बच्चों को बार बार पीटना गलत है - आचार्य प्रशांतजी #education #spritual #motivation #success 🎯🙏

संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो माता-पिता, विशेष रूप से माताओं की भूमिका और बच्चों के साथ उनके व्यवहार पर केंद्रित है। इसमें चर्चा की गई है कि कैसे माता-पिता घर और सामाजिक दबाव के कारण बच्चों पर फ्रस्ट्रेशन निकालते हैं, जिससे बच्चों को शारीरिक और मानसिक चोट पहुँचती है। आचार्य जी यह भी बताते हैं कि माता-पिता की मानसिक परिपक्वता के बिना बच्चों का पालन-पोषण करना कितनी बड़ी चुनौती है।

  • माता-पिता का तनाव बच्चों पर शारीरिक और मानसिक प्रभाव डालता है।
  • माताओं की मानसिक परिपक्वता का बच्चों पर गहरा असर होता है।

माता-पिता का तनाव और बच्चों पर इसका प्रभाव

वीडियो में आचार्य जी चर्चा करते हैं कि अक्सर माता-पिता, खासकर माताएं, अपने व्यक्तिगत तनाव और घर के दबाव को बच्चों पर उतार देती हैं। यह समस्या तब बढ़ जाती है जब वे बच्चों पर बिना किसी कारण के चिल्लाते या उन्हें डांटते हैं, जिससे बच्चों को मानसिक और शारीरिक नुकसान होता है। आचार्य जी के अनुसार, वैश्विक स्तर पर लगभग 60% बच्चे जो 2 से 14 वर्ष के हैं, शारीरिक दुरुपयोग का सामना करते हैं।

माता की मानसिक परिपक्वता

आचार्य जी बताते हैं कि कई माताएं खुद अपनी समस्याओं से जूझ रही होती हैं और उन्हें खुद को समझाना मुश्किल लगता है। वे अपने बच्चों की परवरिश करने में नासमझी का प्रदर्शन करती हैं। इससे माता का दिमागी तनाव बच्चे के विकास को प्रभावित करता है और हिंसा को जन्म देता है। यदि माताएं अपने अंदर सही दिशा में विकास नहीं करतीं, तो वे बच्चों को समझने और उनके साथ सामंजस्य बैठाने में असमर्थ रहती हैं।

समाज और बच्चों की स्वस्थ परवरिश

कम्प्यूटिंग से जुड़ी समस्याओं या सामाजिक अपेक्षाओं के कारण, माताएं समाज और परिवार के दबाव में बच्चों पर भड़क जाती हैं। आचार्य जी का कहना है कि माता-पिता को अपने बच्चों को सही तरीके से सिखाने की आवश्यकता है, न कि उन्हें शारीरिक दंड देने की। अगर बच्चों का पालन-पोषण सही तरीके से नहीं किया गया, तो वे हिंसक या दुविधाग्रस्त हो सकते हैं।

बच्चे की प्रारंभिक विकास

किसी बच्चे के जीवन में पहले 7 साल बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इस अवधि में, बच्चे की मानसिकता और व्यक्तित्व का विकास होता है। आचार्य जी बताते हैं कि यदि बच्चे को इस समय के दौरान हिंसा का सामना करना पड़ा, तो उसके भविष्य पर इसका गहरा असर पड़ सकता है।

भावनाओं और हिंसा ने परवरिश को कैसे प्रभावित किया

वीडियो में आचार्य जी बच्चों की परवरिश में भावनात्मक हानि और हिंसा के प्रभाव पर बात करते हैं। वे बताते हैं कि हिंसा केवल शारीरिक दंड नहीं है बल्कि यह बच्चों के मानसिक विकास में बाधा डालती है। बच्चों को सही तरीके से समझाने की बजाय, जब हम उन्हें दंडित करते हैं, तो इससे उनकी भावनाएं कुंठित होती हैं। यह सब समाज में मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों को जन्म देता है।

शिक्षा और ज्ञान का महत्व

आचार्य जी कहते हैं कि माता-पिता को अपने बच्चों को सही शिक्षा देने की कोशिश करनी चाहिए। केवल हिंसा से समस्या का समाधान नहीं होता, बल्कि संवाद के माध्यम से बच्चों के साथ सकारात्मक रूप से जुड़ना आवश्यक है। बच्चों की सोच और संवेदनशीलता को समझकर उन्हें उचित शिक्षा देकर, उन्हें गहरे ज्ञान के साथ बड़े बनाया जा सकता है।

अवसाद और परवरिश का नासमझी

आचार्य जी यह भी स्पष्ट करते हैं कि कैसे माता-पिता की नासमझी और स्वयं की कुंठाएं बच्चों पर विपरीत असर डालती हैं। वे बताते हैं कि यदि माता-पिता खुद अपने बच्चों को जरूरत के समय सही मार्गदर्शन नहीं देते, तो इससे बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो सकता है।

