Osho - जीवनसाथी पिछले जन्म का दुश्मन है? | गरुड़ पुराण का सबसे बड़ा रहस्य #Osho#OshoHindi

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संक्षिप्त सारांश

इस वीडियो में विवाहित जीवन और उसके कठिनाईयों पर चर्चा की गई है। व्यक्ति अपने जीवनसाथी के प्रति असंतोष और शिकायत का अनुभव करते हैं, लेकिन असल में ये उनकी पूर्व जन्मों के कर्मों का फल होते हैं। यह बताया गया है कि कैसे पिछले जन्म के ऋण और संबंध वर्तमान जीवन में निभाए जाते हैं। इसमें क्षमा और प्रेम के माध्यम से अपने रिश्तों को ठीक करने का तरीका बताया गया है।

  • विवाहित जीवन में कठिनाइयां अक्सर पिछले जन्मों के कर्मों का परिणाम होती हैं।
  • सही दृष्टिकोण अपनाने पर रिश्ते में सुधार किया जा सकता है, जिसमें क्षमा महत्वपूर्ण है।

पारिवारिक रिश्ते और त्याग

वीडियो की शुरुआत में यह बताया जाता है कि क्या आपका जीवनसाथी आपको ताने मारता है और आपके स्वार्थों का दमन करता है? आप सोचते हैं कि आप महान हैं और अपार त्याग कर रहे हैं, लेकिन आप पीड़ित महसूस करते हैं। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि विवाह का आधार क्या है? क्या यह प्यार है या किस्मत का खेल?

कर्मों का फल

इस भाग में कहा जाता है कि जब कोई आत्मा जन्म लेती है, तो वह अपने पिछले जन्मों के कर्मों का बोझ लेकर आती है। गरुड़ पुराण के अनुसार, आत्मा अपने साथ पिछले जन्मों का कर्ज लाती है, जिसे उसे चुकाना पड़ता है। इस दृष्टिकोण से, पति-पत्नी के रिश्ते में जो कठिनाईयाँ आती हैं, वे अक्सर कर्मों का फल होती हैं।

अतीत की छाया

यहाँ एक कहानी का उल्लेख है जिसमें एक धनी व्यक्ति की पत्नी उसे अपमानित करती है, लेकिन सच्चाई यह है कि पहले जन्म में वह खुद एक निर्दयी साहूकार था। उसे अंततः उसी दासी से शादी करनी पड़ी, जिसे उसने पहले सताया था। यह उसकी आत्मा के लिए उसके पिछले कर्मों का फल है।

कर्ज का संग्रहण

वीडियो में यह बताया गया है कि कैसे पिछले जन्मों में किसी के साथ किए गए अन्याय का परिणाम वर्तमान में पति या पत्नी के रूप में सामने आता है। जब आप किसी को चोट पहुँचाते हैं, तो यह दर्द एक दिन आपको वापस मिलता है। इस स्थिति में, किसी भी स्थिति को समझने और स्वीकार करने का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है।

क्षमा और स्वयं का परिवर्तन

यहाँ यह बताया गया है कि नफरत एक बंधन होती है, और यदि आप अपने जीवनसाथी से छुटकारा पाना चाहते हैं, तो आपको क्षमा करनी होगी। क्षमा का अभ्यास करने से न केवल आप खुद को स्वतंत्र कर सकते हैं, बल्कि आपके रिश्ते में भी सकारात्मक परिवर्तन आएगा।

सकारात्मक दृष्टिकोण

अंत में दर्शाया गया है कि यदि आपको अपने जीवनसाथी से कोई तकलीफ मिल रही है, तो आपको उन्हें दुश्मन नहीं समझना चाहिए, बल्कि अपने कर्मों का डाकिया मानकर उनके प्रति कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए।

इस रास्ते पर चलकर अंततः आपके जीवन में शांति और संतोष आ सकता है।

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Transcript

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0:01 क्या तुम्हारा पति या तुम्हारी पत्नी तुम्हें बात बात पर ताने मारते हैं? क्या तुम उनके लिए अपना पूरा जीवन दांव पर लगा देते हो? अपनी इच्छाओं का गला घोट देते हो। लेकिन बदले में तुम्हें सिर्फ तिरस्कार और पीड़ा मिलती है। और तुम एकांत में बैठकर स्वयं को एक पीड़ित आत्मा मान लेते हो। तुम सोचते हो कि तुम तो बहुत महान हो। तुम तो बहुत त्यागी हो। इस विराट पृथ्वी पर इस अनंत आकाश के नीचे अरबों मनुष्यों की एक आंधी और भागती हुई भीड़ है। करोड़ों चेहरे रोज तुम्हारे आसपास से गुजरते हैं। लेकिन क्या तुमने कभी अपने एकांत में अपने उस गहरे सन्नाटे में इस

0:48 बात पर विचार किया है कि इस भारी भीड़ में तुम्हारी नजरें अचानक किसी एक ही चेहरे पर जाकर क्यों रुक जाती हैं। हजारों लोग तुम्हारे जीवन में आते हैं और चले जाते हैं। लेकिन केवल एक ही इंसान के साथ तुम्हारा विवाह क्यों होता है? क्या तुमने कभी अपनी नम आंखों से छत को घूरते हुए अपने दुख के उन गहरे एकांत क्षणों में यह सोचा है कि मुझे यही पति या यही पत्नी क्यों मिली? तुम इसे अपना चुनाव कहते हो। तुम इसे प्रेम का नाम देते हो। तुम कहते हो कि तुम्हारी नियति ने तुम्हें मिलाया है। जब विवाह के पहले दिन घर में शहनाइयां बजती हैं तो बड़ा भारी उत्सव होता है। सबको लगता है कि दो हृदय मिल रहे हैं। एक नया स्वर्ग जमीन पर उतर रहा है। लेकिन

