0:12 सूरज की पहली किरण जैसे ही धनपुर गांव की छोटी सी नहर पर गिरी। हवा में रुई की तरह उड़ते धूल के कणों के साथ एक आवाज गूंजी छपाक छपाक। यह आवाज थी गांव के धोबी प्रताप की जो नहर के किनारे कपड़ों को पटक-पटक कर धो रहा था। उसके हाथों की त्वचा सूख कर फटी हुई थी। लेकिन चेहरा एक अलग ही ताजगी से भरा हुआ था। इस चेहरे पर शिकन तक नहीं थी क्योंकि वह जानता था कि मेहनत के बिना कोई फल मीठा नहीं होता। हर कपड़े की अलग कहानी है। चौधरी के कपड़े जरा ज्यादा घमंड से लथपथ हैं। स्कूल मास्टर के कपड़ों में स्याही की महक है और रमा काकी की साड़ी। उसमें तो पूरे परिवार
0:58 की थकान छुपी होती है। कुछ ही दूरी पर उसकी पत्नी गोमती खड़ी थी। जो दिन भर के श्रम के बावजूद अपनी आंखों में एक विशेष चमक लेकर चलती थी। उसकी आंखों में हमेशा उम्मीद की झलक होती। भले ही कंधों पर बोझ [संगीत] हो। ये जी अकेले क्या बरबरा रहे हो? आप जरूर थक गए हो। जब भी थकान होती है, आप ऐसे ही अपने आप से बात करते रहते हो। आप ऊपर आइए। बाकी के कपड़े मैं धो देती हूं। गोमती यह थकान नहीं है। मैं तो बस अपने
1:46 काम के बीच थोड़े खुद से ही बात कर लेता हूं। इससे मेरे मन को अच्छा लगता है। प्रताप की बातें सुनके गोमती थोड़ा मुस्कुराते हुए चुप हो गई। तभी प्रताप ने गोमती से उनके एक लौटा बेटा विक्रम के बारे में पूछा। अरे गोमती हमारा बेटा विद्यालय गया कि नहीं या अभी तक उठा ही नहीं। वो इतनी देर तक नहीं सोता। वो भी आपके जैसा मेहनती है। आपको तो पता ही है। मैंने तो उसको विद्यालय जाने के लिए तैयार कर दिया था। तैयार करने के बाद मैं आपकी मदद करने चली आई। फिर उन्होंने देखा विक्रम अपने छोटे से बस्ता लिए घर के अंदर से उनके तरफ आया। उसकी आंखों में सवाल था और दिल में कुछ ख्वाहिशें। 10 वर्षीय था वो। लेकिन उसकी आंखों में वह समझ थी जो
2:33 उसके माता-पिता के जीवन की कठिनाइयों ने उसे दी थी। बाबूजी आज विद्यालय में कविता पाठ है। पर मेरी किताब का पन्ना ही फट गया है। शायद मास्टर जी डांटेंगे मुझे। आज स्कूल जाऊं कि नहीं बाबूजी? बेटा तेरे बाबा की जिंदगी भी पन्नों की तरह फटी हुई है। मगर देख मैं फिर भी रोज एक नई कहानी लिखता हूं। तुझे भी लिखनी है सच्चाई की, ईमानदारी की, तू अभी विद्यालय जा। मैं देखता हूं क्या कर सकते हैं। अगर मुझे कुछ पैसे मिले तो मैं तुझे एक नई किताब खरीद के दूंगा। आप बात तो सही कह रहे हो जी। लेकिन क्या हम हमेशा ऐसे ही गरीब अवस्था में ही रहेंगे? हम तो अपने बेटे को एक नई किताब भी नहीं दे पा रहे हैं। प्रताप ने
3:21 चुपचाप कपड़े की टोकरी उठाई और घर की ओर निकल पड़ा। उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस उसे लगा कि इस घर की तकलीफें उसी के कंधे पर हैं। अगर वह सच्चाई और मेहनत से आगे बढ़ेगा तो एक दिन वह अपने परिवार को हर दर्द से मुक्ति दिला सकता है। गांव में सभी जानते थे कि प्रताप अपनी ईमानदारी और मेहनत से कमाता है। वह कभी किसी से कुछ नहीं मांगता। उसकी मेहनत ही उसकी पहचान थी। एक दिन यह मेहनत उसे जरूर किसी बड़ी मंजिल तक पहुंचाएगी। कुछ ही दूरी पर उसकी नजरें गांव के दो बिगड़ैल लड़कों पर पड़ी। मंगतू और शिवरा जो उसे देखकर मजाक उड़ा रहे थे।