परिवार में संवाद की आवश्यकता

अंत में, आचार्य जी परिवार में संवाद और बच्चे की भावनाओं को समझने की आवश्यकता पर जोर देते हैं। संवाद से माता-पिता और बच्चों के बीच की दूरी कम होती है और इससे न केवल बच्चों का सही विकास होता है, बल्कि परिवार में सामंजस्य भी बना रहता है।

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Transcript

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0:00 िंग को लेकर के खासतौर पे मां को लेकर के अक्सर देखा जाता है आचार्य जी जब भी माएं घर के दबाव में या अपने काम के दबाव में होती हैं तो सारी परेशानियां अपने बच्चों के ऊपर ही उतार देती हैं। चिल्ला करके कभी डांट करके सारा फ्रस्ट्रेशन निकालती हैं। कई बार तो बच्चे बहुत बुरी तरीके से पीटे भी जाते हैं। [अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] आचार्य जी, ग्लोबली 60% बच्चे जो कि 2 से 14 वर्ष के हैं। उन्हें पेरेंट्स के द्वारा या फिर केयर गिवर्स के द्वारा फिजिकल अब्यूज का सामना करना पड़ता है और वह भी रेगुलरली। ऐसा क्यों होता है आचार्य जी? ऐसा क्या हम में परिवार समाज का दबाव के चलते होता है? या फिर यह हम जो भावनाओं के प्रति नासमझी

0:48 है हमारी यह है। ऐसे में एक मां क्या करें आचार्य जी कृपया मार्गदर्शन करें। आपने पूछा ही ऐसा है कि मुझे बात खोल करनी पड़ेगी। आपने पूछा ऐसा क्यों होता है? अब कोई भी किसी को मारेगा कब? जब उबा हुआ रहेगा, चिढ़ा हुआ रहेगा, परेशान रहेगा, झुंझुलाया हुआ रहेगा तभी तो मारेगा ना। माएं बच्चों को मार रही हैं। मूल कारण तो यह है कि मां खुद अभी बच्ची है।

1:37 बिना किसी आंतरिक परिपक्वता के उसने औलाद को जन्म दे दिया है। अचानक से उसके हाथ में उसकी गोद में एक जीव आ गया है। हम एक चीज आ गई है जो जीती जागती है। मां भी जीव है और यह जीव कभी नहीं समझ पाया कि जीवन का खेल क्या है। इस जीव को अपनी ही हस्ती का कुछ पता नहीं। यह जो मां है तो यह जो उसके हाथ में चीज आ गई है जो अब देखभाल मांगती है, परवरिश मांगती है,

2:24 सुरक्षा मांगती है, उसकी कामनाएं हैं। कहती है पूरी करो, रोती है, चिल्लाती है। बात मानने से इंकार करती है। मां करे क्या उसका? मां तो खुद वो बच्ची है। जो कोई भी ढंग की बात मानने से इंकार करती रही है ना और मां को नहीं पता कि आपके भीतर क्या बैठा होता है जो अच्छी बात से भी इंकार करना चाहता है आपको इतनी अच्छी-अच्छी बातें बताई जाती हैं पर आप उनको मना करते हो नहीं मानते मां ने खुद कोई ढंग की बात नहीं मानी तो मां को नहीं पता कि भीतर कौन है और वो

3:10 क्यों मना करता है किसी भी अच्छी सलाह को वो क्यों विरोध देता है मां को नहीं पता तो बच्चे को भी वो कुछ बोलती है बच्चा मानता नहीं मां को नहीं पता सचमुच कि बच्चा क्यों नहीं मानता तो ले दे के मां के पास बस झुंझुलाहट फिर गुस्सा और फिर हिंसा बचती है कि लगा दो उसको चार तो मूल कारण तो देखिए यही है अब आप बाजारों [गला साफ़ करने की आवाज़] में निकल जाए, कहीं भी चले जाइए, किसी बेबी बूमर जगह पर चले जाइए। कहीं भी क्या चले जाइए, अपने घर में, अपने मोहल्ले में ही देख लीजिए। तो ये बेबी बूमर्स घूम रहे होते हैं।

3:57 हम तो उसमें कई बार होता है कि जो पुरुष आगे-आगे चल रहा होगा, वह तो फिर भी किसी उम्र का लगेगा। 25, 28, कई बार 30 का होगा। उसके पीछे पीछे एक महज लड़की आ रही होती है और उसकी गोद में बच्चा ना हो तो आप कहेंगे कि ये अभी तो ऐसे ही किसी कॉलेज में पढ़ती होगी। आप यह तक बोल सकती हैं अगर वो जो पीछे लड़की चली आ रही है उसको स्कूल ड्रेस पहना दी जाए तो आप कहेंगे कि यह स्कूली लड़की है। पर फिर आप देखते हैं तो उसकी गोद में बच्चा होता है। कई बार उसकी गोद में नहीं होता क्योंकि वो थोड़ा कमजोर सी होती है। तो पतिदेव की गोद में होता है और वो पीछे

