0:00 इंडिया के सारे डॉक्टर स्ट्राइक पे चले गए तीन महीना तो तीन महीने के बाद एक भी बीमारी नहीं रहेगी। आपने आयुर्वेद क्यों चुना? स्पेसिफिकली विधकर्मा उसमें क्यों चुना? वेद को आप चूज़ नहीं करते। आयुर्वेद आपको चूज़ करना है। फर्स्ट ईयर में थे तो गुरु शिष्य परंपरा के बिना ये सीखा नहीं जाता है। तो विध्कर्मा का पहला मेरा आइडेंटिफिकेशन वैद रामग सर से वहां हुआ और तब से अभी तक जर्नी चल रही है। यानी आयुर्वेद शाश्वत है। [संगीत] तो सर विध और कर्म दो शब्द जो है उसको अगर आप थोड़ा डसेक करके समझा पाए संस्कृत में या इसका कोई आपके पास आयुर्वेदिक रेफरेंस हो या ग्रंथों का रेफरेंस हो देखिएगा
0:46 आयुर्वेद में तीन संहिता मुख्य बताई जाती है। एक चरक संहिता है। चरकस्तु चिकित्स है। यानी चिकित्सा में चरक संहिता श्रेष्ठ है। औषधियों में वागभट को कहा गया है। औषधियों का वर्णन इस्तेमाल करने के लिए छोटे-छोटे नुकस से वागभट संहिता में दिए गए। सर्जरी जो है सुश्रुत संहिता में बताई गई। इसीलिए सुश्रुत जी को फादर ऑफ सर्जरी कहा है। कई बार सर लोग इसे एक्यूपंचर से भी थोड़ा बहुत कंपेयर करते हैं। तो क्या डिफरेंस है दोनों में विधकर्मा और एक्यूपंचर में। विध्कर्मा यह रक्त दोष के हिसाब से आता है। विध्कर्मा हमारे मर्म को महत्व देता है। हमारे शरीर में 107 ऐसी जगह जहां पे आघात होने के बाद शरीर में विकलांगता आती है। आप जब प्रिक करते हैं वो प्रिक करने के बाद उसकी बॉडी में क्या चेंज आता है? आयुर्वेद दोष धातु मल
1:32 सिद्धांत के ऊपर आधारित है। तो हर चिकित्सा करते समय उसका विचार किया ही जाता है। अगर हम पर्टिकुलर जगह पे अगर काम करते हैं वेधन कर्म करते हैं तो शरीर में अलग-अलग बदलाव आते हैं। देखिएगा आप यहां पे बैठे यहां पे लाइट है। इसका बटन वहां पे बराबर यहां पे क्यों नहीं बट? विध्कर्मा क्या सिर्फ पेन मैनेजमेंट तक सीमित है या फिर कौन से कौन से रोगों में हम विधकर्मा यूज़ कर सकते हैं? रक्त की वजह से जब शूल होता है तो विधकर्मा आता है। लेकिन रक्त वजह से रक्त के दोष की वजह से बहुत सारी बीमारियां होती है। सबसे ज्यादा आने वाले होते हैं इनफर्टिलिटी केसेस होते हैं। उसके बाद में आते हैं ऑटिज्म और सेरेबल पालसी जैसे केसेस जहां पे बिहेवियर डिसऑर्डर होता है। 11 मिलियन से ज्यादा लोग रेटिना के प्रॉब्लम से सफर कर रहे हैं। तो आयुर्वेद इन कंडीशंस को
2:18 कैसे देखता है? नेत्र में सरसों के मात्रा के हिसाब से एक होलो भाग है। उसको दृष्टि हम कह रहे हैं और उसके मैं इतनी व्याधियां बता रहा हूं। ऐसा सुश्रुत संहिता पे वर्णन है और उसमें ग्लूकोमा उसमें कैटक लिंगनास 3000 साल पहले बता चुके हैं। सही बात है। वेलकम डॉक्टर देशमुख सर टू द आयुर्वेदिक पडकास्ट। फाइनली आज हम आपके साथ जब रूबरू हुए हैं तो थोड़ा मैं रिकॉल करना चाहूंगा। हमारे दर्शकों को बताना चाहूंगा कि अप्रैल में जब मैं आपके वहां आया था और फर्स्ट टाइम मैंने देखा था पूरा क्लीनिक स्टूडेंट से भरा हुआ था आपका और
3:06 जब मुझे आपसे मिलने का मौका मिला तो यू वर डूइंग सम प्रिक्स जो पेशेंट थे आपके पास उनके आप बॉडी पे कुछ प्रिक्स कर रहे थे। तब मुझे लगा कि ये क्या थेरेपी है? ये क्या कर रहे हैं सर? जिसकी वजह से वो पेशेंट भी मैं देख रहा था एकदम खुश हो के बाहर जा रहा था। हां। तो उस वक्त से हम सोच रहे थे कि क्या है क्या है? एंड देन थोड़ा हमने भी देखा कि इसे आई थिंक विधकर्मा कहते हैं। विधकर्मा कहते हैं। तो वो क्या मैजिक था जो आप कर रहे थे तब से हम लोग सोच रहे थे एक बार आपके साथ रूबरू होंगे। हम तो यह थेरेपी के बारे में थोड़ा हम आज समझेंगे और प्लस आज के स्टूडेंट्स जो यह थेरेपी सीखना चाहते हैं उनके लिए क्या फ्यूचर पॉसिबिलिटीज है इस थेरेपी को लेकर भी और थोड़ा इसके बारे में और डिटेल में
3:52 हमें बताइएगा कि क्या इस थेरेपी में आयुर्वेद का कुछ वर्णन है वगैरह थोड़ा हम जानना चाहेंगे आपके साथ तो पहले तो आप थोड़ा अगर अपनी जर्नी के बारे में बताना चाहेंगे कि आपने आयुर्वेद क्यों चुना स्पेसिफिकली विद कर्म उसमें क्यों चुना अभी सबसे अच्छी बात है कि आयुर्वेद के बारे में हम जब सीखते हैं तो एक 5 साल जैसा कोर्स होता है आयुर्वेद जी इक्वली इक्वल टू एमबीबीएस हम कभी कहेंगे तो उससे भी ज्यादा इसमें पढ़ाई होती है अच्छा हमें सिर्फ आयुर्वेद सीखना नहीं होता है हमें सिर्फ संस्कृत सीखना नहीं होता है ग्रंथ सीखना नहीं होता है हमें मॉडर्न के सब पैथोफिजियोलॉजी मेडिसिन माइक्रो बायोलॉजी सब सीखना है हमें अच्छा उसके साथ में उसका कंपेरेटिव आयुर्वेद में क्या है वो सीखना है और जो प्रेजेंटेशन रहता रहता है पेशेंट का वह हमें आयुर्वेद
4:40 से ठीक करना है क्योंकि डिग्री आयुर्वेद है तो हम आयुर्वेद से ही चिकित्सा देंगे लेकिन पेशेंट को बताते समय हमें सब सीखना होता है तो बेसिकली बीएएमएस और आयुर्वेद कोर्स ही सबसे कठिन कोर्स है। इसके लिए सामान्य लोग इसमें नहीं आ सकते। इसको चूज़ किया जाता है। कहते हैं ना आयुर्वेद को आप चूज़ नहीं करते। आयुर्वेद आपको चूज़ करता है। तो ऐसा होने के बाद हम जब फर्स्ट ईयर में थे तो गुरु शिष्य परंपरा के बिना ये सीखा नहीं जाता है। और आयुर्वेद किसी ने निर्माण नहीं किया है। टेक्स्ट बुक्स में निर्माण नहीं है। ब्रह्मा ने निर्माण नहीं किया है। ब्रह्मा जी भी कहते हैं कि ब्रह्मा स्पुत्वा आयुष वेदम प्रजापति मजग्रत यानी ब्रह्मा ने भी स्मरण किया है आयुर्वेद का और लोगों को दिया है। यानी आयुर्वेद शाश्वत है। पहले से है। सिर्फ स्मरण करके ब्रह्मा ने बताया
5:26 और वो हम हमारे सबके बीच में है। हम जब सीखते हैं बीएएमएस कोर्स को जाते हैं तो कोर्स में जाते समय कॉलेज में तो जाते हैं लेकिन साथ में कहीं बाहर सीखने के लिए जाते हैं। जहां गुरु बनाते हैं किसी को। हमने भी ऐसे गुरु बनाए और सीखने के बाद हमारा ट्रेंड क्या होता है? पुणे इज अ हब ऑफ़ आयेदा। यहां पे बहुत अच्छे आयुर्वेदिक वैद्य है। यहां पे आप गली-गली में देखो कम से कम 20 आयुर्वेदिक क्लीनिक मिल जाएंगे आपको। तो ऐसे आयुर्वेदिक हब में हम आना चाहते थे और हम जहां पे गुरु के यहां पे सीखने के लिए जाते थे। ट्रेंड ऐसा था कि पुणे में आके सीखना है। बट हमारे क्लीनिक में हमारे गुरु व अमृत सर के क्लीनिक में हम सीखते थे। सारा सीख लिया था क्योंकि वो भी सब जगह पे घूम चुके थे। अब आगे क्या था कि पुणे में आना चाहते थे। लेकिन पुणे में 22 आयुर्वेदिक
6:13 डॉक्टर्स की लिस्ट मुझे मिली थी हमारे एक सीनियर से और सारे 22 डॉक्टर के पास मैं चले गया था कि समथिंग डिफरेंट मुझे सीखना है यहां पे जाके। अब वैसे वहां पे जाने के बाद वो तो सीख लिया था क्योंकि हमारे सर घूमे थे सब जगह पे सीखने के लिए। लेकिन देयर वाज़ लैकुना। वहां पे आयुर्वेद का कुछ लैकुना था जैसे कि पेन मैनेजमेंट के लिए लोग एक दर्द हो गया तो एक पेन किलर खा लेंगे और ड्यूटी को जाएंगे। आयुर्वेद में क्या होता था कि अभ्यंग है, ट्रीटमेंट चलती थी 15 20 दिन तो वो स्पीड ट्रीटमेंट का एक लैकुना था। तो हम सोचते समय घूम रहे थे ऐसा तो हमारे एक वैद्य राहु गोकटे सर उनकी उम्र 95 के ऊपर थी तो उनका नाम समझ में आया और मैं जा रहा था सर के क्लीनिक
6:58 में ऊपर जाते-जाते समय एक बूढ़ी औरत है। उसका घुटना दुख रहा था और ऊपर जाते समय उसको बहुत दर्द हो रहा था। ऐसे समय मैं उसके पीछे से आगे जाना चाहता था। लेकिन मुझे समय लगा जाने के लिए क्योंकि उसके स्पीड से मुझे जाना था। अब जैसे ऊपर जाने के बाद हम क्या सोचते हैं आयुर्वेद में कि इसको औषधि देंगे उसको पंचकर्म रहेगा नी जॉइंट अर्थराइटिस है तो एट एक तो नी जॉइंट रिप्लेसमेंट टोटल नी जॉइंट रिप्लेसमेंट बोला जाता है टीकेआर या कैल्शियम बाकी सारी ट्रीटमेंट रहती है एलोपैथी में आयुर्वेद में गुगुल वगैरह या पंचकर्मा रहेगा एटलीस्ट शी विल टेक टू मंथ्स लेकिन अंदर गई और इतने स्पीड से बाहर आई जैसे कि मैं मेरे स्पीड से नीचे और ऊपर जाके आई सो आई वास वंडरिंग अरे ये क्या हुआ? हमने तो कभी टेक्स्ट बुक में पढ़ा नहीं था।
7:44 और फर्स्ट टाइम एट दैट टाइम आई एंटर्ड इन द गोकर्स क्लीनिक और वहां पे देखने के बाद 95 इयर्स का आदमी बैठा है। सिंपल कपड़े परिधान किए हैं उसने और लोग जैसे आप हमारे क्लीनिक में देखते हो वैसे वो सर के क्लीनिक में ठीक हो के जा रहे हैं। यानी ठीक होने यानी पेन मैनेजमेंट हो रहा था। हम तो विधकर्मा का पहला मेरा आइडेंटिफिकेशन वैद रामगो सर से वहां हुआ और तब से अभी तक जर्नी चल रही है। इसको इस चिकित्सा को विध्कर्मा कहा जाता है। ये एक थेरेपी नहीं है। एक कंप्लीट चिकित्सा है। ऐसा समझा जाता था कि ओनली पेन मैनेजमेंट टेक्निक है। नहीं ये थेरेपी नहीं है। चिकित्सा होती है और चिकित्सा यानी ठीक होना। हम बस
8:29 तो सर विध और कर्म दो शब्द जो है उसको अगर आप थोड़ा डसेक्ट करके समझा पाए संस्कृत में या इसका कोई आपके पास आयुर्वेदिक रेफरेंस हो या ग्रंथोक्त रेफरेंस हो हां देखिएगा आयुर्वेद में तीन संहिता मुख्य बताई जाती है एक चरक संहिता है चरकस्तु चिकित्सिते यानी चिकित्सा में चरक संहिता श्रेष्ठ है औषधियों में वाग्भट को कहा गया है औषधियों का वर्णन इस्तेमाल करने के लिए छोटे-छोटे नुक्से वाग्भट संहिता में दिए हैं और शल शल्य सुश्रुता यानी शल्य कर्म यानी सर्जरी जो है सुश्रुत संहिता में बताई है। इसीलिए सुश्रुत जी को फादर ऑफ सर्जरी कहा जाता है। सब जगह पे सुश्रुत को फादर ऑफ सर्जरी कहा जाता है। वही सुश्रुत संहिता में सर्जरी के साथ बहुत सारे अलग-अलग प्रकार दिए हैं। आजकल बहुत टाइप ऑफ इंसीजन आते हैं। अलग प्रकार
