Bhagvati Sutra Vachana -210 I Shatak 9, Uddeshak 4 I Jun 20, 2026

संक्षिप्त सारांश

इस वीडियो में, डॉ. अरुनविजय म. ने केवली भगवंत के ज्ञान और उनकी देशना के प्रभाव को समझाया है। यह समझाया गया है कि किसी व्यक्ति को केवल भगवंत की देशना सुने बिना भी ज्ञान प्राप्त हो सकता है। इसके तहत विभिन्न आत्माओं की प्रकृति और उनके परिणामों पर चर्चा की गई है।

  • केवली भगवंत की देशना का प्रभाव।
  • विभिन्न आत्माओं की संज्ञा और उनके परिणाम।
  • उच्च भाव रखने वाले आत्माओं की विशेषता।

अभ्यंतर खाम

इस खंड में विभिन्न तात्त्विक विचारों पर चर्चा की गई है और बताया गया है कि कैसे आत्माएं केवली भगवंत की उपासना कर सकती हैं चाहे उन्होंने उनकी देशना पहले सुनी हो या न हो।

इच्छि

यहां इच्छा और उसकी प्रकृति को समझाया गया है। इच्छाओं के पीछे की तात्त्विकता को भी महत्वपूर्ण बताया गया है।

अपत्यम परिपत्यम

इस खंड में आत्मा के गुण और उनके प्रति अभिव्यक्तियों पर प्रकाश डाला गया है कि कैसे ये गुण आत्मा के विकास में सहायक होते हैं।

वयाव आलावे सलावे उचासने समास अंतर भाषाए

यहां विभिन्न भाषाओं के माध्यम से संवाद करने के महत्व को बताया गया है और समास की रचना पर जोर दिया गया है।

उरी भाषाए जज्ज विणय परिहण सुम बाहर त जाण

इस खंड में अच्छे संवाद के महत्व को समझाया गया है, जिसमें जज्ज और विनय की महत्वपूर्णता को चर्चा में लाया गया है।

अहम न जाणाम

यहां अपने स्वयं के ज्ञान की सीमाओं को पहचानने की महत्वपूर्णता को बताया गया है।

समच्छाम दुम वंदामि साह जी सुम

इस खंड में भक्ति और सेवा का महत्व दर्शाया गया है और जिनके प्रति यह समर्पण होना चाहिए, उनकी पहचान की गई है।

इच्छामिमासो

यहां इच्छाओं की प्रकृति और उनके परिणामों पर चर्चा की गई है, साथ ही बताया गया है कि इच्छाएं आत्मा के विकास में कैसे सहायक हो सकती हैं।

वंदे जाव नि वंदाम इच्छा संस भग व संस

इस खंड में वंदना और इच्छाओं के सामंजस्य के महत्व को बताया गया है।

इच्छा इच्छा खमासणो वंदे जाव

यहां इच्छाओं के महत्व और उनके साथ व्यक्ति की उदारता पर चर्चा की गई है।

भग पसाय करी वणा प्रसाद करा जी नमो अरताणं

इस खंड में श्रद्धा और प्रसाद की आवश्यकता पर जोर दिया गया है और यह बताया गया है कि इसके पीछे क्या विचार होते हैं।

नमो सिंम नमो

यहां नमो ग्रहण करने की प्रक्रिया और इसके उपयोगिता पर चर्चा की गई है।

नमो सबसा

इस भाग में प्रत्येक की महत्ता और उनके प्रति श्रद्धांजलि देने का महत्व बताया गया है।

पंच नम

यहां पंच नमों की प्रक्रिया और उनके लाभ को समझाया गया है।

पाव पणासन

इस खंड में भक्ति और उसकी प्रक्रियाओं का महत्व प्रस्तुत किया गया है।

मंगलम चिं

यहां मंगल और उसकी प्रक्रियाओं पर चर्चा की गई है, जिसमें शुभ भावों का संचार किया जाता है।

