Bhagvati Sutra Vachana -212 I Shatak 9, Uddeshak 4 I Jun 27, 2026

संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो भक्ति, ज्ञान और धर्म के विषय पर आधारित है। इसमें विभिन्न जीवों के जन्म और मृत्यु के चक्र पर चर्चा की गई है, साथ ही नरक गति और उसकी विभिन्न श्रेणियों का भी उल्लेख किया गया है।

  • जीवों के लिए जन्म-मृत्यु का चक्र अनिवार्य है।
  • नरक गति में किसी जीव का जाना कर्म के अनुसार होता है।

भक्ति की शुरुआत

इस अध्याय की शुरुआत भक्ति और साधना के जप से होती है। इसमें अध्यापक सभी से नमस्कार करते हैं और भक्तिमय वातावरण में आत्मा का ध्यान कराते हैं।

क्लास की जानकारी

यहाँ पर तीसरी क्लास की जानकारी दी जा रही है जो भगवती सूत्र पर आधारित है। बंदे जी ने पिछले पाठ की संक्षेप में जानकारी मांगी है, जिसे विभा बहन प्रस्तुत करती हैं।

भगवती सूत्र का अध्ययन

इस अध्याय में भगवती सूत्र के ज्ञान तथा उसकी महत्वपूर्ण अवधारणाओं को समझाया गया है, जैसे जीव का सम्यक दर्शन और ज्ञान की विभिन्न श्रेणियाँ जैसे मति, श्रुत, और अवधि ज्ञान।

गंगेय मुनि का प्रश्न

गंगेय मुनि भगवान महावीर से जीवों की उत्पत्ति के बारे में प्रश्न पूछते हैं। भगवान उनके प्रश्नों का उत्तर देते हैं और विभिन्न प्रकार के जीवों के जन्म की चर्चा करते हैं।

नरक गति की व्याख्या

यहाँ नरक गति के बारे में चर्चा की गई है। बताया गया है कि नरक में जाने वाले जीव केवल पंचेंद्रिय जीव होते हैं और देवताओं का वहां जाना संभव नहीं है।

अण्डरस्टैंडिंग कर्म

इस अध्याय में कर्म के बंधन और उसके परिणामों के बारे में विस्तार से बताया गया है। नरक में जाने का रास्ता कर्म बंधन पर निर्भर करता है।

भक्तिपूर्वक निष्कर्ष

यहाँ सभी जीवों के जन्म-मृत्यु चक्र और उनके आरोपित कर्मों का निष्कर्ष निकाला गया है। वीडियो का अंत भक्ति के संगीतमय जप के साथ होता है जिसमें धार्मिक भावना और ज्ञान का संचार होता है।

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Transcript

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0:00 ो वंदे जा वंदाम कारण संस इच्छम खामे रायम ज अपत्यम परिपत्यम भत्ते पाण विनय वयाव आलवे सवे उचासने समास अंतर भाषा उ भाषा ज विनय परम सुम बाम अहम नम तसच्छामच्छाम इच्छामिमा वंदे जा

0:45 वंदाम इच्छा संस भगवान व संस इच्छा इच्छामिस वंदे जा वंदाम इच्छा कारण संदेश भेशो ले जाओ इच्छा इच्छामी समो वंदे जाण वंदाम इच्छी भगवान पसाय करी वणा प्रसाद करा जी नमो अरहतां नमो सिंम नमोणं नमो नमो लोए ससा साहो पंच नमोकारो

1:32 सब पाप पणासनो मंगलम चस पडमम मंगलम जय जगजी जोड़ी विणु जग गुरु जगानंद जगना हो जग बंधु जय जग पिया महो जय सुयाण भव तेथम पश्चिमो जय जय गुरु लोग जय बहावी सर्वो प्रणाय सर्वदायनी

2:19 सर्वलब्धि निधानाय श्री गौतम स्वामिनी श्री सुद स्वामीने अज्ञान देम ज्ञानम जन शलायम नेत्रितम ये तस्मै श्री गुरुवे नमलामी साहब जी प्रणाम सभी को आज 27 जून 2026 के दिन अभी हमारी तीसरी क्लास जो है वो भगवती सूत्र आगम वाचना की है। आज हमारी 212 क्लास है। हम अभी

3:05 शतक नौ उद्देशक चार पढ़ रहे हैं। मैं विभा बन से विनती करूंगी कि वो हमें लास्ट क्लास की समरी सुनाए। विभा बहन बहन खूब खूब आभार। मध्य में साहिब जी सभी को मेरा प्रणाम। भगवती सूत्र के अध्याय में साहिब जी ने लास्ट क्लास में हमें समझाया था कि कैसे बिना देशना सुने जीव को सम्यक दर्शन हो जाता है मतलब केवली की देशना सुने बिना जीव को सम्यक दर्शन कैसे हो जाता है मति ज्ञान श्रुत ज्ञान अवधि ज्ञान भी कैसे होता है तो जीव कषाय आदि से ग्रस्त होता है कषायों का क्षय होते ही आत्मा में मति श्रुत और अवधि ज्ञान उत्पन्न होता है जीव

3:51 किस प्रकार की प्रवृत्ति में रह जाए। उस प्रकार के निमित्त को जानकर अगर आत्मा शुद्ध भावों में स्थिर करने का प्रयत्न करें तो निर्जरा का बड़ा लाभ मिलता है। भगवती सूत्र के नौवें शतक का 32वा उद्देश्य गंगेय का है। गंगेय मुनि पार्श्वनाथ भगवान की पाठ परंपरा के मुनि थे। भगवान महावीर स्वामी वाणिज्य ग्राम नगर के धुती पलाश नाम के उद्यान में समोवसरण में देशना दे रहे थे। गंगे मुनि वहां आए और भगवंत को प्रश्न पूछते हैं हे भगवंत नारकी जीवों में देवगति में असुर कुमार आदि पृथ्वी काय अपकाय तेवकाय वाकाय वनस्पति बे्द्रिय ते इंद्रिय चौरेंद्रिय

4:37 पंचेंद्रिय तिर्यंच में जीव निरंतर उत्पन्न होते हैं किस सांतर भगवान कहते हैं हे गंगे नारकी जीव असुर कुमार आदि एकेंद्रिय विकेंद्र और तिर्य पंचेंद्रिय जीव निरंतर उत्पन्न होते हैं और सांतर भी उत्पन्न होते हैं। निरंतर का मतलब है सतत और सांत का मतलब है कदाचित। कभी-कभी तो साहिब जी आगे आप हमें पढ़ाएं। बहुत-बहुत धन्यवाद आपको। पंचमांग जो भगवती सूत्र है उसके 32 वे उद्देश्य में यहां पर यही प्रसंग आ रहा है जैसा कि अभी आपको समरी में सुनाई दिया यह है कि