9:15 के स्विचरिंग आते हैं। अलग-अलग इन्वेशंस हो रहे हैं। लेकिन ये सों का उल्लेख जो है 3000 साल पहले हुआ है। अष्टवि शस्त्र कर्म में अष्टवि शस्त्र में सेवन पाटन लेखन अलग-अलग यानी कटिंग टू स्क्रैपिंग टू पंक्चरिंग तो उसमें वेधन यह एक शस्त्रकर्म आया है विधक कर्म जो है वेदन है वेदन यानी टू पंक्चर वहां पे वेधन कर्म करना है जैसे किसी का पेट में पानी है तो क्या करेंगे डॉक्टर वहां पे डाल के एस्पिरेट कर लेंगे दैट इज अ वेदन कर्म हार्ट में जाना है किसी को इंजेक्शन देना देना है। क्या किया जाता है? टू पंक्चर। दैट इज़ अ शस्त्रकर्मा। सर्जरी का पार्ट है। कटिंग सर्जरी का पार्ट है। स्क्रैपिंग सर्जरी का पार्ट है। बर्निंग सर्जरी का पार्ट है। तो
10:01 विधकर्मा, अग्निकर्मा या अष्टविद शस्त्रकर्मा आठ प्रकार के सर्जरीज बताए गए आयुर्वेद में। उसका एक वेधन कर्म पार्ट है। और उसका उल्लेख पूरे संहिता में तीनों संहिता में आया हुआ है। हर एक व्याधि में आया है। प्रॉब्लम यह है इसको एक्सप्लोर कैसे करना हर एक व्यक्ति के हिसाब से होगा। हम देखिएगा आयुर्वेद जीवंत आयुर्वेद है। मैं एक आपको बताता हूं। जैसे हम यहां पे बैठे हैं। एक हरडे नाम की दवाई है। आपने खरीद ली। आप पेशेंट हो। आपको एक बीमारी है। आपने YouTube पे पढ़ के हरडे नाम की दवाई खरीद ली। हम वही आप किसी नाड़ी तज्ञ के पास जाके हरडे नाम की दवाई उसने दी। एक ही व्यक्ति को। मैं सर्जरी का कार्य करता हूं। विध कर्म करता हूं। मेरे पास आए। मैंने कुछ सोच के आपको हरडे नाम की
10:48 दवाई दी। एक ही व्यक्ति को एक ही समय पे ऐसे थ्री कंडीशंस है और आपने खुद जाके कोई शॉप में से परचेस किए हर डे तो क्या होगा? पैरासिटामॉल परचेस करेंगे तो सब कंडीशन में पैरासिटामॉल एंटीबायोटिक जैसा कार्य करेगी। लेकिन आयुर्वेद जीवंत आयुर्वेद है। देने वाले व्यक्ति के सोच के अनुसार वो औषधि काम करती है। मैं दिया हूं। मैं सर्जरी के हिसाब से मैंने पथ्या सोचा है तो पथ्यकर काम करेगी। आपको किसी नाड़ी तज वैद्य ने आपको अनुलोमनी नाम का सोच के उसको दिया है तो उस औषधियों में देने वाले व्यक्ति का कर्म के तत्व आके वो काम करती है इसलिए हर एक आयुर्वेदिक वनस्पति के 15 20 17 नाम है हम तो जो जैसे सोचता है उसके हिसाब से देगा
11:33 तो वो काम करती है तो विधक कर्म करते समय वैसे ही हमें करना पड़ता है। अच्छा बायो इंडिविजुअल है। यस। ओके। कई बार सर लोग इसे एक्यूपंचर से भी थोड़ा बहुत कंपेयर करते हैं। तो क्या डिफरेंस है दोनों में? विधकर्मा और एक्यूपंक्चर में? हां। पंक्चर इंग्लिश शब्द है अलग। हम विधकर्मा यह रक्त दोष के हिसाब से आता है। विधक कर्म हमारे मर्म को महत्व देता है। हमारे शरीर में 107 ऐसी जगह है जहां पे आघात होने के बाद शरीर में विकलांगता आती है। सद्य प्राण ऐसी जगह है जहां पे मार लग गया तो स्पॉट डेथ है। कुछ ऐसे मर्म है जहां पे आघात होने के बाद क्या हो जाएगा कि विकलांगता आ जाएगी। जैसे हमारे हाथ की यहां पे एक मर्म है। अंगुष्ट अंगुल मध्य क्षिप्रम नाम तत्र विस आक्षेपक मरणम। यहां
12:19 पे अगर मार लगा एग्जजेक्टली तो पेशेंट को आक्षेपक आते हैं यानी कन्वर्जेंस आते हैं। भगवान श्री कृष्ण जी को जो बाण लगा था सिर्फ पैर के यहां पे लगा था। चार मर्म दो हाथ में दो पैर में भगवान श्री कृष्ण जी को जो श्राप था वो पूरा होने के लिए जो बाण लगा था एरो लगा था वो क्षिप्र मर्म के ऊपर लगा था और उनकी मृत्यु होने तक उनको आक्षेपक आ रहे थे। तो ये जो अलग-अलग मर्म दिए हैं ये मर्म के अनुसार आयुर्वेद में विध्कर्म बताया गया। मर्म को स्पर्श नहीं करना है। मर्म के ऊपर, नीचे, आगे पीछे हमारे 72,000 योग में नाड़ियां बताई गई हैं। और वो नाड़ियों के जो मूल स्थान है उनको चक्र कहा गया है। और उन चक्रों की एनर्जी है पूरे शरीर में डिस्पर्स हो चुकी है और जो मेनमेन वायबल जगह है जो इंपॉर्टेंट जगह है उसको मर्म
13:06 कहा गया है। अब वो मर्म को लेके चिकित्सा करनी होती है जिसको विधक कर्म कहा गया है। एक्यूपंक्चर क्या होता है? वो अलग सिस्टम है। वो मेरडियन के हिसाब से है। एनर्जी फ्लो के हिसाब से चाइना में आती है तो चाइना में जो ची शब्द है ची का शब्द है अर्थ है एनर्जी होता है तो वह एनर्जी के हिसाब से और आयुर्वेद का विधकर्मा है दोष धातु मल सिद्धांत के हिसाब से होता है तो ये 3000 पुराना है और एक्यूपंक्चर 600 600 साल पुराना होगा ज्यादा मुझे पता नहीं लेकिन ये बहुत पुराना है। अच्छा तो सर विधक कर्म क्या सिर्फ पेन मैनेजमेंट तक सीमित है या फिर कौन से कौन से रोगों में हम विधकर्मा यूज कर सकते हैं? अगर शास्त्रोक्त बात की जाए तो पेन मैनेजमेंट में आयुर्वेद में सीक्वेंस आया है। अगर किसी को दर्द हो रहा
13:52 है तो आपको स्नेहन करना है। यानी तेल लगाना है। गरम तेल लगा के बहुत सारे प्रकार के तेल आए। उसमें से सारे दर्द चले जाएंगे। अगर नहीं गया स्नेहन के बाद स्वेदन देना है यानी स्टीम देना है अलग-अलग प्रकार के सेक लेना है जो पेशेंट घर पे लेते हैं स्नेहन स्वेदनम मर्दन यानी वहां पे मालिश करनी है मसाज करनी है पेन मैनेजमेंट के लिए इससे भी नहीं हुआ तो वहां पे बंधन आया है अलग-अलग प्रकार के बैंड बांधने हम नी गैप देते हैं अलग-अलग प्रकार के बैंड आते हैं या बैंडेजेस आते हैं अलग-अलग तो उसको बंधन कहा गया उसके बाद में विध आया है रक्तव स्रोतस यानी रक्त के अनुसार अगर शूल होता है तो वहां पे वेधन कर्म आया आया है तो विधन और उसके बाद अग्निकर्मा ऐसा सीक्वेंस आया है। तो रक्त रक्त की वजह से जब शूल होता है तो विधकर्मा आता है। लेकिन रक्त वजह से रक्त
14:39 के दोष की वजह से बहुत सारी बीमारियां होती है। आयुर्वेद के ग्रंथ में ऐसा वर्णन किया है कि आप अगर औषधि लेते हो, आप बहुत प्रकार के पंचकर्म करते हो, अलग-अलग गुणों की चिकित्सा करते हो और फिर भी रिजल्ट नहीं आता है तो समझ लेना यह व्याधि रक्त के दोष के अनुसार हुआ है और इसीलिए वहां पे रक्त मोक्षण चिकित्सा बताई है और उसका ही एक पार्ट है विधकर्मा आता है। तो ये पेन मैनेजमेंट भी हो गया। डिसीज मैनेजमेंट हो गया। आयुर्वेद में अर्ध चिकित्सा बताई गई है। बस्ती के और विधकर्मों को रक्त मोक्षण को अर्ध चिकित्सा बताई गई। यानी हाफ ट्रीटमेंट। हाफ ट्रीटमेंट बाकी क्या रहेगी? आप पेशेंट को कहना है कि आप जो भी इसके कारण है वह बंद करो और अच्छी तरह से पथ्य अपथ्य करो। आप ठीक हो जाओगे। तो ये कंप्लीट ट्रीटमेंट सारे डिजीज में होती है जहां पे रक्त का दोष होता है।
15:25 तो आप मेजरली अभी अगर बात करें तो कौन से डिजीज में ये इंपैक्ट करते हैं? पेन के अलावा। हां पेन मैनेजमेंट तो सब होता ही है। लेकिन मेरे यहां पे सबसे ज्यादा आने वाले होते हैं इनफर्टिलिटी केसेस होते हैं। उसके बाद में आते हैं ऑटिज्म और सेरेबल पालसी जैसे केसेस जहां पे बिहेवियर डिसऑर्डर होते हैं। माइलस्टोन डेवलपमेंट के लिए विधक कर्म किया जाता है। ये मज्जावतस यानी मेंदु यानी मस्तिष्क के विकार ठीक नहीं होते। यही समझा जाता था। और जैसे आपने कल देखा था कि मेरे पास कंटीन्यूअस पेशेंट होते हैं और माता-पिता को होप मिलती है कि ये बच्चे ठीक हो रहे हैं। उसके बाद में रेटिना की डिसीज जहां पे असंभव ऐसी व्याधियां होती है जहां पे ठीक ही नहीं हो पाती। वहां पे आयुर्वेद बहुत अच्छा दिया है। आपने कभी एक कुछ साल पहले
16:12 सुना होगा एक साउथ अफ्रीका की कुछ सेलिब्रिटी थी। कोई नेता की लड़की थी उसकी आंखें चली गई थी। और वो नरेंद्र मोदी जी ने बताया था कि उन्होंने आयुर्वेदिक चिकित्सा ली थी। बराबर तो जो कहीं नहीं होता है वो उसके रेटिना सही हुए थे। हमारे पास ऐसे बहुत सारे पेशेंट आते हैं जो रेटिना के डिसीज लेके आते हैं। तो प्रॉब्लम यह है कि आयुर्वेद और एलोपैथी साथ में नहीं चलता है। अगर साथ में चलेंगे तो ये अलग ऊंचाई पे चले जाते हैं। लेकिन दोनों अगर एक दूसरे को रिस्पेक्ट से देखेंगे तो जो आयुर्वेद करता है वो एलोपैथी नहीं कर पाएगा और जो एलोपैथी करता है वो आयुर्वेद नहीं कर पाएगा। तो दोनों अगर मिल जाते हैं तो कंप्लीट ट्रीटमेंट भी बना सकते हैं आप। ट्रू ट्रू। तो आपने जिनजिन इंडिकेशंस की
16:58 बात की, पेन मैनेजमेंट की, ऑटिज्म की आपने बात की, रेटिना की बात की, आपने इनफर्टिलिटी की भी बात की। तो हर एक पे थोड़ा इंडिविजुअली हम फोकस करना चाहेंगे। पहले अगर हम पेन की बात करें तो पेन मैनेजमेंट में क्या कोई स्पेसिफिक पेन पे ही विधकर्मा रहता है या फिर जनरल बॉडी पेन कोई भी हो, बोनस का, मसल्स का किसी पे भी काम करेगा। नहीं नहीं देखो अभी सीक्वेंस कैसा है? मैंने कहा था कि स्नेहन स्वेदन मर्दन बंधन विद्ध अग्नि अकेला विधक कर्म यह रक्त वस्त्र तो उसके ऊपर काम करेगा लेकिन उसके साथ कुछ ना कुछ चाहिए आपको अग्निकर्म भी करना पड़ेगा उसको या पेशेंट है जैसे कि एसी में बैठा है और उसको गर्दन अकट गई है तो वो ठंडा शीत गुण की वजह से उसका स्टिफनेस बढ़ता है तो वहां पे उसको उष्ण चिकित्सा की जरूरत होती है विधकर्म के साथ तो हम वहां पे थोड़ा सा तेल लगा के थोड़ा सा मसाज करके थोड़ा गर्म उष्ण तेल
