Insight: केंद्र सरकार द्वारा चार नई श्रम संहिताओं के मसौदा नियमों की अधिसूचना: प्रभाव और संभावनाएँ

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संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए चार नए श्रम संहिताओं के मसौदा नियमों पर चर्चा करता है। इसका उद्देश्य इन सुधारों के संभावित प्रभावों को सरल भाषा में समझाना है, जिसमें समय पर न्यूनतम वेतन, सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल कल्याण शामिल हैं। वीडियो में विशेषज्ञों के साथ पैनल चर्चा शामिल है जो इन संहिताओं की आवश्यकता, प्रमुख परिवर्तनों और कार्यान्वयन चुनौतियों पर प्रकाश डालते हैं।

मुख्य बातें:

  • नई श्रम संहिताओं का उद्देश्य श्रम कानूनों को सरल बनाना और श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा बढ़ाना है।
  • वेतन की परिभाषा में बदलाव, निश्चित अवधि के रोजगार के लिए ग्रेच्युटी और हड़ताल नियमों में बदलाव जैसे महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं।
  • असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों तक लाभों का विस्तार एक प्रमुख चुनौती है, और ई-श्रम पोर्टल इस संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

परिचय

कार्यक्रम का परिचय अमृता चौरसिया ने किया, जिसमें बताया गया कि आज का विषय सीधे-सीधे आपकी जेब, आपके काम की सुरक्षा और आपके भविष्य की सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा है। केंद्र सरकार ने देश की चार नई श्रम संहिताओं के तहत ड्राफ्ट नियम सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किए हैं। सरकार चाहती है कि कामगार, कर्मचारी, उद्योग, यूनियन, विशेषज्ञ सब अपनी राय दें ताकि नियम, जमीनी हकीकत के अनुरूप बने। सरकार का कहना है कि इन सुधारों से समय पर न्यूनतम वेतन, सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और वर्क प्लेस वेलफेयर को मजबूती मिलेगी।

मसौदा नियमों पर सरकार का दृष्टिकोण

आशुतोष एटी पेडनेकर, संयुक्त सचिव, श्रम एवं रोजगार मंत्रालय, बताते हैं कि सरकार ड्राफ्ट नियमों पर सार्वजनिक परामर्श से प्राप्त फीडबैक को कैसे प्रोसेस करेगी। उन्होंने बताया कि 30 दिसंबर को नियमों को प्रीपब्लिश किया गया था, जिसमें आईआर कोड के लिए 30 दिन और अन्य कोड के लिए 45 दिन का समय दिया गया है। सुझावों को हिंदी और अंग्रेजी में सार्वजनिक डोमेन में रखा गया है, और एक प्रोफार्मा भी दिया गया है जिसमें नाम, डोमेन और सेक्शन का उल्लेख करना होता है। प्राप्त सुझावों का विश्लेषण करने के लिए प्रत्येक कोड के लिए एक कमेटी बनाई गई है, और अंतिम निर्णय के बाद नोटिफिकेशन जारी किया जाएगा।

नई श्रम संहिताओं की आवश्यकता

वरिष्ठ अधिवक्ता रावी बीरबल जी बताते हैं कि नई श्रम संहिताओं की आवश्यकता क्यों पड़ी। उन्होंने कहा कि समाज में बदलाव के साथ कानूनों में बदलाव जरूरी है। भारत की विशाल जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को बढ़ावा देने, विदेशी निवेश को आकर्षित करने और विनिर्माण इकाइयों को बढ़ाने के लिए ऐसे कानूनों की आवश्यकता थी। इसके साथ ही, श्रम कानूनों का कार्यान्वयन देश के दूरदराज के हिस्सों तक पहुंचाने, दंड बढ़ाने और सभी प्रकार के कर्मचारियों को कवरेज प्रदान करने की भी आवश्यकता थी।

औद्योगिक संबंध संहिता में महत्वपूर्ण परिवर्तन

रावी बीरबल जी औद्योगिक संबंध संहिता में किए गए महत्वपूर्ण परिवर्तनों पर प्रकाश डालते हैं। फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों को एक वर्ष की सेवा पूरी करने पर ग्रेच्युटी मिलेगी। वेतन की परिभाषा में बदलाव किया गया है, जिसमें कुल सीटीसी का कम से कम 50% मूल वेतन, महंगाई भत्ता और रिटेनिंग अलाउंस होना चाहिए। रिट्रेंचमेंट और क्लोजर के लिए, 100 कर्मचारियों की सीमा को बढ़ाकर 300 कर दिया गया है। हड़तालों को लेकर भी सकारात्मक बदलाव किए गए हैं, जिसमें हड़ताल से पहले नोटिस देना अनिवार्य है। ट्रेड यूनियनों को मान्यता मिली है, और एक रीस्किलिंग फंड भी बनाया गया है।

कर्मचारियों के जीवन पर प्रभाव

डॉ. एलना संत राय बताती हैं कि इन संहिताओं में सबसे बड़ा बदलाव क्या है जो एक सामान्य कर्मचारी के जीवन में सीधे तौर पर दिखेगा। उन्होंने कहा कि न्यूनतम वेतन अब सभी प्रतिष्ठानों पर लागू होगा, जिससे वेतन में पारदर्शिता आएगी और कर्मचारियों की वित्तीय स्थिरता बढ़ेगी। सामाजिक सुरक्षा असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों तक बढ़ाई गई है, और ई-श्रम पोर्टल इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

नए नियमों के लागू होने तक क्या होगा

आशुतोष जी स्पष्ट करते हैं कि जब तक नए नियम फाइनल नहीं होते, तब तक पुराने नियम लागू रहेंगे। उन्होंने बताया कि 29 अलग-अलग एक्ट्स को चार कोड में समाहित किया गया है, और नए रूल्स बनने की प्रक्रिया चल रही है। जनरल क्लॉजिस एक्ट 1897 के सेक्शन सिक्स के तहत, पुराने एक्ट के रूल्स तब तक कायम रहेंगे जब तक कि वे नए कोड के खिलाफ नहीं हों।

सामाजिक सुरक्षा में बदलाव

रावी बीरबल जी सामाजिक सुरक्षा में हुए बदलावों पर विस्तार से बताती हैं। 50% वेतन के कांसेप्ट से ग्रे एरिया और लूप होल को कवर किया गया है। नए लेबर कोर्ट्स ने कर्मचारियों के लिए भी बेनिफिट किया है कि एटलीस्ट पूरी सैलरी का 50% आपका बेसिक डीए रिटेनिंग होगा और इस पे एंप्लई को ग्रेचुटी और प्रोविडेंट फंड मिलेगा ही मिलेगा। फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों को भी ग्रेच्युटी का लाभ मिलेगा, लेकिन इसके लिए कुछ सावधानियां बरतनी होंगी।

