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संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो एक प्रवचन है जिसमें वक्ता वैदिक दर्शन, विज्ञान और विकास के बीच संबंधों पर प्रकाश डालते हैं। वे बताते हैं कि कैसे भौतिकवादी दृष्टिकोण अक्सर विनाशकारी परिणामों की ओर ले जाते हैं, जबकि वैदिक सिद्धांतों पर आधारित विकास अधिक टिकाऊ और सार्थक होता है। वक्ता इस बात पर जोर देते हैं कि सच्ची खुशी और मुक्ति केवल आत्म-ज्ञान और आध्यात्मिक जागृति के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती है।

मुख्य बातें:

  • भौतिकवादी विकास के विनाशकारी परिणाम
  • वैदिक दर्शन का महत्व
  • आत्म-ज्ञान और आध्यात्मिक जागृति का महत्व
  • वेद और विज्ञान का समन्वय
  • सनातन धर्म की सार्वभौमिकता

जलि वास्प वारी परिपूर्ण

प्रवचन की शुरुआत भगवान के नामों के जाप से होती है, जिसमें राम, कृष्ण और महादेव के नामों का स्मरण किया जाता है। यह जाप भक्ति और श्रद्धा का माहौल बनाता है, जो प्रवचन के आध्यात्मिक विषय के लिए महत्वपूर्ण है।

समायोजन एवं संचालन

वक्ता शिक्षण संस्थान के उन महानुभावों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं जिन्होंने इस कार्यक्रम का आयोजन किया। वे गुरु परंपरा और वंश परंपरा की प्राचीनता पर प्रकाश डालते हैं, जो एक अरब 97 करोड़ 29 लाख 49000 117 वर्षों से चली आ रही है। वे बताते हैं कि कैसे वेदाज शास्त्र सम्मत गुरु परंपरा दार्शनिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक धरातल पर आज भी महत्वपूर्ण है।

सृष्टि की संरचना

वक्ता बताते हैं कि भगवान ने आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी से मंडित सृष्टि की संरचना की है। जीवों को उनके शुभाशुभ कर्मों के अनुसार देद्र, प्राणा और अंतःकरण से युक्त जीवन प्रदान किया गया है। इसका उद्देश्य धर्म, काम और मोक्ष जैसे पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि करना है।

जन्म और मृत्यु

मानव जीवन का लक्ष्य जन्म और मृत्यु की अनादि अजस्र परंपरा का अंत करना है। देह के नाश से जीव का नाश नहीं होता और देह के भेद से जीव में भेद की प्राप्ति नहीं होती। वैदिक मार्ग पर चलने के लिए कम से कम आध्यात्मिक धरातल पर इतना विज्ञान आवश्यक है।

प्रवृत्ति और निवृत्ति

वक्ता बताते हैं कि हमारी प्रवृत्ति और निवृत्ति का नियामक मृत्यु का भय और अमृत्व की भावना है। इसके अतिरिक्त, जड़ता, अज्ञ, नासमझी और मूर्खता का भय भी हमारी प्रवृत्तियों को नियंत्रित करता है। हम दैहिक, दैविक और भौतिक त्र ताप के चपेट से विमुक्त होकर अखंड आनंद स्वरूप होकर शेष रहना चाहते हैं।

अंश और अंशी

वक्ता बताते हैं कि प्रत्येक अंश स्वभावतः अपने अंशी की ओर आकृष्ट होता है। हम भगवान जगदीश्वर सच्चिदानंद स्वरूप सर्वेश्वर के अंश सरीखे हैं, इसलिए हमारे आकर्षण के विषय एकमात्र सच्चिदानंद स्वरूप सर्वेश्वर ही हो सकते हैं।

माया की चमत्कृत

वक्ता बताते हैं कि प्रामाणिक रीति से निरीक्षण परीक्षण करने पर जो कुछ दृश्य है, अनामा है, वह अनित्य अवश्य है, जड़ अवश्य है, और दुख प्रद अवश्य है। समग्र अनामा प्रपंच अंततः सच्चिदानंद ही सिद्ध होता है, और हमारे आकर्षण का केंद्र सच्चिदानंद तत्व ही सिद्ध होता है।

मृत्यु का भय

वक्ता बताते हैं कि मृत्यु का भय अनित्य का वर्णन करने से प्राप्त होता है। अनादि काल से अब तक कभी कहीं किसी कारण से सचमुच में हमारा आपका नाश ही हो गया होता तो वर्तमान दशा में हम अपनी आप विद्यमान की अनुभूति कैसे करते?

वस्तु शक्ति

वक्ता बताते हैं कि वस्तु शक्ति ज्ञान की अपेक्षा नहीं रखती। भले ही हमको इस तथ्य का विज्ञान नहीं है कि हमारी मौत संभव ही नहीं है, क्योंकि मृत्यु के भी हम दृष्टा ही प्रामाणिक रीति से विचार करने पर सिद्ध होते हैं, इस तथ्य का विज्ञान ना होने पर भी सचमुच में वस्तु शक्ति ज्ञान की अपेक्षा नहीं रखती।

गाढ़ी नींद

वक्ता बताते हैं कि गाढ़ी नींद में किसी को मृत्यु का भय प्राप्त नहीं होता, क्योंकि मृत्यु ग्रस्त शरीर को लेकर संसार को लेकर अंता ममता का उदय नहीं होता है। चित स्वरूप परमात्मा, सत स्वरूप परमात्मा, आनंद स्वरूप परमात्मा के अत्यंत स निकट हम पहुंच जाते हैं।

ईश्वर की उपयोगिता

वक्ता बताते हैं कि हमारी चाह का विषय ही ईश्वर है। ईश्वर कोई आरोपित या कल्पित वस्तु का नाम नहीं है, हमारी आपकी चाह का सचमुच में जो विषय है उसी का नाम ईश्वर है।

पानी को प्यास

वक्ता बताते हैं कि प्यासे व्यक्ति को पानी पिलाकर उसकी प्यास को आप और हम दूर कर सकते हैं। कदाचित पानी को प्यास लग जाए तब उसकी प्यास को दूर करने के लिए आप क्या उपाय करेंगे? पानी को प्यास लगने का अर्थ पानी का जो अधिदेव वरुण या इंद्र या कल्पना कीजिए पानी को ही प्यास लग जाए तो पानी को प्यास लगने पर पानी पिलाकर उसकी प्यास को आप दूर कर सकते हैं?

चिकित्सा और अध्यात्म

वक्ता बताते हैं कि दवा के पैकेट पर दवा की मौत की तिथि अंकित होती है। जिस दवा की मौत सुनिश्चित है, उस दवा का सेवन करके कोई सोचे सदा के लिए मृत्यु के चपेट से मुझे मुक्त हो जाना है, यह उपहास की बात है।

ब्रह्मा जी की आयु

वक्ता बताते हैं कि कदाचित ब्रह्मा जी की आयु भी हमको प्राप्त हो जाए तो भी अंत में मृत्यु का भय नष्ट नहीं हो सकता। श्रीमद् भागवत में यह तथ्य दो स्थलों पर प्रकाशित किया गया है।

विश्वविद्यालय और ज्ञान

वक्ता बताते हैं कि विश्व में जितने विश्वविद्यालय हैं, सब की डिग्री डिप्लोमा उसको प्राप्त हो, पारंगत हो, समग्र विश्वविद्यालयों के ज्ञान विज्ञान से वह संपन्न हो, तो भी जिसे जानना था जान चुका मेरा जानना कुछ भी शेष नहीं है, जड़ता या ज्ञान के से उसको मुक्त नहीं किया जा सकता।

विषय जन आनंद

वक्ता बताते हैं कि अगर विषय जन आनंद ही आनंद है, जिसको विषय जन आनंद भरपूर प्राप्त है, उसे उस आनंद की तिलांजलि देकर सोने की भावना क्यों प्राप्त है? अतः गाढ़ी नींद का वेग ही कमम पर भौतिकवाद पर पानी फेरने में पर्याप्त है।

सप्त द्वीपा मेदनी

वक्ता बताते हैं कि सात दीपों वाली पृथ्वी का एक छत्र कोई सम्राट हो, हष्ट पुष्ट सुंदर स्वस्थ है, ब्रह्म मुहूर्त में प्रजा उठकर यशोगान करती है, राजाधिराज दीर्घ काल तक जीवित रहे।

त्रिपुटी और द्वैत

वक्ता बताते हैं कि जहां विषय जन्य आनंद है, वहां त्रिपुटी है। त्रिपी का अर्थ होता है तीन: गुलाब का पुष्प हो गया भोग्य, उसके द्वारा जो आनंद की अनुभूति हुई उसका नाम है भोग, और मैं हो गया भोक्ता। जहां विषय जन आनंद है वहां त्रिपी जरूर है, और जहां तृप्ति है वहां द्वैत अवश्य है।

राम राज्य

वक्ता बताते हैं कि उस लक्ष्य को सामने रखकर जो शासन तंत्र व्यवस्था करता है, उसी का नाम राम राज्य है। इस लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए जो शासन तंत्र की व्यवस्था है वही रामराज्य धर्मराज की स्थापना हो सकती है।

गूलर का फल

वक्ता बताते हैं कि शरीर को जो आत्मा मानते हैं, वह कितने भी बुद्धिमान क्यों ना माने जाए और अपने को माने, अगर हम वेदांत सम्मत वेदाज शास्त्र सम्मत दृष्टि से उनके ज्ञान का आकलन करें तो सचमुच में वो गूलर के फल के अंदर के पतंगे के समान उनकी जान का विषय निकलेगा।

बुद्धिमान कौन

वक्ता बताते हैं कि बुद्धिमान कौन है? ऐसा बुद्धिमता बुद्धि मनीष मनीष नाम अनित्य जगत का संसार का आलंबन लेकर अनित्य संसार को बटोरने में ही अपनी जीवनी शक्ति का जो समग्र उपयोग कर देता है व बुद्धिमान है या अनित्य जीवन और जगत का उपयोग नित्य परमात्मा आत्मा को प्राप्त करने के लिए करता है व बुद्धिमान?

वेदांत सम्मत ईश्वर

वक्ता बताते हैं कि वेदांत ने जिस ईश्वर को खित किया है, उस ईश्वर की क्या विशेषता है? वह जगत बनाता भी है और जगत बनता भी है।

माया की चमत कृति

वक्ता बताते हैं कि माया भगवान की शक्ति माया की क्या चमत कृति है? भगवान की शक्ति माया की वेदांत की दृष्टि से क्या चमत कृति है? अपनी विद्यमान से शक्ति शक्तिमान अपने आश्रय भगवान को सती नहीं होने देती, द्वैत का धन नहीं कर सकती, और अपने कोट कोट कार्यों को लेकर भी अपने आश्रय शक्तिमान को सति नहीं बना सकती।

मैटर इज नथिंग बट एनर्जी

वक्ता बताते हैं कि मैटर इज नथिंग बट एनर्जी आजकल के कहते हैं वैज्ञानिक, लेकिन उसे पूछे कि मैटर के मूल में जो एनर्जी है जगत उसका परिणाम है या विवर्त है? व एनर्जी जर है या चेतन है? यहां जाकर वैज्ञानिकों को मौन रहना पड़ता है।

भौतिक वादियों को साप

वक्ता बताते हैं कि भौतिक वादियों को कम से कम चार पांच शप प्राप्त विश्व में कोई ऐसा भौतिक व नहीं जो सापक ग्रस्त ना हो और साप से पिंड छुड़ाने में समर्थ हो जब तक व अध्यात्म को नहीं मानेगा भौतिकवादी तब तक साप ग्रस्त बना ही रहेगा।

महा यंत्र प्रवर्तन

वक्ता बताते हैं कि महा यंत्र प्रवर्तन क्यों? महा यंत्र के आविष्कार की भावना क्यों जगती? महा यंत्र की आवश्यकता क्या है? इस पर थोड़ा विचार करें। महा यंत्रों के नि का प्रयोजन क्या है इस पर विचार करें।

महानगर का अर्थ

वक्ता बताते हैं कि महानगर का अर्थ क्या होता है? शुद्ध मिट्टी की पहुंच ना हो, शुद्ध मिट्टी से परहेज हो, यही तो महानगर है। शुद्ध पानी की जहां पहुंचना हो, शुद्ध पानी से परहेज हो, चाय पीजिए, पिप्सी पीजिए, कोका कोला पीजिए, दूषित जहर बोतल में रखा हुआ पीजिए, यही ना शुद्ध पानी की जहां पहुंचना हो, शुद्ध पानी से परहेज हो।

विज्ञान से दुश्मनी

वक्ता बताते हैं कि नल नील को क्या आप वैज्ञानिक नहीं मानेंगे? कि सा लाख वर्ष पहले जो बना दिया सेतु नासा से पूछे मानव निर्मित सेतु साढे लाख वर्ष पहले नल नील को आप वैज्ञानिक नहीं मानेंगे?