17:45 इस्तेमाल करते हैं या विधकर्म के बाद अग्निकर्म करते हैं तो वो पूरी चिकित्सा हो जाती है। तो हर पेन मैनेजमेंट में हर पेन प्रत्येक पेन क्यों आ रहा है? वो कौन से गुणों की वजह से आता आ रहा है वो देखना पड़ेगा। जैसे कि सिंपल है कि माइग्रेन बहुत ज्यादा पेन होता है पेशेंट को। कुछ लाइट भी सहन नहीं कर पाता है। आवाज भी वो सहन नहीं कर पाता है। तो वो पित्तज शूल बताया गया है। पेशेंट के लिए हेडेक इज द मेन कंप्लेंट। लेकिन आयुर्वेदिक डॉक्टर सोचता है कफ हेडेक हो रहा है। जब खाना खाने के बाद हो रहा है तो कफ़ दोष अनुबंधित है। किसी का खाली पेट हो रहा है। लाइट सहन नहीं कर सकते। साउंड फोबिया साउंड नहीं चाहिए मुझे यार। पेशेंट बोलता है यार ये साउंड बंद करो। आप सब बात करना बंद करो। मैं अंधेरे में रुकता हूं। वो पित्तज सुरशूल होता है। रात्रोवृत्ति निशिच यानी रात्रि में जब
18:32 बढ़ रहा है तो वातशूल होता है। खाने के बाद बढ़ रहा है तो कफज की वजह से होता है। खाली पेट बढ़ रहा है तो पित्त की वजह से हो रहा है। एंगेजमेंट हो रहा है तो पित्त की वजह से है। तो ये क्यों हो रहा है वो देख के उसकी साइट बदल जाती है विधक कर्म की और वो पेन मैनेजमेंट उसी तरह से होगा। ऐसा नहीं तो क्या हो जाता हम परमानेंट मार्क कर लेते हर पेशेंट को मार करके देते और घर पे जाके करो सुई लगाओ तो ऐसा नहीं होगा। धातु स्थान देखा जाएगा, दोष देखा जाएगा। आयुर्वेद दोष धातु मल सिद्धांत के ऊपर आधारित है। तो हर चिकित्सा करते समय वो उसका विचार किया ही जाता है। तो जैसे फॉर एग्जांपल अभी आपने बताया माइग्रेन का आपने एक एग्जांपल बताया कि उसको आप एनालाइज करेंगे कि खाने के बाद हो रहा है, रात को हो रहा है। वो एनालाइज आपने कर लिया। आपको मालूम पड़ गया। अब आप जब प्रिक करते हैं फॉर एग्जांपल पेशेंट
19:17 आपके पास है उस समय पे तो वो प्रिक करने के बाद उसकी बॉडी में क्या चेंज आता है ऐसा कि उसको रिजल्ट दिखता है। देखो सबसे इंपॉर्टेंट है आप कार्डियोलॉजिस्ट को पकड़ेंगे कार्डियक सर्जन है। वो क्या करेगा कि यहां पे ब्लॉकेजेस है वो ब्लड वेसल से कुछ इंस्ट्रूमेंट डालेगा और जो ब्लॉकेजेस जस्ट उसको पोक करेगा और वहां से उसको ब्लॉकेजेस को क्लीन करेगा। दैट इज़ अ प्लंबिंग। दैट इज़ अ बेस्ट मैकेनिज्म। बट दो विजुअल है। वायु का गुण जो है शरीर में तीन दोष है। वात, पित्त, कफ उसमें वायु जो है सूक्ष्म है। अदृश्य है। अब मैं हाथ ऊपर कर रहा हूं। दैट इज ड्यू टू द वातज। मैं पलकें झपक रहा हूं। अक्षी निमेश उन्मेश बंद कर रहा हूं, चालू कर रहा हूं। वो वन वायु की वजह से मेरा हार्ट बीटिंग हो रहा है वायु की वजह से।
20:03 वो दिखता नहीं है। वो उसको महसूस करना पड़ता है। वायु दिखेगा नहीं। नहीं तो ऐसे थोड़ी है विध कर लिया और हवा निकल गया। ऐसा नहीं होगा। तो वायु के गुण के हिसाब से बताया गया है। और वात विकार कैसे बताया? देह श्रोतासी रिक्तानी पूरित अनलोबली यानी शरीर में अलग-अलग प्रकार के टिश्यूज़ है, अलग-अलग प्रकार के रचनाएं हैं। उसमें वात विकार अगर हो रहे हैं। वात विकार हो रहे हैं यानी हवा नहीं जा रही है। वहां पे उसके गुण जो है वो रुक्ष बन रहा है। यानी अगर कोई स्निग्ध है यानी ऑयलीनेस है। उसका इलास्टिसिटी है। वहां पे इलास्टिटी लूज़ होना है। यानी वहां पे रुखापन आ गया। दैट इज़ अ वात। हां किसी के आइज अच्छे हैं लेकिन वहां पे ड्राई बन गया। दैट इज अ वात। हार्ट का पल्पिटेशन अच्छा है लेकिन तेज हो रहा है। दैट इज अ चल गुण। तो ऐसे गुणों के हिसाब से जहां पे वायु बढ़ेगा तो वो वहां पे
20:50 अवरोध होता है या क्षय होता है। दो प्रकार से बढ़ता है। एक तो रुक गया यानी बहुत भीड़ जा रही है और अगले बंदे ने सब रास्ता रोक दिया तो क्या हो जाएगा? पीछे गड़बड़ हो जाएगी। दैट इज़ अवरोधात्मक संप्राप्ति। रुक गया है। दैट इज़ अ ब्लॉकेज। एंड सेकंड इज वहां पर कोई नहीं है। खाने को नहीं दिया किसी को सूख जाएगा। वैसे क्षीण संप्राप्ति ऐसे दो प्रकार के वात विकार होते हैं। दोनों प्रकार में विध्क कर्म करने के बाद क्या हो जाएगा? फर्स्ट प्रकार में वो ब्लॉकेज निकल जाएगा। दैट इज़ वायु का अवरोध दूर हो जाएगा। सो सर्कुलेशन सही हो जाएगा तो क्या हो जाएगा? पेशेंट की बीमारी आधी कम हो जाएगी। और जब क्षीण है यानी कम हो चुका है तो वहां पे ब्लड अगर बढ़ेगा रक्त प्रवाह बढ़ाएंगे हम तो वहां पे क्या हो जाएगा? दोषों के गुण बताए गए धातुओं के पीनम जीवनम लेप स्नेह धारण पूर्ण यानी
21:38 खाने के बाद हमें अच्छा लगता है एकदम से स्ूर्ति आ जाती है हम धूप में घूम रहे हैं और हमने कोई जूस पी लिया तो स्फूर्ति आ जाती है वो रसवस्रोतस का काम है दूसरा काम है रक्त का रक्त का काम है जीवन देना यानी हीलिंग है डॉक्टर क्या करता है जख्म होने के बाद सिर्फ क्लीन करता है हीलिंग कैपेसिटी इज़ इटसेल्फ वो हो शरीर का काम है अगर वहां पे रक्त नहीं है तो हील ही नहीं होगा जैसे सोयासिस जैसी कंडीशन है अगर कोई गिर गया गाड़ी में से और एकदम से वो घिस गया उसको मार लगा है तो अपने आप हील हो जाता है लेकिन सोरियासिस नहीं हील हो जाता है क्योंकि उसकी बॉडी करने नहीं देती दैट्स व्हाई इट इज़ इन ऑटोम्यून डिसऑर्डर वहां पे अगर रक्त व स्रोत यानी जीवन कर्म हम सही करते हैं तो वो पेशेंट सही होता है इसीलिए सोरायसिस जैसे त्वचा विकार में रक्त मोक्षण चिकित्सा 15-15 दिन को आई है हम
22:23 तो हमें देख के करना पड़ेगा जीवन कर्म करना है तो रक्त के ऊपर काम करने का पड़ेगा विध कर्म वही करता है अगर हम पर्टिकुलर जगह पे अगर काम करते हैं, वेधन कर्म करते हैं तो शरीर में अलग-अलग बदलाव होते हैं। देखिए आप यहां पे बैठे यहां पे लाइट है, इसका बटन वहां पे है। बराबर यहां पे क्यों नहीं बटन? दैट इज अ डिसकंफर्ट ना यहां पे नहीं रख सकते बटन। उधर ही रखना पड़ेगा जो हमें इजी है। शरीर में ऐसे ही बताया गया है। हम यहां पे अगर डिजीज है वहां पे वेदन कर्म करो। यहां पे डिजीज है तो वहां पे वेधन कर्म। में ऐसे बताया गया है क्योंकि वो इजी है। जैसे कि अंगुष्ट मूल है हमारे पैर के यहां पे एक ऐसी जगह पे वहां पे विध कर्म करने के बाद स्टोन का पेन तुरंत कम हो जाता है। टेबल में से नीचे लेने तक स्टोन का पेन कम हो जाता है। ओ अच्छा अब एनाटॉमी और शरीर
23:09 रचना है। शारीर रचना आयुर्वेद का शब्द है। यानी हमारी एड़ी है ना वहां पे एक बोन है। कैल्कनियम बोन है। दैट इज ओनली बोन। उसका क्या लेना देना? एक ऐसी बीमारी है विषुचिका नाम की जिसमें उल्टियां हो रही है और संडास भी हो रहे हैं। दस्त लग रहे हैं। तो ऐसे में क्या होगा? पेशेंट डिहाइड्रेट हो जाएगा और इमरजेंसी ट्रीटमेंट क्या है? उसको सलायन देना है। आरएल देना है। इलेक्ट्रोलाइट इमंबैलेंस जो है क्लियर करना है। बस आयुर्वेद में क्या कहा है? पार्शनी के ऊपर दाह कर्म करना है। यानी पैर के यहां पे कैल्केनियम बोन है। वहां पे उसको चटका देना है। अब कोई अगर आधुनिक वैद्य होगा, डॉक्टर होगा वो बोलेगा ये क्या यार लगा के रखा बंदुगरी लगा के रह गया ऐसा कुछ होगा क्या लेकिन आयुर्वेद में शरीर रचना बहुत अलग बताई गई है जो पारशनी यानी कैल्केनियम बोन है उसको अस्थिमर्म कहा गया है और अस्थि की उत्पत्ति अस्थि
23:56 धरा कला सा व पुर धरा कला यानी आतोड़ों से होती है इसीलिए जब वहां पे हम अग्निकर्म करते हैं चटका देते हैं पार्शने के ऊपर इंटेस्टाइन जो है नजदीक आती है और जो फ्लूइड लॉ से रुक जाता है इंपॉर्टेंट क्या है ऐसे पेशेंट में फ्लूइड देना इंपॉर्टेंट है आईवी देना लेकिन जो लॉस हो रहा है वो भी रुकाना चाहिए ना। तो वो अग्निकर्मा से लॉस रुक जाता है। अब ये तो हो गया मिथ हो गया ऐसा लगता है। हमारे सर क्या कहते थे? क्या करते थे? वो अपेंडिक्स की सर्जरी कर रहे हैं। अपेंडिक्स लोकेट ही नहीं होता था। तो ऑपरेशन थिएटर में कॉटरी होती है। वो वहां पे लगाते थे। आप पूरे इंटेस्टाइन सिकुड़ जाती है और अपेंडिक्स मिल जाता है। अच्छा। तो दैट इज अ ऑन द टेबल प्रूफ। हां प्रूफ। तो आयुर्वेद का शरीर रचना अलग होती है, एनाटॉमी अलग होती है। लेकिन यह
24:42 पढ़ा नहीं जानी चाहिए सब जगह। तो सर ये आपने जो एग्जांपल दिया कि इस आपने वो जगह पे दिया तुरंत पेन कम हो गया और वो जो आपने रिलीफ बताई तो लोग जो पेन किलर लेते हैं हम तो उसकी जगह पे ये ट्रीटमेंट करना है ना। अच्छा दैट्स व्हाई इतनी भीड़ है ना? तो वो वो स्पीड पे रिजल्ट हमको मिल जाएगा। मिल जाता है। आप खरीदने के लिए जाओगे उसके पहले मिल जाता है। लेकिन प्रॉब्लम क्या है? ये विद्या कर्म के एक्यूरेसी के ऊपर डिपेंड करेगा। नहीं तो कोवि बहुत चलते हैं आजकल। कोवि यानी कहीं पे भी सुई लगाना। इसीलिए हम एक्यूरेसी के ऊपर ज्यादा ध्यान देने को कहते हैं डॉक्टर्स लोगों को। आपके पास सर कोई ऐसा ऐसा केस स्टडी है कि बॉडी पेन में लाइक यू थॉट लाइक ये तो मैजिकल रिजल्ट हमको मिला। आपके पास ऐसा केस स्टडी है कोई?
