Bhagvati Sutra Vachana -205 I Shatak 8, Uddeshak 10 I May 24 2026

संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो भगवती सूत्र आगम वाचना के तीसरे भाग का सारांश है, जिसमें सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र की आराधना के महत्व पर जोर दिया गया है। यह बताता है कि मोक्ष प्राप्ति के लिए इन तीनों में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। वीडियो में विभिन्न गुणस्थानों में आराधना के प्रकार, ज्ञान और क्रिया के समन्वय, और सही ज्ञान के बिना धार्मिक क्रियाओं के अधूरेपन पर भी प्रकाश डाला गया है।

  • मोक्ष मार्ग के लिए सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र का संतुलन आवश्यक है।
  • ज्ञान और क्रिया का समन्वय मोक्ष प्राप्ति में सहायक होता है।
  • सही ज्ञान के बिना धार्मिक क्रियाएँ अधूरी रह जाती हैं।

परिचय और पिछली कक्षा का सारांश

प्रणाम के साथ कक्षा की शुरुआत होती है, जिसमें 24 मई 2026 को भगवती सूत्र आगम वाचना की तीसरी क्लास का उल्लेख है। पिछली कक्षा में शतक आठ और उद्देशक दवा पर चर्चा की गई थी, जिसकी समरी विभा बहन ने सुनाई। समरी में बताया गया कि 'आराधना' शब्द का अर्थ है आत्मा के आंतरिक गुणों की उपासना करना। ज्ञानावरणीय कर्म ज्ञान गुण पर आवरण का काम करता है, जबकि मोहनीय कर्म दर्शन और चारित्र मोहनीय में विभाजित होता है। जैन धर्म ज्ञान और क्रिया दोनों को मोक्ष के लिए आवश्यक मानता है।

मोक्ष मार्ग और आराधना के प्रकार

भगवती सूत्र के दव उद्देश्य के दूसरे चैप्टर में मोक्ष मार्ग पर चर्चा की गई है। मोक्ष की दिशा में ले जाने वाला मार्ग मोक्ष मार्ग है, और इसके लिए सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र की आराधना आवश्यक है। इन तीनों आराधनाओं में संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है। सम्यक दर्शन चौथे गुणस्थान पर, सम्यक ज्ञान पहले गुणस्थान से आगे तक, और सम्यक चारित्र पांचवें-छठे गुणस्थान से आगे तक होता है। देवलोक के देवता केवल दर्शन और ज्ञान की आराधना कर सकते हैं, क्योंकि उनके पास चारित्र नहीं होता।

आराधना में संतुलन का महत्व

मनुष्य होने के नाते हमें दर्शन, ज्ञान और चारित्र का सही पालन करना चाहिए। यदि कोई दर्शन आराधना नहीं करता, लेकिन ज्ञान और चारित्र आराधना करता है, तो यह अधूरा है। इसी तरह, यदि कोई दर्शन आराधना करता है, लेकिन ज्ञान और चारित्र में रुचि नहीं रखता, तो भी यह सही नहीं है। तीनों में से किसी भी आराधना में रुचि न रखने वाले जीव मिथ्यात्वी होते हैं और मोक्ष मार्ग पर नहीं होते। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र के साथ व्रत, वृत्ति, पचकान और तपस्या करने वाला ही मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।

ज्ञान का महत्व और अंधविश्वास

सम्यक दर्शन के बिना ज्ञान में रुचि रखने से मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ना मुश्किल है। दर्शन और ज्ञान दोनों में रुचि रखने वाले, लेकिन आचरण न करने वाले भी संसार में ही रहते हैं। केवल व्यवहार धर्म की श्रद्धा रखने और क्रिया करने से भी लाभ नहीं होता, यदि भगवान के स्वरूप का सही ज्ञान न हो। बिना ज्ञान के धर्म अंधविश्वास बन जाता है, और उद्देश्य मोक्ष की जगह सुख-दुख प्राप्त करना रह जाता है।

आराधना के विभिन्न पहलू

सम्यक दर्शन के लिए दर्शनाचार का पालन और अतिचारों से बचना आवश्यक है। सम्यक ज्ञान के लिए ज्ञानाचार का पालन और अज्ञानाचार का त्याग करना चाहिए। सम्यक चारित्र साधु-साध्वी और श्रावक-श्राविका दोनों के लिए है, जिसमें चारित्र अतिचार का त्याग और चारित्रचार का पालन करना होता है। तपाचार को भी चारित्रचार में समाविष्ट किया गया है।

आराधना में पसंदगी का प्रश्न नहीं

आराधना में यह नहीं कह सकते कि हमें यह पसंद है और यह नहीं। सामयिक, परमात्मा की पूजा, प्रतिक्रमण और भगवान के दर्शन सभी का समान महत्व है। सम्यक ज्ञान के बिना आराधना अधूरी रह जाती है। परमात्मा के वितरागी, केवल ज्ञानी और तीर्थंकर स्वरूप को जानना आवश्यक है।

नौ पद और मोक्ष मार्ग

नौ पदों (अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु और आत्मा के चार गुण) का सामूहिक रूप से मोक्ष मार्ग में महत्व है। अरिहंत भगवान ने भी सम्यक दर्शन, केवल ज्ञान, दीक्षा और तपश्चर्या के माध्यम से मोक्ष प्राप्त किया। भूतकाल में भी बिना सम्यक दर्शन, केवल ज्ञान, दीक्षा और तप के कोई मोक्ष में नहीं गया।

उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्य आराधना

उत्कृष्ट रूप से ज्ञान, दर्शन और चारित्र की आराधना करने वाले इसी भव में मोक्ष जा सकते हैं। मध्यम आराधना करने वाले दो-चार भव के बाद मोक्ष जाते हैं, जबकि जघन्य आराधना करने वालों को कई भव लग सकते हैं। भव घटाने के लिए जघन्य से मध्यम और मध्यम से उत्कृष्ट कक्षा में आना आवश्यक है। महाविद क्षेत्र में तीर्थंकर भगवान और केवल ज्ञानियों की उपस्थिति से उत्कृष्ट कक्षा में आने में मदद मिलती है।

अंतिम विचार

भव संख्या घटाना हमारे हाथ में है। हमें यह नहीं कहना चाहिए कि यह ऊपर वाले की मर्जी है। जैन धर्म में यह स्पष्ट है कि हमारी आत्मा ही हमारे कर्मों के लिए जिम्मेदार है। इस अध्याय का उद्देश्य यही है कि हम अपनी आराधना को सही दिशा में ले जाएं।

