0:00 अभ्यंतर रायम खामे इच्छा खामे रायम जत परिपत्यम भत्ते पाण विनय वया आवे सलावे उचासने समास अंतर भाषा भाषा ज विनय परिहण सुम बाम वा जा अहम न जाम तसच्छाम दुख वंदाम सा इच्छामी खमा समो वंदे जा वंदाम इच्छा सं भग संदेश इच्छाम खमा समो वंदे जाम
0:48 इच्छा कारण भगवान लेो ले इच्छा इच्छामिमा वंदे जा वंदाम इच्छी भग पसाय करी वणा प्रसाद करा जी नमो अरता नमो सिं नमो नमो सबसा एसो पंच नमोकार सब पव पणासन मंगलम चस परम हव जय जग भजनी
1:34 वेणो जग गुरु जग जगना जग बंधु जय जगिया जय सुयाण भव तेथम पश्चिमो जय जय गुरुम जय बप्पा महादेव सर् प्रणाशाय सर्वदाय सर्वधि निधान श्री गौतम स्वामीनेम धर्मम स्वामीनेम
2:22 अज्ञान देम ज्ञानम जनमित नम वंदामि साहि जी प्रणाम सभी को आज फिफ्थ सितंबर 2026 के दिन अभी हमारे सैटरडे के दिन तीसरी क्लास भगवती सुत्रा आगम वाचना की है। आज हमारी 230वीं क्लास है। मैं विभा बहन जी से विनती करूंगी कि वह हमें लास्ट क्लास की समरी सुनाएं। विभा बन जी धन्यवाद एलसामी साहिब जी प्रणाम सभी को
3:09 भगवती सूत्र के 11वें शत्र के 11वा उद्देश्य का मुख्य मुख्य विषय काल और लोक में उसकी व्यवस्था है। क्या काल इस जगत की व्यवस्था में एक इंडिविजुअल सब्सटेंस है? यदि यह स्वतंत्र द्रव्य है तो इसे छह द्रव्यों में क्यों गिना जाता है और लोक को पंचास्तिकाय ही क्यों कहा गया षडास्तिकाय क्यों नहीं कहा गया तो इसके बारे में साहिब जी ने लास्ट क्लास में हमें समझाया था लोक का निर्माण पांच अस्तिकायक द्रव्य द्रव्यों के समूह से हुआ है अस्तिकाय का अर्थ है प्रदेशों का समूह आकाशास्तिकाय धर्मास्तिकाय अधर्मास्तिकाय और जीवास्तिकाय के स्कंद देश प्रदेश ऐसे से तीन-तीन भेद है और यह सभी द्रव्य अखंड
3:56 है। आकाश के प्रदेश अनंत है और धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय और जीवास्तिकाय के असंख्य प्रदेश है। पुद्गल द्रव्य के स्कंद, देश, प्रदेश और परमाणु ऐसे चार भेद है। पुद्गल द्रव्य के संख्यात, असंख्यात और अनंत प्रदेश हो सकते हैं। यह यह खंडित द्रव्य है। इसके प्रदेश स्कंध से अलग होकर परमाणु बन सकते हैं। पांचों परमाणु बनते हैं। पांचों द्रव्यों के प्रदेश होने के कारण अस्तिका काय कहा जाता है। काल का कोई पिंड रूप नहीं है और ना ही इसके प्रदेशों का समूह होता है। इसीलिए इसे कालास्थिका काय संज्ञा नहीं दी गई है और यह लोक के निर्माण का घटकी भूत अंग नहीं है। आत्मा कोई इमेजिनरी या
4:43 हाइपोथेटिकल वस्तु नहीं है बल्कि एक वास्तविक एवं अखंड द्रव्य है। द्रव्य स्वरूप से सभी आत्माएं समान है। अंतर केवल इतना है कि हमारी आत्मा के प्रदेशों पर कार्मण वर्गना के पुद्गल परमाणु लगे हुए हैं। जबकि तीर्थंकर परमात्मा के अपनी आत्मा के प्रदेश पर लगे कार्मण वर्गना के पुद्गल परमाणुओं को हटाकर पूर्ण शुद्धता प्राप्त कर लेते हैं। देवलोक के सात राजलोक में काल की कोई व्यवस्था नहीं है। नरक क्षेत्र के सात राजलोक में भी काल की व्यवस्था नहीं है। असंख्यात द्वीप समुद्र में सूर्य और चंद्र स्थित है। परंतु वे गतिहीन है। इसलिए वहां भी काल की गणना नहीं है। ढाई द्वीप के मनुष्य क्षेत्र में ही काल की व्यवस्था और गणना लागू होती है।
5:29 काल का अपना कोई स्वतंत्र पिंड नहीं है। वह सूर्य और चंद्र की गति पर पूर्णतः आश्रित है। मनुष्य क्षेत्र में स्थित सूर्य और चंद्र के विमानों की गति स्टेबल और परमानेंट है। इनकी गति ना हो ना तो बढ़ती है और ना ही घटती है। इस निरंतर नियत गति के आधार पर ही दिन रात समय और काल का कैलकुलेशन होता है। मध्य साहिब जी विनती करते हैं आगे हमें समझाएं। हां जी बहुत-बत धन्यवाद आपको। यहां पर विषय जो आया है भगवती सूत्र के 11 वे शतक के अंदर 11वा उद्देश भी चल रहा है। अब यहां पर ये आया है काल का स्वरूप जो
