हर जगह प्रोटेस्ट… फिर भी शोषण क्यों नहीं रुकता? || आचार्य प्रशांत (2026)

संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो भारतीय समाज में व्याप्त शोषण और असमानता पर प्रकाश डालता है। इसमें बताया गया है कि कैसे जनसंख्या और बेरोजगारी के कारण लोग कम वेतन पर काम करने को मजबूर हैं, और कैसे पूंजीवादी व्यवस्था इस स्थिति का फायदा उठाती है। वीडियो में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि सरकार भी पूंजीपतियों से धन लेकर वोट खरीदती है, जिससे शोषण को रोकने की संभावना कम हो जाती है। अंत में, वीडियो दर्शकों को अपनी मान्यताओं और परंपराओं पर सवाल उठाने और शोषण के खिलाफ खड़े होने के लिए प्रोत्साहित करता है।

मुख्य बातें:

  • भारतीय समाज में जनसंख्या और बेरोजगारी के कारण शोषण व्याप्त है।
  • पूंजीवादी व्यवस्था इस स्थिति का फायदा उठाती है।
  • सरकार भी पूंजीपतियों से धन लेकर वोट खरीदती है।
  • शोषण को रोकने के लिए, हमें अपनी मान्यताओं और परंपराओं पर सवाल उठाना होगा।

परिचय: समाज में व्याप्त शोषण और असमानता

वीडियो की शुरुआत में, वक्ता भारतीय समाज की संरचना पर प्रकाश डालते हैं, जहाँ जनसंख्या तो बहुत अधिक है, लेकिन धन कुछ ही लोगों के हाथों में केंद्रित है। वे इस बात पर जोर देते हैं कि इस स्थिति में, यदि कोई व्यक्ति कम वेतन पर काम करने से इनकार करता है, तो उसकी जगह लेने के लिए कई लोग तैयार रहते हैं। वक्ता आदर्शवादी समाधानों पर सवाल उठाते हैं और पूछते हैं कि इन आदर्शों को वास्तविकता में कौन बदलेगा।

आदर्श बनाम वास्तविकता: शोषण को कौन रोकेगा?

वक्ता पूछते हैं कि गिग वर्कर्स के साथ बेहतर व्यवहार कौन करेगा। नियोक्ता (employer) तो लाभ कमाने के लिए हैं, और सरकार वोट और धन के लिए पूंजीपतियों पर निर्भर है। ऐसे में, शोषण को रोकने की जिम्मेदारी किसकी है? वक्ता बताते हैं कि सरकार अक्सर उन्हीं लोगों से वोट लेती है जिन्हें वह पैसा देकर खरीदती है, और यह पैसा पूंजीपतियों से आता है। इसलिए, सरकार पूंजीपतियों पर रोक लगाने के बजाय, उनसे और अधिक धन प्राप्त करना चाहेगी ताकि वह लोगों को सस्ते में खरीद सके और उनसे वोट ले सके।

जनता की भूमिका: अज्ञानता और उदासीनता

वक्ता जनता की भूमिका पर सवाल उठाते हैं, जो अक्सर शराब, पैसे या मुफ्त उपहारों के लिए अपना वोट बेच देती है। वे पूछते हैं कि क्या ऐसी जनता द्वारा चुनी गई सरकार शोषण को रोक पाएगी, जबकि वह खुद पूंजीपतियों से पैसे लेकर चुनाव में बांटती है। वक्ता का मानना है कि जब तक समाज की नींव अज्ञानता, मान्यताओं, धारणाओं और अंधविश्वासों पर टिकी रहेगी, तब तक शोषण का खेल चलता रहेगा।

शोषण की जड़: अज्ञानता और मान्यताएं

वक्ता का तर्क है कि दुख का कारण अज्ञानता है। वे श्रोताओं को अन्याय की जड़ तक पहुंचने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, यह समझाते हुए कि व्यक्ति अन्याय नहीं है, बल्कि व्यवस्था ही अन्यायपूर्ण है। यह व्यवस्था मान्यताओं, धारणाओं, परंपराओं और अंधविश्वासों पर आधारित है। वक्ता श्रोताओं को उन कहानियों पर ध्यान देने के लिए कहते हैं जिन्हें वे पवित्र मानते हैं, और उनमें मौजूद असमानता और शोषण को पहचानने के लिए कहते हैं।

परंपराओं का सम्मान: क्या यह उचित है?