असंगठित क्षेत्र तक लाभ कैसे पहुंचेगा

डॉ. एलना संत राय बताती हैं कि असंगठित, कॉन्ट्रैक्ट, गिग और प्लेटफार्म वर्कर्स तक लाभ कैसे पहुंचेगा। उन्होंने कहा कि ई-श्रम पोर्टल एक बड़ा प्लेटफार्म है जिसमें असंगठित कर्मचारी रजिस्टर हो रहे हैं। गिग और प्लेटफार्म वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा कोड ने निर्धारित कर दिया है, और माइग्रेंट वर्कर्स की परिभाषा भी बढ़ गई है। राज्य सरकारों के पास भी इन लाभों को पहुंचाने की बहुत बड़ी क्षमता है।

राज्यों की भूमिका और कार्यान्वयन

आशुतोष जी राज्यों की भूमिका और ऑन ग्राउंड इंप्लीमेंटेशन को लेकर बताते हैं कि लेबर का विषय कनकरेंट लिस्ट में आता है, इसलिए राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों इसमें कानून और रूल्स बनाते हैं। असंगठित वर्कर्स के लिए स्टेट्स द्वारा बोर्ड का गठन किया जाएगा, और गिग एंड प्लेटफार्म वर्कर्स के लिए केंद्र सरकार स्कीम्स बनाएगी।

कानूनी विवादों पर असर

रावी बीरबल जी बताती हैं कि नए कोर्ट्स का कोर्ट केस या जो हमारे कानूनी विवाद है उन पर क्या असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि नए कोर्ट्स लिटिगेशन को बहुत फास्ट करने वाले हैं। कंसिलिएशन की प्रक्रिया को 45 दिनों में खत्म करना होगा, और उसके बाद 90 दिनों के अंदर इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में मामला ले जाया जा सकता है। 2 साल के बाद आप कोई भी इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट फाइल नहीं कर सकते हैं।

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Transcript

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0:03 [संगीत] नमस्कार आप देख रहे हैं inाइट और मैं हूं आपके साथ अमृता चौरसिया। आज का विषय सीधे-सीधे आपकी जेब, आपके काम की सुरक्षा और आपके भविष्य की सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा है। केंद्र सरकार ने देश की चार नई श्रम संहिताओं के तहत ड्राफ्ट नियम सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किए हैं। यानी अब सरकार यह चाहती है कि कामगार, कर्मचारी, उद्योग, यूनियन, विशेषज्ञ सब अपनी राय दें ताकि नियम, जमीनी हकीकत के अनुरूप बने। सरकार का कहना है कि इन सुधारों से समय पर न्यूनतम वेतन, सुरक्षा,

0:48 सामाजिक सुरक्षा और वर्क प्लेस वेलफेयर को मजबूती मिलेगी। लेकिन सवाल यह भी है कि इंप्लीमेंटेशन कैसे होगा? राज्यों की भूमिका क्या होगी? ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के साथ-साथ वर्कर्स की गरिमा और अधिकार का संतुलन कैसे बनेगा? तो आज हम कोशिश करेंगे इस मुद्दे को बहुत ही सरल साफ और नागरिक हितैषी भाषा में आप समझें ताकि आप यह जान सके कि यह बदलाव आपके लिए क्या मायने रखता है और इस विषय पर चर्चा के लिए मेरे साथ एक बेहद खास पैनल जुड़ा हुआ है। मैं आपसे उनका परिचय करा दूं। मेरे साथ डॉ. एलना संत राय हैं। आप वीवी ग्री नेशनल लेबर इंस्टट्यूट से हैं। मैम बहुत स्वागत है आपका संसद टीवी पे। आप हमारे साथ ऑनलाइन जुड़ रही हैं। मेरे साथ स्टूडियो में रावि बीरबल जी हैं।

1:35 वरिष्ठ अधिवक्ता हैं सुप्रीम कोर्ट एवं दिल्ली हाई कोर्ट। बहुत स्वागत है रावि जी आपका और मेरे साथ ऑनलाइन जुड़े हैं आशुतोष एटी पेडनेकर सर। संयुक्त सचिव हैं आप श्रम एवं रोजगार मंत्रालय। सर बहुत स्वागत है आपका संसद टीवी पर। आप तीनों का स्वागत करते हुए चलिए सबसे पहले इन चारों श्रम संहिताओं की आत्मा और इनके सबसे बड़े बदलाव को समझते हैं। सबसे पहला सवाल मेरा आशुतोष जी आपसे होगा क्योंकि हम समझना चाहेंगे गवर्नमेंट के पर्सपेक्टिव को। ड्राफ्ट रूल्स को प्रीपब्लिश करके पब्लिक कंसल्टेशन मांगा गया है। सरकार इस फीडबैक को कैसे प्रोसेस करेगी और लोगों को किन-किन मुद्दों पर सबसे उपयोगी सुझाव देने चाहिए। आपके हिसाब से वेतन, परिभाषा, सोशल सिक्योरिटी या सेफ्टी वर्किंग कंडीशंस।

2:23 अ जो चारों कोड्स हैं उनके ड्राफ्ट रूल्स अभी प्रीपब्लिश करे गए हैं। 30 दिसंबर को इनको प्रीपब्लिश किया गया था। जिसमें से आईआर कोड के लिए 30 दिवस का समय दिया गया है। पब्लिक को अपनेप सुझाव देने के लिए और बाकी सब तीनों कोड के लिए 45 दिवस का समय दिया गया है। ये जिस इसके साथ-साथ मैं ये भी कहना चाहूंगा राज्य भारत सरकार ने जो प्रीपब्लिश करे हैं उसके साथ-साथ स्टेट्स ने भी जो उनके अप्रोप्रियट गवर्नमेंट जहां पर स्टेट गवर्नमेंट है वो अपने ककरेंटली या साइड बाय साइड वो भी अपने रूल्स को प्रीपब्लिश कर रहे हैं। जो इसकी प्रक्रिया इस तरह से रहेगी कि जो रूल्स को हिंदी में और इंग्लिश में पब्लिक

3:08 डोमेन में रखा गया है। हम अभी सबसे सुझाव हर एक टॉपिक के ऊपर हम सुझाव मांग रहे हैं। सुझाव देने का एक प्रोफमा भी दिया गया है। जिस प्रोफ में जो भी अपने सुझाव देते हैं उसके अपने नाम देना पड़ता है। और बहुत ही महत्वपूर्ण ये है कि एग्जैक्ट सुझाव किस प्रकार का है, किस डोमेन का है, किस सेक्शन का है और उसकी क्या भाषा वो लिखना चाहते हैं वो हम उसको लेते हैं ताकि उसको कंसीडर किया जा सके। इसी तरह से राज्य सरकारों में भी इसी तरह की प्रक्रिया दी गई है। और जब हमारे पास ये सुझाव आते हैं कनकरेंटली हम भी ऑन अ डेली बेसिस इनफ अब सुझाव आने चालू भी हो गए मंत्रालय में। हम उनको एक-एक करके उसको देखते हैं। उसकी फिर उसका एनालिसिस होता है। हर एक कोड के लिए एक कमेट बनाई गई है। जो प्रत्येक जो जो सुझाव आया है उसके उसको