6:15 समझा क्या स्वरूप है काल का? कैसा स्वरूप है? कितने प्रकार के स्वरूप में काल का अलग-अलग? तो यह बात भी यहां पर आई अभी गत क्लास में जैसा कि अभी जी ने समरी सुनाया काल स्वतंत्र द्रव्य नहीं क्यों नहीं है क्योंकि प्रदेश समूहात्मक पिंड रूप नहीं बात इतनी अब रही बात ये कि काल जो है कितने प्रकार में किस किस प्रकार काल का मुख्य लक्षण दिया है वर्तना लक्षणों काल जगत में जो जो परिवर्तन आता है वह सब काल
7:02 के आते आप छोटा बड़ा कह दो आप नया पुराना कह दो भाई आप किसको कहेंगे नया पुराना अब एक मां के दो बेटे है एक छोटा है एक बड़ा है क्यों है छोटा क्यों बड़ा है दो वर्ष के अंतर का काल है आप उसको काल के आधार पर छोटा बड़ा कह दो बाकी तो महावीर स्वामी ने ऐसा कहा ही नहीं है कुछ भी। तो यहां पर यह जो व्यवहार जगत का चल रहा
7:48 है तो इन सब के अंदर काल की व्यवस्था कारणीभूत आ रही है बीच में तो कैसे काल की व्यवस्था बैठती है अब काल के प्रकार कई प्रकार के काल आएंगे यहां व्यवस्था बैठाने में अब हमको यहां काल का जो स्वरूप समझाया गया है। नंबर एक ये प्रमाण काल का जो आएगा यह है प्रमाण काल। इधर नंबर दो के अंदर अलग से फिर वापिस आपको यथा युग निवत्त काल। अब यह जो दिया है
8:41 अब ये काल यथा आयु निवत्त काल का है कि जिसके अंदर हम यहां पर समझेंगे नंबर तीन अब ये जो दिया गया है इसके अंदर आपको मरण काल समझाया यहां आपको एक और चौथा जो है अध्या काल जो है ये सत्य अब ये चार प्रकार जो बताए हैं इनको अलग अलग तरीके समझिए व्यवस्था है ध्यान रखिए वो चर्चा पूरी हो गई काल
9:28 द्रव्य है कि नहीं कालास्त काय नहीं कहा है वो बात पूरी हो गई यहां हम यहां पर अलग से चार प्रकार के काल दिखा तो इनके अंदर जो है व्यवस्था कब किस में किस तरह से कैसे होती है वो अलग अलग तरीके से आपको समझना है पहले में क्या देखेंगे आप प्रमाण अब काल का प्रमाण आप कब किस में कितना देखेंगे तो यह आपको स्वरूप समझना है अब ये प्रमाण काल जो है यहां प्रमाण शब्द का अर्थ क्या है? माप।
10:17 अब माप से अब काल को कैसे पहचानेंगे? किस तरह का माप यहां पर है? तो स्वाभाविक रीत में हम यहां पर देख रहे हैं कि एक तो दिन है होता है और दूसरी तरफ जो है ये रात है। दिन रात की व्यवस्था ये क्या है? कोई करता है? किसके करने से होती है? कोई इसके पीछे है? क्या है? बोले कुछ नहीं सिर्फ सूर्य चंद्र की गति अब सूर्य चंद्र की गति जो है उसमें सूर्य के कारण दिन रात हो रहे और
11:04 चंद्र के कारण तिथि नक्षत्र ये व्यवस्था बैठा दी गई है। अब क्यों बैठाई गई है? भी सूर्य की निरंतर गति एक लेवल पर एक शरीर की एक जैसी ना घटती है ना बढ़ती है चाहे हजारों लाखों करोड़ों अरबों खरबों कितने बरसों बीतग जाए लेकिन जो गति है वो इतनी संतत गति है जो सातत्यता उसमें रही है कभी घटने बढ़ने का प्रश्न नहीं होता है आज की तारीख समझ लीजिए दिन आज क्या तारीख है? 5 सितंबर। 5 सितंबर को सूर्योदय कितने बजे हुआ है?
11:49 सूर्यास्त कितने बजे? किस एक्सिस पर हुआ है? कहां? आप 100 साल के बाद भी 5 सितंबर को इसी एक्सिस पर इतने बजे ही सूर्योदय होगा। इतने बजे ही सूर्यास्त। आपको देयर विल बी नो चेंज एट ऑल। 100 साल के बाद देखिए, 500 साल के बाद देखिए,000 साल के बाद देखिए। तो यह मैथमेटिकल कैलकुलेशन करना इजी क्यों पड़ता है? क्योंकि इसमें सिर्फ एक सरी गति होने से आपको इजी पड़ता है। लेकिन अब साइंस का विषय अलग है विजय भाई। वहां पर सूर्य को स्थिर कर दिया है। पृथ्वी को घुमा दिया है। यहां जैन धर्म के अंदर क्या किया है?
