0:26 अहंकारी मैं तुझे श्राप देता हूं। जिस सुंदरता और ज्ञान के लिए मुझे अपमान किया है, वह सुंदरता तो रहेगी परंतु वह तेरे प्राण के लिए खतरा होगा और जिस बुद्धि और ज्ञान का घमंड करता है, वह ज्ञान तू कभी स्वयं के लिए उपयोग नहीं कर पाएगा। तू एक मोर पक्षी बन जाएगा। और इसी बरछाबन जंगल में बरसों तक रह जाएगा। इतना कहते ही वह व्यक्ति एक मोर में बदल गया। मोर में बदलते ही वो व्यक्ति फूट-फूट कर रोने लगा। नहीं यह क्या किया आपने साधु महाराज? मेरा इच्छा आपके हृदय को दुख देना नहीं था महाराज। मुझे आप क्षमा कर दीजिए। [संगीत] कृपया मुझे श्राप से मुक्त कर दीजिए। मुझे
1:14 मुझे आपको एक बार समझाने की प्रयास तो करने दीजिए। मुझसे भूल हो गई स्वामी। कृपया मुझे इतनी बड़ी दंड मत दीजिए। मोर के कई बार विनती करने के बाद साधु महाराज उस पर दया दिखा [संगीत] के उससे धीरे-धीरे कुछ कहने लगे और कुछ समय बाद वे [संगीत] वहां से चले गए। एक गांव के शोर पर छोटा सा कस्बा था। जहां हरिया नाम का एक चरवाहा अपनी पत्नी राधा के साथ रहता था। उसके पास तीन बकरियां थी [संगीत] और उन्हीं से वे दोनों जैसे तैसे अपना गुजारा करते थे। सुनिए आज मैं स्पष्ट बोल रही हूं। अब
2:02 मुझसे यह रोज का डर छुपाया नहीं जा रहा। आप देख रहे हैं ना तीनों बकरियां पहले जैसी नहीं रहीं। दूध कम हो गया है। खाना ढंग से खा नहीं पा रही। और जब जानवर कमजोर होता है तो सबसे पहले घर की हालत बिगड़ती है। पशुपति क्रोधित हो जाते हैं। जी। मैं रोज देखता हूं राधा। जब मैं इन्हें जंगल ले जाता हूं तो यह इधर-उधर बस मुंह उठाकर देखती रहती है। पहले घास ढूंढने की जरूरत नहीं पड़ती थी। अब घास ढूंढनी पड़ती है। लगता है मुझे अब वर्षावन में ही अपना किस्मत ढूंढने जाना होगा। अरे अरे नहीं जी वर्षावन नहीं हम ऐसे ही कुछ ना कुछ कर लेंगे। कुछ भी हो जाए आप उस वन में मत जाना। हमें नहीं चाहिए ज्यादा
2:48 धन। हम ऐसे ही खुश रह सकते हैं। सच कहूं तो अब जंगल से ज्यादा मुझे अपने हालात डराने लगे हैं। हरिया बस उस दिन अपनी पत्नी को इतना बोल के बकरियों को लेके जंगल निकलता है। [हंसी] कुछ समय बाद वो जंगल पहुंचता है और अपने बकरियों को घास चढ़ने देती है। तुम तीनों मेरी किस्मत हो। अगर तुम खाओगी तो घर चलेगा। अगर तुम कमजोर हुई तो समझ लेना कि मैंने कहीं ना कहीं गलती कर दी। पर आज सवाल यह है कि मैं तुम्हें खिलाने के लिए आखिर जाऊं तो जाऊं कहां?
3:34 उसकी बकरियां इधर-उधर घास चरने जाती है। वो चारों तरफ देखता है और बड़ी सी पेड़ के छांव में बैठ जाता है। इंसान मजबूरी में वही रास्ता चुनता है जिससे वो सबसे ज्यादा डरता है। अब तो मुझे भी वही करना होगा जो काम मैं करने से डरता हूं। अब तो यह जंगल भी मुझे रोज यह एहसास दिला रहा है कि यहां रुकना मतलब धीरे-धीरे खत्म होना। हरिया यह सब सोच के दुखी होकर बैठा हुआ था। तभी दूर से रघु जो कि हरिया का बचपन का मित्र था। वो सूखी लकड़ियां ले आ रहा था। रघु हरिया को देख के उसके पास लकड़ियों को रखता है और उसके साथ बैठ जाता है। अरे अरे हरिया इतना दुखी क्यों है मित्र?