1:35 क्या यह केवल एक संयोग है? कुछ ही साल बीतते हैं और कभी कभी तो कुछ महीने भी नहीं बीतते और वे सारी शहनाइयां हमेशा के लिए खामोश हो जाती हैं। उनका मधुर संगीत मर जाता है और उनकी जगह घर के अंदर बर्तनों के टकराने की चीखने चिल्लाने की या फिर एक जानलेवा घुटन भरी खामोशी की आवाजें गूंजने लगती। दो अजनबी जो एक ही छत के नीचे, एक ही कमरे में, एक ही बिस्तर पर रहने को मजबूर हैं। लेकिन जिनके बीच मीलों लंबी खाइयां पैदा हो गई, तब तुम्हारे मन में यह सवाल एक कांटे की तरह चुभता है कि क्या मेरी किस्मत ही खराब थी? या उस ऊपर

2:20 बैठे परमात्मा ने मेरे साथ कोई बड़ा अन्याय किया है। तुम रोते हो, तुम शिकायत करते हो। तुम मंदिरों में जाकर अपने भाग्य को कोसते हो। लेकिन तुम यह नहीं जानते कि जिसे तुम अपना चुनाव समझ रहे थे, जिसे तुम अपना प्रेम समझ रहे थे, वह तुम्हारे ही अतीत का एक बहुत गहरा और अंधा जाल था। तुम्हारी छोटी सी बुद्धि उस जाल को समझ ही नहीं पाती क्योंकि तुम केवल इस छोटे से जीवन को इन 60 70 सालों को देख रहे हो। जबकि असली सत्य तुम्हारे जन्म जन्मांतरों की गहराई में तुम्हारी चेतना की अंधियारी परतों में छिपा है। पूर्व के रहस्यदर्शी हमारे उपनिषदों के ज्ञानी और कर्मों का वह

3:07 अकाट्य विज्ञान बहुत स्पष्ट रूप से कहता है कि इस ब्रह्मांड में एक पत्ता भी बिना कारण के नहीं हिलता। इस पूरे अस्तित्व में संयोग जैसी कोई चीज है ही नहीं। सब कुछ एक बहुत गहरे बहुत अदृश्य धागे से बंधा हुआ है। तो फिर तुम्हारा जीवन साथी जो तुम्हारे सुख और तुम्हारे सबसे गहरे संताप का सबसे बड़ा कारण है वह बिना किसी कारण के तुम्हारे जीवन में कैसे प्रवेश कर सकता है? आज मैं उस भारी पर्दे को उठाने जा रहा हूं जो तुम्हारी शादीशुदा जिंदगी पर तुम्हारे इस तथाकथित प्रेम पर पड़ा हुआ है। आज मैं तुम्हें वह कठोर सत्य बताऊंगा

3:55 जिसे सुनकर तुम्हारा अहंकार तिलमिला उठेगा। आज तुम्हें पता चलेगा कि जिस इंसान के साथ तुम सो रहे हो। जिस इंसान के साथ तुम रोज भोजन कर रहे हो। वह असल में कौन है? गरुड़ पुराण जो कि कर्मों के विज्ञान का चेतना के अनंत जन्मों की यात्रा का एक बहुत ही गहरा और रहस्यमय शास्त्र है। वह कहता है कि जीवात्मा जब मृत्यु के द्वार से गुजरकर कोई नया शरीर धारण करती है तो वह अपने साथ कोई भौतिक संपत्ति नहीं लाती। वह ना धन लाती है, ना वस्त्र लाती है, ना ही इस संसार के पद और प्रतिष्ठा लाती है। चिता पर सब कुछ जलकर राख हो जाता है। लेकिन वह आत्मा अपने साथ एक अदृश्य ऊर्जा

4:42 की पोटली लेकर आती है जिसे हमारे दृश्यों ने ऋणानुबंध कहा है। ऋण यानी कर्ज और अनुबंध यानी बंधन। यह वह कर्ज है जो पिछले जन्मों में चाहे वह धन के रूप में हो। भावनाओं के रूप में हो या किसी गहरे प्रतिशोध और क्रोध के रूप में हो अधूरा रह गया था। प्रकृति का नियम बहुत कठोर और गणितीय है। तुम समाज के नियमों से भाग सकते हो। तुम किसी साहूकार से पैसा लेकर शहर छोड़ सकते हो। तुम किसी को धोखा देकर छिप सकते हो। लेकिन तुम कर्मों का कर्ज लेकर मृत्यु के पार भी नहीं भाग सकते। मृत्यु तुम्हारे खाते को शून्य नहीं करती। वह कर्ज एक काली छाया की तरह तुम्हारे

5:31 पीछेछे आता है। और जब तुम दोबारा इस पृथ्वी पर जन्म लेते हो तो वह कर्जदार या वह लेनदार वेश बदलकर तुम्हारे सबसे करीब आ बैठता है। और मनुष्य के जीवन में सबसे करीबी रिश्ता कौन सा होता है? पति और पत्नी का। क्योंकि यही वह जगह है जहां दो लोग पूरी तरह से निहत्ते होकर एक दूसरे के सामने खड़े होते हैं। इसलिए प्रकृति अपना हिसाब बराबर करने के लिए अक्सर तुम्हारे पिछले जन्म के सबसे बड़े शत्रु को ही तुम्हारा जीवन साथी बना देती है। मुझे उपनिषदों के समय की एक बहुत प्राचीन कथा याद आती है जो तुम्हारे इस संताप को पूरी