वक्ता उन परंपराओं पर सवाल उठाते हैं जिन्हें लोग सम्मान देते हैं, और पूछते हैं कि क्या उनमें समानता है या नहीं। वे ताजमहल जैसे स्मारकों का उदाहरण देते हैं, जो भयानक शोषण के प्रमाण हैं। वक्ता पूछते हैं कि क्या उस समय समाज समतावादी था जब ये स्मारक बनाए गए थे, जबकि अधिकांश आबादी गरीबी में जी रही थी।

ब्रिटिश साम्राज्य और भारत: एक विरोधाभास

वक्ता ब्रिटिश साम्राज्य का उदाहरण देते हैं, जो सबसे धनी और शक्तिशाली साम्राज्य था, लेकिन उसी दौरान भारत में सबसे बड़ा अकाल पड़ा था। वे श्रोताओं को खुश होने के बजाय, आम आदमी की हालत देखने के लिए कहते हैं। वक्ता कहते हैं कि आम आदमी को भी राजाओं से मतलब है, लेकिन उसे अपने भाई-बंधुओं के बारे में भी पूछना चाहिए कि वे कैसे रहते थे।

शोषण का संस्थागतकरण: जाति और लिंग

वक्ता का मानना है कि भारत उन कुछ देशों में से एक है जिसने शोषण को संस्थागत बना दिया है, यह कहकर कि कुछ जातियों और लिंगों का शोषण होना चाहिए। वे पूछते हैं कि गिग वर्कर्स के साथ अन्याय होने पर आश्चर्य क्यों होता है, जबकि समाज में पहले से ही शोषण व्याप्त है।

निष्कर्ष: शोषण के खिलाफ खड़े होने की आवश्यकता

वक्ता जर्मनी का उदाहरण देते हैं, जिसने प्रथम विश्व युद्ध के बाद अपने अपमान की फाइनेंसिंग करने से इनकार कर दिया था। वे कहते हैं कि जब तक हम अपने शोषकों के सामने सिर झुकाते रहेंगे, तब तक भारत में शोषण होता रहेगा। वक्ता ऐसे इंसान की तलाश करते हैं जिसमें इतनी गरिमा हो कि वह शोषण के खिलाफ खड़ा हो सके।

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Transcript

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0:00 यह समाज ऐसा है जिसमें खूब आबादी है और इसके मूल्य ऐसे हैं कि इस समाज में ज्यादातर पैसा चंद हाथों में सीमित है, केंद्रित है। एक आदमी मना करेगा कि मुझे इन स्थितियों में इतने पैसों में काम नहीं करना है। तो चार आदमी खड़े हैं। कितना सुंदर आदर्श है। आ चल के तुझे मैं लेके चलूं एक ऐसे गगन के तले जहां गम भी ना हो आंसू भी ना हो बस प्यार ही प्यार खिले आ हा हा ये सब तो ठीक है सर पर ये करेगा कौन 150 करोड़ लोगों का देश है रोज ही कुछ ना

0:45 कुछ ऐसा हो रहा होता है कि आप लोग उस पर आउटरेज कर सकते हैं 90 95% आबादी क्या करती थी उसके पास कितना पैसा रहा होगा तो ये ताजमहल कैसे बन गया आज का कैपिटलिस्ट तुम्हें बुरा लगता है पर वहां जाके खड़े होकर के सेल्फी लेते हो और बहुत खुश हो जाते हो। बहुत कम देश होते हैं जो अपने शोषकों को पूजना शुरू कर दें। हम बिरले हैं जो कैपिटलिस्ट हैं वो एक ऐसे माहौल में मौजूद है जहां पर लोग बहुत कम पैसों पर बहुत सस्ती दरों पर काम करने को तैयार हैं। क्यों? क्योंकि जनसंख्या और बेरोजगारी दोनों बहुत ज्यादा है। एक आदमी मना करेगा तो चार कतार में खड़े हैं उसकी