12:37 पृथ्वी को स्थिर स्टेडियन स्टेबल और सूर्य चंद्र का मूवमेंट्स बताया। पृथ्वी को प्लनेट के रूप में सूर्य चंद्र के साथ नहीं बैठा है। लेकिन अब इनके तरीके से काल का गणित बना करके आपको बैठा है। अब बताइए विजय भाई हमेशा 360 दिन साल के दिन का माप और रात का माप प्रमाण एक सरी का रह सकता है। एक शरीर का रहना चाहिए। होता है क्या? मैंने अभी क्या कहा आपको? गति एक शरीर की। गति एक जैसी है। कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन अब जब गति बदल रही है, गति ज्यादा
13:24 नहीं है। तो फिर आपको उसके अंदर आपको देखना होगा। क्या बदल रहा है? दिनमान रात प्रमाण में क्यों बदल रहा है? तो यह यहां की व्यवस्था आपको समझते समझते की व्यवस्था में बताया कि जैसे जैसे ये दक्षिणायन से उत्तरायण होगा यहां आपने देखा कि कब जो है तो जब यहां से आपने देखा कि सूर्य अब ये सूर्य ये यहां से चले यहां आ जाए।
14:13 अब इसकी गति है। अब गति के अंदर ये उत्तरायण के अंदर जाएगा। अब फिर यहां से वापस जो है यहां सामने आ जाए तो ये जो है दक्षिणायन हो जाएगा। फिर यहां से वापिस जो है अब ये चलेगा। तो यहां पर आपने क्या देखा क्योंकि सारी क्लाइमेट व्यवस्था वगैरह सब इसके आधार पर चलती है। तो यहां पर जैसे आपने देखा यह लेवल बिल्कुल यहां से इसके
14:58 सामने आ जाए तो यहां आपको क्या कहना चाहिए अब जनवरी कहां आएगा जून कहां आ जाएगा बोलिए आ रहा है ख्याल में विजय भाई बोलो अब जनवरी से जून जून से फिर वापस दिसंबर के बाद जनवरी तो हाफ ईयर छे महीने का हो हो गया तो अब वो आपका जो चलता है चलता चलता आपके हिसाब से अब उत्तरायन दक्षिणायन का काल बीतता जाएगा कब दिन बड़ा होता है तब रात बड़े अब यहां पर जो है इनको तो घूमना है और ये यहां पर मेरु पर्वत आ गया अब मेरु पर्वत के चारों तरफ प्रदक्षिणा है
15:46 तो पृथ्वी तो यही है ये हमारी अर्थ है अब रोटेशन जब चलेगा तो दिन बड़ा कब होगा? रात छोटी कब होगी? रात बड़ी कब होगी? दिन छोटा ये व्यवस्था यहां बैठाई गई है। अब इसमें ये जो मेरु पर्वत से सूर्य का डिस्टेंस अब कब कहां कम ज्यादा कम ज्यादा कहां होता है? क्योंकि जो रोटेशन चल रहे हैं उस रोटेशन के अंदर कब बाहर बाहर बाहर बाहर मारले बीतते जाते हैं तब डिस्टेंस बढ़ेगा कब वापस रिवर्स आते आते अंदर आएगा तब डिस्टेंस घटेगा अब डिस्टेंस घटेगा तब क्या तो क्लाइमेट
16:33 सिस्टम जो पूरी बैठाई है वो इसी पर चल रही है क्लाइमेट की पूरी व्यवस्था तो यह आपको यहां पर भी देखने को मिलेगा हां अब प्रश्न यहां पर आ रहा है। भगवान को पूछा जा रहा है। गौतम स्वामी पूछ रहे हैं हे भगवन ऐसा कब क्या होता है? तो यहां प्रमाण काल को दो प्रकार का है। दिवस प्रमाण काल रात्रि प्रमाण काल। अब उसके आधार पर जो है जो दिन बिता दिया यहां पर यह आपको दिन बताया है अब इस दिन को यहां पर एक दो तीन चार अब ये एक ये दो ये तीन और ये चार अब एक एक को
17:21 कितने हिसाब से बैठाया तीन घंटा तीन घंटा और ये तीन तो हो गए 12 घंटा का इसको क्या संज्ञा दी है तीन घंटे का यह है प्रहर आप जिसको विजय भाई पोसी बोलते हो एक प्रहर की एक पोष अब आपको दो पोसी करना है पचका तो तीन दूनी छ घंटे के बाद आहार पानी तो ये हमारी जो सूर्य की दिन रात की व्यवस्था है। फिर हमारे पचकांड धर्म की व्यवस्था उस तरह से चलेगी। सेम इसलिए
18:07 देखिए रात अब ये रात को भी कैसे चलेगा? तो जब आपको यहां देखिए एक दो तीन चार अब ये आपको जो है व्यवस्था कैसे बैठ गई? तो इनकी व्यवस्था जो बैठाई गई है फिर वापिस तीन घंटे फिर वापिस तीन घंटे फिर वापिस तीन घंटे इधर ये भी जो है आप देखेंगे 12 घंटे की रात हो गई तब जाकर के 12 घंटे का दिन 12 घंटे की रात 24 अब ध्यान से समझिए ये तो हमने आज बनाई व्यवस्था है महावीर स्वामी ने बनाई हुई
18:54 प्राचीन पुरानी व्यवस्था के अंदर सर इन्होंने क्या कहा है? 12 घंटे का नाम नहीं दिया है। इन्होंने 15 मुहूर्त नाम दिया। 15 अंतर मुहूर्त आज हमने 60 मिनट का 60 मिनट का एक आवर महावीर स्वामी ने जो बनाई हुई व्यवस्था है 48 मिनट का एक मुहूर्त इस हिसाब से चल रहे हम दो दो घड़ी के सामयिक करने वाले हैं। दो दो घड़ी के पचकान करने वालों के हिसाब से ये कैलकुलेशन था। वही बात यहां पर भी आई। तो रात को भी आपने 12 घंटे का जो दिया है
19:42 [गला साफ़ करने की आवाज़] तो यह भी आपके लिए 15 मुहूर्त की रात हो गई। अब 15 और 15 मुहूर्त का दिन और 15 मुहूर्त की रात ये हो गया 30 मुहूर्त का अहो रात। 30 मुहूर्त का दिन रात हो गया। अब सामायिक धर्म की व्यवस्था है। सामयिक के लिए काल मर्यादा नहीं है। सामयिक के लिए कोई टाइम लिमिट नहीं होती है। आप सामयिक दिन में भी करिए, रात को भी करिए। कायोत्स्सर्ग के लिए कोई समय की सीमा नहीं है। आप दिन में कास करिए, रात को कास करिए। जप करना है