6:16 तरह स्पष्ट कर देगी। एक बार एक बहुत धनी सेठ रोता बिलखता हुआ एक महान जागृत ऋषि के आश्रम में पहुंचा। उस सेठ ने ऋषि के चरणों में गिरकर अपने आंसुओं से उनके पैर धो दिए और कहा हे गुरुदेव मुझे इस जीवन से मुक्ति दिलाइए। मेरी पत्नी एक राक्षसी है। मैं उसके लिए दिन रात मेहनत करता हूं। मैं उसके लिए दुनिया भर के आभूषण लाता हूं। उसकी हर मांग पूरी करता हूं। लेकिन बदले में वह मुझे केवल गालियां देती है। वह हर क्षण मेरा अपमान करती है। मेरा घर एक नर्क बन चुका है। जहां मैं रोज तिल तिल कर मर रहा हूं। मैंने तो इस जीवन में कभी किसी

7:03 का बुरा नहीं किया। मैं रोज मंदिर जाता हूं। दान पुण्य करता हूं। संतों की सेवा करता हूं। फिर मेरे ही हिस्से में यह क्रूर पत्नी क्यों आई? क्या विधाता अंधा हो गया है? क्या ईश्वर के घर में कोई न्याय नहीं बचा? वे ऋषि थोड़ी देर के लिए शांत हो गए। उन्होंने अपनी आंखें बंद की और अपनी चेतना को समेटकर एक गहरे ध्यान में एक परम समाधि में उतर गए। जब उन्होंने आंखें खोली तो उनकी आंखों में कोई क्रोध नहीं था। बल्कि एक अजीब सी करुणा थी। उन्होंने उस रोते हुए सेठ से कहा, "रो मत मेरे मित्र।" विधाता अंधा नहीं है बल्कि उसके कर्मों का न्याय इतना अचूक है कि तुम्हारी अंधी आंखें उसे समझ नहीं पा रही।

7:50 मैंने अभी तुम्हारे अतीत में तुम्हारे पिछले जन्म में झांक कर देखा है। आज से ठीक एक जन्म पहले तुम एक बहुत ही निर्दई और क्रूर साहूकार थे। और यह जो स्त्री आज तुम्हारी पत्नी है। यह पिछले जन्म में तुम्हारी एक बेबस दासी थी। तुमने इसे जंजीरों में बांध कर रखा था। तुमने इसे भूखा रखा और जब यह भूख से तड़प कर रोती थी तो तुम अपने अहंकार में अंधे होकर इसके शरीर पर कोड़े बरसाते थे। वह दासी बहुत कमजोर थी। वह तुम्हारे कोड़ों का जवाब नहीं दे सकती थी। लेकिन जब वह तड़प कर मरी तो उसके भीतर तुम्हारे प्रति क्रोध और प्रतिशोध की एक ऐसी गहरी आग थी जो मृत्यु

8:39 के ठंडे जल से भी नहीं बुझी वह आग इस ब्रह्मांड में भटकती रही और इस जन्म में अस्तित्व के उसी न्याय ने उसे तुम्हारी पत्नी बनाकर तुम्हारे घर में बिठा दिया है। तुम आज जो उसके कड़वे शब्द सुनते हो वे केवल शब्द नहीं है। वे तुम्हारे ही मारे हुए वे कोड़े हैं जो अब लौट कर तुम्हारे ही ऊपर बरस रहे हैं। वह तुमसे कुछ नया नहीं कह रही है। वह केवल तुम्हारा ही दिया हुआ कर्ज तुम्हें पूरी तरह से वापस लौटा रही है। गरुड़ पुराण के कर्म विज्ञान के अनुसार इसे ही शत्रुजन कहा गया है। अब जरा अपने ही जीवन को देखो। क्या तुम्हारा पति या तुम्हारी पत्नी तुम्हें बात पर ताने मारते हैं? क्या तुम उनके लिए

9:25 अपना पूरा जीवन दांव पर लगा देते हो? अपनी इच्छाओं का गला घोट देते हो? लेकिन बदले में तुम्हें सिर्फ तिरस्कार और पीड़ा मिलती है। और तुम एकांत में बैठकर स्वयं को एक पीड़ित आत्मा मान लेते हो। तुम सोचते हो कि तुम तो बहुत महान हो। तुम तो बहुत त्यागी हो। लेकिन तुम भूल गए हो कि यह वह स्थिति है जब पिछले जन्म में या किसी और तल पर तुमने उस चेतना को बहुत सताया था। उस वक्त वह इंसान कमजोर था। वह तुम्हारा कुछ बिगाड़ नहीं पाया। लेकिन उसकी वह जो तड़प थी, उसकी वह जो बदले की ज्वाला थी, वह ठंडी नहीं हुई। वह ऊर्जा अस्तित्व में पूरी तरह सुरक्षित रह गई। और

10:12 इस जन्म में नियति ने उसे तुम्हारा पति या पत्नी बना दिया। अब वह तुमसे वही अपमान, वही दुख, वही पीड़ा वसूल रहा है जो तुमने उसे कभी दी थी। फर्क सिर्फ इतना है कि अब तुम भूल चुके हो। तुम्हारी स्मृति पूरी तरह मिट गई है। लेकिन उसकी आत्मा की गहराइयों में वह घाव अब भी हरा है। उसकी आत्मा को शांति तभी मिलेगी जब वह अपना हिसाब पूरा कर लेगी। इसीलिए तुम देखते हो कि दुनिया में अक्सर बहुत ही सज्जन और सीधे साधे पुरुष को बहुत ही कर्कश और क्रोधी पत्नी मिल जाती है। या एक बहुत ही शांत प्रेमपूर्ण और धर्म परायण स्त्री को