परम अभय मंगल

इस भाग में परम आनंद और उसके महत्व को समझाया गया है।

मंगलम भगवान विनो मंगल

यहां भगवान के मंगलमय गुणों की महत्ता पर चर्चा की गई है।

जय जग जो

इस खंड में जगत और उसकी सकारात्मकता का महत्व बताया गया है।

जग गुरु जगंद

यहां जगत के गुरुओं की महत्ता और उनके ज्ञान का वितरण किया गया है।

जगना हो जग

इस खंड में जीवन के उद्देश्य और उसके महत्व को स्पष्ट किया गया है।

जय जगिया

यहां जीवन की जय के पीछे की प्रेरणा पर चर्चा की गई है।

जय सुया

इस खंड में जीवन की सुगमता और उसके लाभों का वर्णन किया गया है।

पिनो

यहां पिनो की साधना की प्रकृति पर चर्चा की गई है।

जय जय गुरु लोग

इस खंड में गुरु की महिमा और उनकी पालन-पोषण प्रक्रिया का महत्व गया है।

जय मह

यहां महत्त्वपूर्ण विचारों पर प्रकाश डाला गया है।

सर्व प्रणाशन

इस भाग में प्राणियों के सर्व के प्रति सम्मान का ध्यान रखा गया है।

सर्व

यहां सर्वधर्म के प्रति ध्यान और उसके महत्व पर चर्चा की गई है।

निधान

इस खंड में निधान की प्रक्रिया और उसके लाभ को स्पष्ट किया गया है।

श्री गौतम स्वामी

यहां गौतम स्वामी के ज्ञान और उनके योगदान का उल्लेख किया गया है।

श्री सुध स्वामी

इस भाग में सुध स्वामी की महत्ता और उनके ज्ञान को समझाया गया है।

अज्ञान निराम

इस खंड में अज्ञान से मुक्ति की प्रक्रिया को बताया गया है।

ज्ञान जन

इस खंड में ज्ञान प्राप्ति के विभिन्न मार्गों का उल्लेख किया गया है।

नेत्रम

यहां नेत्रम का महत्व और उसके प्रकाश को समझाया गया है।

तस्म श्री गुरुवे नमवी

इस भाग में गुरु के प्रति सम्मान को दर्शाया गया है।

साह जी आज हमारी भगवती सूत्र की

इस खंड में भगवती सूत्र के अध्ययन और उसके उद्देश्यों पर चर्चा की गई है।

आज जून है

यहां जून के महत्व और अध्ययन की प्रक्रियाओं को दर्शाया गया है।

शनिवार के दिन हमारी तीसरी क्लास इस समय

इस खंड में कक्षाओं के समय और इनके उद्देश्यों को स्पष्ट किया गया है।

आगम वाचना की है। आगम वाचना के अंदर भगवती

यहां आगम वाचन के महत्व को बताया गया है, जिसमें भगवती सूत्र का उल्लेख है।

सूत्र का इस समय एक दवा

इस खंड में सूत्र के अध्ययन की प्रक्रिया को समझाया गया है।

शतक का शतक चल रहा है और उपदेशकवा

यहां उपदेशक के कार्यों और उनकी प्रक्रिया की चर्चा की गई है।

से विनती करूंगी कि वो पिछले क्लास की

इस खंड में पिछले कक्षा की संक्षिप्तता की मांग की गई है।

समरी हमें बताएं।

इस खंड में पिछले पाठ की संक्षिप्ति की मांग की जा रही है।

विवा बहन

यहां एक अन्य भला विचार प्रकट किया गया है।

खूब आभार हिना बहन मध्य वंदा साहिब जी

सभी सदस्यों का आभार प्रकट किया गया है।

और सभी को प्रणाम

इस खंड में सभी के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया गया है।

साहिब जी ने लास्ट क्लास में भगवती सूत्र

यहां पिछले पाठ का संक्षिप्तीकरण किया गया है।

के नौवे शतक का चौथे उद्देश्य में समझाया

इस खंड में नौवे शतक के चौथे उद्देश्य का विवरण दिया गया है।

था और उसमें बताया था कि गौतम स्वामी

यहां गौतम स्वामी और उनके ज्ञान को संदर्भित किया गया है।

महावीर प्रभु को प्रश्न पूछ रहे हैं कि हे

इस खंड में महावीर प्रभु से संबंधित प्रश्नों की चर्चा की गई है।

भगवंत जो केवली भगवंत के साथ विचरण कर रहे

यहां केवली भगवंत के साथ विवेचना का महत्व बताया गया है।

हैं जो केवली भगवान के पाक्षिक उपास उपासक

इस खंड में उपासक और उनके महत्व का उल्लेख किया गया है।

हैं श्रावक है श्राविका हैं पाक्षिका

यहां श्रावक और श्राविका की महत्ता पर चर्चा की गई है।

उपासिका है वो सब केवली भगवंत की देशना

इस खंड में उपासिका का महत्व और उनके कार्यों की चर्चा की गई है।

धर्म श्रवण किए बिना ही क्या उनको ज्ञान

यहां ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रियाओं पर चर्चा की गई है।

दर्शन हो जाता है क्या सम्यक दर्शन हो

इस भाग में दर्शन के महत्व को समझाया गया है।

सके मति श्रुत

यहां मति श्रुत का महत्व बताया गया है और उनके सम्मिलन पर चर्चा की गई है।

अवधि मनोपर्य ज्ञान हो सकता है तो भगवान

इस खंड में भगवान महावीर द्वारा ज्ञान की दृष्टि पर जानकारी दी गई है।

महावीर समझा रहे हैं कोई जीव लघुकर्मी हो

यहां लघुकर्मी की स्थिति और उनके गुणों की चर्चा की गई है।

और वेयावच तप आदि अन्य तरीके से कर्म

इस खंड में कर्मनिर्जरा के विभिन्न तरीके बताए गए हैं।

निर्जरा करें तो उनको भी सम्यक दर्शन

यहां वर्णित किया गया है कि कर्मनिर्जरा कैसे संभव है।

मति श्रुत आदि चार ज्ञान भी हो सकता है।

इस खंड में चार ज्ञान के प्राप्ति की प्रक्रिया को स्पष्ट किया गया है।

गौतम स्वामी भगवंत को पूछ रहे हैं हे

यहां गौतम स्वामी के प्रश्न और उनके उत्तरों पर चर्चा की गई है।

भगवंत केवली की देशना सुने बिना किसी को

यहां केवली की देशना का महत्व बताया गया है।

केवल ज्ञान हो सकता है और नहीं भी हो सकता

इस खंड में केवल ज्ञान प्राप्ति की संभावनाओं पर चर्चा की गई है।

गौतम स्वामी पूछ रहे हैं हे भगवंत केवली

यहां सवाल और उनके संभावित उत्तरों की पुनरावृत्ति की गई है।

भगवान बता रहे हैं सबकी निर्जरा एक सरी की

इस खंड में निर्जरा की समानता के विषय में चर्चा की गई है।

नहीं होगी सबकी अपनीपनी आराधना उपासना

यहां अलग-अलग आत्माओं की आराधना की प्रक्रियाओं पर चर्चा की गई है।

अपने भाव के परिणाम के ऊपर आधारित है।

इस खंड में भाव और उसके परिणामों का महत्व बताया गया है।

किसी के भाव बहुत उच्च कक्षा के तीव्र होते हैं

यहां भाव की तीव्रता पर चर्चा की गई है।

और किसी के भाव बिल्कुल नहीं होते हैं।

इस खंड में विभिन्न प्रकार के भावों पर निराकरण किया गया है।

तो इस इसीलिए सबकी निर्जरा एक सरी की नहीं होगी।

यहां निर्जरा की वैविध्यता पर चर्चा की गई है।

गौतम स्वामी पूछ रहे हैं कि हे भगवंत

यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया गया है।

केवली पाक्षिक उपासक और उसके साथ धर्म

इस खंड में धर्म और उपासना का महत्व समझाया गया है।

श्रवण किए बिना ही क्या कोई जीव प्ररूपित

यहां जीवों के ज्ञान की पहचान की गई है।

[धर्म श्रवण प्राप्त करता है? क्या शुद्ध](https://www.youtube.com/watch?v=iMxad0dToEw&t=337s

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Transcript

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0:00 अभ्यंतर खाम इच्छि अपत्यम परिपत्यम वयाव आलावे सलावे उचासने समास अंतर भाषाए उरी भाषाए जज्ज विणय परिहण सुम बाहर त जाण अहम न जाणाम समच्छाम दुम वंदामि साह जी सुम इच्छामिमासो वंदे जाव नि वंदाम इच्छा संस भग व संस

0:46 इच्छा इच्छामिमा समो वंदे जाव जाए वंदामि इच्छा कारण संस भग वो इच्छा इच्छा खमासणो वंदे जाव वंदामि भग पसाय करी वणा प्रसाद करा जी नमो अरताणं नमो सिंम नमो नमो नमो सबसा पंच नम पाव पणासन मंगलम चिं परम अभय मंगल

1:32 मंगलम भगवान विनो मंगल जय जग जो जग गुरु जगंद जगना हो जग जय जगिया जय सुया पिनो जय जय गुरु लोग जय मह सर्व प्रणाशन सर्व निधान श्री गौतम स्वामी

2:19 श्री सुध स्वामी अज्ञान निराम ज्ञान जन नेत्रम तस्म श्री गुरुवे नमवी साह जी आज हमारी भगवती सूत्र की आज जून है शनिवार के दिन हमारी तीसरी क्लास इस समय

3:05 आगम वाचना की है। आगम वाचना के अंदर भगवती सूत्र का इस समय एक दवा शतक का शतक चल रहा है और उपदेशकवा है जी से विनती करूंगी कि वो पिछले क्लास की समरी हमें बताएं। विवा बहन खूब आभार हिना बहन मध्य वंदा साहिब जी और सभी को प्रणाम साहिब जी ने लास्ट क्लास में भगवती सूत्र के नौवे शतक का चौथे उद्देश्य में समझाया था और उसमें बताया था कि गौतम स्वामी महावीर प्रभु को प्रश्न पूछ रहे हैं कि हे भगवंत जो केवली भगवंत के साथ विचरण कर रहे

3:53 हैं जो केवली भगवान के पाक्षिक उपास उपासक हैं श्रावक है श्राविका हैं पाक्षिका उपासिका है वो सब केवली भगवंत की देशना धर्म श्रवण किए बिना ही क्या उनको ज्ञान दर्शन हो जाता है क्या सम्यक दर्शन हो सकता है मति श्रुत अवधि मनोपर्य ज्ञान हो सकता है तो भगवान महावीर समझा रहे हैं कोई जीव लघुकर्मी हो और वेयावच तप आदि अन्य तरीके से कर्म निर्जरा करें तो उनको भी सम्यक दर्शन मति श्रुत आदि चार ज्ञान भी हो सकता है। गौतम स्वामी भगवंत को पूछ रहे हैं हे भगवंत केवली की देशना सुने बिना किसी को केवल ज्ञान हो सकता है। तब भगवंत कह रहे

