आशीर्वचन। August 15, 2026। #शंकराचार्य #चातुर्मास्य2026 #सलधा

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संक्षिप्त सारांश

इस वीडियो में विभिन्न धार्मिक विचारों, अवतारों और भगवान शिव के ज्ञान के प्रभाव पर चर्चा की गई है। मुख्य रूप से भगवान के अवतार और उनके उद्देश्यों की व्याख्या की गई है। साथ ही, शिवाजी और शंकराचार्य के ज्ञान और धर्मनिरपेक्ष विचारों का महत्व भी बताया गया है।

  • अवतार का उद्देश्य कई प्रयासों को पूरा करना होता है।
  • भगवान शिव और शंकराचार्य के जरिए ज्ञान और सत्य की स्थापना की गई।

भगवान के अवतार

भगवान के अवतार के बारे में बताया गया है कि जब भी कई प्रयोजन एकत्रित होते हैं तो वे धरती पर अवतरित होते हैं। यह चर्चा की गई है कि भगवान आने पर हमारे लिए क्या करते हैं। अवतार किसी एक भक्त के लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए होते हैं। अवतार का मतलब होता है ईश्वर का धरती पर प्रकट होना।

भगवान का ज्ञान

इस खंड में कहा गया है कि भगवान शिव ज्ञान के देवता हैं और उनके कई अवतार हैं। ज्ञान अवतारों का उद्देश्य अज्ञानता को समाप्त करना है। उन्होंने शंकराचार्य के अवतार के माध्यम से ज्ञान को फैलाने का कार्य किया।

गुरु का महत्व

गुरु का संबंध भगवान से जोड़ा गया है। ज्ञान का अंजन गुरु द्वारा दिया जाता है। जब गुरु ज्ञान प्रदान करते हैं, तब अज्ञान का नाश होता है। शंकराचार्य ने भी ज्ञान देने का कार्य किया, जिसका अनुयायी पूरे भारत में फैल गए।

शंकराचार्य का कार्य

शंकराचार्य ने धर्म की स्थापना के लिए कठिनाईयों का सामना किया। उन्होंने भक्तों को वेदों की दिशा में मार्गदर्शन किया और उन्हें समझाया कि वेद ही सत्य धर्म हैं। उनके द्वारा स्थापित चार मठों ने सत्य सनातन धर्म की पुनर्स्थापना की।

पंथवाद और भक्ति

इस खंड में बताया गया है कि जब हानिकारक पंथ बढ़ने लगे, तब शंकराचार्य ने धर्म के मूल सिद्धांतों की रक्षा की। उन्होंने भक्ति और श्रद्धा के महत्व को बताया और एक सच्चे धर्म का पालन करने का उपदेश दिया।

शासन व्यवस्था

अन्य व्यवस्थाओं के साथ, गुरु की प्रणाली को भी समझाया गया है। गुरु जनता को सही मार्ग दिखाते हैं जबकि राजा दंड का भय दिखाते हैं। इसके परिणामस्वरूप, लोग सच्चाई के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।

धर्म का संरक्षण

धर्म की बातों को समझाने के लिए बताया गया कि किस प्रकार शंकराचार्य और उनके अनुयायी वर्तमान में भी धर्म की शिक्षा और प्रवचन करते हैं। अंत में कहा गया कि जहां सच्चाई और धर्म है, वहीं जीवन की वास्तविकता है।

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Transcript

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0:00 नमः परमहंसा। रत्नाक जलांग परस मृगवरायम प्रसन्नम। पद्मासेनम समन्तात कृत्य बसाम विश्वाध्यम विश्व वंध्यम निखिल वय हरम पंच वक्तम त्रिनेत्रम

0:47 सुर वृंदास किरीट कोटि प्रघर्षी तामेव शरणम विगत दीनम विलोक दया विलोचने शिव शिव शंभू हर हर महादेव शिव शिव शंभू हर हर महादेव शिव शिव शंभू हर हर शिव शंभ हर हर शिव शंभू

1:47 हर हर महादेव शंभो हर हर महादेव शिव शिव शंभू हर हर महादेव नारायण स्वरूप। यति वृंद। यहां पर विराजमान। संत वृंद। सज्जन वृंद। सुदेव वृंद और समादरणीय शक्ति

2:40 भगवान अवतार धारण करते हैं। अवतार माने उतरते हैं ऊँचे है। ऊंचे स्थान पर जो बैठा है अगर अपने मुर्दा अभिषिक्त हैं।

3:25 सबसे ऊपर जो लोग हैं उसमें विद्यमान हैं। लेकिन हमारे आपके लिए उनको हमारे आपके पास आना पड़ता है, उतरना पड़ता है। इसलिए जब वह आते हैं तो उनके आने को अवतार कहा जाता है। किसी एक काम के लिए, किसी एक भक्त के लिए नहीं आते। प्रायः यही देखा गया है। जाने कितने प्रयोजन उसी पे रहते हैं। एक

4:12 बार आए सब करके चले गए। आप लोग भी सही करते हो। बाजार का कोई काम आता है। आप कहते हैं ठीक है जाएंगे और फिर जब कई काम इकट्ठे हो जाते हैं तो कहते हैं अब चले ही जाना चाहिए और जाते समय घर वालों से लेते हैं क्यों भाई हम बाजार जा रहे हैं तो वो तो बता दो ताकि हम उसको भी किए आए जा ही रहे हैं तो वो भी कर लेंगे यह भी कर लेंगे उसी तरह से भगवान भी जब आते हैं तो किसी एक प्रयोजन से नहीं आते। कई प्रयोजन जब इकट्ठे हो जाते हैं तब आते हैं और

5:01 आते समय भी पूछ लेते हैं कि कुछ नए हो तो उनको भी शामिल कर दो ताकि उनका भी निपटारा करते हुए हम चले जाएं। इसलिए भगवान आते हैं इसमें कोई शंका नहीं है। लेकिन इसलिए इसको पक्का नहीं कहा जा सकता। हरि अवतार हेतु कही जाए न सोईम माने बस ऐसा ही है इसी कारण से आए ऐसा नहीं कहा जा सकता क्योंकि जान कितना प्रयोजन होते हैं अच्छा है वो कौन है

5:49 तो हम आपने अपने लोग सामान्य रूप से समझते हैं कि हरि माने भगवान विष्णु लेकिन तो लागू है हरि माने हरि हरण धातु है चुराने के अर्थ में तो जो चुराएगा वह हरि कहलाएगा दूसरा प्रत्यय करो तो हर हो जाएगा चाहे हर करो चाहे हरी करो प्रत्यय बदलते रहोगे अर्थ तो चुराना ही रहने वाला है तो जो चुरा लेता है उसी का नाम है हरी उसी का

6:35 नाम है हर तो कौन चुरा है ये सारे के सारे जितने भगवान के रूप है ना पंच देवतमिकतम अभी गार्गी जी ने बताया था। पांच देवता हमारे यहां माने गए हैं। इनमें से गणेश जी हैं, सूर्य हैं, विष्णु हैं, शिव है और देवी हैं। पंच देवतमित ये पांच देवता बताए गए हैं। पांचो चोर। लोग हंस रहे हैं कि ऐसा कैसे कह दे रहे हैं चोर अरे भाई जब हैं तब कह रहे हैं

7:21 आप जो है वही तो आपको कहा जाएगा कि कुछ और कहा जाएगा अगर आप चोरी करेंगे चुरा लेंगे बिना हमको बताए हमारी चीज ले लेंगे तो हम आपको क्या कहेंगे चोरी तो कहेंगे तो इन पांचों का यही स्वभाव है। यह हमारे बिना कहे हमारी चीज ले लेते हैं। नहीं महाराज हमने तो चोर के रूप में माखन चोर कृष्ण को सुना था। उन्हीं को लोग चोर कहते हैं। लेकिन वह तो मक्खन चुराते थे। खाने पीने का वह भी बचपना में। बड़े होने पर कहां चुराया?