4:08 [संगीत] अबे देखो तो जरा। यह हमारे गांव का कपड़ों का रक्षक आ रहा है। देखो तो कैसे कपड़ों का राजा बनके घूम रहा है। हां हां हां राजा नहीं शायद किसी बड़े घर का नौकर बन जाए। वही इसके लायक है। प्रताप ने उनकी बातें अनसुनी कर दी। उसकी चुप्पी ने उन लड़कों का मजाक बनाना और भी तेज कर दिया। लेकिन प्रताप को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। वह जानता था कि उसका मार्ग सच्चाई का है और जो किसी के मार्ग में रुकावट डालते हैं, उनका खुद का रास्ता हमेशा अवरुद्ध रहता है। शाम होने से पहले ही प्रताप सेठ हरनाम के घर पहुंचा। कपड़ों की पोटली जमीन पर रखी और दरवाजे में दस्तक दी। कुछ ही
4:53 देर में सेठ जी बाहर आए। कहां मर गया था? इतनी देर क्यों लगा दी? तू क्या खुद को राजा समझता है? जो इतनी आराम आराम से आया है यही चलता रहा तो तुझे कपड़े देना बंद कर दूंगा। सेठ जी कपड़े ठीक से सूख नहीं पाए थे। सोचा अधिले कपड़े आपके हाथ ना दूं इसलिए देर से आया। अच्छा ऐसा है तो यह क्या है? यह कपड़े तो अब भी बदबू दे रहा है। जरूर तूने कपड़े धोने में गड़बड़ की है और तूने साबुन बचाने के लिए भी ऐसा किया होगा। है ना? आप चाहे तो दोबारा धो दूं सेठ जी। पर मैं कभी ईमानदारी नहीं बचाता। मैंने पूरी ईमानदारी से काम किया था। मौसम फीका था। इसलिए कपड़े सूखने में समय लगा और इसी कारण
5:41 कपड़े बदबू दे रहे हैं। वहीं पर खड़ी थी सेठ की बेटी सरिता। शहर से लौटी थी। शिक्षित थी और नजरिया बिल्कुल अलग। पिताजी प्रताप जी को देखिए। इनके पास ना धन है ना ओहदा। फिर भी जितनी गरिमा इन्होंने दिखाई है वैसी तो आप में भी नहीं। आप क्यों इनको खरी-खोटी सुना रहे हो? तू भी अब इसका पक्ष लेगी। तू कुछ नहीं जानती। गांव के लोगों के बारे में। यह आदमी कुछ नहीं कर सकता। सिर्फ कपड़े धोने का काम जानता है और उसमें भी बेकार ही काम करता है। तो क्या हुआ? यह अपना काम पूरी ईमानदारी से करने का प्रयास तो करता है ना और किसी की मेहनत का ऐसे मजाक बनाना नहीं चाहिए पिताजी। प्रताप सरिता की आंखों में
6:26 आश्चर्य से देख रहा था। उसने पहली बार किसी अमीर की बेटी को अपने लिए इस तरह बोलते देखा था। उसने बिना कुछ कहे कपड़े उठा लिए और वहां से निकल आया। [संगीत] घर लौटने पर गोमती प्रताप से बोली ये जी आप आ गए लेकिन आप यह कपड़े वापस क्यों ले आए और यूं उदास क्यों खड़े हो कुछ नहीं गोमती बस सेठ जी देर से जाने की वजह से नाराज हो गए और उन्होंने कहा कि कपड़ों से
7:12 बदबू भी आ रहा है और बोला कि ऐसे चलता रहा तो आगे से मुझे कपड़े धोने के लिए नहीं [संगीत] देंगे। रात को प्रताप आंगन में जाकर आसमान देखने लगा। चांद अधूरा था जैसे उसकी जिंदगी लेकिन तारे झिलमिला रहे थे। हे भगवान अगर मेरी मेहनत में खोट हो तो मुझे और दुख दे। पर अगर सच्ची हो तो एक दिन मेरी भी बारी आए। मैं अपने बेटे को ऐसी जिंदगी देना चाहता हूं जहां उसे कभी किसी के सामने सिर ना झुकाना पड़े। हवा
7:58 में एक मीठी सरसराहट हुई जैसे ब्रह्मांड ने उसकी बात सुन ली हो। [प्रशंसा] प्रताप अगली सुबह जल्दी से उठकर सेठ के कपड़े लेकर उसके घर गया। सेठ जी आज मैं आपके कपड़े सुखा कर लाया हूं और इसमें कोई बदबू भी नहीं आ रहा है। ठीक है आज कपड़े ठीक लग रहे हैं लेकिन आइंदा से कपड़े लाने में देरी मत करना नहीं तो अगली बार से तुझे कपड़े नहीं मिलेंगे। ठीक है सेठ जी आगे से ध्यान