प्रज्ञा शक्ति प्राण शक्ति

वक्ता बताते हैं कि प्रज्ञा शक्ति प्राण शक्ति जिस यंत्र में डालने में हम समर्थ हो जाते हैं उसका नाम महा यंत्र होता है। देखने में आकृति थोड़ी छोटी ही भले हो, कंप्यूटर को ले लीजिए, मोबाइल को ले लीजिए।

एका क्रिया दव अर्थ करी प्रसिद्धा

वक्ता बताते हैं कि एका क्रिया दव अर्थ करी प्रसिद्धा पद्म पुराण का वचन है। कोई कह सकते हैं ना यह जो वैदिक लोग हैं य व्यवहार के दुश्मन है। इसका उदाहरण पदम पुराण ने दिया।

भूदेवी ने कहा

वक्ता बताते हैं कि भूदेवी ने श्रीमद् भागवत चौथा स्कंद अध्याय 18 श्लोक तीन चर पा पृथु राजा से कहा राजन अगर कोई भौतिक उत्कर्ष ही चाहता है तो भी उसकी बुद्धि की बलिहारी सी में सत है किसमें वैदिक महर्षि हों के द्वारा चिर परीक्षित प्रयुक्त जो उपाय है उनका आलंबन ले।

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Transcript

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0:02 जलि वास्प वारी परिपूर्ण लोचन मारुति नमतरा संत कम नाम पिते च मधुरम मधुरम स्वरूपम कमा पिते च मधुरम मधुरा स्मृति बुद्धि प्रबोध प्रभो मधु बोध शक्ति विद्या परमम परि भाव याम कोमलम कु जयन वेण श्याम लोय कुमार क वेद वेदम परम ब्रह्म भा सत हदय

0:47 मम कुतम राम रामेति मधुरम मधुरा शरम आर्य कविता शाखा वंदे वा को किलम निगम कल्प तरो गलित फलम सुख मुखा मृत द्रव संयुत पवत भागवत रस मालय मोर हो रसिका भु विभव का णा दप सुनी चना तरप सना अमानना मान देना कीर्तनीय सदा हरि श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय

1:38 राम जय जय राम धर्म की जय हो अधर्म का नास हो प्राणियों में सदभावना हो विश्व का कल्याण हो गौ माता की जय हो गौ हत्या बंद हो भारत अखंड हो सर्व भूत हृदय धर्म सम्राट श्री स्वामी करपात्री जी महाराज की जय हो श्री जगन्नाथ महाप्रभु की जय हो श्री बलभद्र महाप्रभु की जय हो भगवती सुभद्रा देवी की जय हो हर हर

2:25 महादेव गोविंद जय जय गो गल जय जय गोविंद जय जय गोपाल जय जय राधा रमण हरि गोविंद जय जय राधा रमण हरि गोविंद जय जय श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी श्री कृष्ण गो गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा हे नाथ

3:13 नारायण वासुदेवा गोविंद जय जय गोपाल जय जय गोविंद जय जय गोपाल जय जय राधा रमण हरि गोविंद जय जय राधा रमण हरि गोविंद जय जय गोविंद जय जय गोपाल जय जय गोविंद जय जय गोपाल जय

3:58 जय राधा रमण हरि गोविंद जय जय राधा रमण हरि गोविंद जय जय गोपाल जय जय गोविंद जय जय गोपाल जय जय राधा रमण हरि गोविंद जय जय राधा रमण हरि गोविंद जय जय श्री

4:46 वृंदावन बिहारी लाल की जय नमो महादव शंभो शिव शिव शिव शिव शिव शिव नारायण नारायण सम उपस्थित समा

5:32 आदरणीय संत वृंद विदव वृंद भक्त वृंद एवं भक्ति मति मातृ शक्ति आप महानुभावों ने अद्भुत अपना आस्था उत्साह और अलाद पूर्वक इस भव्य कार्यक्रम का समायोजन किया है इस कार्यक्रम के समायोजन और संचालन

6:23 में इस शिक्षण संस्थान के जिन महानुभावों का गुप्त अथवा प्रकट योगदान है भगवान श्री चंद्रमौलेश्वर की अनुकंपा के अमोघ प्रभाव से उनका सर्वद उत्कर्ष हो ऐसी भावना सज्जनों अभी मान्य महानुभाव ने [संगीत] बताया हमारी गुरु परंपरा और वंश परंपरा बहुत प्राचीन

7:09 है इस सर्ग में एक अरब 97 करोड़ 29 लाख 49000 117 वर्षों की यह परंपरा साथ ही साथ वेदाज शास्त्र सम्मत जो गुरु परंपरा है दार्शनिक वैज्ञानिक और व्यावहारिक धरातल पर उसका सर्वोत्कृष्ट महत्व आज भी चरितार्थ

7:58 है चतुर्दस भवना मेंक ब्रह्मांड और उसके उपादान पृथ्वी पानी प्रकाश पवन आकाश 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्षों तक महाप्रलय की दशा में सच्चिदानंद स्वरूप सर्वेश्वर से एकही भूत होकर विद्यमान रह स्थावर जंगम प्राणी भी स्थूल सूक्ष्म कारण शरीर से

8:43 रहित होकर महाप्रलय की दशा में विद्यमान रहते हैं महा कारण शरीर महामाया भी सच्चिदानंद स्वरूप महेश्वर से एक ही भूत होकर ही महाप्रलय की दशा में शेष रहती सदैव स्मग सदैव स्मद मग्र आशित कहकर श्रुति ने इस रहस्य को अभिव्यक्त किया महाप्रलय की दशा में सजाती विजाती स्वगत भेद शून्य सच्चिदानंद स्वरूप सर्वेश्वर ही शेष

9:29 रहते हैं महा सर्ग के प्रारंभ में सच्चिदानंद स्वरूप सर्वेश्वर के संकल्प के प्रभाव से जो प्राणी महाप्रलय के पूर्व क्षण पर्यंत कैवल्य मोक्ष नहीं कर पाते उन्हें उनके शुभाशुभ कर्मों का फल प्रदान करने के लिए सृष्टि की सम रचना करते हैं भगवान आकाश वायु तेज जल पृथ्वी से मंडित सृष्टि की संरचना करते हैं और जीवों को उनके शुभाशुभ कर्मों के अनुसार देद्र

10:16 प्राणा अंतःकरण से युक्त जीवन प्रदान करते हैं श्रीमद् भागवत के दशम स्कंध में वेद स्तुति नामक एक अध्याय है उसके दू श्लोक में सृष्टि की संरचना का प्रयोजन बताया गया बुद्धि इंद्रिय मन प्राणा जनाना मसत प्रभु मात्राम भवार्थ आत्मने कल्प नाय भगवान ने जीवों को देद्र प्राणा अंतःकरण से युक्त जीवन प्रदान किया किस अभिप्राय से मात्रा अर्थम च भवार्थ आत्मने अकल्प नाय धर्म काम और मोक्ष संक पुरुषार्थ

11:02 चतुष्टय की सिद्धि जीवों को हो सके इस भावना से भावित होकर सच्चिदानंद स्वरूप सर्वेश्वर ने महा सर्ग के प्रारंभ में सृष्टि की संरचना की जीवों को देद्र प्राणा अंतःकरण से युक्त जीवन प्रदान किया इसका अभिप्राय होता है जो अकता प्राणी उनको कृतार्थ का अवसर प्रदान करने की भावना से सच्चिदानंद स्वरूप सर्वेश्वर ने उन्हें देह प्राणा अंतःकरण से युक्त जीवन प्रदान किया हम य भी कह सकते हैं कि भोग और अपवर्ग दोनों की सिद्धि जीवन का प्रयोजन

11:49 है लेकिन केवल भोग भोगने से जीवन की सार्थकता संभव नहीं है जब तक जीव को अपवर्ग या कैवल्य की प्राप्ति नहीं होती तब तक जन्म और मृत्यु की परंपरा चलती ही रहती है मानव जीवन का लक्ष्य जन्म और मृत्यु की अनादि अजस्र परंपरा का अत्यंतिक उे द है हम यह भी संकेत करना उचित समझते हैं कि देह के नाश से जीव का नाश नहीं होता और देह के भेद से में भेद की प्राप्ति नहीं होती वैदिक मार्ग पर चलने के लिए कम से

12:36 कम आध्यात्मिक धरातल पर इतना विज्ञान आवश्यक है वेदोक्त कर्मकांड उपासना कांड ज्ञान कांड के परिपालन में उसी की प्रीति और प्रवृत्ति परिलक्षित होती है जो इस तथ्य को मानता है कि देह के नाश से जीवात्मा का नाश नहीं होता और देह के भेद से जीवात्मा में भेद की प्राप्ति नहीं होती मैं उदाहरण देता हूं कल्पना कीजिए किसी व्यक्ति की आयु 60 वर्षों की पूर्ण हो चुकी है कदाचित एक वर्ष में उसने 10 ही स्वप्न देखा हो तो भी 60 वर्षों की अवधि में स्वप्न के 600 शरीर उसके नष्ट हो चुके

13:25 होते हैं लेकिन वह अपना नाश नहीं मानता केवल इस उदाहरण के बल पर डंके की चोर से यह तथ खपत होता है कि देह के नाश से जीवात्मा का नाश नहीं होता स्वप्न के 600 शरीर नष्ट हो गए होते हैं शरीर की संख्या 600 होने पर भी व अपनी संख्या एक ही मानता है केवल इस उदाहरण के बल पर भी डंके की चोर से यह तथ्य ख्या पित होता है कि देह के भेद से जीव में भेद की प्राप्ति नहीं होती एक बहुत विचित्र बात है आस्तिक नास्तिक वैदिक अवैध उभय सम्मत सिद्धांत है जात सेही ध्रुव मृत्यु हो जिसका जन्म हुआ

14:13 है उसका मरण सुनिश्चित है परंतु भगवान श्री कृष्ण का आगे वचन है ध्रुवम जन्म मतस्य जो अकता होकर देह त्याग करते हैं उनका पुनर्व भी सुनिश्चित है इसका अर्थ क्या हुआ जन्म का परवन मृत्यु है मृत्यु का परवन जन्म है जन्म और मृत्यु की अनाद अस्त्र परंपरा का अत्यंतिक उे ही मानव जीवन का सचमुच में लक्ष्य है इस पर भी हम गंभीरता पूर्वक विचार करना उचित समझते हैं कोई हिंदू हो या हिंदू स्त्री हो या पुरुष

14:59 यहां तक कि नर हो या वानर वानर हो या वनस्पति उसकी प्रवृत्ति या निवृत्ति का आकलन करें तो एक निष्कर्ष निकलता है जितने प्राणी हैं उनकी प्रवृत्ति और निवृत्ति का आकलन करने पर एक निष्कर्ष निकलता है जो बहुत दिव्य दर्शी है सूक्ष्म दर्शी है वे तो तरु लता गुल जी जो उद्ज प्राणी है उनकी प्रवृत्ति और निवृत्ति का भी आकलन करने में समर्थ होते हैं लेकिन जिनकी बुद्धि उतनी सूक्ष्म नहीं होती वे जंगम प्राणियों की प्रवृत्ति और निवृत्ति का आकलन करने में समर्थ होते हैं जिनकी

15:46 बुद्धि उतनी भी सूक्ष्म नहीं होती कम से कम उनका जीवन उनके साथ 24 घंटे होता है वे अपनी प्रवृत्ति और निवृत्ति का आकलन करने में तो समर्थ होते ही हम आप अपनी प्रवृत्ति और निवृत्ति का आकलन करें तो एक निष्कर्ष प्राप्त होता है हमारी प्रवृत्ति और निवृत्ति का नियामक कौन है बस इस पर विचार करने की आवश्यकता है बहुत मोटी भाषा में अगर मैं बोलूं तो अत्यंत भूखे व्यक्ति की भोजन में प्रीति प्रवृत्ति का नियामक क्या है मृत्यु का भय यही ना भूख के चपेट कहीं दम ना तोड़ जाऊ मृत्यु का भय है और जहां मृत्यु का भय है

16:34 वहां अमृत की भावना अवश्य सन्निहित है इसका मतलब भूखे व्यक्ति की भोजन में प्रीति प्रवृत्ति का नियामक मृत्यु का भय और अमृत की भावना भर पेट भोजन कर लेने पर भोजन से निवृत्ति का नियामक भी मृत्यु का भय अमृत की भावना है अधिक भोजन कर लेने पर कहीं मृत्यु का ग्रास ना बन जाऊं इसका अर्थ हुआ हम हो या आप हमारी आपकी प्रवृत्ति और निवृत्ति का पहला नियामक है मृत्यु का भय अमृत्व की भावना सार्वभौम सिद्धांत है इसमें कोई पक्षपात नहीं कम्युनिज्म की धारा में बहने वाले

17:21 महानुभाव भी बड़े चाव भाव से इस तथ्य को स्वीकार कर ही सकते हैं और करते ही हैं आगे चले हमारी प्रवृत्ति और निवृत्ति का दूसरा नियामक है जड़ता अज्ञ ना समझी मूर्खता का भय और अखंड विज्ञान की भावना छोटा बच्चा कुछ भी आवे यह कौन य कौन यह कौन प्रश्न करता है या नहीं इसका अर्थ क्या होता है हमारी आपकी प्रवृत्ति और निवृत्ति का दूसरा नियामक है जड़ता अज्ञ ना समझी मूर्खता के चपेट से विनिर्मुक्तो हैं प्रवृत्ति और निवृत्ति का तीसरा

18:09 नियामक है दैहिक दैविक भौतिक त्र ताप के चपेट से विमुक्त होकर अखंड आनंद स्वरूप होकर हम शेष रहना चाहते हैं सार क्या निकला जो कुछ अनित्य है मृत्यु ग्रस्त है परिवर्तनशील है जो कुछ जड़ जो कुछ दुख है अर्थात प्रामाणिक रीति से निरीक्षण परीक्षण करने पर जो सच्चिदानंद सिद्ध है उससे पिंड छुड़ाकर सच्चिदानंद मात्र होकर हम शेष रहना चाहते हैं इसी तथ्य को ब उपनिषद अपने शब्दों में खपत करती है असतो मा सद गम तमसो मा ज्योतिर गमय मृत्यु और मा अमृतम गमय हे प्रभु मेरे

18:56 जीवन में वह बल और वेग भर दो जिसके प्रभाव से जो कुछ अनित्य है मृत्यु ग्रस्त है असत्य है उससे पिंड छुड़ाकर सन मात्र होकर में शेष रह सकू जो कुछ अचित है जड़ है अज्ञ है उससे पिंड छुड़ाकर चिन मात्र अखंड विज्ञान स्वरूप होकर मैं शेष रह सकू जो कुछ ताप है वेदना है दुख है उससे पिंड छुड़ाकर आनंद मात्र होकर में से श सकू इसका अर्थ क्या हुआ सज्जनों प्रामाणिक रीति से निरीक्षण परीक्षण करने पर जो अनित्य जड़ और दुख सिद्ध होता है

19:41 उसके चपेट से विनिर्मुक्तो इसके मूल में एक दार्शनिक वैज्ञानिक तथ्य भी है उस पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है मैं प्राया पहली बार जहां जाता हूं या तथ्य अवश्य उद् भाषित करता हूं कोई फल पृथ्वी की ओर क्यों गिरता है या किसी फल को बल और वेग पूर्वक हम जब ऊपर उठाते हैं उछलते हैं बल और वेग के निरस्त हो जाने पर वह फल पृथ्वी की ओर ही क्यों आकृष्ट होता