5:24 गतियां तो चार लिमिटेड है सर सिर्फ और सिर्फ चार ही गति है ज्यादा गति तो होती भी नहीं है और जीव संसार में अनंत है अनंत जीवों का जन्म मरण तो होना अनिवार्य है। संसार में हो और जन्म मरण ना हो यह संभव नहीं है। संसार में है तो जन्म मरण तो होगा ही होगा। लेकिन अब इसमें से मृत्यु के पश्चात कौन सा जीव किधर जाता है? किस तरफ उड़ता है? किस गति में जाता है? क्योंकि चार ही गतियां है और जीव अनंत अनंत है सब और अनंत अनंत जीवों को जिस तरह से जन्म लेना है

6:12 जाना है मरना है अब यहां पर नरक गति में जो जाए वहां जाकर के नैरिक बनते हैं। तो मनुष्य में से नरक में जाने वाले हैं। नरक गति में तिरियंच गति से पशु पक्षी जाने वाले हैं। यह दो गतियां हो गई साहब। दो में से ही जानने वाले हैं। इधर देखिए नरक में कौन नहीं जाएंगे? एक इंद्रिय नहीं जाएंगे। दो इंद्रिय नहीं जाएंगे। तीन इंद्रिय नहीं जाएंगे। चौेंद्रिय भी नहीं जाएंगे। पंचेंद्रिय के अंदर संनी अस्नी दो विभाग हो। ये अस्नी

6:57 जीव जो है यह भी नहीं जाएगा। अब जाने वाले में कौन रहा? सन्नी पंचेंद्रिय सन्नी पंचेंद्रिय में मनुष्य भी है, देवी देवता है, पशु पक्षी है और सभी है तो यहां पर कौन जाएंगे? तो देव तो जा नहीं रहे साहब। देवता के लिए नरक गति के दरवाजे बंद है। यह मतलब क्या समझना है? परमानेंट व्यवस्था समझ। त्रिकाल नित्य शाश्वत व्यवस्था भवितव्यता डेस्टिनी क्या है? वह यह साफ हो गई कि कोई भी देवी देवता अनंत काल में भी मर के नरक में नहीं जाएंगे। कोई भी एक

7:44 इंद्रिय, दो इंद्री, तीन इंद्रिय, चौंद, असंग, पंचेंद्रिय मर के नरक में नहीं जाएंगे। कोई भी युगलिक मनुष्य आदि भी मर के नरक में नहीं जाएंगे। यह बात फिक्स हो गई। एकदम फिक्स हो गई। ख्याल आया पमी बहन जी बोलिए। जी कोई भी देवी देवता नरक गति में कभी जाएंगे नहीं। कोई भी तिर्यंच एकेंद्रिय से लेके असंग पंचेंद्रिय तक कोई भी नरक में नहीं जाएगा। और मनुष्य में युगलिक कभी नरक में नहीं जाएंगे। बहुत अच्छा। धन्यवाद। देखिए ये दष्टिनी है

8:30 पवितव्यता है अब क्यों है भाई साहब भाई ऐसे नरक गति में जाने के लिए किसी ना किसी प्रकार का नरक गति योग्य विशेष कर्म बांधना ही पड़ता है बिना कर्म बांधे नहीं जाओगे जैन धर्म की व्यवस्था है ध्यान रखिए आप अंधाधुंध कोई भी ईश्वर की व्यवस्था है वो भेज दे तो जाए ऐसी बातें मत करना यहां पर यहां यहां सब व्यवस्थित रूप से कार्य कारण भाव कर्म के हिसाब से बात व्यवस्था चल रही है। यहां पर कौन है? पार्श्वनाथ भगवान की पाठ परंपरा के गांगे मुनि आए हुए हैं। वे महावीर स्वामी को पूछ रहे हैं। हे भगवन अब यह दो

9:16 जीव जो नरक में जाने वाले हैं। अब इनका नरक में जाने का क्या संबंध? कैसे संबंध? विजय भाई आज की दुनिया में आप यह सर्वे करो। नॉन वेजिटेरियन पीपल्स एंड प्योरली वेजिटेरियन पीपल्स। अब बताइए आप 100% में से नॉन वेजिटेरियन पीपल्स कितने प्रतिशत है और प्योर वेजिटेरियन कितने लोग हैं? बोलो। सर ज्यादातर 99.99% नॉन वेजिटेरियन है। अब आपने इतना बड़ा फिगर बोल दिया समझे कि नहीं? 99% अब मतलब समझ लो पंचेंद्रिय जीवों की हिंसा

10:05 करके पेट भरना क्योंकि एक इंद्री दो इंद्री ती चौेंद्र जीवों की हिंसा करके खाया नहीं जाता है पेट भरा नहीं जाता है तो जो पंचेंद्रिय जीवों की हिंसा करने वाले हैं यह कारण स्पष्ट हो गया कार्य में नरक गति निश्चित हो गई आग लगती है आग कारण है धुआ निकल चलता है धुआ कार्य है आपको आग दिखाई दे या ना दिखाई दे धुआ दिखाई दिया तो अनुमान करके आग का संबंध निश्चित करिए 99% अगर आप बोल रहे हो पंचेंद्रिय जीवों की हिंसा का प्रमाण तो 99% मनुष्य में से नरक में जाने वाले रोज के हो गए

10:53 रोज के प्रति दिन के हो गए अब यह जो नरक में जाना है तो यहां गति के हिसाब से आपने देखा कितने जाएंगे कौन जाएंगे कहां से जाएंगे ये देखिए साथ अब यहां से आप निकले ये सात नरक आ गई ये पहली नरक है दूसरी नरक है तीसरी नरक है चौथी नरक है ये पांचवी नरक है छठी नरक है सातवी नरक है अब यहां पर जिन जीवों को जिस प्रकार के यहां से आपने देख लिया यह मनुष्य है। और यह तिर्यंच गति के पशु पक्षी है।

11:41 यहां भी तिरियंच है। यहां भी तिरियंच गति के पशु। अब इनको रोज नरक में जाना है। आज जाके आप श्रीमंदर स्वामी को पूछो भगवन महाविद में से कोई नरक में जा रहे हैं कि नहीं जा रहे श्रीमंदर स्वामी कहेंगे रोज जा रहे हैं। अब आपको आश्चर्य होगा महाविद में से कैसे जाएंगे? वहां तो श्रीमंदर स्वामी भगवान है। तीर्थंकर है। अरे मात्र तीर्थंकर ही नहीं। दो करोड़ तो केवल ज्ञानी है। अरे भाई साहब दो करोड़ नहीं। लेकिन 100 करोड़ तो साधु साध्वी जी वहां पर है। लेकिन