4:43 पीछे चल रही होती है। और यह मैं कोई ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की या पिछड़े क्षेत्र के या अनपढ़ लोगों की बात नहीं कर रहा हूं। आप कहीं भी चले जाइए। मेट्रो में भी आपको यह नजारा देखने को मिल जाएगा। बड़े शहरों में। आप उस लड़की को देखिए। वो जो मां बन गई है। आप उस लड़की को देखिए गौर से। वो जो मां बन गई है उसकी शक्ल देखिए। वो किस कोण से एक नए प्राण को सींचने लायक दिखाई दे रही है आपको? उसके चेहरे पर अज्ञान है।

5:34 आंखों में अंधेरा है। वो अभी एकदम अविकसित है। भीतरी तौर पर शरीर से तो विकसित है। तभी बच्चा पैदा हो गया। एकदम अविकसित है। आप उससे आप आपने ना देखा हो बच्चा। आप उससे बात करें तो आप ऐसे कहेंगे बेटा इधर आना या बोर्ड्स की तैयारी कर रहे हो कैसे हैं कितने और यही नहीं कि आपको बस भूल हो गई है तो आपने उसको स्कूली या कॉलेज ही समझ लिया आप उससे बात करें उसकी बातें भी ऐसे ही होंगी बिल्कुल हवाहवाई बातें आप उससे दुनिया की चार बातें पूछिए उसको कुछ नहीं पता आप उससे विज्ञान का कुछ पूछ लीजिए आप उससे राजनीति का पूछिए कुछ खेलों का पूछिए

6:21 इतिहास का कुछ पूछिए समाजशास्त्र का मनोविज्ञान का दर्शन का उसे कुछ नहीं पता होगा। उसने जिंदगी में कुछ नहीं किया। बस झट से एक बच्चा पैदा किया लेकिन और बहुत बारी काम उसे दबाव में करा तो और क्या करेगी वो? अब वो यूं ही एक चीज निकल कर के सामने आ गई है। अब वो बच्चा है। वो बच्चा उसको समझ में नहीं आ रही क्या चीज है? क्यों है? कैसा है? मां बच्चे की जान खा रही है। बच्चा मां की जान खा रहा है। मां बच्चे को पीट रही है। बच्चे के पास ताकत नहीं है। नहीं तो वह पलट के मां को पीट देता। इनका आपसी रिश्ता ही ऐसा है। क्योंकि दोनों ही कुछ जानते नहीं। दोनों ही अभी बालक हैं।

7:10 एक एक अज्ञानी को आप एक पौधा भी दे दीजिए कि इसको बड़ा कर दो। उससे वो ना बड़ा हो। मनुष्य का शिशु तो बड़ी संवेदनशील वस्तु होती है। प्राणवान वस्तु होती है। अज्ञानी को तो आप प्राणहीन वस्तु भी दे दीजिए तो वो उसका भी बंटाधार कर दे। आप समझ रहे हैं कितनी बड़ी जिम्मेदारी होती है। एक एक इंसान की औलाद को जन्म देकर के उसका पालन पोषण करके परवरिश करके उसको एक सशक्त चैतन्य मनुष्य बनाना कितनी बड़ी बात कितनी भारी जिम्मेदारी होती है।

7:58 और यहां 20 साल 22-22 साल 24 साल वाली जिन्होंने जीवन में ना कोई पढ़ाई करी ना कुछ समझा ना कुछ जाना। वो धड़ल्ले से बेबी बूमिंग कर रही हैं। और मुझ पर कुपित ना हो। मुझे मालूम है। अभी कहा ही कि बहुत बार यह सब कुछ अज्ञान में तो अज्ञान दबाव में होता है। बस आसपास का चाल चलन देखकर होता है। घर वालों के धक्के खा कर होता है। कि अरे बेटा शादी के चार महीने बीत गए। अभी तक आपने बच्चा नहीं पैदा करा। सिर्फ थप्पड़ नहीं मारे जाते। अज्ञान में हम बच्चे की जान ले लेते हैं। पशु की जान बस उसके शरीर में होती है।

8:44 इंसान की जान तो अंतःकरण में होती है ना। जो इंसान भीतरी तौर पर विकसित नहीं किया गया मां-बाप के द्वारा उसकी तो जान ही ले ली गई। अब वो भले ही खड़ा हो जाए 6 फुट का हो के तो भी उसको मुर्दा ही मानो। जानवर अपनी पूरी लंबाई चौड़ाई हासिल कर ले तो हम कह देते हैं कि बढ़िया निकल आया। इंसान को हम थोड़ी कह देंगे बढ़िया निकल आया। सिर्फ इसलिए कि 6 फुट का हो गया है। उसमें प्राण भरने वाला उसमें ज्ञान सींचने वाला कोई होना चाहिए घर में या घर से बाहर कोई नहीं होता। तो 6 फुट का होकर भी वह