20:28 कोई टाइम का प्रश्न नहीं है। रात को करिए, दिन को करिए। ध्यान करना है। मेडिटेशन आपको करना है। कोई दिन रात का प्रश्न नहीं है। रात को 12:00 बजे करिए, एक बजे करिए, दो बजे करिए। किसी भी टाइम में मेडिटेशन आप करेंगे चले। लेकिन आपको आगमों का शास्त्रों का स्वाध्याय करना है। वहां थोड़ी लिमिटेशन आ जाती है। अब वो लिमिटेशन कब कैसे आ जाती है? सूर्य उदय के दो एक घड़ी पहले एक घड़ी बाद सन सेट सूर्य अस्त के एक घड़ी पहले एक घड़ी बाद सेंटर ऑफ द डे एंड द नाइट ऑफ द सेंटर ऑफ द नाइट अब
21:14 दोनों के अंदर एक घड़ी एक घड़ी ऐसे करके पूरे 24 घंटे के अंदर आपको चार बार का अस्वाध्याय टाइम मिल रहा है असज ख्याल शास्त्र में हमको पाठ दिए अस सज स न सय स्वाध्याय के काल में आप स्वाध्याय नहीं करोगे तो अतिचार और अस्वाध्याय काल में स्वाध्याय करो तो अतिचार ऐसी व्यवस्था यहां पर की हुई है तो जो जिस तरह से दिया गया है उस हिसाब से चलना है तो यहां पर आते आते अब ये देखना है कि ये
22:00 हमारी व्यवस्था हो गई। ये आपके नॉलेज में तो होना चाहिए ना भाई। आप पुरानी प्राचीन एंशिएंट सिस्टम जो तीर्थंकर भगवंतों के काल में चली। आज नहीं लाखों करोड़ों अरबों खरबों वर्षों तक चली। आदिनाथ भगवान के टाइम 15 मूर्त से 30 मूर्त का टाइम। शांतिनाथ भगवान के टाइम, नेमिनाथ भगवान के टाइम, पारश्वनाथ भगवान के टाइम, महावीर स्वामी के टाइम में यही व्यवस्था है। अंग्रेजों के कारण यहां पर कलाक मिनट सेकंड आई। तब यह हमारी 48 मिनट की व्यवस्था उन्होंने बदलकर 60 मिनट पर ला के 60 सेकंड की एक मिनट 60 मिनट के एक जो है
22:46 आवर्स और ऐसे बनाकर 24 आवर्स का दिन तो रखा तो यहां भी 24 आवर्स के हिसाब से अब हमारी व्यवस्था के अंदर लैंग्वेज ये थी 30 मुहूर्त का दिन 15 मुहूर्त का दिन 15 मुहूर्त की रात दोनों मिलाकर अहो रात्र शब्द का प्रयोग किया जाए। अब गौतम स्वामी ने पूछा कि हे भगवन ये पौरुष व्यवस्था किसलिए है? प्रहर तीन तीन घंटे के प्रहर से पौरुष व्यवस्था किस कारण है? भगवान ने कहा आहार पानी और ज्ञान ध्यान स्वाध्याय।
23:33 ज्ञान स्वाध्याय के लिए कितनी प्रहर देना चाहिए दिन के अंदर से कितना समय और सामने आहार पानी आपको कब देना है साधु साध्वियों के लिए तब उनको यह कहा जाता था कि आप सिर के ऊपर जब सूर्य आ जाए मतलब द सेंटर ऑफ द डे आप उस समय जिसको पूरी मध्य कहते हैं पूरी मध्य मतलब पूर्वार्ध भाग पूरा तो दिन का 12 घंटे का टाइम है। छ घंटे का दिन आपका बीत गया। अब वो पूरी मट है। अब आपको उसी समय में आहार पानी करना है। अब ये व्यवस्था बना दी इन्होंने। और वो
24:21 व्यवस्था शास्त्रों में बरसों तक चली आ रही। चलती जा रही थी। समझे कि नहीं? ऐसी स्थिति के अंदर अब आपको देखना है कि काल किस तरह से कितने प्रमाण में चलता रहता है। चलता है। अब यदि इसी तरह से रात्रि के लिए कहा तो रात को कैसे हम यहां पर गिने तो रात्रि का स्वाध्याय काल ध्यान काल अब रात का मतलब ये नहीं कि 12 घंटे रात है 15 मुहूर्त रात है तो सोते रहो ऐसा नहीं चार मुहूर्त जो आ गए इसमें से और सिर्फ आपको दूसरे और तीसरे मुहूर्त में निद्रा ले तो दूसरे तीसरे मुहूर्त में तीन तीन और
25:07 तीन छ घंटे की नींद सन सेट हो गया तो पहले तीन घंटे आपके लिए प्रतिक्रमण और स्वाध्याय और ध्यान और जाप आपका एक प्रहर पूरा होता है तब तक आप जो है बिल्कुल स्वाध्याय ध्यान में रहेंगे। फिर उसके बाद आप निद्राधीन हो सकते हो। फिर दूसरा मुहूर्त और तीसरा प्रहर और तीसरा प्रहर यह छ घंटे आप निद्रा में लीजिए और रात्रि के एक प्रहर बाकी रहे तीन घंटे पहले उठना है और उठ के आपका स्वाध्याय ध्यान करेंगे और लास्ट में सूर्योदय के टाइम आपका प्रतिक्रमण चलेगा। बाद की दिनचर्या आपकी
25:54 फिर वापस दिन में आ। यह एक पूरी आगम शास्त्रों के अंदर जैन साधु साधियों के लिए आचार संहिता बैठा दी गई। आपको इसी तरह से चलना है। अब यहां पर क्या कहा गया? प्रश्न पूछा है। हे भगवन अब कब दिन रात बड़ा होगा? तब क्या करेंगे? वो सूर्य के गति के आधार पर कभी दिन 13 घंटे का हो तो रात 11 घंटे की हो जाए। कभी रात 13 घंटे की हो जाए तो दिन 11 घंटे का हो जाए। साहब उसी के आधार पर हमारी विंटर और समर की सीजन चल। आपको बराबर ध्यान है 21