25:27 डेली मोर देन 100 तो हो गया ऐसे केस स्टडी। अच्छा प्रॉब्लम कैसा है? जैसे कि अभी सिंपल एक बताता हूं कि जैसे जब पेशेंट केमोथेरेपी लेते लेते हैं कैंसर के इसमें और केमोथेरेपी लेने के बाद बोन कैंसर वाले पेशेंट आते हैं हमारे पास जहां पे पेन बहुत होता है और हर एक बोन काट के तो फेंक नहीं सकते। कभी भी इनिशियल स्टेज में लोग कैंसर की चिकित्सा लेने नहीं जाते और जब समझता है तो कम से कम बहुत देर हो जाती है। ऐसे ही पेशेंट मिलते हैं। तो केमोथेरेपी लेने के बाद कभी-कभी बहुत हैवी तो नारकोटिक्स लेते हैं मेडिसिन नारकोटिक्स नारकोटिक मेडिसिन जो रहते हैं फिर भी पेन कम नहीं होता तो वहां पे विधक कर्म यानी रक्त सिंपल रक्त मोक्षण वो काम करता है क्योंकि जो दोष है वही निकाल
26:15 देंगे तो कार्य हो जाएगा जैसे है कि शरीर एक बोतल है यहां पे बोतल में पानी है पूरी तरह से अगर हमको खाली करना है तो क्या करना पड़ेगा उल्टा ही करना पड़ेगा एक शरीर की ऐसी कंडीशन आती है व्याधि की जहां पे उसको उसको दबाने की या कम करने की लिमिट खत्म हो जाती है तो वहां शोधन ही करना पड़ता है। वो निकालना ही पड़ता है। तो शोधन करेंगे तो पेशेंट दर्द से मुक्त हो जाते हैं। ओके। आपने एक ऑटिज्म की भी बात की थी। हम हम आपके हिसाब से जहां मॉडर्न मेडिसिन भी स्ट्रगल कर रहा है ऑटिज्म में जैसे आपने स्टार्टिंग में बताया था कि मानसिक बीमारियों में काफी लोग स्ट्रगल करते हैं। तो आयुर्वेद के हिसाब से थोड़ा ऑटिज्म को आप अगर समझा पाए तो देखिएगा ऑटिज्म अभी हम यहां पे बैठे हैं। अभी हम बात कर रहे तो अभी कभी ध्यान में
27:00 था आपने चप्पल बाहर रखी है। नहीं ध्यान में था। मैंने पॉइंट आउट किया तो आपको समझ में आया चप्पल बाहर है। अभी हम बैठे आपने कौन से कलर की घड़ी पहनी है? याद नहीं है। बराबर अब हम घड़ी के बारे में बात करें। हम चप्पल भूल गए। हम मन का गुण एकत्व होता है। मन को एक समय एक ही बात समझ में आती है। फिर चप्पल भूल गए ना आप? बराबर आपने टीका लगाया भूल गए। फिर घड़ी भूल गए। अरे फिर चप्पल भूल गए ना? सो हमारा ब्रेन के लिए यहां गेट कीपर होता है। और वो गेट कीपर क्या करता है? जो इंपॉर्टेंट है वही संदेश अंदर जाता है। दैट इज़ अ मन का गुण रहता है। एकत्व। अब ऐसे समय में वो अगर गुण डिस्टर्ब हो जाएगा फिर चप्पल भूल गए आप। हम्। और ऐसे समय में अबंडेंट ऑफ़ स्टिमुलाई आपके ब्रेन की तरफ मन की तरफ जा रहे हैं। ब्रेन
27:46 नहीं कहूंगा मन की तरफ जा रहे हैं। सो वो एकत्व गुण डिस्टर्ब होगा तो क्या हो जाएगा? आप सैर-बैर हो जाओगे। समझेगा नहीं। जैसे कि बुखार में आता है। जैसे 104 106 सात तक बुखार जाता है तो आदमी प्रलाप करता है। कुछ भी बातें करता है। बुखार आने के बाद जैसे फिर चप्पल भूल गए ना आप। बराबर तो ये जब बच्चों में होता है तो बच्चे ज्ञान नहीं ले पाते। आंखों का ज्ञान क्या है? वह रूप ग्रहण करना यानी देख के अंडरस्टैंड करना। मन तक जाना और समझना। नाका का काम क्या करें? गंध ग्रहण करना है। टंग का काम क्या है? रस ज्ञान करना यानी टेस्ट को ग्रहण करना और स्पर्श को भी। कान का काम है शब्द को ग्रहण करना है। अभी सारे इंद्रियों से जो ज्ञान मिलता है वो हमारे मन तक पहुंचता है और मन एनालाइज करता है
28:32 और उसके हिसाब से समझता है। लेकिन गुण तो एकत्व है। चप्पल भूल गए ना फिर से। तो एक गुण एकत्व है और अब यह जब डिस्टर्ब हो जाता है तो शेरवेर हो जाता है। तो बच्चे को आंख सही है लेकिन वो फॉलो नहीं करता है। कान सही है लेकिन वो देख नहीं पाता है। जीभ है लेकिन वो क्या खाना है पता नहीं चलता। ये सब कॉम्प्लिकेशन हो जाते हैं तब उसको कहा जाता है ऑटिज्म। अब ये जिसको सही करना है तो ट्रेनिंग की जाती है। जैसे को कुत्ते को कहा जाता है बैठ कुत्ता बैठ जाता है। खुद वो ऐसी ट्रेनिंग की जाती है वो इंपॉर्टेंट है। उसके बिना काम नहीं होगा। लेकिन ट्रीट करना है तो अंदर से करना पड़ेगा। बाहर से नहीं होगा। अंदर से करना है लेकिन वो ब्रेन को बैरियर होता है। ब्लड ब्रेन बैरियर। ऐसी एक भी टेबलेट नहीं मिलती जो आप खाओगे तो आपको यूपीएससी में एमपीएससी
29:18 में फर्स्ट आओगे। मिलेगी टेबलेट कभी? आओ भाई यहां पे एमपीएससी की टेबलेट मिल जाती है। खा लो और स्पर्धा परीक्षा में फर्स्ट आ जाओ। नहीं आपको करना पड़ेगा। पढ़ाई करनी पड़ेगी। बोला जाता है ना बादाम खाओ बुद्धि बढ़ती है। सबकी कहां बढ़ती है? वो बदाम उष्ण होता है तो कफ वात प्रकृति वाले को ही काम में आता है। तो आयुर्वेद में दोष देख के दिया जाता है। ऐसे ऑटिज्म के पेशेंट को हर एक व्यक्ति देख के उसको कौन सा दोष है ये देख के उसका कारण देख के किस बच्चों को ज्वर की वजह से यानी बुखार की वजह से आया है। किसी को विष बाधा जैसे कभी-कभी वैक्सीन का भी साइड इफेक्ट माना जाता है। लेकिन उस पे अभी रिसर्च नहीं है। कभी-कभी मोबाइल को भी दोष दिया जाता है। अलग-अलग प्रकार से उसके बहुत ज्यादा संशोधन बाकी है उसमें। लेकिन प्रेजेंटेशन होने के बाद उसको अगर सही करना है तो उसको मन के ऊपर चिकित्सा होनी चाहिए और
30:04 आयुर्वेद में मनो स्रोत उसका उल्लेख आया है। लेकिन ये जो चिकित्सा है अ इतनी एक्सप्लोर नहीं हुई है। बहुत कम की जाती है क्योंकि छोटे बच्चा वो भी ऑटिज्म जैसा है वो आयुर्वेदिक चिकित्सालय में आयुर्वेदिक हॉस्पिटल में जाके ट्रीटमेंट लेने के लिए इतना आयुर्वेदिक हॉस्पिटल हमारे इतने बने नहीं है या बनने नहीं दिए किसी ने। ट्रू तो इसकी वजह से ये पीछे है लेकिन अभी-अभी हो जाएगा हम कर रहे हैं। तो मॉडर्न में क्या ऑटिज्म के लाइक मेडिकेशंस है और आयुर्वेद में क्या है और उसमें विधकर्मा का क्या रोल है फिर? देखो मेडिसिन जो है ऑटिज्म जैसे व्याधि में पकड़ेंगे तो वो वहां पे जो पीडिएट्रिशियन है उन्होंने दी हुई है। अह डिप्रेसिव मेडिसिन रहेंगे। वो शांत करने के लिए मेडिसिन रहेंगे। ओटी रहेगा
30:51 उससे बहुत ज्यादा रिजल्ट अच्छे आते हैं। स्पीच थेरेपी रहेगी। लेकिन यह अंदर से आना इज वेरी इंपॉर्टेंट और उसके लिए आयुर्वेद में बुद्धि धी स्मृति ऐसा बताया गया है। जैसे अभी मैं बात कर रहा हूं या मैं पढ़ रहा हूं। मैंने दो पेजेस पढ़ लिए और 15 मिनट में मुझे याद है क्या दो पेजेस रहते हैं याद कुछ लोगों को उसको कहते हैं धारण शक्ति। मैंने पढ़ा है और मुझे याद है धारण शक्ति। लेकिन मैंने चार महीने पहले पढ़ा है। मुझे याद करना है। दैट इज अ स्मरण शक्ति। हम और मैंने धारण किया है। मुझे याद भी है चार महीने वाला और मैं चार पांच स्मरण जो भी पढ़ा है वो मिक्स करके कुछ आईडिया निर्माण करने वाला हूं। उसको कहते हैं बुद्धि। तो तीन प्रकार की होती है धारण शक्ति धी स्मृति और बुद्धि। वात पित्त कफ के अनुसार होती है। तो ये दोषों
31:38 के अनुसार देखा जाएगा। अब आपके उसके ऊपर कार्य करना है तो आयुर्वेद में अलग-अलग प्रकार की औषधि आई है। सबको शंख पुष्पी देके काम नहीं होगा। शंख पुष्पी सिरप मिलता है मार्केट में लोग शंख पुष्पी सिरप ले ले थक गए लेकिन ग्रंथ में दिया है शंख पुष्प स्वरस यानी शंख पुष्प ये मध्य रसा है उसका रस लेना है यानी वनस्पति आपके घर में लगानी चाहिए उसका रस आपको निचोड़ के रस लेना है वो रेडीमेड का उपयोग नहीं है आपको ब्राह्मी पढ़ा है आपने ब्राह्मी का रस लेना है जेष्ठम ऐसा चूर्ण है जो कहा गया है क्षरेन यष्टि मधुकस चूर्णम अगर यह जेष्ठ मदद चूर्ण आप दूध के साथ लोगे तो आपकी धारणा शक्ति बढ़ेगी। अगर कोई कफ प्रकृति का व्यक्ति है मंद बुद्धि पड़ा है
32:23 बच्चा उसको वेखंड देना है। उसको ज्योतिष्मति देना है। अगर आग लगी है तो पेट्रोल डालेंगे तो क्या होगा? और बढ़ जाएंगे ना। वैसे पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति को वेखंड और ज्योतिष्मति देके फायदा नहीं और बढ़ जाएगा। वो पित्त बढ़ जाएगा। तो वो कौन सी बुद्धि के ऊपर कार्य करना है? वह व्यक्ति कैसे जन्मा है और उसमें जन्म के साथ उसकी बुद्धि कैसी है? कौन सी ज्यादा है? कभी-कभी इंटेलिजेंट बच्चे होते हैं ना एक बार पढ़ लिए याद रख लिया छोड़ो लेकिन वो आलसी होते हैं साथ में तो उसके ऊपर काम करना पड़ता है। हम जब स्कूल में जाते हैं ना प्रकृति परीक्षण करते हैं वो विद्याव्रत देते हैं हम यहां पे। यानी तू भाई ऐसा है तुझे अगर पढ़ाई में अच्छा काम करना है तो तेरी ग्रहण शक्ति अच्छी है लेकिन स्मरण शक्ति कम है तेरी। तो स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए तू अलग-अलग इंद्रियों का इस्तेमाल कर। जैसे