1:30 जगह लेने के लिए। एक आदमी मना करेगा कि मुझे इन स्थितियों में इतने पैसों में काम नहीं करना है तो चार आदमी खड़े हैं। ये ये ये ओवरऑल सिचुएशन है। ये स्थिति पर हम एक विहंगम दृष्टि ले रहे हैं। ये मैक सिचुएशन है। ठीक है? यह समाज ऐसा है। यह समाज ऐसा है जिसमें खूब आबादी है। खूब आबादी है। और इसके मूल्य ऐसे हैं कि इस समाज में ज्यादातर पैसा चंद हाथों में सीमित है। केंद्रित है। ठीक है? ये समाज ऐसा है। आप कह रहे हो आदर्श ये है कि आप किसी से काम करा रहे हो तो उसे और ज्यादा पैसा दो और उसके लिए काम करने की बेहतर स्थितियां

2:16 बनाओ। बहुत सुंदर आदर्श बताया आपने। अब ये करेगा कौन? कौन करेगा? कोई दूसरा देश आगे करेगा? कौन करेगा? जो होना है इसी देश में इसी देश के लोगों द्वारा होना है। तो आप बताइए ये कौन करेगा? मुझे बताइए। तो हम चाह क्या रहे हैं? कौन करेगा ये? हम माने कौन? जो आपके ख्याल में रहता है ना जो आप बोलते हो ऐसा होना चाहिए। गिग वर्कर्स के साथ बेहतर सलूक होना चाहिए। सुंदर आदर्श है। बिल्कुल होना चाहिए। पर करेगा कौन? कौन करेगा? एंप्लयर क्यों करेगा? वो नहीं करना चाहता। वो दान दक्षिणा करने, मानवता की सेवा करने, करुणा बरसाने वो तो सीधे कह रहा है। मैं

3:01 कोई लंगर डालने थोड़ी आया हूं। मैं पैसा कमाने आया हूं। मैं तो पैसा कमाने आया हूं। तो कौन करेगा फिर? सरकार। अच्छा। सरकार को वोट मिलता है ज्यादातर ऐसे लोगों से जो कुछ जानते नहीं अंधेरे में है बेहोश हैं और पैसा मिलता है उसी कैपिटलिस्ट से यह सरकार है। सरकार जिनसे वोट भी लेती है अक्सर उनको पैसा देकर लेती है और पैसा भी उस कैपिटलिस्ट से मिलता है। ज्यादातर लोग जो वोट डाल रहे हैं वह पैसा लेकर डाल रहे हैं। यही हो रहा है ना? फ्री बीस मिल जाएंगी।

3:48 यह मिल जाएगा, वह मिल जाएगा। पहले तो सीधे-सीधे नोट वगैरह ट्रक भर-भर के पकड़े जाते थे चुनावों से पहले। फिर उस पर चुनाव आयोग ने और अदालत ने रोक लगा दी। तो दूसरे तरीकों से जनता तक पैसा पहुंचाया जाता है। तो सरकार जो पैसा देकर के लोगों से वोट खरीद रही है, वह पैसा ही किससे आ रहा है? कैपिटलिस्ट से? तो यह सरकार उस कैपिटलिस्ट पे रोक लगाएगी या यह सरकार चाहेगी कि और ज्यादा पैसा उस कैपिटलिस्ट के पास कंसंट्रेट हो जाए और लोग और गरीब हो जाए ताकि उससे पैसा लेके इनको और सस्ते दाम पर खरीद के इनका वोट ले लें। जल्दी बोलो तो आदर्श तो बहुत अच्छा है। इगलिटेरियन आइडियल लोग आए लोग काम करें। मिनिमम वेजेस होनी

4:34 चाहिए। मिनिमम माने एटलीस्ट मिनिमम कम से कम इतने स्तर कि उनको वेजेस मिलनी चाहिए ये होना चाहिए कितना सुंदर आदर्श है आ लेके चलें एक ऐसे गगन के तले हम आ चल के तुझे मैं लेके चलूं एक ऐसे गगन के तले जहां गम भी ना हो आंसू भी ना हो बस प्यार ही प्यार खिले आ हा हा ये सब तो ठीक है सर पर ये करेगा कौन कौन कौन करेगा? जनता करेगी। जनता करेगी जिसने सदा से कभी दारू की एक बोतल के लिए, कभी ₹100 के लिए, कभी फ्री बीस के लिए अपना वोट बेचा है। जनता करेगी। जनता उसी जनता द्वारा चुनी गई सरकार करेगी। जो उन्हीं कैपिटलिस्ट से पैसे लेकर के