10:59 एक अत्याचारी पति मिल जाता है। दुनिया दूर से देखती है और कहती है कि भगवान के घर अंधेर है। यह कैसा भारी अन्याय है। लेकिन अगर तुम ध्यान की आंखों से देखो, सत्य की दृष्टि से देखो तो यह कोई अन्याय नहीं है। ये परम न्याय है। ये तुम्हारे ही बनाए हुए कर्मों के वही खाते का मिलान हो रहा है। कर्म अपने आप को संतुलित कर रहा है। जब तक तुम स्वयं को एक बेचारी पीड़ित आत्मा मानते रहोगे। तब तक तुम इस नर्क में जलते रहोगे और तड़पते रहोगे। लेकिन जिस क्षण तुम्हारे भीतर यह बोध जागेगा कि सामने वाला व्यक्ति तुम्हारा दुश्मन नहीं बल्कि तुम्हारे ही कर्मों का

11:46 डाकिया है। जो केवल तुम्हारा ही भेजा हुआ जहर तुम्हें वापस लौटाने आया है। उसी क्षण तुम्हारा सारा संताप गिर जाएगा। तुम उससे लड़ना बंद कर दोगे और एक गहरी मौन स्वीकारोक्ति तुम्हारे भीतर पैदा हो जाएगी। तुम जान जाओगे कि यह मुक्ति का द्वार है सजा नहीं। क्या तुमने कभी इस बात पर गहराई से विचार किया है कि जीवन में दुख क्यों आता है? तुम जिसे दुर्भाग्य कहते हो, तुम जिसे बुरी किस्मत कहकर अपनी आंखों पर पट्टी बांध लेते हो, वह असल में क्या है? पिछले हिस्से में मैंने तुमसे शत्रु यण की बात की थी। जहां तुम्हारा जीवन साथी केवल तुम्हें मानसिक और शारीरिक पीड़ा देने के लिए तुम्हारे जीवन में आता

12:32 है। लेकिन कर्मों का यह जो रहस्यमय जाल है यह केवल नफरत और तिरस्कार तक ही सीमित नहीं है। गरुड़ पुराण और हमारे प्राचीन योग शास्त्र एक दूसरे प्रकार के टणानुबंध की भी बात करते हैं जिसे समझना तुम्हारे लिए बहुत आवश्यक है। इसे आर्थिक डन या धन का कर्म बंधन कहा गया है। अब जरा समाज में अपनी आंखें खोल कर देखो। क्या तुमने ऐसे परिवारों को नहीं देखा या शायद यह तुम्हारे ही जीवन की कहानी हो। जहां विवाह से पहले सब कुछ ठीक था। धन की कोई कमी नहीं थी। लेकिन विवाह के बाद अचानक खर्चे इस कदर बढ़ गए कि तुम्हारी सारी

13:18 गाढ़ी कमाई पानी की तरह बहने लगी। तुम्हारी पत्नी या तुम्हारा पति अचानक किसी ऐसी रहस्यमय बीमारी का शिकार हो गया जिसका कोई वैद्य कोई हकीम इलाज नहीं खोज पा रहा है। तुम्हारी जीवन भर की जमा पूंजी तुम्हारे पसीने की एक-एक बूंद औषधियों में वैद्यों के चक्कर काटने में या फिर तुम्हारे जीवन साथी की अंधी और व्यर्थ की इच्छाओं को पूरा करने में भस्म हो रही है। तुम कमाते कमाते टूट चुके हो। तुम्हारी कमर झुक गई है। लेकिन उनका खर्च कम होने का नाम नहीं लेता। और तुम रोते हो कि हे विधाता मैंने ऐसा कौन सा पाप किया था कि मेरी सारी संपत्ति इस एक इंसान के पीछे नष्ट हो

14:07 रही है। तुम इसे अपना दुर्भाग्य कहते हो। तुम ग्रहों की दशा को दोष देते हो। पंडितों के पास जाकर ताबीज बंधवाते हो। लेकिन तुम नहीं जानते कि यह प्रकृति का सबसे अचूक गणित है। यह कोई दुर्भाग्य नहीं है। यह संकेत है कि अतीत के किसी जन्म में समय के किसी गहरे मोड़ पर तुमने उस जीवात्मा का धन छीना था। हो सकता है तुमने छल से उसकी संपत्ति हड़प ली हो या उसे कोई बहुत बड़ा आर्थिक आघात पहुंचाया हो। उस समय वह बेबस था। वह तुम्हारा कुछ बिगाड़ नहीं सका। लेकिन प्रकृति किसी का उद्धार नहीं रखती। अब वह आत्मा पति या पत्नी का रूप धारण

14:52 करके पूरे हक से पूरे अधिकार से तुम्हारी छाती पर बैठकर तुम्हारी जेब से अपना वह पुराना धन वापस निकाल रही है। और याद रखना यह सिलसिला तब तक चलता रहेगा जब तक उस पुरानी पाई पाई का हिसाब चुकता नहीं हो जाता। जिस दिन वह हिसाब पूरा होगा वह कर्म बंधन कट जाएगा। या तो वह बीमारी अचानक किसी चमत्कार की तरह ठीक हो जाएगी या फिर वह शरीर ही इस संसार से विदा हो जाएगा। तुम जिसे बीमारी कहते हो वह असल में तुम्हारे ही पुराने कर्मों की वसूली है। इस सत्य को और गहराई से समझने के लिए मैं तुम्हें एक प्राचीन तपोवन की एक कथा सुनाना चाहता हूं। एक बार एक बहुत ही सीधा