12:27 होना अलग बात है। तो नरक के महा विदह के अन्य जीव जो है मनुष्य आदि वो कहते हैं हम नहीं मानते हैं। नहीं मानते हैं। उसका क्या रास्ता? वहां पर भी हिंसाचार है। पंचेंद्रिय जीवों की हिंसा है। प्राणियों को मारकर खाते हैं। नॉनवेज वहां पर भी चल क्या करेंगे? बोलिए साहब क्या करेंगे? अब प्रश्न क्या पूछ रहे हैं गांगे मुनि? हे भगवंत मनुष्य में से तेज पशु पक्षी में से जो जीव नरक गति में जानते हैं उनके लिए दो शब्द का प्रयोग किया है। यह शब्द दिया

13:13 है सांत और यह शब्द दिया है निरंतर। बोलिए निखिल भाई क्या शब्द का अर्थ होगा? मतलब कदाचित और अलग-अलग अंतर पर और निरंतर मतलब कंटीन्यूसली। हां। जब इसका आपने कंटीन्यूसली बोला है तो इसको बोलिए ना इसका भी अर्थ बोलिए विजय भाई क्या अर्थ करेंगे इनडेफिनेटली डिंटिन्यूस इनडेफिनेटली का मतलब इनडेफिनेट बात क्या हो रही है

13:59 प्रति समय नरक में जाएंगे ही जाएंगे एव्री मोमेंट कंटिन्यू क्यों हो जाते ही रहे जाते तो उसको कहे निरंतर लेकिन थोड़ा सा गैप पड़ गया वो हो गया शांतारा अब वो गैप चाहे आधी मिनट का पड़ा है एक मिनट का पड़ा है दो मिनट का पड़ा है जो भी पड़ा है इसलिए वो सांतर कहा है और कोई कारण नहीं है अब आप कल्पना कर लो सोच लो भाई साहब मनुष्य तो वैसे भी लिमिटेड संख्या में ही है। आज की दुनिया की जनसंख्या टोटल पपुलेशन ऑफ द होल वर्ल्ड

14:45 अगर गिनने जाए तो 850 करोड़ के ऊपर है। सब आ गए। सब कंट्री सबक्टिनेंट सब आ गए देश। 850 करोड़ के ऊपर है। अब विजय भाई ने 99% बता दिया है। तो अब रोज जाने वाले क्योंकि रोज मृत्यु तो हो रही है। रोज मरना तो है ही है। जब रोज ही मर रहे हैं तो जाना तो है ही है। साहब आपका जीवन जीने में टाइम लगेगा। जितना जितना आयुष होगा उस हिसाब से आपको जीवन जीने में समय लग जाएगा। लेकिन मरने के बाद जाने में समय नहीं लगता

15:31 है। मरने के बाद जाने में तो नरक अनुपूर्वी होने के कारण उस कर्म के आधार पर आपको एक समय में, दो समय में, तीन समय में, चार समय में जाकर वहां पहुंचना ही पहुंचना है। अब कोई देरी नहीं लगेगी। अब ऐसी स्थिति में अगर निरंतर चल रहे हैं तो कितने जा रहे हैं? मनुष्य मैंने कहा आपको लिमिटेड संख्या में है। यह जो है तिर्यंच पशु पक्षी असंख्य है। जब आप मनुष्यों में 99% का फिगर दे रहे हो तो तिर्यंच पंचेंद्रियों के अंदर का फिगर कितने

16:17 प्रतिशत देंगे? अब सोचो जो जो तिर्य पंचेंद्रिय बिल्कुल नॉनवेज है वो तो कंपलसरी उनको नरक में जाना है। आइदर दे मे बी द लायन द टाइगर जो भी है समझे कि नहीं उनको तो कंपलसरी है। लेकिन अब जिसका जितना आयुष है कोई लायन है कोई टाइगर है कोई जो जीव है आप उनको 50 साल का आयुष 35 साल का आयुष 40 बरस का आयुष है अपना अपना जैसे आयुष पूरा होगा आप ईगल को देखिए आप जलचर प्राणियों को देखिए आप जमीन पर रहने वाले चतुस्पद

17:02 एनिमल्स को देखिए या वाटर में पानी में रहने वाले फिश आदि को देखिए निरंतर जिनको नरक में जाना है तो निरंतरता का मतलब कि एक एक सेकंड का भी अंतर ना पड़े। एक मिनट तो अगर मैं बोलूं तो बड़ा शब्द हो जाए। महावीर स्वामी की भाषा तो यहां समय की है। अब हम समय का इतना सूक्ष्म गणित तो नहीं समझते हैं तो लेकिन सेकंड तो समझो। अब वह भी लिमिटेड हो जाएंगे। समझे कि नहीं? एक मिनट की 60 सेकंड, एक कलाक की कितने सेकंड हो गए? तो 24 घंटे की सेकंड

17:49 तो लिमिट हो गई ना। अब जाने वाले तो चारों तरफ से महाद से जा रहे हैं। भरत क्षेत्र से जा रहे हैं। ऐरावत क्षेत्र से जा रहे हैं। पांचों भरत है, पांचो एरावत है, पांचों महाविद है। सब जगह से जा रहे हैं। बाकी के तो नहीं जाएंगे। कितने हो गए मनुष्य कितने प्रकार के प्रवीण जी यह देखिए 101 प्रकार के मनुष्य हैं। अब 101 में से सिर्फ 15 कर्म भूमि वाले ही जाएंगे। बाकी के 86 वाले तो सभी युगलिक है। अभी हमने बात की कि युगलिक तो नरक में नहीं जाते। अब यह कर्म भूमि है 15

18:36 पांचों महाविद इसमें आ गए पांच पांचरा इसमें से जाने वालों की संख्या कितने प्रमाण में हो गई अब ले लो तिरियंच पंचेंद्रिय और फिर ले लो संधि पंचेंद्रिय पर्याप्त मनुष्य 15 कर्म भूमि के तो निरंतरता बैठेगी कि नहीं बैठेगी लेकिन कभी कभी बीच में व्यवधान आ जाए थोड़ा सा कभी बीच [गला साफ़ करने की आवाज़] में समय बढ़ जाए इसलिए महावीर स्वामी ने शब्द प्रयोग किया है सांतर तो यह भी जो है कोई क्वचित कदाचित थोड़ा सा गैप बढ़ गया तो बढ़ गया नहीं तो निरंतरता तो है और इसी कारण नरक गति में