20:27 है क्या मिलेगा पार्थिव है फल पृथ्वी का अंश है प्रत्येक अंश स्वभाव तो अपने अंशी की ओर आकृष्ट होता है जल को यांत्रिक विधा का आलंबन लेकर 50 मंजिल ऊपर तक हम पहुंचा सकते हैं पहुंचाते हैं वहां भी जल से भरी हुई को खोलने पर जल की धारा नीचे की ओर क्यों अपला वित होती है क्योंकि वह अंश है अंश कौन है महोदधि समुद्र या सागर प्रत्येक अंश स्वभाव तो अपने अंसी की र आकृष्ट होता है या दीप की शिखा उर्द मुख ऊपर की ओर ही क्यों उठती है गमन करती है क्योंकि य अंश है अंसी कौन है

21:14 न भो मंडल में विद्यमान आदित या सूर्य इन दृष्टांत के बल पर डंके की चोर से या तथ सिद्ध होता है कि प्रत्येक अंश स्वभाव तः अपने अंश की आकृष्ट होता है अगर हम विचार करके देखें तो जितने हम प्राणी या जीव हैं य भगवान जगदीश्वर सच्चिदानंद स्वरूप सर्वेश्वर के अंश सरीखे अंश नहीं है अंश सरीखे हैं और जगदीश्वर हमारे अंशी सरीखे हैं इसलिए हमारे आकर्षण के विषय एकमात्र सच्चिदानंद स्वरूप सर्वेश्वर ही हो सकते हैं और कोई नहीं मम वामो जीव लोके जीव

22:02 भूता सनातन भगवत पाद शिवतार शंकराचार्य महाग सचमुच में अंग्रेजों की कूटनीति के चपेट में ना पड़े इसवी सन से 507 वर्ष पूर्व अवर्ण हुए उनके प्रथम शिष्य पदम पादा आचार्य जी से मेरा स्थान 145 वा है श्रीमन नारायण से 155 वा स्थान है भगवत पाद शंकराचार्य महाभाग्य सन से 507 वर्ष पूर्व अवती हुए तो हमने एक संकेत किया सज्जनों भगवत पाद शंकराचार्य महाभाग्य ने एक तथ्य खपत किया कि

22:47 आखिर जीव सचमुच में सच्चिदानंद स्वरूप सर्वेश्वर का अंश ही है उन्होंने कहा अंश वव क्योंकि आगे सनातन शब्द का प्रयोग किया गया है उदाहरण देते हैं एक गुलाब का पुष्प लीजिए एक एक दल को आप नोटते जाइए दल भी नश्वर सिद्ध होगा पुष्प भी नश्वर सिद्ध होगा एक मिश्री की डली लेकर पत्थर पर जोर से पटक दीजिए उसके रवे विकीर्ण हो जाएंगे मिश्री की डली भी नश्वर सिद्ध होगी एक एक रवा भी नश्वर सिद्ध होगा कदाचित भगवान के हम अंश होते तो भगवान भी नश्वर सिद्ध होते हम भी नश्वर सिद्ध हो इसलिए भगवत पाद शिवा वतार शंकराचार्य महाभाग्य ने अंस के आगे इव शब्द का प्रयोग

23:35 किया जीव ईश्वर का अंश सरीखा है ना कि अंश ही जीवन धन जगदीश्वर जीव के अंश सरीखे हैं ना कि अंश ही दो दृष्टांत को भगवत पाद शंकराचार्य महाभाग्य ने प्रस्तुत किया न भो मंडल में विद्यमान सूर्य होता है जलाशय में उसका प्रतिफल या प्रतिबिंब होता है उसको नव सूर्य कहते हैं इसको जल सूर्य कहते हैं जल सूर्य अंश सरीखा होता है नव सूर्य अंश सरीखा होता है इसी प्रकार जीव जीवन धन जगदीश्वर का अंश सरीखा होता है जीवन धन जगदीश्वर जीव के अंश सरीखे

24:21 होते हैं दूसरा उदाहरण भगवत पाद शिवा अवतार शंकराचार्य महाभाग्य ने दिया घट की सीमा में जो निबध सरीखा परिलक्षित आकाश जिसे घटा आकाश कहते हैं वह अंश सरीखा होता है और महाकाश अंशी सरीखा होता है इसी प्रकार जीव जीवन धन जगदीश्वर का अंश सरीखा है और जीवन धन जगदीश्वर अंशी सरीखे हैं क्योंकि प्रत्येक अंश स्वभाव अपने अंशी की ओर ही आकृष्ट होता है अत जीवों के आकर्षण के एकमात्र केंद्र जीवन धन जगदीश्वर ही हो सकते हैं पूरे विश्व में जितने दार्शनिक

25:07 विचार अब तक है आगे संभावित है सबको ध्यान में रखकर मैं एक संकेत करता हूं प्रामाणिक रीति से निरीक्षण परीक्षण करने पर जो कुछ दृश्य है अनामा है वह अनित्य अवश्य है जड़ अवश्य है अयोगा स्पद संयोग स्पद योगा स्पद होने के कारण दुख प्रद अवश्य है अगर हम दार्शनिक और वैज्ञानिक धरातल पर कस के देखें समग्र अनामा प्रपंच दश्य प्रपंच अंत तो गत्वा अस सच्चिदानंद ही सिद्ध होता है और हमारे आपके आकर्षण का कन केंद्र सच्चिदानंद तत्व ही सिद्ध होता है ऐसी

25:54 स्थिति में एक बहुत अच्छा उदाहरण है सावधान मरी हुई छु सुंदरी को नाक से चिपका कर कोई चमेली जैसा गंध प्राप्त कर सकता है क्या मरी हुई छछुंदर को नाक से चिपका कर चमेली से जो सुगंध की अभिव्यक्ति होती है उसकी प्राप्ति कर सकता है क्या कई मुच का न्याय से जीवित सु सुंदरी के शरीर से भी जब दुर्गंध की अभिव्यक्ति होती है तो फिर क्या कहना कि मरी हुई छछुंदर को नाक से चिपका कर कोई सुगंध प्राप्त नहीं कर सकता तद वत प्रामाणिक रीति से निरीक्षण परीक्षण करने पर जो भी अनामा प्रपंच

26:43 है अनामा है दृश्य है भाष्य है वह अनित्य अचित और दुख अवश्य सिद्ध होता है त उसका वर्ण करने पर हमको तीन फल की प्राप्ति सुनिश्चित है अपना अनुभव मिलाते च मृत्यु का भय अनित्य का वण करेंगे शरीर और संसार उसमें अहम ममता उले रेंगे तो मृत्यु का भय अवश्य प्राप्त होगा एक पते की बात है मृत्यु का भय प्राप्त है या सचमुच में मृत्यु प्राप्त है मैं रुक के बोल रहा हूं ताकि विचार करने का आपको अवसर मिले मृत्यु का भय ही हमको प्राप्त है या सचम में मौत भी प्राप्त

27:29 अनादि काल से अब तक कभी कहीं किसी कारण से सचमुच में हमारा आपका नाश ही हो गया होता तो वर्तमान दशा में हम अपनी आप विद्यमान की अनुभूति कैसे करते किस्म वर्तमान दशा में हम आप अपनी विद्यमान की अनुभूति करते हैं अस्म याय अनुभूति डंके की चोर से सिद्ध करती है कि अब तक तो मरना संभव नहीं हुआ मृत्यु संभव नहीं है लेकिन मृत्यु का भय प्राप्त है क्यों प्राप्त है मृत्यु ग्रस्त शरीर और संसार में अंता ममता के कारण अब आगे चलिए कोई कह सकता है कि भविष्य में मृत्यु संभावित है अब तक तो हम

28:15 जीवित रहे भविष्य में मर सकते हैं तो बहुत ऊंची बात है कि भविष्य में भी मौत नाम की देवी भी कदाचित मूर्ति मती होकर हमारे सामने प्रस्तुत हो जाए खड़ी हो जाए तो हम उसके दृष्टा ही सिद्ध होंगे हमारे ऋषियों ने एक तथ स्पित किया श्रीमद् भागवत के छठे स्कंद के दूसरे अध्याय में वस्तु शक्ति ज्ञान की अपेक्षा नहीं रखती वस्तु शक्ति ज्ञान की अपेक्षा नहीं रखती है अग्नि को कोई अग्नि समझकर छूले तो जले बिना ना रहे और आग को कोई आग ना समझकर छू ले तो जले बिना ना रहे ठीक है ना ग आस्तिक के लिए गंगाजल को कोई

29:02 गंगाजल समझकर पी ले तो े बिना ना रहे गंगाजल को कोई गंगाजल ना समझकर पीले तो तरे बिना ना रहे श्रीमद् भागवत ने उदाहरण दिया अमृत को कोई अमृत समझकर पी ले तो अमर हुए बिना ना रहे अमृत को कोई अमृत ना समझकर पी ले तो अमर हुए बिना ना रहे इसका अर्थ है वस्तु शक्ति ज्ञान की अपेक्षा नहीं रख भले ही हमको इस तथ्य का विज्ञान नहीं है कि हमारी मौत संभव ही नहीं है क्योंकि मृत्यु के भी हम दृष्टा ही प्रामाणिक रीति से विचार करने पर सिद्ध होते हैं इस तथ्य का विज्ञान ना होने पर भी सचमुच में वस्तु शक्ति ज्ञान की अपेक्षा नहीं रखती इसलिए मौत तो हमारी प्राप्त हो नहीं सकती है

29:50 केवल अज्ञान के वशीभूत होकर हम मौत को पाले हुए मृत्यु का भय हमको क्यों प्राप्त है मृत्यु ग्रस्त शरीर और संसार में अंता ममता के कारण अज्ञ हमको क्यों प्राप्त है जड़ शरीर और संसार में अता ममता के कारण दुख हमको क्यों प्राप्त है दुख प्रद शरीर और संसार में अता ममता के कारण थोड़ा और मन को ऊपर ले चले क्या हमारे जीवन में कोई ऐसी घाटी है जहा मौत के भय की पहुंच ना हो किसी मनोविकार कामक क्रोध लोभ मोह शोक आदि की पहुंच ना हो किसी वेदना दहिक दैविक भौतिक त्र ताप

30:36 में किसी भी ताप की पहुंच ना हो ऐसी घाटी हमारे जीवन में आती है क्या गाढ़ी नींद पाच सात घंटे के लिए हमको प्रतिदिन गाढ़ी नींद प्राप्त होती है अब अपना अनुभव मिलाकर देखें स्मरण को प्रवाहित करके देखें गाढ़ी नींद में किसी को मृत्यु का भय प्राप्त होता है नहीं मृत्यु का भय क्यों नहीं प्राप्त होता मृत्यु ग्रस्त शरीर को लेकर संसार को लेकर अंता ममता का उदय नहीं होता है अंता ममता का आश्रय अंतःकरण भी उस समय विलीन हो जाता है गाढ़ी नींद में किसी द्वंद की प्राप्ति और व्याप्ति हमको होती है सर्दी गर्मी भूख

31:21 प्यास इत्यादि द्वंद द्वंद की पहुच गारी नींद तक नहीं है जब तक अहम जागरूक रहता है तभी तक मृत्यु के भय की पहुंच है जब तक अहम उलिक रहता है तभी तक कामक क्रोधा मनो विकारों की पहुंच है गाढ़ी नींद में हम च प्रसुप्त किसी द्वंद के चपेट में हम आप नहीं आते मृत्यु का भय भी हमको नहीं प्राप्त होता जबकि हम कहा करते हैं न बटा च से भी अधिक मौत का नाम गारी नींद है कर्मेंद्रियां सो जाती है ज्ञान इंद्रिया सो जाती हैं अंत करण भी विलीन हो जाता है प्राणों का भ भान भी विलुप्त हो जाता है 3 ब च से अधिक गा मौत की प्राप्ति गाढ़ी नींद में होती है फिर भी हमको मृत्यु का

32:09 भय क्यों नहीं प्राप्त होता मृत्यु ग्रस्त शरीर और संसार को लेकर अंता ममता का गाढ़ी नींद में उदय नहीं होता चित स्वरूप परमात्मा सत स्वरूप परमात्मा आनंद स्वरूप परमात्मा के अत्यंत स निकट हम पहुंच जाते हैं इसलिए गाढ़ी नींद में भूख प्यास सर्दी गर्मी आदि किसी द्वंद की पहुंच हम आप तक नहीं होती काम क्रोधा आद किसी मनो विकार के चपेट में हम आप नहीं पड़ते और यहां तक कि दैहिक दैविक भौतिक त्रिविध ताप में किसी ताप की प्राप्ति या व्याप्ति हमको आपको नहीं होती इसका अर्थ क्या हुआ निर् दबंद होकर मनो विकारों से विहीन होकर और मृत्यु के

32:56 भय से विहीन होकर हम गाढ नींद में शेष रहते हैं लेकिन गाढ़ी नींद में मृत्यु जड़ता और दुख का बीज शेष रहता है उसी का नाम अज्ञान है यह जो विद्या संस्थान संस्थान विद्यापीठ है इनका वास्तविक लक्ष्य क्या होना चाहिए मृत्यु जड़ता दुख का बीज जो अज्ञान है उस ज्ञान को भू डालने की क्षमता जीवन में अभिव्यक्त हो सके शिक्षण संस्थान का सचमुच में वही और यही लक्ष्य होना चाहिए एक उदाहरण देता हूं और

33:42 आगे विषय की ओर चलता हूं बबूल का बीज बहुत चक्कन होता है सूक्ष्म वीक्षण के द्वारा निहारने पर भी उसमें छिपे हुए कांटे का दर्शन नहीं होता लेकिन उसी बबूल के चिकने बीज को अनुकूल पृथ्वी पानी प्रकाश पवन आकाश दिक् काल का संसर्ग प्राप्त हो जाने पर तीक्षण कांटे निकल आते हैं इसी प्रकार गाढ़ी नींद में मृत्यु का भय हमको प्राप्त नहीं होता मनोविकार के चपेट में हम नहीं पड़ते द्वंद की गति हम तक नहीं होती ध ताप में किसी ताप या वेदना की प्राप्ति नहीं होती यहां तक कि हम आनंद स्वरूप आनंद के भी भोक्ता होकर ार निम शेष रहते हैं लेकिन