33:09 आंखों का इस्तेमाल कर, लिख के पढ़ाई कर, सुन के पढ़ाई कर। ऐसा जब हम बताते हैं तो बच्चों के मार्क्स 70 से 95 तक जाते हैं। अच्छा। तो औषधि भी है, गाइडेंस भी है, विधक कर्म इसमें काम क्या करेगा? ये रोल रहेगा उसका कि यह अवरोध दूर करने का। यानी हमने आंखों से देखा है। लेकिन उसको समझ नहीं रहा है कैसे देख के क्या करना है। नाकों से कंध ले रहा है, लेकिन क्या करना है, पता नहीं। टंग है लेकिन वो बात ही नहीं कर पा रहा ना स्पीच ही नहीं आ रही है। स्पीच कब आएगी? जब आंखों से सुनेगा आपको तेलुगु आती है क्या? नहीं आती। कभी सुनी नहीं ना बचपन से तो क्यों आएगी? तो वही बच्चों को सुना हुआ वो मन की तरफ गया ही नहीं है। इंद्रियों से यह आवाज या देखना या सुनना या गंध लेना या टेस्ट लेना या स्पर्श का ज्ञान जो है इसको
33:55 ज्ञानेंद्रियों से हमारे श्रृंगाटक मर्म तक जाते हैं। श्रृंगाटक से शंख तक और शंख से मन तक मन का स्थान हृदय बताया गया है। मुझे समझता है ना? बच्चों को समझता है ना अगर वो नहीं समझ रहा है तो वो समझने की चिकित्सा है विध का। इसलिए वो कई बार करनी पड़ती है और जब समझना शुरू हो जाता है तो अपने आप लर्निंग हो जाती है। अपने आप एक्शन शुरू हो जाती है। तो इसमें मेटाबॉलिज्म फिर क्या रहेगा? आप पहले तो प्रिक कहां करेंगे? हां विध कर्म करते समय ग्रंथ में दिया है अगर उन्माद व्याधि है उन्माद यानी मद यानी जैसे मरकट है ना जैसे एक आया है मरकटस सुरापानम यानी एक बंदर है उसने दारू पी है मरकटस सुरापानम तद मदे वृश्य कदंशम उसमें उसको बिच्छू ने काटा है
34:40 पहले ही बंदर है उसने दारू पी है और उसमें बिच्छू में बिच्छू ने काटा है तो उसका क्या हाल होगा ऐसी अवस्था जो है ऑटिज्म के बच्चों में कुछ-कुछ होती है जो क्रोधी बच्चे होते हैं उसको समझना ही नहीं ना पहले से पित्त प्रकृति और माता-पिता उसको पित्त बढ़ाने वाली औषधियां देती है। तो अब जब हम विध कर्म करते हैं तो यह जो सेंस ऑर्गन से अवरोध होता है यानी जा ही नहीं रहा है मन तक दैट इज अ बैरियर वो बैरियर दूर करने के लिए ये आयुर्वेद ग्रंथ में उन्माद व्याधि में उ अपांग ललाटेशु यानी उर स्थान अपांग संधि और ललाट यानी यह दूर करने के लिए स्थान बताएं। जैसे अब हम यहां पर रूम में यहां पर अगर एक कोई विंडो है और वहां पर दरवाजा है। एयर टाइट रूम में और किसी ने दरवाजा बजाया तो खिड़की भी बजती है। बराबर दिखता नहीं
35:28 ना कोई खिड़की बजाने वाला आदमी लेकिन बजता है। वैसे हमारे शरीर में अगर उधर काम करना है तो इधर करो। लाइट बंद करना है तो उधर का बटन दबाओ। ऐसे बताया गया है। क्योंकि वो ब्रेन के अंदर जा नहीं सकते। मन के अंदर कोई पहुंच नहीं सकता है। बातें पहुंचती है। औषधि नहीं पहुंचती। हम तो औषधि पहुंचाने के लिए या रक्त से कार्य करने के लिए हील करने के लिए मन को हील करने के लिए जो अवरोध आया है ब्लॉकेजेस है वो दूर पिद्ध कर्म करेगा तो उसके लिए हमें विध मतलब फेस पे कहीं होते हैं फेस पे होगा चेहरे पे होगा किस वजह से हो रहा है वो देखना पड़ेगा ना उसके उसके हिसाब से ग्रंथ में जो आया है शास्त्रोक्त है न ममत जब भी मैं सिखाता हूं मैं कहता हूं न ममत मेरा कुछ नहीं है जो ग्रंथ में आया है वो बता रहा हूं शरीर
36:13 संस्कृत में शास्त्र में भारतीय शास्त्र में आप्त नाम का एक शब्द आया है। आप यानी सारे दोष विरहित यानी कोई मोह नहीं, लोभ नहीं, माया नहीं, कुछ नहीं। उसके विरहित वो सत्वगुण से परिपूर्ण है। यानी वो सात्विक है। वो ग्रंथ को कहा गया है। यानी ग्रंथ में जो शब्द है वो आप्त वचन है। वो कभी गलत नहीं होगा। एग्जांपल देता हूं। हमारी सुंठ है जिंजर है सुटी सुंठी से खांसी चली जाती है मराठी में मन है सुटी वाचुन खोखला हम अब ये 25 ले लो 2010 ले लो या 1990 ले लो सुन से खांसी जाएगी जाएगी पाप तो वचन है जाएगी ही जाएगी अब कैसे लेके जानी है कैसे कम करनी है आप डिसाइड करो भविष्य शास्त्र में या हमारे भारतीय शास्त्र में अगर लिखा
36:59 है आपकी कुंडली में आप 15 साल में पराक्रम करोगे तो आप डिसाइड करना है पराक्रम कैसे करना लिखा तो है पराक्रम करोगे दैट इज अ सूत्र तो अगर किसी को गोली मार के पराक्रम करो या आप एमपीएससी में फर्स्ट आके पराक्रम करो या पडकास्ट लेके पराक्रम करो जो भी करना है आप डिसाइड करना है सूत्र तो सूत्र है वैसे ग्रंथ में दिया है वो फिक्स है वो आपको इस्तेमाल कैसे करना है वो बुद्ध के अनुसार आपको रहेगा कोई एक बुद्धि रहेगा कोई शत बुद्धि रहेगा वो आप डिसाइड परफेक्ट आपके सर हम इंस्टा हैंडल्स पे देखते हैं इनफर्टिलिटी का आप नंबर भी रखते हैं 787 797 वगैरह वगैरह तो इनफर्टिलिटी में आप इसे कैसे यूज करते हैं और इसमें क्या सिर्फ मेल्स या फीमेल्स दोनों पे आप
37:45 विधक कर्म कर सकते हैं देखो होता क्या है कि जैसे कि आजकल क्या हो गया इनफर्टिलिटी का एक इशू बन गया है हमारे कुछ मित्र हैं जो गायनेकोलॉजिस्ट है एमबीबीएस गायनेकोलॉजिस्ट हमारी बातें होती रहती है वो कहते हैं इनफर्टिलिटी को बनाया गया है वो इंफिनिटी नहीं रहती आयुर्वेद में एक श्लोक आया है सो मनस्यम गर्भधारणा सो मनस्यम यानी मन अगर सुस्थित रहेगा तो गर्भधारणा इजी हो जाती है आजकल लोगों के मन ही नहीं है ये इतना रजोगुण यानी अधर्म का काल आया है हर एक व्यक्ति अधर्म करने के पीछे जा रहा है यानी खाने का अधर्म है प्रॉपर नियम नहीं है खाने के ऑयल के नियम नहीं है फूड के नियम पता नहीं है और ये प्रोटीन संस्कृति के पीछे जाते हैं जैसे कि प्रोटीन के बारे में बताऊंगा अभी सब्जेक्ट
38:31 निकला ही है तो पनीर ये प्रोटीन के लिए सोर्स बताया जाता है। लेकिन वो सड़ा हुआ दूध है। यह कोई देखता नहीं। उसका गुण है रक्त दूषित करना। वो स्प्राउट्स दिए जाते हैं प्रोटीन के लिए। अच्छे हैं। पता है हमें। लेकिन स्प्राउट से वात बढ़ता है। ये भूल चुके हैं ना। जिसको पहले से ही शरीर में वायु बढ़ चुका है। एक्सरसाइज करके वात बढ़ा रहे हैं। वात कम करने के लिए कोई नहीं कर रहा है। तो वो स्प्राउट्स प्रोटीन देगा लेकिन साथ में वो वात भी देगा। ऐसे ग्रंथ हमारे शास्त्र में बताया गया है कि गुण के अनुसार अनुसार हम काम करना चाहिए। हम अगर गुण से काम करेंगे तो इजी जाता है। ट्रू तो मेल और फीमेल इनफर्टिलिटी दोनों में काम कर सकते। इनफर्टिलिटी की बातें कैसी होती है? मन के हिसाब से रहेगा। अब होता क्या है कि इनफर्टिलिटी के इतने सेंटर बन चुके हैं। तो पेशेंट 2 साल के बाद समझता है मुझे
39:19 बच्चा नहीं हो रहा है तो चिकित्सा लेनी चाहिए। ऐसा नहीं सोचता कि मैं वाइफ के साथ साथ में रहूं। उसको समय दूं। दोनों साथ में बातें करेंगे। जल्दी सो जाएंगे। जल्दी उठेंगे, एक्सरसाइज करेंगे तो 70% डिसीज ठीक हो जाएंगे। आपको एक बुक है। उस बुक में क्या दिया है? अगर इंडिया के सारे डॉक्टर स्ट्राइक पे चले गए तीन महीना तो तीन महीने के बाद एक भी बीमारी नहीं रहेगी। सारे डॉक्टर स्ट्राइक पे गए और 3 महीने का एक भी बीमारी नहीं रहेगी। क्यों? क्योंकि ये सारे लोग अपना-अपना कर चुके हैं। अभी क्या अवेलेबिलिटी इनफिनिटी डॉक्टर, हाथ के डॉक्टर, उंगली के डॉक्टर, नाखून के डॉक्टर तो इसमें अटक चुके हैं। सोमनसम गर्भधारणा नाम नहीं तो क्या आजकल हमारे से भी ज्यादा पेशेंट को पता है आईवीएफ के प्रकार कैसे
40:04 करना है, कब करना है, क्या करना है? चार्जेपी है ना वो खुद बताता है। तो हर एक डॉक्टर बन चुका है। 1.4 बिलियन अगर आबादी है तो 1.4 बिलियन डॉक्टर भी है और आयुर्वेदिक डॉक्टर तो ज्यादा है। छोटा बच्चा भी बन रहा है अभी आयुर्वेदिक डॉक्टर। सो ये मन है, मन शांत रहेगा तो कार्य हो जाएगा। विध्कर्मा कैसे काम करेगा? विद्याकर्मा हर एक कंडीशन में काम करेगा। जैसे मैं एग्जांपल देता हूं। गुप्ते सर के यहां पे पेशेंट आती थी और एक एक एग्जांपल देता हूं। एक पेशेंट आई रुगनास्थ लड़की आई और उसके बाल थे। मेरे से भी ज्यादा दाढ़ी थी उसको और एकदम से ऐसे बैठी लड़के का ड्रेस पहन के और सर ने पूछा क्या हुआ? उसने कहा सर मुझे दाढ़ी है। सर ने कहा अच्छा है ना फिर। उसने कहा सर मैं लड़की हूं। सर ने कहा फिर लड़की बनना। लड़की जैसे ड्रेस