5:20 इलेक्शन में जनता में बांटती है। यह कौन करेगा? कोई नहीं करेगा। बस तमाशा अच्छा बनेगा। कुछ दिन और शोर मचा लो। गिग वर्कर्स हम तुम्हारे साथ हैं। गिग वर्कर्स हम तुम्हारे साथ हैं। मचा लो शोर। और अगर मैं अब बोलूं कि दुख जहां भी है जिस रूप में भी है उसका कारण अज्ञान है। तो कहोगे ये बात को जलेबी की तरह घुमा देते हैं। यह डायरेक्ट मुद्दे पर बात नहीं करते। एक्सप्लइटेशन हो रहा है कि नहीं? हो रहा है ना? तो उस पे रोक लगनी चाहिए ना? हां। तो उसकी बात करो ना। मैं पूछ रहा हूं कर रहा हूं मैं बात बताओ कौन रोकेगा रोक के दिखाओ

6:06 रोक के दिखाओ ना कौन रोकेगा ऊपर से कोई शक्ति आ नहीं सकती और सीमा पार से हम किसी शक्ति को आने नहीं देंगे तो कौन रोकेगा हमें ही रोकना है ले देकर हम ही हैं। क्या बोलता है हमारा संविधान वी क्या वी द पीपल गिव टू आवरसेल्व्स दिस कॉन्स्टिट्यूशन किसी बाहरी ताकत ने हमें नहीं चला रखा। हम स्वयं अपना संविधान निर्धारित करते हैं। हमें ही रोकना है। हम कैसे रोकेंगे? ना हमें पढ़ने में रुचि, ना लिखने में रुचि, ना हमें तथ्य जानने में रुचि, हमें टीवी पर बेहूदा शोर सुनने में रुचि है। समाचार के नाम पर।

6:53 हम पढ़ नहीं सकते कुछ भी। तो कोई आकर के आकर हमको ज्ञान देकर जाता है 15 मिनट में वह आएगा और बताएगा मैं आपको बताने जा रहा हूं कि दुनिया में क्या चल रहा है। वो क्या वो वो वो फील्ड रिपोर्टिंग कर रहा है। कुछ नहीं कर रहा है। वो जाकर के विकपीडिया पढ़ के और धरधर करके 15 मिनट का वीडियो बना दे रहा है। आप खुश हो जा रहे हो। ज्ञान वो जो कुछ पढ़ रहा है आप खुद भी पढ़ सकते हो। बेहतर पढ़ सकते हो। ज्यादा विस्तार में पढ़ सकते हो। यह तो हम लोग हैं। हम रोकेंगे शोषण। हम रोकेंगे। बस यह है कि शोर मचा के हम अपने आप को सांत्वना दे लेंगे कि हम अच्छे लोग हैं, नैतिक लोग हैं। देखो गिग वर्कर्स का एक्सप्लॉयटेशन हो रहा था। हमने भी आवाज

7:40 उठाई। हमने कैसे आवाज उठाई? हमने वो जो एक वीडियो बनाया था हमारे फेवरेट इन्फ्लुएंसरर ने कि सी गिग वर्कर्स आर बीइंग एक्सप्लॉयटेड। हमने आके उसको लाइक कर दिया। और हमने कमेंट भी लिख दिया। डाउन विद कैपिटलिज्म टू हुड्स टू एक्सप्लइटेशन। यह अलग बात है कि जितनी एक्सप्लइटेटिव फोर्सेस हैं मेरे सब पसंदीदा सेलिब्रिटीज, बाबाजी, नेताजी सब उसी एक्सप्लइटेटिव ताकत के हिस्से हैं। उसी एक्सप्लॉयटेटिव स्ट्रक्चर के हिस्से हैं। वो सब जिन्हें मैं अपना फेवरेट बोलता हूं। यह अलग बात है। पर जब गिग वर्कर्स की बात आएगी तो मैं जाकर के वहां पर लाइक बटन दबा दूंगा।