9:31 भीतर से प्राणहीन ही रहता है। और किसी को प्राणहीन कर देना मुझे बताइए हत्या है कि नहीं? प्राणवान को आप प्राणहीन कर दें तो इसको हम कहते हैं हत्या करी। और जो बच्चा संभावित रूप से प्राणवान हो सकता था उसको आपने प्राणहीन कर दिया तो इसको क्या कहें? पर खून बहता दिखाई नहीं देता तो किसी को सजा नहीं दी जाती। पशुओं के बाद अगर इंसान ने सबसे ज्यादा किसी के साथ अत्याचार करा है तो शिशुओं के साथ और दोनों में एक साझी बात है कि दोनों दुर्बल है, आश्रित हैं, कमजोर हैं। पशु और फिर शिशु दोनों ही कुछ बेचारे कर नहीं

10:18 सकते। तो हमने उनका इतना शोषण करा, इतना शोषण करा। क्या उसकी मां है चिबिल्ली बिल्कुल? ना कुछ उसको अनुभव ना ज्ञान ना जानती ना समझती वह उसको लेकर घूम रही है और घर में तमाम तरीके के तत्व हैं। सब अपने-अपने चौधरी बने हुए हैं। खासकर संयुक्त परिवार है तो वहां चाचा, ताऊ, फूफी, मामी, मौसी, बुआ सब लगे हुए हैं कि हम भी कुछ हैं। सब अथॉरिटी फिगर्स हैं घर के अंदर। और सब चढ़े बैठे हैं बच्चे पर और उस पर अपनेप प्रभाव डाल रहे हैं। इससे बड़ा अत्याचार क्या होगा? दुनिया भर के अज्ञानियों को मौका मिला हुआ

11:03 है बच्चे के ऊपर चढ़ बैठने का। यह जो बच्चों की मारपिटाई होती है, इसके बड़े घातक परिणाम होते हैं। साइकोलॉजिकल न्यूरोलॉजिकल दोनों तलों पर बच्चे का व्यक्तित्व हमेशा के लिए कुंठित हो सकता है उसकी जिज्ञासा मर जाएगी वो सवाल नहीं पूछ पाएगा या फिर वो हिंसक आक्रामक हो जाएगा कि मैं पिटा था अब औरों को पीटूंगा

11:50 एक सहज शांत निडर करुण व्यक्तित्व बनकर नहीं उभर पाएगा वो या तो दब्बू हो जाएगा अगर बच्चा घर में पिट रहा है तो या तो दब्बू बन जाएगा या खूंखार वही जो हम देखते हैं अपने देशवासियों की आम स्थिति ज्यादातर दब्बू हैं कुछ खंखार हैं जो दब्बुओं को दबाकर चलते हैं। बड़े होकर के बड़ी से बड़ी जो मनोवैज्ञानिक कुंठाएं होती हैं। फिर जो बहुत उच्च कोटि के साइकेट्रिस्ट

12:37 होते हैं। जब वो इन केस स्टडीज में जाते हैं कि चल क्या रहा है? चल क्या रहा है? और मनोवैज्ञानिक अध्ययन करे जाते हैं कि लाओ केस स्टडी है मुझे समझने दो कि क्या हुआ है बात तो ज्यादातर जो भीतर कॉम्प्लेक्सेस होते हैं उनकी जड़ जाकर के बचपन में निकलती है कि इसके साथ बचपन में ऐसा हुआ था और खूब हुआ था लंबे समय तक हुआ था तो इसका अभी चल रहा है काम ऐसा अब तो यह जानी बात है कि बच्चे के व्यक्तित्व का निर्धारण बहुत हद तक 7 वर्ष की उम्र तक हो जाता है जो बुनियाद के पत्थर हैं वो रख दिए जाते हैं 7 साल की उम्र तक उसके बाद आगे इमारत के रंग रोगन कम कमरे थोड़ा नक्शा ढांचा अलग हो सकता है आगे के अनुभवों के अनुसार पर बुनियाद तैयार हो जाती है और सात साल

13:24 की उम्र तक बच्चा अगर पिट रहा है तो अब वो पिटा हुआ जीवन ही जिएगा। कभी जब घर वाले बच्चों को पीट रहे हो तो आप वो दृश्य देखिएगा। हिंसा होती है। वो चिल्लाना, वो थप्पड़ों की आवाज कई बार तो लातें भी पड़ती हैं। कई बार बेल्ट भी चलती है। कई बार माएं होती हैं तो कुछ उठा के बेलन, कसला, छन्नी, कढ़ाई कुछ भी मार देती हैं। एक दूसरी दिशा से इसको समझते हैं। मारने