26:40 जून कह अब 21 जून पर आप गए इधर 21 जो है दिसंबर पर आ जाएंगे एकदम सबसे बड़ा दिन और एकदम सबसे छोटा ये है तो कब होगा कैसे होगा तो उस समय शास्त्रीय पद्धति क्या थी वहां कैसे कब होता था तो यहां यहां पर उन्होंने कहा कि कभी चार चार मुहूर्त मतलब 13 घंटे फिर दिन और फिर चार चार मुक्त की रात अब ये व्यवस्था अलग अलग प्रकार की थी सब अब यहां पर ये प्रश्न है कि हे भगवन दिन रात के देख उत्कृष्ट चार चार मुहूर्त की
27:27 पॉलिसी कब होती है और जगन्य तीन मुहूर्त की पॉलिसी कब होती है वो दिन कब आते हैं तब यहां पर उत्कृष्ट 18 मुर्त का दिन तथा जगन्य 12 मुहूर्त की छोटी रात्रि तब चार चार मुहूर्त को दिन और उत्कृष्ट पोसी होती है और रात्रि की तीन मुहूर्त की सबसे छोटी पोसी होती है उत्कृष्ट 18 मुर्त की बड़ी रात्रि हो और जगन्य 12 मुहूर्त का छोटा दिन तब चार चार मुहूर्त का उत्कृष्ट रात्रि पड़ और तीन मुहूर्त की जगन्य दिन पड़ी होती थी हे भगवन 18 मुहूर्त का उत्कृष्ट दिन और 12 मुहूर्त के जगन्य रात्रि ये भी 30 तो हो ही गया तथा 18
28:15 मुहूर्त के उत्कृष्ट रात्रि और 12 मुहूर्त का जगन्य दिन कब आता है तो यहां पर जो है उनके लिए उस काल से जो तिथि आ रही है उसी तिथि का यहां जिक्र किया गया है। अब प्राचीन काल की पद्धति की बात है भाई। तो वहां पर यह कहा 18 मुहूर्त का उत्कृष्ट दिन और 12 मुहूर्त की जगन्य रात्रि आषाढ़ी पूनम को होती है। नंबर एक ये आया आषाढ़ी पूनम।
29:08 अब ये भी बराबर आपको ध्यान में आ गया है 30 मुहूर्त का ही हो रहा है दिन रात तो लेकिन अब दिन बड़ा है रात को अब ये आप देखने जाओगे तो यहां पर उस काल के हिसाब से चलता है अब ये आषाढ़ पूर्णिमा आई अब भगवान को कहा कि उल्टा हो जाए तब क्या करेंगे आप? ये 18 मुहूर्त की रात हो जाए और 12 मुहूर्त का दिन हो जाए। ये भी जो है 30 का ही है। तो हे भगवन ये स्थिति कब आती है? तो यह आ गई
29:53 कौसिक पूर्णिमा उस महीने की पुनः पोष महीना विंटर की सीजन है आषाढ़ महीना अभी यहां पर आद्रा नक्षत्र के पहले की जिसको आप 21 जून की बात या आगे पीछे की करते हो क्योंकि वो डेट आपकी कम ज्यादा बदल सकती है। यहां सूर्य की गति आदि नक्षत्र के हिसाब से जो है गणित बैठता है। अब ये दोनों जो है बताई गई बात। अब आगे का प्रश्न क्या है कि भगवान दोनों ही इक्वल कब? इक्वल का मतलब क्या लेना है? 15 मुहूर्त का दिन
30:38 प्लस 15 मुहूर्त की रात। यह व्यवस्था कब बैठती है? तब यहां पर भगवान ने इसका भी प्रमाण दिया। अब यह प्रमाण देकर के चैत्र की पूर्ण और आश्विन की पूर्णिमा को दिन रात्रि दोनों समान बराबर होते हैं। अब ये चैत्री पूनम आइस चैत्री पूर्णिमा ही है। और फिर यहां पर यह जो आपको दी है कि जिसके अंदर आसो की पूर्णिमा
31:27 परत यहां पर देखिए 15 मुहूर्त की रात और फिर 15 मुहूर्त का दिन अब बरस की चार पूर्णिमा आ गई। अब चार पूर्णिमा के हिसाब से यह गणित इन्होंने यहां पर बैठाया है। बात क्या हुई भाग्यशाली? कि जब परमात्मा महावीर भगवंत उस समय बिहार करके कई पुरुषों के साथ प्रवृत्त होकर पैदल वाणिज्य ग्राम नगर के अंदर पधारे हैं और भगवंत द्वितीय पलाश नाम के एक उद्यान के अंदर विराजमान थे और उस
32:14 समय जो है ऋषभ यहां पर सुदर्शन नामक श्रेष्ठ एक सेठ आए हैं और सुदर्शन सेठ ने अब आकर भगवान को वंदना की और परपासना करके यह प्रश्न पूछे हैं। तो इन प्रश्नों के उत्तर में महावीर स्वामी ने ऐसा जवाब दिया। अब हे भग इसके अंदर थोड़ा थोड़ा कम ज्यादा कैसे होता है? कब कम ज्यादा होता है? फिर वापस इसके अंदर कैसे दिन रात का प्रमाण बढ़ता घटता है वह भी चर्चा की है कि आप देखेंगे दिन रात का बढ़ता घटता बिगड़े ये प्रमाण काल व्यवस्था
33:00 है ये हमने की कब की प्रमाण काल व्यवस्था क्योंकि ये व्यवस्था आप कब कब सूर्योदय होगा सनराइज कितने बजे है आपको दो घड़ी का नवकाशी पखान कब करना हमारे यहां पर नियम यह है कि सूर्य उदय हो गया मतलब खाना चालू ऐसा नहीं है। सूर्य उदय के बाद दो घड़ी के बाद नवकाशी पछका रहा है। सूर्य उदय के एक प्रहर के बाद पोसी पचका रहा है। सूर्य उदय के वन प्रहर प्लस डेढ़ घंटा मतलब 4 घंटे के बाद सा बोवे और सूर्य उदय के सनराइज के बाद दो प्रहर
33:47 के बाद पूरी मट आवे अब आपको कौन सा पचान करना है आप कहां तक जो है अपने तप को ले जाना चाहते हो जैसी आपकी शक्ति जितनी शक्ति उस हिसाब से तप अब सब अपनी अपने इच्छा से पखान लेते हैं वो गुरु महाराज को सामने कहते हैं भगवान नवकाशी का पखान दो तो नवकाशी का पखान आएगा आपको तो सभी क्योंकि यहां पखान धर्म की व्यवस्था लेने वाले की यथाशक्ति और इच्छा पर है। अब ये क्या है? नंबर एक सूर्योदय