4:21 तेरे चेहरे को देखकर ही समझ गया कि तुझे कोई चिंता सता रही है। बता क्या बात है? अपने मित्र से तू बोल ही सकता है। अरे क्या बताऊं तुझे? मेरी रोजीरोटी पर मुसीबत आ चुकी है। मित्र मुझे तो समझ नहीं आ रहा है कि मैं करूं क्या? मेरे बकरियां तो अब दिन-बदिन ताजी घास ना मिलने की वजह से कमजोर हो जा रही है। अब दूध भी कम देने लगी है। बकरियों का तो ऐसा हो गया है कि अपने बच्चों को दूध पिलाए या हमको दूध दे। मुझे तो अब कोई मुश्किल सिद्धांत लेना ही होगा। हां, अब यह जंगल सूख रहा है। बहुत से पेड़ सूख के मर गए हैं। मैं यह सब लकड़ियां वहीं से ले आया हूं। लेकिन तू क्या करेगा अब? क्या सोचा है तूने? सोच
5:07 लिया है कि अब यहीं अटका नहीं रह सकता। तो किधर जाएगा? मुझे तो ऐसा कोई रास्ता नहीं दिख रहा है। दक्षिण दिशा ओर जंगल बरसावन। रघु एकदम चुप हो गया और हैरानी से बोला तू जानता है ना कि उस जंगल का नाम लोग मुंह से लेने से भी डरते हैं। वहां की लोकथा क्या रहती है? अरे हमारे राज्य के महाराज ने तो गांव के किसी निवासी को उस जंगल में जाने से मना किया है। अगर वहां किसी के साथ कुछ हो जाए तो महाराज भी अपने हाथ खड़े कर लेंगे। कोई मदद नहीं करेगा। डरने वाले पेट भरे लोग होते हैं रघु। भूखे आदमी के पास डर के लिए जगह नहीं बचती और वैसे भी वह सब बस लोक कथाएं हैं। वहां ना मुझे कुछ होगा ना ही मेरी बकरियों को। अरे
5:55 बकरियों का तो पता नहीं वहां कोई हिंचक जानवर नहीं रहता है जो तेरे बकरियों को नुकसान होगा। नुकसान तो तुझे होगा। सुना है वहां कई मायावी जीव होते हैं। कई कई तो बोलते हैं वहां बहुत शक्तिशाली और गुस्सैल साधु महाराज भी रहते हैं। वह एक फूंक से किसी भी जीव को भस्म कर सकते हैं। अरे जो होगा देखा जाएगा मित्र। यह सब बस लोग कहते हैं। कई वर्षों से सुनते आया हूं। इतना ही खतरनाक बन होता तो वहां से कोई दुर्घटना की कुछ खबर आती। तू डर मत। मुझे कुछ भी नहीं होगा। ठीक है मित्र। मेरा काम था तुझे चेतावनी देने का। मैंने बोल दी। अब जो भी करना है तू देख ले। लेकिन हां एक बात याद रखना। वहां सिर्फ साहस काम नहीं
6:43 आता है। रघु यह बोल के वहां से चला गया और हरिया थोड़ा चिंता में डूब गया। लेकिन वो बरछावन में जाने का मन बना चुका था। कुछ समय बाद संध्या होने से पहले हरिया अपनी बकरियों को लेके अपने घर चला आता है। शाम को घर के भीतर हरिया राधा से बोलते हुए राधा मैंने मन बना लिया है। मैं अब से
7:31 बरछावन में ही जाया करूंगा। तुम चिंता मत करना। मुझे कुछ नहीं होगा। नहीं ऐसा मत कीजिए। यह कैसी जिद पकड़ लिया है आपने? कोई जरूरत नहीं है। हम कर लेंगे कुछ ना कुछ। चारा खरीद लेंगे या रोज पेड़ की पत्तियां खिलाया करेंगे। क्या बोल रही हो राधा? हम कैसे चारा खरीद सकते हैं? हम तो मुश्किल से खाना जुटा पाते हैं। और पेड़ की पत्तियां कितना खिलाएंगे? कहां-कहां जाऊंगा मैं पत्तियां लाने? राधा को हरिया की बात पे सच्चाई दिखी और वो मायूस हो गई। लेकिन वो अपने पति को बरछावन जंगल में जाने देना नहीं चाहती थी। आपकी बात ठीक है लेकिन मेरा मन नहीं मान रहा है आपको वहां जाने देने से।
8:18 आप चिंता मत कीजिए। मैं भी कुछ काम कर लूंगी। बुद्धि भ्रष्ट हो गई है क्या राधा? नहीं। मैं तुम्हें कहीं जाकर कोई भी काम करने नहीं दे सकता। तुम बस घर संभालो। बाकी का मेहनत मैं कर लूंगा। और वैसे भी तुम्हारे कुछ काम कर लेने से सब ठीक नहीं होगा। बात सिर्फ हमारी नहीं है। हमारी तीनों बकरियां ताजी घास ना मिलने की वजह से दुबली पतली होती जा रही है। उनका भी सोचना होगा हमें। नहीं तो हमें पाप लगेगा। बरसों से साथ निभाया है हमारा। राधा मानना नहीं चाहती थी। लेकिन रघु के इतना समझाने से वो भी मान जाती है। चलिए आप चले जाना। लेकिन ध्यान रखना। वहां आप किसी अनजान शीश को मत छूना और जानवरों से संभल के रहना। अभी चलिए मेरे साथ रसोई
9:06 में। मेरी थोड़ी मदद कर दीजिए। रात के खाने का इंतजाम करना है। दोनों यह सब बातें करके रसोई में रात के खाने की तैयारी करने जाते हैं। के बरछावन जंगल की दिशा ओर निकल गया। जंगल उसके गांव छोड़ के दक्षिण ओर था। हरिया जब जंगल के रास्तों में पहुंचा तो उसने ऐसा दृश्य देखा जो उसने अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा था। ऊंचे-ऊंचे पेड़, बड़ी-बड़ी फूल, ऊंची घास और दिखने
9:54 में ऐसा जैसे कोई सपनों की नगरी में दाखिल हुआ हो। आ हा हा हा क्या सुंदर जगह है। लोग तो ऐसे ही डरते हैं। भला यह भी कोई डरने की जगह है। शायद किसी ने जानबूझकर यह सब अफवाह फैलाया है कि इस जंगल को कोई खराब ना करे। हे प्यारी जंगल मैं आपको कोई नुकसान नहीं पहुंचाऊंगा। बस मुझे मेरी बकरियों को घास चराना है। फिर मैं चला जाऊंगा। हरिया अपने मन में यह सब बड़बड़ाते हुए जंगल के बीचों-बीच थोड़ी सी खाली जगह में पहुंच गया और अपनी बकरियों को घास चढ़ने देकर वो आराम से बैठ गया। हरिया अभी उसी जगह बैठा हुआ जंगल की सुंदरता में मंत्रमुग्ध हुआ बैठा था। तभी अचानक [संगीत] तेज हवा चलने लगी। पेड़ों
10:41 की डालियां आपस में टकराने लगी। बकरियां घास चरते-चरते कहीं दूर निकल गए थे। हरिया बिल्कुल अकेला था। ये ये अचानक क्या हो गया? [संगीत] अचानक ऐसे हवा क्यों चलने लगी? और फिर एकदम से हवा रुक गई। ऐसी खामोशी छा गई कि पत्ते तक हिलना भूल गए। हरिया को लगा जैसे पूरा जंगल उसकी सांसे गिन रहा हो। तभी उसके पीछे से एक [संगीत] कठोर गूंजती हुई इंसानी आवाज आई। कौन है तू? मनुष्य। हरिया सिहर गया। उसने झटके से पीछे मुड़कर देखा। एक ऊंची चट्टान पर एक सुंदर [संगीत] मोर खड़ा था। पंख फैले हुए थे। लेकिन उसकी आंखों में ऐसी आग [संगीत] थी जो किसी जानवर की नहीं हो सकती। हरिया उसको देख