3:56 एनालाइज करता है कि किस तरह से उसको देखा जाना है। फिर उसको सुझाव को फाइनली एक एनालिसिस करके फिर एक निर्णय लेने के बाद फिर फाइनल नोटिफिकेशन होगा। जी थैंक यू सो मच सर। रावी जी मैं आपका रुख करना चाहूंगी। हम जानते हैं कि कितना गेम चेंजिंग स्टेप गवर्नमेंट की तरफ से उठाया गया है। लेकिन आपसे मैं एक एडवोकेट की हैसियत से और लीगल पर्सपेक्टिव की हैसियत से ये समझना चाहूंगी कि नई श्रम संहिताओं की जरूरत क्यों पड़ी? देखिए अ चेंज सोसाइटी नीड्स चेंज लॉ एज वी ऑल नो। इंडिया की पपुलेशन बहुत वास्ट है। ऐसी वास्ट पपुलेशन को कैटर करने के लिए बहुत टाइम से जरूरत थी कि ऐसे लॉस आए जिससे ई ऑफ बिनेस हो। हम फॉरेन इन्वेस्टमेंट्स को अट्रैक्ट कर सकें। मैन्युफैक्चरिंग

4:42 यूनिट्स भी इंक्रीस हो। अदर बिजनेस यूनिट्स भी इंक्रीस हो। इसके साथ-साथ जरूरत थी कि जो लेबर लॉ का इंप्लीमेंटेशन है, एग्जीक्यूशन है, वो रिमोटेस्ट पार्ट्स ऑफ द कंट्री तक पहुंचे। उसके लिए पेनल्टीज इंक्रीस करी गई हैं। फेयर वेजेस रिमोट पार्ट्स ऑफ़ द कंट्री में भी पहुंचे। इसके अलावा और भी ज्यादा जरूरत थी कि हर एक तरह का एंप्लई चाहे वो अनऑर्गेनाइज्ड हो, गिग हो, प्लेटफार्म हो, सेल्फ एंप्लॉयड हो सबको कवरेज मिले। मोस्टेंटली इंडिया का जो पपुलेशन है वो हमेशा एक नेगेटिव फैक्टर माना गया है। मेरा यह मानना है कि अगर हम इसी पपुलेशन को स्किल्ड कर देते हैं देन आवर मोस्ट नेगेटिव फैक्टर कैन बिकम अ मोस्ट पॉजिटिव फैक्टर वी कैन एक्चुअली बिकम अ ह्यूमन रिसोर्स कैपिटल ऑफ द वर्ल्ड। सो इन्हीं सब चीजों को मद्देनजर रखते हुए बहुत टाइम से जरूरत थी कि लेबर

5:28 लॉस व्हिच इज कंसीडर्ड एस वन ऑफ द मोस्ट इंपोर्टेंट लॉ फॉर एनी इकॉनमी इन द वर्ल्ड उसको अमेंड करा गया है। जी बिल्कुल बहुत ही सुंदर तरीके से और संक्षिप्त तरीके से आपने बताया यहां पे इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड को हम खासतौर पे समझना चाहेंगे। वैसे तो चार कोड्स हैं। इसमें जो इंपॉर्टेंट चेंजेस किए गए हैं बदला वो क्या हैं और क्यों? देखिए चेंजेस तो कई सारे हैं। मैं मोटे-मोटे आपको इंपॉर्टेंट चेंजेस बताना चाहूंगी। फर्स्ट ऑफ ऑल तो जो फिक्स्ड टर्म एंप्लाइजज़ हैं जो कि कॉन्ट्रक्चुअल बेस्ड एंप्लॉयमेंट है जहां पे एंप्लाइजज़ उनको पता होता है कि वो फिक्स्ड टर्म के लिए अपॉइंटेड हैं उनको ग्रेचुटी मेयरली अपॉन कंप्लीशन ऑफ़ वन ईयर ऑफ़ सर्विस जब वो क्विट करेंगे तब मिल जाएगी। इसके अलावा जो आपकी वेजेस की डेफिनेशन है उसमें एक बहुत इंपेरेटिव चेंज आया है कि एटलीस्ट 50% ऑफ योर एंटायर सीटीसी या सैलरी स्ट्रक्चर या

6:13 आप उसको कोई भी नोमेनक्लेचर देते हो दैट विल बी योर बेसिक डियरनेंस अलाउंस एंड रिटेनिंग अलाउंस। इसका मतलब यह होता है कि एटलीस्ट इस 50% कंपनसेशन के ऊपर आपको ग्रेचुटी, प्रोविडेंट फंड वगैरह और अदर स्टैटरी कंपनसेशन आपको मिलेंगे। फिर अगर हम लोग रिट्रेंचमेंट और क्लोज़र की बात करें तो अभी तक प्रोविजन ये था कि जो फैक्ट्री माइंस एंड प्लांटेशंस हैं वहां पे 100 या 100 से ऊपर वर्कर्स होंगे तो रिट्रेंच करते हुए क्लोज़र करते हुए आपको गवर्नमेंट की परमिशन लेनी पड़ेगी जो कि बहुत ही रेस्ट ऑफ़ वेयर केसेस में दिए जाती थी प्रैक्टिकली। अब इस नंबर ऑफ 100 को 300 कर दिया गया है कि अगर आप फैक्ट्री माइनर प्लांटेशन है और आपके पास 300 या ऊपर वर्कर्स हैं तभी आपको परमिशन लेनी पड़ेगी। अदरवाइज आपको परमिशन की जरूरत नहीं है। ये नंबर 300 अभी स्टेट ऑफ यूपी में था। बाय वर्च्यू ऑफ़ यूपी इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स

6:58 एक्ट 1947। राजस्थान में था बाय वर्चुअ ऑफ़ स्टेट नोटिफिकेशन। बट बाकी सारी कंट्री में 100 था। अब ये 100 को 300 कर दिया है थ्रूआउट यूनिफॉर्मली। शॉप्स एंड एस्टैब्लिशमेंट्स के लिए कोई ऐसा नंबर नहीं है। उसमें अगर हजारों एंप्लाइजज़ भी हो तो उन्हें कोई एप्रोप्रियट गवर्नमेंट से परमिशन लेने की जरूरत नहीं पड़ती है। वो रिट्रेंचमेंट के प्रोविज़ंस को कंप्लाई करते हुए रिट्रेंचमेंट कर सकते हैं। फिर स्ट्राइक्स को लेके एक बहुत पॉजिटिव चेंज आया है। अब ओवरनाइट स्ट्राइक्स या जिसे हम कहते हैं फ्लैश स्ट्राइक या कैट आई स्ट्राइक नहीं हो सकती हैं। आपको एक प्रॉपर नोटिस देना पड़ेगा। एंड आप कंसलेशन पीरियड के दौरान स्ट्राइक नहीं कर सकते। लेबर कोर्ट की प्रोसीडिंग्स के दौरान स्ट्राइक नहीं कर सकते। आर्बिट्रेशन प्रोसीडिंग्स के दौरान स्ट्राइक नहीं कर सकते और इन सब प्रोसीडिंग से खत्म होने के स्टिमुलेटेड पीरियड के बाद भी आप स्ट्राइक नहीं कर सकते। जैसे स्ट्राइक एक वेपन है एम्प्लाइजस के हाथ में ऐसे ही लॉकआउट एक