14:12 की जरूरत क्यों पड़ रही है? मैं बिल्कुल समझता हूं कि बच्चे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जो बहुत परेशान कर रहा है। तो आप उसे व्यवहार में परिवर्तन चाहते हो। यही तो चाहते हो। आप मां-बाप हो और बच्चा घर में ऐसा व्यवहार कर रहा है जो गड़बड़ है। पढ़ाई नहीं कर रहा है या खाना नहीं खा रहा है या खाना फेंक रहा है या अपने खिलौने तोड़ रहा है या बाहर कुछ गड़बड़ कर रहा है। वो कुछ तभी तो आप परेशान हो। उससे आप मां-बाप हो। आप परेशान हो बच्चे के व्यवहार से। अब व्यवहार बदलने के लिए दो बातें हो सकती हैं। या तो उसको जानवर समझो या उसको इंसान समझो। जानवर क्या होता है? गौर से समझिएगा। जानवर क्या होता है? देह मात्र। जो देह मात्र है वह पशु है। उसके पास कोई ज्ञान

14:58 नहीं है। उसके पास बस शरीर है। शरीर है और शरीर से उठती हुई उत्तेजनाएं हैं। शरीर से उठती हुई भावनाएं हैं। ये सब जिसके पास होता है वो जानवर होता है। तो मनुष्य वो होता है जिसके पास देह और भावनाओं से आगे जिसके पास ज्ञान होता है। चेतना होती है। वो मनुष्य होता है। आप अगर उसको पीट रहे हो इसका मतलब आप उसको मनुष्य नहीं मान रहे क्योंकि चेतना को परिवर्तित करने के लिए तो बात करनी पड़ती है। फिर समझते हैं बच्चे का व्यवहार ही तो बदलना चाहते हो ना आप तो व्यवहार तो तब भी बदल जाएगा अगर बच्चे की आप चेतना बदल दो कि नहीं बदलेगा? हां पशु के पास कोई खास चेतना होती नहीं। तो अगर आपको उसका व्यवहार बदलना है तो आपको उसके शरीर

15:43 के साथ ही कुछ खेल खेलना पड़ता है। आपके पास कुत्ता है आप उसे कोई व्यवहार सिखाना चाहते हो तो आप उसे कुछ खाने पीने का देते हो तो वो वो उस तरह का व्यवहार करने लग जाता है। है ना? या कि सर्कस में जानवरों को पीटते हैं उनको कुछ करतब सिखाने के लिए पशु का व्यवहार बदलने का और कोई तरीका नहीं है। उसको शरीर से संबंधित ही हम कुछ आपको या तो लालच देना पड़ेगा या दंड देना पड़ेगा तो पशु का व्यवहार बदलेगा क्योंकि पशु शरीर मात्र है। पर मनुष्य के पास तो चेतना भी है। आप बच्चे का व्यवहार बच्चे की चेतना को बदलकर क्यों नहीं बदल पा रहे? क्योंकि आप खुद पशु हो गए आप मां-बाप पर आप खुद पशु हो तो आप एक ही तरीका जानते हो

16:30 देह का उसी देह के तरीके से आपने बच्चा जन्म दिया है तो आगे भी आप देह का तरीका ही जानते हो कि इसकी पिटाई लगा दो या फिर कि इसको लालच दे दो। यह तरीके तो जानवरों के साथ अपनाए जाते हैं। इंसानों के साथ यह तरीके अपनाने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। और पड़े भी तो एकदम अंत में पड़े। कि जब पॉइंट ऑफ नो रिटर्न आ जाए किसी का तब उस पर शारीरिक तरीके लगाए जाते हैं। कि अब यह खुद ही इंकार कर रहा है कि इसे नहीं बदलना है। तो तब हम कहते हैं कि इसने अपनी इसकी चेतना बढ़ चुकी है कि नहीं बदलेगी। अब तो इस पर सिर्फ कोई शारीरिक विधि ही काम कर सकती है। पर बच्चा तो पॉइंट ऑफ नो रिटर्न पर नहीं पहुंच गया है ना। लेकिनकि आप सचेत नहीं हो तो इसीलिए आपको बच्चे की चेतना को उठाना

17:17 आता नहीं है। बच्चा का व्यवहार बदल जाएगा। आप उससे बात करो ना। आपको बात करनी लेकिन आती नहीं। क्यों? क्योंकि आपने भी कभी जिंदगी भर में किसी ढंग के आदमी की बात सुनी नहीं। आपने अच्छी किताबें पढ़ी नहीं। आप अच्छे लोगों की संगत में बैठे नहीं तो आपको पता ही नहीं है कि अच्छी बात का कितना गहरा प्रभाव हो सकता है। आपको बस ये पता है कि बात नहीं लात काम करती है तो आप लात लगाते रहते हो अपने बच्चों को। बात भी तो काम कर सकती है ना। बशर्ते आपको बात करना आता हो। बेटा तुम अपने खिलौने तोड़ रहे हो और यह बात गलत है। आओ मेरे साथ बैठो। थोड़ा