प्रश्नोत्तर

एक प्रश्न के उत्तर में बताया गया कि अंधविश्वास वह है जिसमें मिथ्यात्व और सम्यक दर्शन का मिश्रण हो। वास्तविक श्रद्धा में सुख-दुख का हेतु नहीं होता, बल्कि कर्म क्षय का उद्देश्य होता है। वास्तविक श्रद्धा चौथे गुणस्थान पर होती है, जबकि अंधविश्वास पहले गुणस्थान पर रहता है और आगे नहीं बढ़ता।

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Transcript

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0:00 प्रसाद करे प्रसाद करा जी नमो अरतां नमो सिं नमोणं नमोणं नमो लो साहं ए पंच नमो पाव पणास मंगलं च परम हवय मंगलम जय जगणो जग गुरु जग जगना जग बंधु जय जग या महोय जय सुया ती पश्चिमो जय गुरुम जय महाप महावी सर्व प्रणाय

0:47 सर्वदा दायिनी सर्व निधानाय श्री गौतम स्वामिने नम श्री सुधर स्वामीने जननाय नेत्रितम तस्मै श्री गुरुवे नम साहब जी प्रणाम सभी को आज 24 मई 2026 के दिन अभी हमारी तीसरी क्लास भगवती सूत्र आगम वाचना की है जिसमें हमने लास्ट क्लास से

1:33 शतक आठ और उद्देशक दवा चालू किया था। मैं विभा बहन से विनती करूंगी कि वो हमें लास्ट कल के क्लास की समरी सुनाए। थैंक यू हिना वेलकम आभार साहिब जी मंदामि प्रणाम प्रणाम सभी को लास्ट क्लास में साहिब जी ने हमें बताया था आठवां शतक और दसवा उद्देश्य का विषय था आराहणा यह शब्द अर्ध भाषा में प्राकृत शब्द है। प्रचलित भाषा में इसे आराधना कहते हैं। आराधना शब्द का अर्थ है आत्मा के आंतरिक गुणों की उपासना करना। जानावणीय कर्म ज्ञान गुण पर आवरण आवरण के रूप में कार्य करता है। जबकि

2:18 मोहनीय कर्म दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय में विभाजित होता है। ज्ञान गुण का मुख्य काम जानना दर्शन गुण का मुख्य काम मानना और चारित्र गुण का मुख्य काम आचरण है। ज्ञानावणीय कर्म जानने की क्रिया को कम करता है। दर्शन मोहनीय कर्म सत्य को मानने से रोकता है। चारित्र मोहनीय कर्म आचरण में बाधा डालता है। कर्मों का आचर आवरण जितना कम होगा जानने मानने और आचरण करने की क्षमता उतनी ही अधिक होगी। दुनिया के विभिन्न धर्मों में ज्ञान, क्रिया और आचरण को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण है। कुछ सिर्फ क्रिया को कुछ सिर्फ ज्ञान को महत्व देते हैं। जैन धर्म एकांतवादी दृष्टिकोण को नकारता है और ज्ञान और क्रिया दोनों को

3:06 मोक्ष के लिए आवश्यक मानता है। पांचों इंद्रियों के पास विवेक नहीं है। वे सिर्फ दर्शन से ज्ञान को मति ज्ञान में स्टोरेज करते हैं। मति ज्ञान से विवेक नहीं होगा। श्रुत ज्ञान विवेक करता है और उपयोग करके सही निर्णय कराता है। मोहनीय कर्म श्रुत ज्ञान के पास जाने से पहले ही स्टोरेज से जानकारी ले लेता है और गुणधर्म में गुणधर्म में विपरीतता आ जाती है। जिससे गलत निर्णय हो जाएगा। ज्ञान विचारशीलता को सुधारता है। बिना सही ज्ञान के विचार सही नहीं आते हैं। विचारों को शुद्ध करने के लिए ज्ञान की शुद्धता परम आवश्यक है। जब तक बाल्यावस्था में शुद्ध ज्ञान से विवेक ना कर सके तब तक हमें

3:55 बालकों को आचार धर्म सिखाना चाहिए ताकि उसका आचरण सुधर जाए। फिर क्रिया और ज्ञान को साथ में व्यवस्थित करते जाना चाहिए। क्रिया के आचरण में ज्ञान का जुड़ना सकाम निर्जरा को बढ़ाता है। जी साहब जी आगे आप हमें और समझाएं। बहुत-बहुत धन्यवाद आपको। भगवती सूत्र के इस क्लास में आज हम दव उद्देश्य का दूसरा चैप्टर पढ़ रहे हैं। आठवा शतक ही चल रहा है और यहां पर विशेष रूप से यह सूत्र लगभग लगभग लोगों को आता होगा। अब यहां पर अगर आपको आता है तो ये देखिए

4:40 क्या लिखा है? मोक्ष मार्ग का। अब मोक्ष की दिशा तरफ जो हमको ले जा रहा है यह मोक्ष मार्ग है और कैसे हम आगे बढ़े तो यहां पर आपको ये सूत्र बता रहा है कि हमारी आराधना जो है वो ये तीनों प्रकार की आराधना है। अब इस आराधना के अंदर आप जो है कौन सी आराधना किस स्थान पर कितने प्रमाण में कर रहे हो? अब यह नहीं पूछा जा रहा है कि आपको कौन सी ज्यादा पसंद है। आप कौन सी ज्यादा अच्छी मानते हो? कौन सी आप ज्यादा करना चाहते हो। कोई ऐसी बात नहीं है। पहली बात आप

5:29 ध्यान में रख लीजिए। यहां पर जो है यह आपको स्पष्ट रूप में ख्याल आया। आपको तीनों की आराधना का बैलेंस रखना है। लेकिन संसार बहुत बड़ा है। अनंत काल से चल रहा है। और सभी जीव सब प्रकार की आराधना कर ले। यह कितना संभव है यह आपको देखना है। सम्यक दर्शन की आराधना सम ज्ञान की आराधना सम्यक चारित्र की आरा क्या हम तीनों आराधना को बैलेंस पूर्वक समान रूप से व्यवस्थित कर रहे हैं

6:16 या तीन में से कोई दो पर ज्यादा ध्यान दे रहा है या कोई तीन में से एक पर ही ध्यान दे रहा है या तीनों का भी निषेध करके कोई कर रहा है। सब प्रकार के लोक है। आ रही है बात समझ में? ध्यान में लीजिए। मैं यहां पर ये फिगर लिखता हूं। तो सम्यक दर्शन की आराधना आपको कहां? चौथे गुणस्थान पर। यह यहां पर आपको सम्यक ज्ञान की आराधना आपको एक से लेकर के पहले गुणस्थान से लेकर के सब जगह पर आगे चलते जा सब सम चारित्र की आराधना ये आपको पांचवे