15:41 सादा और ईमानदार व्यक्ति जो पेशे से एक साधारण किसान था। एक महान सिद्ध गुरु के आश्रम में पहुंचा। वह फूट-फूट कर रो रहा था। उसने गुरुदेव के चरणों में सिर रखकर कहा, हे ऋषिवर मुझ पर बड़ी भारी विपत्ति टूट पड़ी है। मैंने अपने जीवन में कभी किसी चींटी को भी नहीं सताया। हमेशा धर्म के मार्ग पर चला हूं। कुछ वर्ष पूर्व मेरा विवाह हुआ था। विवाह के कुछ ही महीनों बाद मेरी पत्नी एक ऐसी अजीब बीमारी से ग्रस्त हो गई कि वह बिस्तर से उठ ही नहीं पाती। मैंने अपनी सारी खेती बेच दी। अपना घर गिरवी रख दिया।

16:26 गांव के हर वैद्य को दिखा लिया। लेकिन उसकी बीमारी बढ़ती ही जा रही है। अब मेरे पास उसे खिलाने के लिए अन्न का एक दाना तक नहीं बचा है। गुरुदेव मुझे बताइए कि मेरे ही साथ यह अन्याय क्यों हो रहा है? वह बेचारी भी दर्द से तड़प रही है और मैं भी। उन सिद्ध गुरु ने अपनी करुणा भरी दृष्टि से उस किसान की ओर देखा। उन्होंने अपनी चेतना को समेटा और समय के पार झांका। फिर उन्होंने एक गहरी सांस ली और कहा मेरे मासूम मित्र तुम केवल आज को देख रहे हो इसलिए तुम रो रहे हो। अगर तुम वह देख सको जो मैं देख रहा हूं तो तुम्हारे आंसू सूख जाएंगे। आज से दो जन्म पहले तुम एक बहुत ही चालाक और बेईमान व्यापारी थे। और यह जो

17:13 स्त्री आज तुम्हारी पत्नी है। यह उस जन्म में एक बहुत ही भोलीभाली विधवा थी। इसके पति के मरने के बाद तुमने छल कपट से इसकी सारी संपत्ति इसका सारा धन हड़प लिया था। वह बेचारी भूख से तड़प-तड़प कर सड़कों पर मर गई। उस समय जो धन तुमने छीना था, वह तुम्हारे कर्मों के खाते में एक भारी पत्थर की तरह दर्ज हो गया। आज जो तुम अपनी खेती बेचकर अपना घर गिरवी रखकर इस स्त्री की औषधियों पर धन लुटा रहे हो वह तुम कोई उपकार नहीं कर रहे हो। तुम केवल अपना वह पुराना कर्ज ब्याज सहित चुका रहे हो। जिस दिन वह पुराना हिसाब पूरा हो जाएगा यह

17:59 बीमारी अपने आप समाप्त हो जाएगी। इसलिए रो मत बल्कि उस परमात्मा का धन्यवाद करो कि वह तुम्हारा हिसाब इसी जन्म में साफ कर रहा है ताकि तुम आगे की यात्रा में हल्के होकर जा सको। यह कथा कोई साधारण कथा नहीं है। यह तुम्हारे ही जीवन का दर्पण है। लेकिन हर रिश्ता केवल दुश्मनी या पैसे के लेनदेन का नहीं होता। गरुड़ पुराण एक तीसरे प्रकार के विवाह की भी चर्चा करता है जिसे उदासीन संबंध कहा गया है। यह वह विवाह है जहां ना तो बहुत गहरा प्रेम है और ना ही बहुत गहरी नफरत। बस एक गाड़ी है जो घिसट रही है। तुम ऐसे कई जोड़ों को देखतेगे। पति अपने काम में व्यस्त है।

18:46 पत्नी अपने काम में मग्न है। दोनों एक ही छत के नीचे रहते हैं। लेकिन बिल्कुल अजनबियों की तरह उनके बीच कोई गहरा संवाद नहीं है। कोई आत्मिक स्पर्श नहीं है। कोई भावना नहीं है। वे केवल सामाजिक मर्यादा या बच्चों के लिए एक दूसरे को बर्दाश्त कर रहे हैं। यह तब होता है, जब पिछले जन्म में तुम्हारा उस आत्मा के साथ कोई बहुत गहरा लेनदेन नहीं था। बस कोई एक बहुत ही हल्का सा संपर्क था। कोई अधूरा छूटा हुआ वादा था। जिसे पूरा करने के लिए प्रकृति ने तुम्हें एक साथ बांध दिया है। यह रिश्ता एक ठंडी जेल जैसा लगता है। जहां कोई बड़ी सजा तो नहीं है लेकिन रिहाई भी

19:33 नहीं है। लेकिन इन सबके बीच एक चौथा रिश्ता भी होता है जो इस पृथ्वी पर बहुत ही दुर्लभ है। यह केवल उन मुट्ठी भर लोगों को मिलता है जिनकी चेतना बहुत शुद्ध है। जिनके पुण्य बहुत प्रबल है। इसे शास्त्रों में सखा जर्ण या पुण्य अनुबंध कहा गया है। जब तुम्हें कोई ऐसा पति या पत्नी मिले जो तुम्हारे बिना कहे तुम्हारे मन की हर बात तुम्हारे हर संताप को समझ ले। जो तुम्हारे दुख में तुमसे ज्यादा रोए और तुम्हारे सुख में तुमसे ज्यादा हंसे। जो तुम्हें इस संसार के कीचड़ में ना धकेले बल्कि