4:41 हैं कि केवली की देशना सुने बिना केवल ज्ञान हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है। गौतम स्वामी पूछ रहे हैं हे भगवंत केवली भगवंत के सानिध्य में आए सभी जीव समोवसरण में एक सरी की देशना सुन रहे हैं तो क्या सबको निर्जरा एक सरी की होगी तो भगवंत बता रहे हैं सबकी निर्जरा एक सरी की नहीं होगी सबकी अपनीपनी आराधना उपासना अपने अपने भाव के परिणाम के ऊपर आधारित है। किसी के भाव बहुत उच्च कक्षा के तीव्र होते हैं और किसी के भाव बिल्कुल नहीं होते हैं। तो इस इसीलिए सबकी निर्जरा एक सरी की नहीं होगी। गौतम स्वामी पूछ रहे हैं कि हे भगवंत

5:29 केवली पाक्षिक उपासक और उसके साथ धर्म श्रवण किए बिना ही क्या कोई जीव प्ररूपित धर्म श्रवण प्राप्त करता है? क्या शुद्ध बोधी सम्यक दर्शन प्राप्त करता है? या कोई मुंडन कराकर अणगार साधु बन सकता है? क्या ब्रह्मचर्य कारण कर कारण करा सकता है? तो भगवंत कह रहे हैं हे गौतम कोई जीव स्वयं ही संयम ले सकता है। कोई नहीं भी ले सकता है। कोई संयम द्वारा संयत रहदात करता है और शुद्ध संवर में समृद्ध होता है। शुद्ध से अधिक शुद्ध ज्ञान उत्पन्न होता है। चारों ज्ञान और केवल ज्ञान भी उत्पन्न करता है। साहिब जी ने हमें समझाया था कि सभी जीवों के अपने-अपने कम ज्यादा भाव परिणाम होते हैं और आत्मा के आवरणीय

6:14 कर्मों की निर्जरा के हिसाब से ही चेंजेस होता रहता है। मिथ्यात्व से सम्यक दर्शन विभंग ज्ञान से अवधि ज्ञान हो सकता है। इसके लिए क्रोध, मान, माया, लोभ के काय की मंदता होनी जरूरी है और गुणों का उपार्जन करना जरूरी है। गुणों को नहीं बढ़ा सके तो निर्जरा नहीं कर पाएंगे। आगे साहिब जी आप हमें समझाएं। बहुत-बहुत धन्यवाद। देखिए विनय भाई थोड़ा ध्यान देना समझना। इस उद्देश्य का नाम ही ऐसा है। 31वा उद्देश्य है असोचा केवली। केवली भगवान को अगर हमने नहीं भी सुना है, केवली की देशना नहीं सुनी है, क्या तो भी

6:59 कुछ परिणाम आ सकते हैं? यह बात बता रहे हैं यहां पर। अब बात किसके लिए है? कौन-कौन है? केवली आदि तो 10 महापुरुष है। अब वो कौन-कौन है? केवली खुद हो केवली के श्रावक हो केवली की श्राविका केवली के उपासक हो केवली के उपासिका हो केवली पाक्षिक स्वयं बुद्ध जो होते हैं वो केवली पाक्षिक के श्रावक केवली पाक्षिक की श्राविका केवली पाक्षिक के उपासक केवली पाक्षिक के उपासिका अब इस तरह से यहां पर जो जो भी जनरली 99% क्या होता है केवल ज्ञान जिस किसी को भी हो ख्याल आया

7:47 केवल ज्ञान कितने किस किस को हो सकता है बोलो विजय भाई ख्यालमा से जी मनुष्य कोई हो सकता है बोलो निखिल भाई बोलो क्षय सम जिसने पाया हो मनुष्य उसको हो सकता है। केवल ज्ञान तीर्थंकर को कंपलसरी होना है। केवल ज्ञान गणधरों को कंपलसरी होना ही होना है। केवल ज्ञान आचार्य भगवंतों को पॉसिबल है। उपाध्याय जी को संभव है। साधु महाराज को संभव है। साध्वी जी को संभव है।

8:33 दीक्षा ना लिए हुए श्रावक को भी संभव है। श्राविका को भी संभव है। संभावनाएं जो बताई है आपने भी सुना है भरत चक्रवर्ती को केवल ज्ञान हुआ वे दीक्षित साधु नहीं थे फिर भी विवाद से हां जी अब सिर्फ केवल तीर्थंकर भगवान के लिए स्पेशल नियम स्पेशल नियम क्या है उनके लिए उनको जब केवल ज्ञान हो जाएगा तीर्थंकर को तभी देवता केवल ज्ञान कल्याणक मनाने के लिए आएंगे उसमें समवसरण की रचना है। अब यह किसका प्रभाव है? तीर्थंकर नाम कर्म की पुण्य प्रकृति का स्वभाव है। लेकिन वे ही

9:21 देवता अन्य किसी को केवल ज्ञान हो जाए तो समवसरण बनाने नहीं आते हैं। उनकी देशना सुनने के लिए 12 परसदा या समवसरण नहीं बनता है। गणधरों को हो जाए केवल ज्ञान तो सुवर्ण कमल की रचना करेंगे। वहां बैठकर के रचना दे देंगे। लेकिन बाकी सबके लिए कोई संभावना नहीं है। जिसको जिसको आपको अपने अपने तरीके से हो जाए हो जाए। अब दूसरों के लिए यह नियम जरूरी नहीं है कि केवल ज्ञान होते ही वेष ना दे। सिर्फ और सिर्फ तीर्थंकर के लिए नियम कंपलसरी है कि केवल ज्ञान होते ही देवताओं

10:09 द्वारा बनाए गए समवसरण में ही देश ये नियम उनके लिए फिक्स हो गया कंपलसरी हो गया है बोलिए बाबा जी ख्याल आ गया आपको जी साहब जी जब भी तीर्थंकर को केवल ज्ञान होगा तभी ही देवता आएंगे समोसरण बनाएंगे और कंपलसरी तीर्थंकर उसी समवसरण में ही देशना देंगे। इसी को कहते हैं केवल ज्ञान कल्याणक बनाना। आप समझ गए कल्याणक के रूप में मनाना मतलब क्या करना है उनको? समवसरण बनाना। भगवान के चौक रूप करने भगवान समवसर में आवे। भगवान देशना देवे। जगत के सब जीव देशना सुने।

10:56 अब भगवान का अपना अतिशय भी है। देवता अतिशय में भी अपनी तरह से सहयोग कर रहे हैं। तो भगवान की देशना जो जिस तरह से फैलती है। पशु पक्षी के जीव देव गति के देवी देवता मनुष्य के मनुष्य जीव नर नारी 12 वर्षदा में बैठते हैं और तीर्थंकर भगवंत की केवली की देशना सुनकर निश्चित रूप से किसी को सम्यक दर्शन किसी को सम्यक ज्ञान किसी को चारित्र भाव किसी को दीक्षा लेना किसी को व्रत नियम इसलिए भगवान चतुर संगति स्थापना करके के धर्म की स्थापना करते हैं जो हम रोज बोलते हैं कि नहीं बोलते दम पित्त यरे

11:42 जिम धर्म तीर्थ की स्थापना करने वाले अब वो केवली है अब बात कहां आ रही है अन्य भी केवली जो हो गए साधु साध्वी श्रावक श्राविका जो भी उन केवली भगवंतों के पास कोई आकर बैठे कोई श्रावक आकर बैठे कोई श्राविका आकर बैठे, कोई साधु आकर बैठे, कोई साध्वी आकर बैठे, कोई देवी देवता आकर बैठे, कोई मिथ्या आकर बैठे, कोई अवधि ज्ञानी आकर बैठे, कोई विभंग ज्ञानी बैठे। तो अब मान लो कि केवली भगवान ने अभी देशना शुरू भी नहीं की। केवली भगवान ने अभी तक कोई देशना दी नहीं