7:03 गुणस्थान छठे गुणस्थान से आगे चलते जाए अब यहां पर देखेंगे देवलोक के देवता है वो दर्शन और ज्ञान की ही आराधना कर सकते हैं। अब उनके पास चारित्रचार नहीं है। ठीक है? चारित्र का मतलब क्या हुआ? यहां पर विशेष रूप से क्रियात्मक आचरण जो करना है व्रत नियम पान तप तपश्चर्या सारी आराधना हो क्योंकि एक बात जरूर समझे जैसे कि कल हमने समझा था अकेले दर्शन से भी मोक्ष नहीं है। अकेले ज्ञान से भी मोक्ष नहीं है। अकेली क्रिया या चारित्रचार से भी

7:51 मोक्ष। अभी विभा जी ने आपको जो है समरी के अंदर जो बताया दूसरे अन्य लोगों के मत अन्य दार्शनिक कोई किस में मानता है कोई किस में मानता है कोई किस में नहीं मानता है कोई किस में नहीं मानता है अलग अलग ख्याल आया आपको तो यहां पर आपने ये देखा कि अब ये जो हो गए देवी देवता उनके जीवन में तो दर्शन ज्ञान की आराधना है चारित्र आचार्य नहीं हम तो मनुष्य है ना। हम जो मनुष्य है तो हमें क्या करना चाहिए? सोचिए। हमको किस तरह से करना है? तो यहां पर आप दर्शन आराधना भी मान रहे हो। ज्ञान

8:37 आराधना भी मान रहे हो। कर रहे हो। चारित्रचार का पालन भी सही कर रहे हो। ये हो गया। आपने देखा एक नंबर इनका हो गया। दूसरा नंबर यह हो गया। तीसरा कोई अगर हो दर्शन आराधना ना करे ज्ञान आराधना और चारित्र आराधना करे तो क्या कहना ये भी आप समझिए यहां पर और इसके बाद अगर आप यह भी देखो कि कोई दर्शन आराधना करता है ज्ञानाचार में नहीं रस लेता है चारित्रचार में रस लेता है किसी को देखोगे दर्शन आराधना कर रहा है। ज्ञान आराधना

9:23 करता है। चारित्रचार में रस नहीं है। समझे कि नहीं? किसी को देखोगे दर्शन आराधना भी नहीं है। और अकेली ज्ञान आराधना करता है। चारित्रचार में बिल्कुल रस नहीं है। और भी आप देखोगे कि जिनके अंदर यहां पर सर्वथा बिल्कुल जो है रस ना हो। तीनों में से कोई भी तो यह तो बात अलग हो गई कि यह जीव जो है यह मिथ्यात्वी जीव जो होते हैं जो मोक्ष मार्ग पर नहीं है। बोलिए निखिल भाई आपको ये सब जो देख लिए आप यहां से

10:16 सब अलग-अलग लग रहे हैं। सब प्रकार के जीव है। अपने अपने कर्मु है। लेकिन इसके अंदर जो तीनों के अंदर सम्यक दर्शन भी साथ में लेकर चल रहा है। श्रद्धावान है। ज्ञान भी सम्यक ही प्राप्त कर लिया है। और साथ में चारित्र्राचार के अंदर व्रत वृत्ति पचकान तप तपस्या आराधना सब में सक्षम वही आत्मा यहां पर मोक्ष मार्ग पर रहेगा ये जो है जिसको आप कहते हो यह मोक्ष मार्ग पर चढ़ अब बाकी के सब आप देख लो अलग-अलग से

11:03 अब क्या होगा यहां पर एक एक से समझो सम्यक दर्शन नहीं है, श्रद्धा नहीं है, आचरण नहीं करना है। फिर भी ज्ञान में रस है। वो यह समझता है कि नहीं ज्ञान बहुत अच्छा है। ज्ञान इनके अंदर विपुल प्रमाण में है। विविध प्रमाण में हम ज्ञान को जरूर सीखेंगे। ज्ञान जरूर प्राप्त करेंगे। ऐसे करके अगर आप करोगे तो परिणाम क्या आएगा? अब मोक्ष मार्ग पर आगे कैसे बढ़ोगे? यह भाई साहब जो है दर्शन भी मानने को तैयार है, ज्ञान भी मानने को तैयार है। आचरण की नात है।

11:49 नहीं मुझे नहीं। अब क्या करेंगे आप? है संसार है। ध्यान रखिए। देवताओं में भी है, मनुष्य में भी है। ख्याल आया कि नहीं? अगर मनुष्य में भी है और वह इस प्रकार की वृत्ति रखते हैं। नहीं नहीं नहीं बस बस बस बस अपने को तो ज्ञान ज्ञानात्मक ही चाहिए। सब क्रिया करके क्या करना है? आचरण से क्या होता है? क्रिया से क्या होता है? आत्मा थोड़ी करता है। आत्मा थोड़ी करता है। ये सारी बातें आप मान करके दिमाग और खराब हो। वृत्तियां और हमारी भी कर बैलेंस बनाइए। जीवन के अंदर बिल्कुल धर्म आराधना भी कर रहे हो तो बैलेंस बहुत सही होना चाहिए।

12:36 यहां पर ये भाई साहब दर्शन में तैयार है लेकिन ज्ञान बिल्कुल फिर भी क्रिया कर रहे हैं। श्रद्धा बनाई है। ऊपर ऊपर की व्यवहार धर्म के श्रद्धा बनाई है और व्यवहार धर्म के आचरण क्रिया प्रवृत्ति कर रहे हैं। लेकिन ज्ञान के अंदर वो बिल्कुल नहीं। अब क्या करना बताइए आप? कैसे करना? अगर वो ज्ञान में कोई रस रुचि ना ले। मैं भगवान को मानता हूं। लेकिन जब पूछा जाए कि क्या आप भगवान को जानते हो? क्या आप भगवान का सही स्वरूप जानते हो कि नहीं? तब उसके

13:21 लिए तकलीफ। नहीं नहीं बस मैं मानता हूं ना। फिर क्या है? मैं माला जपता हूं। मैं क्रिया विधि करता हूं। मैं जो है मंदिर जाता हूं। लेकिन भगवान के बारे में कुछ भी नहीं जानते। धर्म के बारे में और कुछ भी जानने की रस रुचि नहीं है। वो अपनी तरफ से इतना ही प्रयत्न करते हैं। बस आगे तो कैसे चलेगा सोच? वो तो कभी मोक्ष में नहीं जा सके। वह आगे भी नहीं बढ़ सकेगा। आप बैलेंस बताने की कोशिश करिए। आज भी मैं आपको कहता हूं कि यह नंबर वाले बहुत ज्यादा