34:37 अब सूर्योदय हो गया तुरंत खाना नहीं है अब अब सूर्योदय के बाद आपका जो दिन चल रहा है पूरा तो इसके पश्च आपको चार भाग ये दो हो गए अब ये चार चार में यहां पर आपको पहले क्या किया है ये 48 मिनट के हिसाब से नवकाश और ये एक प्रहर हो गया पूरा एक प्रहर थ्री आवर्स इसके हिसाब से आपको पिसी का पश्चात ये वन हाफ थ्री आवर का ये हाफ लेना है तो ये आपने 3 प्लस वन हाफ लिया है तो ये 4
35:26 प्रोसेस आ गई चार चार कोटी सा ये चार चार घंटे और इसके बाद अगर आप चलते हो तो दो प्रहर पूरे हो गए यहां पर तो यहां पर आपको पूरी वर्ष का प्रस्थान दिया तो ये सिक्स आवर्स छ घंटे आए अब आप जैसे आई मिल कर रहे हो एकासना कर रहे हो तो आप कितने बजे का पचखान लेंगे आपके की इच्छा है कि मुझे मिनिमम से मिनिमम कौन सा पका तप लेना है क्योंकि उतने टाइम वहां स्वाध्याय था आपका मेडिटेशन है स्वाध्याय है उसको डिस्टर्ब
36:12 नहीं होना चाहिए इसलिए यहां पर ये पचकांड की व्यवस्था तो प्रमाण काल चाहिए अब उस प्रमाण काल के हिसाब से यहां पर किया अब इसी तरह से इसको प्रमाण काल कहते है अब यह प्रमाण काल दिन प्रमाण काल भी हो गया रात्रि प्रमाण काल भी हो गया अब सामान्यत दिन तथा रात्रि का प्रमाण चार चार प्रहर के हिसाब से बताया गया है अब उस हिसाब से हमारी पखा व्यवस्था हो गई सम अब उत्कृष्ट में बड़ा दिन और रात्रि कब तो जो हमको यहां आषाढ़ी पूर्णिमा कि जिस दिन हमको 18 मुर्त का दिन और पौषिक पूर्णिमा 18 मुक रात होती है। अब
37:02 यह कथन पंच संवत्स परिमाण युग के अंतर है। और फिर इसी अपेक्षा से समझ है। अब कहीं पर जो है नक्षत्र आदि आते हैं तो कर्क संक्रांति और फिर वहां से 18 मुहूर्त का दिन और रात्रि होती है। जब मुहूर्त के दिन रात्रि के हिसाब से चलो तो चार मुहूर्त ही होते हैं। अब समान दिन और रात्रि में चैत्री और अश्विनी पूर्णिमा को दिन और रात्रि दोनों बराबर होती है। इन दोनों में 151 मुहूर्त का दिन और रात होती है। अब यहां पर ये व्यवहार नय की अपेक्षा से कथन है। अब निश्चय नय में कर्क संक्रांति से मकर
37:48 संक्रांति में जो 92 डेज वहां दिन होता है तब रात्रि और दिन दोनों समान हो जाते हैं। तो यहां पर यह हमारी जो व्रत नियम पचान की व्यवस्था चलती थी आज से नहीं हजारों लाखों वर्षों से चल रहा है। क्योंकि भाई आप आराधक है। आपको बिना पचकांड का एक दिन खाली नहीं जाना है। किसी के भी लिए हम आहार की संज्ञा में या आहार की प्रवृत्ति में मृत्यु हो जाए आयुष टूट जाए, आयुष बंद हो जाए तो यह गलत हो जाएगा। फिर गति बिगड़ जाए तो हम किसी ना
38:33 किसी पचखान में अवश्य हमारी मृत्यु पखान में हो। हम बिना पचखान के हमारी मृत्यु ना हो। समझे कि नहीं? अब यह अब मैं आपको क्या कह विजय भाई हमारी मम्मी जी माताजी जो थे उन्होंने पहले से कह के रखा था मुझे कुछ भी हो जाए मेरा पचखान मत तोड़ क्योंकि वो हमेशा ही पचखान में रहती थी उपवास है बिल है कासना है अब जो उनके पचखान है तो एट द एज ऑफ 96 में जब लास्ट में उनको स्ट्रोक आया तब भी उन्होंने कहा कि नहीं नहीं मेरा पचान नहीं तो पखान रखे कहते मुझे पचखान मत तोड़ाना हॉस्पिटल मत ले जाना ऐसे करके जो है अपनी
39:21 तरह से अपना पचान धर्म क्योंकि आहार की प्रवृत्ति में खाते पीते जीव जाए तो आ तिंच गति होती है। ये सबसे पहले बचने की बात यहां पर की। अब जगन्य दिन रात का 12 मुहूर्त का प्रमाण आ गया। अब यहां पर दूसरी व्यवस्था काल की हम ले रहे हैं। नंबर दो अब ये जो काल की व्यवस्था यथा युग निवत्त काल
40:10 अब आपने इसके अंदर जो है तीन शब्द अलग-अलग है। आपका सबसे बड़ा महत्व क्या है? आयुष काल। ये आयुष काल जो है यह जीवन ये जो जीवन काल है हमारा आयुष जो चल रहा है हालांकि सबका आयुष आयुष कर्म के आयुष कर्म के अंदर हमारे पास काल का गणित नहीं है सब तो शास्त्रों के अंदर शब्द है दलित कार्बन वर्गना के परमाणुओं का कर्म दलिक आपके कितने है उस हिसाब से आयुष की गणना
40:57 होती अब वो इतनी सूक्ष्म है कि हमारी समझ में नहीं बैठती हमने इसको मेजरमेंट करके मापने का रख दिया सब अब कोई भी जीव हो अब उसका आयुष मापने के लिए अब ये एग्जांपल ले लो कि हमने अपना सिलेंडर भरा अब ये जो सिलेंडर भरा गया है वो इसके अंदर आपको देखना है कि ये आयुष के दिक है एटम्स। कार्बन वर्गना के ही परमाणु है। अब ये कार्बन वर्गना के परमाणु आपने कितने