11:29 संदेह की नजर से देखने लगा। वो थोड़ा इधर-उधर देखने लगा। कौन [संगीत] है? कौन है? यह आवाज कहां से आ रहा है? मैं मैं हरिया हूं। मैं मैं बस अपनी बकरियों को घास चराने लाया हूं। जो भी है सामने आओ। [संगीत] हरिया ने मोर को अनदेखा कर दिया था। उसे लगा कि वो बस एक साधारण सा मोर है। [संगीत] मोर ने गर्दन हल्की सी झुकाई और फिर वही इंसानी आवाज। घास चराने लाया है या अपने प्राणों की आहुति देने आया है। मोर से यह सुनके हरिया के पैरों तले जमीन खिसक गई। आहुतिथी मैं कुछ समझा नहीं और तुम तुम इंसानी आवाज में बात कैसे कर रहे हो? मोर एक पल चुप रहा। फिर एक कड़वी मुस्कान
12:14 उसके चेहरे पर [संगीत] उभरी। समझ आता नहीं है मनुष्य को। इसलिए यहां तक आ जाता है। वो चट्टान से नीचे उतरा। धीरे बहुत धीरे। हर कदम के साथ जमीन कांपती महसूस हो रही थी। क्या [संगीत] तुझे अपने प्राणों की आहुति देने का शौक है? या अपने भय से इतना भाग चुका है कि मृत्यु भी छोटी लगने लगी है। यह सुनकर हरिया का गला डर से सूख गया। मैं कोई योद्धा नहीं हूं। ना ही मुझे मरने का शौक है। मैं बस एक गरीब सरवाहा हूं। मेरे घर में भूख है। मेरी बकरियां कमजोर हो रही हैं। अगर मैं यहां नहीं आता तो हम सब धीरे-धीरे मर जाते। मोर की आंखों में कुछ [संगीत] पल के लिए
13:00 कुछ बदला जैसे दर्द। लेकिन अगले ही पल वो फिर कठोर [संगीत] हो गया। तो क्या भय नहीं लगता तुझे? लोग इस जंगल का नाम लेने से भी कांपते हैं। और तू ऐसे बैठा है जैसे ये तेरे पिता की भूमि हो। डर लगता है लेकिन भूख उससे बड़ी होती है। मोर ने तेज हंसी-हंसी ऐसी हंसी जिसमें खुशी नहीं सिर्फ जला हुआ अहंकार था। मनुष्य तू पहला नहीं है जो यह कह रहा है। हरिया ने साहस जुटाकर पूछा तुम तुम हो कौन? मोर ने उसकी ओर देखा। लंबी गहरी नजर मानो [संगीत] उसके भीतर झांक रहा हो। मैं क्या हूं? यह जानना तेरे लिए अभी जरूरी नहीं। अभी तू अपना चिंता कर। चला जा
13:47 यहां से। [संगीत] नहीं तो हमेशा के लिए यही रह जाएगा। जल्दी घर चला जा यहां से। यहां की माया तुझे रास नहीं आएगी। मोर इतना बोल के पलक झपकते [संगीत] ही उड़ के गायब हो गया। हरिया गंभीर चिंता में चला गया। उसे यह सब एक सपना जैसा लग रहा था। यह सब क्या था? कैसी अद्भुत जगह है यह? भला मोर भी कभी बोलता है क्या? क्या यह मेरा सपना था या यह सब सच में हो रहा है? है ईश्वर। मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा है। अच्छा होगा कि यहां से आज के लिए चला ही जाऊं। कल फिर आ जाऊंगा। शायद मैं बहुत थक गया हूं। कुछ समय बाद रघु अपने तीनों बकरियों को लेके जल्दी-जल्दी अपने घर निकल गया।
14:42 यहां मोर उड़ते हुए जंगल के दूसरी जगह आके। कई वर्षों से यहां कोई मानव नहीं आया। कितना समय निकल गया। [संगीत] अब याद भी नहीं है। शायद यह भी कोई प्रभु की इच्छा होगी। क्या पता यही वो मानव हो जिसकी मुझे अपेक्षा [संगीत] थी। अगर यह मानव दोबारा इस जंगल में आया तो मुझे समझ आ जाएगा कि यही वो मानव हो सकता है। शाम को हरिया अपने बकरियों को बांध के घर के भीतर थोड़ा चिंता में बैठा हुआ था और उसे ऐसे देख राधा उसके पास आई और बोली
15:33 मैं देख रही हूं जब से आप बरझावन से आए हो किसी चिंता में डूबे हुए हो वहां कुछ घटना घटी क्या आपके साथ? अरे नहीं नहीं राधा ऐसी बात नहीं है। भला वहां क्या होगा? लोग तो बस ऐसी ही बातें बनाते रहते हैं। देखो मैंने अपने बकरियों को घास चरा के ले आया और खुद भी सही सलामत हूं। हरिया अपने साथ हुए दिन की उस घटना के बारे में राधा को कुछ नहीं बताता है और राधा भी खुश थी क्योंकि उसका पति बरछावन से सही सलामत वापस आ गया था। [संगीत] यहां राज्य के राजमहल में महाराज विक्रमादित्य दुखी और चिंता में राज्यमंत्री के साथ बैठे हुए थे।
16:18 मंत्री जी मंत्री जी अब मैं क्या करूं? क्या कुछ नहीं कर लिया? कितने ज्ञानी ज्ञानी वैद्य को दिखा लिया। इन तीन दिनों में कहा नहीं गया। परंतु मेरी पुत्री चित्रलेखा [संगीत] की इलाज नहीं कर पाया। पता नहीं उसे क्या हो गया। अचानक हमारे बगीचे में मूर्छित हुआ और अभी तक निद्रा में है। महाराज आप आप ऐसे हताश मत होइए। ईश्वर हमें जरूर कोई ना कोई पथ दिखाएंगे। राजकुमारी चित्रलेखा पवित्र मन की है। उनके साथ ईश्वर कुछ गलत नहीं कर सकते। राजमहल में रोशनी थी पर राजा विक्रमादित्य के चेहरे पर अंधेरा था। मंत्री जी एक राजा अपने राज्य की रक्षा तो
17:05 कर सकता है। पर अगर अपनी ही बेटी को ना [संगीत] बचा पाए तो उसका मुकुट किस काम का? यह सुनके मंत्री ने सिर झुका लिया। महाराज राजकुमारी चित्रलेखा कोई साधारण कन्या नहीं है। उनके रगों [संगीत] में भी राजघराने की ही रक्त बहता है। वह हार नहीं मानेगी। वह अपने [संगीत] जीवन के लिए जूझ रही है। वह हमारी अपेक्षा कर रही है। उनके चिकित्सा के लिए। हमें तो इस बात का भी आभास हो गया है कि राजकुमारी के ऐसे अचानक मूर्छित होने का भी कोई बड़ी कारण होगी। किसी सीज की संकेत होगा। राजा चौंक कर पलटे। संकेत आप कहना क्या चाहते हैं मंत्री जी?