7:45 वेपन है एम्प्लयर्स के हाथ में। तो जैसे स्ट्राइक के लिए आए हैं लॉकउड यूनियंस की बात करी जाए तो यह एक पहला लॉ आया है जिससे ट्रेड यूनियंस को रिकग्निशन मिला है। अभी तक इंडिया में सिर्फ महाराष्ट्र रिकॉग्निशन ऑफ़ ट्रेड यूनियंस एक्ट जो कि महाराष्ट्र स्टेट में लगता था और इसको हम लोग हंसीज़ाक में मृत्यु एक्ट भी कहते थे। सिर्फ उसके तहत ट्रेड यूनियंस को रिकॉग्निशन मिलती थी। बट आफ्टर कमिंग ऑफ दिस कोर्ट थ्रू आउट दी कंट्री जहां पे भी आपके स्टिपुलेटेड नंबर ऑफ एंप्लाइजज़ हैं आपकी जो मेजॉरिटी यूनियन होगी वो आपकी रिकॉग्नाइज्ड ट्रेड यूनियन मानी जाएगी। फिर स्टैंडिंग ऑर्डर्स जो कि अभी तक 100 लोगों की इस्टैब्लिशमेंट पे लगता था वो 300 पे लगेगा। इसके अलावा एक रीस्किलिंग फंड कॉन्स्टिट्यूट हुआ है कि रिट्रेंचमेंट कंपनसेशन के अलावा आपको रीस्किलिंग फंड में भी पैसा जमा करना पड़ेगा एंप्लाइजज़ को

8:30 रिट्रेंच करते हुए। लिटिगेशंस को सिंपल किया गया है। अभी रेफरेंस सिस्टम ऑफ़ एजुडिकेशन इज़ गोइंग। अभी सिर्फ कंसिलेशन 45 डेज का होगा। मैनेजमेंट और वर्कर्स जाएंगे। दे विल ट्राई टू सेटल द डिस्प्यूट्स। 45 डेज का टाइम वो एक्सटेंड करना चाहें तो वो एक जॉइंट एप्लीकेशन दे सकते हैं और वो नहीं दे सकते हैं तो 45 डेज में कंसिलिएशन खत्म और फिर मैटर वर्कमैन साइड या मैनेजमेंट साइड जो भी एग्रीव है अपने केस को डायरेक्टली इंडस्ट्रियल ट्रिबनल में ले जा सकती है 90 डेज के अंदर एडजुडिकेट करा सकती है और दो साल के बाद आप लेबर डिस्प्यूट्स नहीं फाइल कर सकते हैं। तो ये कुछ इंपॉर्टेंट चेंजेस हैं। इसके अलावा भी हैं। बट दीज़ आर सम ऑफ़ द मेजर। बिल्कुल डॉक्टर एललीना सरकार कह रही है कि चारों नई श्रम संहिताओं से वेतन सुरक्षा सोशल सिक्योरिटी का सिस्टम जो है वो सरल होगा बेहतर होगा। आपसे हम बहुत ही

9:17 आसान भाषा में समझना चाहेंगे इन चारों संहिताओं में सबसे बड़ा बदलाव क्या है जो एक सामान्य कर्मचारी या हम मजदूर की बात करें उसकी जिंदगी में सीधे तौर पर दिखेगा। धन्यवाद। सबसे पहले तो मैं यह कहना चाहूंगी कि ये जो संहिताएं बहुत बड़ा एक परिवर्तन के तरफ डेफिनेटली संकेत देते हैं और सरकार का इसको करने के पीछे बहुत बड़ा और एक अच्छा मकसद रहा है। सेकंड नेशनल कमीशन ऑन लेबर जब बैठी थी और उसमें जो रेमेंडेशंस आए थे उसको सरकार आगे लेके गए और सबसे बड़ा वेतन को लेके अब जो मिनिमम वेजेस है वो अप्लाई करेंगे सारे एस्टैब्लिशमेंट्स में। पहले शेड्यूल एंप्लॉयमेंट्स में होते थे। अब और

10:05 बहुत से अनकवर्ड अब कोड ऑन वेजेस जो मेन लेबर कोड ऑन वेजेस है वो आपको मिनिमम वेजेस एक स्टचटरी राइट के रूप में हम उसको देख पाते हैं और मिनिमम वेजेस और टाइमली पेमेंट ऑफ वेजेस अब इंश्योर किया जा रहा है। तो यह मेरे हिसाब से अगर हम इसको देखें बहुत बड़ा ट्रांसपेरेंसी आया हुआ है वेज पेमेंट्स को पूरे देश पूरे देश में लेके और एंप्लॉयर्स के लिए भी मैंडेटरी है कि वेजेस टाइमली पे किया जाए और वर्कर्स का मतलब फाइनेंसियल स्टेबिलिटी रहे और वर्क स्ट्रेस वर्कर्स का डेफिनेटली रिड्यूस होगा और उनका इनकरेजमेंट होगा मोरल बूस्टिंग होगी। यह एक बहुत बड़ा परिवर्तन है। वेज

10:51 स्ट्रक्चर को लेके, वेज रेगुलेशंस को लेके। दूसरा सामाजिक सुरक्षा। सामाजिक सुरक्षा भारत सरकार तो काफी आईलों में भी अभी हमारा हम बहुत आगे बढ़ चुके हैं। सामाजिक सुरक्षा को देते हुए हमारा और बहुत अंतरराष्ट्रीय प्लेटफार्म में भी इसके बारे में बात हो चुकी है। भारत का सामाजिक सुरक्षा बहुत अच्छा रहा है। पर्टिकुलरली लेबर कोड्स को लेके सोशल सिक्योरिटी कोड और अन्य इवन ओएसएच कोड के अंदर सामाजिक सुरक्षा अनऑर्गनाइज्ड वर्कर्स असंगठित क्षेत्र की तरफ पूरा इनक्रीस हो चुका है। ये एक बहुत बड़ा परिवर्तन है। पहले हमारे पास बहुत चैलेंजेस थे असंगठित क्षेत्र के वर्कर्स के लिए जिसके वजह से भारत सरकार ईश्रम

11:36 पोर्टल भी लेके आई ताकि इंश्योर हो सके सामाजिक सुरक्षा। अब लेबर कोर्ट्स के अंदर जो सोशल सिक्योरिटी फंड है वो डायरेक्टली असंगठित क्षेत्र के वर्कर पर्टिकुलरली महिला वर्कर जो भारत में अभी पीएलएफएस पीरियडिक लेबर फॉर सर्वे के हिसाब से एक बढ़ती हुई एंप्लॉयमेंट है महिलाओं का उसको बूस्ट करने के लिए डेफिनेटली इस तरीके का सामाजिक सुरक्षा जो असंगठित क्षेत्र के महिलाओं के लिए या अन्य असंगठित क्षेत्र के वर्कर्स के लिए ये एक बहुत बड़ा योगदान है। इनफैक्ट असंगठित क्षेत्र को एक तरीके से रिकॉग्नाइज सोशल सिक्योरिटी इंश्योरिंग एंड फॉर्मलाइजेशन की तरफ लेने के लिए। तो ये दो मेजर महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखते हैं