8:34 जहां समाज की बुनियाद ही अज्ञान की बनी हुई है। मान्यताओं की बनी हुई है। धारणा की बनी हुई है। अंधविश्वास की बनी हुई है। बहुत झूठे सिद्धांतों क्या जहां बुनियाद है। वहां इमारतों में शोषण होगा कि नहीं होगा? बोलो। तो हो रहा है। उस पे तुम्हें शोर मचा के खुश होने तो हो लो। कुछ दिन शोर मचाओ खुश हो लो। फिर एक नया मुद्दा जाएगा उस पे शोर मचा लेना, खुश हो लेना। पर जब तक बुनियाद कोई ठीक नहीं करोगे, यह शोषण का खेल चलता रहेगा। और आउटरेज के लिए हमें मुद्दे तो मिल ही जाते हैं हर दूसरे दिन। 150 करोड़ लोगों का देश है। रोज ही कुछ ना कुछ ऐसा हो रहा होता है कि आप तरक्की पसंद, उदार लिबरल लोग उस पर

9:20 आउटरेच कर सकते हैं। सुबह उठिए, अखबार खोलिए, कहिए। सो, व्हाट्स देयर टू आउटरेच टुडे? कुछ ना कुछ मिल ही जाएगा। किसी का रेप हो गया है। किसी की लिंचिंग हो गई है। किसी का एक्सप्लइटेशन हो गया है। किसी को फालतू फायर कर दिया। कोई किसी का कुछ कर रहा है। कहीं सड़क में गड्ढा निकल आया। कर लीजिए आउटरेज। आउटरेज भी इंडस्ट्री है पूरी। सचमुच बुरा लगता है जब किसी के साथ अन्याय होता देखो तो अन्याय की जड़ तक पहुंचो।

10:07 व्यक्ति अन्याय नहीं है। यह व्यवस्था ही अन्याय है। क्योंकि यह व्यवस्था, मान्यता, धारण, धारणा, परंपरा, अंधविश्वास इन पर आधारित है। आप जिन चीजों को बहुत महत्व देते हैं, जो कहानियां आपके चित्त को बड़ी प्यारी हैं और बड़ी पवित्र हैं। गौर से देखिए उन कहानियों को। क्या उनमें भयानक असमानता नहीं है? क्या शोषण नहीं है? वही सब तो हमारे सामाजिक जीवन की बुनियाद भी है ना।

10:59 आप सब बहुत सम्मान देते हो उन्हीं तरीकों को जैसे घर में चलते आए हैं जैसे बाप दादाओं ने किया तो यह बताओ वहां समानता चलती थी क्या वहां तो आज आप जितनी असमानता देख रहे हो उससे और ज्यादा थी आज तो फिर भी कानून और संविधान ने यह कर दिया है कि किसी की जात वगैरह पूछ के उसके साथ आप बदतमीजी नहीं कर सकते। जिन चीजों को हम बहुत सम्मान देते हैं उन उन चीजों को देखो गौर से और बताओ कि उनमें भयानक असमानता है कि नहीं और शोषण है कि नहीं। अब एक और आप शोषण का विरोध करना चाहते हो।

11:45 देखो सवाल में कितनी उग्रता थी। कितना असंतोष था। गिग वर्कर्स के साथ बुरा हो रहा है। एक और तो आप शोषण का, असमानता का विरोध करना चाहते हो। दूसरी ओर आप उन्हीं सब परंपराओं को पूजते भी हो। ऐसा कैसे चलेगा? बोलो। आपको कितना अच्छा लगता है। आप कहते हो अब हम जा रहे हैं अपनी धरोहर देखने। ये देखो ये विराट महल यहां हमारे पुराने राजा ने ये कर रखा था वो कर रहा था ये मुगल बादशाह उसने यहां पे इतना बड़ा ये खड़ा कर दिया ताजमहल और यहां देखो यहां पे चांदी मढ़ा रखी थी वो गुंबद वो शिखर वो सोने का था ये

12:32 तबा कैसे हुआ था वो इगलिटेरियन था क्या समाज बोलो ना वो उतना बड़ा महल जिसमें सोने के गुंबद हैं और ऊंची ये है प्राचीर है और ये जो ताजमहल संगमरमर का यह इगलिटेरियन सोसाइटी के गवाह हैं। यह तो प्रमाण हैं भयानक शोषण के कि नहीं है? उस समय तो इंडस्ट्री भी नहीं थी। खेती चलती थी और कुछ आर्टिजंस थे जो हैंडीक्राफ्ट्स। ज्यादातर आबादी क्या करती थी? खेती करती थी। बाकी आबादी क्या करती थी? कुछ कुछ कोई कपड़ा बना रहा है, कोई लोहे की चीजें बना रहा है, कुछ लकड़ी का काम कर रहा है, कोई यह और उसके अलावा मुट्ठी भर