8:10 यह तर्क दिया किसी ने। लेकिन जब तर्क की बात आती है तो एक के बाद एक निकलने लगता है। तो जब एक ने कहा कि अरे वह तो चोर कहना ठीक नहीं है। दूसरे पंडित खड़े हो गए। उन्होंने कहा ऐसा थोड़े है। बचपन में मक्खन चुराया था। लेकिन जब थोड़े बड़े हुए तो क्या गोपियों के गोपा गोप बालिकाओं के वस्त्र नहीं चुराए थे? बोलो हां हां चुराए तो थे कहा तो फिर क्यों कहते हो कि केवल मक्खन चुराया जाता उन्होंने वस्त्र भी चुराए थे और

8:57 और बड़े जब हो गए जब बहुत ही बड़े हो गए उसके बाद से तो जाने क्या-क्या चुराते रहते हैं। अरे रुक्मणी किया बड़े होने के बाद और सबसे बड़ी बात यह है कि जब महाभारत का युद्ध होने वाला था तो अर्जुन के मन में क्लीवता आ गई थी। नपुंसकता आ गई थी। धनुष बाण रख के भाग रहा था कि महाराज यह लो

9:43 ले लो अपनी कंठी माला। ऐसे समय में का जो मोह था उसका अपहरण कर लिया। ब्रजे बसंतम नाम चूल चौरम। अनेक जनार्जित पाप चरम चौराग्र गण्यम सिरसा नमामि किसी ने कहा कि भाई यह चोर कहे जाते हैं भगवान लेकिन इनको कोई बुरा नहीं समझता जबकि में तो हम देखते हैं कि जिसको चोर की उपाधि मिल जाए उसका सम्मान नहीं होता ये तो चोर के पूज रहे हैं ये कैसे चोर हैं

10:32 तो बताया कि दो तरह के चोर होते हैं। एक काम की चीज है उसको चुरा के लेके उससे क्या होता है आपको दुख होता है कि हमारी अच्छी चीज ले चला और दूसरा जो कूड़ा कबाड़ा कचरा है जिसके कारण आप बहुत परेशान हो उसको आकर के घर ले चला जाता है आपके यहां से कोई अगर आके रोज झाड़ पोंछ के कचरा उठा के जाएगे कि खराब? हां उसको तो अच्छा कहना ही पड़ेगा। तो यह

11:18 जो भगवान हैं यह चोर तो हैं लेकिन आपकी अच्छी चीजों की चोरी नहीं करते। आपका पुण्य नहीं चुराते लेकिन अगर आपके पास कहीं से पाप आ गया है तो उसको चुरा करके हटा देते हैं। हरि हरति पापानी यह पाप का हरण करते हैं। पाप चुरा लेते हैं। मैंने चुरा लिया। कोई एहसान नहीं दिखाते। जैसे ही आप भगवान का नाम लेते हैं। जैसे ही आप भगवान का दर्शन करते हैं। जैसे ही आप भगवान का चिंतन वैसे ही भगवान चुरा लेते। बताते नहीं दिखाते कि मैंने आपके घर में साफ

12:05 सफाई कर दी है। गड़बड़ियां हटा दी है। ऐसे भगवान क्यों नहीं साफ सफाई वाले को सब चाहते हैं करना कोई नहीं चाहता लेकिन सफाई सब चाहते हैं। कि कोई आए और साफ कर दे। क्यों? भगवान सदा से करते रहे हैं। तो इसीलिए लोगों को आदत पड़ गई है। साफ सफाई हमें चाहिए। कोई आए कर दे और इसीलिए लोग साफ सफाई के काम में लगे हैं। उनको दर्जा देते हैं। वह कोई अलग लोग हैं जो साफ सफाई करने वालों को छोटा महसूस कराते हैं। सनातन

12:53 धर्म में तो उनके लिए बड़ा सम्मान है। तो भगवान जो है पाप हरते हैं, दोष हरते हैं और इनहीं की एक विधा है अज्ञान उसका भी अपहरण कर लेते हैं। जो भगवान है अज्ञान को हरने वाले अलग-अलग तरह का चोर भी तो अलग-अलग होगा। अभी मध्य प्रदेश में एक तोप की चोरी हो गई। सुना कि नहीं आप लोगों ने? अच्छा ही है ज्यादा। आप लोग इसका मतलब मीडिया में नहीं रहते हो। तोप की चोरी हो गई। चोर आए बहुत बड़ा कन लेकर के 30 लोग

13:42 और तोप को कन से लादा और लेकर फरार हो गए। किसी को पता नहीं चला। कहां ले गए पता ही नहीं। अभी तक मिली नहीं है। तोप की चोरी हो गई और अभी तक पता नहीं गया कहां ले गया। कन ले आए तो इतना पता चला। पैसे तो उठा भी नहीं सकते थे। बहुत बड़ी तोप थी। ऐतिहासिक थी। तो चोर जो है वह भी तरह-तरह के होते हैं। तो यह जो अज्ञान को चुराने वाला चोर है ना भगवान का गुरु रूप है। जब भगवान को किसी का है तो वह गुरु रूप में प्रकट होकर के आते

14:29 हैं। इसीलिए अज्ञानंदस्य चक्षुरितम येना तस्मै श्री गुरुवे नमः गुरु को नमस्कार करते समय यही कहा जाता नाश कर देंगे क्यों क्योंकि ज्ञान रूपी अंजन की आपके अंदर सलाका है। ज्ञान का अंजन आंच देते हैं आंखों में। जन जो है वह काल होता है लेकिन जब आंख में साफ साफ देखने लगती है अंजन की यही विशेषता है तो गुरु जी जो है ज्ञान रूपी अंजन लेकर आते हैं उसको आंच देते हैं और उन अजन से आझी हुई जो है वो साफ साफ देखने

15:17 लग जाती है। अज्ञान का नाश हो जाता है। इसलिए हमारे भगवान कभी-कभी गुरु रूप में आते हैं। तो भगवान शिव के अवतारों की चर्चा चल रही है। उनके चार अवतार ज्ञान अवतार हुए हैं। कुल भगवान विष्णु के 24 अवतार हैं। और भगवान शिव के प्रसिद्ध जो अवतार हैं, वैसे तो नाना अवतार हैं। कोई संख्या नहीं है। लेकिन उनमें से भगवान और भगवान शिव अवतार हैं। इनहीं 28 अवतारों में से चार अवतार ज्ञान

16:06 अवतार हैं। ज्ञान देने के लिए ही आए थे। गुरु बन के ही आए थे। और उन्हीं एक अवतारों में से दक्षिणा मूर्ति भगवान की चर्चा हम लोगों ने की। और दूसरे अवतार हैं भगवान आदि शंकराचार्य। उनको धरती पर आना पड़ा। काहे के लिए आना पड़ा? ज्ञान फैलाने ज्ञान फैलाने की जरूरत क्यों पड़ी? ज्ञान फैलाने की जरूरत बंधुओं इसलिए पड़ी कि किसी ने अज्ञान फैला दिया था। अज्ञान फैल गया तो ज्ञान दब गया। अब

16:53 अज्ञान को हटा के फिर ज्ञान को फैलाने की जरूरत थी। इसीलिए भगवान शिव जो ज्ञान के देवता हैं उनको धरती पर आना पड़ा। बात क्या थी? बात यह थी कि आप लोगों ने पुराणों में सुना कि देवता और असुर भाई भाई ही हैं। कोई पराए नहीं है। अलग-अलग माताओं से संतान है। जो कश्यप ऋषि हैं। उन्हीं की कई पत्नियां हैं। उन्हीं में से एक है दिति। उनसे जो बच्चे पैदा हुए उनका नाम हो गया दैत्य। उन्हीं में से एक है धनु। उनके बच्चे जो हुए उनको कहा गया दानव और जो अदिति हैं उनके बच्चे देवता कहलाए आदित्य

17:43 तो है एक ही पिता की संतान स्वभाव के कारण दोनों में अंतर आ गया जो देवता है उनको देकर के अच्छा लगता है और जो असुर हैं उनको छीन करके अच्छा लगता है आप लोग बताओ आप लोगों का क्या स्वभाव है दे के अच्छा लगता है कि छीन करके अगर देकर अच्छा लगता ना होता आप लोगों को तो सवा लाख लोग इस मंदिर के लिए 5000 रुपया ना दे देते इसी से पता चलता है एक तरह की टेस्टिंग है कि समाज में कितने देवता हैं और कितने असुर हैं।

18:32 और भगवान शंकर के मामले में तो अलग ही देखा जाता है असुर भी भगवान शिव के उपासक है। तो देवता और दानव दोनों के स्वभाव में अंतर था। दानव करने लगे। यह जानकर के कि देवताओं की शक्ति का रहस्य क्या है? कहा यह वेदा अध्ययन करते हैं और वेदों में जैसा जैसा बताता है वैसा ही वैदिक धर्म का अनुगमन करते हैं और वैदिक धर्म का अनुगामी जो भी होगा उसकी शक्ति का कोई पराभव नहीं कर सकता तो इसलिए हो गए हैं ये वैदिक धर्म पे इनको जितना कठिन है

19:20 तो देवता और दैत्य मजबूत होने लग गए यह सनातन धर्म का प्रभाव है कि जो इसको मान ले वही मजबूत होने लग जाएगा। तो असुर मजबूत होने लगे। अब वह वेदा अध्ययन करते थे। वेदा अध्ययन करके अब उनका मुख्य काम हो गया यज्ञ करना। एक से एक यज्ञ करते। और यज्ञ करके यजन करके शक्ति प्राप्त करते थे। उनके जो बड़े-बड़े असुर थे उनके नाम से हवन कर देते थे। शक्ति प्राप्त हो गई। और उस शक्ति का प्रयोग उन्होंने देवताओं के विरुद्ध करना शुरू किया। देवता परेशान हो गए। भगवान के पास गए बचाइए बचाइए। भगवान ने कहा भाई क्या करें? यह तो धर्म

20:06 का पालन कर रहे हैं। इनको जितना कठिन है। कहा अगर धर्म का पालन करने के कारण जितना कठिन है तो इनको धर्म से डिगा दीजिए। ऐसा कुछ करिए कि यह धर्म का पालन छोड़ दे अपने आप। तो यह रास्ता पसंद आ गया। और इसके कारण भगवान विष्णु ने अवतार धारण किया। कौन सा अवतार? इसी को बुद्धावतार कहते हैं। बुद्ध के रूप में भगवान विष्णु ने अवतार धारण किया। यह जो अवतार चल रहा है यह बौद्धा अवतार का समय चल रहा है। माने बौद्धा अवतार हो चुका है और कल्कि अवतार अभी होने वाला है। उसी बीच का यह समय चल रहा है जिस समय हम लोग यह चर्चा कर रहे हैं। इसीलिए जब संकल्प हम लोग पढ़ते