12:21 जो सोशल सिक्योरिटी और वर्कर्स वेलफेयर और ये सभी परिवर्तन भारत सरकार के जो संहिताओं में है वो अंतरराष्ट्रीय श्रमिक मानक मानकों को लेते हुए है और हम कहीं अंतरराष्ट्रीय श्रमिक मानकों के साथ डेफिनेटली अलाइन है बहुत अच्छी तरीके से और सामाजिक सुरक्षा में भारत बहुत आगे एक नया चेंज देखेगा बिल्कुल कहीं ना कहीं एक नज़र पेश करेगा। इसमें कोई शक नहीं है। आशुतोष जी एक बहुत ही इंपॉर्टेंट चीज़ मैं आपसे समझना चाहूंगी कि लोगों में इस बात को लेके बड़ा कंफ्यूजन है कि जब तक नए नियम फाइनल नहीं होते तब तक ऑफिस या फैक्ट्री में कौन से नियम लागू माने जाएंगे। सरकार ने के जो एफएक्यूस में कहा है कि पुराने नियम लागू रहेंगे। आप इसे सरल भाषा में जरा समझाइए कि कर्मचारी और एंप्लयर दोनों

13:08 के लिए अभी क्या जो है सिस्टम है और उन्हें क्या करना है? सरल भाषा में मैं ये कहना चाहूंगा कि पहले जैसे 29 अलग-अलग एक्ट्स थे तो वो 29 एक्ट्स अब सब्सम हो गए चार कोड में जो पूर्व में जो 29 एक्ट्स थे उनके अलग-अलग रूल्स भी थे। अब जो अभी नए जो कोड बने हैं जो 21 नवंबर 2025 को जो एनफोर्स हो गए वो कोड आने के पश्चात अब उनके रूल्स बनने की प्रक्रिया अब चालू हो गई है। ये अगले डेढ़ से दो माह में ये रूल्स बनेंगे और वो नोटिफाई होंगे। अब ये जो अंतराल का जो ट्रांजिटरी पीरियड रहता है उसके लिए एक्ट में कानून में प्रावधान है जिसको

13:54 कहते हैं जनरल क्लॉजिस एक्ट 1897 का सेक्शन सिक्स होता है जिसके तहत प्रावधान ये बहुत सरल प्रावधान ये है कि जब तक नए रूल्स आपके नोटिफाई नहीं होते हैं तब तक पुराने एक्ट के रूल्स कायम रहेंगे बस उसमें एक अलग एक क्लॉज़ और एक है या उसमें कंडीशन ये है जब तक कि वो नए एक्ट नए कोड के किसी तरह से खिलाफ नहीं हो तब तक वो सब के सब रूल्स यथास्थिति में रहेंगे और लागू भी रहेंगे। अब इसका मतलब ये हुआ कि ये जो ट्रांजिशन पीरियड है जिसमें एंप्लयरर्स को भी अलग-अलग प्रकार के अपने जैसे पेरोल सॉफ्टवेयर जो है उसको भी अपडेट करना है। हमारे जो ईश्रम का जो

14:40 पूरा मॉड्यूल है और पूरा जो पोर्टल है वो भी नया तैयार हो रहा है। इंस्पेक्शन स्कीम्स भी तैयार होंगी। ये सब पूरी प्रक्रिया चल रही है। तो अभी किसी प्रकार का ताकि किसी प्रकार का एक वैक्यूम नहीं हो इसलिए यह व्यवस्था बनाई गई है। मैं इसके साथ-साथ ये भी कहना चाहूंगा कि अभी जो इंस्पेक्टर्स जो पुराने एक्ट्स में जिनको इंस्पेक्टर्स कहते हैं उनको हम इंस्पेक्टर्स कम फैसिलिटेटर्स कहते हैं। अभी इनका रोल इस तरह से हो गया कि हमने पूरे देश भर में जो सेंट्रल लेबर कमिस्ट्रेट की ऑर्गेनाइजेशन है। इवन स्टेट गवर्नमेंट्स हैं। एक बहुत ही व्यापक प्रचार प्रसार का अभियान चलाया हुआ है जिसमें हम एम्प्लाइजस को और एम्प्लाइजस को जाके नए कोर्स के प्रावधान के के बारे में बता भी रहे हैं ताकि किसी प्रकार का नॉलेज गैप नहीं रहे नहीं रहे। एफएक्यूस भी जारी

15:27 किए गए हैं और एक लगातार संवाद एंप्लयर्स और एम्प्लाइजस के साथ दोनों के साथ हमने मेंटेन किया हुआ है ताकि किसी प्रकार का ये जो अंतराल का जो ट्रांजिशन पीरियड है उसमें किसी प्रकार की व्यवधान नहीं आए और जहांजहां पर अगर किसी जैसे इंडस्ट्री बॉडी ने अगर हमसे कोई क्वेश्चन वगैरह रेज किया है तो हमने तुरंत ही उसका एफएक्यू के माध्यम से उसका क्लेरिफिकेशन भी जारी किया गया है। तो मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि अभी किसी प्रकार का रेगुलेटरी वैक्यूम नहीं है। जब तक नए कोर्ट्स के नए रूल्स अस्तित्व में नहीं आते तब तक जो वर्तमान के जो रूल्स हैं वो अभी अस्तित्व में रहेंगे। ओके सर थैंक यू सो मच रावी जी सबसे ज्यादा जो चर्चा हो रही है वो सोशल सिक्योरिटी में हुए बदलावों को लेकर हो रही है। एक तो मैं आपसे जो 50% वेजेस है उसके कांसेप्ट को समझना चाहूंगी। साथ ही क्या

16:14 कर्मचारियों के फायदे और कटौतियां इससे प्रभावित होंगी यह भी हम चाहेंगे। आप थोड़ा सा इबोरेट करें और क्या फिक्स टर्म एंप्लाइजस को भी ग्रेजुटी का लाभ मिलेगा? देखिए पहले इस चीज की हिस्ट्री को जानना जरूरी है। टाटा पहली कंपनी थी जो कि प्रोविडेंट फंड के प्रोविजंस को लेकर आई थी। फिर गवर्नमेंट ऑफ इंडिया को ये प्रोविज़ंस अच्छे लगे तो उन्होंने कई सारे एक्ट्स प्रोमोलगेट किए। जैसे कि एंप्लाइजज़ प्रोविडेंट फंड मिसलेनियस प्रोविज़ंस एक्ट 1952। उसके बाद आपका पेमेंट ऑफ़ ग्रेचुटी एक्ट 1972 भी आया। इसके अलावा मेडिकल बेनिफिट्स के लिए हमारे पास एंप्लई स्टेट इंश्योरेंस एक्ट 1948 है। और सालाना बोनस के लिए पेमेंट ऑफ़ बोनस एक्ट है 1965। बहुत सारे प्रोविज़ंस थे। अभी हम लोग स्पेसिफिकली बात करें कोर्ट से रिलेटेड एंड पुराने लॉ से रिलेटेड तो 50% कांसेप्ट