40:50 पहनना। तो उसने कहा सर मुझे पीरियड नहीं आते। मैं कराटे में जाता हूं। मुझे ऐसे ड्रेस पहनने पड़ते हैं। सर ने कहा नहीं अगर तू लड़की है लड़की बनना चाहती है लड़की जैसा रहे। इमोशन है। आजकल लज्जा नाम की बात ही चली गई है। तो उसको बताया सर ने हमने विध्कर्मा किए। ऐसा होता है कि सर ने विधन कर्म किए। विद्याकर्मा किया उसको पेशेंट बाहर बैठने के बाद तुरंत भाग गया। एक पेशेंट था पीरियड नहीं थे उसको छ महीने से। सर ने विद्यामा किया और हम पैसे लेने के लिए जाते थे। ₹0 फीस थी सर की। ₹70 ₹100 तो मैंने देखा तो पेशेंट भाग गई नीचे और भाग गई तो मैं भी पीछे गया उसके पैसे लेने के लिए और वह नीचे मेडिकल शॉप पे चली गई। मैंने कहा मैडम आपके पैसे रह गए। बोली मैं आ रही हूं ऊपर तो हम ऊपर जाने के बाद देखा तो वो पैड खरीदने गई थी क्योंकि उसको जो छ महीने में पीरियड नहीं आए थे ऊपर के
41:37 विधकर्मा से तुरंत आए थे पीरियड। तो दैट इज अवरोध दूर करना। ऐसे हमारे पास केसेस बहुत होते हैं ऐसे। तो पीसीओडी, फाइब्रॉइड, ट्यूबल ब्लॉक हर एक की चिकित्सा अलग-अलग होती है और उसमें विधकर्मा एक सहायक चिकित्सा काम में आती है। चिकित्सा कोई भी एक चिकित्सा संपूर्ण नहीं होती है। उसमें सहायक होना ही पड़ता है। उसका हेतु दूर करना पड़ता है। यानी कारण क्या है? ढूंढना पड़ता है। आजकल कारण नहीं ढूंढा जाता। इनफर्टिलिटी में क्यों हो रहा है ऐसे? सीधा-सीधा बोला जाता है ओवुलेशन नहीं हो रहा है। ओवुलेशन की टेबलेट देंगे या इंजेक्शन देंगे कांटेक्ट नहीं हो रहा है। आईवाई करेंगे। अगर बच्चा नहीं रह रहा है तो अनक्लेन इनफिनिटी में भी वो आईवीएफ करने के पीछे जाएंगे। आयुर्वेद में कारण ढूंढा जाता है। हेतु ढूंढा जाता है। अगर हेतु ढूंढने के बाद अगर हम चिकित्सा करते हैं तो विधकर्मा
42:25 उसमें बहुत सहायक होता है। मनोव स्रोत के विध्कर्म के करने के बाद पेशेंट को कभी आते हैं। कभी हम पीसीओडी के विधकर्म करते हैं। कभी फाइब्रइड के करने पड़ते हैं। कभी-कभी ट्यूबल ब्लॉक के लिए भी आयुर्वेद चिकित्सा उत्तर बस्ती के साथ विध्कर्म देना पड़ता है। तो यह सहायक चिकित्सा होती है। तो ये सब फायदे में जाती है। अब मेल इनफर्टिलिटी में तो इतना फायदा होता है। इरेक्शन जो है इरेक्टाइल डिस्फंक्शन आपको दिल्ली कभी गए हो दिल्ली से अगर बाहर जाने का सोचो तो हर एक दीवार पे लिखा हुआ है कि सेक्स रोगी यहां पे मिले या गुप्त रोगी यहां पे मिले बराबर वो मार्केट तो उन्होंने बहुत बनाया है और कोई भी पेपर निकालो वहां पे सेक्स का पावर बढ़ाने के लिए दवाई मिलती है ट्रू तो यहां पे वेधन कर्म बहुत अच्छे से काम करता है। जैसे इरेक्टाइल डिस्फंक्शन है, ओलिगोस्परमिया है। तो यह वेदन कर्म करने
43:12 के बाद वहां पर फेयर फाइट फ्लाइट मैकेनिज्म से एंड्रोजन थोड़े मात्रा में आते हैं। सिंपल सिंपल है। अवरोध दूर करना है। ब्लड फ्लो बढ़ाना है और रिजल्ट लेना है। तो फीमेल्स में ये जो मेजर प्रिंसिपल आपने बताया यह खाली क्या ब्लड फ्लो है या इसके हार्मोनल्स पे भी काम करता है। ये नहीं नहीं हार्मोन तो नॉर्मल होते ही है। अगर हार्मोनल नहीं है तो हमें शोधन की तरफ जाना चाहिए। ओके। जैसे कि मैंने कहा कि कोई चिकित्सा कंप्लीट नहीं होती लेकिन सब नॉर्मल है फिर भी नहीं हो रहे तो या सब नॉर्मल है। सिर्फ रुक गया है कुछ दैट इज पीरियड आने की कगार में है लेकिन आ नहीं रहा है। ऐसे बहुत सारे कंडीशन हमें मिलते हैं। तो ये सारे केसेस में विधकर्मा अलग-अलग पेशेंट के हिसाब से किया जाएगा। अच्छा अगर आपके पास कोई अच्छा मतलब
43:58 आपका एनेकडोट हो कि आपने इनफर्टिलिटी में इस मैजिक का रिजल्ट लिया है स्पर्म काउंट में या फिर फीमेल्स में किसी में इतना अभी जो हम नंबर देते हैं वो सारे केसेस ऐसे हैं हमारे पास कि जो सब करके जाए। अभी जस्ट एक एग्जांपल देता हूं। अभी एक पेशेंट पिछले साल आई थी। उसके 32 अबॉर्शन हो चुके थे। 32 32 अबॉर्शन यानी उसकी जिंदगी के 17 साल अबॉर्शन में चले गए थे। और कंप्लीटली डिवस्टेटेड केस थी। यूटरस गंदा बन चुका था और उसको सारा पता था। अबॉर्शन हो रहा है। वो कभी-कभी जाती नहीं इतने रूलर एरिया में रहते थे वो। अब सिर्फ समझाया हमने कुछ रसायन चिकित्सा की और एक चार तीन चार महीने हमने बुलाया फॉलो अप लिया। अभी उसको
44:43 अच्छा सा बेबी है। ये मैं क्यों बता रहा हूं? क्योंकि हमारे इंडिया में हमें लगता है कि सब डेवलपमेंट हो चुका है। लेकिन इतने छोटे-छोटे गांव हैं जहां पे पता ही नहीं लोगों को क्या-क्या है। जैसे और सीखे हुए लोगों के पास भी ऐसा है। तो सब जगह पे प्रॉब्लम है और जिनको टाइम नहीं है उनको ही ज्यादा प्रॉब्लम है। ट्रू सही बात है। रेटिना का सर थोड़ा डिस्कस करना चाहूंगा कि अभी हम एक रिसर्च देख रहे थे कि इंडिया में 11 मिलियन से ज्यादा लोग रेटिना के प्रॉब्लम से सफर कर रहे हैं। तो आयुर्वेद इन कंडीशंस को कैसे देखता है? देखिए जैसे मैंने नरेंद्र मोदी ने जो बताया था वो केस के बारे में बताया था। वो पेसिना रेटिना वाली ही थी। अब होता क्या है? अब एग्जांपल देता हूं मैं आयुर्वेद में
45:31 नेत्र को कैसे वर्णन किया गया? नेत्र को एक अवयव को मंडल के हिसाब से डिवाइड किया गया। जैसे पक्षम यानी आईलशेज, वर्तमा यानी आईलिड्स, शुक्ल यानी सफेद भाग, कृष्ण यानी काला भाग और दृष्टि यानी उसके अंदर का भाग। यानी शरीर के अंदर एक मसूर दल मात्रा यानी सरसों के हिसाब से एक विवर यानी होलो भाग है। नेत्र में सरसों के मात्रा के हिसाब से एक होलो भाग है। उसको दृष्टि हम कह रहे हैं और उसके मैं इतनी व्याधियां बता रहा हूं। ऐसा सुश्रुत संहिता पे वर्णन है। और उसमें ग्लूकोमा उसमें कैटक लिंगनाश 3000 साल पहले बता चुके हैं। कैटक्ट की सर्जरी 3000 साल पहले आयुर्वेद में
46:16 लिंगनाश के नाम के अंदर आई है। सर्जरी एग्जैक्टली प्रॉपर सर्जरी आई है। बताया गया है। अब देखो इतना आंखों में इतना छोटा भाग जहां पे ना टेलिस्कोप है ना कोई माइक्रोस्कोप है ना नथिंग है और तब बताया गया और उसके व्याधि बताए गए और उसकी चिकित्सा बताई गई है। अच्छा रेटिना तो वो दृष्टि का एक भाग है। हम रेटिना छोड़ के उसके आगे विटस आता है। उसके आगे लेंस आता है। फंडस आता है। बहुत सारे एनाटॉमिकली स्ट्रक्चर आ जाते हैं। लेकिन आयुर्वेद में यह सब दृष्टि के अंदर बताया गया। आप चिकित्सा करते समय आयुर्वेद में क्या बताया? आपका आप बैठो और मुझे बताओ आपको क्या दिखता है? आपको अगर चिमचिमान दिख रहा है आपको धजर दिख रहा है अव्यक्त दिख रहा है। अव्यक्त रूपण पश्यती कभी दूर है नजदीक
47:02 लग रहा है। नजदीक है दूर लग रहा है। ऐसे लक्षणों को पूछ-पूछ के उनकी कैटेगरीज कहे गए हैं दृष्टि विकार में। और उसमें जो तिमिर है या हम कहेंगे कि कांच है जो वर्णन है उन वो रेटिना के डिसीज जैसा हमें मिलते हैं। आजकल जो रेटिना की व्याधि कहते हैं जैसे रेटिनल डिटचमेंट है या रेटिना स्वेलिंग है रेटिनल स्वेलिंग है तो ऐसे व्याधि ऐसे इसमें व्याधि में मिलते हैं जैसे तिमिर में तो तृतीयगत पटल में अगर व्याधि है उसमें भी पटल बता उसमें चार पांच प्रकार बताएगा आयुर्वेद में और उसमें विधक कर्म दिया है दैट इज अ वैद्य व्याधि वेधन कर्म से सही हो जाएंगे ऐसा वर्णन आया है सिर्फ किया नहीं जाता है आयुर्वेद कॉलेज में क्या होता है चार औषधि के ऊपर निर्भर होता है एक फल त्रिफलाकृत होता है सप्तमृत लोह होता है दो तीन ऐसे औषधि के ऊपर वहां पर
47:49 निर्भर किया जाता है। लेकिन आप साउथ में जाइएगा वहां पे अंजन चिकित्सा होती है। वहां पे विलक चिकित्सा होती है। तो यह इसमें विधक कर्म अगर ऐड करते हैं तो एक संप्राप्ति आई है। क्या संप्राप्ति है? सिरानुसारणी भी दोष उध्व मागते जायंती नेत्र भागेशु रोगा परम धरु यानी हम खाना पीना करने के बाद शरीर में जो भी रक्त के माध्यम से सिराओं के माध्यम से दोष जो है ऊपर आ जाते हैं और वो जायंती नेत्र भागेशु यानी नेत्र के यहां पे रोगा परम दारुण परम दारुण व्याधि बनते जिससे पेशेंट को अंधता आती है दिखता ही नहीं है ऐसे इसमें क्या करना है वह सिराओं का वेदन करना करना है सिरावेद करना है यानी वेदन कर्म विध कर्म करना करना है तो विध कर्म करते हैं तो ब्लड फ्लो शुरू होता है। हीलिंग होती है
48:35 क्योंकि रक्त का काम जीवन कर्म है। हीलिंग है। अगर वह हम पहुंचाते हैं तो काम अच्छी तरह से हो जाते हैं। लेकिन वो इट इज़ अ वेरी ब्रॉड कांसेप्ट। बहुत इसमें बहुत रिसर्च करना पड़ेगा। हमारे स्टूडेंट कर रहे हैं अलग-अलग। अच्छा। तो ये रेटना के इसमें विधन कर्म बाकी सारी चिकित्साओं के साथ बहुत अच्छा कार्य कर। आई के प्रॉब्लम में सर आजकल लेजर का सर्जरी बहुत चल रहा है। तो उसके सामने हम विधकर्मा बता सकते हैं? लेजर इज़ अ टाइप ऑफ़ अग्निकर्म है। वो गर्म कर रहे हैं ना जला रहे हैं अंदर डाल के। तो अग्निकर्म भी आया है। अधिमंत नाम का व्याधि है। अधिमंत अगर हम कंपेयर करते हैं तो ग्लकोमा के हिसाब से जाता है। आई पेन बहुत होता है। तो वहां पे ड्रॉप दिए जाते हैं। आंखों में प्रेशर कम करने के लिए स्टेरॉयडल ड्रॉप होते हैं कुछ। तो वो बहुत अलग-अलग चिकित्सा। मैं तो कोई ऑप्टर्मिलॉजिस्ट नहीं हूं। तो इसके बारे