8:44 रखूंगा और हां सेठ जी आज कुछ धोने को कपड़े हैं क्या आपके पास? आज नहीं है तू बाद में आना जब होगा मैं तुझे बोल दूंगा। सेठ से यह सुनने के बाद प्रताप भारी मन से घर की ओर निकला और रास्ते में और भी दो-तीन घरों में कपड़ों के लिए पूछा लेकिन कहीं से उसको आज कुछ नहीं मिला। प्रताप खाली हाथ घर लौटा। [संगीत] गोमती प्रताप को देखकर बोली के जी आज फिर क्या हुआ जो आज भी उदास होकर आए हो सेठ जी ने फिर से कुछ कहा है क्या ऐसा कुछ नहीं है गोमती तुम तो जानती ही हो हमारे हालत
9:32 कैसे है और इस हालत में अगर काम नहीं मिले तो जिंदगी और भी मुश्किल हो जाती है। आप ठीक कह रहे हो जी लेकिन आप कुछ और काम क्यों नहीं करते? आजकल धोबी को कपड़े देना कम कर दिया है लोगों ने। बहुत से अमीरों के पास तो कपड़े धोने की मशीन होती है। मशीन से कहा कपड़े अच्छे से साफ होते हैं गोमती। हाथ की मेहनत की बात ही अलग होती है। लेकिन लोग यह बात कहां समझेंगे? इस आधुनिकता ने मानो हम जैसे कुछ गरीबों की रोजी रोटी ही छीन रहा है। गोमती ने प्रताप की बात सुनके उसकी तरफ देखा। उसको देख के गोमती को प्रताप की आंखों में गरीबी की दुख और अपने परिवार के लिए ज्यादा कुछ ना कर पाने का चिंता साफ दिख रही थी। आप
10:18 छोड़िए ना इन सब बातों को। हम कर लेंगे कुछ ना कुछ। आप बस सच्चे मन से काम कीजिए। भगवान जरूर हम पर कृपा करेंगे। प्रताप ने कोई जवाब नहीं दिया और चुपचाप बाहर निकल आया। वो गांव में कुछ काम मिलने की उम्मीद में निकल आया था। [संगीत] वह पहले सेठ हरनाम के पास पहुंचा और उसने दरवाजे पर दस्तक दी। सेठ हरनाम बाहर आते ही प्रताप से ऊंची आवाज में बोला, क्यों रे प्रताप? अब क्या लेने आया है तू? पैसे लेने आया है क्या? तुझे तो मैंने पहले ही पैसे दे दिए थे। अब क्या चाहिए? जी सेठ जी। आपने पहले ही दे दिए थे और मैं आपसे पैसे मांगने नहीं आया
11:06 हूं। मुझे कुछ और काम चाहिए था। अगर आपके पास कोई मजदूरी वाले काम है तो आप मुझे दीजिए। मैं कर दूंगा। मुझे पैसों की बहुत जरूरत है। मजदूरी वाले काम तू क्या अब यह सब करने लगा है? तुझे आता भी है? सेठ जी, पहले कभी किया तो नहीं, लेकिन मैं करूंगा सेठ जी? क्योंकि इन दिनों कपड़े धोने का काम अच्छा नहीं चल रहा और बीच-बीच में बारिश भी हो जाती है तो कपड़े सही से नहीं सूख पाते। इसी कारण लोग कपड़े ही नहीं दे रहे हैं। तो क्या मैं तुझे ऐसे ही काम पर लगा दूं? तुझे कपड़े धोने के सिवा कुछ आता ही नहीं है। चला जा यहां से कोई काम नहीं है तेरे लिए। जो भी काम है वो मैंने दूसरे मजदूरों को दे दी है। तू जा यहां से। मेरा
11:51 समय बर्बाद मत कर। सेठ की बात सुनकर प्रताप को बुरा लगा और वहां से गांव के बाजार तक गया ताकि उसे कुछ काम मिल सके। ने एक दुकानदार से काम मांगा। अरे भाई मेरे लायक कुछ काम है क्या? मुझे काम की बहुत जरूरत है भाई। अरे प्रताप तू तू काम मांगने आया है। अरे भाई धोबी का काम छोड़ दिया क्या? या फिर उस काम से मन ऊब गया तेरा? नहीं भाई इन दिनों कुछ काम नहीं मिल रहा है। बस इसीलिए तुम्हारे पास काम मांगने आया हूं। ओ अच्छा लेकिन भाई
12:38 मेरे पास तो ऐसा कुछ काम नहीं है। तू सेठ हरनाम के पास जा ना। उनके पास तो काम होते हैं और वैसे भी तू तो कपड़े के लिए उनके घर आता जाता ही रहता है। तुझे तो कुछ काम दे ही देगा। प्रताप ये सुनकर दुखी स्वर में बोला। अरे भाई गया था लेकिन कुछ नहीं मिला। वो तो बड़ा सेठ है। उनके उधर काम करने वालों की कमी नहीं है। भला मुझे क्यों ही कुछ काम देंगे। छोड़ो भाई मैं दूसरों से पूछता हूं। यह बोलकर प्रताप और भी कई लोगों से काम के लिए पूछता है। लेकिन उसे कहीं कुछ काम नहीं मिलता। प्रताप थक हार के घर की ओर [संगीत]