17:53 मंत्री ने [संगीत] चारों ओर देखा। फिर धीमी आवाज में बोला बरछावन जंगल वहीं से कई वर्षों पहले राजमहल तक [संगीत] अजीब-अजीब घटनाओं की आहट आई थी। संभव है संभव है वहीं से किसी शक्ति का प्रभाव हो। यह सुनकर राजा की मुट्ठी भी गई। क्या बरछावन? बरछावन [संगीत] से हमारी पुत्री का क्या ताल्लुक? वह तो कभी वहां नहीं गई। वह तो क्या स्वयं हम भी वहां नहीं गए। तो कैसे संभव है कि हमारी पुत्री की रोग बरछावन जंगल से जुड़ी है? महाराज मुझे नहीं पता परंतु मुझे ऐसा आभास हुआ है बस लोक कथाएं हैं बहुत उस वन के
18:40 बारे में और जिस प्रकार हमारी राजकुमारी [संगीत] मूर्छित हुई है उसे देख कुछ ऐसा ही लगता है। परंतु अभी हम इसे तय नहीं कर सकते। मंत्री की बात सुनकर राजा [संगीत] चुप हो गए। उनकी नजर अब भी महल के उस कक्ष की ओर थी जहां चित्रलेखा [संगीत] गहरी निद्रा में थी। इधर राजमहल से दूर हरिया का घर। रात को हरिया करवटें बदल रहा था। उसकी आंखों के सामने बार-बार वही दृश्य आ रहा था। वही मोर। वहीं इंसानी आवाज में बोलता मोर। वो अचानक उठ बैठा। वो सपना नहीं था। मैं जानता हूं उसकी आंखों में कुछ था जैसे वह कुछ कहना चाहता
19:26 था पर कह नहीं पाया। वो मोर वो सिर्फ एक साधारण मोर नहीं था। बाहर बकरियों की हल्की सी आवाज आई। हरिया उठा उन्हें देखा। तीनों बकरियां आज पहले से बेहतर लग रही थी। अरे आज तो तुम सब ठीक लग रही हो। कल फिर चलेंगे बरसावन और पेट भर खाना तुम लोग। यह बोलते ही उसका मन और बेचैन हो गया। उसके मन में वही मोर बार-बार आ रहा था। अगली सुबह सूरज निकलते ही हरिया ने फिर
20:13 वही रास्ता पकड़ लिया। ध्यान रखना जी आज मन बहुत भारी लग रहा है। कुछ नहीं होगा राधा तुम इतना चिंता मत किया करो। इतना कह के हरिया अपने बकरियों को लेके जंगल की दिशा ओर निकल गया। बरसावन जंगल। आज जंगल और भी ज्यादा सुंदर लग रहा था। हवा में एक अजीब सी सुगंध थी। हरिया अपने बकरियों को घास चढ़ने देके आगे बढ़ा। लेकिन इस बार वो उसी जगह नहीं रुका। आज छुप कर नहीं बैठूंगा। आज उस मोर से साफ बात करूंगा। डरने से कुछ हासिल नहीं होगा। वैसे भी उस मोर ने मुझे कोई हानि नहीं
20:59 पहुंचाया। काश कि वो मोर मुझे मिल जाए। जरूर उसमें कोई रहस्यमय बात है। हरिया यह सब बातें सोच के जा ही रहा था कि तभी पेड़ों के पीछे से पंखों की सरसराहट आई। हरिया ठिठक गया। मैं आ गया हूं। अगर तुम यहीं हो तो सामने आओ। कुछ पल की खामोशी। फिर वही गूंजती हुई आवाज। मनुष्य तू फिर लौट आया। मानना पड़ेगा तेरे साहस को। अपने प्राण गवाने का भय नहीं है। इस बार मोर सामने था। पहले [संगीत] से भी ज्यादा भव्य। पर उसकी आंखों में अब क्रोध नहीं, कुछ और था। जैसे कोई इंतजार। मैं डर कर नहीं आया। मैं जानना चाहता हूं
21:46 तुम कोई साधारण मोर नहीं हो। तुम में जरूर कोई बात है। और यह जंगल ये इतना रहस्यमय क्यों है? मोर ने गहरी सांस ली। अगर तूने सच जान लिया तो वापस वही इंसान नहीं रह पाएगा जो आज है। लोग तेरे पीछे पड़ जाएंगे। तुझे अलग समझने लगेंगे। तू मुसीबत में पड़ सकता है। मोर के इतना कहते ही हवा फिर से जलने लगी। पत्तियां घूमने लगी। हरिया के रोंगटे खड़े हो गए। हरिया थोड़ा चिंतित होकर बोला, [संगीत] तो फिर तुम मुझे क्यों दिखाई दिए? क्या इसका मतलब मेरा यहां आना कोई संयोग नहीं था? क्या तुम मुझे कोई माया से यहां ले आए हो? क्या तुमने ही हमारे गांव के पास की जंगल को सुखाया है?