13:18 लोग थे जो ट्रेडिंग करते थे। पर 90 95% आबादी क्या करती थी? उसके पास कितना पैसा रहा होगा? तो ये ताजमहल कैसे बन गया? जल्दी बोलो। आज का कैपिटलिस्ट तुम्हें बुरा लगता है। पर वहां जाकर खड़े होकर के सेल्फी लेते हो। और बहुत खुश हो जाते हो। हमारे ऐसे राजा थे, राजों ने यह किया, राजों ने वह किया। राजे तो ठीक है। आम आदमी का क्या हाल था? वो इतिहास ना हमें जानना है, ना सामना करना है। ब्रिटिश एंपायर वाज़ द रिचेस्ट एंड इंडिया

14:04 वाज़ द बिग पार्ट ऑफ इट। वाज़ इट नॉट? और उसी रिचेस्ट और मोस्ट पावरफुल एंपायर में दुनिया का आज तक का सबसे बड़ा अकाल पड़ा था। 194142 में बंगाल में। आप खुश होते रहिए क्योंकि टेक्निकली अगर भारत ब्रिटिश एंपायर का पार्ट था तो भारत भी एक बहुत अमीर एंपायर का हिस्सा था। ब्रिटिश किताबें मालूम है क्या बोलती हैं? बोलती हैं व्हेन द वर्ल्ड वॉर टू स्टार्टेड द मेजॉरिटी ऑफ द किंगडम वाज हिंदू। वास्तव में हिटलर को हिंदुओं ने हराया है। क्योंकि ब्रिटिश एंपायर ने हराया है और

14:50 ब्रिटिश एंपायर में सबसे ज्यादा आबादी हिंदुस्तान की थी तो ब्रिटिश एंपायर में 50% से ज्यादा हिंदू थे। तो हिटलर को किसने हराया? हिंदुस्तान ने। या तो अपने आप को इस तरह के भुलावे और दिलासे देते रहिए या यह देख लीजिए कि तुम्हारी ब्रिटिश एंपायर कुछ भी रही होगी। भारत तो अकाल से मर रहा था और तुम्हारे वर्ल्ड वॉर टू की वजह से ही बंगाल में उतना अकाल पड़ा था। तुमने धान नहीं रोपने दिया। और जब लोग मरने लगे तो भी तुमने कहा कि नहीं सप्लाई सारी वॉर एफर्ट में जाएंगी। पेमें रिलीफ में नहींंगी। या तो खुश होते रहो कि इतना पैसा था, इतना

15:36 पैसा था या यह देख लो कि आम आदमी की क्या हालत थी। आम आदमी से तो आम आदमी को ही मतलब नहीं है। आम आदमी को भी राजाओं से मतलब है। वाह क्या महल है। महल तो है वो पहाड़ के ऊपर बनाया है। और वहां नीचे जो लोग रहते थे उनके बारे में तू आम आदमी है। अपने भाई बिरादरों के बारे में भी तो पूछ ले कि वो कैसे रहते थे। आम आदमी भी जाकर के ऐसे मेसमेराइज्ड। वाह क्या महल है। अरे वो तेरा ही शोषण करके बना था वह महल। यह उस समय की रानी जी

16:22 की खास साड़ी है। 17.5 किलो की है। क्योंकि उसमें सोना है, चांदी है, हीरे हैं। ऑल काइंड्स ऑफ फाइनरीज़। और आप ऐसे हो तुम्हारी परदादी को लूट के ही उन रानी जी ने वह साड़ी पहनी थी। ये तुम्हें नहीं दिखाई देता। तो हमारे यहां तो यह धारा बहती आ ही रही है। जहां पूजा ही उसको जाता है। बस जिसके पास सारी दौलत सारी ताकत केंद्रित हो गई है। तो आज का भारत भी अगर बस उनको ही पूज रहा है जो दौलतमंद है, ताकतवर हैं तो इसमें आपको ताज्जुब क्या हो रहा है?