34:30 मृत्यु जड़ता दुख का बीज अज्ञान शेष रहता है उस अज्ञान को तत्व ज्ञान आत्मा का वास्तव में जो स्वरूप है उसके अनुरूप ही आत्मा को जानकर उस अज्ञान को हम नष्ट करने में दग्ध करने में समर्थ हो सकते हैं तभी सदा के लिए जो कुछ अनित्य है जो कुछ जड़ है जो कुछ दुख है उससे पिंड छुड़ाकर सच सचिदानंद मात्र होकर हम शेष रह सकते हैं एक संकेत प्राय लोग कहते हैं इस रॉकेट कंप्यूटर एटम मोबाइल के युग में ईश्वर की उपयोगिता क्या है ईश्वर को मानने की क्या आवश्यकता है सांकेतिक ढंग से हमने इसका उत्तर दे

35:17 दिया हमारी चाह का विषय ही ईश्वर है समझ गए ईश्वर कोई आरोपित या कल्पित वस्तु का नाम नहीं है हमारी आपकी चाह का सचमुच में जो विषय है उसी का नाम ईश्वर है हमारी चाह का सचमुच विषय है अमृत त्व मृत्युंजय तत्व सरूप होकर हम शेष रह सके उसी का नाम सत्यम ब्रह्मा ईश्वर है हम आप चाहते अखंड विज्ञान स्वरूप चिन्ह मात्र होकर शेष रह सके उसी का नाम ईश्वर है ज्ञानम ब्रह्मा विज्ञान ब्रह्मा हम आप चाहते हैं आनंद मात्र होकर हम शेष रह सके आनंद स्वरूप होकर शेष रह सके उसी

36:04 का नाम ईश्वर है आनंदो ब्रह्मा आनंदम ब्रह्मा जैसे जल तरंग चिल्ला चिल्ला कर कहे कि जल कौन होता है तो जानकार क्या कहेंगे जल वह होता है जो तेरा जीवन होता है तेरी उत्पत्ति जिससे होती है उसका नाम जल है तू जिसमें अखलिया करते हो उसका नाम जल है तेरा लय जिसमें होता उसका नाम जल है इसी प्रकार जीव कहता है ईश्वर कौन होता है जानकार कहते हैं जो तेरा जीवन धन होता है उदय स्थान होता है निलय स्थान होता है विलय स्थान होता है जो तेरी चाह का सपुत में विषय होता है उसी का नाम ईश्वर है इस तथ्य को समझ लेने पर कोई

36:49 भी अनश्वर वादी रह नहीं सकता मैंने आपके सामने कई बार एक एक घण पानी पिया कदाचित मुझे यह ना मालूम हो कि जिसके पीने से प्यास की निवृत्ति हुई उसी का नाम पानी है आप पूछ दे क्या पानी पिया मान लीजिए मैं हिंदी नहीं जानता मैं कह दूंगा नहीं झूठ तो नहीं बोला लेकिन यह नहीं पता कि जिसके पीने से प्यास की निवृत्ति हुई उसी का नाम पानी है दुध मुहा बच्चा पानी तो पीता है लेकिन उसे नहीं पता होता कि जिसके पीने से प्यास की निवृत्ति होती है उसी का नाम पानी है इसी प्रकार ना जितने मनुष्य हैं उनको यह नहीं पता होता कि उनकी चाह का जो सचमुच में विषय है उसी का नाम ईश्वर है

37:36 उसी का नाम भगवान है उसी का नाम परमात्मा है अगर उनकी आस्था को टटोल विश्व में कोई भी अनश्वर वादी है ही नहीं अर्थात ऐसा कोई नहीं है जो ईश्वर का अस्तित्व ना मानता हो समझ गए ना ईश्वर के अस्तित्व को ना मानने का अर्थ अपना अस्तित्व ना मानना और एक विचित्र बात क्यों जी दो बालिकाओं ने बहुत अच्छा भाव व्यक्त किया विश्व में पानी का अस्तित्व ना हो तो किसी को प्यास लगे प्यास का लगना डंके की चोर से तथ को सिद्ध करता है कि पानी का अस्तित्व अवश्य है विश्व में अनन का भोज्य पदार्थ का अस्तित्व ना हो तो किसी को भूख

38:24 लगे भूख का लगना ड कि चोर से इस बात को सिद्ध करता है कि क्या अन्य का अस्तित्व अवश्य है थोड़ा और विचार कीजिए कोई व्यक्ति प्यासा है प्यास के चपेट में आकर उसे चक्कर आने लगा मानवो शल का परिचय देते हुए आपने उसे पानी पिला दिया ठीक है प्यास की निवृत्ति हो गई जठराग्नि के द्वारा फिर पानी का पाचन होगा फिर उसे प्यास लगेगी प्यासे व्यक्ति को पानी पिलाकर उसकी प्यास को आप और हम दूर कर सकते हैं साहित्य में जिसको अ भूतो पमा कहते हैं कदाचित पानी को प्यास लग जाए तब उसकी

39:13 प्यास को दूर करने के लिए आप क्या उपाय करेंगे पानी को प्यास लगने का अर्थ पानी का जो अधिदेव वरुण या इंद्र या कल्पना कीजिए पानी को ही प्यास लग जाए तो पानी को प्यास लगने पर पानी पिलाकर उसकी प्यास को आप दूर कर सकते हैं आप चार महावाक्य की चर्चा कर रहे थे यह भी एक महावाक्य है आपको एक महावाक्य बोलना होगा अरे वह जलदेव जिसके पीने से प्यासे प्राणी प्यास के चपेट से मुक्त होते हैं वही तो तुम हो पानी को प्यास लग जाए तो पानी को पानी पिलाने की की आवश्यकता होगी क्या नहीं ना

39:59 उसको बताना होगा प्यासे प्राणी जिसके पान से प्यास के चपेट से मुक्त होते हैं वही तो तुम्हारा स्वरूप है इसी प्रकार हमारे आपके जीवन में सदरू होकर रहने की पिपासा अनादि काल से है चिरूप होकर रहने की पिपासा अनादि काल से है आनंद स्वरूप होकर रहने की पिपासा अनादि काल से है बाहर से आयु बढ़ा बढ़ करके कोई हमको मृत्यु के भय से मुक्त नहीं कर सकता एक बार बिहार की राजधानी पटना में लगभग 18 साल पहले चिकित्सकों सिविल सर्जनों के बीच में प्रवचन हो रहा था चिकित्सा और अध्यात्म विषय दिया गया था अध्यक्षता मेरी थी उन

40:46 चिकित्सकों को हंसाते हुए मैंने कहा आजकल दवा के पैकेट पर दवा की मौत की तिथि अंकित होती है क्या ज्योतिषी कई प्रकार के होते हैं भवन विज्ञान जिनको है वह भी ज्योतिषी है पुल भवन आदि की आयु का अंकन करते हैं एक प्रकार से जो दवा बनाते हैं वह भी ज्योतिष है क्योंकि दया दवा की आयु का भी अंकन करते हैं उसके गुण धर्म का अंकन करते हैं दवा के पैकेट पर दवा की मौत की तिथि अंकित होती है जिस दवा की मौत सुनिश्चित है उस दवा का सेवन करके कोई सोचे सदा के लिए मृत्यु के चपेट से मुझे मुक्त हो जाना

41:32 है उपहास की बात है या नहीं आप दवा लीजिए लेकिन मौत की दवा वो नहीं है तो क्या अर्थ हुआ इसका अर्थ क्या हुआ पानी को प्यास लग जाए तो पानी पिलाकर उसकी प्यास को दूर नहीं कर सकते उसको बताना होगा अरे वो जल देव जिसके पीने से प्यासे प्राण प्यास के चपेट से मुक्त होते हैं वही तो तुम हो इसी प्रकार ी आयु बढ़ा बढ़ा करके कोई हमको मृत्यु के भय से मुक्त नहीं कर सकता कल्पना कीजिए श्रीमद भगवत गीता के आठवे अध्याय के अनुसार भगवान के द्वारा एक व्यक्ति की आयु

42:20 उतनी हो जाए जितनी आयु ब्रह्मा जी की है आजकल के वैज्ञानिक नहीं बता स कि पृथ्वी की आयु सचमुच में कितनी है अब तक नहीं पूरी पृथ्वी की आयु कितनी है पृथ्वी का जीवन कितने वर्षों का पृथ्वी की पूर्ण आयु कितनी पानी की पूर्ण आयु कितनी तेज की पूर्ण आयु कितनी वायु की पूर्ण आयु कितनी नया वैसे सिक तो मान ही नहीं सकते कि आकाश भी नश्वर है लेकिन सांख्य वादी योगी और वेदांती कह सकते हैं कि तस्मा वा तस्मा आत्माना आकाश संभूता है आकाश भी उत्पन्न होता है आकाश भी नष्ट होता है आकाश की आयु कितनी और मैंने पहले ही प्रवचन प्रारंभ किया था चतुर्दस भुवना

43:06 मेंक ब्रह्मांड की पूर्ण आयु कितनी तो गीता के आठवे अध्याय के आधार पर 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्ष तो ब्रह्मा जी की भी पूरी आयु मानवो चित गणना के अनुसार ब्रह्म लोक की गणना के अनुसार 100 वर्ष मानव गणना के अनुसार 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्षों की आयु ब्रह्मा जी की होती है उतने समय तक महाप्रलय की दशा में सृष्टि रहती है अब एक व्यक्ति जो आजकल ब्रह्मा जी के पद पर प्रतिष्ठित है तभी तो मृत लोक में उन्होंने ब्रह्म पद प्राप्त करने के लिए साधन किया होगा ब्रह्मा जी की पूर्ण आयु

43:52 को द परार्थ भी कहते हैं ना में परार्थ शब्द यहां पारिभाषिक है ब्रह्मा जी की आधी आयु का नाम परार्थ ब्रह्मा जी की पूर्ण आयु 50 50 100 ब्रह्मा जी की पूर्ण आयु का नाम होता द परार्थ आजकल जो ब्रह्मा जी के पद पर प्रतिष्ठित है 50 वर्ष की आयु ब्रह्मलोक की गणना के अनुसार पूर्ण कर चुके हैं तो मैंने क्या संकेत किया कदाचित ब्रह्मा जी की आयु भी हमको प्राप्त हो जाए तो भी अत में मृत्यु का भय नष्ट नहीं हो सकता श्रीमद् भागवत में य तथ दो स्थलों पर प्रकाशित किया गया है तीसरे स्कंध में और 11 स्कंध में तीसरे स्कंध में ब्रह्मा जी

44:40 ने कहा मेरी आयु यद्यपि दो पराध की है 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्षों की है लेकिन मुझे मौत का भय प्राप्त होता अभी सोचते होंगे 5 वष हो गए वहां की आयु के अनुसार और श्रीमद् भागवत के एकादश स्कंध में उद्धव जी को भगवान श्री कृष्ण ने कहा जिन ब्रह्मा जी की आयु द्वि पराध है उन ब्रह्मा जी को भी मौत का भय प्राप्त होता है जैसे पानी को पानी पिला कर के प्यास की निवृत्ति नहीं कराई जा सकती वैसे ही हम जीवों को एक एक हजार ब्रह्मा की आयु प्राप्त हो जाए तो भी

45:26 मौत के भय से हम मुक्त नहीं हो सकते नन्य पंथा विद्यते नाया मौत के भय से मुक्त होने का एक ही उपाय है क्या उपाय है हम आत्मा को स्वरूपत मृत्युंजय अमृत स्वरूप समझ ले जब तक कोई भी व्यक्ति स्वयं को मृत्युंजय अमृत स्वरूप मृत्यु का भी साक्षी नहीं समझता तब तक आयु बढ़ा बढ़ा करके भी उसको मृत्यु के भय से मुक्त नहीं किया जा सकता साथ ही साथ आगे व विश्वविद्यालय एक नहीं जितने घर हैं सबको विश्वविद्यालय बना दीजिए कल्पना के द्वारा

46:14 और जितने विषयों से डिग्री डिप्लोमा विद्या और कला का प्रशिक्षण है एक एक विश्वविद्यालय में एक एक हजार विषयों से डिग्री डिप्लोमा की व्यवस्था कर दीजिए विद्या और कला का केंद्र उनको बना दीजिए और ऐसे व्यक्ति की कल्पना कीजिए विश्व में जितने विश्वविद्यालय हैं सब की डिग्री डिप्लोमा उसको प्राप्त हो पारंगत हो समग्र विश्वविद्यालयों के ज्ञान विज्ञान से वह संपन्न हो तो भी जिसे जानना था जान चुका मेरा जानना कुछ भी शेष नहीं है जड़ता या ज्ञान के से उसको मुक्त नहीं किया जा सकता जब तक इस तथ्य का

47:00 विज्ञान ना हो जाए कि आत्मदेव स्व स्वय स्व प्रकाश स्वयं प्रकाश विज्ञान स्वरूप है मैं विज्ञान स्वरूप हूं जब तक इसका विज्ञान ना हो जाए तब तक समग्र विश्वविद्यालयों की विद्या और कला का पारंगत व्यक्ति भी अज्ञ के चपेट से अपने आप को मुक्त नहीं कर सकता इसका मतलब ज्ञान पिला पिलाकर अज्ञान के चपेट से को मुक्त नहीं किया जा सकता जैसे पानी को पानी पिला पिलाकर प्यास के चपेट से मुक्त नहीं किया जा सकता उसी प्रकार जीव को बाह्य विद्या पिला पिला करके रटा रटा करके उसके हृदय में प्रविष्ट करके अज्ञ के चपेट से उसको मुक्त नहीं किया जा सकता जब तक वह इस तथ

47:46 को स्वयं ना जान ले अखंड विज्ञान स्वरूप आत्म तत्व है दृष्टा जो है किसी की दृष्टि का विषय नहीं हो सकता विजाता किसी की विज्ञान का किसी के विज्ञान का विषय नहीं हो सकता और एक संकेत करता हूं सुख के जितने साधन है सब किसी को दे दीजिए सुख के जितने साधन है सबसे संपन्न हो जाए तो भी बाहर से आनंद की घुटी पिला पिलाकर किसी को क्या दुख के चपेट से मुक्त नहीं कि जा सकता इस संदर्भ में मैं दृष्टांत देता हूं सावधान यहां तो सब आस्तिक है कदाचित कहीं

