुई है? शरीर की, समाज की, धर्म की, परंपरा की। की गुलामी किसको

43:10 ज्यादा मिली हुई है? स्त्री को। स्त्री को ज्यादा मिली हुई है। तो आजादी के लिए भी वही ज्यादा फड़फड़ाती है। वो पहले ही तैयार है कि भैया ये सब हटाओ उड़ो बाहर निकलो। पर आप प्रश्न ये कर रहे हो कि उसको कैसे समझाएं? जैसे कि वो कह रही हो कि नहीं मुझे तो पिंजरा बहुत प्यारा है। अरे वो तुमसे ज्यादा तैयार बैठी हुई है। उससे बात तो करके देखो। अभी भी मैं यहां पर जितना देख पा रहा हूं। आधी तो होंगी कम से कम महिलाएं कि नहीं होंगी? आधी तो होंगी। आधी तो होंगी। और अगर आधी मौजूद हैं मौजूदगी में अनुपात अगर एक और एक का है तो इच्छा में अनुपात

43:55 दो और एक का होगा स्त्रियों और पुरुषों का। क्योंकि स्त्रियों को यहां मौजूद होने के लिए पुरुषों से दुगनी इच्छा लगानी पड़ती है। दुगना प्रयास करना पड़ता है और दुगने बंधन तोड़ने पड़ते हैं। तब वो यहां आकर एक और एक के अनुपात में मौजूद हो पाती हैं। तो कौन कहता है कि महिला तो मोहिनी है। कामिनी है। उसका तो काम है पुरुष को अपनी माया में बांध लेना। काला जादू कर देना। उसको अपने रूप के जाल में फांस लेना और बेचारा पुरुष कबूतर की तरह गुटरगु कर रहा है कि अरे मुझे तो फंसा लिया फंसा लिया अगली बार इसका दूसरा अध्याय कर सकते हैं

44:41 कि मोहिनी उठ गई मोहिनी उठ गई बोली निकल और बोल रही है कि तुम्हें क्या लग रहा है ये सब अनायास हो गया था कि बुद्ध यहां आए थे। मैंने बुलवाया था। तुम्हें क्या लग रहा है? यूं ही तुम्हें दीक्षा दे रहे थे, केश काट रहे थे। कैंची भी मैंने ही दी थी। आनंद को भी मैंने ही तुम्हारे पीछे छोड़ा था कि इनको वापस आने मत देना। फिर भी तू वापस आ गया बेशर्म। और अभिनय ऐसे कर रहा है कि जैसे मेरी खातिर लौटा हो। मेरे प्रेम में वापस आया है। इस बात पर फिर से विचार करिएगा।

45:27 दासता का दंश तो ज्यादा स्त्री ही भुगत रही है ना। शरीर समाज हां परंपरा बाहर निकलने में भी उसको दिखाई देता है कि 100 तरीके के बंधन है। जो यहां पर आए हैं रात में 7 आठ बजेगा नहीं कि धुकधुक चालू हो जाएगी। उनकी वो सोचने लगेंगे कि कैसे जाएंगे वापस क्या करना है? बंधनों का ज्यादा अनुभव किसको होता है? स्त्री को ही होता है। तो अगर मुक्ति दोगे तो लपक कर वही तो लेगी पहले और कौन लेगा?

46:16 हम इंसान की तरह देखो, दोस्त की तरह देखो बात बनेगी। हम बोलिए नमस्ते आचार्य जी। चौराहे पर नंगा खड़ा हूं। चारों दिशाएं बुला रही हैं। सभी दिशाएं पुकार रही हैं। हर दिशा की तरफ आकर्षित होता हूं। आगे जाता हूं। फिर एहसास होता है गलत दिशा में आ गया। वह दिशा अपने ही ध्रुव पर डोल रही है और और फिर मैं अपने कदम ऐसा चलता रहता है और मदिरा पात्र फेंक देता हूं। इन सबके बीच में आपके साथ हूं पिछले दो वर्षों से। तो एक झूठा सा प्रतीत होने

47:03 वाला झांसा भी देता रहता हूं। जैसा आप कहते हैं कि पिटते जाओ, पिटते जाओ, हारते जाओ, हारते जाओ। हारते-हारते कब जीतने लगोगे पता भी नहीं चलेगा। वह भी बहुत ज्यादा व्यर्थ सा लगता है। अपने आप को बोलता हूं तो सब कुछ बिल्कुल वैसा ही है जैसा आप नाटक के दौरान चीख-चीख कर कह रहे थे कि चिर रहा हूं, फड़ रहा हूं। ऐसा ही होता जाता है। मैं कौन हूं? मैं वो हूं जो जो खुद को ही झांसा दे रहा है। जो झांसा है वो अभी पहले प्रश्न में हमने खोल कर रख दिया। बुद्ध के पास जाकर भी लौट आने के पक्ष में तर्क क्या था नंद के

47:49 पास? तर्क क्या था? अरे मोहिनी बुरा मानेगी, मोहिनी बुरा मानेगी। जब आप पूरा नाटक पढ़ेंगे तो आप पाएंगे कि मोहिनी नाटक में सुंदरी के नाम से तो आप पाएंगे कि जो मोहिनी का व्यक्तित्व है वह नंद से ज्यादा मजबूत दिखाया गया है। वह मोहिनी नहीं है। मोह नंद को है। हटने के लिए चिरने के लिए दो पक्ष चाहिए ना। दो पक्ष चाहिए ना। जो परस्पर विरोधी हो। एक दूसरे के विपरीत खींच रहे हो। एक पक्ष पर सत्य है। इतना तो समझ में आता है। वहां बुद्ध बैठे हुए थे। इधर बुद्ध बैठे हुए थे। ये तो समझ में आता है।

48:37 और प्रस्तुत ऐसे किया गया जैसे दूसरी तरफ कौन है? मोहिनी है। और ये दोनों विपरीत दिशाओं में खींच रहे हो। बुद्ध अपनी ओर खींच रहे हैं। बुद्ध सत्य की ओर धर्म की ओर खींच रहे हैं। यहां तक तो ठीक है। बिल्कुल। पर क्या हम परीक्षण करेंगे कि सचमुच मोहिनी अधर्म की ओर खींच रही है, मोहित कर रही है, झांसा दे रही है, भ्रमित कर रही है या यह नंद बाबू का अपना अनुराग है। इन्होंने प्रदर्शित ऐसे करा यह यहां मध्य में खड़े हुए हैं। यह है ना झूला कभी आगे, कभी पीछे। यह यहां खड़े हुए हैं। यहां बुद्ध हैं और यहां वो ही नहीं है।