17:09 वो जो गिग वर्कर है वह तब भी लूट रहा था। आज से 500 साल पहले भी,000 साल पहले भी, 1500 साल पहले भी वो आज भी लूट रहा है। आपको इसमें ताज्जुब क्या है? बल्कि हम तो दुनिया के उन चंद देशों में से हैं जिन्होंने शोषण को संस्थागत बना दिया। एक्सप्लइटेशन को इंस्टीट्यूशनलाइज कर दिया। यह बोल के कि तेरी जात ऐसी है कि तेरा तो शोषण होना चाहिए। और तेरा लिंग ऐसा है। तू पैदा ही हुई है। पति परमेश्वर के पांव दबा और जो बोले उनकी मांग पूरी कर बच्चे पैदा कर यह कर वो कर। अब आपको ताज्जुब क्यों होता है कि गिग वर्कर्स के साथ अन्याय हो रहा है?

17:57 क्यों होता है? जिस ताजमहल पर इतना फक्र करते हो बहुत अच्छी बात है। आर्किटेक्चर बहुत सुंदर है उसका। वह सब बढ़िया है। आर्किटेक्चर के तौर पर उसकी तारीफ कर लो। पर कभी यह भी सोचना कि आज की दरों पर उसको बनवाने की लागत कितनी है? वो रुपैया आया कहां से? वो हमारे ही परदादे थे। जिनका खून चूस करके इस तरह की इमारतें बनी है। और व्यवस्थाएं बनी है और बड़ी-बड़ी लड़ाईयां लड़ी गई है। कितने फक्र से कहते हो और फिर हमारे फेवरेट राजा ने बादशाह ने

18:45 फलानी लड़ाई लड़ी। तुम्हें पता है लड़ाई लड़ने में कितना पैसा लगता है? तुम्हें पता है उनके साम्राज्य उनकी एंपायर के विस्तार में एक्सपेंशन में कितना पैसा लगता है? उसकी फाइनेंसिंग कौन कर रहा था? कौन कर रहा था हमारे पुरखे गांव के लोग साधारण खेतीहर किसान मजदूर यह लोग ताकि राजा जी और ऐसे अकड़ के कह सके अब हमने दक्खन भी जीत लिया और कितना अच्छा लगता है ना मूवी बनती है वहां राजा आ रहा है कह रहा है दक्खन जीतना बाकी है अपनी पॉकेट मनी से जीत रहा है तू यह सब जो पूरा चल रहा है तेरा

19:31 इतना लंबा चौड़ा एक्सपिडिशन हु इज द फाइनेंसर? बहुत कम देश होते हैं जो अपने शोषकों को पूजना शुरू कर दें। हम बिरले हैं। प्रथम विश्व युद्ध खत्म हुआ। वर्सेसली की संधि की गई। उसमें जर्मनी से कहा गया जितना नुकसान हुआ है सब देशों का। चलो तुम मुआवजा भरोगे। जितने पैसे लगे हैं लड़ाई में वो सब तुम भरोगे। और उसके जो क्षेत्र थे जर्मनी के वो भी तीन-चार देशों में बांट दिए गए। किसी ने थोड़ा ले लिया, किसी ने कुछ ले लिया, किसी ने कुछ ले लिया। जो भी था उन्हें क्रोध आया कि ये हमसे क्या बोला जा रहा है?

20:17 क्या बोला जा रहा है? कि हम अपने अपमान की फाइनेंसिंग खुद करें। वो क्रोध एक अंधेरी दिशा की ओर बढ़ गया। उससे फांसीवाद का जन्म हुआ। उससे द्वितीय विशुद्ध हो गया। वो अलग बात है। लेकिन इतना तो करा जर्मनी ने ना कि अपने ही शोषण को पूजना नहीं शुरू कर दिया। जब तक हमारी यह परंपरा कायम रहेगी कि जो तुम्हारा शोषण कर रहा है जानते हुए भी कि वो शोषक है वो अन्याय है तब भी उसके सामने सर झुकाते चलो भारत में जो हो रहा है वो होता रहेगा चाहे गिग वर्कर्स के साथ चाहे

21:03 किसी और के साथ वो इंसान चाहिए जिसमें इतनी गरिमा हो कि कहे कि नहीं प्यार दोगे तो तुम्हारे लिए सर भी कटा सकते हैं पर डराओगे, धमकाओगे, शोषण करोगे तो इतना सा भी नहीं झुकेंगे। वो इंसान चाहिए।

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