22:32 मोर ने उसकी ओर देखा। लंबी गहरी नजर। उन सब में मेरा कोई हाथ नहीं है। तुम यहां स्वयं आए हो। संयोग कुछ नहीं होता। सब पहले से तय [संगीत] होता है। तू मेरा भाग्य है। तुझे मेरे नियति ने यहां खींच [संगीत] लाया है। मैं मैं कुछ समझा नहीं। तुम कहना क्या चाहते हो? भला तुम्हारी किस्मत मुझे क्यों यहां खींच लाएगी? मैं तो बस एक साधारण सा चरवाहा हूं। समझ जाएगा बाद में। क्या नियति है और क्या भाग्य। अभी तू यह बता कि तुझे क्या चाहिए? मांग जो सहायता चाहिए मांग ले। सहायता मुझे क्या सहायता चाहिए होगा? मुझे
23:17 तो बस अपने बकरियों को अच्छे से पेट भर के चराना था। वो तो इस बन ने कर दिया। बाकी तुम मेरी क्या ही सहायता कर सकते हो? काफी अच्छे मन के हो। लोभ बिल्कुल नहीं है तुम में। परंतु साथ में अहंकार भी [संगीत] है। जो मुझे मेरे मन में आकर पूछ रहे हो कि मैं क्या दे सकता हूं। अरे मानव मेरे पास इस धरती की सबसे शक्तिशाली चीज है। शक्तिशाली चीज वो क्या है भला? कोई बहुत बड़ा अस्त्र है क्या या बहुत से धन अगर वो सब है तो मुझे यह सब बिना कुछ किए मुफ्त का नहीं चाहिए। [संगीत] मैं एक ईमानदार व्यक्ति हूं। मोर हंस पड़ा। वो हरिया की बातों से प्रसन्न था। लेकिन हरिया मोर को हंसते देख गुस्सा हो रहा था।
24:02 काफी अलग मानव प्रतीत होते हो। [संगीत] मैंने अपने जीवन काल में कभी भी तेरे जैसा मानव नहीं देखा था। आज से कुछ वर्ष पहले एक और व्यक्ति आया था इस वन में। परंतु वो लालची और स्वार्थी था। [संगीत] लेकिन तू बहुत अलग है। और मेरे पास ना शक्तिशाली अस्त्र है ना ही बहुत से धन। परंतु मेरे पास इस धरती का सबसे शक्तिशाली चीज है। और वो है ज्ञान। अगर मेरा ज्ञान तेरे कुछ काम आए तो बता। मुझे तो बस मेरी बकरियों को ही चराना था। तुम्हारे ज्ञान मेरे कोई काम नहीं आएगा। मोर उसकी बात सुनकर हल्की हंसी-हंसने लगा। [संगीत] तभी हरिया बोल पड़ा। हां एक चीज है जिसमें तुम मेरी सहायता कर सकते हो। हमारे राज्य के राजकुमारी
24:50 चित्रलेखा वो चार दिन पूर्व ही अपने कक्ष में मूर्छित होकर गिर गए और अब वो गंभीर निद्रा में है। उन्हें कोई वैद्य कोई औषधि भी ठीक नहीं कर पाए। अगर तुम कुछ सहायता कर सकते हो तो बोलो। [संगीत] ठीक है मैं करूंगा सहायता। ऐसा कोई रोग नहीं जो मैं उसका तोड़ नहीं जानता। ऐसा [संगीत] कोई औषधि नहीं जो मैं पहचानता नहीं। तुम एक कार्य करो। तुम अपने महाराज के समक्ष जाओ और उनसे विनती करो कि उनके पुत्री का चिकित्सा तुम्हें करने दे और तुम्हें राजकुमारी के साथ अकेला छोड़े। और तुम राजकुमारी की अवस्था देख के मुझे बताना कि वे कैसी [संगीत] है, किस हालत में है। तब मैं तुम्हें बता दूंगा कि चिकित्सा करना कैसे है। हां, ठीक है। अगर यह संभव है तो मैं जरूर राजकुमारी की सहायता करूंगा। परंतु अगर
25:37 मैं उनकी चिकित्सा ना कर पाया तो [संगीत] शायद से महाराज मुझ पर बहुत क्रोधित होंगे और शायद मुझे दंड भी मिल सकता है। तू उन सब परिस्थितियों का चिंता [संगीत] मत कर। मुझ पर विश्वास रख और मैंने जैसा कहा वैसा कर। ठीक है। मैं आज संध्या को राजमहल जाऊंगा [संगीत] और महाराज से यह विनती करूंगा कि वे अपनी बीमार पुत्री का चिकित्सा मुझे करने दें। उचित है। [संगीत] इतना कहते ही वो मोर पल भर में हरिया की आंखों से ओझल हो गया। क्या है यह? कितना अद्भुत मोर है। हर बार यह हैरान कर देता है। पता नहीं है यह मोर है या कोई मायावी दानव। परंतु कुछ भी हो उसने मुझे अभी तक कोई हानि नहीं पहुंचाया। जो भी है अब मुझे
26:23 राजकुमारी चित्रलेखा की चिकित्सा करने की कोशिश करनी होगी। क्या पता यह रहस्यमय मोर सच में मदद कर सके। हरिया यह सब सोच के अपनी बकरियों के पास जाके उनको चराते हुए बैठ जाता है। कुछ समय बाद हरिया घर लौट के संध्या [संगीत] को राजमहल के लिए निकला। हरिया राजमहल पहुंचा। राजमहल रोशनी से चकाचौंध था। लेकिन अब भी पूरा राजमहल शांत था। [संगीत] मानो पूरा राजमहल अपनी राजकुमारी के लिए शोक में था। कुछ समय बाद हरिया को महाराज विक्रमादित्य से मिलने का अवसर मिला। महल का एक साधारण कक्ष। राजा विक्रमादित्य [संगीत] चिंतित मुद्रा में बैठे थे। मंत्री पास ही
27:10 खड़े थे। क्या तुम वही चरवाहा [संगीत] हो जो मेरी पुत्री की रोग को ठीक करने का दावा कर रहे हो? जी महाराज परंतु मैं केवल उन्हें देखना चाहता हूं। मुझे पहले उनको देखना होगा। उसके बाद मैं कोई उपचार बता पाऊंगा। कृपया आप मुझे उनको एक बार देखने दीजिए। राजा ने मंत्री की ओर देखा। महाराज समय बहुत कम है। हमें इस पर भी एक बार विश्वास करके [संगीत] देखना होगा। मंत्री की बात सुनके राजा ने हल्की सी स्वीकृति में सिर हिला दिया और बोला ठीक है पर शीघ्र और मेरी पुत्री को देख के तुम्हें जो भी पता चले जो तुम कर सको जल्दी-जल्दी करना [संगीत] मैं अब मेरी पुत्री को वैसी हालत में देख के बेबस नहीं बैठ सकता मंत्री हरिया को राजकुमारी के कक्ष ले गया