20:18 तुम्हें तुम्हारे सत्य के करीब उस परमात्मा के करीब ले जाए। जो तुम्हारे गिरने पर तुम्हें ताने ना मारे बल्कि तुम्हारी ढाल बनकर खड़ा हो जाए। तो अपने दोनों हाथ जोड़कर आसमान की तरफ देखना और धन्यवाद देना। समझ लेना कि यह पिछले जन्म का कोई ऐसा साथी है, कोई ऐसा गुरु या मित्र है जिसकी सेवा तुमने बिना किसी स्वार्थ के की थी। तुमने उसके साथ कोई बहुत ही शुभ कर्म किया था और अब वह तुम्हारे उसी निस्वार्थ प्रेम का फल बनकर तुम्हारे जीवन में तुम्हारी रक्षा करने आया है। ऐसे लोग अक्सर कहते हैं कि हमारी शादी तो स्वर्ग में तय हुई थी। हां, वे सही कहते हैं। वह स्वर्ग में ही तय हुई थी। लेकिन उस फैसले की स्याही तुम्हारे ही

21:05 पिछले जन्म के अच्छे कर्म थे। अब यहां एक बहुत बड़ा और सबसे गहरा प्रश्न उठता है जो तुम्हारे मन में भी इस क्षण कौन रहा होगा? क्या हम इस चुनाव को बदल सकते थे? जब हम मां के गर्भ में आ रहे थे या जब हमारा यह विवाह तय हो रहा था। क्या हमारे पास कोई विकल्प था? गरुड़ पुराण का विज्ञान कहता है कि विवाह उन चुनिंदा घटनाओं में से एक है जो पूरी तरह से प्रारब्ध के अंतर्गत आती है। हमारे जीवन में दो तरह के कर्म काम करते हैं। एक क्रियामान जो तुम अभी इस क्षण कर रहे हो और एक प्रारब्ध जो बीज रूप में पहले ही तय हो चुका है जिसे अब बदला नहीं जा सकता। मनुष्य के जीवन में माता

21:53 पिता मृत्यु का समय और उसका जीवन साथी यह तीन चीजें आत्मा अपने जन्म से पहले ही चुन लेती है या उसके कर्मों के अनुसार उसे सौंप दी जाती है। जब तुम मृत्यु और जन्म के बीच के उस अंतराल में थे। आत्मा के लोक में थे तब तुम्हारे सामने तुम्हारे कर्मों का पूरा नक्शा खोला गया था। तुम्हें दिखाया गया था कि तुम्हारी चेतना के विकास के लिए तुम्हारे इस झूठे अहंकार को तोड़ने के लिए तुम्हें किस तरह के जीवन साथी की आवश्यकता है। जी हां, यह बात तुम्हारे अहंकार को बहुत चुभेगी। लेकिन यह सत्य है। कभी-कभी एक क्रूर पति या एक झगड़ालू पत्नी एक बहुत अच्छे और प्रेमी जीवन साथी से

22:40 ज्यादा बेहतर होती है। तुम्हारी आध्यात्मिक यात्रा के लिए तुम पूछोगे कैसे? जरा विचार करो। अगर तुम्हें एक बहुत ही प्रेम करने वाला जीवन साथी मिल जाए। जो तुम्हारी हर बात माने जो तुम्हारी हर इच्छा पूरी करें। जो तुम्हें अपनी पलकों पर बिठाकर रखे तो तुम इस संसार की माया में इतने गहरे फंस जाओगे कि तुम्हें कभी उस परमात्मा की उस परम सत्य की याद ही नहीं आएगी। तुम सोचोगे कि बस यही संसार स्वर्ग है। मुझे और कुछ नहीं चाहिए। तुम्हारी यात्रा यहीं रुक जाएगी। तुम्हारी चेतना सो जाएगी। लेकिन जब तुम्हें ठोकर मिलती है, जब तुम्हारे अपने ही घर में क्लेश होता है, जब तुम अपने ही सबसे करीबी

23:28 व्यक्ति से अपमान के घूंट पीकर रात के अंधेरे में अकेले रोते हो, तब तुम्हारा मोह भंग होता है। तब तुम्हारे भीतर की वह गहरी नींद टूटती है। तब तुम्हें पहली बार यह समझ में आता है कि इस संसार में कोई किसी का नहीं है। सब स्वार्थ के रिश्ते हैं। और तब उस गहरी पीड़ा में तुम उस परमपिता परमात्मा की ओर मुड़ते हो। याद करो भक्त राज तुलसीदास को। तुलसीदास अपनी पत्नी रत्नावली के मुंह में इतने अंधे थे कि आधी रात को उफनती हुई नदी पार करके मुर्दे पर बैठकर उससे मिलने पहुंच गए थे। वे वासना से भरे थे। लेकिन उनकी पत्नी ने उन्हें गले नहीं लगाया। उसने उन्हें

24:14 धिक्कारा। उसने एक ऐसा कड़वा ताना मारा जिसने तुलसीदास के अहंकार के चीथड़े उड़ा दिए। उसने कहा कि जितना प्रेम तुम मेरे इस हाड़ मांस के शरीर से कर रहे हो अगर इसका आधा प्रेम भी तुमने श्री राम से किया होता तो भवसागर पार हो जाते। अगर उस रात रत्नावली ने उन्हें प्यार से गले लगा लिया होता तो क्या आज दुनिया को रामचरितमानस मिलती? कभी नहीं मिलती। तुलसीदास एक साधारण कामी पुरुष की तरह पैदा होते और मर जाते। उस पत्नी के रूप में आए उस कड़वे कर्म ने उस तिरस्कार ने तुलसीदास को उनकी नींद से झकझोर कर जगा दिया। उनकी वासना प्रार्थना में बदल गई। अगर आज तुम्हारे