49:24 इन्होंने ऐसे दिखाया जैसे दोनों दिशाओं से दो विपरीत बल इनको खींच रहे हो। इधर से तो खींचा जा रहा है। इधर से कोई है भी सचमुच खींचने वाला या तुम खींच रहे हो या तुम खींच रहे हो? वो तुम्हें खींच रहा है या तुम पकड़े बैठे हो? यहां झूठ था। ठीक है। बहुत भावनात्मक उबाल था नंद के वक्तव्यों में। पर आवश्यक है कि भावना के पीछे छुपे झूठ को भी पकड़ लिया जाए। नंद ने प्रदर्शित यूं किया जैसे मोहिनी की खातिर वापस लौट के आया है। मोहिनी को बुरा लगेगा ये होगा वो होगा। उसकी खातिर आया है या अपनी खातिर आया है?

50:14 जहां लौट करके आया है महल में अपने वापस वहां पर वैभव है। धन है, सोना है और मोहिनी वो सुंदर दिखाई गई है। युवा है, सुंदर है, तेज है। तो बोलो आकर्षण किसकी ओर से है? किसकी ओर से है? और जब आप नाटक पढ़ेंगे तो उसमें तो मोहिनी कई बार बोलती है नंद को तुम वापस लौट कर मत आना। तुम वापस लौट कर मत आना। जब वो आ रहा होता है मैंने तो इसको संक्षेप में कर दिया था। नहीं तो बहुत लंबा नाटक है। जब वापस आ रहा होता है तो नौकर वगैरह आकर के सूचना देते हैं कि वो वापस आ रहा है। बोलते हैं वापस आ रहा है तो मेरे कमरे के दरवाजे बंद कर दो। मुझे यहां नहीं चाहिए।

51:00 वो बुला रही है। तुम चिपके हुए हो। वो बुला रही है। तुम चिपके हुए हो। वो से मेरा आशय है मात्र स्त्री नहीं। वो सब कुछ जिसका हवाला देकर जिसका बहाना लेकर तुम कहते हो कि अरे मैं सही काम कैसे करूं जिंदगी में। दूसरे भी तो काम करने हैं। वो दूसरे काम तुम्हारे ऊपर चढ़े हुए हैं या तुम खुद जाकर अपने स्वार्थ, अपने मोह के कारण उन दूसरी चीजों से चिपके हुए हो? बताओ। बिल्कुल खून निकल रहा है। बिल्कुल चितड़े हो गए हैं भीतर से। पर यह भी हो सकता है कि इधर तो बुद्ध बुला रहे हो। बुद्ध ने अपना हाथ बढ़ाया है आगे और कहा है कि लो और इधर यह

51:46 हो सकता है कि इधर मैंने पकड़ रखा हो। दोनों दिशाओं में जो प्रक्रिया चल रही है बहुत अलग-अलग हो सकती है और उसके अलग होने के बावजूद ऐसे लहूलुहान हुआ जा सकता है। इधर तो बुद्ध बुला रहे हैं। पर इधर से मुझे कोई बुला नहीं रहा। इधर वाले को तो मैंने जकड़ रखा है। आप मत जकड़ो। आप छोड़ दो। आप मत जकड़ो। मोह आपकी ओर से है। मोहिनी नाम व्यर्थ दूसरे को दे रहे हो। पूछने लायक प्रश्न होता है। इतना वैभव ना होता, बड़ा महल ना होता, सुंदर उपवन ना होता, इतने परिचारक ना

52:34 होते, सुंदर युवा, आकर्षक पत्नी ना होती तो भी क्या नंद बाबू वापस लौट के आ जाते? ऐसे सवाल पूछा करो। अब बताओ यह प्रेम है या क्या है? बेचारे आनंद की तो फजीहत कर दी। अरे तुम्हें क्या मालूम कि यह सिर्फ जगह नहीं है। यहां तो प्यार की खुशबू है। ये प्यार की खुशबू तुम्हारे जीवन में है ही नहीं। आनंद हां कुछ गंध है। पर क्या वो प्रेम की है? हम प्रेम की पहचान तो बड़ी सीधी होती है।

53:21 मुक्ति देता है। जो बांध कर रख रहा हो वो प्रेम के अलावा और कुछ होगा। 50 तरह के नाम हो सकते हैं उसके। प्रेम नहीं होगा। लेकिन हम जब भी कोई बोले कि अंतर्द्वंद है फंसा हुआ हूं। तो वह किस में अपना यकीन दिखा रहा है? द्वैत में। वो कह रहा है ना कि एक पक्ष है और दूसरा भी। पर सत्य दो होते हैं क्या? सत्य तो एक ही होता है। आप कह रहे हो मैं दो में फंसा हूं। दो में फंसे हो। तो या तो इधर सत्य होगा, इधर असत होगा। या फिर इधर भी असत होगा और इधर भी असत होगा।

54:06 आप असत को पकड़े बैठे हो? और सहानुभूति मांग रहे हो। असत को पकड़ कर आप बैठे हो। आप कह रहे हो दो तरफ दो ताकतें दो आवाजें मुझे बुलाती हैं। पर सत्य की तो दो आवाजें होती नहीं ना। वो तो एक ही तरफ होगा। दूसरी तरफ जो होगा वो झूठ ही होगा। या फिर दोनों तरफ झूठ होगा। हंसना चुनाव है। समाप्त हो गया सब। उसके बाद आई बिल्कुल हो सकता है कि मोहिनी उठ खड़ी हो। ये सब खून

54:52 खच्चर देखे। आकर के घाव वगैरह साफ करे कपड़े बदलवाए। माथे पर चुंबन दे। और नंद को लगे कि इतना खून बहा सब सार्थक हो गया। इतना बढ़िया रोमांस और कैसे मिलता? तो बाबू ये चलता है। सहानुभूति मत बटोरो। वो पात्र था जो अभिनीत कर दिया मैंने। वो सचमुच मेरे सामने आ जाए तो उधेड़ दूंगा।