16:59 मैं यह कहूंगी उसने ग्रे एरिया को और एक लूप होल को कवर किया है। जो पीएफ एक्ट था जो ग्रेचुटी एक्ट था स्पेसिफिकली वो ये कहता था कि जब एंप्लई क्विट करे जब वो रिटायर हो तो उसके टाइम पे उसके पास एक अच्छा पैसा आए ताकि वो सर्वाइव कर सके। उसका इंटेंट कभी भी नहीं था कि वो पैसा इतना कम हो जाए कि उसका सर्वाइवल मुश्किल हो जाए। वो तो कंपनी ने अपनी स्टचरी ऑब्लिगेशन को कम करने के लिए प्रोब्ली बिकॉज़ ऑफ़ रोंग एडवाइस ऐसे निकाले कि उन्होंने बेसिक और डीए को बहुत कम अमाउंट पे रखना शुरू कर दिया। लाइक 20% 25% 30% ऑफ़ द एंटायर सैलरी स्ट्रक्चर कि उससे उन एम्प्लाइजस का ग्रेचुटी और पीएफ काफी कम हो जाया करता था। नए लेबर कोर्ट्स ने एम्प्लाइजस के लिए भी बेनिफिट किया है कि भ नया लेबर कोड कहता है कि एटलीस्ट पूरी

17:45 सैलरी का 50% आपका बेसिक डीए रिटेनिंग होगा और इस पे एंप्लई को ग्रेचुटी और प्रोविडेंट फंड मिलेगा ही मिलेगा। साथ ही साथ ये एंप्लयर्स के लिए भी बेनिफिश है क्योंकि जब एंप्लॉयर्स अपना परसेंटेज कम तो कर देते थे पर साथ ही साथ वो लाखों करोड़ों के लिटिगेशंस भी फेस किया करते थे और लिटिगेशंस के एंड में कई बारी कोर्ट्स कहती थी कि नहीं आप तो 100% ऑफ दी सैलरी पे या 75% ऑफ दी सैलरी पे आप दें। आपका जो सैलरी स्ट्रक्चर है वो एक सब्टर फ्यूज है। वो एक कैमाप्लॉज है। तो एंप्लयर्स के लिए भी एक एकदम एक क्लेरिटी आ गई है कि उनको किस अमाउंट के ऊपर प्रोविडेंट फंड ग्रेचुटी को देना है। अब ये बात करें कि ये कम हुआ या ज्यादा हुआ। जहां तक ग्रेचुटी की बात है एंप्लई की पॉकेट से तो कुछ नहीं जा रहा। तो एम्प्लई का तो फायदा ही है। एंप्लयर के लिए भी ग्रेचुटी एक्ट में कैप्स हैं जो कि डिलीट नहीं करी गई हैं। प्रोविडेंट फंड की भी कैप्स हैं जो

18:31 कि डिलीट नहीं करी गई हैं। बट उन कैप्स को यूज़ करने के लिए आपको प्रोविज़ंस का अच्छे से नॉलेज होना चाहिए। सो देयर फॉर आई वुड से इट्स नॉट रियली अ चेंज। एक गलत चीज चली आ रही थी। एक ग्रे एरिया था। एक लूप होल था जिसको लेजिस्लेचर ने बिल्कुल क्लियर किया है कि 50% के ऊपर तो आप दो। एंड इट्स अ मिडिल पाथ। अगर यह बहुत ही ज्यादा मैं कहती आर्काइक होता तो लेजिस्लेचर उसको 100% करती एज अ मिडिल पार्ट सिर्फ 50% बोला है। जहां आपने फिक्स्ड टर्म एम्प्लाइज की बात करी तो उनके लिए एक बड़ा अच्छा इंपॉर्टेंट चेंज आया है कि जैसे रेगुलर एम्प्लाइजस को तो ग्रेचुटी पूरे फाइव इयर्स कंप्लीशन पे ही मिलेगी व्हेन दे क्विट बट फिक्स टर्म एंप्लाइजस को जो ग्रेचुटी है वो मेयरली अपॉन कंप्लीशन ऑफ़ वन ईयर ऑफ़ सर्विस पे व्हेन दे क्विट मिल जाएगी और वर्किंग जर्नलिस्ट को थ्री इयर्स पे मिलेगी। मुझे कई सारे फोन कॉल्स आते हैं कि अब तो फिक्स्ड टर्म एंप्लाइजस को ग्रेचुटी देनी पड़ेगी एक साल कंप्लीट होने

19:18 पे जब वो क्विट करेंगे तो क्या हम फिक्स्ड टर्म एंप्लाइजस को निकालना शुरू कर दें। मैं उन्हें कहती हूं कि फिक्स्ड टर्म एंप्लाइजस को आपको रिट्रचमेंट कंपनसेशन नहीं देना उन्हें नोटिस पे नहीं देना अगर आपको थोड़ी सी ग्रेचुटी देनी पड़ भी रही है और उससे आपका वैलिड टर्मिनेशन हो जाता है तो फिर उसमें क्या प्रॉब्लम है? लेकिन यहां पे मैं एक प्रकॉशन देना चाहूंगी कि कभी भी फिक्स्ड टर्म एंप्लाइजस को बहुत सालों तक कंटिन्यू ना करें कि ऐसा लगे कि आपने बस एक कैमा फ्लॉथ सिस्टम बनाया हुआ है। ऐसे भी नहीं करें कि आपने फिक्स टर्म एंप्लई को साल भर के लिए रखा। दो-तीन दिन का ग्रेप गैप दिया और फिर से आपने उनको फिक्स टर्म के ऊपर रख लिया। एक बहुत ही जेन्युइन अरेंजमेंट करें। आपको कोई लेबर लॉ की प्रॉब्लम नहीं आएगी। सो वर्चुअली अब ग्रेचुटी पीएफ के बेनिफिट्स हर एक कैटेगरी ऑफ़ एंप्लाइजज़ को मिलेंगे और यह एक बहुत ही पॉजिटिव प्रोविज़ंस प्रोमोगेट किए हैं लेजिस्लेचर ने।

20:04 जी बिल्कुल मैम मैं आपका रुख करना चाहूंगी एललीना मैम और आपसे ये समझना चाहूंगी कि सरकार का दावा यह है कि सोशल सिक्योरिटी का दायरा बहुत ज्यादा जो है वो बड़े वर्ग तक पहुंचेगा। तो ऐसे में असली सवाल यह है कि असंगठित कॉन्ट्रैक्ट गिग और प्लेटफार्म वर्कर्स तक लाभ कैसे पहुंचेगा और इस आपके अनुसार सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी? पहचान रजिस्ट्रेशन योग्यता तय करना या लाभ की डिलीवरी सबसे पहले तो अब रजिस्ट्रेशन के लिए बहुत बड़ा जो मुझे हमेशा लगता है कि जो बहुत बड़ा प्लेटफार्म है वो ईश्रम है जिसमें बहुत सारे असंगठित कर्मचारी और वर्कर्स रजिस्टर हो रहे हैं और लगातार कई राज्य सरकार तो बहुत अच्छी तरीके से इवन डोमेस्टिक वर्कर्स को