19:23 जाने वाले नारकी जीवों की वहां की संख्या असंख्य की है। अब नरक गति में जाने के बाद वहां पर कोई दो पांच बरस या 10 20 बरस या 100 200 बरस या 5000 बरस का वहां का व्यवहार नहीं है। कम से कम भी 10,000 बरस का आयुष लेकर के ही आपको पहले नरक में रहना पड़ेगा। मिनिमम से मिनिमम कम से कम 10,000 बरस का आयुष। अब आप सोच लो भाई साहब तो जब इतने निरंतर जा रहे हैं और इतने वहां लाखों वर्षों का आयुष लेकर के जीवन जी रहे हैं तो नरक के अंदर तो आपको पैर

20:09 रखने की जगह नहीं मिलेगी। लेकिन इसीलिए तो सात नरक है। मनुष्य क्षेत्र तो सिर्फ इतना सा है। इतने से मनुष्य क्षेत्र में 15 कर्म भूमि तो इतनी सी और उसमें से अगर निरंतर जा रहे हैं और यह सिर्फ आपको जो है एक रज्जु लोक प्रमाण जो तिरछा लोक है उसमें पशु पक्षी आदि जो है सब असंख्य द्वीप समुद्र में जो है उसमें से जा रहे हैं। अब यह निरंतरता अगर बनी भी रहती है तो असंख्य की संख्या नरक गति में परमानेंट रहती है। अनंत अनंत भूतकाल के पहले भी नरक में नारकी जीवों की

20:56 संख्या असंख्य से कम होकर घटकर के संख्या कभी हुई नहीं थी। वर्तमान काल के अंदर भी नरक में असंख्य की संख्या ही है। आगामी भविष्य काल के अंदर भी वहां पर नारकी जीवों की संख्या हमेशा के लिए असंख्य असंख्य असंख्य ही रहने वाली। आप सोचिए समझे कि नहीं? बोलो नीलेश जी तीनों फिगर बोलेंगे आप तीनों काल के। वर्तमान काल, भविष्यकाल और सभी कालों में तीनों कालों में नारकी नारकी में जीवों की संख्या असंख्य रहती है। अब यह आपने यहां से समझ लिया कारण क्या

21:44 है? किस कारण से है? वो भी आपको ख्याल में आ गया। जैसे आप बता रहे हो कि तिर्यंच, पंचेंद्रिय और मनुष्य। मनुष्यों में तो जरूरी नहीं है मांसाहार करना। लेकिन लायन, टाइगर आदि तो जन्मे ही उस प्रकार से हैं कि वह तो कभी घास खा ही नहीं सकते हैं। तो उनको तो कंपलसरी है। तो भाई साहब कंपलसरी नरक में जाना भी उनके लिए अनिवार्य है। वो भी लायन टाइगर वगह चौथी नरक तक जाएंगे। स्त्रियां छठी नरक तक जाए। मनुष्य तो सातवी नरक तक जाए। यह यहां पर निरंतरता बताई गई। अब इसके बाद एक समय में एक जाए, एक समय में दो जाए, एक समय में तीन जाए, एक समय

22:31 में चार जाए। मैं समय बोल रहा हूं, ध्यान देना। जबकि महावीर स्वामी ने क्या क्लेरिफिकेशन किया है? जस्ट इन द ब्लिंकिंग ऑफ द आईज इनमरेबल समय आर पासिंग। आंख की पलक में असंख्य समय बीत जाते हैं। बोलिए प्रवीण जी ख्याल आ गया आंख की एक पलक में असंख्य समय बीत जाए। अब इतने असंख्य समय में से एक समय में एक जन जाए। एक समय में दो जन जाए, एक समय तीन जन जाए, एक समय चार जन जाए। एक बात विजय भाई समझ लो कि यह केवलियों का गणित है। केवल दर्शनी भगवंत स्वयं अपने अनंत दर्शन

23:20 में देख रहे हैं। केवल ज्ञानी भगवंत अपने अनंत ज्ञान में एट ए टाइम जान रहे हैं। इसलिए उन्होंने शब्दों का प्रयोग किया है। इतने इस तरह से जीव अगर जाते रहे, जाते रहे, जाते रहे, क्या होगा? क्या होगा? कैसे होगा? कैसे होगा बताइए आप? अब जैसे जैसे नीचे उतरते जाओगे लास्ट में सातवीं नरक में आ गए 33 सागरपम का आयुष। अब यहां पर मिनिमम 22 सागरोपम है और मैक्सिमम 33 है।

24:06 अब इतने जल्दी तो वहां से वापस बाहर आने वाले नहीं है। और यहां महावीर स्वामी प्रति समय जाने वालों की निरंतरता बता रहे हैं। अब आप सोच लो 33 सागरोपम किसको कहते हैं? शास्त्रकारों ने जो गणित किया है उसमें एक सागरोपम में असंख्य बरस बीते हैं। एक सागरोपम बराबर असंख्य बरस होते हैं। अब रही बात यह कि जो जाने वाले हैं तो स्वाभाविक समझ लो मनुष्यों की संख्या ज्यादा आएगी कि तिर्यंच पंचेंद्रियों की संख्या ज्यादा है। स्वाभाविक है। संग तिर्यंच पंचेंद्र्रियों की संख्या बहुत बड़ी आएगी। बहुत बड़ी आएगी।

24:55 मनुष्य तो वैसे भी कम है। बहुत कम संख्या है मनुष्यों की। लेकिन मनुष्य गति की दृष्टि से अगर कोई पूछे तो श्रीमंदर स्वामी इन शब्दों का प्रयोग करके कहेंगे कि नरक मनुष्यों में से एक दिन भी खाली ना जाए। एक दिन नहीं आधा दिन आधा दिन नहीं एक कलाक भी खाली ना जाए। एक कलाक नहीं एक मिनट भी खाली ना जाए कि कोई ना कोई कोई ना कोई कोई ना कोई मनुष्य नरक में जाता ना जाता हो। ऐसा बने ही नहीं। इतनी निरंतरता इतनी निरंतरता रहती है हमारी स्थूल गणना हम अगर मिनटों में गण ले और तीर्थंकर भगवंत उसको समय में गणना कर

25:41 ले कितना फर्क कितना लंबा फर्क पड़ जाता है अब ये जो गमन है इतना अगर नरक में गमन हो रहा है अब इसके भंग गिन लो आप भेद करके भंग गिनने में आपको ख्याल आ जाएगा एक बार एक में जाए तो वो कितने हो गए और दो बार में दो दो साथ में जाए तो तीन सात में जाए तो चार जाए पांच आए छ जाए सात जाए यावत जो है संख्या बढ़ते बढ़ते बढ़ती जाए बढ़ती जाए बढ़ती जाए तो और जो जीव अपने कर्म अनुसार कर्म मान के जाए जैन धर्म है ध्यान रखिए यहां