55:44 हम कहिए आचार्य जी एक केश काटने का भी प्रकरण था। तो जो नंद का कैरेक्टर है वह यह बात कहता है। हालांकि जब वह कहता भी है तो भी उसमें धूतता से दिखती है। लेकिन वो उसको बोलता ऐसे है कि यह बस बाहरी कर्मकांड है। इससे क्या ही हो जाना है। तो इसका वास्तविक अर्थ मैं आपसे समझना चाहूंगा कि अगर बुद्ध ऐसा करा रहे हैं तो इसका क्या अर्थ हो सकता है? देखो इन सब की जरूरत नहीं पड़ती है उनको जो अवधूत हो गए महाशिवरात्रि है अभी हम अवधूत के पास भी जाएंगे उन्हें नहीं पड़ती है पर जो भिक्षु है ना

56:30 वो समाज से बाहर नहीं गया है। वो भी समाज का एक विशिष्ट प्रकार का सदस्य होता है। वो भी समाज का ही एक सदस्य होता है। वो गांव-गांव शहर-शहर फिरता है, भिक्षा मांगता है। वो अभी जंगल पहाड़ नहीं निकल गया है। वो समाज में ही रहता है। एक अलग तरीके से रहता है। लेकिन रहता वो समाज में ही है। तो ये एक प्रकार का चिन्ह होता है बस ताकि लोग जब देखें तो आपसे दूसरे तरह की उम्मीदें ना करें। क्योंकि हम किसी के अंतर् जगत में घुसकर तो उसको पहचानते नहीं ना। हम तो वेशभूषा से ही अनुमान लगाते हैं कि इससे कैसा आचरण करना है और कैसी आशाएं रखनी है। तो यह बस बताने का एक तरीका है कि देखो

57:17 मुझसे वो आशाएं मत रखना। मैं तुमको अग्रिम में ही बताए दे रहा हूं। एडवांस में बताए दे रहा हूं कि मैं कौन हूं? नहीं तो फिर व्याहारिक उलझने आ सकती हैं। क्या व्यवहारिक उलझने आएंगी कि तुम मुझे देख के सोच रहे हो कि मैं इस काम में लग जाऊंगा उसमें लगूंगा या तुम ऐसी बात करोगे तो मैं उसमें साथ दूंगा तुम्हारा और तुम वैसी आशा रखो और अपनी आशा में तुम निवेश कर दो घंटे 2 घंटे या महीने दो महीने का और फिर तुम पाओ कि तुम्हारा निवेश व्यर्थ गया है तो फिर क्या होगा तुम आओगे मुझसे उलझोगे मुझ पर इल्जाम लगाओगे बात समझ रहे हो? वही बात भिक्षु आपसे बोले तो आप एक तरीके से लेते हो और वही बात

58:02 कोई दूसरा मनुष्य अगर आपसे बोले साधारण नागरिक गृहस्थ तो आप उसको दूसरे तरह से लोगे। तो इसका कोई पारमार्थिक महत्व नहीं है कि केश मुंडा दिए। कोई पारमार्थिक महत्व नहीं है। इससे कुछ नहीं हो जाने वाला। इस हद तक नंद की बात बिल्कुल ठीक थी कि बाल काटने से कोई क्या सत्य मिल जाना है। बात बिल्कुल ठीक थी। बाल काटने से सत्य नहीं मिल जाना है। ये एक समझिए कि मैनेजरियल प्रोसेस है। आज आप जैसे अपनी फर्म में होते हो तो क्या यहां पर चिपका कर चलते हो? अपना अपना आई कार्ड वगैरह लेकर चलते हो ना। उसी से आप स्वाइप भी कर लेते हो। हम उसी से स्वाइप भी कर लेते हो। तो ये जो भिक्षु

58:50 का घुटा हुआ सर होता था टकला उसको देखकर दूर से ही लोगों को पता चल जाता था वो आ रहा है खाना वगैरह तैयार कर लो भिक्षा दे देना वो उसका समझ लो कि स्वाइपिंग इन था बात समझ आ रही है उसका कोई पारमार्थिक महत्व नहीं है बस प्रैक्टिकल यूटिलिटी है व्यवहारिक लाभ हो जाता है समाज में ही रह रहे हो समाज के लोगों को सही संदेश जाता है तुमने ने पहले ही अपनी पहचान बता दी कि मैं कौन हूं। तुमने पहले ही अपनी पहचान बता दी कि मैं कौन हूं। लेकिन साथ ही साथ इसका दुरुपयोग भी करा जा सकता है। आप भीतर से कोई बहुत गड़बड़ आदमी भी हो सकते हो पर बाल बढ़ा भी सकते हो और बाल घुटा भी सकते हो और आप फिर

59:36 बाल बढ़ा करके या घुटा करके लोगों को भ्रमित कर सकते हो। लोगों को यह प्रदर्शित कर सकते हो कि मैं तो भिक्षु हूं या सन्यासी हूं या साधु हूं या कुछ और हूं। वह दुरुपयोग की बात हो गई। अभी हम यह बात कर रहे हैं कि बुद्ध ने व्यवस्था क्यों करी थी? बुद्ध ने जिस खातिर व्यवस्था करी थी वो यही बात थी और कुछ नहीं। इस पे एक और पूछ सकता हूं। आपने व्यवहारिक अर्थ बताया इसका कि बाल घुटा लिया तो लोग क्या एक्सपेक्ट करेंगे और ये सारी चीजें ताकि प्रैक्टिकली हमें हेल्पफुल हो वो आगे बढ़ने में। आपने तो इसका ठीक उल्टा किया हुआ है। हमें घर परिवार संसार सबके साथ छोड़ दिया है और ऊपर ही कुछ कर्मकांड वगैरह भी नहीं करने देते हो आप। साल में दो-तीन बार आप बुला

1:00:22 लेते हो जैसे महाशिवरात्रि आदित्सव पे बाकी हमें रहना वही है। तो ये चीजें कैसे कारगर साबित हो रही हैं? और दूसरा अह जो लोग धर्म के ठेकेदार बने बैठे हैं। जिन्होंने धर्म को अपने मुट्ठी में ले लिया है। वो यह सारे काम कर रहे हैं। उन्होंने वेशभूषा वैसी बना रखी है और वह पता नहीं क्या-क्या नई-नई चीजें कर रहे हैं और रोज नई-नई खबरें भी आती जाती हैं। क्योंकि भिक्षु के जब बाल घुट जाते हैं ना तो वो समाज के रह भीतर भी रह के अपना एक विशिष्ट कोना बना लेता है। मतलब है तो समाज के अंदर ही पर वो अलग कहलाएगा। क्या कहलाएगा कि अरे तुम तो भिक्षु हो। तुम्हें गृहस्थों का क्या पता? दो फाड़ बन गए ना समाज के भीतर और जब भी