20:50 रजिस्टर कर दिए हैं और तेजी से रजिस्ट्रेशन हो रही है। ये एक अगर हम इस इस चीज को गहराई से देखें सोशल सोशल सिक्योरिटी कवरेज बहुत विस्तार इनफैक्ट हो गया है। जैसे मैं अगर एक एग्जांपल दूं ग्रैंड पेरेंट्स अब उसमें आ जा रहे हैं। पोटेंशियल एलिजिबिलिटी में अगर कोई भी किसी वर्कर का कोई वेलफेयर बेनिफिट्स है उसके लिए कवरेज जो है एलिजिबिलिटी है डिपेंडेंट ग्रैंड पेरेंट्स का वेलफेयर बेनिफिट्स के लिए वो बढ़ गया है। वह एक बहुत बड़ा पॉजिटिव एस्पेक्ट है लेबर कोर्ट्स के अंदर। इसके अलावा गिगन प्लेटफार्म वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा सोशल सिक्योरिटी कोड ने निर्धारित कर दिया है और जिसके ऊपर इस साल भी ऑनरेबल फाइनेंस मिनिस्टर ने अपने बजट

21:36 भाषण में भी इसके ऊपर जिक्र किया था और आई एम श्योर श्रम मंत्रालय इस पे ऑलरेडी कार्य कर रहे हैं। इसके अलावा आपके माइग्रेंट वर्कर्स जो असंगठित क्षेत्र के एक बहुत बड़ा कैटेगरी है कह सकते हैं। माइग्रेंट वर्कर्स का भी डेफिनेशन बढ़ गया है। पहले क्या था कि माइग्रेंट वर्कर्स ओनली कॉन्ट्रैक्टर से जो लोग आते थे उन्हीं लोगों को माइग्रेंट वर्कर्स माना जाता था। अब जो डायरेक्टली आते हैं वो लोग भी माइग्रेंट वर्कर्स में माने जाएंगे। तो जो सामाजिक सुरक्षा का दायरा है, जो वेलफेयर बेनिफिट्स का दायरा है वो अब बहुत बड़ा उसका स्कोप हो गया है और मुझे ये लगता है कि बहुत से राज्य सरकार क्योंकि बहुत से राज्य सरकार ऑलरेडी माइग्रेंट वर्कर्स के लिए हेल्थ इंश्योरेंस, कोई राज्य सरकार

22:21 हाउसिंग की स्कीम कर रहे हैं। कई राज्य सरकार टोल फ्री हेल्पलाइन नंबर इवन कोड के आने से पहले कर दिए थे। तो स्टेट गवर्नमेंट्स के पास बहुत बड़ा पोटेंशियल है एक्चुअली इसी सेंट्रल कोर्ट्स को देखते हुए लेवरेज करने के लिए और अपने वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा जो वो स्पेशली और देना चाहते हैं वो जरूर कर सकते हैं और सोशल सिक्योरिटी फंड और एक बहुत बड़ा और इंटरेस्टिंग और पॉजिटिव एस्पेक्ट मैं जो देख पा रही हूं कोर्ट में एक इसकी कंपाउंडिंग ऑफ़ ऑफेंस का जो पैसा है पेनल्टी का पैसा जो है वो भी सामाजिक सुरक्षा के फंड में जा रहा है। तो ये फंड बहुत अच्छी तरीके से वेलफेयर स्कीम्स वेलफेयर बेनिफिट्स के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। और इसमें बहुत क्लियरली ओएसएच कोड में क्लियरली मेंशन किया गया है कि

23:07 दिस फंड विल बी यूज्ड एंड एडमिनिस्टर्ड फॉर द वेलफेयर ऑफ़ अनऑर्गेनाइज्ड वर्कर्स। और अनऑर्गनाइज्ड वर्कर्स का डेफिनेशन में बहुत क्लियरली मान दिया मान लिया गया है कि इसमें वो लोग होंगे जो लोग सेल्फ एंप्लॉयड है जो लोग जो लोग कहीं भी किसी भी कानून में किसी में भी कवर्ड नहीं हो पाते सामाजिक सुरक्षा के लिए वो सभी लोग आपके हो जाएंगे। होम बेस्ड वर्कर्स हो जाएंगे और अन्य तरह-तरह के सेल्फ एंप्लॉयड वर्कर्स होंगे और इसमें बहुत बड़ा इंपैक्ट पड़ेगा उनको सामाजिक सुरक्षा के लिए सरकार तैयार रहेगी इस प्रोविजन के थ्रू। जी बिल्कुल आशुतोष जी मैं इसमें राज्यों की भूमिका और ऑन ग्राउंड इंप्लीमेंटेशन को लेकर सवाल करना चाहूंगी। चारों को्स एक साथ लागू करने में राज्यों के नियम, इंस्पेक्शंस, व्यवस्था और जागरूकता को लेकर रोड मैप क्या आप लोगों ने तैयार किया

23:54 है? खासकर अगर असंगठित और गिग वर्कर्स तक लाभ पहुंचाने की रणनीति की अगर मैं बात करूं तो वो क्या होगी? राज्यों का जो सवाल है लेबर का जो विषय है वह कनकरेंट लिस्ट में आता है। यानी राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों इसमें कानून और रूल्स बनाते हैं। इसमें मैं ये कहना चाहूंगा कि राज्य सरकारों का बहुत ही इंपॉर्टेंट रोल है। जिसमें अपन एप्रोप्रियट गवर्नमेंट कहते हैं। कोर्ट में बहुत ही स्पष्ट तरीके से बताया कि कौन से कौन से क्षेत्र में एप्रोप्रियट गवर्नमेंट राज्य सरकार रहेगी और कौन से में केंद्र सरकार रहेगी। जहांजहां पर अप्रोप्रियट गवर्नमेंट राज्य सरकार है वहां पर राज्य सरकारों द्वारा रूल्स अपने अपने प्री

24:40 पब्लिश करके उनको नोटिफाई किया गया है। जहां तक असंगठित वर्कर्स का सवाल रहा वहां पर जो गिग एंड प्लेटफार्म वर्कर्स होते हैं उसके लिए रूल्स जो है उसके लिए एप्रोप्रियट गवर्नमेंट केंद्र सरकार है और केंद्र सरकार उनके लिए स्कीम्स बनाएगी और उसमें एक नेशनल सोशल सिक्योरिटी बोर्ड का भी क्रिएशन किया जा रहा है और नेशनल सोशल सिक्योरिटी बोर्ड एक असंगठित वर्कर्स के लिए और गिगन प्लेटफार्म वर्कर्स के लिए अलग-अलग प्रकार की स्कीम्स बनाएंगी। जिसमें जो उनको बेनिफिट्स देने हैं जैसे डिसेबिलिटी बेनिफिट हो गया, एक्सीडेंट कवरेज हो गया, पेंशन हो गया। ये जो बेनिफिट्स हैं ये पूरे इन स्कीम्स के माध्यम से दिए जाएंगे। इसके लिए फंडिंग की