12:28 है। और बिना सुने ही किसी को असर हो सकती है क्या? बोलो विजय भाई ध्यान दिया अब पॉइंट आया है आज का कांसेप्ट जो है टॉपिक क्या है केवली भगवान की देशना सुने बिना ही किसी को कुछ भी चेंजेज परिवर्तन पॉसिबल है कि नहीं ये है विषय अब इससे यहां पर जो बात की गई अलग-अलग तो ये कौन-कौन केवली वाले हैं ऐसा और कौन-कौन केवली भगवान के पास आने वालों में है और कौन-कौन के भगवान की देशना सुनने वालों में अब बात कहां चल रही है वो देखिए सुने कोई जीव देव गति से देवता आ गए

13:18 कोई जीव महा विदेश से आ गए कोई वहां से आ गए कोई यहां से आ गए अब कौन आए हैं सब्जेक्ट में अब ये कोई देवता का जीव है देवी देवता जो भी हो अब ये उनका जीव यहां आ के अब वहां से ही पूर्व जन्म से ही बहुत कुछ अशुभ कर्मों की निर्जरा करके आया। कोई यहां पर जो है महावि से चल के आ जाए और वह आकर के तो अब उनके अंदर पूर्व जन्म के संस्कार है कि नहीं है?

14:06 ख्याल आया कि नहीं? कोई महादे में सिमंदर स्वामी की देशना बरसों तक सुनने के बाद आयुष पूरा हो गया और कोई यहां आकर भरत क्षेत्र के अंदर मनुष्य बन गया। तो पूर्व जन्म के महावि में देशना सुनी है संस्कार तो है। अब वह अपने परिवार की पारिवारिक परिस्थितियों आदि के कारण सिमंदर स्वामी के पास देशना दीक्षा नहीं ले सका। ठीक है? कोई हरकत नहीं। नहीं नहीं ले सका। वह यहां आए और उनको कोई केवल ज्ञानी मिल गए और अभी उन्होंने देशना प्रारंभ भी नहीं की हो और वो बैठ के सुन के कोई उसके भाव परिणाम ऊंचे चढ़ जाए तो रिजल्ट आता है कि

14:55 नहीं आता है। पहले इन बातों को समझ लो। आपको यह ख्याल आएगा अच्छी तरह से कि कौन-कौन से जीव कैसे जीव समझे कि नहीं। तो यहां पर यह भी कहते हैं कुछ बातें यह भी ध्यान ले लो कि जिसके अंदर अब ये जो भी जीव आए हो समझे कि नहीं। अब वो कोई यहां पर प्रकृति से ही सरल आत्मा बाय नेचर बहुत ही सरल आत्मा है। बहुत ही अच्छा जो है विनय आत्मा है। बहुत ही अच्छा विवेकी आत्मा है। बहुत ही अच्छा सद्भाव वाला है।

15:44 पूज्य भाव वाला है। अहो भाव वाला हो जो आया है जीव जहां से जो आया है वहां इस प्रकार का उसका जीवन था लेकिन आयुष समाप्त हो गया और भले देव गति से आया हो लेकिन देव गति में रह के देवलोक का वो देवता जो है वो भी महाविद में श्रीमंदर स्वामी के यहां देशना सुनने जाता था वो श्रीमंदर स्वामी के जन्म कल्याणक आदि प्रसंगों में जाता था मेरु पर्वत पर जाकर के परमात्मा के अभिषेक करके आया हो अब सोचिए समझे कि नहीं और वो यहां आकर के

16:32 जिस तरह से आज यहां आया हो अब उसके अंदर पूर्व जन्मों की की हुई आराधना मान लो कि आप धर्म आराधना नहीं कर रहे हो लेकिन आप स्वभाव खराब करके नए कर्म भी नहीं बांध रहे हो। बोलिए प्रवीण जी दो में से कौन आपको ज्यादा उचित अच्छा लगे? जिसने सवा साल नहीं किया। हां जी। किसको ध्यान में आया? वीणा बहन जी दो मैंने प्रश्न पूछे। ख्याल आया? नहीं चलो बोलिए जी आपके क्या ख्याल है जी

17:21 आपने पूछा कि जो आए हैं श्री स्वामी की सुनकर सरल स्वभाव के है लेकिन धर्म नहीं कर रहे हैं जिसने धर्म किया हो वो धर्म नहीं किया लेकिन स्वभाव खराब करके पाप नहीं दूसरे गलत काम नहीं किए साहब धर्म नहीं किया हो लेकिन अपना स्वभाव खराब करके ना करने के गलत पाप ना किए हुए हो तो ऐसा जीव जब केवली के सामने आ जाए बात क्या चल रही है ध्यान रखना केवली की देशना अभी तो सुनी भी नहीं है बिना सुने ही क्या ऐसे जो हो सम्यक दर्शन

18:11 हो सकता है क्या ऐसे जीवो को सम ज्ञान हो सकता है? क्या ऐसे जीव श्रावक बन सकते हैं? क्या ऐसे जीव दीक्षा लेकर साधु बन सकते हैं? पहले वो ध्यान में रखिए बिना देशना सुने। ख्याल आया कि नहीं? क्यों मैंने कहा सभी केवली होते हुए तुरंत देशना देंगे ही। ऐसा नियम नहीं है। लेकिन तीर्थंकर भगवान केवली होते ही तुरंत देशना अवश्य अनिवार्य रूप में देंगे ही देंगे। उनके लिए ऐसा नियम व्यवस्थित है। बोलो विजय भाई बोलो।

18:59 सर जी केवली देशना देते नहीं है लेकिन उनकी लेष्या का जो इफेक्ट होता है निमित्त नहीं काका क्यों ले क्यों शब्द बोला ऐसी गलती बोलिए सीमा बहन जी ध्यान में शब्द सही पकड़ो सभी खेवली होते हुए देशना दे यह नियम नहीं है लेकिन तीर्थंकर भगवान साथ ही देशना देते हैं यह नियम है तीर्थंकर भगवान को केवल ज्ञान होगा वे तुरंत देशना देंगे ही देंगे कंपलसरी देंगे लेकिन अब बाकी के भी तो है ना बाकी के दूसरे भी तो बहुत है इस समय वर्तमान प्रेजेंट टाइम के अंदर पांच महा

19:47 विद क्षेत्रों में तीर्थंकर भगवान सिर्फ 20 ही है और बाकी के केवल ज्ञान प्राप्त कर चुके ऐसे जो है पांचो महाविय में दो करोड़ केवली है प्रवीण जी बोलो थोड़ा जागते रहना आज महाद क्षेत्र में दो करोड़ केवली है 20 तीर्थंकर भगवान है अब वहां पर क्या है 20 तीर्थंकर है तो रोज उनके समस बनेंगे रोज देश डालेंगे अब बताइए दो करोड़ केवलियों का केवली दो करोड़ तीर्थंकर के सिवाय दूसरों

20:34 के लिए समवसरण नहीं अब बाकी दो करोड़ केवल ज्ञानी रोज देशना देवे या ना भी वो जहां जिस रूप में विचरण करते हो विहार करते हो आते जाते हो जहां पर भी तो एक एक तीर्थंकर के पास एक एक तीर्थंकर के साथ 10 लाख केवल ये फिगर सुनिधि पहले आप अभी आज एट प्रेजेंट श्रीमंदर स्वामी के पास 10 लाख केवली भगवंत विचरण कर रहे युगंदर स्वामी के पास 10 लाख केवली विचरण