49:21 में मैं एलोपैथी के इसमें ज्यादा नहीं बात कर सकता। उसका अधिकार भी नहीं है मुझे। लेकिन आयुर्वेद में इसको कहा गया है कि वातस यदि मनता है तो अग्निकर्म करो। सर के ऊपर अग्निकर्म किया जाता है। जहां पर व्रण भी नहीं होता है। सूर्ण शलाका से अग्निकर्म करते हैं। तो हेम शलाका धातु पुष्यति धातु का पोषण होता है। यानी वहां पे जो ग्लूकोमा करने वाले एंगल्स वो सही होने लगते हैं कुछ पेशेंट में और 20 21 25 तक जो आंखों का आईओपी प्रेशर बढ़ा हुआ है वो कम होते हुए दिखता है वात अधिमंत में। तो इस पे रिसर्च होना चाहिए। अह जैसे लेजर आपने कहा तो अग्निकर्मा में चले जाता है। हमारे पास अग्निकर्म भी चिकित्सा है। लेकिन इनवेजिव अह टेक्निक जो है जैसे विधकर्मा अग्निकर्मा अंदर जाके आंखों के अंदर नहीं होगा। बाहर से ही होगा कार्य। तो मतलब ये हमें विध्कर्मा या अग्निकर्मा
50:08 तभी कराना चाहिए जब प्रॉब्लम है या फिर एज अ पार्ट भी करा सकते हैं कि अगर मुझे फ्यूचर में प्रॉब्लम है। हम हम कलयुग में है ना। अब स्वास्थ्य स्वास्थ्य रक्षणम कहा गया है। स्वास्थ्य का स्वास्थ्य रक्षण करने के लिए आयुर्वेद बताया गया है। लेकिन कोई करता नहीं ना। अब मैक्सिमम है तंबाकू के ऊपर लिखा जाता है कैंसर होता है। लेकिन जब तक होता नहीं तो छोड़ते नहीं। दिखते ही नहीं ना इमेज लोगों को। तो मतलब एज अ प्रिवेंटिव एक्शन भी हम करवा सकते हैं। ताकि तो करेगा ही ना। जैसे कि अगर कोई वनस्पति है जैसे हम गुडूची यानी गुडवेल लेंगे। सबको पता होता है। या अश्वगंधा लेंगे। अश्वगंधा के बारे में गुडूची के बारे में बताऊंगा। गुडुचीच का ऐसा भाव प्रकाश में ऐसा श्लोक आया है गुडुची कटुका तिकता स्वादु पाका रसायनी संग्रहनी कष्ण लघवी बलग्नि दीपनी दोष तर
50:55 तुट त्रुट दाह मेह कासास पांडुताम कामला कुष्ठ वातासर ज्वर कृमी वमरेत यानी रसायन जैसी है पांडु में कामला में एनीमिया में डायबिटीज में कृमी में बच्चों के विकार में ज्वर में यानी बुखार में पुराने ज्वर में सब जगह पे ये काम करती है लेकिन लोग कहां करते हैं। पता है ना सबको लेकिन वो करते नहीं है। तो यह कलयुग का काल है। जब होने के बाद ही सोचा जाता है लेकिन प्यास लगने के बाद ढूंढा जाता है। पहले कोई संग्रह नहीं करता है इसका। विधकर्मा सर जब आप करते हैं इनमें से कोई भी इंडिकेशंस में तो क्या कुछ परहेज वगैरह कुछ रखनी चाहिए उस वक्त? ऐसा कुछ है विधकर्मा करते समय तो भीरू व्यक्ति नहीं होना चाहिए। कुछ-कुछ लोग होते हैं ना ब्लड देख के डर जाते हैं या चक्कर आ जाती है
51:42 उनको आंखें बंद करके हम करवाते हैं। दूसरा है परेज ऐसा होता है कि तुरंत एसी में नहीं जाना चाहिए। अगर एसी में जाएंगे तो क्या वात प्रकोप फिर से हो जाएगा। वायु की चिकित्सा है तो वात प्रकोप करने वाले सारे जो भी बताया गया है जैसे व्यायामात अप्पर्पनात प्रपतनानात भंगात क्षयात जागरनाथ वेगाना विदारनाथ अतिशय शत अति त्रासत ये जो भी जो भी लक्षण आए वो हम कहते हैं पेशेंट को कि आप अवॉयड करें और एक 10 मिनट अवॉयड करने के बाद हम इट इज़ रेडी टू गो आजकल सर बहुत लोगों को वो आदत है कि वो अपने हाथ में ऐसे वो ऐसे करके आवाज करते हैं। यह इसमें विधकर्मा क्या मतलब यह पहले तो क्या कोई प्रॉब्लम है और है प्रॉब्लम नहीं दैट इज वो क्या है एक प्रकृति के प्रकार रहते हैं जैसे किसी के मौसल
52:29 उंगलियां रहती है किसी के अस्थिसार वाले व्यक्तियों को ऐसा ज्यादा होता है ये तोड़ना अस्थिसार यानी वो कष्ट करने वाले व्यक्ति होते हैं लंबी-लंबी हड्डियां होती है उसमें तो ये लोग वात विकार के लिए प्रोन रहते हैं तो सिंपल है क्यों प्रोन रहते हैं क्योंकि वो लंबी हड्डियां ज्यादा काम करने के पीछे जाती है तो क्षिप्रमर्म से ऊपर दो अंगुली क्षिप्रमर्म के ऊपर दो उंगली अगर वेदन कर्म करते तो आपका भी बजना बंद हो जाएगा। अच्छा ठीक है। सर हमने मैं खुद आज तक एटलीस्ट डेढ़ से 2000 वैद्यों को मिला हूं। लेकिन टू बी ऑनेस्ट मैंने आपको ही ये प्रैक्टिस करते देखा है। तो इसे क्या ग्लोबल लेवल पे हम ले जा सकते हैं या फिर यहां तक ही सीमित है ये। नहीं देखिएगा नम मेरा नहीं है हमने वैद राबू गुप्ते सर
53:17 से सीखा है और जब से सीखा है तब हम दे रहे हैं डेली मेरे पास 80 स्टूडेंट रहते हैं सीखने के लिए और पूरे भारतवर्ष में मेरे हर एक शहर में व्याख्यान हो चुके हैं विधकर्मा के बारे में जी इंडिया के बाहर में भी दो बार हो चुके हैं और सोशल मीडिया है YouTube है वहां पे हम सिखाते हैं जितना हम कर सकते हैं इतना कर रहे हैं लेकिन लेकिन हम कौन होते हैं? कौन होते हैं आयुर्वेद को बढ़ाने वाले? आयुर्वेद पहले से ही बढ़ा हुआ है। लेकिन जिसका नसीब है वो आयुर्वेद की चिकित्सा लेगा। और जिसका नसीब है वो आयुर्वेद सीखेगा। जो नहीं है वो कितना भी बोलेंगे तो हम उसमें कुछ नहीं कर सकते। पहले से ही ग्लोबल है ये। लेकिन हम एक निमित्त मात्र है कि इसको थोड़ा शाइनिंग दे। शाइनिंग दे
54:02 सकते हैं। और अगर आप अह जो यह सीखना चाहते हैं तो आपका क्या कोई कोर्स है या फिर आप पर्सनली लाइक कभी भी कोई भी आ सकता है क्या उसका प्रोसेस है? सीखने के बारे में मैं एक कहता हूं कि मैं भी सीख रहा हूं। अच्छा मैं सिखाने वाला नहीं। मुझे जो आता है आप देख सकते हो। ऑब्जर्व करके सीख सकते हो। लेकिन क्या होता है? अपेंडिक्स की सर्जरी है। अगर हम YouTube पे देख के करते हैं तो YouTube पे सर्च करते हैं तो सब मिल जाता है ना। कैसे क्या करना है तो कर पाते हैं क्या नहीं तो व्यक्तियों के प्रकार होते ऐसे डॉक्टर के भी प्रकार होते हैं आरंभशुर होते हैं कुछ डॉक्टर वात प्रकृति के अभी करना है अभी करना है कुछ आलसी होते हैं कफच प्रकृति के बाद में देखेंगे जब करना है करना कुछ पित्त प्रकृति के होते हैं वो सोचते हैं मुझे सीखना है उसकी
54:48 पैथोपिजियोलॉजी समझना है और कम से कम 10 पेशेंट हर व्याधि के मुझे ठीक होते हुए देखने के बाद भी मैं मानूंगा ऐसे स्टूडेंट होते हैं तो यह कोर्स वगैरह मैं नहीं रखता हूं कभी अच्छा और कैसा कहा है हमारे वैद राम गो सर कभी पैसे ले सिखाते नहीं थे जहां पैसा आ गया वहां सरस्वती नहीं आती तो हम कभी भी किसी का फीस नहीं लेते सिखाने के लिए तो स्टूडेंट आते हैं और सीख के चले जाते हैं जिसको जितना रुकना है मर्जी से रुक के जाते हैं लेकिन क्या हो जाएगा पूरा इंडिया आ जाएगा ना इसलिए हमने सिस्टम बनाई कि नंबर लगाते क्योंकि ओपड़ी में एक बार 60 ही लोग ले पाते बाकी को हम डिवाइड करके ऊपरीज में रखते हैं तो हम नंबर सिस्टम लगाते ते स्टूडेंट नंबर लगाते और आ जाते हैं जिसको जब सीखना होता है लेकिन सीखना बहुत इंपॉर्टेंट है ऐसा कोनी
55:35 या टिकली ला जाए यानी कोई भी आ जाओ और टिकली लगा के जाए ऐसा नहीं होता है जो आयुर्वेद है जो जिसका मन होता है और जिसके अंदर से भावना आती है वो हमें समझ में आता है ये बंदा सीखेगा आगे जाके और ये नाम करेगा आयुर्वेद का उसको मैं नहीं बोलता हूं और आ भी नहीं बोलता हूं वो अपने आप हो जाता है। मैंने कहा ना आयुर्वेद की तरफ हम आयुर्वेद को चूज नहीं करते। आयुर्वेद हमें चूज़ करता है। तो वैसे ही होता है। जो सीखता है वो कैसे भी सीखता है। कई कहीं से भी मिलके सीखता है। थोड़ा सर मर्म के बारे में मैं समझना चाहूंगा। आपने मर्मों की बात की बॉडी में आयुर्वेद के हिसाब से ऐसे कितने पॉइंट्स है कि जहां ब्रेक करना चाहिए। उसका क्या कोई नंबर है क्या? हां। मर्म सिर्फ में 107 है। 107 मर्म है। अच्छा। ये मर्म यानी क्या है? मारती मर्मणि कहा
56:21 गया है। यानी जहां पे मार लगने के बाद मृत्यु होगी या विकलांगता आ जाएगी या वेदना होगा या पीड़ा हो जाएगी या शरीर में कुछ बदलाव हो जाएंगे। ऐसे 107 जगह है जिसको मर्म कहा गया है जिसमें कुछ मर्म है सद्य प्राणर मर्म। जैसे अभी हम इनफर्ट इनफर्टिलिटी के बारे में बोल रहे हैं तो इनफर्टिलिटी का एक अवयव है। यूट्रस कहा जाता है। यूट्रस के आगे क्या है? ब्लैडर है और पीछे क्या है? अ एक हमारा सिस्टम एक्सिटरी सिस्टम गुदा हुआ है तो गर्भाशय ऐसी जगह पे बैठा है जहां उसके आगे एक सद्य प्राण मर्म है यानी बस्ती और उसके पीछे सद्य प्राण मर्म गुद है तो वो सद्य प्राण मर्म के बीच में बैठा हुआ है तो उसको कितना हमें प्रिकॉशन लेना पड़ेगा चिकित्सा करते समय शरीर में 107 जगह है अलग-अलग और