20:54 हैं तो कहते हैं बुद्धावतारे बौद्ध अवतार के बाद का समय यह चल रहा है। इसमें बौद्ध का भजन रहेगा। तो अब बौद्धा अवतार हो गया। भगवान विष्णु का। अब आप समझ लिए कि इस अवतार का प्रयोजन क्या था? हमने कहा ना कि कई प्रयोजन होते हैं। तो एक प्रयोजन इसमें जो साक्षात दिखाई दिया वह यह दिखाई दिया कि जो असुर थे उनको वेद के कर्मकांड से हटाने के लिए अश्रद्धा उत्पन्न कर ले। वेदों के प्रति उनके मन में अश्रद्धा हो जाए ताकि वह वैदिक कर्म छोड़ दें। वैदिक कर्म छोड़ेंगे

21:39 तो कमजोर हो जाएंगे। तब देवता उनको आक्रमण करके जीत लेंगे। इस उद्देश्य से भगवान विष्णु ने बुद्धावतार धारण किया। बुद्धावतार कितनी देर का है? बुद्धावतार ऐसा नहीं है कि अमुक जगह पर बुद्ध हुए। फिर उनकी बाल लीला हुई। फिर वह बड़े हुए। फिर बड़े होकर के उन्होंने यह किया, फिर यह किया, फिर यह किया। ऐसा अवतार नहीं है। कैसा अवतार है? कि असुरों का एक बहुत बड़ा यज्ञ चल रहा था। बहुत भीड़ थी। सारे असुर उसमें सम्मिलित हो रहे थे। कोई यज्ञ में आहुति दे रहा था, कोई व्यवस्था कर रहा था और जो नहीं कर पा रहे थे, वह परिक्रमा ही करके पुण्य ले रहे

22:25 थे। बड़ा आनंद हो रहा था। बड़ी श्रद्धा से कर रहे थे। वहीं पर भगवान विष्णु साधु महात्मा का रूप बना के बुद्धा अवतारण करके थोड़ी दूर पर जाकर एक चबूतरे पर पेड़ के नीचे बैठ गए। अब सबका आकर्षण हो गया। तो थोड़ी देर में लोगों का ध्यान गया कोई महात्मा आए हैं। तो जाकर के उनके पास प्रणाम करने लगे। लोग कहने लगे ध्यान में है अभी ध्यान मत करो। जब उठेंगे तब बात करेंगे और करते उन्होंने आंख खोली तो सब लोगों ने प्रणाम करके कहा महाराज सेवा बताइए कहां से पधारे हैं आप क्या

23:12 आपका नाम है कहा भाई यह सब बाद में पूछना यह बताओ यह हो क्या रहा है यहां पर किस बात का कोका कोला हाल है का यहां पर यज्ञ हो रहा है यज्ञ यह क्यों किया जा रहा कहा यह शक्तिमान होने के लिए किया जा रहा है। बोले इसमें क्या होता है? इसमें होता है कि एक यज्ञशाला बनाई जाती है। उसके बीच में एक कुंड बनाया जाता है। उसमें आग प्रज्वलित कर दी जाती है और घी चावल जब तेल गुड़ यह सब मिलाकर के साकल्य बनाया जाता है। और फिर मंत्र पढ़ पढ़ करके एक एक मंत्र से स्वाहा स्वाहा स्वाहा किया जाता है।

23:58 कहा अच्छा यह सब मिलाकर के उसमें आग में झोंक दिया जाता है। कहा हां फिर क्या होता है? बोले फिर वह जल जाता है। फिर कहा जिनके निमित्त दिया गया है उनको पुष्टि मिलती है। बोले अच्छा जलाओ जरा यहां पर आग तो लोगों ने आग जला दी। लकड़ी लाए आग जला दी। कहा बोलो तुम्हारा क्या नाम है? तो उन्होंने अपना नाम बताया सामने वाले ने। तो उठा के तिल ज थोड़ा सा आग में डाल दिया बोलो तुमको ताकत आई बोले हमको तो नहीं आई कहा अच्छा जो कमजोरी महसूस कर रहा हो आपके आगे की हम कमजोरी महसूस तो बैठ जाइए अब आपकी

24:47 अक्षत वगैरह लेकर के हाथ में तुम्हारा नाम क्या है उनके नाम से स्वाहा स्वाहा स्वाहा सैकड़ों बार कर दिया। अब बोलो अब ताकत आई। बोले तो कोई बोले अरे जब तुमको ताकत नहीं आई तो तुम कह रहे हो कि हम जिसके नाम करते हैं उनको ताकत आ जाती है जब मनुष्य देवताओं का नाम लेकर के आहुति डालते हैं तो देवताओं को ताकत आ जाती है और हम असुरों को नाम लेकर के आहुति कर रहे हैं तो असुरों को ताकत आ जा रही है। ये कैसे हो सकता है? यह बहुत बड़ी मूर्खता है। आग में आप लोग खाने पीने के अनाज को झोंक रहे हो। मतलब

25:34 जला रहे हो। कोई मतलब नहीं है। अब लीजिए इतनी श्रद्धा से हो रहा था। अब दिमाग में विक्षेप आ गया। अब तीन चार जो बैठे थे उनके मन में बात धस गई कि बात तो सही है आग में डालेंगे जाएगा उसका क्या कैसे हो सकती है तो वह जाकर दूसरे चर्चा करने लेंगे लगे दूसरे तीसरे से तीसरे चौथे से आजकल भी Facebook में यह सब चलता रहता है तो कई लोगों का दिमाग बिगड़ गया कुछ पंडित मानी लोग थे जब उन्होंने सुना कि एक महात्मा आया है बैठा है और वह उल्टे पुलटी बात कर रहा है। तो उन्होंने कहा कि हम जाएंगे हम शास्त्र की चर्चा करेंगे तो

26:22 आ गए शास्त्र की चर्चा कहा भाई देखो हमारा कुछ लेना देना नहीं है बताया अगर आपके कहते हैं कि इससे शक्ति आती है तो इन लोगों को आ जानी चाहिए। हम आपके लिए हवन कर देते हैं। आपको ताकत आ जाए तो बता दो। उन्होंने कहा भाई देखिए बात यह है कि ताकत आती है कि नहीं आती हम नहीं जानते हम तो वेद कहते हैं कि ताकत आएगी पुष्टि होगी इसीलिए हम कर रहे हैं त्रंबकम यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम हम तो त्रंबक की आराधना कर रहे हैं यजन कर रहे हैं ताकि पुष्टि हो जाए तो वेद कहता है कि इससे पुष्टि होती है इसीलिए हम वेदों के कहे अनुसार

27:09 कहा तो इसका मतलब है कि वेद भी झूठ ही बोल रहा है। हो तो रही नहीं है पुष्टि। इसका मतलब वेद भी झूठे हैं। अभी तक वेद को सच मान रहे थे। अब कहने लगे कि वेद भी झूठ बोलते हैं। प्रति उनकी अश्रद्धा हो गई कि वेद जो है गप्प है कुछ नहीं है। बेकार की बात है। लोग इसमें लग गए। वेदों के अनुसार बिना मतलब अपने खाने पीने की चीजों को आग में झोंके दे रहे हैं। चलो बंद करो यज्ञ तो दिमाग बदल गया। यज्ञ बंद कर दिया गया और यही तो भगवान चाहते थे कि असुर यज्ञ बंद कर दें। उन्होंने बंद कर दिया कमजोरी और इधर देवता

27:57 ताकत गए। फिर से देवास संग्राम अब आप कहेंगे कि भगवान ये क्यों कर रहे थे? असुरों की ताकत को क्यों घटा रहे थे? असुर भी तो व्यक्ति ही थे। उनकी ताकत को क्यों घटाया जा रहा था? भगवान क्यों देवताओं का पक्ष लेकर के चल प्रपंच कर रहे थे? तो बंधुओं बात यह है कि असुरों का स्वभाव छीनने का है। अगर उनके पास ज्यादा ताकत आती तो फिर किसी को शांति से वह रहने ना देते। जिसके पास जो कुछ होगा शुरू कर देंगे। इसीलिए भगवान चाहते हैं कि जिसके पास जो है वह सुरक्षित रहे।

28:45 इसीलिए पुलिस महकमा तैयार किया रहता है सरकार के द्वारा कि कोई चोरी करे तो तुरंत दंडित किया जाए ताकि किसी की वस्तु कोई ले ना ले। जैसे राजा पुलिस के द्वारा आपकी वस्तुओं की रक्षा करता है। असुरों को परास्त करवा के देव को बढ़ावा देकर के आप सब की सुरक्षा करते हैं। इसलिए उनके इस छल प्रपंच को भी उद्देश्य के लिए यह किया गया क्योंकि कोई भी कार्य उद्देश्य के पवित्र अथवा अपवित्र होता है। महाभारत में कहा गया है तपो नको कल स्वाभाविक वेद विद कल प्रस हरण कल तहत