14:08 ये नंबर वाले जो आपको दिख जाएंगे समझे कि नहीं बहुत ज्यादा और भी आपको अगर बता दूं कि जिसमें इन दोनों के बिना भी आचरण करने वाले और है मतलब जिनको दोनों में रस नहीं है ना तो सम्यक दर्शन में ना सम ज्ञान और फिर भी समय आने पर परषण आ जाए तो अठाई कर लेंगे अम कर लेंगे प्रतिकम कर लेंगे व्यवहार नय से भाई मैं जैन कुल में पैदा हुआ हूं ना जैन है और लोग सब करते हैं मैं कैसे बाकी रहूं मैं भी साथ में राज कर उनके अंदर ना तो सम्यक दर्शन है ना सम

14:55 कैसे रिजल्ट आए जो परिणाम लक्षी हम कह रहे हैं। रिजल्ट लक्ष्य के अंदर की बात कर रहे हैं। वो कैसे ख्याल आया? तो बहुत मुश्किल बन जाता है। संभव नहीं रहता है। ऐसी स्थिति के अंदर ऐसे आत्मा आज भी बहुत बड़ी संख्या में है। परसण आ जाएंगे। होली जी आ जाए हम भी कर लेंगे बड़े दिन आ जाए तो बड़ों के साथ में दूसरे भी मिलकर के कर लेंगे लेकिन तैयारी नहीं है उनकी अब बिना ज्ञान के कैसे होगा बिना दर्शन के कैसे होगा

15:43 कैसे चलेंगे सम्यक दर्शन आपकी श्रद्धा और निष्ठा पर सम्यक ज्ञान नौ तत्वों का सही ज्ञान समस्त द्रव्य गुण पर्यायों का सहित ज्ञान उसके बिना आगे नहीं चलेगी। मतलब जिनको हम आप कह रहे हो चलो भूतकाल में भी अनंत आत्माओं को देखिए कि जो मोक्ष में गए हैं तो किस रास्ते से गए? इसमें से आपको कौन सा लग रहा है? बिना दर्शन के तो कोई मोक्ष में नहीं जा। सम्यक दर्शन के बिना अनंत भूतकाल में भी कोई मोक्ष में नहीं। सम्यक ज्ञान के बिना भी अनंत भूतकाल में कोई मोक्ष में नहीं गया और सम्यक चारित्र के बिना भी कोई

16:29 मोक्ष में। अब हम तो सिर्फ यहां पर सम्य ज्ञान सम्य ज्ञान ही कर सकते हैं। लेकिन मोक्ष के लिए जो नियम जोड़ा है बिना चारित्र के भी मोक्ष नहीं। बिना केवल ज्ञान के भी मोक्ष नहीं। बिना क्षायिक सम्यक के भी मोक्ष। इसलिए जो है सूत्र ही जो स्वाति महाराज ने जो बनाया है वह तीनों बैलेंस में बनाया सम दर्शन ज्ञान चारित्रणी मोक्ष ऐसा बनाया है तो ये क्यों बनाया ऐसा किस लिए बनाया है कि जो व्यवस्था की है सोचिए आप सुन किस प्रकार की व्यवस्था थी अब हमें

17:16 यह समझ लेना पड़ेगा मैं दूसरों की बात नहीं करता हूं। अपनी खुद की बात सबको सोचनी है। अगर तराजू लिया जाए तो क्या मैं तीनों प्रकार की आराधना में बैलेंस में बैठता हूं? क्या तीनों प्रकार की आराधना में मेरा बैलेंस सही ढंग से बना हुआ है या नहीं है? पहले यह देख सबको ख्याल आ जाना चाहिए। अपना अपना देखो अपनी आत्मा में देखो मुझे किसी दूसरों को कहने का कोई राइट नहीं अधिकार नहीं मैंने सम्यक दर्शन प्राप्त किया कि नहीं किया मैं सम्यक दर्शन पूर्वक

18:03 आराधना कर रहा हूं कि नहीं कर रहा हूं और सम्यक दर्शन मतलब श्रद्धा तो क्या मैं व्यवहार नहीं की ऊपर ऊपर की श्रद्धा रख रहा हूं देव गुरु धर्म देव गुरु धर्म देव गुरु धर्म मैं तो मानता हूं मैं देव गुरु धर्म मानता हूं जी हां आप अगर आ चुके हैं, फर्स्ट स्टेप पर आए हैं तो आगे बढ़िए। आगे बढ़कर के आप भगवान ने जो जो कहा है उस सब वचनों पर आइए। भगवान ने पांचो अस्तिक आयात्मक पदार्थ का स्वरूप बताया। उत्पादक स्वरूप बताया है। आप आइए उस पर भी आइए। क्यों नहीं आ रहे? वो भी करना है। ज्ञानाचार भी आना चाहिए। का चारित्रचार भी

18:48 आना चाहिए। जीवन में व्रत नियम, पकांड, तप, तपश्चर्या, आराधना, कर्म, क्षय की साधना नहीं आएगी तो निर्जरा कैसे होगी? आप चारित्रचार में बिल्कुल ना रहो। और फिर आप बोलो कि मैं तो ज्ञानाचार में ही निज्रा कर लूंगा। मैं दर्शनाचार से निज्रा कर लूंगा। 100% रिजल्ट नहीं आता। ये बात ध्यान में रखिए। 100% रिजल्ट नहीं आता है। तो तीनों को महत्व दीजिए जीवन के अंदर। यहां पर इसी विषय में बात करते हुए थोड़ी काफी स्पष्टता की है और इस स्पष्टता को बताते बताते। अब हमको यह स्पष्ट कर रहे

19:35 हैं कि अगर हम यहां पर बराबर ध्यान दीजिए। दर्शन दर्शन जो है यह सम्यक दर्शन तो यहां पर आपको क्या चाहिए पहले दर्शनाचार का पालन और इधर देखिए दर्शनाचार के अतिचार का

20:25 ये दोनों तरफ से बताया है। अब आपको ध्यान में आ रहा है कि यह सम्यक दर्शन जो है हमारे सम्यक श्रद्धा जिसको आप कहते हो ये सम्यक श्रद्धा कैसी होनी चाहिए तो जो दर्शनाचार का शुद्ध पालन करते हुए चलिए फिर दर्शना के अतिचार जो आते हैं आप बोलते होंगे निखिल भाई ध्यान में है निशंकीय निकच्छा मुर उ तेरी करने व प्रभाव अ ये जो आठों प्रकार के अतिचार है उनका सेवन नहीं है वो सावधानी में रहना है कि मैं इनसे कैसे बचू