1:01:10 दो फाड़ बनेंगे तब दूसरा बचा रह जाएगा। दूसरा अपनी अलग पहचान सुरक्षित कर ले जाएगा। मुझे आप पर ज्यादा भरोसा है। मुझे नहीं लगता कि आपको गृस्थों से अलग होने की जरूरत है। मुझे नहीं लगता अपने आपको एक भिन्न वेशभूषा में दिखाने की आपको जरूरत है। भिक्षु को लेकर हमने यही कहा ना कि अगर उसके बाल घुटे हैं तो लोग फिर खुद ही उससे मरदित व्यवहार करेंगे। यही कहा ना दूर से ही देख लेंगे अच्छा ये भिक्षु आ रहा है। चलो इससे अलग तरह का व्यवहार करो। शायद वो बात वैध और उपयोगी रही होगी बुद्ध के समय

1:01:56 में। मैं देखता हूं आज के समय में बिल्कुल उसके विपरीत की जरूरत है। मैं नहीं चाहता कि कोई आपकी वेशभूषा देखकर पहले ही सतर्क हो जाए और आपसे मरदित संस्कारित किस्म का व्यवहार करना शुरू कर दे। आप अपने बालवाल बिल्कुल घुटा लीजिए। आप यहां ग्रेटर नोएडा में सड़क पर निकल पड़ी है। हम देखिए चारों ओर से लोग आकर कोई पांव छुएगा, कोई कुछ करेगा। आप बहुत सारी डोनेशन लेके अपने घर पहुंच जाओगे। मैं चाहता ही नहीं कि वैसा हो। क्योंकि अगर मैं आपको कोई विशेष चिन्ह लक्षण वेशभूषा धारण करने की सलाह देता हूं तो उसमें मेरी यह मान्यता होगी कि मैंने

1:02:45 कर लिया स्वीकार आपकी कमजोरी को कि आपको जरूरत है अपने आपको अलग दिखाने की ताकि सामने वाला मर्यादा में रहकर सीमा में रहकर व्यवहार करे। मैं चाहता हूं जैसी ये खुली दुनिया है, जंगल है, इसमें पशु है, पिशाच है, जैसी भी है, इसमें आप बेधड़क उतरो। बिना किसी आवरण के, बिना किसी कवच के उतरो। क्यों आपको, क्यों आपको यह करना है कि दूर से ही आपको देख के कोई समझ जाए कि अरे अरे बाबा जी आ रहे हैं। नहीं। अगर मेरे भीतर होगी सच्चाई, अगर मेरे भीतर होगा साहस, अगर मेरे भीतर होगी स्पष्टता,

1:03:31 तो मैं प्रदर्शित कर दूंगा। तुम्हें कुछ जताने के लिए मुझे किसी खास किस्म के कपड़े की या दाढ़ी की या माला की या बिंदी की या बाल की जरूरत नहीं है। मेरी हस्ती काफी है। बात आ रही है समझ में कुछ? क्यों दिखाना है कि हम अलग हैं? आपके अलग होते ही वो जो दूसरा पक्ष है उसको वैधता मिल जाती है। वो कहेगा फिर कि तुम एक अलग जीवन इसलिए जी पा रहे हो ना क्योंकि तुम तो भिक्षु हो। और हम क्या हैं? हम गृहस्थ हैं। हम पे

1:04:19 जिम्मेदारी है। तुम तो भिक्षु हो। देखो तुम्हारे बाल घुटे हुए हैं। देखो तुमने ऐसे कपड़े पहन रखे हैं। देखो तुम ये करते हो वो करते हो। देखो तुमने ऐसा नाम रख लिया है। इसलिए तुम एक अलग जिंदगी जी पा रहे हो। पर हम तो तुमसे अलग है ना। हम तो तुमसे अलग है ना? हां ठीक है। तुम तुम क्लाइमेट फ्रेंडली जीवन जी पा रहे हो। क्योंकि तुम तो भिक्षु हो। हां ठीक है। तुम पशु क्रूरता के उत्पाद नहीं इस्तेमाल करते क्योंकि तुम तो पर हम तो हम क्लाइमेट फ्रेंडली जिंदगी थोड़ी जिएंगे। हम थोड़े ही फिर कहेंगे कि हां सोय और कोकोनट की चाय भी बढ़िया है। क्योंकि हम तो हम तो गृहस्थ हैं। तुम जितने भी अच्छे-अच्छे बात कर रहे हो, जितने भी अच्छे तुम काम कर रहे हो, वो तुम कर सकते

1:05:06 हो। तो तुम अफोर्ड कर सकते हो क्योंकि तुम तो भिक्षु हो और हम क्या हैं? मैं उनको ये कहने का मौका ही नहीं देना चाहता। मैं चाहता हूं आप उनके सामने खड़े होकर के बोले कि जैसे तुम गृहस्थ वैसे ही हम गृहस्थ और कौन कहता है कि जिम्मेदारी वास्तविक जिम्मेदारी वास्तविक प्रेम के साथ गृहस्ती नहीं निभाई जा सकती। कौन कहता है? क्योंकि अध्यात्म पर सदा से यही आरोप रहा है ना। अध्यात्म का क्या मतलब है? अच्छे-अच्छे काम करना। लेकिन दुनिया छोड़ के बहुत अच्छे-अच्छे काम करना लेकिन जंगल में जाकर के मैं चाहता हूं आप जंगल में जाकर के अच्छे-अच्छे काम नहीं करें। आप जिंदगी में ही रहकर अच्छे-अच्छे काम करें।

1:05:51 आ रही है बात समझ में? कोई जरूरत नहीं है अपने आप को अलग प्रदर्शित करने। क्या अलग क्या दिखा लोगे? वो भी बात सिद्धांतों के प्रतिकूल ही होगी। अलग क्या हो जाओगे? ये ये भी मिट्टी है और ये खून भी बाल घुटवा भी दो तो बाल के नीचे जो खोपड़ा है ये भी क्या है? मिट्टी और बाल भी क्या है? तो बाहर से तो अलग होना संभव ही नहीं है। अलग तो बस भीतर से हुआ जा सकता है इस अर्थ में कि किसी के भीतर वो कीड़ा बैठा होता है जिसको हम क्या बोलते हैं? अहंकार और कोई होता है जो उस कीड़े के मिथ्यात्व को देख लेता है। अलग तो बस भीतर से ही हुआ जा सकता है ना। बाहर से रूप परिवर्तन हो सकता है। आयाम परिवर्तन नहीं हो सकता। और