18:03 समझते हैं कि हम क्या कर सकते हैं। इन शब्दों को दोहराने की जरूरत नहीं है। पर जैसा भी आपका घर का माहौल हो उसके अनुसार इसी भाव में बात क्यों नहीं हो सकती है? कि जो तुम कर रहे हो ये ठीक नहीं है। आओ बैठो समझते हैं कि क्या कर सकते हैं हम। और उसी के मुंह से निकलवाइए कि बताओ क्या तुम्हें ये ठीक लग रहा नहीं ठीक लग रहा था तो बताओ कैसे बदले कहां पर क्या गड़बड़ हो जा रही है और मैं तुम्हारी कैसे मदद करूं कि यह चीज बदल जाए। मैं पूरी मदद करने के लिए तैयार हूं। बताओ कैसे मदद करूं तुम्हारी? ये थोड़ी कि बच्चे ने खिलौना तोड़ा आपने बच्चा तोड़ दिया। और आपको उसको कोई दंड देना भी है तो यह पहले से बता कर रखिए ताकि ये बात उसको

18:48 न्यायसंगत लगे। आपने अगर 8:00 बजे तक भी यह किताब पूरी नहीं करी या स्कूल का काम नहीं करा तो आप 8:00 बजे जाएंगे और पूरी सोसाइटी के दो चक्कर लगा के आएंगे। ठीक है ना? हां ठीक है। अभी 4:00 बज रहा है। बज रहा है ना चार? हां 4:00 बज रहा है। तो ठीक है। चलिए इसमें आप दे रहे हैं उसे शारीरिक दंड। पर कम से कम उसमें उसको हिंसा नहीं दिखाई देगी और अन्याय नहीं दिखाई देगा। आपने पहले ही बोल दिया है कि 8:00 बजे तक तुमने काम पूरा नहीं किया तो जाओगे और दो चक्कर पूरी सोसाइटी का लगाओगे। फिर हफ्ते हुए यहां पर आना। तो ठीक है। अब ठीक है। इसकी भी नौबत आनी नहीं चाहिए। पर नौबत आए भी कि उसे आपको शारीरिक रूप से ही कुछ दंड देना है। तो उसको ये नहीं लगना चाहिए कि हिंसा हुई है, अन्याय हुआ है। उसे स्पष्ट होना चाहिए कि बात क्या है।

19:38 यहां तो हालत यह रहती है घरों में कि बच्चे ने कई बार कुछ नहीं भी किया हो। मां को सास ने रगड़ दिया तो मां ने आकर बच्चे को रगड़ दिया। और बच्चा सोच रहा है मैं। मैंने क्या किया है? उसने कुछ नहीं किया पर उसने एक सीख ले ली है। किसी को किसी भी बात पर रगड़ा जा सकता है। छोटी मछली को बड़ी मछली खाती है। मैं जैसे-जैसे बड़ा होता जाऊंगा छोटियों को निगलता जाऊंगा। तुम बड़े बच्चे को छ साल वाले को जाकर के रगड़ दो। वो दो साल वाली छोटी बहन को जाकर रगड़ देगा। एक और पहलू है बहुत सारे बच्चे के व्यवहार जो आपको नापसंद होते हैं और जिसके लिए आप उसको

20:24 दंडित करना चाहते हैं वो व्यवहार उसने आपसे ही सीखे होते हैं। आप कहते हो छी कितना चुगलखोर हो गया है। अभी ना मेरी सारी बातें जाकर के ना यह मदर इन लॉ को बता आया। इसने मेरी चुगली करी सास के सामने पटाख और देवी जी आप जो फोन पर अपनी सास की चुगली करती हैं अपनी मां के सामने वो बैठ के वही सुन रहा होता है। उसने आपसे ही सीखा है। चुगली बांचना। झूठ बोलना भी उसने आपसे ही सीखा है। 100 तरीके के भावनात्मक प्रपंच करना भी उसने आपसे ही सीखा है।

21:10 तो आप करें तो बढ़िया और वो करें तो हम बच्चे को शिक्षा चाहिए बिल्कुल चाहिए और बच्चे का जो प्राकृतिक व्यवहार है हम बिल्कुल समझते हैं कि उसको बदलाव की जरूरत होती है। उसको सिखाओगे नहीं उसको उठाओगे नहीं उसका व्यवहार बदलोगे नहीं तो फिर मां-बाप किस काम के? बिल्कुल ये काम करना है। लेकिन उस काम को करने की आप में पात्रता तो होनी चाहिए ना। हम कहते हैं कि जितनी प्रजातियां हैं उनमें सर्वश्रेष्ठ मनुष्य योनि होती है। दंभ की बात है पर हम कहते ऐसे ही हैं। तो