21:12 ये दोनों तरफ से आपको प्राधान्यता आनी चाहिए सब इधर नंबर दो पर आ जाइए यह हो गया एक अब दूसरे में आ गए आप यहां सम्यक ज्ञान में आ अब सम ज्ञान में भी आप क्या करोगे यहां पर आप देखिए आगे चलकर के ज्ञानाचार का पालन करना इधर क्या करेंगे अज्ञाना चार

22:02 अगर आप बराबर ज्ञान अतिचार जो लग रहे हैं दोष लग रहे हैं उनका अगर हम त्याग करते जाते हैं और शुद्ध ज्ञानाचार आठों प्रकार का है काले विनय बहुमान की निंदा वंजन अ तदय अविण ये आठों प्रकार का ज्ञानाचार हम पालन पर वो सम्यक ज्ञान आपके लिए बिल्कुल भव घटाने वाला सम्यक दर्शन हमारी भव परंपरा घटाने वाला है। सम्यक दर्शन आपने प्राप्त किया तो अनंत पुद्गल परावर्तक घट के अर्ध पुद्गल

22:48 परावर्त सम्यक ज्ञान में अगर आप आगे बढ़ गए तो आप काफी ज्यादा आगे बढ़ते हुए उस अर्ध पुद्गल में से भी आधा फिर सम्यक चारित्र में अगर आप आ गए तीनों का बैलेंस करके फिर तो गिनती के थोड़े से भो में ही मोक्ष हो वही बात यहां पर इस अध्यय में बता रहे हैं। इधर देखिए तीसरा क्या है? ये आ गया सम्यक चारित्र। अब सम्यक चारित्र दोनों के लिए है। साधु साध्वी के लिए भी है। श्रावक श्राविका दोनों ही सम्यक चारित्र है। क्या फर्क है?

23:37 श्रावक श्राविका के लिए थोड़े प्रमाण में इसलिए उसको देश साधु साध्वी के लिए पंच महाव्रत के लिए संपूर्ण रूप यही विशेषता है यह तो ये अगर हम दोनों बैलेंस में बैठाते हैं। ठीक है? आप गृहस्ती हो। आप गृहस्थ आश्रम में जीवन में हो। पत्नी पुत्र परिवार व्यापार व्यवसाय सब कुछ है आपकी मर्यादा के हिसाब से आखिर वो भी तो तीर्थंकर भगवंतों ने ही बनाया श्रावक धर्म किसने बनाया श्रावक धर्म की व्यवस्था भी तो तीर्थंकर भगवान ने की दोनों का उद्देश्य मोक्ष की दिशा तरफ ही की है। दोनों को एक दिशा में ही चल

24:25 आज श्रावक जीवन में अनुव्रत है। कल महाव्रत में आएगा। इसमें क्या बड़ी बात है? अब यह सब में चारित्र है। तो यहां आप क्या करेंगे? ये चारित्र अतिचार का त्याग करेंगे। इधर क्या करेंगे? चारित्रचार का पालन करना है। अब देखिए तीनों का बैलेंस बन रहा है। एक क्लेरिफिकेशन क्या है यहां पर?

25:13 चारित्रचार में ही तपाचार को समाविष्ट करके जोड़ दिया। उसको वो भी क्रियात्मक है। करना ही है। उसमें भी आचरणी है। तो यह मत सोचना कि नहीं नहीं नहीं तपाचार तो है ही नहीं। इसलिए सूत्र आपने जब सुना है तो उसमें आदि शब्द लिखा है धर्म सम्यक दर्शन ज्ञान चारित्रणी मतलब प्लुरल जो दिया है वहां पर आ शब्द से बहुवचन करके प्लुरल दिया है तो वो ये गिनती करके साथ में ले सामयिक भी करनी है उपवास भी करना है प्रतिक्रमण भी करना है आयुर्वेद भी करना है क्रिया भी करनी है तप भी करना है ये चले चलेगा

25:58 आप इसमें से एक को मुख्य दूसरे को गण दो को मुख्य तीसरे को गण एक को मुख्य दोनों को गौ यह नहीं कर सकते हैं आप यह नहीं बोलेंगे मुझे यह पसंद है यह पसंद नहीं है नहीं मुझे तो यह पसंद है यह पसंद नहीं है इधर पसंदगी का प्रश्न नहीं आ रहा है यह खाने पीने की भोजन की वस्तु नहीं है कि मैं यह पसंद करता हूं, यह पसंद नहीं करता हूं। यह गलती मत करिए। ख्याल आया कभी? हमें पसंदी का प्रश्न नहीं है। सामयिक भी उतनी ही करनी है। परमात्मा की पूजा भक्ति भी उतनी ही करनी है।

26:45 प्रतिक्रमण भी करना है और भगवान के दर्शन और नाम स्मरण भी करना है। बैलेंस बनाइए। ज्ञानाचार के अंदर भी हम आ गए। सम्य ज्ञान अवश्य प्राप्त करना। सम्यक दर्शन कह रहा है भगवान को मानना है। सम्य ज्ञान कह रहे हैं भगवान का सही स्वरूप जानना है। आप गलती नहीं करेंगे। क्यों नहीं जानेंगे हम? अगर आप परमात्मा वितरागी है, परमात्मा केवल ज्ञानी है, परमात्मा तीर्थंकर है। यह सही स्वरूप आप नहीं जानोगे तो कैसे चले फिर कैसे चले यह हमें अवश्य जान

27:33 ज्ञान तो चाहिए कि नहीं बिना ज्ञान के फिर वापस आप ब्लाइंड फेथ में चले जाओगे और ब्लाइंड फेथ में गए तो क्या होगा धर्म तो यही रह जाएगा लेकिन उद्देश्य बदल जाएगा मोक्ष की जगह पर हमारे सुख दुख के लिए करते रहेंगे फिर तो बस बस बस बस बस बस हमारा दुख कले सुख मिले दुख कले सुख मिले दुख कले सुख मिले अगर सम्य ज्ञान नहीं होगा तो आप आईिल करके भी बोलेंगे नहीं नहीं हमने तो पुण्य उपार्जन किया आप अम करके अठाई करके बोलेंगे नहीं नहीं हमने तो पुण्य उपार्जन किया है जी नहीं आपने आई एम मिल की तपस्या कर्मक्षय मेज्रा के लिए आपकी तपश्चर्या कर्मक्षय निजरा के लिए