41:45 भरे हैं? ये किस हिसाब से कितने भरे गए हैं? जस्ट कि आपने सिलेंडर में गैस भरी है। अब वो सिलेंडर की गैस आपने कितने प्रमाण में कैसे भरी है? तो वहां पर क्या है कि हैवी है तो उसको वेट के हिसाब से बताया आपको। अब यह आपने देख लिया पूरा हमारा सिलेंडर भरा हुआ है किससे आयुष कर्म के कार्बन वर्गणा के पुद्गल परमाणु से जब हमने आयुष बांधा तब तब इस तरह से
42:33 हमने भर दिया अब इसको आपको क्या करना है ये बांधना है 100 बरस के या आपने जितना बाा है कितना लखो तुम्हारा विजय भाई 100 लगो बोलो अब यहां से 100 की गणना कैलकुलेशन शुरू करो आप ये जीरो यहां पर आपने दिया फिर ये 10 20 30 40 50 60 70 80 90 100 यहां तक आतेआते ये आपके 100 हो रहे हैं तो आप आपकी लाइफ में से जैसे आप जीवन जी रहे हो।
43:22 अब जैसे जीवन चल रहा है आपका जीवन जीते जीते इतने आयुष के बल जो है ये आपके स्वासो स्वास में ये बाहर निकलते जाते हैं। ये सिस्टम है। अब आपने कितने बरस बिता दिए? नीलेश भाई तुम्हारा कितना 50 पूरा थ गया छ हां साहब जी 60 हां 60 मा चार हो चलो 56 इनके हो गए तो 10 20 30 40 50 और ये 56 अब दिनेश भाई के 56 के हिसाब से ये इतने
44:10 एटम्स जो है ये इनके स्वासो स्वास में गते यह कम ओके अब यहां तक के आपके एटम्स जो है ब्लैंक खाली आप सिंपल एग्जांपल में समझिए वन गैस सिलेंडर इन आवर हाउस इन किचन सो यू आर कुकिंग द फूड एक गैस सिलेंडर आपका जो है कितने टाइम चलता है पमी बहन जी आइदर वन मंथ और टू मंथ वी डोंट हैव सिलडर्स अच्छा वेरी गुड चलो अब यहां पर जो है इंडिया में अभी भी सिलेंडर सिस्टम है। तो यह कितने टाइम तक चले? वन सिलेंडर हैविंग द गैस वो इसके अंदर कितनी है?
45:02 एक 15 मिनट बाद फोन करो। मैं क्लास चल रही है थोड़ी देर बाद। तो यहां पर जब आपने देखा कि ये इतना सिलेंडर आपका खाली हो गया। अब आपको फिर वापस कितना है? अब आपके जो है कुकिंग तो एवरीड है किचन के अंदर तो वहां पर आपका सिलेंडर तो यूज़ हो रहा है। गैस तो यूज़ होती जा रही है। सेम लाइक दैट इन आवर ब्रीथिंग सिस्टम ऑलवेज वी आर यूजिंग दिस टाइप ऑफ आयुष कर्मिक एटम्स। अब यह रेगुलर यूज़ हो रहे है। अब रेगुलर यूज़ हो जाए तो आपका इतने एटम्स इसमें से कम हो रहे हैं। सो नाउ यू कैन
45:48 काउंट अकॉर्डिंग टू दिस टाइप ऑफ ऑक्सीजन या ब्रीथिंग सिस्टम। सो नाउ यू आर कमिंग एट द एज ऑफ़ 56। अब फिर धीरे धीरे ये और घटती जाएगी। घटती जाएगी। ये व्यवस्था यथा आयु निवत्त काल। अब इसको क्या है? अब हमने उसको स्थूल गणना बनाई। हाउ टू मेजर इट? अब वो मेजर करने के लिए हमने इयर्स पर लाया है। महावीर स्वामी ने कहा ये तो आपकी स्थूल गणना है। ये सही है कि जो आपके ऑक्सीजन के अंदर ये ब्रीथिंग सिस्टम में जितने कार्बनिक एटम जो आपके निकल रहे हैं यह आपकी सबसे परफेक्ट है। अब यह हम इसको
46:36 ब्रीथिंग के मापे कैसे साथ कैसे पता चलेगा क्या करें कैसे पता चले तो हमने स्थूल गणना के अंदर काल बैठा है अब इस काल से हम चल रहे हैं व्यवस्था हो रही है लेकिन अब आपकी व्यवस्था हो जाएगी पर स्वर्ग में नरक में देवलोक में नारकी जीवो के लिए सबके लिए व्यवस्था क्या है उन सबको अपने अपने काल की व्यवस्था का कैसे गणित करना पड़ेगा सब तो ये यहां पर आप देखिए ये हो गया आपका 14 राज लोक अब यहां पर तो कौन है देवता है
47:26 ये मेरु पर्वत यहां पर है और ये सूर्य चंद्र है और यहां पर जो है मनुष्य मनुष्य क्षेत्र ये नीचे नरक है। इधर देखिए अब देव लोक के अंदर वहां पर कोई काल की टाइम सिस्टम की व्यवस्था नहीं है। अब वो भी तो जीवन तो जी रहे लेकिन उनको मापना कैसे? नरक के अंदर यहां पर भी कहीं पर भी कोई काल की व्यवस्था नहीं है। लेकिन अब वो जो नरक में गया है वह तो आयुष बांध के लेकर गया। उसी अभी हमने आपने ये देखा ना अब इसी आयुष
48:15 के अंदर सबका है। अब ये आप लेकर गए हैं। कोई भी हो ये देवता का है। यही नीचे नरक के नारकी जीव का है और सिस्टम एक ही चल रही है। सबको अपनी तरफ से स्वासो स्वास के साथ ही चलना है। कैसे करेंगे बताइए आप तो नारकी जी अपने को उनको क्या पता चले कि मेरी आयुष कितनी हो गई मेरा जीवन कितने बरस का हो गया वो कैसे समझेगा देवलोक के देवी देवता को कैसे समझेंगे यहां पर महावीर स्वामी और पारश्वनाथ भगवान के जीव आए ये है पार्श्वनाथ की आत्मा ये
49:04 महावीर स्वामी की आत्मा और उनका आयुष 20 साल अब ये प्रश्न आया कि हाउ हाउ टू काउंट इट इन ए फिगर अब ये काउंटिंग कैसे करना साहब इसका गणित फिर और ही अलग से बताया गया तो ये हमको यहां पर आयुष काल का देखना है और काल के हिसाब से आयु का क्या देखेंगे सिस्टम क्या चल रही है पहले कर्म का गणित देखिए आप। अब कर्म के गणित को आपको कैसे देखना है?