29:36 कल कल माने होता है पाप तो वहां बताया गया है कि कोई काम पाप नहीं है कोई काम पुण्य नहीं है जिस काम के पीछे जो उद्देश्य लगा है उस उद्देश्य के कारण पता चलेगा कि यह काम पाप है कि पुण्य हाथ में छुरी लेकर के किसी के पेट को चीर देना पाप है कि पुण्य है और डॉक्टर आपको आप ही का पैसा लेकर के ले जाता लेट जाते हैं और फिर हाथ में छुरी लेकर के आपका पेट चीर देता है। कि पुण्य है। अरे अभी तो कह रहे पाप है। अब पुण्य हो गया। देखिए दोनों ने एक ही काम किया। हाथ में

30:23 छुरी ले चीर दिया पेट को। लेकिन दोनों को उद्देश्य में अंतर है। एक ने आपको मारने के लिए यह किया और एक ने आपको के लिए यह किया। इसीलिए हाथ में छुरी लेकर चीरने मात्र से कोई कहे कि डॉक्टर तो हत्यारा है तो वह गलत हो जाएगा। क्यों? क्योंकि उसने चीरा जरूर लेकिन हत्या की नियत नहीं है। इसी तरह से भगवान ने असुरों को छल किया जरूर। लेकिन छल करने के पीछे उनका असुरों को कहने लगे हम लोग हारे क्यों विश्लेषण करो। तो विश्लेषण में पता चला कि एक महात्मा जी प्रकट हुए थे। उनहीं ने हम लोग को कहा था कि यज्ञ बंद करो। जब तक हम लोग यज्ञ कर रहे थे हमें हराने वाला कोई नहीं था। आज

31:09 हम गए जरूर ऋषि का कारण है। बोले पता करो वो कौन महात्मा थे। तो पता चला वह तो भगवान विष्णु ही आकर के कार्य करने के लिए कर गए थे। तो इस तरह से भगवान विष्णु को बुद्धा अवतार धारण करके वेदों की निंदा करनी पड़ी। लेकिन वेदों की निंदा हो गई और निंदा होने के कारण वेदों के प्रति अनास्था जनता में चली गई। बहुत से लोगों ने मनुष्य ने भी उसी को पकड़ लिया उन्हीं तर्कों को और उसी अनुसार दिमाग होने लगा। का जो धर्म है वेदों में बताया गया धर्म लोग उसको बोलने लगे और मनमाने धर्मों का आचरण होने लग गया।

31:56 ये बौद्ध प्रभाव हुआ। बौद्ध प्रभाव मतलब बुद्धि में तो हमारी बुद्धि में जो आए वही सही है ऐसा मान करके बौद्ध प्रभाव शुरू हुआ और जिसकी बुद्धि में जो आ रहा है वही कर रहा है तोपन बढ़ गया हरित भूमि संकुल समझि पर नहीं पंथ में पाखंड लुप्त हो सद ग्रंथ पाखंडवाद जब फैलता है तो सद ग्रंथ लुप्त हो जाते हैं वेद वेदांग दिखाई नहीं देते किसी को उस समय तो जो उनका गुरु कह दे काल नेमी वही सच लगने लगता है कि गुरु महाराज ने कहा है यही कहा होगा और प्राय ऐसे गुरु जो आपको अच्छा लगे वही कह देते हैं

32:44 आपको अगर कोई जो चीज आपको बुरी लगे वह कहे तो आप कितना मानोगे और अगर आपके को जो अच्छा लगता है वही कह दे आ हा सोने में सुगंध हो गई कि जो हमारा मन था वही आदेश भी हो गया गुरु गुरु महाराज का गुरु महाराज बड़े अच्छे हैं। तो पाप की ओर आपको जाने की अनुमति क्या बात तो यह जो पंथवाद है तरह तरह के पंथ जो उत्पन्न हो जाते हैं वह क्यों उत्पन्न होते हैं? यह इसीलिए उत्पन्न हो जाते हैं क्योंकि इनके अंदर जाने ईसाइयत क्यों फैल गई?

33:36 कि उन्होंने एक लुभावना नारा दे दिया। क्या दिया? उन्होंने कहा कि इस संसार में पाप कि हमारे पंच करते हैं खाने में चलने में जाता है हमारे द्वारा दिया जलाने से मर जाता

34:28 जो करना पड़ता है ईसाई धर्म वालों ने माने जो पाप पहले ईसा मसीह के पहले तक जितने लोग थे उन्होंने जो जो पाप किए थे सबका का पाप का प्रायश्चित उन्होंने कर लिया और उतना ही नहीं आगे आने वाले जितने भी लोग हैं उनके का प्रायश्चित उन्होंने कर लिया सूली आपको इतना ही करना है कि आप पे ईमान ले आइए बस

35:14 तो आपके पापों का प्रायश्चित तो वो कर ही चुके हैं अब पास रह जाएगा जो मांग में हो गए अब आपको करने की जरूरत नहीं है। अच्छा खड़े होके खा सकेंगे खड़े खड़े लघु शंका कर सकेंगे ऐसा ही हमने ड्रेस बनाया है जिसके ही सुविधा रहती है

36:01 मांसाहार बोले उसमें क्या बाधा है वो भी एक आहार है खाने पीने लगाए का वो भी तो मांस ही है जब उनका पुजारी भी पूजा करने ले ही लेता है सबके सामने अब कितनी सुविधा हो गई

36:49 ये नहीं खाओ ये नहीं क्यों बढ़ गई पापों का प्रायश्चित तो ईसा मसीह ने कर लिया अरे पाप हम करें प्रायश्चित वो कर और पाप कितना हो रहा है जितना को दूर करने में समर्थ है लेकिन ये सब कोई नहीं समझ

37:34 नहीं तो सुविधा हो गई और मांसाहार तो अनिवार्य है। शाकाहारी नहीं रह सकते हो। अगर आप मुसलमान बन तो आप यह नहीं कह सकते कि हम शाकाहारी हैं। बहुत मुसलमान शाकाहारी हैं। इच्छा से शाकाहारी हैं। धर्म उनको अनुमति नहीं देता है कि पक्के शाकाहारी रहो। इसलिए कभी खाना ही पड़ेगा अपनी। मुसलमानियत सिद्ध करने के लिए तो हमने आपको बताना चाहा और रोक टोक लगाने के कारण सनातन धर्म पीछे रह जाता है। आप में से कई लोग ये सवाल

38:22 पूछते हैं कि सनातन धर्म जब महान धर्म है। चार शंकराचार्य बैठे हुए हैं। तो फिर आखिर क्या कारण है कि सनातन धर्म पीछे रह जाता है और बढ़ जाते हैं। इसीलिए बढ़ जाते हैं। छूट देते हैं। करेले का जूस ले जाए आपके मोहल्ले में। का यह महात्मा

39:17 लेकिन फायदा किस में है? फायदा करेले में। तो समस्या यह है कि लोग फायदा नहीं सोचते। लोग जो है तात्कालिक स्वाद सोचते हैं। गए सारे पुण्य नष्ट हो जाते हैं। यह हम उपदेश वहां करें और उसी में एक चिलमात्मा भीड़ ज्यादा होगी। समझ रहे हो ना? तो इसलिए भीड़ से मत अनुमान लगाओ।

40:04 अगर आओगे तो गड़बड़ा जाओगे। जहांजहां भीड़ है समझ लो कि ज्यादा वो लेना होता है वो सच सच कहता है तो इसलिए

40:50 और ये जो मतवा आज उत्पन्न होते हैं, कल खत्म हो जाते हैं। आज उत्पन्न हुए कल खत्म हो जाते हैं। तो भले हमारे पास भीड़ ना हो लेकिन टिकाऊपन अगर किसी में है तो की शिक्षा जहां पर होगी वहीचार की शिक्षा नहीं होगी। वहां भले जाए लेकिन अशांति ही सदा बनी रहेगी। भगवान विष्णु जो मनमाना करने वाले लोग थे उनकी बढ़ोतरी होने लगी। ऐसा हो गया कि पूरे संसार में

41:38 माने पूरे देश में सनातन धर्म विलुप्त था। ग्रंथ अब मनमाने ग्रंथ आ गए जिसको देखो नाम वेद रख ले लिखेंगे हम रख देंगे वेद और ऐसे ही हो रहा है तो इससे क्या हुआ कि सनातन नकली गया जुड़ गया कोई उनके साथ जुड़ गया कोई उनके साथ जुड़ गया ऐसी परिस्थिति बन गई ऐसे ऐसे समय में भगवान विष्णु को चिंता हुई

42:24 चिंता हरण का कार्य ले साइड इफेक्ट तो लेकिन उसका साइड साइड इफेक्ट जो भी प्रति बेरुखी अपना ली इसलिए अब भेद मत आ गया तो वह भगवान विष्णु शंकर जी के पास गए। कहा महाराज आप फिर से भारत भूमि में अवतार धारण करिए। शिव जी ने कहा क्यों? कहा हमने बुद्ध अवतार धारण करके देवकारी सिद्धि के

43:09 लिए वेदों की निंदा कर दी। वेदों की निंदा करने के कारण मनुष्यों ने भी उसी बात और पकड़ कर के वह भी वेदों की निंदा करने लग गए हैं। फिर से करने के लिए आग लगाई है। कर लो। हम जाकर के वेदों के बारे में उल्टा कह के आए हैं। अभी हम अपनी बात के उलट कहेंगे तो प्रामाण्य नहीं रह जाएगा। इसलिए हमारे जाने से काम नहीं बनेगा। यह काम आपको करना होगा।