27:58 और राजा विक्रमादित्य [संगीत] दुखी अवस्था में बैठे रहे राजकुमारी [संगीत] का कक्ष अति सुंदर सुंदर और शांति से परिपूर्ण। लेकिन कहीं ना कहीं शांति के पीछे शोक और दुख [संगीत] का मिश्रण भी था। राजकुमारी के पास में दो दासी थे। मंत्री हरिया के आने के बाद दोनों वहां से चले जाते हैं। राजकुमारी चित्रलेखा गंभीर निद्रा में थी और बेजान पड़ी थी। हरिया राजकुमारी की बिस्तर [संगीत] के पास ठहर गया। उसने ध्यान से देखा। चेहरे पर कोई पीड़ा नहीं थी। पर वह शांति स्वाभाविक नहीं लग रही थी। राजकुमारी का पूरा शरीर नीला पड़ गया था। हरिया यह [संगीत] देख
28:44 चिंतित हो उठा। यह नींद नहीं है। यह जैसे किसी जहरीली पदार्थ या जहरीली जीव के जहर से हुआ लगता है। मंत्री जी क्या राजकुमारी को किसी सर्प ने दस लिया है या उन्होंने किसी जहरीली पदार्थ का सेवन किया है? मैं ही हरिया। हमने बहुत से वैद्य को दिखाया परंतु इनकी रोग का उपचार कोई नहीं दे पाए। वैसा कुछ हुआ होता तो हमें पहले ही पता चल जाता। तुम भी अब यही प्रश्न मत पूछो। अगर कुछ कर सकते हो तो बताओ। सब ने बस यही बोला कि यह कोई सर्प का काम नहीं है और ना ही कोई जहरीली पदार्थ का काम। बस कोई रहस्यमई वस्तु [संगीत] या कोई प्राकृतिक वस्तु है। परंतु यह कोई
29:32 नहीं बता पाया कि आखिर रोग का कारण है क्या? इतना सुनके हरिया बिना कुछ कहे बाहर आ गया। राजा ने उसकी ओर [संगीत] देखा। पर हरिया ने केवल सिर झुका दिया और दुखी स्वर में बोला महाराज राजकुमारी चित्रलेखा की अवस्था की इतनी जानकारी तो मुझे पता नहीं लगा। परंतु मैं कल संध्या को फिर आऊंगा और इस बार कुछ जानकारी लेकर ही आऊंगा। इतना कहकर हरिया कक्ष से निकल गया और महाराज विक्रमादित्य के चेहरे पे थोड़ी आशा की लोह जल उठी। अगले दिन हरिया ने फिर से अपनी बकरियों को
30:18 लेकर बरसावन जंगल का रास्ता पकड़ा। अब जंगल उसके लिए एक आम सी जंगल जैसे लगने लगा था और ना ही उस जंगल में उसको कोई हानि पहुंचती थी जैसे उसकी यही नियति हो। [संगीत] बकरियां घास चढ़ने लगी पर हरिया का मन कहीं और था। अब सब उसी मोर पर निर्भर है। वो आगे बढ़ा। [संगीत] मैं आ गया हूं। जो देखा समझा अब सब बता सकता हूं। कुछ ही क्षणों में पेड़ों के बीच से वो भव्य [संगीत] मोर प्रकट हुआ। बोल मानव राजकुमारी की अवस्था कैसी है?
31:06 [संगीत] तूने क्या देखा? क्या समझा? वो जीवित है पर जैसे उनकी चेतना शरीर में नहीं। ना पीड़ा ना जागृति। [संगीत] बस उनका शरीर नीला हो गया है और ना ही उनको कोई जहर दिया गया और ना ही किसी सर्प ने काटा। यह सुनते ही मोर गंभीर हो गया। जैसा मुझे संदेह था वो रोग नहीं बल्कि एक जहरीली और अलौकिक पुष्प है। स्वप्न विष पुष्प। हरिया की आवाज भर आ [संगीत] गई। पुष्प स्वप्न विष पुष्प ये कैसा पुष्प है और कहां उगती है? और आप उस पुष्प के विषय में जानते हो तो क्या राजकुमारी निद्रा से लौट सकती है? वो ठीक हो सकती है? हां, मुझे सब ज्ञात है। वो एक नर्क लोक की
31:54 पुष्प है। और वो वहां उगती है जहां किसी निर्दोष की स्वप्न का बलि चर गया हो। अवश्य ही तुम्हारे महाराज ने किसी के साथ अन्याय किया था। और उसी जगह वो पुष्प उगा और राजकुमारी ने [संगीत] उसकी सुगंध ली और मूर्छित हो गई। और जब कोई उस पुष्प को स्पर्श करता है तो वह पुष्प [संगीत] सदैव के लिए गायब हो जाते हैं। इसी कारण कोई वैद, कोई हकीम राजकुमारी की रोग का पता लगा नहीं पाए। तो इसका उपचार क्या होगा? हम कुछ तो कर सकते हैं ना। अवश्य कर सकते हैं। अगर यह बरसावन जंगल ना होता तो नहीं कर सकते थे। परंतु यह संभव [संगीत] है। मात्र इस वन की वजह से। यहां कई अलौकिक औषधि मिलती है और मुझे वह सब ज्ञान है। तू निश्चिंत रह और चल मेरे साथ।
32:41 [संगीत] मैं तुझे उसके औषधि के पास ले जाता हूं। इतना कह के मोर हरिया को बरसावन जंगल के भीतर ले जाता है और एक जगह जाकर रुकता है जहां कई औषधि जैसे फूल [संगीत] थे। हरिया यहां कई सारे चमत्कारी पुष्प है और इनमें से एक सबसे ऊपर दर्जे की पुष्प है जिसका [संगीत] नाम है अमीय पुष्प। तू यह पुष्प ले और जाके राजकुमारी के मुख पर इसका रस डाल दे और कुछ ही समय बाद वे फिर से ठीक हो उठेगी। क्या यह सच में काम करेगा? और यह काम करेगा भी तो इसमें आपका क्या लाभ? जरूर [संगीत] आप मुझसे कुछ छुपा रहे हो। हरिया क्या लाभ? क्या नुकसान यह जानने से अधिक जरूरी है शीघ्र अपने राजकुमारी को ठीक