1:06:37 रूप परिवर्तित करके क्या मिलेगा? अभी मैं आपके सामने इस रूप में हूं। थोड़ी देर में किसी और रूप में आ जाऊं। उससे क्या फर्क पड़ जाएगा? पड़ जाएगा। तो यह जो रूप बदलने का खेल चला है अध्यात्म में परंपरा से यह कोई बहुत सफल खेल नहीं है। किस लिए चला था वो मैंने आपको बता दिया। किस लिए चला था? व्यवहारिक उपयोगिता थी उसकी कुछ। उसकी कुछ व्यवहारिक उपयोगिता थी इसलिए चला था। लेकिन वो व्यवहारिक उपयोगिता ना जाने कब के पीछे छूट गई। अभी बस पाखंड बचा है। पाखंड कुछ शब्दों का उच्चारण शुरू कर लो। माला कंठी कुछ धारण कर लो। ना लोगन राम खिलौना जाना हम माला तिलक पहन मनमाना अब तो तो वो जो उपयोगिता रही होगी

1:07:26 वो बहुत पीछे छूट गई अब वो सब बस पाखंड का तरीका है उसकी कोई जरूरत भी नहीं है जरूरत छोड़ दो वो चीज अब हानिप्रद है कि आपसे आप जितने सोचो यहां बैठे हो सब सफेद कपड़े पहन के बैठ गए हो कितना अजीब लगेगा मैं यहां से रंग लेकर फेंकना शुरू कर दूंगा। अरे प्रकृति में एक ही रंग है क्या? इतने रंग है ना? क्या समझा था हमने गीता में? जहां भेद नहीं है वहां भेद ना करना भी विवेक कहलाता है। विवेक माने सिर्फ अंतर करना नहीं होता। हम सोचते हैं विवेक माने अंतर करना। सत असत

1:08:14 में अंतर करने को विवेक कहते हैं। यह अधूरी बात है। जहां अंतर है ही नहीं वहां अंतर ना करने को भी विवेक कहते हैं। सफेद और काले में क्या अंतर है मूलत? कभी सफेद पहन लो, कभी काला पहन लो। इसमें क्या हो गया? कभी पजामा पहन लिया, कभी पतलूून पहन ली। कभी कुछ पहन लिया। तुम्हारी मर्जी है। बाल लंबे रखने रख लो कभी बाल घुटाने घुटा लो कभी। मर्जी है। साड़ी पहननी है। स्कर्ट पहननी है। मर्जी है। इसमें कौन सा अध्यात्म घुसाएगा? तुम्हारी मर्जी है। इसमें साड़ी भी आग लगा दो जल जाएगी। सड़ जल जाएगी। उसमें तुम कौन सा बड़ा भारी तुम भेद स्थापित कर रहे हो। जहां भेद है फिर वहां भेद दिखना बंद हो जाता है। जब जहां भेद है ही नहीं वहां

1:09:00 फालतू ही भेद खड़ा करोगे तो जहां सचमुच भेद है वहां भेद फिर नहीं दिखेगा। अध्यात्म बस किसी गुट की चीज बना दें कि यह सब जो बैठे हैं हजारों ये तो सब गृहस्थ हैं और वो जो पांच जने वहां बैठे हैं कुल वो भिक्षु हैं। तो फिर पांच जनों की चीज रह गई अध्यात्म। वो सब सर घुटाए बैठे हैं टकले और यह सब यहां पर बढ़िया चोटीधारी केशधारी हैं। तो फिर तो अध्यात्म कितनों तक सिमट कर रह गया? पांच तक क्यों सिमटाएं? सबके लिए है।

1:09:48 किसी को बाल रखने हैं लंबे बेशक रखो। कौन रोक सकता है? किसी को नहीं रखने मत रखो। कोई नियम की बात थोड़ी है। प्रकृति की बात है। पेड़ों पर कभी फूल खिलते हैं और कभी पत्तियां भी झड़ जाती हैं। पेड़ भी अपना पहनावा बदलते रहते हैं। इसमें कौन सी बात है? हम कहिए आचार्य जी जब नाटक स्टार्ट हुआ था तो स्टार्टिंग में जो नंद का अहंकार था वो वैसा दिखाई दे रहा था जब गीता सत्र में लोग आते हैं जो स्टार्टिंग में जुड़ते हैं लेकिन सर जब वो लौट के आया तो बुद्ध बुद्ध को छोड़कर आया था तो लगा कि जरूर कुछ बात

1:10:34 तो समझ आई होगी तो शुरू शुरू में ये दिखाई पड़ रहा था कि शायद वो मटेरियल पोजेशन की वजह से छोड़कर आया है। अपने जो स्वार्थ हैं उनकी वजह से छोड़ कर आया है। थोड़ी देर बाद लगा कि शायद इस वजह से भी नहीं आया क्योंकि वो बीच में बोलता है कि जो मुझे चाहिए था वो तो मैं छोड़कर आ गया हूं। अंत में भी फिर एक ऐसा बिंदु रहा लगा कि शायद अभी कुछ बात बनी नहीं है। कुछ ऐसा है जो अभी छूट रहा है। बीच में ऐसा लगता रहा कि वो क्या है जो लंद को रोक रहा है बार-बार बुद्ध से जाने से। क्योंकि स्वार्थ वो मोहिनी का बोल रहा था कि मोहिनी की वजह से मैं आया हूं। फिर भी वो बहाना जैसा ही प्रतीत हो रहा था कि बहाना ही दे रहा है। और ज्यादातर हमारे साथ भी ऐसा ही होता है। हम मटेरियल का मतलब हम जो बहाने देते हैं हम जो अपनी मजबूरियां बताते हैं वो भी ऐसे होते हैं वो सिर्फ बहाने जैसे ही दिखते हैं। फिर भी अंत में