43:58 भगवान पर शंकर जी ने शंकराचार्य के रूप में अवतार धारण किया। उनके अवतार की कथा कि प्रदेश में रहती थी। उसी नदी के किनारे बड़ी शांति से जीवन बिताने वाले एक बड़े पवित्र दंपति ब्राह्मण दंपति रहते थे। क्या नाम था शिव गुरु आर्य के बड़े थे पूरा जीवन सुखपा समय आने लगा तो उनके मन में बात आई कि हमको संतान नहीं हुई

44:45 तो कि प्रभु संतान तो हो पवित्र देखो बात यह है कि अपनी कोख को पवित्र बनाए रखना बहुत जरूरी है। इसलिए जरूरी है कि जब किसी महान आत्मा को जन्म लेना होता है। महानि है ना जैसे किसी बड़े नेता को बड़े अधिकारी को आपके गांव में आना होगा तो देखें ना कि कहां ठहर सकते हैं। कहां हमारे लायक व्यवस्था होगी। उसी तरह से जब भगवान को या उनके अंश को या किसी महापुरुष को अवतार धारण करना होता है तो वह भी

45:31 देखते हैं कि किसकी कोख पवित्र है जिसकी कोख पवित्र होगी उसमें हम जाकर के अवतार धारण करेंगे। इसलिए जिन माताओं के मन में यह बात हो कि मेरे को पिता होना चाहिए। अवतार होना चाहिए। उन माताओं को अपनी कोख को पवित्र बनाए रखना चाहिए। तो जो माता आर्यंबा थी उन्होंने अपने पति शिव गुरु से कहा उन्होंने विशेष अनुष्ठान किया। इस अनुष्ठान से भगवान शिव प्रसन्न हो गए। रात को सपने में आए। दोनों के सपने में आए। कहा एक ही साथ दोनों से पूछा कि आप

46:18 प्रसन्न हैं। पुत्र तो तुमको होगा लेकिन दो है 100 साल तक जिएगा लेकिन मूर्ख होगा और एक बहुत कम दिनों तक जिएगा लेकिन तो बोलो तुम लोगों को कौन चाहिए? देखिए सपने में भी कितना समर्पण है। हमारे दंपति की बात है। सपने में भी शिव शंकर जी से कहते हैं और आर्य अंबा सपने में भगवान शिव को कहती हैं कि सवेरे में पतिदेव से सवेरा होते हैं। होता है। दोनों लोग उठते हैं। आपस में कहते हैं आज सपना आया भगवान

47:05 शिव पूछ रहे थे कहा तो क्या करना है तो दोनों ने आपस में करके तय किया कि भले अल्पायु हो लेकिन अच्छा विद्वान पुत्र है इसलिए हमें विद्वान पुत्र चाहिए तो उन्होंने उन्होंने प्रार्थना की हमने हमने आपस में सलाह कर ली है। हमें विद्वान पुत्र इसलिए संतान विद्वान होनी चाहिए। संतान सही नहीं होती।

47:51 अब वरदान तो मांग लिए। हो गया हुए सबको समझ में आ गया कि यह भगवान ही अवतरित हुए हैं। तीन वर्ष केरल भाषा में एक महाकाव्य लिख दिया ग्रंथ रचना कर दी

48:37 पता चला जिसने ग्रंथ लिख दिया तो जैसे आजकल भी कोई छोटा उम्र का बच्चा जैसे हमारा कौटिल्य कौटिल्य पंडित छोटी सी उम्र में यह बता देता था, यह बता देता था तो लोगों का आकर्षण हो जाता था। पूरे प्रदेश में फैल गई। कहते हैं कि 4 वर्ष की जब उनकी उम्र थी तब उन्होंने वहां के पंडितों से संवाद किया था और पांच वर्ष की जब उनकी उम्र हुई तब उनका उपनयन संस्कार करके उनको गुरुकुल में भेज दिया गया। गुरुकुल में एक वेद सांग पढ़ने पर 12

49:25 साल का समय लगता है। उन्होंने चारों होना चाहिए था 12 चौको 48 साल 48 साल में जो पाठ्यक्रम उनको पढ़ना चाहिए था 48 साल का पाठ उन्होंने तीन साल में पढ़ लिया अष्ट वर्षे चतुर्वेदी आठ साल की उम्र में आदि शंकराचार्य जी ने चारों वेदों का सांग अध्ययन कर लिया उनके जो विद्यालय के अध्यापक थे वह हाथ जोड़के खड़े हो गए कहा शंकर बोले जी गुरु जी बोलिए बोले बेटा जितना हम जानते थे सब हमने पढ़ा

50:10 दिया अब को पढ़ाने के लिए कुछ नहीं है तो शंकर ने कहा आपने हमको उपनिषद नहीं पढ़ाए हमें उपनिषद पढ़ाइए अध्यापकों ने कहा हम सदगृहस्थ हैं यह यह तो कोई यति सन्यासी ही पढ़ा सकता है। इसलिए किसी यति सन्यासी से सन्यास लेकर के पढ़ा जाता है। अभी तुम्हारे सन्यासी होने का मतलब है कि जैसे मेंढक उछल करके दूर चला जाता है। बीच की जगह को छोड़ देता है। ऐसे ही सामान्य नियम यह है कि ब्रह्मचारी से गृहस्थ, गृहस्थ से वानप्रस्थ और वानप्रस्थ से सन्यासी होना चाहिए। लेकिन विशेष नियम यह है कि अगर कोई चाहता

50:58 है तो सीधे ब्रह्मचर्य आश्रम से उछल करके सन्यास में चला जाए या वानप्रस्थ में चला जाए। गृहस्थ में तो सामान्य में ही जाता है। तो उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था है इसलिए मैं उपनिषद पढ़ना चाहूंगा। और वह तो सन्यास लेकर सन्यासी से पढ़ना पड़ेगा। कहा मैं सन्यास ले लूंगा। मां आपके पास आए। मां मैं सन्यास लेने जा रहा हूं। क्यों? कहा अब हमारी यहां की पढ़ाई पूरी हो गई। अब उपनिषद केवल बाकी है। उसको पढ़ने के लिए सन्यास मां बोली बेटा अभी तू आठ साल का है। कहां जाएगा? रास्ते बड़े घनघोर है। कोई बात नहीं। मैं जाऊंगा क्योंकि ज्ञान तो बहुत आवश्यक

51:46 वस्तु है। और मां तूने ही तो बताया था। पिताजी तो अब नहीं रहे लेकिन पिताजी और आपने मिलकर के हमको बताया था कि तय किया था कि हमें तो विद्वान पुत्र चाहिए तो मां नहीं पढूंगा तो मूर्ख रह जाऊंगा इसलिए तूने विद्वान पुत्र की कामना की थी तो विद्या अध्ययन के लिए जाने से मुझे मत रोक लेकिन मां तो मां होती है पति चल बसे थे अकेला बालक था कहने लगी बेटा तू चला जाएगा तो मेरी सेवा सेवा कौन करेगा? आचार्य शंकर ने कहा शास्त्रों में लिखा हुआ है कि जो धन लेता है वही सेवा करता है। तो जब मैं चला जाऊंगा सन्यास लेकर के

52:32 तो मेरा जो कुछ उत्तराधिकार में है मेरी जमीन मेरी जायदाद मेरा घर मकान सोना चांदी वो तो छोड़कर जाऊंगा सन्यास लेने तो जो कोई आएगा उसको लेने के लिए उसी का दायित्व होगा कि वह तेरी सेवा भी करें। इसलिए इसमें कोई दिक्कत नहीं है और भगवान का दिया अपने पास इतना है कि कोई भी आकर के उसको लेना चाहेगा तो जो लेगा वही तेरी सेवा कर देगा काहे को चिंता करती है मां ने कहा बेटा यह बता सेवा तो कर देगा कोई धन लेकर के लेकिन अग्नि संस्कार हर मां बाप की इच्छा होती है कि उनका बेटा उनका संस्कार करें क्या वह भी अब मुझे किसी दूसरे से करवाना पड़ेगा

53:18 बहुत मार्मिक बात कह दी तो भगवान शंकराचार्य ने कहा मां अब इतना तो तय हो गया कि अगर अग्नि संस्कार की बात ना हो तो तू मुझे जाने देना चाहती है। तो इसलिए ठीक है मैं वचन देता हूं कि चाहे जहां रहूंगा दिए गए वचन के अनुसार तेरा अंतिम समय आएगा तो तेरे सामने आऊंगा और तेरा अग्नि संस्कार भी मैं करूंगा चिंता मत कर लेकिन मां तो मां वो काहे को जाने दे उसने बोले ना सन्यास के लिए अनुमति मैं नहीं दूंगी और बिना अनुमति सन्यास होता नहीं है तो भगवान शंकर ने लीला रची दूसरे दिन सवेरे पूर्णा नदी में जब नहाने के लिए दोनों गए