21:19 कर रहे हैं। बा स्वामी के पास 10 लाख केवली विचरण कर रहे हैं। सुबाहु स्वामी के पास 10 लाख केवली विचरण कर रहे हैं। हमारे जंबू द्वीप के एक महाविदेह के अंदर चार विजयों में 40 लाख अब ये तो पॉसिबल नहीं है कि 10 लाख 40 लाख केवल सभी एक साथ में एक ही साथ में रहेंगे। ये तो पॉसिबल नहीं है। विहार करेंगे विचरण करेंगे जाएंगे आएंगे जहां जाएंगे साथ। अब जहां पर संयोग परिस्थितियां जिस प्रकार की जैसी हो कोई देशना देंगे कोई नहीं भी देंगे लेकिन अब केवली भगवंत तो आ गए और उन्होंने

22:05 देशना नहीं भी दी है और कोई मिथ्या जीव आए कोई आकर के बैठे कोई साथ में जुड़े कोई मिले हे भगवान क्या ऐसे जीवो को कुछ असर होगी जरूर होगी अब जो पिछले जन्म से ही कोई अपने साथ में यह कर्म घटाते घटाते आए हो सरल आत्माएं वो तो सम्यक दर्शन भी पा सकती है। ग्रंथि भेद भी कर सकती है। मिथ्या तो मोहनीय कर्म भी उनका टूट सकता है और सम्यक दर्शन भी हो सकता है। तो यहां प्रश्न पूछ रहा है कि भगवान ये कैसे अभी तो केवली ने देशना भी नहीं ली।

22:51 बोले कोई हरकत यह नहीं है कि केवली के प्रभाव से हो रहा है। यह नहीं है कि केवली कोई जादू कर रहे हैं। ऐसा मत सोचना। वो जीव जो है प्रकृति से सरल है विनय है विवेकी है क्या खुद की अपनी समता आदि जो भी गुण है पूज्य भाव है अहो भाव है केवली भगवंत के प्रति उसके कसाय जो है अपने आप में उपशांत हो गए सब बहुत ही मंद कसाय उसके उपशांत हो गए काम भोग की वासना उसकी बहुत घट गई है सब शुद्ध आचार धर्म का पालन अच्छी तरह से करता हो। शुभ अध्यावसाय उसके बहुत अच्छे

23:40 हो। ये भाव देखिए समझ शक्ति उसकी बहुत अच्छी हो और सुंदर परिणाम उसके बहुत अच्छे भाव और उसके भावों में जो है विशेषता हो। ऐसे आत्मा को कई बार जो है बिना केवली की देशना सुने दर्शन करते करते वंदना करते करते भी कर्म की निज्रा होती है। यह दिखा आप समझो ध्यान से। केवली के दर्शन से निर्जरा हो रही है। केवली को वंदना करने से निर्जरा हुई।

24:26 करने से निर्जरा हो रही है। केवली भगवंतों को आहार पानी आदि का दान करके केवल निर्जरा हो रही है। उनके कर्म क्षय इधर देखिए पहले सिर्फ पुण्य की बात नहीं चल रही है। आप केवली भगवंत को देखकर उनके दर्शन वंदन से आप यह सोचो खाली पुण्य पुण्य पुण्य से नहीं और केवली भगवंत के दर्शन बंधन से पुण्य उपार्जन होने से किसी को सम्यक दर्शन होता नहीं है। सम्यक दर्शन सिर्फ और सिर्फ ग्रंथि वेद की प्रक्रिया से ही होगा। सम्यक दर्शन सिर्फ और सिर्फ सम्यक ज्ञान तत्व ज्ञान से ही होगा। पुण्य से सम्यक

25:13 दर्शन कभी होता ही नहीं है। वंदना माता जी बोलिए बड़े अच्छे नियम है। महाराज साहब केवली भगवान के दर्शन करने से सम्यक दर्शन नहीं होता। क्या हो गया आपको? ऐसा उल्टा मत बोलो। बोलो निखिल भाई बोलो। तो यहां पर जो विषय है हे भगवंत ये कैसे हो रहा है? आप पहले यह समझिए एक भी वंदना हमारी निरर्थक नहीं जाती है।

26:02 एक भी दर्शन हमारा निरर्थक नहीं जाता है। एक भी भयावज की हुई आपकी निष्फल नहीं जाती है। उत्तराध्य सूत्र के 29 वे अध्ययन के अंदर सम पराक्रम अध्ययन में इन सब का फल बताया है। तो क्या हो रहा है आपको दिमाग स्पष्ट खोलिए अंदर से मुझे केवली भगवन के दर्शन से पुण्य हो गया पुण्य बन गया पुण्य बन गया ऐसा मत सोच मेरे भाव मेरे अवसाय निजरा के ही होने चाहिए अब आपके अधवसाय भाव की विशुद्धि कर्मक्षय निजरा की हो गई अब आप आहार पानी बहराओगे तो भी आपकी निद्राव

26:51 करोगे तो भी निर्जरा है केवली के भी असाता वेदनीय कर्म होता है क्योंकि केवल ज्ञान सिर्फ चार घाती कर्मों के क्षय से ही प्रकट हुआ है। अघाती कर्म चारों अभी तक श्लोक में सत्ता में ऐसे ही पड़े तो हो सकता है उनको भी असशाता आ सकती है। कोई नाम नहीं है। ऐसी स्थिति में अगर कोई जाकर केवली की कयावच करता है तो उसकी निर्जरा अवश्य हो जाएगी। अब वैसे ही वहां से कोई जिसको आप नाम दे रहे हैं ये लघुकर्मी है।

27:38 आप इसको लघुकर्मी बोलिए या हकर्मी बोलिए। आप बात एक ही है समझे दोनों में क्यों भाई साहब यह नाम क्यों दिया है लघु कर्मी बोलिए या हकर्मी बोलिए इसका मतलब क्या हुआ उसके भारी गाड़ कर्म घटते घटते घटते घटते अब हल्के से रह गए इसलिए हल कर्म लघुकर्मी का मतलब जिसकी बंद स्थिति घट के बहुत कम बहुत कम बहुत कम होते हुए थोड़ी से बची रही है वो लघुकर्मी अब ऐसे आत्मा केवली के सनुख आ जाए ऐसे आत्मा आकर केवली को वंदना करे ऐसे

28:24 आत्मा आ के केवली के दर्शन करें ऐसे आत्मा कोई आकर के केवली की बयावत कर ले भाई साहब अभी केवली की देशना नहीं सुनी है फिर भी उनको किसी को सम्यक दर्शन हो जाए किसी को सम्यक ज्ञान हो जाए किसी को तत्व ज्ञान हो जाए। कोई भगवान से प्रार्थना करे, विनती करे कि भगवान मुझे अनुव्रत दे दीजिए। मुझे 12 व्रत उचरा आप मुझे व्रत उचरा कर मैं आपके लिए देश वित्त श्रावक बन जाऊं। कोई आकर के भगवान से कहे प्रभु मुझे तो महाव्रत उचरा दो। मैं तो दीक्षा लेकर साधु हो जाऊं। एक आगार बनता है। एक अनगार बनता है। अनगार मतलब

29:10 श्राधु बनता है। आ सागार मतलब सार्वत बनता है। अभी केवली भगवान ने कुछ भी नहीं कहा है। अभी उपदेश भी नहीं दिया है। देशना भी नहीं दिया। फिर भी क्यों? फिर भी क्यों? कितनी बड़ी बात है। सोचिए आप कितनी बड़ी बात। तो क्या भगवान ऐसा होता है? हां गौतम ऐसा होता है क्या सबके लिए ऐसा नियम बना दो तो समसरण के अंदर हजार लोग बैठ जाए तो क्या सबको हो जाएगा जी सबको नहीं सबको नहीं होता है क्योंकि सभी जीव एक शरीर के नहीं होते हैं भार कर्मी भी होते हैं। ये हकर्मी है तो भार कर्मी जीव भी