33:27 करो। तू पहले उनकी चिकित्सा कर और उसके बाद मैं तुझे बता दूंगा आखिर मैं तेरी सहायता क्यों कर [संगीत] रहा हूं। परंतु हां मेरे स्वार्थ के पीछे किसी को कोई हानि पहुंचाने का मन नहीं है। अब तू जा और राजकुमारी जी की सहायता कर। मैं तो यही हूं। तेरा अपेक्षा रहेगा। और हां याद रखना [संगीत] कि मेरा जिक्र नहीं होना चाहिए। मोर के इतना बोलते ही हरिया ने तुरंत अमी पुष्प को लिया और अपने कमीज के जेब में पुष्प को [संगीत] लेके अपने बकरियों के साथ जंगल से निकल गया।
34:14 कुछ समय बाद हरिया अपने बकरियों को घर छोड़ के [संगीत] सीधे राजमहल पहुंचा। और महाराज विक्रमादित्य, मंत्री [संगीत] और कुछ दासियां और हरिया राजकुमारी के कक्ष में जमा हुए और हरिया समय नष्ट ना करते हुए अमीय पुष्प का रस राजकुमारी के मुख में निचोड़ देता है। और देखते ही देखते राजकुमारी का शरीर का रंग ठीक होने लगा और उन्होंने अपनी आंखें धीरे से खोली और यह देख सब हैरान और खुश हो उठे और महाराज की आंखों से आंसू निकलने लगे। हरिया तुमने आज वो कार्य किया है जो कोई नहीं कर पाया। आज तुमने मेरी जीवन का सबसे मूल्यवान
35:01 वस्तु दी है। मेरी पुत्री की प्राण लौटा दिए तुमने। राजकुमारी की मां चंद्रप्रभा की मृत्यु के बाद मेरी पुत्री ही मेरी जीवन स्वरूप है और आज तुमने मेरी जीवन को वापस कर दिया है। तुम्हारा कोटि-कोटि धन्यवाद हरिया। नहीं नहीं महाराज मुझे आप यूं लज्जित मत कीजिए। यह तो मेरा दायित्व था। इस राज्य का नागरिक होने हेतु इतना तो मेरा कर्तव्य बनता था। हरिया तुमने यह किया कैसे? कोई वैद कोई हकीम राजकुमारी जी का इलाज नहीं कर सके तो तुमने कैसे? और यह चमत्कारी पुष्प यह कहां से ले आए हो तुम? क्षमा कीजिए मंत्री जी। क्षमा कीजिए महाराज। मुझे इस चमत्कारी पुष्प के विषय में विशेष जानकारी नहीं है। मैं बस इतना जानता हूं कि यह पुष्प राजकुमारी की रोग
35:46 को ठीक कर सकता था और यह ज्ञान मुझे कई और से मिली है। परंतु मैं आपको इन सब विषय में ज्यादा विस्तार से नहीं बता पाऊंगा। यह मेरी धर्म और मर्यादा के खिलाफ होगी। इसके लिए मैं कोई भी दंड स्वीकार करने के लिए तैयार हूं। अरे हरिया थोड़ा संभाल के तुम भूल रहे हो कि तुम महाराज के सामने हो अभी हमें सब बताओ। मंत्री जी भूल तो आप रहे हैं कि इसने हम पर कितना उपकार किया है। आप हरिया को कुछ मत बोलिए। हमें कुछ नहीं जानना है। हमें हमारी पुत्री वापस मिल गई है। वही बहुत बड़ी बात है। मंत्री जी हरिया को ढेर सारा उपहार से निवाजा जाए। इन्हें कभी भी धन की कमी ना हो। इतना धन दे दीजिए। मंत्री महाराज के ऐसा बोलने से चुप हो गया और हां में सिर हिलाया और उनके आदेश का पालन किया और हरिया के लिए धन का व्यवस्था करने गया।
36:37 महाराज मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूं। क्या मुझे बोलने की अनुमति है? हां हां हरिया निसंकोश बोलो। महाराज आपके पुत्री की अवस्था के पीछे स्वप्न विष नामक पुष्प का हाथ है। यह एक नर्क लोक का पुष्प है और वह वहीं उगता है जहां किसी निर्दोष के स्वप्न का बलि चढ़ गया हो। किसी निर्दोष के साथ अन्याय हुआ हो। शायद आपसे कभी ऐसा कार्य हुआ है और महल में कहीं वह पुष्प उगा है और राजकुमारी ने उसकी सुगंध ली और वे मूर्छित हो गए। हां पिताजी यह सच बोल रहे हैं। मैंने एक बैंगनी रंग की पुष्प हमारे बगीचे में देखा और उसे तोड़ के उसका सुगंध लिया था और उसके सुगंध लेते ही वह पुष्प गायब हो गया था और उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं रहा। यह सुनते ही महाराजा विक्रमादित्य हताश हो गए और बोले
37:24 हमसे अनजाने में कही भूलचूक हुई है और उसी का दंड मेरी पुत्री को मिला है। आज तुमने हमें अंधेरे से निकाला है। हरिया हम प्रण लेते हैं कि अब से हम किसी के साथ भूल से भी अन्याय नहीं करेंगे और हमसे अनजाने में जिसके साथ भी अन्याय हुआ है उनको या उनके परिवार से श्यामा मांगेंगे और उनको भुगतान करेंगे। राजा के इतना कहने के बाद हरिया के चेहरे पर एक खुशी सा गई और कुछ समय बाद उसे ढेर सारा धन पुरस्कार में मिला और वो यह सब लेके खुशी-खुशी राजमहल से घर लौट आया। घर पहुंचते ही हरिया के पास इतना सारा धन देख के राधा स्तब्ध रह जाती है और हैरानी