57:07 वो उसको मर्म कहते हैं उसको स्पर्श नहीं करना है मार नहीं लगाना है उसको सर्जरी करते समय उसको अवॉइड करना उसको प्रेशर एक्यू प्रेशर करते समय भी उनको अवॉयड करना है। ऐसा कहा गया है। मारती मर्म क्योंकि वह मारते हैं। लेकिन विधक कर्म करते समय मर्म के ऊपर कभी नहीं विधक कर्म किया जाता। अग्निकर्क भी मर्म के ऊपर नहीं किया जाता। मर्म के आगे पीछे ग्रंथ में ही वर्णन आया है। क्षिप्र मर्म उपरिषद अंगुले विदुर मर्मा शितम केशांत संधि के ऊपर। ऐसे मर्म को छोड़ के उसके आजू-बाजू में वेदन कर्म बताया गया है ताकि वह मर्म का सर्कुलेशन मर्म की नर्वस सिस्टम मर्म की प्लेगसेस ये सही हो जाए और वहां पे आजू-बाजू होने वाले ऑर्गन्स के विकार सही हो जाए। ऐसा सिस्टम बताई गई है। अच्छा तो बॉडी में ऐसे कोई पॉइंट्स कितने होंगे
57:53 जहां विध करने से आपको लाभ होगा? हां 107 देखो ये शास्त्र जो है ग्रंथ में जो दिया गया है ग्रंथ कहता है यह मैं एक बुद्धि वाले व्यक्ति को बता रहा हूं। अगर आप पढ़ते हो तो अनुभव आता है तो आप एनाटॉमी देख के अलग-अलग प्रकार से आप कर सकते हो इसमें तो ऐसा पॉइंट पकड़ेंगे तो हम एक कहेंगे कि ऐसे कुछ 200 पॉइंट हो गए शरीर में जहां पे विधक कर्म हम करते हैं लेकिन कहते हैं ना कि अभ्यासत प्राप्ति दृष्टि कर्म सिद्धि प्रकाशनी रत्नाद असत ज्ञानम न शास्त्र देव जाते अभ्यास करने से बार-बार करने के बाद दृष्टि मिल जाती है। जैसे हम ऊपर से देख के नारियल में पानी है या उसमें खोबरा ज्यादा है ये बता नहीं
58:39 सकते लेकिन वो बेचने वाले को पता होता है क्योंकि बार-बार देखा है ना उसने वैसे अभ्यासत प्रापति दृष्टि बार-बार अभ्यास करने के बाद पेशेंट बार-बार देखने के बाद पेशेंट एंट्री करते समय ही समझ में आता है ये इस व्याधि का है और इसको इतना समय लगेगा और इसको ये ये विध कर्म करना पड़ेगा उसके साथ ये ये करना पड़ेगा ये अभ्यास से प्राप्त होता है तो जो ग्रंथ में लिखा है वो एक बुद्धि व्यक्ति हमारे जैसे छोटे बुद्धि के लिए है। लेकिन अगर कोई विद्वान है तो वो खुद के भी पॉइंट अलग-अलग तरीके से बना के रिसर्च करके बता सकता है। अभी रिसर्च का काल है ना तो सारा रिसर्च करके देखना पड़ेगा ऐसा और सर विध करने के जो आप करते हो उसके कोई नियम आप है कितना डीप करना है कितने प्रेशर से करना है सबसे पहला नियम है कोवि नहीं करना है कहीं पे भी विध नहीं करना है पहला नियम दूसरा नियम है एक्यूरेट करना है जहां पे बताया
59:26 गया है जिस व्याधि में बताया तब करना है तीसरा नियम है योग्यभ्यास करके ही करना है पहले फलों के ऊपर फूलों के ऊपर कपड़ों के ऊपर अलग-अलग मांस के ऊपर पनीर के ऊपर यह विध्कर्म आपको योग्यभ्यास करना है। सर्जरी डायरेक्ट नहीं करनी है। आपको प्रयास करना है। प्रयास करना है। उसके बाद में फिर एंगल रहेंगे, स्थान रहेंगे और फिर व्याधि देख के ऑब्जर्व करके फिर विधक कर्म करना। और कोई ऐसा स्पेसिफिक नहीं है कि इतने प्रेशर पे करना है या इतने वो एकदम नहीं नहीं देखो अभी कहां कर रहे हो ये इंपॉर्टेंट है। हां अगर अपांग मर्म के ऊपर दो उंगली अगर वेदन कर्म करते हो तो वहां पे नीचे बोनी है डायरेक्टली। हम् तो वहां करते समय हमें 1/4 वृही बचा के वहां पे करना पड़ता है। यानी वृही यानी चावल 1/4 यानी एक चावल 11 एमएम का होता
1:00:12 है। तो 1/4 यानी 34 एमएम तक हमें वहां पे करना पड़ता है। अच्छा। तो वो इतनी बार कैसे करना है आपको? तो आपको पता होना चाहिए ना कैसे-कैसे करना है। तो ये आपको पता है एक वर्नियर कैलपर मिलता है। हम वो मेजरमेंट के लिए होता है। तो हमारे सर क्या करते थे? पेशेंट कहां से? अगर तू कोकन से आ रहा है तो आते समय चावल लेके आ जो खाता है तू वो चावल का मेजरमेंट लेते और उसका वृही प्रमाण होता था। अब कोकन का चावल अलग, नॉर्थ का चावल अलग, महाराष्ट्र का चावल अलग जो जहां रहता है उसके अनुसार वृही प्रमाण रहते थे। गिन के हम करते थे। इतना एक्यूरेसी है उसमें। ओ तो मतलब चावल के हिसाब से एक श्लोक भी है। हां वृही प्रमाण। चावल है ना? वृही यानी चावल। अर्धवह यानी आधा चावल के प्रमाण से वेदन
1:00:58 कर्म करना है। तो हर एक का चावल अलग है ना? तो तू जो कौन सा खाता है तेरे क्षेत्र में कौन सा चावल पकता है ज्यादा वो तू लेके आ और उसका प्रमाण देख के उसका ही प्रमाण देखिए फिर करते और वो रिजल्ट फिर उसके बगैर रिजल्ट नहीं आता है क्या बात है क्या बात है तो बहुत मतलब साइंटिफिक ही अप्रोच पूरा अप्रोच साइंटिफिक है इसका इस पे सर कुछ रिसर्च वगैरह हुए आपकी टीम की तरफ से या अभी अभी क्या है एक 12 पीएचडी कैंडिडेट है हमारे जो इस पे काम कर रहे हैं मोर देन 500 पीजी स्टूडेंट के थीसिस है इसके अच्छा और क्या है प्रैक्टिशनर मैं हूं तो रात 1:00 बजे घर जाता हूं तो फिर भी प्रयास करता हूं आर्टिकल लिखने का तो रिसर्च मेरे जो हाथ है मेरे स्टूडेंट
1:01:44 है वो करते हैं और जो भी पीजी स्टूडेंट है अलग-अलग सब्जेक्ट लेते हैं और उस पे काम कर रहे हैं। देखो हुए 10 साल गोपटे सर जाके 10 ही साल हुए अभी बहुत बाकी है। काफी रिसर्च अभी तो आप मतलब इस पे काम करना चाहते हैं। सर कई ऐसे हमारे व्यूअर्स होंगे जो अभी इनमें से कई जो हमने डिस्कस किया उनसे पीड़ित होंगे। उनको आप क्या कोई मैसेज देना चाहेंगे? मैसेज यही है डॉक्टर्स और पेशेंट के लिए दो मैसेज रहेंगे। जो रुग्ना है एक सही होना है। हर चिकित्सा करने के पहले उसके इफेक्ट साइड इफेक्ट ज्ञापक बनना है। आप आ रोगी तो है ही। आयुर्वेद में ठीक होने के लिए चार गुण बताए गए। आ रोगी भीषक वशो ज्ञापको सत्ववानोप यानी पैसा होना चाहिए ट्रीटमेंट लेने का वो सबके पास है आ रोगी भीषक वशो आयुर्वेद के वैद्य प्रति श्रद्धा
1:02:31 होनी चाहिए भीषक वशता ज्ञापक वो क्या करने वाले हैं उससे क्या होगा मेरे शरीर में वमन कर रहे विरेचन कर रहे विधकर्मा अग्निक कर्म इससे क्या बदलाव होंगे मुझे कौन सा व्याधि हुआ यह समझना चाहिए ज्ञापक और सत्ववान यह व्यक्ति के ऊपर मेरी श्रद्धा है और मैं ठीक होने वाला हूं यह श्रद्धा रहेगी तो व्यक्ति ठीक हो जाता तो जो भी है अपने-अपने क्षेत्र में अच्छा आयुर्वेदिक वैद्य जो आयुर्वेद के प्रति श्रद्धा आयुर्वेद का सम्मान करता हो ऐसे आयुर्वेदिक वैद्य के पास जाके चिकित्सा लें और उनको पूछे विधकर्म के बारे में अगर उनको आता है। हमारे भारतवर्ष में हर एक शहर में विधकर्मा करने वाला कोई ना कोई ऑथेंटिक वाला स्टूडेंट सीख के गया हुआ है। क्या बात है? है कोई भी पकड़ो जगह पे। वहां पे मिलेगा ही मिलेगा। 200 कि.मी. के अंदर मिलेगा ही
1:03:18 मिलेगा। जाके वहां पे चिकित्सा ले सकते हैं। और वैद्य के या डॉक्टर या स्टूडेंट के बारे में मैं कहना चाहूंगा कि कोई भी किसी भी गुरु को हमारा समर्पण दे और समर्पण के बिना शास्त्र नहीं समझता है और वो गुरु तत्व भी नहीं आता है। हम सीखते हैं। सीखने के लिए एक हीलिंग टच आना बहुत जरूरी होता है। उसको तत्व कहते हैं। गुरु तत्व आना जरूरी है। और गुरु के यहां पे जाने के बाद सेवा करने के बजाय वो नहीं आता है। तो किसी को भी जिसको आप मानते हो उसको गुरु बनाइएगा। उसके साथ रहिएगा। उसकी सेवा करिएगा। ज्ञान और तत्व अपने आप आ जाते हैं साथ में। सर विध कर्मों को लेकर आप इतना एक्साइटेड रहते हैं। आपका खुद का क्या कोई
1:04:04 स्वप्न है विध कर्म को लेकर? देखो मेरा एक ही सपना था हमारे गुरु का स्वप्न पूरा करना। हमारे गुरु का स्वप्न है कि ये सबको पता होनी चाहिए। अब उसके ऊपर ही कार्य कर रहे हैं और हमारे गुरु का सपना अगर पूरा होता है तो हम धन्य हैं। क्या बात है। बहुत अच्छा लगा सर आपसे मिलके। आपने जो मैसेज दिया डेफिनेटली वो काफी लोगों को इंस्पायर भी करेगा और इट वाज़ प्लेज़र हैविंग यू और विधकर्म के ऊपर इतना अच्छा डिस्कस जो आपने बताया हमें डिस्कस किया अलग-अलग रोग के बारे में जब हमने डिस्कस किया तो डेफिनेटली आई थिंक ये थेरेपी को आप जैसे जो भी है आपके स्टूडेंट्स हैं जिनको उन्होंने आपने बताया 8 9000 लोगों को आपने ट्रेन किया है। आप सब इसको कहीं ना कहीं तो एक अलग आई थिंक लेवल पे लेके जाएंगे। तो उसके लिए आपको ऑल
1:04:51 द बेस्ट एंड थैंक यू सो मच वंस अगेन हमारे इस पडकास्ट में आने के लिए एंड थैंक यू सो मच। थैंक यू। थैंक यू।