29:57 है। भारी मिथ्यात्व वाले जीव भी आके समोसर में बैठ आपने सुना है महावीर स्वामी के समोसर में काल शौकरीनी कसाई भी आके बैठ अब जी भी आकर के बैठ जाए उनको क्या फायदा होगा कुछ भी नहीं उनको कोई फायदा नहीं होगा क्यों नहीं होगा उनके कर्म अभी बहुत गाढ़ कर्म है। भारी कर्म है। इसलिए उनको असर नहीं हो। ख्याल आया आपको? लेकिन कुछ हक कर्मी आत्मा हो। अब मान लो कि जिसने पिछले जन्म में देव गति में या

30:45 मनुष्य गति में या महाविद में अन्यत्र सम्यक दर्शन प्राप्त किया था। और वमन हो गया। चला गया फिसल गया। तो आज यहां आते फिर से वह चांस उसको वापस जल्दी मिल वो जल्दी सम दर्शन प्राप्त कर और आपको यह पता चल जाए आज हमारे यहां कोई केवल ज्ञानी आए हैं तो आपका अहो भाव पूज्य भाव आपका है कि नहीं है बोलो विजय भाई पूजा भगवान ने पूजा कर ली प्रैक्टिकली जो हमारे अंदर पूज्य भाव व्हाट इज दैट पूज्य भाव इस रिस्पेक्ट वो जो भगवान के प्रति रिस्पेक्ट है वो

31:31 हमारे में नेचुरल प्रकट हो गया काले तमने कोई कहे कि भाई त केवल ही भगवंत पधारवाना छे तो सु करो तो तारो रिस्पेक्ट छे ख्याल कितना बढ़ जाए महावीर स्वामी गोचरी पधारेंगे ऐसा जी सेठ अपने भावों में कितनी ऊंची भावना में ला रहे हैं। कितनी ऊंची भाव अब भगवान आए कि नहीं आए? भगवान तो आने में देरी है या आएंगे या नहीं आएंगे। जीन शेठ ने भावना बाते किस कक्षा तक पहुंच गया। इस लेवल तक पहुंच गया।

32:16 इतनी बड़ी बात हो। तो कोई व्यक्ति अपने शुद्ध अध्यावसाय अपने सुंदर भाव परिणामों से इतना बड़ा रिजल्ट ला सकता है और सामने निमित्त केवली भगवंत का हो हम रोज ही केवली भगवंत का नाम लेते हैं। रोज बोलते हैं रोज ख्याल आया। हम प्रतिदिन केवली भगवंत का नाम लेकर के या उनको याद करके हम कहते हैं अगर साक्षात आ जाए तो भाई भाव नहीं बढ़ेंगे हमारे साक्षात हमको मैसेज समाचार मिल जाए चलो चलो भाई तो कितना भाव पड़ेगा करी जो विजय भाई अथ तो कर जो काले सिमंदर

33:05 स्वामी महारा बोलो सु करो काले श्रीमंद स्वामी ना गणधर भगवान तारा घरे पधार वाला अब घर तो जड़ छे घर तो ज तुम्हारा भाव में सु विशुद्धि थ रही छ आपके भाव परिणाम कितने अंदर से उछल रहे हैं ऐसा ओ हो हो केवल भगवंत मेरे गप बताए कल गधर भगवंत मेरे पधारेंगे कल मेरे घर में केली भग तीर्थंकर भगवंत आए। वाह भाई मेरा तो परम सौभाग्य ये अहो भाव अगर आपके उछलते उछलते

33:52 उछलते बढ़ते बढ़ते जाए कितनी निद्रा होगी साहब कितनी निद्रा होगी। आपने तीर्थंकर भगवंतों के चरित्रों में सुना है कि मल्लनाथ भगवान ने सुबह दीक्षा ली और शाम को केवल ज्ञान। क्यों हुआ ऐसा? एक ही दिन में कैसे हो गया? अब श्री मल्लनाथ भगवान ने एक दिन की देरी की होती तो क्या होता? एक दिन की देरी करते तो वो तो घर में बैठे ही केवल ज्ञान हो जाता। लेकिन तीर्थंकर भगवंतों को कभी भी घर में बैठे केवल ज्ञान नहीं होता है। यह विशेषता

34:38 है। नहीं होता है। बस कहलाएगा दूसरों को हो सकता है। तीर्थंकर के सिवाय दूसरों को हो सकता है। बात गणधरों को भी नहीं होगा। घर बैठे केवल दीक्षा लेंगे साधना करेंगे चारों जाती कर्मों का आशय होगा तब केवल यही विशेषता हमें भी यही समझना है ये हमारे साथ में बराबर समझ करके चलिए ये विशेषता आनी चाहिए तो यहां पर जो कुछ है कि भग अब इन जीवो को इतने भाव क्यों हो जाते हैं मैं आपको क्या बताऊं? आप तो केवली की बात

35:26 कर रहे हो लेकिन बिना केवल ज्ञान के भी सिर्फ साधु का वेश देखकर के भी कई आत्माओं को सम्यक दर्शन प्राप्त हुआ है। सिर्फ साधु का वेश रजो हरण देख के साधु मुनि महात्मा देख के एक श्रद्धा से जो रिस्पेक्ट प्रकट हुआ है सद्भाव जो प्रकट हुआ है पूज्य भाव जो प्रकट हुआ है कितनी बड़ी बात कितनी बड़ी बात हो सकता है निषेध कुछ भी ना ये बात जरूर समझ के चलिए निष अब यहां पर हे भगवन कोई आत्मा किस तरह से

36:11 कैसे वर्तन व्यवहार कर रही अब उनके जीवन में मिथ्या मोहनि अनंतानुंदी कसाय के सब तक इसका क्षयप होते ही उनको सम्यक दर्शन हो जाए। ऐसे के भगवंतों के योग संयोग निमित अब किसी किसी आत्मा को शुद्ध बोधि लाभ हो और किसी आत्मा को श्रावक धर्म व्रत वित्त पखान ग्रहण करने के बावजूद तो करने वाले हैं। ऐसे भी आत्माएं हैं। बहुत अच्छी आत्मा है। सोचिए समझ गई अब इस तरह से केवली भगवंत के पास आकर के कोई

37:00 ब्रह्मचर्य वत पकान ले के भगवंत को देखा जाना उसके भाव विशुद्ध होते गए बढ़ते गए बढ़ते गए और ये संकल्प उसने कर लिया निर्णय इतना बड़ा काम ऐसी स्थिति के अंदर हे भगवन क्या कोई केवली भगवंत को प्राप्त करके देश ले सर्व वत्ति ले तो पूर्व जन्म के संस्कार पूर्व जन्म में जिन जीवो ने व्रत वृत्त पकांड नियम का पालन किया हुआ हो आचरण किया

37:45 हुआ हो और ऐसे जीवो के भाव परिणाम बन जाए आ के अभी केवली भगवान की देशना नहीं सुनी है। फिर भी उनके भाव उच्च कक्षा के हो जाए। वो सामने से विनती करें भगवान मुझे देश वित्त धर्म के अनुवरत चाहिए और कोई आत्मा कहे मैं दीक्षा लूं और आप मुझे महाव्रत दीजिए। यह होता तो कोई महाव्रत लेकर के साधु भी कोई ना ऐसे ना ऐसे करते करते शुद्ध संयम ग्रहण कर ले अब यहां पर और आगे बढ़ गए कि हे भगवान केवली आदि से शुद्ध संवर धर्म कोई सीख ले