1:11:21 कुछ ऐसा बिंदु समझ नहीं आया कि वो क्या था जो नंद को बार-बार रोक रहा था। कुछ नहीं कुछ नहीं था। देखो बुद्ध वगैरह ना सब दूर से प्यारे लगते हैं। दूर से प्यारे लगते हैं। ठीक है? अभी भी आप देखोगे तो यहां पर वो नहीं गया है बुद्ध के पास। बुद्ध आए हैं उसके द्वार। उसको खींच कर ले गए हैं। यहां पर बुद्ध आपको सिर्फ मसीहा की तरह नहीं मिशनरी की तरह दिखाई दे रहे हैं। बुद्ध ने भी पूरी एक प्रक्रिया चलाई है उसको बुलाने की। असल में जो नाटक है वह बताता है कि पूरा जो शहर ही है बुद्ध के पास जा चुका है। बस मोहिनी के कारण नंद नहीं गए और मोहिनी खफा

1:12:07 भी है क्योंकि मोहिनी ने उसी दिन जिस दिन बुद्ध बड़ी सभा कर रहे हैं। मोहिनी ने उसी दिन अपना उत्सव रख लिया है। उसने बहुत तरह की मदिरा मंगवा ली है। व्यवस्था कर ली है। उसके आगे वहां उसने उसके पास बड़ा सरोवर है। वहीं से आए लहरों के राजहंस। उसमें राजहंस रहते हैं। वहां उसने बढ़िया शाम की पार्टी की व्यवस्था करी है। सब लोग आएंगे बढ़िया होगा ये सब होगा। पर फिर अब दोपहर हो रही है और उसको खबरें आ रही है कोई नहीं आने वाला उसकी दावत में। क्यों? क्योंकि आज ही शाम को बुद्ध ने अपना उपदेश रख दिया है और सारे लोग वहां जा रहे हैं। तो ऐसा ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि बुद्ध को ये खबर थी कि पूरा शहर तो मेरे पास आ रहा है पर शहर का एक महत्वपूर्ण व्यक्ति मेरे पास नहीं आ रहा। तो बुद्ध खुद उठकर

1:12:55 आए हैं उसको ले जाने के लिए। बुद्ध खुद उठकर आए हैं। अनुमान आए हैं और इसीलिए वहां खड़े हुए हैं। भिक्षाम देही बोला है। पर जब वह भिक्षा देने गया तो ली नहीं है। जैसे इशारा करके चले गए हो कि अब तुम्हें आना है। तो तो बुद्ध आए उसको ले गए। उसके भीतर अपने भीतर कोई विशेष प्रेम नहीं था बुद्ध के लिए। ठीक है? दूर-दूर से बोलना अच्छा लगता है। हां बुद्ध हैं। बड़े महान है। बुद्ध इतने ही अच्छे होते तो क्या वो प्रतीक्षा करता कि बुद्ध आएंगे तब जाऊंगा उनके पास। वो पहले ही उठकर ना चला गया होता। समझ में आ रही है बात? तो आधा अधूरा सा है गुनगुना सा मामला।

1:13:43 कोई विशेष सम्मान, कोई विशेष प्रेम बुद्ध के लिए आरंभ से ही नहीं है। पर ठीक है। एक आकर्षण है। जैसे कि शुरू में कहते हैं ना अरे वाह। बुद्ध की वो सलोनी आकर्षक मूर्ति। इतने सुंदर लग रहे थे। बुद्ध खड़े हुए। खड़े हो गए हैं एकदम स्थिर। और मुझसे क्या कह रहे हैं? भिक्षाम देह तो आकर्षण है। व्यक्तित्व का आकर्षण तो ये जाता है। अब दूर-दूर से तो मामला फिर भी आकर्षक लग रहा है। समझना पहली बात हमने कही कि कोई गहरा प्रेम नहीं है। गहरा प्रेम होता तो बुद्ध के आने की प्रतीक्षा नहीं करता। वो खुद ही पहले ही चला गया होता। वो तो बुद्ध ने इतनी मेहनत करी कि नंगे पांव चल के अपने विहार से इसके महल

1:14:28 तक आए। तब जाकर के यह बंधु निकले हैं बुद्ध के पास जाने के लिए। ये कोई अपनी स्वेच्छा से थोड़ी जा रहे थे। बुद्ध ने जान लगाई है इनको खींचने के लिए। खैर ये जब बुद्ध इनके पास आ गए तो इनको भीतर थोड़ी जिम्मेदारी अनुभव हुई कि मुझे भी जाना चाहिए। तो वहां पहुंच गए। दूर से तो फिर भी बुद्ध अच्छे लग रहे थे। जब पहुंच गए तो वहां पर जो बातें हो रही हैं आपने सुना होगा जो दूसरा प्रकरण था कि बड़ी देर तक बैठे रहे। जो वहां बातें हो रही हैं वो बोझ की तरह लगने लगी। असहनीय लगने लगी। बुद्ध धर्म अधर्म पर उपदेश दे रहे हैं। काम अकाम पर उपदेश दे रहे हैं। त्याग और ग्रहण की बात कर रहे हैं। बुद्ध के सामने बैठकर के वो बातें सुनना एकदम

1:15:15 जैसे कोई बोझ आ गया हो। जैसे किसी ने जकड़ लिया हो। जैसे कोई गिरफ्त में ले रहा हो। हम तो इसीलिए सुनते हो कि बोलते हैं कि मेरा तो शुरू में ही हुआ कि उठ के भागूं पर साहस नहीं हुआ। मुझे तो शुरू में ही लगा कि अरे मैं क्यों आ गया यहां पे यहां से भागो। कुछ खतरा है यहां पर कुछ खतरा है। क्या खतरा था? कुछ नहीं। यही था। अपनी कामना को अपने स्वार्थ को खतरा था। और क्या खतरा था? असल में जब आप नाटक पढ़ेंगे तो उसे पता चलेगा कि क्योंकि शाम को दावत थी। तो मोहिनी आज अपना एक विशेष श्रृंगार करना चाहती थी। वह सब जो आभूषण वगैरह रखे हुए थे ना मोहिनी विशेष और जिस जो विशेष श्रृंगार करने वाली सेविका थी वो खुद