25:25 भी व्यवस्था का और उसका प्रावधान भी कोर्ट में ही किया गया है। जी। इसी तरह से जो अनऑर्गनाइज्ड वर्कर्स होते हैं उसके लिए अनऑर्गनाइज्ड वर्कर्स बोर्ड का गठन स्टेट्स द्वारा भी किया जाएगा और उनके लिए स्कीम्स स्टेट्स द्वारा बनाई जाएंगी। इसमें भी इसी प्रकार के जैसे पीएफ के प्रावधान, हाउसिंग के प्रावधान इत्यादि उनको उनको स्टेट्स द्वारा भी किया जाएगा। तो मैं ये कहना चाहता हूं कि स्टेट्स का बिल्कुल क्लियर कट रोल है और उनको इंस्पेक्शन स्कीम्स भी करनी है, नोटिफाई करनी है अथॉरिटीज को भी नोटिफाई करना है और हमने स्टेट्स के साथ बहुत ही क्लोज संवाद रखा गया लगातार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से इत्यादि और बहुत ही लगातार क्लोजली कोलबोरेट कर रहे हैं हम स्टेट्स में और मैं ये और भी ये

26:11 कहना चाहूंगा कि एक जोनल कॉन्फ्रेंसेस भी किए जा रहे हैं। जहां पर केंद्र सरकार के ऑफिसर्स भी स्टेट्स में जाके एक हैंड होल्डिंग भी और एक असिस्टेंस भी जहां पर आवश्यकता महसूस हो वहां पर प्रोवाइड भी कर रहे हैं ताकि अच्छी तरीके से ये कोर्ट एक बेहतर मैकेनिज्म की तरफ इस ये स्टेप्स उठाए जा रहे हैं। रावी जीकि वक्त की कमी है और मुझे कमांड आ चुकी है कि हम आपसे आखरी प्रश्न कर लूं। नए कोर्ट्स का कोर्ट केस या जो हमारे कानूनी विवाद है उन पर क्या असर पड़ेगा? खासकर अगर मजदूरों, यूनियंस और इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल्स में चलने वाले मामलों की अगर हम बात करें तो इसका क्या निपटारा तेज होने की संभावना है? ऐसी आशा हम करें। जी नए जो कोर्ट्स हैं वो लिटिगेशन को बहुत फास्ट करने वाले हैं। अभी तक क्या होता था कि पहले मैनेजमेंट और वर्कर्स जो उनका डिस्प्यूट होता था उसको लेके कंसिलिएशन मशीनरी के पास जाते थे और वहां कोई टाइम

26:57 लिमिट नहीं था। कई बार कंसिलेशन महीनों चलती थी और कई केसेस में तो सालों भी चलती थी और कंसिलेशन फेल होने के बाद जो फाइल है वह एप्रोप्रियट गवर्नमेंट के पास जाती थी। वहां भी कई बारी महीनों भी लगते थे, साल भी लगते थे। वो एक टर्म्स ऑफ रेफरेंस को डिफाइन करते थे। फिर वो टर्म्स ऑफ रेफरेंस लेबर कोर्ट इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में जाता था। और कई बारी इसके बीच में क्या होता था कि टर्म्स ऑफ रेफरेंस जो बने वो मैनेजमेंट या वर्कर्स के पास कई बारी एड्रेस चेंज या किसी और यू नो तकनीकी खराबी के कारण नहीं पहुंच पाता था। अभी कोर्ट्स ने क्या कहा है कि जो कंसिलिएशन है वो सिर्फ 45 डेज में खत्म होना ही पड़ेगा। अगर वर्कर्स और मैनेजमेंट चाहते हैं कि टाइम एक्सटेंड हो वो सेटलमेंट की बातें और करना चाहते हैं तो उसके लिए उन दोनों को जॉइंट एप्लीकेशन देनी पड़ेगी। नहीं तो 45 डेज में कंसिलेशन खत्म। उसके बाद विद इन 90 डेज वर्कमैन

27:43 साइड या मैनेजमेंट साइड जो भी एग्रीव्ड है अपने डिस्प्यूट को इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में लेके जा सकती है। वो भी 90 डेज के अंदर उनको जरूर करना पड़ेगा। और 2 साल के बाद आप कोई भी इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट फाइल नहीं कर सकते हो। तो वर्कर्स के लिए भी अच्छा है कि आपके जो डिस्प्यूट है वो रेोल्यूशन मिलेगा आपको और मैनेजमेंट भी अच्छा है कि उनको स्टेल डिस्प्यूट हैंडल नहीं करना पड़ेगा बिकॉज़ अभी मैं लेबर कोर्ट में कई सारे केसेस करती हूं जहां पे वर्कर्स 5 साल के बाद और 10 साल के बाद भी आते हैं। सो ओवरऑल लिटिगेशन हैज़ बिकम वैरी फास्ट दे देयर आर सर्टेन अदर चेंजेस आल्सो लाइक अब इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में कुछ इंडस्ट्रियल ट्रिबनल्स में डिवीजन बेंच हुआ करेगी जहां पे एक जुडिशियल मेंबर हुआ करेंगे एक एडमिनिस्ट्रेटिव मेंबर हुआ करेंगे और जुडिशियल मेंबर जो हैं वो सीनियर माने जाएंगे और कुछ इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल सिंगल बेंच ही रहेंगी। सो देयर हैव बीन सर्टेन इम्पोर्टेन्ट चेंजेस एंड इट्स डेफिनेटली गोइंग टू बी वैरी फास्टर

28:30 एंड इट्स डेफिनेटली गोइंग टू बी वैरी गुड फॉर पीपल टू हैव देयर जेन्युइन डिस्प्यूट्स कंटेस्टेड। बिल्कुल आप तीनों खास मेहमानों का बहुत शुक्रिया। बहुत ही कम समय था हमारे पास लेकिन बहुत ही सही तरीके से आपने मुख्य बिंदुओं को सामने रखा। आप तीनों का ही बहुत शुक्रिया। किसी भी देश के बैकबोन उसकी जो वर्क फोर्स है वो है और ऐसे में जो न्यू लेबर कोर्ट्स है वो बहुत वेलकम स्टेप्स हैं। सारे हितों को ध्यान में रखते हुए जो उठाए गए सरकार की ओर से और अब तो पीपल्स पार्टिसिपेशंस भी है इसमें। तो बढ़चढ़कर हिस्सा लीजिए और हमारे इस कार्यक्रम को आप संस टीवी के तमाम YouTube चैनल्स पर देख सकते हैं। दीजिए इजाजत। नमस्कार। [संगीत]

29:24 संसद टीवी के और भी प्रोग्राम्स देखने के लिए सब्सक्राइब करें हमारा YouTube चैनल और हां इन्हें लाइक और शेयर करना ना भूलें।

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