48:34 कोई शरीर को ही आत्मा मानता हो कम्युनिज्म की धारा में बहने वाला हो चार वाक्य सिद्धांत को ही चर्म सिद्धांत मानता हो वह भी हमारे लिए बहुत लाडला प्यारा है सब लाडले प्यारे हमारे लिए थोड़ा विचार कीजिए अगर शरीर ही आत्मा हो तो तो गाढ़ी नींद की आवश्यकता ही क्यों हो गाढ़ी नींद का जब वेग प्राप्त होता है तो शरीर को भुलाने की भावना का उदय होता है या नहीं शरीर को भुलाए बिना गाढ़ी नींद ही संभव नहीं है तो यहां पर जाकर कम्युनि में घुटना टेक देता है देहाम बाद घुटना टेक देता है क्योंकि शरीर ही आत्मा है तो शरीर को

49:20 भुलाकर सोने की आवश्यकता क्यों अत्यंत जड़ वादी भौतिकवादी देहाम वादी भी शरीर को भुलाकर सोना पसंद करता है कदाचित शरीर को भुलाकर सोबे नहीं उसे गाढ़ी नींद प्राप्त ना हो तो विक्षिप्त हुए बिना नहीं रह सकता इसका मतलब जितने भौतिकवादी हैं उनके सिद्धांत के अनुसार उनके मत के अनुसार उन्हें गाढ़ी नींद का अधिकार प्राप्त नहीं है अगर वो गारी नींद चाहते हैं तो अपने सिद्धांत को अपनी मान्यता को अपने मत को तक पर रख करके किनारे करके ही गाढ़ी नींद चाहते हैं क्योंकि गाढ़ी नींद में शरीर की पहुंची नहीं होगी अगर चेतना विशिष्ट शरीर ही आत्मा है तो शरीर को भुलाकर सोने की भावना

50:08 कैसी और एक विचित्र बात है प्रधान मंत्री आदि सब ध्यान पूर्वक सुने नहीं सुन रहे होंगे य भी मालूम है नेताओं के कान कुछ पक्के होते हैं हर बात उनके कानों तक नहीं पहुंच पाती है लेकिन मैं संकेत करता हूं अगर विषय जन आनंद अनुकूल शब्द स्पर्श रूप रस गंध और इनके अभि व्यंजक संस्थान सक चंदन वनिता व्यंजना आदि के संस्पर्श से जो आनंद मिलता है वही आनंद आनंद हो विषय जन आनंद ही आनंद हो तो जिसको विषय जन आनंद भरपूर प्राप्त है उसको तो कम से कम गाढ नींद की आवश्यकता ना हो क्या है होनी चाहिए

50:56 जिसको विषय जन आनंद भरपूर प्राप्त है उसको भी गान चाहिए क्या नहीं चाहिए पागल हो जाएगा पागल हो जाएगा पंचदशी का विद्या स्वामी जी ने बताया सुनिए वेदांत आप कह रहे थे जिसको कोई वेदना है ताप है शोक है कदाचित उससे पिंड छुड़ा के लिए वह गाढ़ी नींद चाहता है तो बात समझ में आती है लेकिन जिसके जीवन में विषय जन आनंद भरपूर है प्रिय के स्थान पर प्रिय मोद के स्थान पर मोद प्रमोद के स्थान पर प्रमोद पर्याप्त है प्रिय माने अभीष्ट

51:42 वस्तु के मिलने की आशा और मिलने से जो आनंद का उद्रेक होता है उसका नाम प्रिय है अभीष्ट विषय के सेवन से जो आनंद का उद्रेक होता है प्र की अपेक्षा उन्नत आनंद मोद है अभीष्ट विषय का यथ संभोग उपभोग कर लेने पर बाहिया अभ्यंतर आनंद का जो उलन होता है अंग्रेजी वाले ओवरफ्लोइंग कह सकते हैं उसका नाम प्रमोद है जिसको प्रमोद की प्राप्ति है विषय जन आनंद जिसको भरपूर प्राप्त है कदाचित उसे री नींद सुलभ ना हो तो दो चार 10 20 दिन विक्षिप्त तो होने लगेगा या नहीं इसका मतलब क्या है अगर विषय

52:30 जन आनंद ही आनंद है जिसको विषय जन आनंद भरपूर प्राप्त है उसे उस आनंद की तिलांजलि देकर सोने की भावना क्यों प्राप्त है अत गाढ़ी नींद का वेग ही कमम पर भौतिकवाद पर पानी फेरने में पर्याप्त है आगे सुन लीजिए सपत दपा च मेदनी मनुम का वचन है दक्षिणा पाठ है और भगवत पद शंकराचार्य महाभाग्य ने गीता भाष के मंगलाचरण में इसको समदित किया सात दीपों वाली पृथ्वी का एक छत्र कोई सम्राट हो तैत्र उपनिषद के आधार पर

53:15 बोल रहा हूं सप्त द्वीपा मेदनी का एक छत्र कोई सम्राट हो आजकल सात दीपों वाली पृथ्वी सुलभ नहीं है विष्णु पुराण श्रीमद् भागवत आदि का अनुशीलन कीजिए छार सिंधु से ित भूभाग ही आजकल सुलभ है छह द्वीप विलुप्त हो गए कारण बता देता हूं समय रहेगा तो उसकी व्याख्या करूंगा पहली बार य आना हुआ है ध्यान पूर्वक सुनिए महा यंत्रों का प्रचुर आविष्कार प्रयोग भी होता रहे कोई दिव्य वस्तु और व्यक्ति भी शेष रह जाए संभव नहीं आगे चलकर शरीर तो नश्वर होता है मेरे इस वाक्य पर हजारों अनुसंधान होंगे फिर से

54:04 सुनिए महा यंत्रों का प्रचुर आविष्कार प्रयोग भी होता रहे ईश्वर के संकल्प से बीज की रक्षा के अतिरिक्त कोई दिव्य वस्तु और व्यक्ति विशेष रह जाए सिरोही जी संभव नहीं फिर से सुनिए महा यंत्रों का प्रचुर आविष्कार भी होता रहे कोई दिव्य वस्तु और व्यक्ति बच जाए संभव नहीं है दो शिरोही है मालूम है दोनों बुलंद सर के हमने क्या कहा सुनिए छह द्वीप हमारे लुप्त हो गए लुप्त हो गए माने हमारी दृष्टि में वो क्षमता नहीं दिव्य दृष्टि के द्वारा जिन द्वीपों का दर्शन हमारे

54:49 पूर्वजों को होता था उन द्वीपों का दर्शन हम कर सके महा यंत्र का प्रचुर आविष्कार प्रयोग भी होता रहे कोई दिव्य वस्तु और व्यक्ति भी शेष रह जाए यह संभव नहीं अभी हम इसको इस धारा की ओ नहीं ले जा रहे केवल संकेत कर रहे कल्पना कीजिए सपत दीपा मेदिनी पृथ्वी का कोई एक छत्र सम्राट है हष्ट पुष्ट सुंदर स्वस्थ है ब्रह्म मुहूर्त में प्रजा उठकर यशोगान करती है राजाधिराज दीर्घ काल तक जीवित रहे पृथ्वी का निष्क भोग्य पदार्थ उसको सेवन करने के लिए प्राप्त है उस चक्रवर्ती सार्वभौम नरेंद्र को जो आनंद मिल सकता है

55:37 उसका नाम है मानुष आनंद मृति लोक में सर्वोत्कृष्ट आनंद का नाम है मानुष आनंद आजकल किसी को सुलभ नहीं उस मानुष नंद की अपेक्षा ब्रह्मा जी को जो प्रतिक्षण व्यवहार दशा में आनंद मिलता तैत्र उपनिषद कितना गुना अधिक है जी एक लिखने के बाद 20 शून्य लिखिए एक लिखने के बाद 17 शून्य लिखते हैं तो गणित की दृष्टि से उसका नाम पराध होता है 18 व संख्या का नाम परार्थ है एक लिखने के बाद 17 शून्य लिखेंगे उसका नाम परार्थ है और एक लिखने के बाद 20 शून्य लिखेंगे तो 1000 परार्थ ब्रह्मा जी को ब्रह्मा जी दिव्यता की

56:27 पराकाष्ठा जीवों में सबसे उत्कृष्ट ब्रह्मा जी सर्व जीव नात्म ब्रह्मा जी उन ब्रह्मा जी को व्यवहार में जब तक योग निद्रा प्राप्त नहीं करते तब तक व्यवहार में प्रतिक्षण जितना आनंद मिलता है उनका अंतःकरण इतना परिष्कृत होता है आनंद रूप जो भगवत तत्व है उसका अभि व्यंजन करने में वह इतना समर्थ होता है कि म त्रिलोक की अपेक्षा 1000 पराध गुण अधिक आनंद प्रतिक्षण मिलता रहता है ब्रह्मा जी को मृति लोक की अपेक्षा 1000 परार्थ गुण अधिक आनंद ब्रह्मा जी को प्रतिक्षण मिलता रहता है विषय की ओर भी देख रहा हूं हमें ने विषय भी

57:15 दिया ऐसे ब्रह्मा जी को भी सुन लो ऐसे ब्रह्मा जी को भी कदाचित गाढ़ी नींद सुलभ ना हो योग निद्रा सुलभ ना हो हम लोग सोते हैं ब्रह्मा जी योग निद्रा लाभ करते हैं ऐसे ब्रह्मा जी भी व्यवहार से उपरा मता को प्राप्त कर योग निद्रा प्राप्त ना करें तो भी विक्षिप्त हो जाए अब तक के प्रवचन का सार क्या निकला अगर शरीर ही आत्मा हो तो शरीर को भुलाकर सोने की भावना क्यों प्रकट हो अगर विषय जन आनंद ही व्यक्ति को कृतार्थ करने में सफल हो तो विषय जन आनंद जिसको भरपूर प्राप्त है बल्कि मृत लोक में सर्वाधिक आनंद की

58:01 अपेक्षा 1000 पराध गुण अधिक आनंद जिन ब्रह्मा जी को प्राप्त है वे उस विषय जन आनंद को भुलाकर क्यों योग निद्रा लाभ करें इसके पीछे दर्शन क्या है अब मैं धीरे से बोलूंगा जहां विषय जन्य आनंद है वहां त्रिपुटी है कल्पना कीजिए कोई गुलाब का पुष्प है उसको देखकर सुनकर या छूकर मुझे आनंद मिलता है विषय जन्य आनंद जहां है वहां त्रिपति है त्रिपी का अर्थ क्या होता है तीन गुलाब का पुष्प हो गया भोग्य उसके द्वारा जो आनंद की अनुभूति हुई उसका नाम है भोग और मैं हो गया भोक्ता जहां विषय जन आनंद है वहां त्रिपी जरूर है

58:49 और जहां तृप्ति है वहां द्वैत अवश्य है द्वैत माने अजल लक्ष दो या दो से अधिक का नाम द्वैत होता है और जहां द्वैत है ध्यान पूर्वक सुनिए व श्रम अ अवश्य है जहा द्वैत है वहा श्रम अवश्य है आप दर्पण लेकर अपना ही मुख चंद देखते रहिए थक या नहीं अंत में दर्पण को किनारे करने की आवश्यकता होगी या नहीं जहां द्वैत है वहा श्रम अवश्य है और जहां शम है वहां खालिस पयो नि आनंद नहीं है इसलिए विषय ज आनंद कित ना भी किसी को प्राप्त हो जाए वहां त्रिपति अवश्य होगी तपट होगी तो द्वैत अवश्य होगा और द्वैत होगा तो श्रम अवश्य होगा श्रम अवश्य होगा तो उस सुख से

59:37 भी उपरा मता अवश्य होगी इसलिए तुलसीदास जी ने विनय पत्रिका में लिखा सपनेहु नहीं सुख द्वैत दर्शन बात कोटिक को कहे इसका अर्थ क्या हुआ सज्जनों अब तक मैंने यह कहा कि जैसे पानी को प्यास लग जाए तो पानी पिलाकर उसकी प्यास को दूर नहीं कर सकते इसी प्रकार हमको अनादि काल से किसकी प्यास लगी है किसकी प्यास सत की मृत्युंजय होकर मैं रह सकू चित्त की ज्ञान स्वरूप होकर मैं रह सक ऐसा ज्ञान और आनंद की प्यास लगी है बाहर से आयु बटोर बटोर के बाहर से ज्ञान विज्ञान डाल डाल करके बाहर से विषय जन

1:00:22 आनंद की घुटी पिला पिलाकर मृत्यु जड़ता दुख के चपे समको कोई मुक्त नहीं कर सकता आज ना सही कल कल ना सही परसों एक अरब वर्ष बाद सही जब हमको इस तथ्य का ज्ञान होगा कि आत्म तत्व अर्थात मैं स्वतः सत चित आनंद स्वरूप हूं तभी मृत्यु मूर्खता अज्ञ जड़ता दुख के चपेट से सदा के लिए मुक्त हो सकते हैं उस लक्ष्य को सामने रखकर जो शासन तंत्र व्यवस्था करता है उसी का नाम राम राज्य इस लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए जो शासन तंत्र की व्यवस्था है वही

1:01:10 रामराज्य धर्मराज की स्थापना हो सकती है विषय लोलुपता को बढ़ाने के लिए देहात्सेक्स एक में संकेत कर द गलर का फल पका हुआ हो गलर उसको फोरिए क्या होगा फु दकते हुए पतंगे निकलेंगे जब तक व गलर के फल में रहते हैं तब तक गलर के जितने अंदर का जितना क्षेत्रफल है उतना भी उनकी दृष्टि का क्षेत्रफल होता है क्या व तो जहां रहते हैं उसे थोड़ी दूर तक देख सकते हैं गलर के फल में रहने वाले जो पतंगे होते हैं उनकी

1:01:58 दृष्टि में उनकी सृष्टि का क्षेत्रफल कितना होता है ठीक इसी प्रकार शरीर को जो आत्मा मानते हैं वह कितने भी बुद्धिमान क्यों ना माने जाए और अपने को माने अगर हम वेदांत सम्मत वेदाज शास्त्र सम्मत दृष्टि से उनके ज्ञान का आकलन करें तो सचमुच में वो गूलर के फल के अंदर के पतंगे के समान उनकी जान का विषय निकलेगा अर्थात वो अपने को बुद्धिमान मानते रहे दुनिया उनको बुद्धिमान मानती रहे बुरा ना मानो होली है सिद्ध होंगे बुद्धु ही प्रत्येक मोर्चे पर उन प्रत्यक मर्चे पर असफल हुए बिना नहीं रहते लोगों को भ्रम