13:24 निकला। घर पहुंचते ही उसने देखा कि गोमती और उसका बेटा, विक्रम उसका बेसब्री से राह देख रहे थे। ये जी आप यू बिन बताए कहां चले गए थे? हम तो डर गए थे। आपको कुछ हो गया तो हम कैसे रहेंगे? अरे मुझे क्यों कुछ होगा? मैं तो काम मांगने गया था लेकिन कहीं से मुझे कुछ काम नहीं मिला। ऊपर से कपड़े धोधो के मेरे कमर में दर्द होने लगा है। कुछ देर चलने लगता हूं तो दर्द से जान निकल जाता है। बाबूजी आप कपड़े धोना छोड़ दीजिए। मां और मैं कुछ ना कुछ करके घर चलाएंगे। जब तक आपके कमर का दर्द ठीक नहीं होता आप आराम कीजिए। नहीं बेटा तेरा यह पढ़ने लिखने का समय है। तू अच्छे से पढ़ाई
14:10 कर और कुछ काबिल बन मेरा यही मनोकामना है। बाबूजी मैं तो बड़े होकर कृषि वैज्ञानिक बनना चाहता हूं और गांव के सब किसानों की मदद करना चाहता हूं। लेकिन बाबूजी मैं आपको ऐसे मुश्किल में भी नहीं देख पा रहा। मुझे बहुत बुरा लगता है। हां बेटा तू बनना और नाम ऊंचा करना। तुझे यह सब चिंता करने की जरूरत नहीं। तेरे बाबूजी और मैं सब कुछ संभाल लेंगे। अभी तू जा रसोई में खाना रखा है। तू अभी विद्यालय से आया है। जाकर कुछ खा ले। विक्रम के अंदर जाने के बाद गोमती प्रताप से पूछती है, यह जी विक्रम अंदर चला गया है। अभी आप मुझे खुल के बताओ क्यों इतना परेशान हो इन दिनों? क्या बताऊं गोमती?
14:58 दिन-बदिन काम कम मिलने लगे हैं। मैं तो कोई दूसरा काम भी नहीं जानता। ऊपर से अपने बेटे की भविष्य का भी जिम्मेदारी है। लेकिन उसके लिए अच्छे से पैसे ही नहीं जुटा पाता। जैसे तैसे तो दिन का गुजारा निकाल लेता हूं। और तो और धोबी के काम में भी इतनी मेहनत करनी पड़ती है कि क्या बताऊं। गीले कपड़ों की बोझ उठाना बहुत मुश्किल हो गया मेरे लिए। शरीर में अब पहले जैसे ताकत भी नहीं बची है। आप इतना परेशान मत होइए। आपको परेशान देख के बेचारा विक्रम टूट जाता है। हम लोग तो मेहनत कर ही रहे हैं। थोड़ी सी और कर लेंगे। कभी तो हमारा भी दिन आएगा। अच्छे दिन आएंगे। लेकिन कब गोमती इतने वर्षों से तो वही उम्मीद पर हो लेकिन कभी कुछ अच्छा
15:45 होता ही नहीं। मुझे कितना कुछ करना है। यह जो घर है उसकी भी मरम्मत करनी है। तुम लोगों को अच्छे कपड़े, अच्छे भोजन खिलाना है। लेकिन यह सब मुझसे नहीं हो पा रहा है। सब हो जाएगा। आप हौसला रखिए। इन दिनों बारिश का मौसम है। बारिश के मौसम में सबके घरों में थोड़ी बहुत तंगी आता ही है। हां, यह बारिश का मौसम किसी के लिए अच्छा तो किसी के लिए बुरा है। बारिश के वजह से गांव के किसान भाई खुश हैं। लेकिन मेरा काम तो बुरा ही चल रहा है। यही सब रोज की दिक्कतों की बात करने के बाद दोनों थोड़े भावुक होते हैं और फिर गोमती उसी उदासी से रसोई में चली जाती है और प्रताप भी घर के कुछ काम करने में व्यस्त हो जाता है।
16:35 थोड़े समय बाद अंधेरा होता है और जोर की बारिश भी होने लग जाती है। बारिश के आते ही बारिश से होने वाली उनके जीवन के समस्याओं को याद करके दोनों ओर भी उदास हो जाते हैं। ये जी आज फिर से बारिश हो गई। उन दिनों तो हल्की-हल्की बारिश थी और आसमान में काले बादल थे। लेकिन आज तो जोरों की बारिश होने लगी है। अगर ऐसे ही बारिश होती रही तो हमारा गुजारा मुश्किल हो जाएगा। जी। हां गोमती। मुझे पता है इसी कारण तो मैं चिंतित हो रहा हूं लेकिन हम चिंतित होने के अलावा और कर भी क्या सकते हैं? यह सब तो भगवान के ऊपर है। यही सब सोच के दोनों परेशान हो जाते। लेकिन अपने बेटे से यह चिंता छुपाते हुए जैसे तैसे