21:55 चलो मान लिया सबसे सर्वश्रेष्ठ मनुष्य योनि ही है। तो उस सर्वश्रेष्ठ प्रजाति का आपको एक जीव मिल गया है आपकी गोद में। आपने कभी अपने आप से पूछा कि आप में योग्यता है उस जीव का पालन पोषण करने की? आपने पूछा कभी ये या आपको लगा कि जैसे गाय, भैंस सब बच्चा बछड़ा, पड़वा जन्म देती हैं और वो बड़े भी हो जाते हैं, वैसे ही आपका बच्चा भी बड़ा हो जाएगा। बहुत घरों में तर्क चलता है। खासकर जब और ज्यादा बच्चे पैदा करने की बात आती है, कहते हैं, अरे आने दो सब पल भड़ जाते हैं। देखो मुझको और तुम्हारे दादा जी को तो पता भी नहीं चला कि हमने कब 12 पैदा कर दिए।

22:43 हमें पता भी नहीं चलता था। हो जाता था। पर तुम सब बड़े हो गए ना। तो ऐसे ही बस हो जाता है। सब पल बढ़ जाते हैं। नहीं सब पल बढ़ जाते हैं पशुओं में। मनुष्यों में बच्चे को बड़ा करना एक प्रोजेक्ट होता है। एक भारीभारी भारी जिम्मेदारी का काम होता है। और वह जिम्मेदारी उठाने के लायक नहीं हो तो बच्चा मत पैदा करो। दुनिया की सारी समस्या उन बड़ों के कारण है जो कभी बच्चे थे ऐसे मां-बापों के जिनको बच्चे पालना नहीं आया। हम कहते हैं ना दुनिया के लोग सब अरे दुनिया कैसी है? लोग खराब हैं। यह जितने

23:30 खराब लोग हैं सब कोई कहते हो आप सब खराब हैं। 99% लोग चोर हैं, भ्रष्ट हैं। ऐसे हैं। यही कहते हैं ना हम तो ये 99% लोग कभी बच्चे थे। तो अगर ये बर्बाद हैं आज के लोग तो इसका श्रेय इनके मां-बाप को जाता है जो खुद बर्बाद थे पर बच्चा जरूर पैदा करा। और पहले एक व्यवस्था चलती थी। उस व्यवस्था में पूरा समाज प्रतिभागी नहीं होता था। पर कम से कम कुछ लोग उसमें रहते थे कि मां-बाप समझते थे कि शरीर से हमने जन्म दे दिया है। पर हम ऐसे नहीं है कि हम एक चैतन्य वयस्क युवा स्त्री या पुरुष खड़ा कर पाए। तो वो

24:16 उसको ले जाकर के गुरु को दे आते थे। घर से बहुत दूर और 25 साल तक वो बच्चा गुरु के पास ही रहता था। मां-बाप घर परिवार इन सब के संस्कारों से एकदम दूर कि घर का कोई प्रभाव कोई छाया बच्चे पर नहीं पड़ेगी। बच्चा अभी उसके साथ है। उसकी शरण में है जो बच्चे को बड़ा करना जानता है। और जब 25 साल का हो जाएगा तो फिर वो गुरु से विदाई लेगा और अपने घर वापस आ जाएगा। इसमें मुझे थोड़ी विनम्रता दिखाई देती है कि मां-बाप ये स्वीकार तो करते थे कि हम नहीं इसको बड़ा कर पाएंगे। इसको दे दो किसी दूसरे को जिसको कुछ ज्ञान हो कुछ समझ हो

25:01 तो अभी तो चलता है मां-बाप ही गुरु हैं भगवान है गुरु तो गुरु भगवान है मां-बाप ही भगवान है हम ही बता रहे हम बता रहे हैं ना वो करो तुम दुनिया भर की मां की बाप की कुंठाएं इनको जिंदगी में कोई इज्जत देने वाला नहीं कोई इन्हें सुनने वाला नहीं, कोई इन्हें गुनने वाला नहीं। चूल्हे देकर के घर में एक नन्ही सी जान इनको मिलती है। जाके उसके ऊपर चढ़ जाते हैं। दिन भर जाकर यह दुनिया की मालिश करते हैं। और लोगों के तलवे चाटते हैं। और जो सारी कुंठा है और गुबार है वो ले जाकर किसके ऊपर वो फोड़ देते हैं? बच्चे के ऊपर। कि किसी पर हमारा बस नहीं चलता।

25:48 पर यह जो ये जो चार साल का है इस पर तो बस चलता है ना इसको दबा कर रखेंगे वो फिर दब ही जाता है वो दब ही जाता है हमारी बात मानो बस ये बहुत है हमारे संस्कारों में हमारी लोकधर्मिता में ये खूब हो गया हमारी बात मानो नहीं मानोगे तो थप्पड़ मारेंगे तुम्हारी बात मानेगा तो सवाल कैसे करेगा देश में कहां से वैज्ञानिक पैदा होंगे बिना प्रश्न करे तो कोई समाज, समुदाय, राष्ट्र यह पूरा विश्व कोई भी किसी दिशा में आगे नहीं बढ़ सकता। हमारे यहां तो सवाल करे तो थप्पड़ दे दो उसको।