1:02:45 है क्या भ्रम है कि हम अध्या आत्मा का आलंबन लेंगे परमात्मा का आलंबन लेंगे धर्म का आलंबन लेंगे तो हमारी दृष्टि संकी ण हो जाएगी संकीर्ण मानस संकीर्ण मानस वाले ये हैं मानसिकता के गुलाम है पक्षधर है बात उल्टी है अगर शरीर को ही आत्मा मानते हैं तो जितने शरीर को आत्मा मानने वाले हैं सबकी दशा यही है गूलर के फल के अंदर जो पतंगे होते हैं उनकी दृष्टि में जो उनकी सृष्टि का क्षेत्रफल होता है बहुत सीमित उनकी जानकारी का क्षेत्रफल होता है बहुत सीमित उससे थोड़ा ऊंचा कौन होता है कूप मंडूक कुए में पड़ा हुआ मेढक बैंग मैथली

1:03:30 में कहेंगे बैंग कुए में पड़ा हुआ जो मेढक होता है क्या वो कभी कभी ऊपर उछल दिखता है कुए की सीमा के ऊपर का दृश्य उसको दिखाई पड़ता है लेकिन सचमुच में कुए में छलांग लगाने वाला उछलने कूदने वाला जो मेढक होता है उसकी दृष्टि कितनी होती है इसी प्रकार सज्जनों को शरीर को ही आत्मा मानता है कोई इंद्रिय को ही आत्मा मानता है कोई मन को ही आत्मा मानता है लेकिन धीरे-धीरे उनकी दृष्टि उन्नत होती जाती है शरीर को ही आत्मा मानने वाला बुद्धिमान तो माना जाता है सचमुच में बुद्धिमान नहीं होता आज विश्व में जितनी व्यवस्थाएं हैं विकास को लेकर सबके गर्भ से विस्फोट क्यों निकल रहा

1:04:19 है क्योंकि शरीर को आत्मा मानकर ही सारी व्यवस्था हैं शरीर को आत्मा मानकर ही सारी व्यवस्थाएं हैं एक बहुत बढ़िया भागवत के एकादश स्कंध में भगवान श्री कृष्ण चंद्र का वचन है बुद्धिमान कौन है ऐसा बुद्धिमता बुद्धि मनीष मनीष नाम अनित्य जगत का संसार का आलंबन लेकर अनित्य संसार को बटोरने में ही अपनी जीवनी शक्ति का जो समग्र उपयोग कर देता है व बुद्धिमान है या अनित्य जीवन और जगत का उपयोग नित्य परमात्मा आत्मा को प्राप्त करने के लिए करता है व बुद्धिमान अनित्य के बदले अनित्य को पाया तो क्या पाया खा

1:05:07 पाया अनित्यम असखम लोकम मम प्राप्य भस्म भगवत गीता में दुखा लय अश्वत बुद्धिमान कौन है जीवन तो अनित्य है जीवन का भी महत्व है य बल्ब जो है य बिजली तो नहीं है लेकिन विद्युत का भी व्यंजक संस्थान है बादल जो होता है मेघ मंडल व बिजली तो नहीं होता लेकिन बिजली का भी व्यंजक संस्थान य जगत है यह जगदीश्वर की अभिव्यक्ति का संस्थान है लेकिन जगत का वरण करने पर जीवन सार्थक नहीं होता जगदीश्वर का वर्ण करने पर ही जीवन सार्थक होता है थोड़ी बात ईश्वर के बारे में हम कह दे कुछ विकास के बारे में सावधान य सी विकास के बारे में ही प्रकारा से हम कह

1:05:54 रहे हैं हमारा जो वेदांत सम्मत जो ईश्वर है वेदांत माने उपनिषदों का शिरो भाग उपनि वेदों का शिरो भाग उपनिषद उपनिषद का नाम ही वेदांत होता है उपनिषद का अर्थ है वेदों का शिरो भाग उसी का नाम वेदांत होता है ईश्वर ईश्वर में भी आकाश पाताल का अंतर होता सज्जनों अब सुनकर ईश्वर ईश्वर में भी आकाश पाताल का अंतर होता है हम इस चीज को विस्तार पूर्वक नहीं कहना चाहते लेकिन थोड़ा सुन लीजिए वेदांत ने जिस ईश्वर को खित किया है वेदों के शिरो भाग वेदांत ने जिस ईश्वर

1:06:43 को खित किया है उस ईश्वर की क्या विशेषता है व जगत बनाता भी है और जगत बनता भी है ध्यानपूर्वक सुनिए वह जगत बनाता भी है और जगत बनता भी है य देखिए सामने माइक नामक यंत्र है किसी ज्ञानवान इच्छा वान प्रयत्न वान चेतन यांत्रिक मैकेनिक ने प्लास्टिक नामक मैटर धातु या पदार्थ को इस माइक नामक यंत्र का रूप प्रदान किया होगा जो ज्ञानवान इच्छा वान प्रयत्न वान चेतन यांत्रिक या मैकेनिक किसी मैटर धातु या पदार्थ को कार्य का रूप प्रदान करता है उ उस कार्य का निर्माता अर्थात निमित्त कारण कहा जाता है और जो

1:07:28 मैटर धातु या पदार्थ कार्य का रूप धारण करता है उसे उस कार्य का उपादान कारण कहा जाता है जिस यांत्रिक मैकेनिक ने ज्ञानवान इच्छा वान प्रयत्न वान यांत्रिक मैकेनिक ने प्लास्टिक नामक धातु को इस माइक नामक यंत्र का रूप प्रदान किया उसे प्लास्टिक को माइक का रूप देना आता था प्लास्टिक को माइक का रूप देना जानता था लेकिन माइक बनना उसके बस की बात नहीं और जो प्लास्टिक नामक मेटर धातु या पदार्थ माइक बना उसमें माइक बनने की क्षमता थी माइक बनाने की नहीं मैकेनिक में माइक बनाने की क्षमता थी माइक बनने की नहीं और

1:08:17 प्लास्टिक में माइक बनने की क्षमता थी बनाने की नहीं ऐसे बहुतों के ईश्वर होते हैं बहुत जोर मार करके जगत बना भी दे तो जगत बन नहीं सकते वैश सिकों का ईश्वर नकों का ईश्वर और शवर सांख्य वादी योगियों का ईश्वर बाहर के लोगों का नाम नहीं लूंगा तो विद्यालय है सब तरह के लोग होते हैं अपने घर का नाम लिया अपने घर माने वैदिक आचार्यों का ही नाम लिया वो कोई मारने नहीं दौड़ेंगे गाली नहीं देंगे वैशेषिक के द्वारा मान्य ईश्वर नको के द्वारा मान्य ईश्वर योगियों शवर सांख्य वादी ईश्वर के व मान्य जो ईश्वर है व जगत

1:09:04 बना सकता है जगत बन नहीं सकता एक पत्य की बात है जिसका ईश्वर जगत बना सकता जगत बन नहीं सकता व अवतार भी नहीं ले सकता अवतार उन्हीं का ईश्वर ले सकता है संकेत में समझ गए जिनके ईश्वर में मेकर और मैटर दोनों होने की क्षमता है जो जगत बनाते भी है और जगत बनते भी हैं उन्हीं का ईश्वर अवतार ले सकता है अन्यों का ईश्वर नहीं अवतार ले सकता इसीलिए किसी के यहां दूत आते हैं किसी के य पूत आते हैं वो स्वयं नहीं आते उनका दोष नहीं है उनका दोष नहीं है उनकी सीमा में उनके

1:09:49 विचार की सीमा में वो ईश्वर अवतार ले ही नहीं सकते किसका ईश्वर अवतार ले सकते हैं वेदांत प्रस्थान का ईश्वर अवतार ले सकता है क्योंकि मेकर और मेटर दोनों है जगत बनाता भी जगत बनता भी है उदाहरण दिया मुंडा उपनिषद ने मकरी से तो परिचित है ना मकरी मकरी जाला बनाती भी है और जाला बनाने की सामग्री भी अपने अंदर संजोग के रखती है अच्छा और उदाहरण ले लीजिए कोई सिद्ध योगी हो व ब्याग बन जाए बनाने वाला कौन सिद्ध योगी अ व्याघ्र बनने वाला सिद्ध योगी इसी प्रकार से हमारे ईश्वर ऐसे हैं जगत बनाते भी है और जगत बनते भी हैं इसलिए

1:10:38 हमारे ईश्वर के सामने किसी ईश्वर की दाल नहीं गलती और दूसरी बात क्या है कितना भी निपुण यांत्रिक मैकेनिक क्यों ना हो जिस यंत्र की उसने संरचना की है क्या उस यंत्र पर पर उसका पूरा अधिकार होता है कभी-कभी वह भी उस यंत्र को ठीक करने में विफल हो जाता संकेत क्या हुआ किसी चतुर मैकेनिक ने यांत्रिक ने किसी यंत्र की संरचना की अब आप नहीं कह सकते कि यंत्र पर उसका पूरा नियंत्रण है कदाचित ईश्वर को जगत बनाने वाला ही मान है तो जगत पर पूरा नियंत्रण उसका हो ही नहीं सकता है और जगत पर पूरा नियंत्रण होगा तो

1:11:24 ईश्वर क्या होगा तो झक मारेगा इसीलिए सचमुच में ईश्वर उसी का ईश्वर है जो मेकर और मेटर दोनों है जगत बनाता भी और जगत बनता भी है आप कहेंगे सातव आसमान की बात दो उदाहरण तो मैंने दिया दूसरों को लेकर मकरी जला बनाती भी है जला बनती है सिद्ध योगी कह देंगे सिद्ध योगी तो हम समझते नहीं मकरी हमारे घर में है नहीं हम कैसे माने आपके घर में स्वप्न है या नहीं स्वप्न आपके घर में है सपना आता है या नहीं स्वप्न तो आता है अरे हम आप भी स्वप्न में मनोयोग से मन को लेकर क्या हो जाते हैं जी पूरी सृष्टि स्वप्न की बना

1:12:11 लेते हैं स्वप्न की सृष्टि बनाने वाला कौन है जीव हम आप है कर्मेंद्रियां सो जाती है ज्ञानेंद्रियां सो जाती है अंतःकरण अर्ध नित हो जाता है आत्म तन से अधिष्ठता मन कर्मेंद्रियों ज्ञानेंद्रियों के सो जाने पर निद्रा की प्रगल्भता निद्रा दोष की प्रगल्भता और वासना या संस्कार की प्रगल्भता से स्वयं ही स्वप्न में ग्राह ग्राहक भाव को प्राप्त होता है अर्थात मनो योग से मन के योग से स्वप्न जगत का निर्माता हम स्वयं होते हैं जैसे स्वप्न के निर्माता हम स्वयं होते हैं स्वपन वस्था में कितनी ऊंची सिद्धि हमको मिलती है त्यागा चर

1:12:57 अंतरम या जो स्थूल शरीर है बाह्य जगत है इसका विस्मरण हुए बिना स्वप्न भी नहीं हो सकता गाढ निंद की बात हम कह चुके ठीक है ना इस शरीर का विस्मरण हुए बिना बाहरी संसार सगे संबंधियों का विस्मरण हुए बिना स्वप्न भी नहीं हो सकता स्वप्न में हम में आप में उतनी क्षमता कैसे आ जाती है कभी कभी हमको स्वप्न में व्यवहार करने के लिए जो शरीर मिलता है उससे हम आकाश में उड़ जाते या नहीं कभी कोई हमको स्वप्न में समुद्र में पटक देता फिर भी जीवित होकर खड़े हो जाते या नहीं कभी कभी चिता में कोई पटक देता है लेकिन फिर भी जलने से बच जाते या नहीं स्वप्न में जो चमत्कार आता

1:13:43 है एक शरीर में अता ममता ना रहने के कारण जीव में इतना बल आ जाता है वेग आ जाता है कि स्वप्न प्रपंच के स्रष्टा हम होते अर्थात स्वप्न में बन स्वप्न बनने वाले भी हम स्वप्न बनाने वाले भी हम एक बहुत विचित्र है जा जीी माया माया प्रति स्वेते सरा चरम हेतुना कते जगत भी परिवर्तन मह ब्रह्मा तस्म गर्भम दम संभवा माया भगवान की शक्ति माया की क्या चमत कृति है भगवान की शक्ति माया की वेदांत की दृष्टि से क्या चमत कृति है अपनी विद्यमान से शक्ति शक्तिमान अपने

1:14:31 आश्रय भगवान को सती नहीं होने देती द्वैत का धन नहीं कर सकती और अपने कोट कोट कार्यों को लेकर भी अपने आश्रय शक्तिमान को सति नहीं बना सकती उदाहरण लिए मिट्टी में सगता नाम की चिकनाहट नाम की शक्ति होती है उस शक्ति के योग से कोई सति हो जाती है क्या द्वैत शक्ति जो है वह अपने आश्रय शक्तिमान में द्वैत का आधान नहीं करती और उस शक्ति के कारण मिट्टी को घट कुल्लर सकोरे हजारों रूप हम देते हैं लेकिन उन घट कुल्लर सकोरे को लेकर भी मिट्टी में द्वैत की प्राप्ति नहीं होती यही माया की चमत्कृत है माया अपनी

1:15:17 उपस्थिति से और अपने विविध कार्यों की विद्य मानता से भी अपने आ भगवान को सदु नहीं होने देती हमारे भगवान की चमत्कृत क्या है भगवान जगत बनाते भी हैं बनते भी अब थोड़ा हम विज्ञान की ओर भी जा रहे मैटर इ नथिंग बट एनर्जी आजकल के कहते हैं वैज्ञानिक लेकिन उसे पूछे कि मैटर के मूल में जो एनर्जी है जगत उसका परिणाम है या विवर्त है व एनर्जी जर है या चेतन है यहां जाकर वैज्ञानिकों को मौन रहना पड़ता है यहां जाकर और हमारे यहां वह परमात्मा

1:16:03 ही वो परमात्मा ही क्या होते हैं जगत बनते भी हैं जगत बनाते भी हैं किसी भी वस्तु का अनुसंधान करते करते करते करते हम परमात्मा तक पहुंच कर ही विश्राम ले सकते हैं हर वस्तु के मूल में अंत में चेतन परमात्मा की सिद्धि होती है इसलिए और दूसरी बात आजकल का जो विज्ञान है हमारे वेदांत का अनुगमन करता है आपने यह विषय दिया था विज्ञान वेदांत और विज्ञान मैटर कैन नादर बी क्रिएटेड्रॉअर्नेविगेटर