25:00 जीवन में ऐसा ही कोई भारी संघर्ष है। अगर तुम्हारा जीवन साथी तुम्हें समझ नहीं रहा है। तुम्हें पीड़ा दे रहा है तो रुको। उसे कोसना बंद करो। उसके साथ झगड़ना बंद करो। क्योंकि तुम उस व्यक्ति से नहीं लड़ रहे हो। तुम अपने ही पिछले जन्म के कर्म से लड़ रहे हो। और कर्म से लड़कर आज तक कोई नहीं जीत सका है। तुम आईने में खड़े अपने ही अक्ष को थप्पड़ नहीं मार सकते। अगर तुम्हें अपना प्रतिबिंब बदलना है तो तुम्हें अपना असली चेहरा बदलना होगा। तुम्हें अपने भीतर उस गहरी समझ को उस प्रज्ञा को जगाना होगा। तुम मुझसे पूछते हो और तुम्हारे मन में यह सवाल बार-बार उठ

25:46 रहा होगा कि ओशो अगर यह सब पिछले जन्म का कर्म है अगर यह सब ऋणानुबंध है तो क्या हम जिंदगी भर इसी तरह घुट-घुट कर मरते रहे? क्या हम चुपचाप इस अत्याचार को सहते रहे? नहीं। मैंने ऐसा कभी नहीं कहा। गरुड़ पुराण या योग का कोई भी विज्ञान तुम्हें अत्याचार सहने को नहीं कहता। लेकिन वह तुम्हें व्यर्थ लड़ने को भी नहीं कहता। वह तुम्हें एक बहुत गहरी कीमिया सिखाता है स्वीकार और रूपांतरण की। जब तक तुम यह मानते रहोगे कि मेरी पत्नी एक राक्षसी है या मेरा पति एक जल्लाद है। तब तक तुम एक पीड़ित की भूमिका में रहोगे, तुम दुखी रहोगे, तुम रोते रहोगे। लेकिन जिस क्षण तुम्हारी चेतना में यह बोध उतरेगा कि सामने वाला व्यक्ति मेरा शत्रु नहीं बल्कि

26:32 मेरे ही कर्मों का डाकिया है। जो केवल मेरा ही लिखा हुआ खत मुझे वापस देने आया है। उसी क्षण तुम्हारे भीतर एक महाक्रांति घटित हो जाएगी। तुम्हारी सारी शिकायतें वाष्प बनकर उड़ जाएंगी। उस दिन तुम उस व्यक्ति को एक बिल्कुल अलग नजर से देखोगे। तुम सोचोगे कि यह बेचारा भी तो नियति के हाथों कितना मजबूर है। यह भी तो अपनी भूमिका बस इसलिए निभा रहा है ताकि मेरा पुराना हिसाब चुकता हो सके। यहीं पर तंत्र का एक बहुत बड़ा चमत्कार होता है। शास्त्रों में इस कर्म बंधन को काटने की एक बहुत गुप्त विधि है जिसे क्षमा का ध्यान कहते हैं। तुम कहते हो कि तुम अपने पति या पत्नी से नफरत करते हो। तुम उनसे

27:18 छुटकारा पाना चाहते हो। लेकिन याद रखना नफरत भी एक बहुत गहरा बंधन है। प्रेम से भी ज्यादा गहरा बंधन नफरत का होता है। जिसे तुम प्रेम करते हो उसे तुम शायद अगले जन्म में भूल भी जाओ। लेकिन जिसे तुम नफरत करते हो, जिसके बारे में तुम दिन रात बुरा सोचते हो, उसे तो प्रकृति दोबारा तुम्हारे सामने लाकर खड़ा कर देगी। क्योंकि तुम्हारा सारा ध्यान उसी पर अटका हुआ है। तुम अपनी नफरत के धागों से उसे अपने साथ बांध रहे हो। अगर तुम इस जन्म में अपने उस कष्टदाई जीवन साथी से सचमुच पीछा छुड़ाना चाहते हो तो केवल अदालत जाकर तलाक लेना काफी नहीं। कागज पर

28:03 तलाक हो सकता है। लेकिन चेतना के स्तर पर तलाक तब तक नहीं होता। जब तक तुम्हारे भीतर पूर्ण क्षमा नहीं उतरती। जिस दिन तुम अपने एकांत में बैठते हो, अपनी आंखें बंद करके ईश्वर से कहते हो, हे अस्तित्व इसका और मेरा जो भी जन्मों का लेनदेन था, आज मैं उसे अपने पूर्ण प्रेम और क्षमा के साथ समाप्त करता हूं। मैं इस आत्मा को मुक्त करता हूं और स्वयं को भी मुक्त करता हूं। जिस क्षण यह क्षमा तुम्हारी नाभि से उठती है, उस दिन वह जन्मों जन्मों की अदृश्य डोरी टूट जाती है। या तो उस व्यक्ति का व्यवहार तुम्हारे प्रति बदल जाएगा या फिर वह तुम्हारे जीवन से अपने आप दूर हो

28:49 जाएगा। क्षमा वह परम अग्नि है जो सारे कर्म बंधनों को जलाकर भस्म कर देती है। तुम हमेशा शिकायत करते हो कि तुम्हें तुम्हारा सोलमेट नहीं मिला। वह आदर्श साथी नहीं मिला जो तुम्हें हमेशा खुश रखे। लेकिन सोलमेट का अर्थ वह नहीं है जो तुम्हारी हर हां में हां मिलाए। सोलमेट का अर्थ है वह साथी जो तुम्हारी आत्मा को शुद्ध करें। और आत्मा सोने की तरह होती है। सोने को शुद्ध करने के लिए उसे भट्टी की आग में तपना पड़ता है। तो अगर तुम्हारा जीवन साथी तुम्हें तपा रहा है। तुम्हें अपने क्रोध और तानों की आग में जला रहा है। तो समझ लेना वह तुम्हारी अशुद्धियों