38:35 जी हां पॉसिबल कोई ना संवर धर्म के अंदर आश्रम को रोकना मैं यह पाप नहीं करूं। मैं यह पाप की प्रवृत्ति ना करूं। मैं इस पाप की प्रवृत्ति ना करूं। मैं इस पाप में संलग्न ना हो। ऐसे करके कोई कोई आत्मा अपनी तरह से जो है अब इसी तरह से किसी किसी आत्मा को पश्चाताप जग किए हुए अपने पापों का पश्चाताप जग सा प्रायश्चित करने के भाव बन जाए। आपने एक छोटा सा सूत्र सुना है तस उत्तरी करणम पायित करने मतलब वो पहले नंबर पर

39:21 प्रायश्चित करने के भाव बनाए विोही करने आत्मा को विशुद्ध करने के भाव बनाए विल करने आत्मा को शल्य रहित बिल्कुल शल्य रहित करने के शुद्ध भाव बनाए पाम कम निकायए पाप कर्मों को निकालने के निर्घात करने के भाव बनाए कामी का सर्गम अब इन चारों भावों को बनाकर कोई कायोसर्ग शुरू करे कोई कायोसर्ग में रहने के अपने भाव बनाए अब वो गली 10 लोगस का कौसर करे 20 लोगस का

40:08 करे 40 लोगस का करे 100 लोग का करे जैसे जितने उसके भाव परिणाम चलेंगे उतना वो कर सके बस भावों की विशुद्धि अनिवार्य इतने भाव शुद्ध उसके जितना जिसको कहते हैं हम लास उसका बढ़ जाए वो इतने प्रमाण में कर जैसा बने जितना बने जिस तरह से बने यही उसको करना तो हे भगवन अब जिस तरह से वो तो सर्व संवर धर्म को स्वीकार कर ले तो यहां शब्द दिए हैं अजसान वरित संवर शब्द से वहां पर शुभ अवसाय की वृत्त

40:54 विवक्षित भाव चारित्र रूप होने से त आवर इसलिए अवसान आवरणीय कर शब्द में यहां पर भाव चारित्र अब कह रहे कि भगवान केवली भगवंत आदि से आ ज्ञान ऐसा कोई ज्ञान उपार्जन करे मतलब नया नया ज्ञान से अब केवली भगवंत से सुनोगे तो तो आपको नया नया ज्ञान लेकिन केवली भगवंत को बिना सुने भी अभी उन्होंने देशना प्रारंभ ना की हो उनको बिना सुने भी क्या हमको लाभ होगा हां जी जरूर रूप होता

41:40 क्योंकि आपके जीव विशेष के अपने परिणाम पर आधार है। ये मत सोचना कि केवल ही भगवान सामने से कोई चमत्कार कर रहे हैं। ऐसा मन से कोई केवली चमत्कार नहीं कर रहे। कुछ नहीं कर। चमत्कार से किसी को केवल ज्ञान नहीं होता है। ख्याल यह बातें यहां पर बीच में ना आए ध्यान रखना क्योंकि यहां तो जो होगा वो सिर्फ कर्मक्षय से आपकी कर्म प्रकृति का क्षयोपक्षम हो रहा है तो ही लाभ होगा। नहीं तो नहीं होगा। अब यह आपको इधर देखा कि भाई हां आदि बद्ध ज्ञान आदि से उपार्जन करता है तो जरूर

42:29 करता है। नया नया तत्व चिंतन आत्म स्वरूप चाहे मोक्ष स्वरूप लोक स्वरूप सारी चीजें उसके ज्ञान में आ सकती है। अब केवल ज्ञान से हे भगवंत कोई जीव अपनी तरह से केवल सूत ज्ञान भी प्राप्त कर लेता है। हां जी करता है। श्रुत ज्ञान के अंदर पूर्व जन्म के संस्कार से तत्व चिंतन अभी उसने पुस्तक नहीं पढ़ी है। केवली को सुना नहीं है। देशना नहीं सुनी है। तो क्या भगवंत के लिए पूर्व जन्म से संभव है? हां संभव है। ऐसे करते करते

43:14 अब क्या केवल ज्ञान केवली भगवंत को बिना सुने अवधि ज्ञान हो सकता है मनोपर ज्ञान हो सकता है आपने सुना है अच्छी तरह से जब जब तीर्थंकर भगवान दीक्षा लेते हैं उसी दिन उसी समय साथ में मन परिसरी है तीर्थंकर के लिए बस बस बाकी सबके लिए तो क्या होता है उनका अब मन पर ज्ञान तो किसी को पुण्य से तो होता नहीं ऐसा कोई भी ज्ञान नहीं होता है केवल ज्ञान भी नहीं होता है मन पर ज्ञान भी नहीं होता है कोई भी नहीं तो फिर मनोप ज्ञान कैसे हो गया मन पर ज्ञान वर्ण कर्म की निजरा होगी छयोप

44:02 होगा तब जाके मन पर ज्ञान प्रकट होगा नहीं तो ये उसके निश्चित बनता हुआ है। अब भगवंत क्या इसी तरह से किसी को दूसरे को केवल ज्ञान भी हो सकता है? हां गौतम हो सकता है। ख्याल आया कि नहीं? कई ऐसे निमित्त है। कुर मुनि को केवल ज्ञान हो गया। लेकिन बाकी के अन्य तीन साधुओं को उनको क्षमाते खमाते केवल ज्ञान हो। मतलब उनसे क्षमा याचना कर रहे हैं। ब्रह्म कर रहे हैं। हमने आपकी आशाना की बोलते हुए और फिर वो पश्चाताप वो उनके कर्म निग

44:52 इलाची कुमार को क्यों हुआ? इलाची कुमार तो मोह दशा में था। एक नर्तकी के साथ शादी करने का मोह था उसका और इसीलिए वह अपनी तरह से नृत्य कर रहा था। जैसे उसकी दृष्टि बदल गई। क्यों बदली दृष्टि? एक निमित्त ही इतना प्रबल हो गया। एक सुंदर स्त्री संधारी अपने घर में किसी साधु महाराज को लड्डू पहरा रही थी। और साधु महाराज दृष्टि ऊपर करके देखने को भी राजी नहीं थे। उन्होंने अपनी तरफ से अपनी इंद्रियों का संयम इतना प्रबल बनाए

45:40 रखा। यह दृश्य जो है उस इलाची कुमार को देखते देखते देखते देखते ओ हो हो इतनी सुंदर एक स्त्री को देखने के बाद नहीं देखते हुए भी महात्मा आहार पानी के बोलने में कितना चिंतन मनन करते होंगे ये दृश्य देखते देखते इलाची कुमार की दृष्टि बदल गई मैं यहां पर नर्तकी को जीतने के लिए शादी करने के लिए मैं राजा को रिझाने की कोशिश कर रहा हूं। राजा प्रसन्न हो जाए ऐसा प्रयत्न कर रहा हूं। यह दृष्टि उसकी बदल एक कोइिडेंस बोलते हैं आप देखिए नेम कुमार को इन पशुओं को देख के जो जागृति हुई