1:16:53 कटेड न डिस्ट किसी भी पदार्थ का निरव नाश नहीं होता उसका कुछ ना कुछ मूल विद्यमान रहता है यत हमारे यहां अव्यक्ता भूतानि व्यक्ति मध्यानी भारत ना सतो विवा भावो ना भावो विद्यते सता विज्ञान अभी उरान भर रहा है विज्ञान को दिशा देने की क्षमता केवल वेदांत में हमारे दर्शन में विज्ञान को भी देने की क्षमता है इसलिए हमने संकेत किया सबसे ऊंचा सिद्धांत क्या है जड़ के मूल में जड़ क्रिया के मूल में क्रिया गति के मूल में गति अंत नहीं होगा हर गति अंत में

1:17:38 गति का विश्राम स्थल स्थिति उस गति की क्या होगी गति जिस गति के गर्भ से गति निकलती जाए 10 मिनट लगभग और बोलेंगे थोड़ा संकेत करते हैं अब मैं प्रवचन को यं ढाल रहा हूं भौतिक वादियों को कम से कम चार पांच शप प्राप्त विश्व में कोई ऐसा भौतिक व नहीं जो सापक ग्रस्त ना हो और साप से पिंड छुड़ाने में समर्थ हो जब तक व अध्यात्म को नहीं मानेगा भौतिकवादी तब तक साप ग्रस्त बना ही रहेगा भौतिक वादियों को क्याक साप प्राप्त है दो चार का मैं नाम लेता हूं सावधान

1:18:25 तुम्हारी प्रवृत्ति का परवशा निवृत्ति में नहीं हो सकता भौतिकवादी जो प्रवृत्ति प्रारंभ करते हैं उसका परिवन निवृत्ति में कभी हो ही नहीं सकता पहला सा कोई भी भौतिक वाली कोई कर्मठ क्यों ना हो चीटी के समान रंगता रहे कर्मशील हो श्रमजीवी हो उससे पूछिए कि जो करना था कर चुके तने भौतिकवादी हैं उनको पहला सापल क्या लगा है उनकी प्रवृत्ति के गर्भ से प्रवृत्ति ही निकलती जाएगी और जिस गति के गर्भ से गति ही निकलती जाए जिस गति का परवन गंतव्य तक पहुंचने में स्थिति में ना हो उस गति की दुर्गति मानी जाएगी या

1:19:12 सार्थकता भौतिक वादियों को यह क्या है साप है या नहीं कोई भी भौतिकवादी आप लीजिए उसकी प्रवृत्ति का कहीं अंत होता है क्या प्रवृत्ति के से प्रवृत्ति और हमारे यहां मनु जी क्या कहते हैं निवृति महा फला प्रवृत्ति तब तक सार्थक नहीं है और प्रवृत्ति वही प्रवृत्ति कहने योग्य है जिसके गर्भ से निवृत्ति निकले हम आप चलते हैं तो गति का परिवन कहां होता है गंतव्य तक गमन में गंतव्य तक गमन के बाद गति शांत हो जाती है हेलीकॉप्टर या हवाई जहाज भारतीय न चलाते हैं पृथ्वी पर क्यों चलाते हैं जी पृथ्वी को छोड़ने के अनुकूल बल और वेग यान को प्राप्त हो सके इसलिए ना

1:19:58 पृथ्वी पर चलाते हैं पृथ्वी को छोड़ने का बल और वेग अर्जित करने के लिए इसी प्रकार हमारे यहां शास्त्रों के आधार पर जब प्रवृत्ति प्रारंभ की जाती है तो प्रवृत्ति की सार्थकता निवृत्ति में होती और निवृत्ति की सार्थकता निर्वत निर्वत माने मुक्ति में होती है इसलिए हमारे यहां प्रवृत्ति भी सार्थक निवृत्ति भी साधक सार्थक जितने भौतिकवादी हैं उनके बस की बात नहीं कि प्रवृत्ति के गर्भ से निवृत्ति निकल सके इसलिए समग्र भौतिक वादियों का जीवन निरर्थक होता है प्रवृत्ति ऐसी अपनाते हैं जिसका परिवन कभी निवृत्ति में ना हो सके य साप है दूसरा साप क्या है करते रहो वही करते रहो करते

1:20:45 रहो करते रहो करते रहो अपनी ही दृष्टि में करना कभी पूरा नहीं होगा प्रवृत्ति माने करना करना करते रहो करते रहो करते रहो करते रहो कभी भौतिकवाद इस अनुभूति तक नहीं पहुंच सकता कि जो करना था कर चुका मेरा कोई कर्तव्य विशेष नहीं है और अध्यात्म मार्ग में प्रवृत्ति का आलंबन अगर हम वैदिक विधा से लेते हैं तो क्या होता है यवाम देवस्या त मानव आत्म संतुष्ट कार्यम विद्यते इसका मतलब जो करना था कर चुका मेरा कोई कर्तव्य शेष नहीं है कर्तव्य का अंत प्रवृत्ति का अंत भौतिक वादियों के

1:21:30 जीवन में नहीं होता पहला शप य है अर्थात जब प्रवृत्ति का अंत ही नहीं होता कर्तव्य का अंत ही नहीं होता जितने भौतिकवादी होते हैं उनका जीवन निरर्थक होता है व्यर्थ होता है दूसरा साप क्या है भौतिक वादियों को प्राप्त बटोर रहो बटोर रहो सिकंदर के समान कब्रस्तान खुदवा खुदवा कर धीरे जवाहरात बटोर रहो अंत में जब एकांत में हृदय पर हाथ रखकर बोलोगे जो पाना था पा चुका कराते हुए को हाय जो पाना था पान सका भौतिकवादी के कर्तव्य का कभी अंत नहीं होता पहला साप प्राप्त का कभी अंत नहीं होता जो पाना था पा चुका मेरा कुछ प्राप्त

1:22:17 विशेष नहीं है गीता ते सूते क व तो उध चौथा अलग है हा वह भी है मुझे कुछ प्राप्त विशेष नहीं भगवान का वचन य जीव के लिए तथ नाते कना न स भूते क इसका मतलब इसका मतलब यह है कि उसका कुछ प्राप्त विशेष नहीं रहता परम धन परमात्मा को पा लेने पर स्वयं को सच्चिदानंद स्वरूप समझ लेने पर सच्चिदानंद स्वरूप सर्वा स्मा में मनोयोग प्राप्त कर लेने पर मृत्यु अज्ञ

1:23:03 दुख का अत्यंतिक उे हो जाने पर कुछ भी प्राप्त विशेष नहीं रहता तीसरा साप क्या प्राप्त है भौतिक वादियों को वो तो यही को लेकर तार्थ होता है य नहीं और भी शिक्षण संस्थानों को लेकर चरितार्थ होता है कभी जानना नहीं पूरा होगा तीसरा सा भौतिक वादियों को प्राप्त है यह क्या यह क्या यह क्या यह क्या बटोर रहो बटोर रहो जानकारी बटोर रहो एकांत में बैठकर 1000 वर्ष की आयु होगी बटोर रहो अंत में जब बैठकर हृदय पर हाथ रखकर विचार करोगे हाय जो जानना था जान ना सका ज्ञातव्य का कभी अंत नहीं होता क्योंकि कमन विजा सर्वम विज्ञ भवति एकम विज्ञ

1:23:48 सर्वम विज्ञ भवति जो जगत का निमित्त और उपादान अभिन्न निमित्त उपादान कारण है मेकर भी है मैटर भी है वो जो तत्व सबके मूल में स्थित है उसको जाने बिना हजारों लाखों करोड़ों वस्तुओं को जानते रहो जानना कभी पूरा नहीं होगा एक मिट्टी के ढेले का भी पूरा ज्ञान होना कठिन है फिर अनंत कोटि ब्रह्मांड में असंख्य पदार्थ है इसलिए भौतिक वादियों को क्याक साप हुआ कर्तव्य कभी पूरा नहीं होगा ज्ञात कभी पूरा नहीं होगा प्राप्त व्य कोई कभी पूरा नहीं होगा अर्थात जीवन कभी धन्य हो ही नहीं सकेगा इसलिए सज्जनों इस रॉकेट कंप्यूटर एटम मोबाइल के युग में भी

1:24:34 अध्यात्म विद्या का महत्व पूर्वक चर्चा अर्थ है अब कुछ लोग कहते हैं पुरानी चीजों के दिन लद गए जी 21वी शताब्दी में रॉकेट कंप्यूटर एटम का या मोबाइल है का युग है उनको हम लोग बहुत अच्छा उत्तर देते हैं क्यों जी पृथ्वी पुरानी है या नहीं पृथ्वी की उपयोगिता के दिन लग गए क्या अरे पृथ्वी का आलंबन लिए बिना कौन डॉक्टर बनेगा कौन इंजीनियर बनेगा कौन वैज्ञानिक बनेगा पृथ्वी की उपयोगिता लज गई क्या जल का उपयोग की उपयोगिता लद गए क्या तेज की उपयोगिता लद गए क्या वायु की उपयोगिता नष्ट हो गई क्या आकाश की उपयोगिता नष्ट हो गई क्या और सबसे पुराने तो भगवान है नया भगवान बनाओ बना हुआ भगवान

1:25:21 भगवान से होगा क्या नया भगवान बना लो भगवान से ही परहेज करो सबसे पुराने तो भगवान है व महाप्रलय में बचे रहते हैं शिष्य शिष्य संज्ञा वैदिक मैथमेटिक्स का नाम सुना होगा उसमें एक उप सूत्र है शिष्य श संज भागवत का ये वचन है इसका मतलब महाप्रलय में भगवान रहते सबसे पुराने कौन है भगवान भगवान भी काम नहीं देंगे क्यों पुराने है तो नया भगवान बनाओ तुम जिसको भगवान बनाओगे उसके भगवान तो तुम स्वयं हो गए और तुम भगवान हो [प्रशंसा] नहीं हमारे द्वारा कोई भगवान बनाया जाएगा उसके भगवान तो हम ही हो गए और हम भगवान है नहीं तो वो क्या भगवान होगा सबसे ज्यादा परहेज करना चाहिए भगवान

1:26:09 से क्योंकि सबसे पुराने भगवान है और छोड़ दो सबसे ज्यादा परहेज अपने से करना चाहिए कि हम भी जी पुराने हैं वही वही वही क्या क्या वही वही वही पुराने जीव है महाप्रलय के बाद फिर आ जाते हैं फिर इसका मतलब अपने से परहेज करना पड़ेगा इसका अर्थ क्या है जो कुछ पुरानी चीज है उससे परहेज करेंगे आखिर बात क्या है मैं प्रन को विराम देने की ओर जा रहा हूं निरव वस्तु क्या कभी पुरानी होती है निरव अवयव रहित जो वस्तु होगी व नित्य होगी या नहीं भगवान नि अयव है पृथ्वी इत्यादि जो

1:26:54 है व सावयव तो है लेकिन यह दिल्ली है ना कुतुब मीनार है ना लोहे लोहे से उसका निर्माण हुआ है ना उसमें जंग क्यों नहीं है संस्कार के योग से संस्कार की य महिमा है कि लोहे से बना हुआ जो मीनार लोहे से बना उसमें जंग नहीं है संस्कार के द्वारा भी वस्तु में दिव्यता का आधान होता है सनातन सिद्धांत उसको कहते हैं हर देश में हर काल में हर परिस्थिति में हर व्यक्ति के लिए जिसकी उपयोगिता शेष हो इसलिए अंध परंपरा से बचने की आवश्यकता है लेकिन पृथ्वी पानी प्रकाश पवन आकाश जीव परमात्मा

1:27:40 यह सब पुराने हैं इनके बिना कोई काम चल ही नहीं सकता और ऊंची बात क्यों जी त्रेता युग के द्वापर युग के त युग के व्यक्ति कलयुग के 2000 वर्ष पहले के व्यक्ति अगर आंखों से रूप का दर्शन करते थे आज भी हम आंखों सेही रूप का दर्शन करते या नहीं इस सिद्धांत में कोई अंतर आए आया क्या आगे भी जो कोई देखेगा आंखों से देखेगा या नहीं आंख की उपयोगिता सदा बनी रहेगी या नहीं कानों से सुनते थे पहले भी आज भी सुनते आगे भी कोई सुनेगा तो कान से सुनेगा इसका अर्थ क्या है यह सब गणित है ना पृथ्वी की पानी की प्रकाश की पवन की आंख की हर

1:28:26 कर्मेंद्रिय की हर ज्ञानेंद्रिय की पूर्व योग्य उपयोगिता रहती है इतना हमने संकेत किया अब एक दो सूत्र की व्याख्या करके प्रवचन को विराम देते हैं मनु महाराज 11वां अध्याय 6वा श्लोक का एक चरण महा यंत्र प्रवर्तन महा यंत्रों का प्रचुर आविष्कार और प्रयोग भी होता रहे कोई दिव्य वस्तु और व्यक्ति विशेष रह जाए संभव नहीं इतना मैंने 30 मिनट पहले लगभग कहा था थोड़ी इसकी व्याख्या कर दू महा यंत्र प्रवर्तन क्यों जी महा यंत्र के आविष्कार

1:29:12 की भावना क्यों जगती महा यंत्र की आवश्यकता क्या है इस पर थोड़ा विचार करें महा यंत्रों के नि का प्रयोजन क्या है इस पर विचार करें समय की बचत श्रम की बचत सहयोगी की बचत यही ना महा यंत्रों के निर्माण की आधार शिला पर विचार करें समय की बचत कम समय में अधिक दूरी तय हो जाए कम श्रम में अधिक उत्पादन हो जाए कम सहयोगी से अधिक उत्पादन हो जाए यही ना समय की बचत श्रम की बचत सहयोगी की बचत कम समय में कम श्रम से कम सहयोगी के द्वारा अधिक से अधिक दूरी तय हो वस्तु का

1:29:58 उत्पादन हो उस वस्तु के सेवन से मौज मस्ती पूर्ण जीवन हो यही तो महा यंत्रों के आविष्कार का प्रयोजन है या नहीं आधारशिला है या नहीं अब थोड़ा विचार कर ले समय की बचत 10 किलो गेहूं को आटा का रूप हाथ चक्की के द्वारा दे देने में कितना समय लगता था आज यंत्र के द्वारा हो गया ना समय की बचत श्रम कितना होता था आज सहयोगी समय की बचत श्रम की बचत सहयोगी की बचत अपना अपना जीवन देखें जिसके लिए समय लगाना चाहिए उसके लिए समय है क्या हर व्यक्ति कहते हैं कि कहता है कि मरने की