17:23 तीनों रात का खाना खा के सोने जाते हैं। अगली सुबह सबसे पहले प्रताप उठ जाता है और उठ के देखता है कि आसमान साफ था। लेकिन आज काम मिलेगा या नहीं यह सोच के प्रताप थोड़ा परेशान था। तभी गोमती भी घर के बाहर आती है और आकर प्रताप से बोलती है [संगीत] मैं एक बात सोच रही थी अगर आप मन करे तो हम दोनों यह काम कर सकते हैं। कुछ ना करने से तो बेहतर ही होगा। क्या बात गोमती? तुम क्या कहना चाह रही हो? साफ-साफ बोलो। मैं सोच रही थी कि बारिश का मौसम शुरू हुआ है
18:09 और सब गीला गीला है तो सबको सूखी लकड़ियों की जरूरत होगी। तो हम लोग जंगल में जाकर लकड़ियां ढूंढ के बाजार में बेचे तो हमें दिन का गुजारा चलाने की तो पैसे मिल ही जाएगी। तुम ठीक ही सोच रही हो। लेकिन तुम्हें यह करने की जरूरत नहीं है। दोनों इसी में व्यस्त रहेंगे तो विक्रम की देखभाल कौन करेगा? वो सिर्फ 10 वर्ष का है। उसकी देखभाल भी जरूरी है। ठीक है। लेकिन आपके शरीर में तो दर्द है। क्या आप यह अकेले कर पाओगे? मैं कर लूंगा गोमती। इतनी सी दर्द मुझे मेरी जिम्मेदारी से दूर नहीं कर सकते। और वैसे भी कुछ ही दिनों की तो बात है जब मुझे फिर से लोग कपड़े धोने के लिए देंगे तब तुम भी उस काम में मदद कर देना। उस काम में तो हमें घर से ज्यादा
18:56 दूर भी नहीं जाना पड़ता। ठीक है जी। आप पहले कुछ खाना खा के लकड़ी ढूंढने जाइए। मैं भी विक्रम को खाना खिलाकर विद्यालय भेज देती हूं। थोड़े समय बाद प्रताप लकड़ियां ढूंढने जंगल की ओर निकल पड़ा। [संगीत] कुछ समय बाद प्रताप इधर-उधर से थोड़े लकड़ी जमा कर लेता है और थकान के मारे कुछ समय वह कहीं किसी पेड़ के नीचे आराम करने
19:43 की सोचता है। थोड़े आगे जाने के बाद उसने देखा कि एक साधु महाराज पेड़ के नीचे ध्यान लगा रहे थे। थोड़ी देर साधु महाराज को घूरने के बाद वह वहां से जाने की सोचने लगा क्योंकि वह साधु महाराज का ध्यान भंग नहीं करना चाहता था। लेकिन जब वह वहां से जाने लगता है तभी साधु महाराज उसको पुकारते हुए बोले बेटा शायद तुम बहुत थक गए हो। आओ थोड़ा विश्राम कर लो यहां पर। साधु महाराज की बात सुनकर प्रताप रुक गया और पलट के साधु महाराज की तरफ हैरानी से देखने लगा और उनसे पूछा प्रणाम स्वामी जी स्वामी आपको
20:32 कैसे पता लगा कि मैं बहुत थका हुआ हूं और आराम करना चाहता हूं। बेटा मैंने तो बस अनुमान लगाया था। बाकी सब कुछ तो प्रभु ही जानते हैं। आओ तुम यहां थोड़ा विश्राम कर लो। साधु महाराज की बात का सम्मान रख के प्रताप उनके सामने बैठ गया। स्वामी आप क्या रोज यहां पर तप करते हैं? हां बेटा इस प्रकृति के गोद में ध्यान लगाने से मेरा मन बहुत प्रसन्न हो जाता है। परंतु बेटा तुम्हें देख के यह प्रतीत होता है कि तुम अपनी जीवन से प्रसन्न नहीं हो। नहीं स्वामी मैं बस रोज की मुश्किल भरी जीवन के कारण थोड़े परेशान रहता हूं लेकिन मैं
21:17 अपने परिवार के साथ बहुत खुश हूं। जीवन में तो कठिनाई आएंगे ही परंतु जो उस कठिनाई से झूझ के प्रभु ने जो दिया है उसी को लेकर सब्र रखे तो जीवन बहुत खुशहाल हो जाती है। प्रताप को साधु महाराज की बातें कुछ ठीक समझ नहीं आई और कुछ समय साधु महाराज के साथ व्यतीत करने के बाद वो उनसे विदा लेके घर की ओर निकल गया। साधु महाराज उसको जाते देख एक रहस्यमई हंसी के साथ देखने लगे। थोड़े समय बाद प्रताप जमा किया हुआ लकड़ियों को जाके एक ढाबे वाले को बेच देता है और ढाबे वाला उसको ₹100 दे देता [संगीत]