54:04 तो एक मगरमच्छ ने इनका पैर पकड़ लिया और गहरे पानी की ओर घसीट करके ले जाने लगा शंकर चिल्लाए मां मां मां मगर ने पकड़ लिया। अब मां किनारे पर थी। कपड़ा पहन रही थी नहा के। यह तो छपछप खेल रहे थे। तभी मगर ने पकड़ लिया। अब ले अंदर जाने लगी। बोले मां मगरमच्छ से नहीं छुड़ा पा रहे हैं। मैं छुड़ा नहीं पा रहा हूं। मां भी दूसरों को बुलाती रही। और गहरे पानी में और गहरे पानी में मां अब तो प्राण जाना तय हो गया। क्या मेरी अंतिम इच्छा पूरी नहीं करेगी? मेरा सन्यास लेने का मन था। कम से कम अंतिम समय में तो बोल दे तो मैं सन्यासी हो जाऊं। तो माँ ने सोचा कि अंतिम इच्छा

54:51 पूरी कर दें बच्चे की पता नहीं बचे ना बचे। तो ऐसा मान करके कि अब इसका जीवन नहीं रहेगा। मां ने कहा बेटा मैं आज्ञा देती हूं। सन्यास ले ले। शंकर ने सुना और सुनकर के थोड़ी देर तक लीला करते रहे और फिर वह मगरमच्छ पैर छोड़कर के चला गया बोले मां पैर छूट गया मां तो बहुत खुश हो गई बाहर निकल कर के आए जहां दांत लगे थे पट्टी बांधी गई पट्टी बांध करके माता ने दो लोगों को बुलाया बोले शंकर को उठाकर ले चलो शंकर बोले मां कहां ले चलेंगे यह लोग का घर कहा मां अब घर में नहीं जाऊंगा। बोले क्यों? बोले अब तो मैं सन्यासी हो गया। अब

55:38 कर कैसे घर जाऊंगा? बोले कैसे सन्यासी हो गया? बोले अरे जब मगरमच्छ पकड़ के ले जा रहा था तब तूने आज्ञा दी थी कि ठीक है मेरी आज्ञा है और उसी समय मैंने तीन बार सन्यासो हम सन्यासो हम बोल दिया। सन्यासो हम बोल देने के बाद अब सन्यासी हो गया। आतुर सन्यास ऐसे ही होता है। हमारे यहां एक आतुर सन्यास है। बिना विधि के जिस समय वैराग्य प्रबल हो जाए। जैसे मुसलमानों में तलाक तलाक तलाक तीन बार कह देने से तलाक हो जाता है। ऐसे ही हम सनातन धर्मियों में कोई व्यक्ति विरक्त हो जाए और तीन बार बोल दे सन्यस्तोहम सन्यस्तोहम सन्यस्तोहम तो वह सन्यासी हो जाता है।

56:24 तो हम तो सन्यासी हो गए। अब हम घर नहीं जाएंगे। मां ने बहुत आग्रह किया लेकिन आचार्य शंकर नहीं माने निकल पड़े और वहां से चलकर के दक्षिण भारत से नर्मदा नदी के किनारे एक गुफा थी जिसके अंदर गोविंद पादाचार्य जी विराजमान थे वहां आए वहां पर उनसे सन्यास धारण किया वेदांत की शिक्षा ली और फिर उनके आदेशानुसार काशी गए काशी में रहकर के भाष्य पर चर्चा की वेदांत सूत्रों पर चर्चा की और फिर वही पर व्यास जी का दर्शन हुआ व्यास जी के आदेश से कि तुम हमारे सूत्रों पर भाष्य लिखो वहां से चलकर के हिमालय

57:10 ज्योतिर्मठ गए जहां पर ज्योतिर्मठ बना है और वहां पांच साल लगातार रह के भाष्य ग्रंथ लिखे जिनको शंकर भाष्य कहा जाता है उसी को आजई के रूप में सुना पढ़ा जाता है भगवान शंकर की शिक्षाएं उसी में निबद्ध हैं। उसी में उनका दर्शन बताया गया है। उन भाष्यों की रचना करके तब शंकराचार्य जी ने कहा अब क्या किया जाए? तब उन्होंने सब विद्वानों से पूरे भारत में शास्त्रार्थ के लिए यात्रा करना शुरू कर दिया कि भाई तुम झूठ क्यों बोलते हो? क्यों बरकरार रहे हो जनता को? सच बात है वह बताओ। कहते थे हम कह रहे हैं। बोले तुम कह रहे हो कैसे सच हो सकता

57:55 है। वो होगा। जो वेद कहेंगे तो वेद के अनुसार तुम्हारा धर्म नहीं है तो सब जगह जाते थे वेदों का प्रामाण्य स्थापित करते थे और सबको परास्त करते हुए भारत भर में भ्रमण किया और 772 मत उस समय के थे। सबको परास्त करके फिर से सत्य सनातन धर्म की उन्होंने स्थापना कर दी। उन्होंने कहा मैंने सत्य सनातन धर्म की स्थापना कर दी। वेद प्रमाण फिर से लोग मानने लगे कि वेद ही प्रमाण है। अगर वेदों में कहा गया है तब हम मानेंगे नहीं तो नहीं मानेंगे। जनता कहने लगी देखो बात यह है ना कि आप लोगों में से कई लोग हमसे पूछते हैं कि

58:41 अमुक ने ऐसा बताया है कि चार कोयले के टुकड़े ले लो तीन इमली ले लो और दो गुड़ की डली और एक ढेला नमक और सूफा में रख के बाई तरफ देखते हुए चले जाओ जो चौराहे पड़े उसी पर रख दो यह काम बन जाएगा। तो बताइए महाराज यह सही है कि नहीं है? ऐसा अगर कोई पूछे पूछते ही है मतलब हमने तो एक उदाहरण कहा ऐसे जाने कितनी बातें हैं। कोई भी आता है और कोई भी आपके बगल में बैठता है और कुछ भी बता के चला जाता है कि ऐसा है। आपका मन घूमने लगता है कि पता नहीं सही है कि गलत है। अब हम आपको बताना चाहते हैं कि शंकराचार्य जी ने क्या

59:27 किया। शंकराचार्य जी ने पहले यह सिद्ध किया कि वेद कोई सामान्य ग्रंथ नहीं है। यह ईश्वरीय वाणी है और अपरुषेय है। किसी व्यक्ति के द्वारा बनाई गई नहीं है। व्यक्ति के द्वारा बनाई गई होती तो कुछ ना कुछ इसमें व्यक्ति की कमजोरी आ जाती। व्यक्तियों की कोई कमजोरी इसमें नहीं है। यह ईश्वरीय वाणी है। इसलिए इसका एक अक्षर भी अनर्थक नहीं है। और इसमें जो कहा गया है वही परम धर्म है। तो जब यह बात निकल के आ गई तो लोग मानने लगे कि भाई वेदों के अनुसार जो बोलेगा वह धर्म है और जो वेद विरुद्ध बोलेगा वह अधर्म है। जनता को स्पष्टता हो गई। आज दोपहर की बैठक में आप लोगों ने पूछा था कि धर्म क्या है?

1:00:15 तो गार्गी जी ने यही तो बताया था कि वेद प्रणित धर्म अधर्म विपर अब बहुत साफ हो गया पहले पता ही नहीं चलता था कि धर्म क्या है अधर्म क्या है अब कम से कम यह पता है ना कि जो वेद कह रहा है वह धर्म है जब ये इतना स्थापित हो गया कि वेद जो कह रहा है वह धर्म है तो फिर भिड़ गए बोलो तुम्हारी जो बात है वह वेद अनुसार है कि वेद विरुद्ध है तो वेदानुसारी सिद्ध नहीं कर पाए तो परास्त हो गए जनता ने हटा दिया और इस तरह से वैदिक मार्ग की पुनः प्रतिष्ठा भगवान शंकराचार्य जी ने पूरे भारत में कर दी

1:01:01 करके जाने लगे कहने लगे अब हम जाएंगे कहां जाएंगे अपने लोक जाएंगे हमारे अवतार का प्रयोजन पूरा हो गया भगवान विष्णु ने हमसे कहा था कि हमने वेदों का प्रामाण्य थोड़ा सा कमजोर जोर शिथिल कर दिया है उसको फिर से जाकर के सुस्पष्ट कर दीजिए तो हमने वेदों का प्रामाण्य सुस्पष्ट कर दिया अब हम जाएंगे तो लोगों ने कहा महाराज आप अगर इतनी जल्दी 32 साल की 16 साल की उम्र थी 16 साल की उम्र में जाने लगे लोगों ने कहा महाराज अगर आप इतनी जल्दी चले जाएंगे तो आपने जिनको परास्त किया है फिर से सिर उठा लेंगे। आपके सामने दब गए

1:01:46 हैं। आपके खड़े हो जाएंगे। फिर मनमाना करने लगेंगे। तब तो भगवान शंकराचार्य ने कहा ठीक है। हम देश की चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना कर देते हैं। तो उन्होंने चार दिशाओं में चार। वेदों को आधार बनाकर के चार मठों की स्थापना कर दी और अपने अनुयायियों को कहा कि मेरे द्वारा स्थापित इन चार पीठों पर यह लक्षण होना चाहिए। सुच जितेंद्रिय वेद वेदांगद विशारदा योग्य सर्व शास्त्र नाम समदा स्थानयात मठामना महानुशासन बना करके बताया कि जो पवित्र हो जितेंद्रिय हो वेद वेदांग