28:20 उद्देश्य बना लो पहले स्पष्टता कर लो। इसलिए कहा गया कि जब जो भी पचकांड लो पचकांड सम प्रधान है। तो उसमें रिजल्ट लाने के लिए आपको कर्मक्षय का उद्देश्य बनाकर पचान लेना। आज मैं उपवास मेरे कसाय मोहनीय कर्म को घटाने के लिए कर रहा। आज मैं आई एम विल मेरे लाभ कर्म को घटाने के लिए क्षम करने के लिए कर रहा हूं। आज मेरी ये सामायिक आत्मा के समता गुण को बढ़ाने और क्रोध कसाय मोहनी को घटाने के लिए कर रहा। आपका उद्देश्य आ जाए साथ में जुड़े वो कौन

29:07 जोड़ेगा? सम ज्ञान ये इसका ताप है। सम ज्ञान के बिना फिर आराधना हमारी अधूरी रह जाएगी। तीनों में से चारों में से सम्यक दर्शन, सम ज्ञान, सम चारित्र, सम तप अगर हम तीनों में से बैलेंस नहीं करेंगे और फिर अगर आपकी आराधना अधूरी रह गई तो फिर हमें उस प्रकार का रिजल्ट नहीं मिलेगा। यहां पर आपने देखा ये केंद्र के अंदर ये हमारी आराधना जो चल रही है और ये इधर एक सर हमको सम्यक दर्शन दिया इधर आप आ गए ये हमको सम्यक ज्ञान दिया

29:57 ये इधर आप आ गए ये सम्यक चारित्र और इधर आप आ गए ये सम्यक तब अब ये भी आपके लिए जो है ये भी मोक्ष का साधन बन रही है। ये भी मोक्ष का साधन है। ये भी मोक्ष के लिए है। ये भी मोक्ष के लिए है। ये आत्मा के गुण है। नवपद के अंदर देख लो ये आत्मा के गुण है। और गुणी भगवंत अरिहंत सिद्ध आचार्य उपाध्याय दोनों का कॉम्बिनेशन कर दिया है। पांच परमेष्ठी चार आत्मा के गुण जोड़कर के नौ पद कर

30:49 अब नौ पदों की एक साथ में सामूहिक सा कल आप बोलोगे नहीं नहीं नहीं नहीं नहीं अरिहंत के सिद्ध की तो हम पूजा भक्ति कर लेंगे आचार्य उपाध्याय साधु के दर्शन ज्ञान चारित्र की क्या पूजा भी आपकी आत्मा के गुण आपको सेल्फ रियलाइजेशन के लिए आत्मा गुणों की उपासना के लिए यह यहां पर दिया है कि यह आत्मा के गुण आपको अवेयरनेस आए। आपको जागृति आए आपके अंदर उसका उपयोग आप जागृत हो। यह इसकी आस तो है तो मोक्ष मार्ग ही बिल्कुल मोक्ष मार्ग है। आपको ये समझना है कि यहां पर जो है ये अरिहंत भगवान जो है

31:37 और ये मोक्ष में जाकर सिद्ध बने। अब अरिहंत भगवान गए तो इसमें से कौन सा कम खुद भगवान अरिहंत गए तो उन्होंने सम्यक दर्शन प्राप्त किया कि नहीं किया? कंपलसरी किया उन्होंने केवल ज्ञान प्राप्त किया पहले मती श्रि पांचो ज्ञान आ गए उन्होंने कुछ दीक्षा ली वे भी चारित्र ग्रहण करके साधु बने उन्होंने इतनी जबरदस्त तपश्चर्या की इतनी तपश्चर्या करके बोलिए अब ये सब इनके लिए आ गए इधर देखिए ये कौन है आचार्य भग चलो इनके अंदर दर्शन ज्ञान कौन सा कम कहेंगे आप नहीं सर

32:27 एक भी कम नहीं कैसे इधर आ गए ये उपाध्याय जी महाराज आ गए अब किसकी कमी बताएंगे आप इसमें उनमें भी दर्शन है ज्ञान है चारित्र तप है पूरा सब कुछ है ये यहां पर आप आ गए साधु साधनी जी आ गए ये हो गए नौ पद जी देख लो अब अरिहंत भगवान मोक्ष में गए। आचार्य भगवंत मोक्ष में गए। उपाध्याय पदवी से मोक्ष में गए। साधु साध्वी जी मोक्ष में गए तो किससे गए? कैसे गए सब? नियम तो शाश्वत नियम है। बिना सम्यक दर्शन के कभी कोई मोक्ष में जाता ही नहीं। बिना केवल ज्ञान के कोई मोक्ष में गया ही नहीं।

33:15 बिना दीक्षा लिए कोई मोक्ष में गया ही नहीं। अनंत भूतकाल में नहीं गए कोई और बिना तप किए भी कोई मोक्ष में नहीं है। आप बोलो कि मैं तो खाता पीता जाऊंगा भाई। मेरे को तप कुछ नहीं करता है। नहीं नहीं मैं तब कुछ नहीं मानता। मैं तो खाते पीते आराम से मोक्ष मिल जाए। ऐसी गलती मत करना। ऐसा सोचना भी मत। विचार भी नहीं करना। यह नौ पद आपको अनंत काल के अनंत भूतकाल के और अनंत भविष्य काल के शाश्वत नियम को समझा रहे बिल्कुल शाश्वत नियम कितनी बड़ी बात अब हमें क्या समझ लेना

34:02 चाहिए भूतकाल तो बीत गया अनंत भूतकाल का यह नियम चल रहा है आज हम तो वर्तमान में है वी आर इन प्रेजेंट अब भविष्य काल जो भी आने वाला है जब भी हम मोक्ष में जाएंगे हमें भी यही रास्ता लेना पड़ेगा। इसी रास्ते चलना पड़ेगा। इसी तरीके से हमको मोक्ष प्राप्त करना है। इसमें कोई फर्क नहीं। ये बात जरूर समझ। ये हमारे साथ में यह जो विशेषता जुड़ी है। अब यहां एक बात बहुत अच्छी पूछ रहे हैं। निखिल भाई आपने देखा है इसके रिजल्ट में भी बताया है। हे भगवन किस तरह से जो है

34:49 कितने प्रमाण में कितने भ में किसी का कल्याण हो सकता है। तो यहां पर कहते हैं कि उत्कृष्ट रूप से ज्ञान दर्शन और चारित्र की आराधना करने वाले या तो इसी भोग में मोक्ष में जाए या शायद ना मोक्ष में जाए तो क्योंकि यहां आज पंचम काल का कलयुग आ गया ना तो आज हमारे इस पंचम काल के कलयुग में संभव नहीं है। तो भाई साहब आप बेईमानी देवगति में जाकर देखो। फिर वहां से एक जन्म महावि आप दूसरे जन्म में मोक्ष में चले जाओ। अगर यहां पर क्या कहा है? तीनों बात ध्यान में ले लो। अब आप इसमें से जो है सबके लिए