1:16:03 बुद्ध के यहां निकल गई थी। तो अब मोहिनी के पास कोई बचा नहीं था जो उसका श्रृंगार भी करे और वो बहुत विशिष्ट तरह का श्रृंगार करती थी। वो यहां पर सूर्य बनाती थी। उसके चारों ओर नक्षत्र बनाती थी। यहां बाजुओं पर अपने कुछ-कुछ लगवाती थी। सब करती थी। तो मोहिनी ने इनसे कहा था कि मैं फंस गई। लोग आ रहे हैं शाम को। मेरे पास तो कोई है नहीं जो मेकअप भी करें मेरा। तो इन्होंने वादा करा था कि तुम्हारा मेकअप मैं करूंगा। अब समझ लो कि किस बात की इनको इतनी जल्दी थी। खेल सारा ये था। बंधुवर को जल्दी लौटना था। मोहिनी का मेकअप करने के लिए अपने हाथों से। तो वहां गए, वहां बैठ गए। वहां पर बुद्ध वहां पर उपदेश दे रहे हैं। जीवन दुख है।

1:16:52 दुख कामनाओं से आता है। कामनाओं को छोड़ने के लिए अष्टांग मार्ग पर चलो। और आप इधर-उधर देख रहे हैं तो कहां यहां पर मोहिनी और वहां सब कौन बैठे हुए हैं? चारों और वही वही बैठे हुए हैं। दम घुट रहा है कि भागो यहां से। वहां मोहिनी प्रतीक्षा कर रही है कि ये आकर के मुझे श्रृंगार करेगा। ये सब करेगा और यहां ये सब घेर के बैठ गए हैं। पर बुद्ध ने भी ठान रखी। बुद्ध बोलेगा चलो तुम अंदर चलो। यहां सब लोगों के सामने अंदर ले गए वहां और सिर्फ भिक्षु मौजूद। बोले एक को दीक्षा दे दो। खेल खत्म करो इसको। दीक्षा देना भी दो वजहों से हो सकता है।

1:17:38 पहली तो वजह होती है व्यवहारिक। व्यवहारिक वजह यह होती है कि बुद्ध को भी एक मिशन चलाना था और उसके लिए बहुत जरूरी था। कि जो गणमान्य लोग हो जिनका रुतबा हो रसूख हो जिनके पास पैसा हो ताकत हो जिनके पास सत्ता हो महल हो वो लोग भी बुद्ध के संघ में जुड़े अगर वो बुद्ध के संघ में नहीं जुड़ते तो बुद्ध का काम फैलता नहीं एक तो व्यवहारिक बात है कि बुद्ध स्वयं क्यों चाहते थे कि इस व्यक्ति को अपने संघ में दीक्षित करें और दूसरी एक और बात बुद्ध अगर वास्तव में बुद्ध है तो उनको यह भी पता है कि यह व्यक्ति अभी भीतर से तैयार है नहीं दीक्षा के लिए उनको दिख रहा है

1:18:24 ये भीतर से तैयार है नहीं दीक्षा के लिए पर बाहर से यह ऐसे दर्शाना चाहता है जैसे मेरा यह बड़ा प्रेमी हो तो इस झूठ का पर्दाफाश करने के लिए भी बुद्ध ये कह सकते हैं कि ले लो ना दीक्षा जैसे ही कहूंगा दीक्षा ले लो वैसे ही तुम्हारी पोल खुल जाएगी वैसे तो बहुत बन रहे हो क्या बोलने का? भगवान मेरा आतिथ्य स्वीकार करिए। आइए मेरे महल में रहिए। मैं आपके चरण धोके पूंगा और मेरी पत्नी तो आपकी पुरानी प्रेमिका है। आप जरूर आइए। अब ये सब बोल रहे हो। अच्छा मुझसे इतनी प्यार करते हो तो चलो ना दीक्षा ले लो। और जैसे ही बोला दीक्षा ले लो। जैसे ही बोला दीक्षा ले लो।

1:19:11 तो यह ज्ञानियों के तरीके भी होते हैं पोल खोलने के। बिल्कुल संभव है कि बुद्ध को पहले से ही अनुमान हो कि जैसे ही इसको दीक्षा को बोलेंगे ये भाग जाएगा। पर वो उसको यही दिखाना चाहते थे कि तू झूठा आदमी है। ऊपर ऊपर की बातें करने के लिए तैयार है। जैसे ही बोलूंगा कि तुझे इतना ही प्यार है अगर मुझसे तो आ जा ना मेरे संग में आ जा। जैसे ही बोलूंगा वैसे ही भाग जाएगा। समझ में आ रही है बात यह अभी आज ही सुबह की बात है देवी जी का संदेश आया बोली कि संस्था से कॉल आई कि आपके साल भर से ऊपर हो गया आप ये ₹1200 करती रहती हो कुछ तो करिए ये करिए बढ़ाइए तो मैंने कहा कि नहीं मैं कुछ नहीं कर सकती हूं और वो तो मुझे आचार्य जी से

1:19:57 प्रेम है मैं इसलिए गीता सत्य सुनती हूं मेरे पास कुछ भी नहीं है एकदम पैसा नहीं है आप लोग डोनेशन के लिए फोन करते हैं आप लोग क्यों फोन करते हैं मैं प्रेम के नाते आई हूं आप डोनेशन के के लिए फोन कर रहे हो। तो जो फोन कर रहे थे उन्होंने कहा आप कितना कमाती हैं कि आप नहीं दे पा रही हैं। तो उन्होंने अपनी एक आय बताई। बोली मैं इतना ही कमाती हूं। तो इसलिए मैं यह ₹100 से ऊपर कुछ नहीं कर सकती। उन्होंने कहा एक काम करिए फिर। आप संस्था आ जाइए। आप जितना कमा रही हैं उससे तीन गुना मिलेगा। और इतना ही नहीं। फिर आपको इतना ही नहीं है। फिर आपको गीता समागम के लिए किसी प्रकार का कोई अनुदान भी नहीं देना पड़ेगा। फिर तो आप संस्था की सदस्या हो गई। आ जाइए आइए।

1:20:45 बोली नहीं वो ऐसा वैसा मेरे घर में जिम्मेदारियां है ऐसा नहीं आ सकती। हम आपको घर से काम करने का मौका दे रहे हैं। वर्क फ्रॉम होम दे रहे हैं विद ट्रिपल सैलरी। नहीं। अच्छा बताइए डोनेशन कितनी देनी है? कुछ भी मंजूर है। पास आना मंजूर नहीं। ये बात समझो। दूर से प्यार जताना आसान होता है। इतना ही प्यार है तो आ जाओ ना भीतर। यही दिखाना था बुद्ध को नंद को।