22:04 है और वह पैसे लेके प्रताप घर आता है घर आके वह गोमती के पास जाता है जो रसोई में दोपहर का खाना बना रही थी। यह लो गोमती आज लकड़ी बेच के मुझे ₹100 मिले। जानता हूं कम है। लेकिन इससे जो मिले तुम राशन ले आना। चाहता था कि और लकड़ियां जमा करूं। लेकिन मुझे बहुत थकान होने लगी थी। तुम मुझे माफ कर देना। मैं बस इतना ही कर पाया। हाय राम आप मुझसे माफी मत मांगिए। पाप लगेगा मुझे। आपने जो मेहनत से कमाया है, इसी से घर चल जाएगा।
22:51 और हां, मैं एक चीज बहुत दिनों से देख रहा हूं। आप बहुत कमजोर हो गए हो, लेकिन आप हमसे छुपाते हो। मुझे पता है शायद यह सब खाने की कमी की वजह से हो रहा है। क्योंकि आप अपने पेट काट के हमारे लिए बचाते हैं। ऐसी बात नहीं है गोमती। मैं कमजोर नहीं हूं। बस धीरे-धीरे उम्र भी तो बढ़ रहा है ना। यह उसी के कारण हुआ है। और हां, मां-बाप अपने बच्चे के लिए कुछ भी कर सकते हैं। इसीलिए तो खुद का पेट काट के अपने बेटे का पालन पोषण कर रहा हूं ताकि उसकी जीवन भी मेरी तरह ना हो। यह बातें चल ही रही थी कि तभी विक्रम भी विद्यालय से आ जाता
23:36 है। विक्रम की आहट सुनके दोनों चुप हो गए और प्रताप विक्रम के पास आके उससे बोलता [संगीत] है बेटा तू मुझसे नाराज तो नहीं है ना क्योंकि मैं तुझे अभी तक एक नई किताब भी नहीं दिला पाया। तुझे भी तो नई किताब, नई खिलौने, नए कपड़े चाहिए होंगे ना? नहीं बाबूजी आप परेशान मत हो। मुझे यह सब नहीं चाहिए। मैं तो मां और आपके चेहरे पर हंसी देखना चाहता हूं। उस दिन तो मैं किताब के फटने से मास्टर जी डांट लगाएंगे। इसीलिए मैं आपसे किताब के लिए बोल रहा था। लेकिन मुझे मास्टर जी ने कुछ नहीं कहा। इसलिए
24:23 मुझे अब किसी चीज की जरूरत नहीं है। विक्रम की बातें सुनके प्रताप भावुक हो गया। लेकिन उसने अपनी भावनाओं को रोकते हुए अपनी आंसू निकलने नहीं दी। कुछ देर बाद तीनों दोपहर का खाना खाते हैं और खाना खाकर विक्रम अपने गांव के दोस्तों के साथ खेलने के लिए निकल जाता [संगीत] है और इधर प्रताप भी फिर से लकड़ी जमा करने जंगल में जाने के लिए तैयार होता है। आप कहां जा रहे हो? अभी आप तो थके हुए थे ना? गोमती मैं थोड़े लकड़ी और जमा कर लेता हूं। थोड़े और पैसे आएंगे तो विक्रम को कुछ दिला पाऊंगा। तुम जानती हो कितना समझदार हो गया
25:10 हमारा बेटा। वो ऐसी किसी भी चीज की ख्वाहिश नहीं रखता जो हम उसे नहीं दिला पाएंगे। हां, आप सही कह रहे हो। वो बहुत समझदार लड़का है हमारा। हमारी दुख को समझने की सूझबूझ है अभी से। लेकिन आप ऐसे ही भावनाओं में बहके जंगल में मत जाइए। आसमान में बादल साया हुआ है। अगर बारिश हो गई तो आप भीग जाओगे और आपको ठंड लग जाएगी। कुछ नहीं होगा। मैं जल्दी आ जाऊंगा। तुम चिंता मत करो। यह बोल के प्रताप जंगल की ओर निकल जाता है। जैसे ही उसने जंगल में प्रवेश किया।
25:56 उसने देखा कि उसके सामने थोड़े ही दूर में एक गधा घास चर रहा था। उसने गधे को देख इधर-उधर देखा। शायद किसी चरवाहे का हो जो यहां घास चरने छोड़ गया है। अरे यह गधा यहां पर कौन छोड़ गया? इस जंगल में तो कभी ऐसे बड़े जंगली जानवर को नहीं देखा। यहां तो बस कुछ छोटे जानवर ही रहते थे। शायद इसे किसी ने यहां घास चरने के लिए छोड़ गया है। यह सोचने के बाद प्रताप उसे अनदेखा कर जंगल में इधर-उधर से लकड़ियां बटोरने लगा। कुछ लकड़ियां बटोरने के बाद जब वो घर जाने को आया तो उसने देखा कि वो गधा अभी भी उसी जंगल में