35:37 शब्द प्रयोग कर लिया है। क्या शब्द प्रयोग है? ये दर्शन, ये ज्ञान और ये चारित्र। अब यह उत्कृष्ट करें हम यह मध्यम करें हम यह जघन्य मतलब यहां टेक्स्ट में यह शब्द है मैंने आपको सिंपली समझा दिया अगर आप यह उत्कृष्ट रखते हो और यह मध्यम कक्षा के करते हो मीडियम लेवल की और ये तो बिल्कुल लोअर लेवल के चारित्रचार में तो मोक्ष नहीं मिला तो आप आगे नहीं बढ़ो यहां पर आपको यह देखना है ये भी उत्कृष्ट लेवल वल का हो ये भी उत्कृष्ट लेवल का हो समझे कि नहीं अब यह आत्मा

36:24 आज अगर महाविद में जो है वो तो इसी जन्म में मोक्ष में चले जा वो तो जा लेकिन अगर मान लो संपूर्ण सब कर्मों का क्षय नहीं हुआ और उत्कृष्ट करते करते भी आयुष समाप्त हो गया तो चलो भाई कोई हरकत नहीं मोक्ष में नहीं गए आप तो वैमानिक देव प्रति में जाकर के उच्च कक्षा के वैमानिक देव ये फायदा चलो भाई इससे आगे चलो देखो अब कई जीव कल्पो पर या कल्पाती देव लोक में जाकर के वहां पर जो है फिर वापस रहेंगे फिर वहां से उतर के आ जाए फिर मध्यम वाले जो है वो

37:10 कहां जाएंगे तो मध्यम दर्शन मध्यम ज्ञान मध्यम चारित्र आराधना वाले अब बहुत ज्यादा से ज्यादा दो चार भव कर लेंगे और क्या होगा तीसरे भव में मोक्ष में जा सकेंगे और फिर जो है कालांतर में मतलब दो चार भव के बाद जरूर मोक्ष में जाएंगे अब नीचे उतरते आइए आप समझे कि नहीं अगर वो जघन्य रूप से ज्ञान दर्शन चारित्र की आराधना करे तो कई जीव जो है अब थोड़े से तो बढ़ भी जाए तीन चार पांच सात आठ नौ ऐसे भ बढ़ जाए समझे कि नहीं क्योंकि महा विद में आज हम चले जाए तो वहां पर क्या है एक तो सबसे बड़ा फायदा है एक एक महादे में एक एक तीर्थंकर

37:58 भगवान के पास 10 द लाख केवल ज्ञानी वरुण जी फिगर सुना आपने 10 लाख केवल ज्ञानी एक एक तीर्थंकर भगवान के पास में सबके 84 84 गणधर है। अब 10 लाख से 20 का गुणाकार मल्टीप्लाई करो। कितने हुए? क्या हुआ? दो करोड़ दो करोड़ दो करोड़ की तो दो करोड़ केवल ज्ञानी एट प्रेजेंट टुडे 20ों महादे क्षेत्र पांचों महाविद क्षेत्र में 20ों तीर्थंकर

38:44 भगवान के अब आप सोच लीजिए कोई 10 लाख केवल ज्ञानी एक जगह तो नहीं रहेंगे हम अगर महाविद में जन्म लेते हैं तो कहीं ना कहीं कहीं ना कहीं किसी ना किसी केवल ज्ञानी का तो योग संयोग बैठ ही जाएगा हम भी उनको में मिल जाएंगे वंदना करें मान लो दूर हो तीर्थंकर तो एक रहेंगे ना अगर आप तीर्थंकर भगवान को नहीं मिल पाए तो केवल ज्ञानी की सभा में चले जाना गणधर भगवंतों के पास चले जाना साधु साथियों के पास हम चले जाए समझे कि नहीं तो कितनी अच्छी बात हो जाएगी आप सोचिए ऐसे योग सहयोग मिल जाए तो हम भी उत्कृष्ट कक्षा में आ

39:30 अब उत्कृष्ट कक्षा में आने में शायद थोड़े से बढ़ भी जाए। अगर हम मध्य में कक्षा में चल रहे हैं तो हमारे भ बढ़ेंगे। जगन्य में चल रहे तो और बहुत बढ़ेंगे। अगर हमें भ घटाने हैं तो जगन्य से ऊपर आइए। मध्यम में आइए, मध्यम से ऊपर आइए, उत्कृष्ट में आइए। फिर उच्च कक्षा में आना पड़ेगा आपको। अब कोई कहे कि नहीं मैं तो तीनों ही जघन्य लेवल की करो या जघन्य मतलब लोअर लेवल मतलब रोज मैं नियमित अच्छी तरह से आराधना नहीं कर पा रहा हूं कभी कभी कभी कभी तो फिर वो उत्कृष्ट भाव नहीं

40:16 कोई यहां पर कहे कि नहीं नहीं मैं तो मध्यम लेवल की मीडियम क्लास की कर तो भाई साहब आप मध्यम लेवल की मीडियम क्लास की करोगे तो भी रिजल्ट कैसे आखिर आपको उत्कृष्ट की कक्षा में जाना अनिवार्य है। अब उत्कृष्ट का मतलब क्या होगा? एक तो निरतिचार हो जाए। अतिचारों का सेवन ना हो। निरतिचार शुद्ध जीवन जी ले तो उसका भी कल्याण। बहुत अच्छी तरह से हो सकता। तीनों बात यहां पर बताई है। ऐसे आत्मा जो है कई बार थोड़े से भग बढ़ भी जाए। चलो कोई हरकत नहीं। देव गति में भी चले गए तो वहां पर भी वापस

41:04 यही संस्कार, यही आचार, यही परिणाम, यही भाव बने रहते। देव गति में जाकर के भी नीचे गिरना नहीं है। इसलिए आपको मालूम है नौ ग्रह में जाने वाले, पांच अनुत्तर में जाने वाले ज्यादा भोग नहीं करते। बात ख्याल आया कि नहीं? जितना नीचे के देवलोक में जाओगे ज्यादा भव और जितने ऊपर के देवलोक में जाओगे भव करते जाए और फिर पांच अनुत्तर वाले तो है ही भाई साहब कि बस एक दो जन्म में इनका मोक्ष तो होना ही है। जैसे आप देख लीजिए आज पद्मावती देवी वाणी भद्रवीर है। अब वो कोई ऊपर नहीं है। पद्मावती देवी तो निरंतर में है। लेकिन