46:29 इलायची कुमार को दृश्य देख के जागृति हुई श्रेणी राजा को ममन शेख के बनाए हुए लोग बैल देख के जागृति हुई ये कई निमित्त ऐसे कई जीवो को ऐसे छोटे छोटे निमित्त मिल जाए वो निमित्त बाय चांस आपको समझ में आ जाए और उस निमित्त को आप पकड़ लो उस समय उस निमित्त को पकड़ कर के आप अगर उसका आचरण कर लेते हो तो वो आपके लिए बहुत अच्छा गोल्डन चांस होता है। लेकिन कई बार लोग इस गोल्डन चांस की अपॉर्चुनिटी को समझ नहीं पाते। उपेक्षा कर देते हैं। कई बार उनका आलस

47:16 प्रमाद में चला जाए तो वो जो चांस आया था वो हाथ से निकल गया। जिंदगी में कई बार बहुत मुश्किल से ऐसे एक आध बार कोई चांस आ जाता है। वेरी रेयर चला लेकिन आने के बाद उसको हाथ से खोना नहीं। चांस आया है तो घुमाना नहीं। लेकिन 90% लोग चांस गाते। उस समय जो चांस आया उसको समझने की उसकी तैयारी नहीं। प्रश्न ये वो उस चांस को गोल्डन चांस को समझ ही नहीं पाया। वो अपने वर्तमान काल के राग द्वेष मोहनीय कर्म की प्रवृत्ति में

48:03 असक्त रहा और वो चांस आज से निकल गया। ऐसा भी बहुत होता है। लेकिन कोई ना कोई ऐसे पुण्यत्मा विरल आत्मा जो हो और वो कभी कभी ऐसे चांस को पकड़ ले और चांस का फायदा उठा ले। आपने कई बार शब्द सुने हो आपदा में अवसर। तकनीक में कभी ऐसे अवसर देख लो आप तो कभी रिजल्ट आ जाता अच्छी तरह से आ जाता है। सामान्य बात नहीं बहुत विशेष बात है तो यह प्रयत्न करना चाहिए अगर चांस मिल जाता है तो कर लेने में फायदा है ऐसा ये इस तरह से

48:52 11 बोल जो है जिनके इन सब के साथ में ये बात बैठाइए आप केवली भगवंत हो या केवली पार्षिक उपासक हो और फिर के पास से धर्म श्रवण किए बिना ही कोई जीव केवली प्रोपित धर्म का लाभ प्राप्त कर ले या बोधि बीज प्राप्त कर ले मुंडित होकर अणगार भी बन जाए या गस्थ जीवन के अंदर व्रत लेकर श्रावक बन जाए कोई ब्रह्मचर्य वास धारण कर ले शुद्ध संयम द्वारा संयम व्यतना करता है और शुद्ध संवर से समृद्ध हो जाए ज्ञान प्राप्त कर ले म पर ज्ञान प्राप्त कर ले और लास्ट में ज्ञान भी प्राप्त कर

49:39 दो। ऐसी कक्षाएं जो जिन जिन जीवो की बनती है बहुत ही अद्भुत है। अभी केवली ने देशना दी होती तो उनका उपकार शुरू होता था। लेकिन अभी तो उन्होंने देशना दी भी नहीं। बिना देशना दिए ही जिन जीवों का उप हो जाता है यह है निमित्त काय उपादान तो उस जीव का खुद का है भाई उपादान तो अपना चलेगा लेकिन किसी का निमित्त आलंबन कितना असर पर अब ध्यान रखिए निमित्त आलंबन जो है प्रभावक है बहुत असर कारक है आप उसकी

50:26 उपेक्षा ना बस उपेक्षा नहीं करें। समय आने पर हमारे लिए बहुत बड़ा उपकार हो सकता है। ये ध्यान में लेकर के आप चलिए तो यहां पर इस तरह से ये सबके बारे में बात केली के बिना सुने ही किसी को केवल ज्ञान प्राप्त हो। किसी का विभंग ज्ञान योग हो जाए। सीधे विभंग मतलब मिथ्यात्व से ग्रस्त जिन देवी देवताओं नरक नारकी जीवों का ज्ञान होता है उसको विभंग ज्ञान मिथ्यात्व के कारण वो विपरीत बुद्धि बन चुकी है इसलिए विभव ज्ञान नाम दिया है अब ये प्रयत्न करके जो लोग जिस तरह से कर

51:13 सकते हैं [गला साफ़ करने की आवाज़] उनके लिए बहुत बड़ी बात अब मतलब क्या हुआ सामान्य रूप से तो आप अर्थ समझ गए भगवान की देशना से तो सबको हो रहा है लेकिन यहां पर आपने क्या देखा बिना देशना के अभी बिना देशना श्रवण किए ही जब इतना लाभ हो रहा है तो तो फिर बहुत बड़ी बात होगी ये हमें सबको समझना चाहिए ये विषय लेकर के यहां पर काफी अच्छी तरह से विस्तार किया है जी बोलिए साह सवाल पूछो साह अपने चार भावनी बात करी द उत्तरी कर पा

52:06 चार भाव कर दस का करो तो चार भाव जरा समझा मीनिंग गुजराती प्रायित कर प्रायश्चित कर माटे कर कासमोसर्ग कर रहा हूं तो मैं कायोसर्ग करने के लिए किस हेतु से कर रहा हूं व्हाट द परपस इस प्रायश्चित करने के लिए पाप जो हो चुके हैं कर चुका हूं उनका प्रायश्चित करने के लिए कर रहा हूं विश करने आत्मा को शुद्ध करो तो फिर कर्म के अंदर से घट जाए नेरा हो जाए तो आत्मा शुद्ध हो निसल करने अब उसमें कोई शल्य ना रहे क्या

52:54 कोई अंदर जो है कोई कोई बाधा ना रह जाए कोई शल्य ना रह जाए ऐसा का ब्रह्मामय व्हाट द पपस द इंटेंशन वी आई हैव मैं अपने पाप कर्मों को आत्म प्रदेशों से बाहर निकालने के मतलब निर्जरा करने के उद्देश्य से कर हूं। ये चारों भाव अगर आप बना लेते हो और करते हो तो बहुत बड़ा काम बहुत बड़ा साह उत्तरी कर अर्थ अरे पहला करदी प नेक्स्ट क्रिया कर [गला साफ़ करने की आवाज़]

53:43 जीवा विरा मने कोई जीव विरा दोष तो मारे कर पश्चित कर पहली कड़ी आली कड़ी हरिया साथ जोड़ी छे एम हां [गला साफ़ करने की आवाज़] सरस वंदन सर सरस बोलिए किसको पूछना है बोलिए नमो अच्छा बोलिए बोलो

54:28 कासर्ग कितने मिनट का होता है कायोसर्ग कितने मिनट सामयिक जितना ही होता है कि नहीं नहीं आप कितनी धारणा करो उतार आपको कायोसर्ग करना है ना तो कितने लोगस का करोगे आप लोगस की धारणा कर लो मुझे 10 लोगस का करना है 20 लोगस का करना है 40 लोगस का करना है 100 लोग अपनी धारणा करो बस वो सामयिक के जैसे टाइम से मतलब नहीं है अपने लोग की संख्या से आप धारणा करिए और उसी हिसाब से करिए नमो सिंह नमो नमोसा

55:13 नमोकार पाव प्रणास मंगलम चस परम भव मंगलम भगवान मंगलम गौतम प्र मंगलम च मंगलम अरिहंता मंगलम सिद्ध मंगलम सा मंगलम केवल चतमा अरह सिम सा शरणम पवजम अरहते शरणम पवित्र

56:00 सिद्ध शरणम पवजम साहहु शरणम पवजम पत्तम गम शरणम पवजम सर्व मंगल मंगलम सर्व कल्याण कारणम प्रधानम सर्वधम वंदना

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