26:42 है। यह देख वो सोचने लगा। अरे यह तो अभी भी यहीं पर है। शायद इसे किसी ने छोड़ दिया है। मुझे इसे यहां से ले जाना होगा। नहीं तो यह इस जंगल में रात नहीं बिता पाएगा और अगर इसे किसी ने ढूंढने की कोशिश की तो मुझे पता लगते ही मैं उनको दे दूंगा। फिलहाल इसे घर ले चलता हूं। यह सब सोच के उसने गधे को अपने साथ ले गया और गधा भी बिना कुछ किए आराम से उसके साथ चलने लगा जैसे उसी का पालतू [संगीत] हो। सूरज ढलने लगा था। अंधेरा होने वाली
27:30 थी। प्रताप लकड़ी और गधे को ले घर आया। प्रताप को गधे के साथ देख गोमती और विक्रम की आंखों में सवालों की लहर दौड़ गई। ये जी यह कहां मिला आपको? किसका गधा ले आए हैं आप? अरे यह मैं किसी का गधा उठाकर नहीं लाया हूं। यह मुझे जंगल में मिला है और मुझे लगा यह किसी का हुआ तो ढूंढने आएगा और तब हम इसे दे देंगे। नहीं तो जंगल में इस बेचारे की जान को खतरा हो सकता था। यह जरूर किसी का पालतू ही होगा। तुमने देखा ना कैसे मेरे साथ आ रहा था। ठीक है बाबूजी। अगर कोई इसे लेने आया तो इसे हम दे देंगे। लेकिन अभी कुछ दिन हम इसे रखेंगे। देखो ना बाबूजी यह कितना प्यारा है। मैं इसका नाम भोला रखूंगा। विक्रम का
28:17 खुशी का ठिकाना नहीं था। विक्रम की खुशी देख प्रताप और गोमती भी खुश हो गए और गधे को अपने पास ही रखने का निर्णय लिया। यही कुछ दिनों तक पूरा परिवार गधे का बहुत ध्यान रखने लग गए। उनके आर्थिक स्थिति खराब होने के बावजूद भी प्रताप कहीं ना कहीं से कुछ घास और चारे का इंतजाम कर ही लेता था। प्रताप अब गधे को धोबी के काम के लिए भी कपड़े का बोझ उठाने ले जाता था और जंगल में लकड़ियां जमा करने और साथ में गधे को घास चराने भी ले जाता था। एक दिन जब प्रताप गधे को लेकर जंगल में गया तो उसे फिर से पेड़ के नीचे वहीं साधु महाराज ध्यान करते हुए मिले। साधु महाराज को देख प्रताप उनके पास गया और उनसे बात करने
29:05 लगा। बेटा आज लकड़ियां जमा नहीं किया क्या तुमने? नहीं स्वामी जी मैं बस जमा करने जा ही रहा था तभी आप दिखे और इसीलिए मैं रुक गया। अच्छा लगा तुम मेरे लिए रुके। लेकिन बेटा तुम्हारे साथ आज नया साथी कौन है? लगता है पशुओं से प्रेम करते हो। स्वामी यह तो मुझे इसी जंगल में भटकते हुए मिला था। इसे कोई लेने नहीं आया और इसलिए मैंने सोचा कि जंगल में इसे नुकसान पहुंचेगा तो मैं ही इसे घर ले जाता हूं। तुमने सही किया बेटा। शायद यह भी तुम्हारी जैसा कोई भला मनुष्य का राह देख रहा था। परंतु तुम जो इससे अपने बोझ उठवाते हो, क्या यह उचित
29:51 है? तुम तो इसका सुरक्षा करने के लिए ले गए थे। लेकिन अब तो तुम उसे पीड़ा ही दे रहे हो। साधु महाराज से यह सुनने के बाद प्रताप हैरान रह गया। मैंने इसके बारे में गहराई से नहीं सोचा था स्वामी। मुझसे भूल हो गई। मुझे आप क्षमा कर दीजिए। लेकिन स्वामी आपको कैसे पता लगा कि मैं इससे अपनी काम में मदद लेता हूं? यह सब तो प्रभु ही जानते हैं। मैं तो बस उनका दास हूं। और मुझसे क्षमा मत मांगो। तुम इसको ले जाकर अच्छे से प्यार से रखो। पशु को पीड़ा देना नहीं चाहिए। नहीं तो पशुपति क्रोधित हो जाएंगे। ठीक है स्वामी। मैं अब से इसका बहुत अच्छे से देखभाल करूंगा। यह बोल के