38:10 से पूछती है ये जी यह सब धन कहां से मिला? क्या कुछ गलत काम किया है? मुझे तो भय लग रहा है। अरे राधा तुम भी ना हर समय डरती रहती हो। क्या तुम मुझे जानती नहीं हो? भला मैं क्या गलत काम करूंगा? मैं तो अपनी ईमानदारी का ही रोटी खाता हूं। यह तो बस महाराज ने मुझे उपहार दिया है। महाराज ने वो क्यों भला वे आपसे इतना क्यों प्रसन्न हुए? अरे तुम्हें पता नहीं मैंने क्या किया है। मैंने राजकुमारी चित्रलेखा की जीवन बचाई है। उसी कारण मुझे महाराज ने यह ढेर सारे उपहार दिया है और कल चौराहे में सुन लेना। ढोल नगाड़े के साथ सूचना दी जाएगी कि राजकुमारी चित्रलेखा अब स्वस्थ है। राधा हैरान थी। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि हरिया ने इतना असाधारण कार्य किया
38:58 कैसे? लेकिन जी आपने यह सब किया कैसे? आपकी तो कोई वैद्य का ज्ञान नहीं था। ना ही आप कोई हकीम हो तो आपने किया तो किया कैसे? सब बताऊंगा राधा। तुम बस शांत हो जाओ। मैं तुम्हें सब बता दूंगा। अभी मुझे यह रख के थोड़ा विश्राम तो करने दो। दोनों भीतर महाराज के दिए धन को संभल के रख देते हैं और अपने चारपाई पर सुकून से बैठ जाते हैं और हरिया राधा को सब सच्चाई बता देता है। आपने मुझे यह सब पहले क्यों नहीं बताया? जी क्या मुझ पर विश्वास नहीं है? यह बात नहीं है राधा। विश्वास तो मैं तुमको खुद से ज्यादा करता हूं। परंतु कुछ बातें तुमको बोल के समस्या में डालना नहीं चाहता हूं। अभी यह सब छोड़ो। यह समय कुछ
39:46 और बात की है। मैं बरसावन जंगल जा रहा हूं। उस रहस्यमय मोड़ से मिलने उनको धन्यवाद करना है। उनकी वजह से अब हमारी जीवन में खुशियां आने वाली हैं। हरिया यह बोल के तुरंत बरसावन जंगल की ओर निकल गया। और वो मोर से मिला। मोर जैसे हरिया से मिलने के लिए व्याकुल था और हरिया को देखते ही व्याकुलता से हरिया को पूछा हरिया क्या राजकुमारी ठीक हुई है क्या महाराज तुमसे संतुष्ट हुए बोलो हरिया मुझे सब कुछ बताओ हां हां राजकुमारी की स्वस्थ अब बिल्कुल ठीक है और महाराज मुझसे काफी प्रसन्न हुए
40:33 और मुझे ढेर सारे उपहार के रूप में कई स्वर्ण मुद्राएं दी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद परंतु मुझे यह समझ समझ नहीं आया कि मेरी और राजकुमारी के सहायता से आपका क्या लाभ। हरिया यह पूछ ही रहा था कि तभी मोर के शरीर से एक दिव्य रोशनी [संगीत] निकली और देखते ही देखते मोर एक व्यक्ति में बदल गया। यह देख हरि दंग रह [संगीत] गया और उसकी आंखें फटी की फटी रह गई। कैसे? यह कैसे संभव है? आप [संगीत] आप कौन हैं? कोई देव या मायावी दानव? उस व्यक्ति के चेहरे पर एक सुकून भरी हंसी आ गई और वह हरिया से बोला हरिया मैं कोई देव या दानव नहीं हूं। मैं तो बस एक साधारण सा मनुष्य हूं जिसे एक
41:18 श्राप मिला था और एक मोर में बदल के इस जंगल में कैद [संगीत] हो गया था। हरिया थोड़ा शांत हो गया और उस व्यक्ति से बोला परंतु कैसे आपको किसने श्राप दिया? क्या आपसे कोई भूल हुई थी? क्या यह जंगल की वजह से हुआ था? [संगीत] नहीं हरिया इस जंगल में ऐसी कोई दुर्लभ बात नहीं थी। बस इसमें कई चमत्कारी औषधि उगते थे। और इस जंगल [संगीत] में कई वर्ष पहले एक बहुत ज्ञानी और क्रोधित साधु महाराज रहते थे। और मैं भी उन्हीं को ढूंढकर इस जंगल में आया था। और फिर उन्हें मेरी बातें अहकारी लगी [संगीत] और उन्होंने क्रोध में मुझे श्राप दे दिया। मैं तो कूल राज्य का एक राजकुमार था जो ज्ञान और दुर्लभ वस्तुओं के खोज में इस जंगल में आया था। मुझसे बस एक भूल हो गई थी कि मैंने साधु महाराज से बोला कि आप
42:05 मुझे अपने ज्ञान की शिक्षा दीजिए और हमारी राज्य में चलिए [संगीत] और आपको अपनी ज्ञान की उपयोग के लिए सही जगह मिलेगा और हमारी राजमहल में राजगुरु बनने का अवसर मिलेगा और यही वाक्य मेरी जीवन की सबसे बड़ी भूल [संगीत] होगी। तो अभी ऐसे अचानक यह श्राप कैसे टूट गया और वह साधु महाराज कहां गए? श्राप अचानक नहीं टूटा। यही नियति थी। मेरे कई विनती के बाद साधु महाराज ने मुझ पर दया दिखाई और बोले कि अगर मुझे कोई निस्वार्थ और भले मन की मां ना मिले [संगीत] जिसके मन में कोई लोभ नहीं है और मैं अगर उसकी कोई सहायता कर पाऊं तो तुरंत मेरी श्राप टूट जाएगी। [संगीत] और आज कई वर्षों बाद वही हुआ। तुम्हारी वजह से मेरा श्राप टूट गया। और तुम जो
42:50 साधु महाराज की बात कर रहे हो ना उनकी रहस्य मैं कभी और दिन बताऊंगा [संगीत] अगर नियति ने हमें फिर मिलाया तो और तुम्हें मुझे धन्यवाद कहने की जरूरत नहीं है। उपकार तो तुमने मुझ पर किया है। तुम्हारा कोटि-कोटि [संगीत] धन्यवाद हरिया। मैं अभी चलता हूं। मुझे मेरे राज्य में जाना होगा। कई वर्षों मैंने अपना राज्य नहीं देखा। [संगीत] पता नहीं अब मेरे पहचान के वहां कौन ही होगा। खैर, अभी तुम अपने घर जाओ और मैं भी जाता हूं। इतना कहकर वो व्यक्ति एक रहस्यमई मुस्कान देके जंगल की दूसरी दिशा ओर निकल [संगीत] गया और हरिया भी खुशी-खुशी [संगीत] अपने घर की दिशा ओर निकल गया।