26:28 पर हिंदू धर्म के जैसी बात नहीं की है। ईश्वर की मर्जी है, इच्छा है और आपको भेज दिया और आप चले जाओगे। ऐसी बात यहां नहीं है। आप समझ गए जिस लेस से जिस प्रकार के कर्म जीव बांधेंगे कोई पहली नरक में जाएगा, कोई तीसरी नरक में जाएगा, कोई पांचवी में जाएगा, कोई सातवीं में जाएगा। महाविद है। आप बोलते हो महाविद है, तीर्थंकर है। लेकिन खाली एक प्लस पॉइंट को मत पकड़ के रखिए। काली तीर्थंकर भगवान है। तीर्थंकर भगवान है। केवली है। मोक्ष की भूमि है। भाई साहब

27:15 सब कुछ होते हुए महाविद क्षेत्रों के अंदर लाखों करोड़ों की जनसंख्या ऐसी है कि जो मिथ्यात्व में है कसाय में है। जो भगवान श्रीमंदिंदर स्वामी को मानने को तैयार नहीं है और वे कर्म बांधते हैं। फिर वहां भी हिंसा आदि की पाप प्रवृत्ति करेंगे। कर्म बांधेंगे तो जाएंगे नरे जाते हैं बराबर जाते निरंतर जाते हैं सतत जाते बताइए क्या करेंगे हम ऐसी स्थिति के अंदर अब इनकी भंग संख्या अगर बढ़ती जाए बढ़ती जाए हम यह समझ कर के चले कि इनकी अब दो की

28:05 संख्या के भंग इनके कितने कितने बने? तीन की संख्या के भंग कितने बने? कितने प्रमाण में कौन कहां से कितने जाए? अगर यह गणना गिनती के साथ अगर हम करने बैठे तो यहां पर जो है जिस तरह से अलग-अलग संख्या जो बताई अब यह आप समझिए एक की संख्या में जाए तो

28:50 असंयोगी सात जाएंगे। अब दो की संख्या में चले जाए तो उनकी संख्या बढ़कर के जो है वह द्विक संयोगी 63 अब मैं ऐसे लिखूं या स्पष्ट लिखूं। अब इनकी संख्या जिस तरह से बढ़ती जाती है। आप ये देखिए त्रिक संयोगी वापी जो हो गए तीन का

29:49 यह और ज्यादा संख्या इनकी बढ़ती गई है। त्रिक संयगी फिर चार जीव अगर चतुर संयोगी जाए तो यह और भी 35 की संख्या बढ़ जाएगी। अब ये अगर आप करते जाओ करते जाओ तो यह संख्या आपकी बढ़ती जाएगी। अब ऐसे ही बढ़ाते बढ़ाते बढ़ाते आप पांच की संख्या करिए छ की संख्या करिए स्वाद की संख्या करिए फिर अलग-अलग तरीके से करने पड़ेंगे तब जाकर के

30:36 इनके भेद और भी बढ़ते जाएंगे तो केवल ज्ञानी भगवंतों ने जिस तरह से अपने ज्ञान में जाना है दर्शन में देखा है अपने हिसाब से उन्होंने संख्याओं को बढ़ा करके यहां पर सब के फिगर बढ़ाए। अब वो कैसे बढ़ेंगे? फिर आगे फिर आगे बढ़ाते बढ़ाते बढ़ाते जब यह बढ़ाते जाएंगे तब वो संख्या और बढ़ती जाएगी। चतुर संयोगी 350 पंच संयोगी 105 फिर वापिस 6 संयोगी सात छ निक आदि के सात भंग अलग-अलग से होते जाएंगे और इतना बड़ा इन्होंने कैलकुलेशन करके सारा गणित दिया

31:23 है यहां पर 1716 भंग कुल मिलाकर इन्होंने किए फिर वापस आठव भंग में नौव भग में और फिर जो है दव भंग में अब यह करते करते असंख्य नैरिकों के प्रवेशन भंग भी इन्होंने दिए। ऐसे करके संख्या जो है जिस तरह से नरक में जाने की बढ़ जाती है। अब आप यहां पर यह देखिए कि सबको जो है मृत्यु सबकी है लेकिन मृत्यु के हिसाब से जाने वाले जीव जो है इन सब में से कौन कहां किस तरह से किस तरह से देखिए कौन-कौन जीव है हम यहां पर अब यहां पर

32:12 मृत्यु और मृत्यु के पश्चात गमन अब या तो यह शांत जाए और या यह निरंतर जाए। अब भगवान को पूछा गया कि भगवंत एकेंद्रिय जीवों में मृत्यु के पश्चात क्या सा है कि निरंतर अब नरक की बात नहीं है। मृत्यु मृत्यु के बाद इन जीवों का गमन होना तो है। तो यह आ गए कौन? एकेंद्रिय जीव।

32:58 बोलिए एकेंद्रिय में कौन आ गए? यह पृथ्वी काय जीव है। अबका काय जीव है। ते काय जीव है। वायु काय जीव है। वनस्पति इनके लिए नियम क्या दिया है? निरंतरता है। एकेंद्रिय जीवों का निरंतर मृत्यु है। निरंतर गमन है। यह निश्चित हो गया कि जो भी जीव मृत्यु पाएगा मरेगा उसको शरीर छोड़ के जाना अनिवार्य है। जिस शरीर में आप रहे हो वो शरीर साथ में लेकर नहीं जा सकते। यह मृत्यु का नियम है। चाहे देवी देवता हो, चाहे नारी हो, चाहे

33:47 मनुष्य कोई भी जीव हो। जीव के रूप में है। अब आप कहीं भी जाते हो, कोई भी जाए आप मृत्यु के बाद अपना शरीर लेकर नहीं जा सकते। और भी कोई वस्तु साधन सामग्री आप कुछ भी लेकर के नहीं जाओगे। अब जाना है तो पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु, वनस्पति में जीवों का मृत्यु और जीवों के मृत्यु के बाद गमन निरंतर चलता है। वहां बीच में व्यवधान नहीं होने से निरंतरता बनी रहेगी। सांतता नहीं आएगी। आ रही है बात समझ में? बोलिए साहब। वंदना माता जी बोलो।

34:37 नहीं है। चलो बोलिए जल्दी बोलो। एक केंद्रिय जीव जब मृत्यु उनकी मृत्यु होती है और मृत्यु के बाद गमन करता है गमन करते हैं तो वो निरंतर होता है। अब बात किसकी आई? दो इंद्रिय जीव ती जीव चौदि जीव इनकी बात आ रही है तो इन जीवों के बारे में क्या समझना चाहिए तो यहां पर नियम बदल जाता है एकेंद्रिय के सिवाय अब जो जीव दो इंद्र में से ती में से चौेंद्र में से उनकी भी तो मृत्यु होती