1:02:33 का ज्ञाता हो और सभी शास्त्रों में समन्वय स्थापित करने की क्षमता रखने वाला सन्यासी हो वह मेरे पीठ पर बैठने का अधिकारी होगा और जो ऐसे लक्षण का संपन्न अधिकारी सन्यासी अभिषिक्त हो जाएगा हमारे पीठ पर वह कोई और नहीं होगा वह मैं ही होऊंगा की जय अहम एवं ऐसा समझना तो इसीलिए अब उनके पीठ पर जो ऐसे लक्षण वाला सन्यासी बैठता है उसका अपना नाम होता लेकिन उस नाम के बावजूद आप लोग क्या कहते

1:03:19 हो? कौन आए? शंकराचार्य आ रहे हैं। शंकराचार्य जी का दर्शन करने गए। शंकराचार्य जी से बात हुई। शंकराचार्य जी का प्रवचन सुना। इस तरह से आप व्यवहार करते हो। क्यों? इसलिए करते हो क्योंकि आदि शंकराचार्य जी ने कहा है कि उक्त लक्षण संपन्न जो सन्यासी मेरे पीठ पर बैठे उसको मैं ही हूं। ऐसा समझना। तो जो लोग आदि शंकराचार्य जी के प्रति आस्था रखते हैं वह उनकी बात में आस्था रखते हैं। बात में आस्था रखना ही तो आस्था रखना है और क्या आस्था है? तो उनकी बात में आस्था रख के चारों पीठों के जो एक के बाद एक होने वाले आचार्य हैं उनको शंकराचार्य के रूप में मानकर आज भी आप लोग

1:04:05 सनातनी लोग आराधना उपासना कर रहे हैं। और शंकराचार्य जब इस तरह से सनातन धर्म की प्रतिष्ठापना किए। उस समय इस देश में राजतंत्र था। सुध्मा नाम का चक्रवर्ती राजा था। पूरे देश का राजा था। सुध्मा ने उनके पास आकर के प्रार्थना की। शंकराचार्य जी तो सन्यासी थे। उनके पास यह चांदी का सिंहासन कहां और जरूरत भी क्या है इसकी सन्यासी को? छत्र की क्या जरूरत? चमवर की क्या जरूरत? छड़ी की क्या जरूरत? लेकिन सुधनवा ने प्रार्थना की कि महाराज धर्मोपदेश आप देते हैं। जनता जो है वह जब तक यह जानेगी नहीं कि यही हमारे धर्मोपदेशक हैं। तब तक वह आपकी बात भी

1:04:53 मानने में उतनी उत्सुक नहीं होगी। आज देखिए अपने देश में न्यायालय बना हुआ है। न्यायालय क्या बोरे पर बैठकर के न्यायाधीश निर्णय नहीं कर सकता? कर सकता है। लेकिन डेकोरम बनाया गया है कि एक कोर्ट होगा। उस कोर्ट में बहुत थोड़ा ऊंचा चबूतरा होगा। उस चबूतरे पर एक कुर्सी होगी। दूसरी कुर्सी नहीं होगी। और जब न्यायाधीश आएगा तो सब लोग खड़े हो जाएंगे। फिर वह बैठेगा। जब वह कहेगा कार्यवाही शुरू करो तब कार्यवाही शुरू होगी। जब कहेगा कार्यवाही बंद तो बंद हो जाएगी और जो आदेश देगा वह लागू हो जाएगा। तो जैसे उनका डेकोरम बनाया गया है ताकि लोगों को पता हो कि यह अधिकारी हैं निर्णय देने के। उसी तरह से महाराज आप भी हमारे शासक हैं। शंकराचार्य

1:05:43 जो हैं वो सीधे जनता का शासन नहीं करते। शंकराचार्य राजाओं का शासन करते हैं। विद्वानों का शासन करते हैं। की जय और राजा और विद्वान यह जनता का शासन करते हैं। तो इसीलिए एक विद्वान से कोई 10 लोग 20 लोग 50 लोग 100 लोग 10000 लोग 5000 लोग जुड़े हैं और वह शंकराचार्य जी से जुड़ा है तो शंकराचार्य जी की बात वह बताता है। इस तरह से यह शासन व्यवस्था चलती है और चलती चली आ रही है। हमारे सनातन धर्म में तीन राजा हैं। हम सब के तीन राजा हैं। एक राजा से हमारा काम नहीं चलता। इसलिए नहीं

1:06:28 चलता क्योंकि हमारे समाज में तीन तरह के लोग हैं। एक वह हैं जो पाप करते नहीं है और अगर हो जाए तो तुरंत आकर घर में बताते हैं कि हमसे तो आज यह गड़बड़ी हो गई। अपने गुरुओं से बताते हैं कि आज हमसे यह गड़बड़ी हो गई। पहले तरह के वह लोग हैं जो पाप करते नहीं और अगर कहीं भूल चूक से हो जाए तो तुरंत उद्वगन हो जाते हैं कि अरे हमसे गड़बड़ी हो गई। गड़बड़ी हो गई तो तुरंत अपने बड़े बुजुर्गों से बताते हैं और कहते हैं इसका कोई प्रायश्चित बता दीजिए। हम जब तक प्रायश्चित नहीं कर लेंगे हमको शांति नहीं मिलेगी। एक तरह के वह लोग हैं। उनका शासन गुरु करता है क्योंकि वह दोष करेंगे नहीं और कर देंगे तो तुरंत आकर

1:07:14 प्रायश्चित पूछ लेकर पवित्र हो जाएंगे। दूसरे वह लोग हैं जो पाप तो करते हैं लेकिन डंडे का भय उनको दिखाया जाए तो उससे विरत होते हैं माने पाप करने से उनको परहेज नहीं है लेकिन डरते हैं कि डंडा पड़ जाएगा इसीलिए नहीं करते हैं अन्यथा पाप करने में उनको दिक्कत नहीं है तो जो ऐसे लोग हैं जो गड़बड़ी कर सकते हैं लेकिन क्या करें डर है कि हम पकड़े जाएंगे फिर हमको पुलिस पीटेगी फिर हमको जेल हो जाएगी इसलिए चलो छोड़ो नहीं करते हैं। ऐसे जो लोग हैं उनका शासक राजा है। तो राजा दंड का भय दिखा के उनको काबू में रखता है। और तीसरे एक तरह के लोग हैं जो कहते हैं कि राजा को पता चलेगा तब ना हमको सजा देगा।

1:08:02 हम पता ही नहीं चलने देंगे और ऐसे ही गड़बड़ी कर लेंगे। गवाह होंगे। एक तो गवाह किसी को हम बिना देखे काम करेंगे। और अगर मान लो किसी ने देख भी लिया तो उसको धमका देंगे। चमका देंगे। रुपया पैसा देकर के फोड़ लेंगे, गवाह पलट देंगे और अंत में साबित नहीं होने देंगे कि हमने गड़बड़ी की। ऐसे भी लोग होते हैं। बंधुओं पहले हमने बताया कि जो लोग पाप करते नहीं लेकिन हो जाए तो उससे घबराते हैं और तुरंत प्रायश्चित करके शुद्ध होते हैं। वह तो गुरुओं के शासन में आते हैं। जो पाप करने से परहेज तो नहीं रखते लेकिन डंडे के भय से डरते हैं। वह राजा के अंडर में आते हैं। और जो ऐसे पापी

1:08:47 हैं जो पापाचार छुपा के कर लेते हैं। सोचते हैं कि किसी को पता नहीं चलेगा। वह यमराज के शासन में आते हैं। यमराज कैमरा लगा के रखते हैं। हर व्यक्ति के पीछे 13 कैमरे लगाए रखते हैं। आज देर हो गई है। कल हम 13 कैमरे बता देंगे आपको। कि कौन-कौन से कैमरे आपके पीछे लगे हैं और हर समय की रिकॉर्डिंग आपकी कर रहे हैं। स्टिंग ऑपरेशन आप सबका यमराज कर रहे हैं और घोषित रूप से कर रहे हैं। बिना बताए नहीं कर रहे हैं। बता के रखा है कि हम 13 कैमरे लगाए हैं। आप सीसीटीवी की नजर में हैं। संभल के रहिए लेकिन फिर भी आप भूल जाते हैं और गड़बड़ काम करते हैं। तो जब यमराज के दरबार में

1:09:35 जाएंगे तो वहां आपको खड़ा होना पड़ेगा। आपसे यमराज कहेंगे कि भाई आपने गड़बड़ी की तो आपकी आदत पड़ी है डिनाई करने की मना करने की तो आप कहेंगे नहीं नहीं हमने कुछ नहीं किया कहेंगे अच्छा चित्रगुप्त तो चित्रगुप्त देखेंगे चित्रगुप्त माने आप समझ लो चित्रगुप्त का मतलब गुप्त चित्र उल्टा करके बोला गया है वहां पर गुप्त फोटोग्राफ करके वीडियो करके रखे हुए हैं तो तुरंत वो डिस्प्ले कर देंगे बड़ी दीवार पर बड़े स्क्रीन पर दिखा दिखाई देगा एक एंगल से दूसरे एंगल से तीसरे एंगल 13 कैमरे हैं 13 एंगल से जब दिखाई देगा 14 एंगल से तब आपका सिर ऐसे हो जाएगा कि हां जी किया तो मानता हूं