1:21:38 आ रही है बात समझ में हम तुम ज्ञानी माने क्या समझते हो कि बस ऐसे ही बैठा रहता है। ज्ञानी माने वो जो चतुराई के भी पार निकल गया है। जिसके सामने तुम चतुराई खेलते हो और तुम्हारी चतुराई को बिल्कुल ऐसे आरपार देख लेता है। उसे बोलते हैं ज्ञानी। तुम उसके साथ चाल चलते हो। तुम जो बोल रहे हो वो भी सुन लेता है। तुम जो छुपा रहे हो वो भी सुन लेता है। प्रणाम आचार्य जी।

1:22:24 मुझे दीक्षा लेनी है मतलब कैसे हुआ उसके लिए क्या करना होगा मोहिनी को लेके आओ साथ मैं तुम्हें दीक्षा देने लगूं और फिर तुम भाग जाओ और भाग ही नहीं जाओ इस तरह के किसी मंच पे आके चिल्ला चिल्ला करके मेरा अपमान करो कि केश काटने से क्या होगा जबान काट दो गर्दन काट दो, टांग काट दो। तो वो बड़ी गड़बड़ होती है। ये जो लोग आधे अधूरे अंदर आ जाते हैं ना मैंने भी यह गलती अतीत में खूब करी है। आधे अधूरों को अंदर ले लिया है। जो आधा अधूरा अंदर आया है वो भागेगा और जब बाहर जाएगा तो वो फिर खूब बदनामी भी करेगा। उल्टा पुल्टा बोलेगा

1:23:10 और विरोध में काम करेगा। तो मैं यह नहीं कह रहा कि तुम जब बिल्कुल एकमत हो जाओ, सहमत हो जाओ, तभी आओ। मैं तो बस ये कह रहा हूं कि जिसकी खातिर बाहर भागने की नौबत आने वाली है पहले उसको साथ लेके अंदर आओ। बुद्ध की जो अपनी अंतरंग मंडली थी उसमें बहुत कम लोग थे। जिसको आप उनका इनर सर्किल बोलोगे ना बहुत

1:23:55 कम लोग थे। इसलिए नहीं कि बुद्ध बहुत कड़ाई से चुनाव वगैरह कर रहे थे। कड़ाई बुद्ध की ओर से नहीं थी। बुद्धों की संगति झेली नहीं जाती। तुम कोई ना कोई बहाना बनाओगे और जब दूर जाओगे तो यह तो नहीं बोलोगे कि तुमसे झेला नहीं गया इसलिए दूर जा रहे हो। तुम सदा दूर जाने के पीछे कारण यही बताओगे कि बुद्ध में कोई खोट थी। जैसे ये महाशय क्या कर रहे थे? बुद्ध ने यह गलती कर दी। बुद्ध ने वो गलती कर दी। बुद्ध ने ऐसा क्यों कह दिया? तो इसलिए आप पाते ये हो कि उनके निकट जो

1:24:42 आते भी हैं उनमें से ज्यादातर टिकते नहीं। आप लोगों की मासूमियत इसमें है कि आप कहते हो अरे कोई इतना पास होकर भी चला कैसे जा सकता है? हर महीने यहां से भी जाते हैं 20-50 लोग। जो पास है उसी के जाने की संभावना ज्यादा हो जाती है। भाई आप क्यों नहीं समझ रहे हो? तथ्य आग की तरह होता है। उसके पास बहुत देर तक नहीं बैठा जा सकता। या तो भस्म हो जाओ या दूर उड़ जाओ। पास बैठोगे तो बड़ी पीड़ा होगी। वही पीड़ा जो आप में से बहुतों को झेलनी पड़ रही है। वही पीड़ा जिसके लिए कबीर साहब ने कहा था कि बिरहिन ओधी लाकड़ी

1:25:29 उसके और धुआए। हम छूट पड़े या विरह से जो सली जली जाए पूरे ही क्यों नहीं जल जाते या फिर पूरी तरह दूर निकल जाओ जैसे गीली लकड़ी होती है ना ओधी लकड़ी ओधी लकड़ी गीली लकड़ी जो ना तो जल रही है ठीक से ना बुझ ही पा रही है बस उसमें से धुआं निकल रहा है धुधुक धुधुक तो उसके लिए क्या बोल रहे हैं कि इस पूरी व्यथा से मुक्त हो जाओगी। पूरी ही जल जाओ। सत्य के निकट आने जैसी कोई बात नहीं होती है। या तो तुम उसमें समा जाओगे या उससे

1:26:14 छिटक जाओगे। निकट जैसा कुछ नहीं होता कि तुम कहो कि हम निकट हैं। एक ऑर्बिट में हैं आसपास। ऑर्बिट कुछ नहीं होता। उसका ग्रेविटेशन इतना तगड़ा होता है कि वो सारे ऑर्बिट अपने में खींच लेता है। आप लोग चाहते हो कि ऐसे वही ग्रहों की तरह अपनी कक्षा में गोल-गोल घूमो कि पास भी हैं और दूर भी हैं और इक्विलिब्रियम में ग्रेविटेशनल सेंट्रिपेटल बिल्कुल बराबर कर रखे हैं और दनदना के घूम रहे हैं। वह जड़ पदार्थ में चल जाता है। सत्य के साथ तो यही है कि भला हो तुम्हारा कि तुम्हें पता ही ना चले

1:27:01 कि सच क्या है, झूठ क्या है? क्योंकि सच पता लगने लग गया। उसके बाद जिंदगी में पीड़ा बहुत उठती है। और उस पीड़ा से बचने के दो ही तरीके होते हैं। या तो पूरी तरह सच्चाई में डूब जाओ या फिर मदिरा में डूब जाओ। जो भाई साहब कर रहे थे। बुद्ध को छोड़कर मदिरा में डूब रहे थे। दूर निकल जाओ। ये चेतावनी भी है उनको जो निकट नहीं आ रहे वो बहुत समय जो जो जो निकट भी नहीं कह रहा हूं। जो डूब ही नहीं जा रहे। जो डूब ही नहीं जा रहे वो बहुत समय तक निकट भी नहीं रह पाएंगे। उनकी व्यवस्था हो जाएगी। उन्हें

1:27:47 भागना पड़ेगा। वह कहेंगे भाग करके भले जंगल जाना पड़े, जंगली जानवरों से खुद को चिरवाना पड़े वह भी स्वीकार है। बुद्ध नहीं स्वीकार है। बुद्ध की संगति जंगली जानवर के पंजों से भी ज्यादा घातक लग रही है। हम

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