35:23 है वो भी तो जाते ही है उन जीवों के लिए अंतर बता बताया है दो वाले, तीन वाले, चार वाले, पांच वाले जिनको जिस तरह से आगे की जैसी इंद्रियां है क्योंकि इंद्रियां कम ज्यादा कम ज्यादा मिलती जो भी जीव अब दो इंद्रिय में संख्या कम है। एक इंद्रिय में जितने अनंत जीवों की संख्या है उसकी तुलना में सिर्फ अनंतवे भाग की ही संख्या दो इंद्रिय तीेंद्रिय चौर इंद्रिय में रहती है। बोलिए हंसा

36:19 [गला साफ़ करने की आवाज़] एकेंद्रिय में जितनी अनंत गुनी संख्या रहती है जीवों की उसी अनंत में भाग के ही विक््द्रिय में दो इंद्री तेंद्र और चौरेंद्रिय में संख्या रहती है। अब इसके लिए इनका मृत्यु के पश्चात गमन निरंतर नहीं संभव है। सांतर संभव है। अंतर बढ़ेगा, व्यवधान होगा, कालांतर बढ़ेगा और उस हिसाब से जाएंगे। इनसे भी जैसे आप आगे बढ़ गए। अब आ गए आप पंचेंद्रिय में। अब यह पंचेंद्रिय में कौन आ गए? यह फिर वापस अलग-अलग चार तिर्य पंचेंद्रिय है।

37:10 देव गति के देवी देवता है। नरक गति के नारकी है और मनुष्य है। बोलिए विजय भाई यहां पर सबसे ज्यादा मृत्यु किसकी होनी है? सबसे ज्यादा साहब जी तिरियंच की संख्या बहुत ज्यादा और फिर मैंने क्या पूछा है मृत्यु किसकी होनी है इनके अंदर बोलिए पमी बहन जी ख्याल आ रहा है जी मेरे से तिरियंच गति के जीवों की मृत्यु ज्यादा है।

37:57 क्यों? क्या कारण है? बोलिए सबसे ज्यादा मृत्यु तिर्यंच गति के पंच या तिर्यंच पंचेंद्रिय है। तिर्यंच पंचेंद्रिय के अंदर ये कौन आ गए? पशु पक्षी आ गए। अरे भाई मनुष्यों ने अपने आहार के लिए सबसे ज्यादा हिंसा तिरियंच पशु पक्षियों की की है। इनकी मृत्यु ज्यादा होने वाली है। अब श्रीमंदर स्वामी को यह प्रश्न पूछा जा रहा है कि हे भगवन त्रियंच पंचेंद्रिय जीवों में मृत्यु अपना आयुष्य समाप्त होने से हो रही है कि दूसरे

38:46 जीव उनका आयुष तोड़ करके मारने वाले ज्यादा है। बोलो विजय भाई ख्याल आया जी साहब जी तोड़ के हो रही है पृथ्वी सबसे ज्यादा जितने स्लॉटर हाउस में स्लॉटरिंग हो रहे हैं, जरूरी नहीं है कि सबका आयुष पूरा हो गया। आयुष्य पूरा होने के बाद वह मर जाए और उनको मरने के बाद स्वाभाविक रूप से यह खाए तो उसको मारने की हिंसा का पाप भी उनका आधा हो जाता है। लेकिन वो जरूरी नहीं है। अब यहां पर ये ऐसे करके त्रियंच पंच इंद्रियों को

39:32 मनुष्यों ने अपना आहार बना लिया। दो इंद्री में तो मिलता नहीं है। कोई तीन इंद्री में मिलता नहीं। कीड़े मकोड़े इतने छोटे हैं। ऐसी स्थिति के अंदर वहां पर उन जीवों ने इस प्रकार की मानसिकता बनाई है। तो आयुष अभी समाप्त भी नहीं है। उसके पहले ही मार देते हैं। बहुत बड़ा खेल हो रहा है। एकमात्र चीज बनाने के लिए प्रेग्नेंट काऊ गाय को जो है उसको मारना। उसके पेट में से बछड़े को तुरंत जन्माकर तुरंत मारना। यह बड़ा चल रहा है। ऐसे बछड़ों को मार के उनके पेट में से जो रेनेट निकलता है वो

40:18 रेनेट डाल के इनको चीज बनानी है और फिर पिज़्ज़ा पास्ता में खानी है। अब आप कल्पना भी नहीं कर सकते हो कि इतना करते हैं ये लोग। एक इतनी सी बात के लिए उस गाय के बछड़े को जन्म भी लेने नहीं दे रहे हैं। नेचुरली उसका जन्म भी नहीं करा रहे हैं। गाय को ही काट दे रहे हैं। अब कोई क्योंकि गाय भैंस को भी गाय को भी सा महीने लगने वाले मनुष्य की तरह से। लेकिन कोई सातव महीने काटते, कोई आठव महीने काटते, कोई नौव महीने काटते। ये रोज का चल रहा है? रोज का चल रहा है। एक खाली रेनेट के लिए इतनी हिंसा करके इतने प्रकार से रेनेट से चीज बना रहे।

41:06 अब क्या होगा? सोचिए आप समझे। आप यह देख के समझ जाओगे कि शास्त्र के सिद्धांत और नियम के अनुसार आप कह सकोगे कि यह निरंतर नरक में जाने वाले निश्चित नरक में जाने वाले। यह ऐसे जीव निश्चित नरकगामी है। अब इनके लिए दूसरा विकल्प ही नहीं है। अब वह मिथ्या है। इसको पाप मानने कोई तैयार नहीं है। यह मैं गलत कर रहा हूं। यह पाप है। यह ऐसा कुछ भी उनकी बुद्धि ही नहीं बन रही है। ऐसी वृत्ति बन गई। अब आप देख रहे हो कि समुंदर के अंदर सभी त्रियंच पंचेंद्रिय प्राणी है। वहां कोई एक इंद्री दो इंद्री

41:54 ती की बात ही नहीं है। चाहे किसी प्रकार की फिश हो मछलियां हो जो भी कोई हो वो सब तिर्यंच पंचेंद्रिय जीव संगनी पंचेंद्रिय जीव है। अब इतने प्रमाण में जब उनकी हिंसा करेंगे तो परिणाम क्या आएगा? क्या आएगा? आज आपको लग रहा है आप चाइना चले जाओ, जापान चले जाओ, आप इधर देख लो क्या परिणाम और फिर जब पाप का प्रमाण इतना बढ़ जाता है, इतना बढ़ जाता है। अब आज वेनेजुएल में क्या परिस्थिति हुई आप देख लो। सामूहिक पाप का उदय जब इतना भारी होता है सबका कर्म इकट्ठा होकर जब सामने आता है तब