1:10:24 और जैसे ही मानोगे मानना ही पड़ेगा वैसे आपको नरक के दूत आएंगे घसीट कर ले जाएंगे और जिस तरह का पाप होगा वैसे नर्क में धक्का मार के गिरा देंगे| वहां आप भोगना शुरू कर दोगे। तो इसलिए सनातन धर्म में तीन स्तर की शासन व्यवस्था है। इनमें सबसे बड़ी शासन व्यवस्था किसकी है? तो आपको हम बताना चाहेंगे इसमें सबसे बड़ी शासन व्यवस्था गुरु की है। क्यों? क्योंकि ज्यादातर लोग जो बता दिया जाए उसको मानने वाले हैं। आज भी आपको बता दिया जाए कि ऐसा करो तो आप कहेंगे हां करना चाहिए। बता दिया जाए कि यह मत करना तो नहीं करेंगे। थोड़े से लोग हैं जो गड़बड़ हैं। अधिक लोग पवित्र ह्रदय वाले

1:11:12 हैं। इसलिए गुरु का शासन ज्यादा है आज भी। इसलिए कोई पूछे कि शंकराचार्य कौन है? तो आप बता सकते हैं कि शंकराचार्य हमारे धर्म के सम्राट। धार्मिक मामले में शंकराचार्य हमारे सबसे बड़े राजा हैं। और शंकराचार्य का निर्णय सनातन धर्म में अंतिम माना जाता है। जैसे कोर्ट होती है ना लोअर कोर्ट होती है। फिर उसके ऊपर हाई कोर्ट होती है। फिर सुप्रीम कोर्ट होती है। ऐसे ही आपके यहां पुजारी हैं आपके मंदिर में। आपके गांव में पुरोहित हैं, कथा वाचक हैं। मठ है तो उसके महंत हैं। मंडलेश्वर हैं।

1:11:58 यह सब पदवियां हैं। लेकिन इन सब पदवियों के ऊपर शंकराचार्य की पदवी है। क्यों? क्योंकि अंतिम निर्णय शंकराचार्य का होता है। इसलिए शंकराचार्य के बारे में नीचे के किसी भी पदधारी धार्मिक को बोलने की छूट नहीं है। वो वो अवज्ञा मानी जाती है। अवहेलना मानी जाएगी। अवमानना मानी जाएगी कि जब शंकराचार्य जी ने कोई बात कह दिया तो फिर कोई महंत कोई मंडलेश्वर कोई पुजारी है तो वह अवमानना का केस बनता है समझ रहे

1:12:44 हैं तो इसलिए भगवान शंकर ने वेदों का प्रामाण्य स्थापित करने के लिए शंकर अवतार धारण किया और लोगों को सत्य सनातन धर्म की शिक्षा पुनः प्रदान की जो मतवाद तरह तरह के पाखंड फैले थे। वह पाखंड दूर हो गए। आज भी कमोबेश वैसी ही स्थिति है। आज भी पाखंडवाद फैला हुआ है। एक से एक मत मतांतर के लोग आ रहे हैं। कुछ भी कह रहे हैं। कबीर मनीष परिभ स्वयंभू वेद मंत्र आ रहा है। कबीर मनी कवि ही मनीष ऐसे दो शब्द हैं। एक शब्द है कवि ही दूसरा शब्द है मनीष। दोनों में संधि होगी संस्कृत व्याकरण के नियम के अनुसार और

1:13:31 संधि में र तो कवि ही जो है उसका विसर्ग र बन करके ऊपर चला गया तो हो गया कबीर मनीष अब इसी वेद मंत्र को दिखा के एक व्यक्ति टेलीविजन में कह रहा है कि देखो कबीर का नाम लिखा है कि नहीं वेद में कबीर का नाम कवि ही जो शब्द है उसको संधि में कबीर हो गया उसको है कि कबीर का नाम है कि नहीं है। और वह कहते हैं कि हम शास्त्रात की चुनौती दे रहे हैं। शंकराचार्यों को भी दे रहे हैं और सबको दे रहे हैं। और उनके पास भी बड़ी भीड़ इकट्ठा हो रही है। क्यों इकट्ठा हो रही है? क्योंकि यही समस्या है कि वह

1:14:17 सुविधाजनक मार्ग बता दे रहे हैं कि आपको कोई परहेज नहीं करना है। अंग्रेजी अपने देश में क्यों लोकप्रिय हो गई। जबकि उसमें कई ऐसी चीजें हैं जिनको खाना पीना हिंदू धर्म को समाप्त करता है। जाने किसका उसमें तो खून है। जाने किसका तो उसमें मज्जा है, मेद है और क्या-क्या उसमें मिलाया है चुरा करके। और जो कैप्सूल है उसमें तो गाय का भी अंश मिलाया जाता है जिलेटिन में। यह सब है लेकिन उसे सब खा रहे हैं। क्यों खा रहे हैं? कि इसमें परहेज नहीं करना पड़ता। आयुर्वेद में परहेज करना पड़ता है। तो यह जो आपका आलस्य है इसी के कारण आप सनातन धर्म को छोड़ रहे हो। अन्यथा सनातन धर्म से बढ़िया कोई धर्म

1:15:04 नहीं है। आपका कोई भाग्यशाली नहीं है कि आपको उत्तराधिकार में सनातन धर्म मिला हुआ है। किसी से मांग के जांच के लेना नहीं पड़ रहा है। उत्तराधिकार में सनातन धर्म मिला है। बाप दादा से मिला हुआ है। लेकिन दुर्भाग्य तो दुर्भाग्य ही होता है। तो बहुत से लोगों का दुर्भाग्य हो रहा है। आप सरल के चक्कर में पथ पड़िए। सत्य सस्ते के चक्कर में मत पड़िए। महंगा रोए एक बार सस्ता रोए हां इसलिए सरल के चक्कर में सस्ते के चक्कर में मत पड़िए। सत्य सनातन धर्म की शिक्षा जहां से दी जाती हो। ऐसे सनातन धर्म की शिक्षा लीजिए। और अब तो गिरावट यहां तक पहुंच गई है कि

1:15:52 शंकराचार्य तो छोड़ो। अब तो जो पाखंडी गुरु हैं उनसे शिक्षा लेते थे। अब उनसे भी बंद कर दिया है काफी सारे लोगों ने। अब तो सीधे नेताजी धर्म की शिक्षा ले ले रहे हैं। नेताजी खुद ही धर्म बता दे रहे हैं। धर्म बताएगा तो धर्म क्या होगा और उस पालन करने वाले धर्मी का क्या होगा। जब वकील जो है वह दवाई बताने लगे और जब डॉक्टर जो है मुकदमा बताने लगे तो समझ लो कि बांटाधार होने वाला है। ऐसे ही जब नेता धर्म बताने लग जाए तो समझ लो कि आपका बांटाधार होने वाला है। इसलिए धर्म के मामले में धर्माचार्य की बात

1:16:37 सुनिए। किसी दूसरे की बात मत सुनिए। और वह धर्माचार्य प्रमाणिक होना चाहिए। कहते हैं एक वाक्य में कुंजी यह है कि जब आपको कोई धर्म की बात बताए तो आप पूछिए कि आप यह जो बात बता रहे हैं किस शास्त्र में लिखा है वह बता दीजिए हम खोज लेंगे आजकल इंटरनेट पर शास्त्र भी मिल जाता है हालांकि सब सही नहीं मिलता है गलत भी मिलता है हम लोगों से कंफर्म कर सकते हैं आप जो बताने आए जैसे ही वह बताएं आपको खूब लोग धर्म बता रहे हैं आपको जैसे बताने आए बताइए किस शास्त्र में लिखा है। हम जरा उस शास्त्र में कन्फर्म कर लेंगे तब आचरण करेंगे। आप देखिए दूसरे दिन से वह बताना छोड़ देगा आपको धर्म क्योंकि उसको किसी शास्त्र का पता नहीं है। इधर उधर से सुन

1:17:25 के और उसी में अपना नमक मिर्ची मिलाकर आपको दे रहा है और आप इसीलिए रोगी हो रहे हो। दोषी हो रहे हो। इसलिए भगवान शंकराचार्य जी का यह कहना है आप शुद्ध सनातन धर्म को जानिए। जानकर के उसको जीवन में उतारिए। आपका कल्याण सुनिश्चित है। शंकराचार्य जी के बारे में थोड़ी बातें अपने लोग कल भी करेंगे और वो कैमरे जो 13 14 कैमरे लगाए हैं हम यमराज ने सबके स्टिंग ऑपरेशन के लिए कल वह भी बताएंगे कौन-कौन से कैमरे कहां-कहां फिट हैं। ठीक है यहां भी है देख लो।

1:18:13 कल बताया जाएगा शिव शिव शंभू हर हर महादेव शिव शिव शंभू हर हर महादेव शिव शिव शंभू हर हर [गाना गाने की आवाज़] महादेव शिव शिव शंभू हर हर महादेव शिव शिव [गाना गाने की आवाज़] शंभू हर हर [संगीत] महादेव शिव शिव शंभू हर हर हर महादेव शिव शिव शंभू हर हर महादेव शिव शिव शंभू [गाना गाने की आवाज़] हर हर महादेव हर हर महादेव बोलो परम पूज्य गुरुदेव भगवान की जय हो परम पूज्य गुरुदेव भगवान की

1:19:01 जय हो नमः पार्वती पतय हर हर महादेव

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