41:52 अगले जन्म में महाविद में जन्म लेकर मोक्ष में चले। आज वाणी भद्रवीर है कहां पर है? व्यंतर में लेकिन वो उत्तम कक्षा की आराधना करके अगले जन्म में ही महाविद से मोक्ष में चले जाएंगे। उनको क्या कहते हैं हम? एकातारी बस एक भ बात ऐसे करके हम अपनी भव संख्या घटा सकते हैं। आप जितनी ज्यादा चाहो यह हमारे हाथ में है। पर फिर बाद में यह मत बोलना ऊपर वाले की मर्जी और ऊपर वाले के हाथ में है। जैन कभी ऐसे शब्द नहीं बोलते हैं।

42:37 ख्याल आया? जैनों को ऐसे शब्द प्रयोग नहीं करने। हम तो यहां पर स्पष्ट है कि हमारे ही आत्मा के हमारा हमारे आत्मा ये स्पष्टता होनी चाहिए। बहुत अच्छी तरह से यहां पर ये अध्याय उद्देश्य है। इस उद्देश्य का अंतर किया। फिर अब कल फिर अगली क्लास में आगे का विषय अलग से आएगा। आज हमारी तीर्थ वंदना के टाइम में थोड़ा सा ज्यादा टाइम लग गया। आपके लिए थोड़ी 101 मिनट कम हो गई। ठीक है? प्रश्नों पर कोई खास बड़ी बात नहीं होगी। अभी ज्यादा है किसी का प्रश्न बोलो। वंदामी साहब जी साहिब जी आई हैड अ

43:24 क्वेश्चन आपने बताया था अभी के लाइन फेथ नहीं होना चाहिए। लेकिन अगर हम मतलब वी हैव डन ऑल द वी हैव गन गॉट द मैक्सिमम नॉलेज ज्ञान मिल चुका है। मतलब वी आर इन द प्रोसेस ऑफ लर्निंग अबाउट जैन धर्म एंड तीर्थंकर एंड ऑल दैट एंड अपना फेथ जो स्ट्रांग है तो फिर तो दन यू आर जस्ट फॉलोइंग द चरित्र नाउ योर बेस इज क्लियर कि दिस इज इट। सो इज दैट कैन नॉट बी कॉल्ड एस ब्लाइंड फथ राइट बिकॉज़ नाउ आई हैव एस्टब्लिश व्हाट इज द मीनिंग व्हाट इज द मीनिंग ऑफ ब्लाइंड फथ लिटिल बिट ऑफ द फथ श्रद्धा एंड लिटिल बिट

44:12 ऑफ द मिथ्यात्व इस मिक्स वि दैट आर यू रेडी टू ब्रिंग दैट टाइप ऑफ द मिल्क वि कंटेन द हाफ ऑफ द शुगर एंड हाफ ऑफ द साल्ट आल्सो देन तो व्हाट इज द ब्लाइंड फथ? व्हाई आई एम टॉकिंग अबाउट द दिस इज द ब्लाइंड गिफ्ट्स। इन दिस ब्लाइंड फथ यू आर नॉट बिलीविंग इन द सोल्वेशन मोक्ष नथिंग बट व्हाटएवर आई एम डूइंग एनी टाइप ऑफ रिलीजियस एक्टिविटी ड्यू टू दैट आई वांट टू रिमूव माय अनहनेस मिरी एंड दुख टाल। तो फिर उसका क्या होगा? वो दुख निवत्त लक्ष्य लेकर चलेगा। दिस इज नॉट द रियल फथ। अब रियल फथ वाले के

44:59 अंदर क्या रहेगा? दिस इज द रियल फथ। अब रियल फथ वाले के अंदर बिल्कुल परफेक्ट है कि भगवान वितरागी तीर्थंकर भगवान है। त्यागी तपस्वी पंच महाव्रत धारी गुरु है और व्रत वृत्ति पंचकाल का तप त्याग वाला धर्म है। अब उसके पीछे वो सुखदख का हेतु नहीं रखेगा। नॉट दैट गोल टू अचीव द हैप्पीनेस। नहीं मुझे कर्म क्षय करना है। आई वांट टू रिमूव ओनली माय कर्म। व्हाटएवर आई एम डूइंग आइदर उपवास, आइदर सामयिक, आइदर आई एम, आइदर नकार, आइदर पूजा, आइदर दर्शन देयर आर द नंबर्स ऑफ द डिफरेंट टाइप्स ऑफ एक्टिविटी

45:46 ऑफ द रिलजेंस व्हिच यू आर प्रैक्टिसिंग इन योर लाइफ। बट माय इंटेंशन इज ओनली वन एंड द सेम। टाइप्स ऑफ द रिलजन मे बी डिफरेंट डिफरेंट डिफरेंट। सम टाइम इट मे पॉसिबल फिजिकल हेल्थ मेल यू टू डू द उपस बट यू आर डूइंग द सामन यू आर डूइंग दैट पूजा एंड भक्ति बट योर इंटेंशन इस वन एंड द सेम एट टाइम फिजिकल कंडीशन इट मे बी डिफरेंट डिफरेंट ये पॉसिबल है लेकिन ब्लाइंड फथ में नहीं रहना है। तो ब्लाइंड

46:31 फथ में क्या है? अगर आपके साथ में मिथ्यात्व भी साथ में है और थोड़ा सम्यक दर्शन है। अब सम्यक दर्शन 20% है और मिथ्यात्व 80% है। व्हाट द रिजल्ट विल कम? ये नहीं होना चाहिए। फिर वो धर्म उसका रिजल्ट ओरिएंटेड नहीं है। सो व्हाट टाइप ऑफ रिजल्ट यू वांट? ओनली कर्मक्षय। तो रियल फथ क्या करेगा आपको? बिल्कुल कर्मक्ष। तो रियल फथ कहां पर? ये चौथे गुणस्थान पर आए। ये चला जाएगा। किस में? पहले गुणस्थान पर चलो।

47:17 ये आगे नहीं बढ़ेगा। फिर ये इसको यही रुकना पड़ेगा। ये बात समझ जी साहब जी तुम सच्चम नमो अरहता नमो सिद्ध नमो नमो नमो सब साहुंमो पंचम सब पावस मंगलम चम हव मंगलम मंगलम भगवान मंगलम गौतम प्रभु मंगलम जैन धर्मस्तु मंगलम चत मंगलम अरिहंता मंगलम सि मंगलम सा मंगलम केवल पत्रो

48:02 मंगलम चत लोगत्तमा अरिहंता लोगत्तमा सिमा सामावले पत्तमा चारी शरणम पवम अरिहंते शरणम पव सिद्ध शरणम पवजम साहू शरणम पवजम केवल पम दम शरणम पवच्छामि सर्व मंगल मंगलम सर्व कल्याण कारणम प्रधानम सर्वधम जैनम जयति शासनाम

48:48 वंदना वंदनी वंदना सबको धर्म लाभ वंदन महाराज साधन सेकंड

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