42:40 ऐसे नेचुरल जो है फेनोमिना कुछ बनते हैं कि एक साथ में हजारों के मनुष्यों की मृत्यु होती अब ये कौन समझेगा बोलिए कौन समझने को तैयार है तो यहां पर जो आप देख रहे हो कि अब इनसे भी कम जो है मनुष्यों की मृत्यु होगी पंचेंद्रिय से कम और फिर उनसे कम देवता नारकियों की क्योंकि आयुष बड़ा है देव नारकियों के लिए यह प्रश्न है कि उनका आयुष ही बहुत बड़ा है सत्य इतना लंबा चौड़ा बड़ा आयुष ऐसे इन जीवों की हिंसा का प्रमाण जो बढ़ता है इसलिए आज जहां पर तिर्यंत पंचेंद्रिय

43:27 जीवों की हिंसा या पंचेंद्रिय जीवों की जिसके भी हिंसा आप देखोगे आप स्पष्ट रूप से कह सकोगे कि यह जीव नरकगामी है नरक में जा रहे हैं। जैसे इनका आयुष पूरा होता है इनको निश्चित तरह का यह जो चक्कर चल रहा है कितना बड़ा चल रहा है। आइए अब हम यहां से देख रहे हैं। यह बात हो गई। अब देवी देवताओं की बात ले लो। अब देवी देवताओं के अंदर आपने यह देखा है सबसे नीचे जो है भवनपति है भवनपति के अंदर यह आ गए असुर कुमार परमाधामी

44:15 यह आ गए व्यंतर है व्यंतर आ गए वाण व्यंतर आ गए तेभग आ गए इधर तीसरे नंबर पर यह ज्योतिषी देवी देवता आ गए अब आ गए बेईमानी से देव गति में देवी देवता भी असंख्य है। अब वहां पर भी आप देखिए जन्म मरण का प्रमाण। अब यहां पर शब्द प्रयोग क्या किया है? जन्म मरण। इनके लिए यहां की थोड़ी टर्मिनोलॉजी अलग है। टेक्निकल वर्ड्स आपको ध्यान में लेना है। जन्म को देवताओं के लिए क्या कहा

45:00 जाता है? उपपात। मरण के लिए क्या कहा जाता है? चवन। जो देवी देवता वहां से उनको मरना है। कब मरेंगे? आयुष पूरा होगा तब मरेंगे। चवन का मतलब कि भाई अब उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया। बस जैसे ही आयुष पूरा हुआ समाप्त हुआ शरीर छोड़कर निकल गए। कहां गए? अब यह जो प्रमाण होना ही है नरक के द्वार के जीवों का और देव गति के देवी देवताओं का। तो इसके लिए जो शब्द प्रयोग किया है उपपात भी कहते हैं और यहां चवन को उदवर्तन

45:47 भी कहते हैं। यह उद् शब्द का प्रयोग भी यहां पर किया गया है। अब इस तरह से यह प्रश्न पूछा गया कि हे भगवन अब इन जीवों का उद्न सांतर है कि निरंतर है? तो एकेंद्रिय के सिवाय अन्य सब के लिए अंतर जो है संभव है। सांतर एवं निरंतर दोनों प्रकार के उत्पन्न होना आदि है। चलो भाई किसकी बात चल रही है? देवी देवताओं अब

46:33 है संख्या असंख्य की है। असंख्य में से असंख्य की संख्या रोज तो मरेगी नहीं। संख्यात ही मरने वाले हैं। उद््तन देव गति में से जो भवन पति का व्यंतर आदि का हो इधर देखिए तो सबसे ज्यादा किसका होगा? बोलिए प्रवीण जी जिनका आयुष्य जितना छोटा होगा उनका वहां से मरना जल्दी होगा और जिनका आयुष ज्यादा बड़ा होगा उनकी मृत्यु का प्रमाण भी कम होगा। बोलिए वंदना माता जी ख्याल आया आपको

47:19 शब्द देखो जी महाराज साहब जिनकी आयुष का प्रमाण जितना कम होगा उनका उवर्तन टाइम भी उतना ही कम होगा जिनकी आयुष का प्रमाण जितना ज्यादा होगा उल्टा उल्टा उल्टा बोल गए आप ऐसा मत करिए विभा बहन जी बोलो जी साहब जी जिसका आयुष जितना कम होगा उतना वो ज्यादा ही भव करेगा मतलब उवर्धना करेगा और जिसका आयुष जितना ज्यादा होगा वो उतना कम उद्वर्तना करेगा। ये क्या भाषा नहीं उद्वर्तन होगा। उनका मरण जो है ना मतलब उणा नहीं है उद्वर्तन जो है मतलब मृत्यु अब वैमानिक

48:08 देवलोक में जाओ तो सबसे ऊंचा ऊंचा आयुष बड़ा बड़ा बड़ा बड़ा आयुष होता ही जाता है जैसे जैसे नीचे उतरते हो इधर देखिए आप अब यहां से वैमानिक वैमानिक में फिर वापिस कौन आ गए कल्पोप्पन्न और कल्पातीत आ गए कल्पोप्पन्न में कौन आ गए 12 देवलोक वाले आ गए और नौ ग्रह वाले तो खले गए इनके अंदर कल्पातीत के अंदर जो है नौ गवक और पांच अनुत्तर सबसे टॉप कक्षा का आयुष अनुत्तर विमान में है नौ ग्रेवयक में है अब इनसे नीचे उतरिए आप तब ज्योतिषी देवताओं का आयुष इनसे नीचे उतरिए

48:57 व्यंतरों का आयुष इनसे नीचे उतरिए असुर कुमार का इनसे नीचे उतरिए ऐसा ऐसे आयुष्य घटता जा रहा है अब या तो आप इधर से उल्टा करो ये यहां से देखेंगे तो उल्टा यहां से आयुष बढ़ रहा है अब इनके बाद यंत्रों के बाद ज्योतिषी का बढ़ेगा फिर कल्पोपण का बढ़ेगा फिर कल्पतीत का तो स्वाभाविक नेचुरल क्या है जिनका आयुष जितना जितना बड़ा होगा उनका मृत्यु प्रमाण भी कम होगा। जिनका आयुष जितना घटा हुआ कम होगा उनका मृत्यु दर भी ज्यादा बढ़ेगा। इतने ज्यादा मरेंगे ना यह भी है। तो देव

49:44 गति के अंदर देवी देवता आ गए। मनुष्य आ गए। विकल इंद्रिय दो इंद्री ती चौर इंद्रिय आ गए और फिर पृथ्वी पानी अग्नि वायु वनस्पति अब सबसे ज्यादा इसमें मैक्सिमम किसका बता रहे हैं प्रवीण जी बोलिए देवता में जी परमादामी अरे भगवान अब मैंने क्या बताया टोटल में से सब में से हिसाब बैठाइए ना आप थोड़ा ध्यान रखिए संसार के समस्त जीवों में सबसे ज्यादा उद् किसका होगा? समझ में आ गया?