26:33 और खासकर अगर उसने कोई कचोटने वाला सवाल कर लिया है या फिर सवाल का झूठ-मूठ का कोई जवाब दे दो। ऐसे ही उसको कि और उसकी बुद्धि खराब कर दी। और अगर वह कहे कि आपने जो सवाल दिया है, आपने जो जवाब दिया है, वह तो ऐसे तो ठीक नहीं है तो उसको बोलो तुझे पाप लगेगा। ऐसे सवाल मत पूछा कर। ऐसे सवाल पूछना पाप होता है। अब इसमें कोई ताज्जुब है कि चाहे कला हो कि विज्ञान हो हम हर जगह पिछड़े ही नजर आते हैं। मेरे लिए आप सब भी बच्चे ही जैसे हो। हो ना? तो क्या करा करूं? बेल्ट लेकर आया करूं सत्र में। हंटर

27:26 जैसे आप अपने बच्चों को बेहतर बनाना चाहते हो। मैं आपको बेहतर बनाना चाहता हूं। ठीक है। आपकी उम्र मुझसे ज्यादा होगी। पर एक तल पर मैं उत्तरदाई हूं। आपको उठाने के लिए तो मैं बताओ क्या करूं? फिर तो हमें zूम नहीं बूम चाहिए। बिल्कुल हमें एक्टिव ऐप चाहिए थ्री डायमेंशनल। ऐप पर क्लिक करो और सीधे वहां से ऐसे मुक्का निकले। नोटिफिकेशंस नहीं आने चाहिए। गालियां

28:15 खुला मैदान होना चाहिए। वहां पर सब संस्था के लोग लगे हुए हैं। सब हंटर लेकर के और सब प्रतिभागी आते जा रहे हैं और धनाधन हंटर चल रहे हैं। ये देखो ये इनके परीक्षा में इनके 50% आए हैं। फटाफट हंटर पढ़ रहे हैं उनको। क्यों? तुम्हें क्यों ना पढ़े? तुम तुम्हारे बच्चों के कम नंबर आते हैं तो तुम अपने बच्चों को पीटते हो। गीता परीक्षा में तुम्हारे कम नंबर आए हैं। तुम्हें संस्था पीटेगी। तुम्हारे बच्चे स्कूल में नालायकी करते हैं। सत्र नहीं सुनते। तुमने कितने सत्र सुने हैं? बताओ कितने परसेंट अटेंडेंस है तुम्हारी? हम तुम्हें क्यों ना पीटे? है ना? स्वैग से करेंगे सबका स्वागत। जब यह नौबत आ जाए कि अब हाथ उठाना ही पड़ेगा।

29:02 तो दो बातें मानिएगा। या तो जिस पर हाथ उठाना पड़ रहा है वो पॉइंट ऑफ नो रिटर्न पर पहुंच गया है। पॉइंट ऑफ नो रिटर्न जानते हैं ना जहां चेतना अब इतनी गिर गई है। इतनी गिर गई है और गिरने के बाद भी इतना हर्ट कर चुकी है कि अब मुझे उठना ही नहीं है कि अब कुछ हो नहीं सकता। या तो वो पॉइंट ऑफ लीडर पे पहुंच गया। या फिर हाथ उठाने की घटना को अपनी नाकामी की तरह लीजिएगा कि मैं इसको समझा नहीं पाया। इसलिए मुझे शारीरिक दंड देना पड़ रहा है। उसको अपनी विफलता मानिएगा। आपको कोई एकदम ही दमित कुंठित व्यक्तित्व दिखाई दे हम तो उसको गौर से देखिएगा कहीं भी बाजार

29:47 में सड़क में कहीं भी दिखाई दे उसको गौर से देखिएगा और अपने आप से पूछिएगा इसकी परवरिश कैसी हुई होगी और तब आप में आक्रोश उठेगा ऐसे अभिभावकों के लिए जिन्हें पालना नहीं आता पर पैदा झट से कर देते हैं। उन्हीं अभिभावकों की नासमझी बल्कि बदतमीजी का नतीजा है। यह सारी जनसंख्या जो आपको दिखाई देती है। अशिक्षित, कुपोषित, पूर्वाग्रहों से भरी हुई, कभी दब्बू, कभी आक्रामक, कभी हिंसक,

30:33 अंधविश्वास से ग्रस्त। यह सब इनके मां-बाप की परवरिश का नतीजा है। सोचिए अब कि कितना बड़ा अपराध है। परवरिश की क्षमता रखे बिना पैदा कर देना।

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