29:36 को जला रहा है। वह तुम्हारे अहंकार को तुम्हारे छिपे हुए क्रोध को बाहर निकाल रहा है। महाभारत में गांधारी ने धृतराष्ट्र को चुना जो प्रज्ञा से भी अंधे थे। मंदोदरी ने रावण को चुना जो अहंकार का पुतला था। क्या यह कोई संयोग था? नहीं। यह उन जागृत आत्माओं का अपना चयन था। उन्होंने जानबूझकर अपने लिए कठिन परीक्षा चुनी। क्योंकि वे जानती थी कि आसान प्रश्न पत्र हल करके कोई आध्यात्मिक ऊंचाइयों को नहीं छू सकता। एक कठिन पति या पत्नी का मिलना यह बताता है कि तुम्हारी आत्मा इस कठिन परीक्षा को पार करने की क्षमता रखती है। तो अब सवाल यह है कि आज रात जब तुम

30:24 अपने उस जीवन साथी को देखो तो तुम्हें क्या करना चाहिए? क्या तुम्हें फिर से वही पुरानी बहस शुरू करनी चाहिए? नहीं। आज रात तुम उन्हें केवल एक हार्ड मांस के शरीर के रूप में मत देखना। आज तुम यह मत देखना कि वे तुम पर चिल्ला रहे हैं या मुंह फेर कर सो रहे हैं। आज रात तुम उनके भीतर बैठी उस अनंत आत्मा को देखने की कोशिश करना विचार करना कि यह आत्मा भी उतनी ही पुरानी है जितनी कि मैं हूं। हम दोनों न जाने कितने जन्मों से एक दूसरे का पीछा कर रहे हैं। कभी मैंने इसे रुलाया था। आज यह मुझे रुला रहा है। यह मूर्छा का खेल बहुत लंबा चल

31:09 चुका है। अब इस खेल को खत्म करने का समय आ गया है। और इस खेल को खत्म करने का केवल एक ही तरीका है कृतज्ञता। जी हां, उस इंसान के प्रति कृतज्ञता से भर जाओ जिसने तुम्हें इतना दुख दिया है। क्योंकि उसी संताप ने आज तुम्हें जागने पर मजबूर किया है। उसी पीड़ा ने तुम्हें परमात्मा के रास्ते पर धकेला है। गरुड़ पुराण और संत कहते हैं कि इस युग में पति पत्नी का रिश्ता ही मोक्ष का सबसे बड़ा द्वार बन सकता है। अगर तुम सन्यासी बनकर हिमालय चले जाओ, तो वहां शांत रहना बहुत आसान है। वहां तुम्हारे अहंकार को चोट पहुंचाने वाला कोई नहीं। लेकिन एक गृहस्थ जीवन में इन सारी खटपट और तानों के बीच

31:59 अगर तुम अपना मानसिक संतुलन बनाए रख सको। अगर तुम सामने वाले के क्रोध को अपनी शांति से पी सको तो तुम हिमालय के किसी भी बड़े तपस्वी से बड़े योगी हो। तुम्हारा अपना घर ही तुम्हारा हिमालय है और तुम्हारा जीवन साथी ही तुम्हारी सबसे बड़ी तपस्या है। इसीलिए अगली बार जब तुम्हारा जीवन साथी तुम्हें चोट पहुंचाए तो कोई प्रतिक्रिया मत देना। बस एक गहरी सांस लेना और अपनी नाभि के केंद्र से जुड़कर मन ही मन कहना हिसाब बराबर हुआ। जैसे ही तुम यह कहोगे, तुम देखोगे कि वह बात तुम्हें चुभना बंद हो जाएगी। तुम एक साक्षी बन जाओगे। तुम देखोगे कि सामने केवल एक कठपुतली है जो चिल्ला रही है और उसके धागे

32:45 उसके पुराने कर्मों से बंधे हैं। उस पर दया करो। क्रोध नहीं। तुम यहां केवल घर बसाने और मर जाने के लिए नहीं आए हो। तुम यहां अपने असली घर उस परमधाम वापस जाने की तैयारी करने आए हो। और यह जीवन साथी उस लंबी यात्रा में तुम्हारा एक सहयात्री मात्र है। कर्मों का चक्र तोड़े बिना तुम्हें कभी शांति नहीं मिलेगी। और इस चक्र को तोड़ने की कैंची केवल दो ही हैं। प्रेम और पूर्ण क्षमा। आज रात सोने से पहले जब तुम्हारा जीवन साथी गहरी नींद में सो जाए तब उसके चेहरे को बहुत ध्यान से देखना और उस मौन में उसकी आत्मा से सीधे बात करना। मन ही मन कहना मैं नहीं जानता

33:31 कि तुम पिछले जन्म में कौन थे। लेकिन इस जन्म में तुम मेरे साथ हो। मैं तुम्हें अपने सारे क्रोध से पूरी तरह मुक्त करता हूं। तुम भी मुझे मुक्त करो। हम दोनों शांति से अपनी यात्रा पूरी करें। यह एक छोटी सी प्रार्थना तुम्हारी पूरी दुनिया बदल सकती है। क्योंकि जब तुम भीतर से बदलोगे तो तुम्हारे आसपास की ऊर्जा बदल जाएगी। और जब ऊर्जा बदलेगी तो सामने वाले को बदलना ही पड़ेगा। तुम्हारा जीवन साथी तुम्हारा सबसे बड़ा आईना है। उसमें अपना असली चेहरा देखो। अपने भीतर के दाग साफ करो और मुस्कुराओ। क्योंकि अंत में हम सब एक ही नदी के यात्री हैं। बस अलग-अलग नावों में सवार

34:18 हैं। मिलना और बिछड़ना तो इस संसार के घाट का नियम है। लेकिन इस यात्रा का आनंद लेना, इसे ध्यान बना लेना। यह केवल एक जागृत आत्मा ही जानती है। प्रणाम।

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