50:31 अब जनरल मत बोलना। ये जो है निगोद है। अब ये निगोद के अंदर आप देख लो। यह निगोद के जीव जो भी है जिस प्रकार के जैसे जैसे जीव जो है यहां पर अब निगोद के जीवों में यह आपने देख लिया कि यह सूक्ष्म है और यह बाद है। बोलिए अब इधर किसका नाम लिखो? कौन सा नाम लिखो यहां पर?

51:17 एकेंद अभी ऐसे मत बोलना जो है वनस्पति अब ये निगोद आ गए अब इनका सबसे ज्यादा उद् क्यों होगा आयुष छोटा है इसीलिए हां वेरी गुड संख्या बड़ी सिर्फ और सिर्फ इनका सूक्ष्म का 256 आवली का का ही आयुष है। इसलिए इतना जन्म मरण इतना जन्म मरण इतना होगा इनका कि कोई हिसाब नहीं। ख्याल आया। अब महावीर स्वामी ने शब्द प्रयोग क्या किया है? नरक से भी ज्यादा

52:06 दुख जीव को जन्म मरण में ही होता है। नरक से भी ज्यादा जन्म मरण में होता है। अब यहां पर आपने देखा कि नरक गति में जीव एक आयुष कितना बड़ा करेगा? 33 सागरोपम का पहली नरक में कितना करेगा? एक सागरोपम। इतने में यहां निगोद के जीवों के कितने भव बन जाएंगे? जब 256 आवली का का करेगा तो हमारी आंख बंद हो और खुले इसमें इतने कितने भव हो जाएंगे अनंत भव बीतते जाएंगे समझे कि नहीं एक भव आयुष नारक का नारकी जीव का 33 सागरोपम

52:52 जिसको हम बोलते हैं एक सागरोपम बराबर असंख्य बरस वो एक बार मरेगा उतने में यह अनंत बार मरेंगे इतना इतना इतना जो है इतना मृत्यु का प्रमाण चल रहा है। इतनी बार इनका मरण हुआ है। क्योंकि जीव है। ध्यान में रखिए जीव संसार में है। बिना जन्म मरण के तो रहेगा ही नहीं। यह निश्चित हो गया है। सब ऐसी स्थिति में जीवों का जन्म लेना। अब जीवों का संसार में वापस शरीर छोड़कर के जाना। यह व्यवस्था जो यहां बताई है, इस व्यवस्था को समझने की कोशिश करिए।

53:38 अब यहां अंतर्मूर्त का आयुष बाद में कह देंगे आलू, प्याज, लहसुन, गाजर, सुरन जो है यह बाद निगोद में आ गए। कितना बढ़ गया। ऐसे संसार में समस्त जीवों का अब यह जो जन्म मरण का प्रमाण चल रहा है तो यहां पर गांगे मुनि ने मुख्य रूप से शांत और निरंतर शब्दों का प्रयोग करके बात की है। यह हमने विषय यहां पर खोला है। आज विद भाई कल चौदस है और चौदस रविवार को ही आ गई है तो अब दूसरा कोई विकल्प भी नहीं बचता है। बराबर है बोलिए किसको पूछना है साहब जी साहब जी जीव ने गर्भ मा केला समय

54:26 पछ कर्म बंधन थवानु चालू थाए कर्म बंधन यानी पर्याप्ति पूरी था चालू पर्याप्ति के लिए तो अंतर्महूर्त का समय दिया गया है बस बोलिए प्रवीण जी साहब जी निगोध के जीव जबकि उनका तो आयुष इतना छोटा है तो आपने बताया कि सबसे ज्यादा दुख जन्म और मरण में होता तो इनकी क्या गलती ऐसी होती है आप ये भाषा क्या बोलते हो गलती होती है वही मतलब क्या जन्म मरण का मतलब शरीर बनाना छोड़ना हां तो इसमें कितना बहुत ज्यादा दुख हो रहा है ना सबसे ज्यादा दुख तो इसी में है

55:11 हां तो क्यों क्या कारण इनका जबकि इन्होंने तो 256 आवली खा इनका आयुष तो आयुष पूरा होगा तो मृत्यु होगी। मृत्यु का दुख आएगा कि नहीं? बनाया हुआ छोटा छोटे आयुष में इतनी मृत्यु बार-बार हो रही है। जन्म हो रहा है। कुछ तो कर्म का कारण होगा इसके पीछे ना साहिब जी। तो इतने क्या भारी कर्म होते हैं? आयुष आयुष पूरा हो रहा है तो भारी कर्म तो है साथ में आठों कर्म है। आठों कर्म आठो कर्म तो है लेकिन ये कोई हिंसा तो करते है नहीं किसी की। अरे भाई हिंसा करे कि नहीं करे इनका कर्म साथ में ही है। कर्म के बिना तो है ही नहीं। सातों आठों कर्म बंधे हुए हैं। मिथ्या तो मेरा प्रश्न सब कर्म मेरा प्रश्न ये है ये हिंसा करते

55:57 नहीं है। मन से विचार भी नहीं करते तो इनका तो सबसे कम मन नहीं होता है ना इनको। हां कर्म तो लगे हुए हैं। कर्म साथ में ही चल रहे हैं सब। ठीक ठीक है। और फिर आयुष पूरा हो रहा है ना फटाफट। फिर आयुष पूरा हो रहा है। फिर नया बांध रहा है। फिर जन्म मरण हो रहा है। नमो अरिहताणं नमो सिणानं नमोणं नमो वजयाणं नमो लोए सब साहहुणं एसो पंच नमोकार सब पावपणास मंगलं चिं परम भवई मंगलम

56:42 मंगलम भगवान वीरो मंगलम गौतम प्रभु मंगलम भद्राध्या जैन धर्मोस्तु मंगलम चतारी मंगलम अरिहंता मंगलम सिद्धा मंगलम साहू मंगलम केवली बंदो तो मंगलम चतार लोगत्तमा अरिहंता लोगत्तमा सिद्ध लोगत्तमा साह लोगत्तमा केवली पतो लोगत्तम चतारी शरणम पवजजामि अरिहंते शरणम पवज्यामि सिद्ध शरणम पव पवजामि साहहु शरणम पवजजामि केवल पत्तम दम शरणम पवजम सर्व मंगल

57:32 मंगल्यम सर्व कल्याण कारणम प्रधानम सर्व धर्म नाम जयम जयति देश

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