30:38 प्रताप साधु महाराज से विदा लेके कुछ लकड़ियां लेकर घर निकल गया। जब प्रताप घर आया तो गोमती उसे देख पूछती है ये जी आपने भोला के रहते हुए सारी लकड़ियों की भार अपने सर क्यों उठा रखी है? प्रताप गोमती को साधु महाराज से हुए वार्तालाप के बारे में सब कुछ बता देता है। गोमती भी यह सब प्रताप के मुंह से सुनके साधु महाराज की बातों का सम्मान रखते हुए चुपचाप मान जाती है। ऐसे ही कुछ दिन बीत जाता है और रोज की मेहनत से प्रताप की जीवन कठिनाइयों से भर गई थी। इसलिए प्रताप एक दिन इन सब कठिनाइयों से परेशान होके साधु महाराज से मिलने गया ताकि उसकी जीवन के समस्याओं से मुक्ति पा
31:24 सके। बेटा बहुत दुर्बल प्रतीत हो रहे हो। मानसिक रूप से बहुत चिंतित भी लग रहे हो। कुछ परेशानी है क्या बेटा? इसी कारण आपसे मिलने आया हूं ताकि आप मुझे सही मार्ग दिखा सके। मैं तो रोज की मेहनत और आर्थिक परेशानियों की वजह से शरीर और मानसिक रूप से टूट चुका हूं। पता नहीं भगवान की कृपा कब होगी मुझ पर। आप कुछ मार्ग दिखाइए स्वामी। बेटा भगवान सबको सही समय पर ही सब देंगे। हमको तो बस मेहनत और अच्छे कर्म करने चाहिए। लेकिन कभी भी पुण्य का फल की आशा नहीं रखनी चाहिए। और तुम्हें क्या लगता है तुम
32:12 खुद यहां मेरे पास आए हो? नहीं बेटा यह तो तुम्हारी अच्छे कर्म है। जो प्रभु तुम्हें यहां मेरे सम्मुख लाए और हां बेटा तुम्हें जो जंगल में तुम्हारा भोला मिला था वो तुमको ऐसे ही नहीं मिला था। वही तुम्हारे अच्छे कर्मों का फल है। तुम जिस प्रेम से उसका ध्यान रखते हो, तुम उसी प्रेम से तुम उसको जंगल के दक्षिण ओर चराने ले जाओ। और जिस स्थान पर भोला पहला घास चरे उसी स्थान पर तुम खुदाई करना। तुमको तुम्हारी सारी समस्याओं का हल मिल जाएगा। साधु महाराज की बात प्रताप को कुछ ठीक समझ नहीं आई। और वह घर चला आया। घर आकर प्रताप गोमती से साधु महाराज से हुई बातित के बारे में सब कुछ
32:58 बताता है। गोमती प्रताप के मुंह से यह सुनकर उससे तुरंत बोलती है, अरे इसमें समझना क्या है? साधु महाराज ने जो आपसे कहा है, जरूर उनके कहे हुए हर बात का कुछ महत्वपूर्ण अर्थ छुपा होगा। आप जल्दी से उनके कहे मुताबिक वहां जाइए। प्रताप गोमती के समझाने पर साधु महाराज के कहे मुताबिक भोला को अपने साथ लेकर जंगल के दक्षिण ओर निकलता है। जंगल पहुंचते ही कुछ देर बाद भोला थोड़े दूर कुछ चट्टान के बीच घास चढ़ने लगता है और प्रताप यह देख वहीं पर अपनी कुदाल से मिट्टी खोदने लगता [संगीत] है। और थोड़ी ही देर बाद खुदाई के जगह से
33:44 आश्चर्यजनक से सोने के सिक्कों से भरा एक घड़ा निकला। उसे देख प्रताप की आंखें फटी की फटी रह गई। वो इसे देख सही से सोच ही नहीं पा रहा था। उसकी आंखों में खुशी के आंसू थे। उसको ऐसा लग रहा था मानो उसको अपनी पूरी जिंदगी की मेहनत का फल मिल गया हो। प्रताप वह सब धन लेकर घर की ओर आता है और जंगल के रास्ते में वह साधु महाराज को धन्यवाद करने के लिए उनको ढूंढने लगता है। लेकिन उसे वे कहीं नहीं मिलते। मानो कहीं वे चमत्कारी रूप से गायब हो गए हो। उसने मन ही मन सोचा कि शायद भगवान ने ही उसकी मदद के लिए उनको धरती पर भेजा था। यह सोच के वह तुरंत घर आया और अपने परिवार को
34:31 सोने से भरा घड़ा दिखाकर उसके साथ जो जो हुआ सब कुछ बताया और यह सब सुनने के बाद पूरा परिवार खुश हो गया और प्रताप भी मन ही मन इस धन को आने वाले दिनों में सदुपयोग करके अपने जीवन को सुधारने की सोचने लगा और भगवान को मन ही मन शुक्रिया किया क्योंकि अब प्रताप और उसकी परिवार के सब परेशानी खत्म होने वाली थी।