49:50 अब यह आपका जन्म है। यह आपका मरण है। अब आपकी लाइफ चल रही है। तो ये जो जीवन आपका चल रहा है। यहां आते आते पहले आपको देखना है। अब यहां पर नेक्स्ट जन्म का आयुष बंद होगा। यह जो पॉइंट है आपका यहां नया आयुष का बंद होगा। ये बंद होना मतलब क्या है? यहां ये आपका सिलेंडर जो है आप भर के साथ में तैयार
50:36 करके लेकर जाओगे। अब यह क्या चल रहा है? यह आपका रनिंग आयुष चल रहा है। ये आपका कहां से आया हुआ है? जहां से जिस गति में से आए हो वहां से लेकर आए हो। ये आयुष आपका चलता है। अब यहां पर आते आते रनिंग आयुष में ये आपका हम समझ ले 100 बरस का है। तो 100 बरस के अंदर ये आ गए 60 75 77 80 का आया। यहां आप नेक्स्ट लाइफ का आयुष बांधेंगे।
51:23 और यह बांधा हुआ आयुष जब आपकी आत्मा निकल जाए शरीर छोड़कर के तब ये आपको सिलेंडर साथ में लेकर जाना है। तब आप साथ में लेकर नेक्स्ट लाइफ में जाओगे। फिर वहां का जीवन इतना जिओगे आप। अब ये यहां पर है तो 100 बरस का है। वहां देवलोक में जाओगे सागरोम का है। आप कौन से देवोक में जाते हो उसके हिसाब से है। कौन से नरक में जाते हो उसके हिसाब से है। क्या जलेश भाई देवोक 15 मामा मा
52:09 देवलोक नहींता जन्म मोक्ष अच्छा चलो चलो पर तो जन्म तो लेो आयुष जीवन तो जीो नेक्स्ट जन्म मा मनुष्य गति मोक्ष बोलो विजय भाई तारे क्या ज मनुष्य गति मनुष्य गति तो यहां पर फिर आपको उस हिसाब से आयुष बांधना है अच्छा अच्छा मोक्ष मिलने वाला महावित्र है तो मिनिमम 84 लाख पूर्व तो आपको कंपलसरी सिलेंडर यही है अब गैस यहां पर हम 14 केजी 15 केजी भर रहे हैं वो 1400 केजी आपको भरनी पड़ेगी तो वहां के हिसाब से 84 लाख पूर्व का जीवन
52:56 अब जिसको मोक्ष में जाना है इनको नीलेश भाई को तो नया आयुष नहीं पा फिर आपको यहां आकर के नया आयुष नहीं बांधना है। यह आयुष पूरा कर लो और मोक्ष में चले जाओ। लेकिन जब तक मोक्ष में नहीं जाओगे वहां तक यह नियम रहेगा। अपना आयुष बांधते रहो। कंपलसरी व्यवस्था है। अब वहां पर हमने देखा कि देवलोक में नरक में सूर्य चंद्र नहीं है, गति नहीं है, दिन रात नहीं होता है, व्यवस्था नहीं है। अब कल उनको इच्छा हो कि वो कैसे मेजरमेंट करें? वो अपना आयुष कैसे मापे?
53:43 भाई मैं आज नरक में आ गया। अब मेरे 10 लाख बरस पूरे हो गए कि नहीं हुए? 10 करोड़ बरस पूरे हुए कि नहीं हुए? 100 करोड़ बरस पूरे हुए कि नहीं हुए? अब वो बेचारा क्या करें? आपके यहां तो कैलेंडर है। आप तो गिनती कर सकते हो। आप गिनती करके बोलो। फिर 1950 में मेरा जन्म हुआ था। तो आज 2026 में मेरे इतने बरसों का आयुष हो गया। तो अब उस हिसाब से आप कैलकुलेट करो वो देवी तीर्थ नारकी क्या करें वहां तो व्यवस्था ही नहीं है सूर्य चंद्र की वहां काल की कैलकुलेशन नहीं है तो वो यहां आएंगे हमारे मनुष्य क्षेत्र में कब कौन से
54:29 तीर्थंकर भगवान हुए उनके बाद से लेकर आज दिन तक कितने वर्षों बीत गए वो काल लेके हमारे हिसाब से वो वहां का अपने आप लाइफ का कैलकुलेशन करेंगे वहां की व्यवस्था है। समझ गया? बहुत बड़ी व्यवस्था है। अब इसमें हमको आगे अभी यह काल समझा फिर आयुष काल समझेंगे। मरण काल समझेंगे। अधा काल समझेंगे। पूरे चार भेद है। थोड़ा टाइम लगता है। एक एक चैप्टर को हम फिर वापस कल आगे करेंगे। नमो अरतां नमो सिं नमो नमो नमोसा
55:16 एो पंच नमोकारो सब पापणासम मंगलं च पम भव मंगलम मंगलम भगवानो मंगलम गौतम प्रभु मंगलम भद्रा जै धर्मोस्तु मंगल मंगलम चतारी मंगलम अरिहता मंगलम सि मंगलम साह मंगलम केवली पम चारी लोगत्तमाम अरिहता लोगत्तमाम सिद्ध लोगत्तम साहू लोग केवली पत्तम चारी शरणम पवजजामि
56:02 अरिहंते शरणम पवजाम सिद्धे शरणम पवज्जामि साहू शरणम पवजजामि केवल पंतम शरणम पवजम सर्व मंगल मांगल्यम सर्व कल्याण कारणम प्रदानम सर्व धर्म जय रत्नम जयति देश