1:30:46 तो फुर्सत नहीं तुम्हारी बात कौन सुने एक विचित्र बात है जिसके लिए समय लगाना चाहिए जिससे जीवन सार्थक हो सकता है उसी के लिए समय नहीं हर व्यक्ति कहता बिजी जी व्यस्त ह जी समय नहीं है मेरे पास कौन जाकर डेढ़ घंटा सुने समय नहीं है प्रयोजन विफल हुआ या नहीं अरे सारा प्रक्रम तो आपका समय बचाने के लिए फिर समय क्यों नहीं है समय बचाने के लिए महा यंत्र का आलंबन लेते फिर समय का टोटा क्यों है समय नहीं है और दो किलो का वजन दे दे बोर हो गई बोलने लगती है देवियां और पुरुष भी बोलने लगते बोर हो गया जी ये कौन ला देगा

1:31:33 हो गया ना श्रम की हर व्यक्ति कहता मैं थका मानदा हूं मुझसे ज्यादा काम मत कराओ हां भोजन कौन बनावे घर में झारू कौन लगावे बाजार से बाजार से वीआईपी व्यक्ति सब्जी क्यों खरीदे भाई हर व्यक्ति थक्का मानदा है दूसरा प्रयोजन में विफल हो गया हर व्यक्ति समय श्रम बचाने के लिए सारा उपक्रम है और हर व्यक्ति थका मादा शमित अपने आपको मानता है तीसरा प्रयोजन क्या है जी सहयोगी कोई भी संस्था खोल दीजिए प्रधानमंत्री जी से पूछिए वो कहेंगे मेरे समान अगर पांच भी सहयोगी हो जाते तो देखिए मैं क्या कर देता सत्कार रोना तो यही है सहयोगी नहीं इसका मतलब सहयोगी से बचने के

1:32:19 लिए महा यंत्र चाहिए ना अब तो सहयोगी पर्याप्त होना चाहिए लेकिन हर जगह व्यक्ति कहता सहयोगी नहीं है दूसरी बात यह है जो कार्य ध्यानपूर्वक सुनिए जो कार्य हमारे पूर्वज देहाम वादी ना होने के कारण अध्यात्म वादी होने के कारण ईश्वर वादी होने के कारण देवता से साधते थे नास्तिकता बर जाने के कारण उन कार्यों की सिद्धि हम महा यंत्रों से साधना चाहते हैं महा यंत्रों का आविष्कार कब होता है देवता के प्रति जब अनास्ता होती इंद्र वरुण कुबेर यह सब देवता है ना जिन कार्यों की सिद्धि देवता के माध्यम से

1:33:06 होती थी देवताओं पर विश्वास ना रहने पर मैथली में क्या कहते देव पितर सब पेट भीतर ना कोई देवता है ना कोई पितर नास्तिकता बढ़ जाने पर देहाम वाद बढ़ जाने पर देवता जिन कार्यों की सिद्धि होती थी उन कार्यों को हम मशीन के माध्यम से लेना चाहे तो महा यंत्रों के आविष्कार का मार्ग प्रशस्त हुआ यह नास्तिकता का थक पशुओं से परहेज बैल इत्यादि बैलगाड़ी आदि खेती आदि में पशु पशु हमारे सहयोगी होते थे ना गांव के पशु अलग और जंगल के पशु अलग होते हैं

1:33:51 राम के पशुओं से ज काम लेते थे उनसे परहेज होने पर जो पशुओं के सहयोग से कार्य होता था उस कार्य की सिद्धि हम मशीन से करना चाहे तो महा यंत्रों का आविष्कार बन गया और हमारे सहयोगी मनुष्य होते थे मनुष्यों से भी परहेज बढ़ाने पर क्या हो गया सहयोगी मनुष्यों की अपेक्षा ना रहे इसलिए महा यंत्रों का आविष्कार किया अब थोरा विचार करिए महा यंत्रों आधार पर महानगर की संरचना होगी तो पर्वत बचेंगे क्या वन बचेंगे नदियां दूषित होने से बचें ऊर्जा के जो चारों स्रोत है पृथ्वी

1:34:36 पानी प्रकाश पवन यह विकृत दूषित कुपित या शु हुए बिना बचेंगे क्या और बड़ी विचित्र बात है पर्वत विहीन वन विहीन जब महा यंत्रों के माध्यम से हम महानगर बनाएंगे तब पर्वत का नाश होगा ही नीचे के पर्वत का भी नीचे जो पत्थर है उनका भी नाश होगा ही वन का नाश करना ही पड़ेगा अंत में होता क्या है जल को भी दूषित करने के लिए हम बाद होंगे और अंत में सूर्य चंद्रमा आदि की जो रोशनी है उनके प्रकाश है वह भी विषाक्त होकर ही हमको प्राप्त होंगे जैसे कि दिल्ली में वन भी हमको विषाक्त ही

1:35:22 प्राप्त होंगे महा यंत्रों का प्रचुर आविष्कार प्रयोग होगा ऊर्जा के जो चारों स्रोत है पृथ्वी पानी प्रकाश पवन ये विकृत दूषित और कुपित या शुब हुए बिना रहेंगे क्या और अंत में मैं एक संकेत करता हूं महानगर में रहेंगे यह नहीं कि महानगर में संयुक्त परिवार खत्म हो गया गांव और वन में है वहां के लोग यही भगते हैं गांव में भी लाचारी में कोई रहता है नाज पूर्वक गौरा पूर्वक गांव में रहना कोई पसंद नहीं करता वनवासी भी वन छोड़ छोड़ के इधर आ रहे हैं वहां भी संयुक्त परिवार का लोप हो गया महानगर को प्रगति का विकास का मापदंड मान लेने के कारण वन भी सुना संयुक्त परिवार

1:36:09 से गांव भी सुना ठीक है संयुक्त परिवार रहित संयुक्त परिवार रहित परिवार और जीवन की संरचना महा यंत्रों की देन है या नहीं त परिवार के टूट जाने पर कुल वधु कुल व कुलाचार कुल देवी कुल देवता कुल गुरु इन सबका लोप हुए बिना रह सकता है लोप हो ही गया इनका विलोपन पर संतान उत्पन्न करने और भोजन करने की मशीन मनुष्य रह जाएगा या और कुछ होगा मानव जीवन की अपूर्व जिससे हम परमात्मा तक को प्राप्त कर सकते थे जन्म और मृत्यु के अनाद अ परंपरा का अत्यंतिक उे कर सकते थे

1:36:54 उस मानव जीवन की अपूर्व पर ही हमने पानी फेर दिया एक बहुत विचित्र बात कल भी मैंने कहा था नई जगह में कहता हूं महानगर का अर्थ क्या होता है जी शुद्ध मिट्टी की पहुंच ना हो शुद्ध मिट्टी से परहेज हो पहुंच नहीं और परहेज भी यही तो महानगर है शुद्ध पानी की पहुंचना और शुद्ध पानी से परहेज हो चाय पीजिए पिप्सी पीजिए कोका कोला पीजिए दूषित जहर बोतल में रखा हुआ पीजिए यही ना शुद्ध पानी की जहां पहुंचना हो शुद्ध पानी से परहेज हो शुद्ध प्रकाश की जहां पहुंचना हो शुद्ध प्रकाश से परहेज हो शुद्ध पवन की जहां पहुंचना हो शुद्ध पवन से परहेज हो प्रचुर

1:37:40 आकाश की जहां पहुंचना हो प्रचुर आकाश से परहेज हो शुद्ध गंध से जहां परहेज हो शुद्ध रस से जहां परहेज हो शुद्ध रूप से जहां परहेज हो अशुद्ध स्पर्श से जहां परहेज हो शुद्ध शब्द से जहां परहेज हो शुद्ध मनोभाव से जहां परहेज हो शुद्ध मुस्कान से जहां परहेज हो उसी का नाम हुआ ना महानगर तो जीवन क्या रह गया इसलिए मैंने संकेत किया वैदिक महर्षि हों ने वेद सम्मत विकास को जो परिभाषित किया है उसको समझे बिना क्रियान्वित किए बिना विकास गर्भ से विस्फोट ही निकल सकता है जैसे कि आजकल इस संबंध में अ वैदिक वेद

1:38:28 सम्मत विज्ञान वेद सम्मत विज्ञान के द्वारा जब विकास को हम परिभाषित और क्रियान्वित करते हैं तब विकास सचमुच में होता है नहीं तो विनाश होता है पूरा विश्व आज मेरी बात से अ विचार होने लगा है कहां पर विदेशों में मैं जो कह रहा हूं उसका असर विदेशों में पड़ने लगा और नासा इत्यादि के वैज्ञानिक इस पर विचार करने लगे हैं कि हमने ऊर्जा के चारों स्रोत पृथ्वी पानी प्रकाश पवन को विकृत दूषित इतना शुद्ध कर दिया है कि हमारा जीवन एक भस्मासुर का बन गया इस पर थोड़ा ध्यान दीजिए पाच मिनट की सीमा में लगभग प्रवचन विराम द प्रन

1:39:14 को पर्वत और वन के लिए मनुष्य दुश्मन हो गया है ना शत्रु पर्वत के साथ वन के साथ दुश्मनी निभाएंगे दुश्मनी किस पर बजगी हम परया नहीं इन्हीं पर तो जीवन निर्भर है पंच भौतिक हमारा शरीर है पंचभूत के साथ अन्याय करेंगे तो अपने साथ अन्याय होगा या नहीं महानगर बनाएंगे तो वन का विलो होगा ही हो ही रहा है पर्वत का विप होगा ही हो ही रहा है हमारे जो सातों द्वीप है उनका नामकरण किस पर है जी कुश पर जमू द्वीप वृक्ष पर और क्रंच पर्वत पर और ार सिंधु ीर सिंधु य सब जलाशय पर हमारे पूर्वजों को देखिए ये जो द्वीपों का विभाग जन है वृक्ष के नाम

1:40:01 पर वनस्पति के नाम पर पर्वत के नाम पर और किसके नाम पर जलाशय के नाम पर इन समू का उे हम कर रहे तो इसका म स्थावर जितने प्राणी है स्वराम हिमालय और तरलता गुल मित आदि इनके हम भक्षक हो गए ध्यान आपका नहीं गया होगा इतने बड़े विद्युत को व्यक्त करने के संस्थान यंत्र मार्गों में लगे रहते ना लाइट एक रात में कम से कम कितने पतंगे उसमें जल के नष्ट होते होंगे इसका अच्छा रेल लीजिए विकास का मैं समर्थक हूं लेकिन थोड़ा विचार कीजिए करोड़ों प्राणी इस विकास के चपेट में आकर नित्य एक एक घंटे

1:40:46 में नष्ट होते या नहीं धीरे धीरे अच्छा चीटी कैसे मुर्दाबाद जिंदा कहकर बाद कहकर अपने प्रति न्याय ले सकती है चीटी के प्रति कोई भी शासन त न्याय देने के लिए समर्थ है वृक्ष कैसे चिल्लाकर मुर्दाबाद जिंदाबाद कहकर अपना काम चला सकते हैं उन सबके जीवन के लिए हम घातक सिद्ध हो गए और थोड़ा विचार करें तो ना चाहते हुए भी एक मनुष्य अपने अलावा हर मनुष्य के लिए घातक सिद्ध हो गया और अंत में विचार करें बहुत एकांत में हर मनुष्य अपने लिए भी घातक सिद्ध हो गया इसका मतलब विकास के नाम पर भस्मासुर तैयार करना यह तो उचित नहीं है अब अगर कहेंगे तो विज्ञान से आपको दुश्मनी है तो मैं दो चार वाक्य

1:41:31 कह दूं नल नील को क्या आप मानेंगे वैज्ञानिक नहीं मानेंगे कि सा लाख वर्ष पहले जो बना दिया सेतु नासा से पूछे मानव निर्मित सेतु राम सेतु साढे लाख वर्ष पहले नल नील को आप वैज्ञानिक नहीं मानेंगे मैं दानव को आप भवन विज्ञान के विशेषज्ञ नहीं मानेंगे और यान किसने बनाया बद्र किसने बनाया अरे यान किसने बनाया पुष्प यान किसने बनाया विश्वकर्मा को आप वैज्ञानिक नहीं

1:42:19 मानेंगे धी महर्षि की हड्डियों से एक गाठ पर्व वाला वज्र बनाया पुष्पक यान बनाया उनको आप वैज्ञानिक नहीं मानेंगे क्या इसका मतलब क्या है और बिना यान का सहारा लिए एक मिनट के अंदर बैकुंठ से यहां तक आ जाने वाले नारद जी को आप वैज्ञानिक नहीं मानेंगे बिना साइकिल के ही बिना हेलीकॉप्टर केही इसका मतलब महा यंत्र की विशेषता क्या होती है एक ही दो वाक्य कहूंगा प्रज्ञा शक्ति प्राण शक्ति जिस यंत्र में डालने में हम समर्थ हो जाते हैं उसका नाम महा यंत्र होता है

1:43:07 देखने में आकृति थोड़ी छोटी ही भले हो कंप्यूटर को ले लीजिए मोबाइल को ले लीजिए ् हमारा जो जीवन संचालित होता है प्रज्ञा शक्ति प्राण शक्ति अगर हम यंत्र में प्रज्ञा शक्ति प्राण शक्ति को डाल देते हैं वैकल्पिक तो वह यंत्र महा यंत्र बन जाता है ठीक है लेकिन किसी ने अपने जीवन में योग बल से प्रज्ञा शक्ति प्राण शक्ति को नारद जी के समान उद्दीप्त कर लिया संन कादी के समान उपत कर लिया तो उत्कृष्ट होगा या इसमें प्रज्ञा शक्ति प्राण शक्ति डालने पर उत्कृष्ट होगा व इसलिए अब एक विचित्र बात है पुष्पक जन से भगवान राम ने क्या कहा को ड्राइवर था वहां पर कप्तान तुम कुबेर पह जाऊ तुम्हारा अधिकार

1:43:56 तु तुझ पर अधिकार विभीषण का भी नहीं रावण तो मारा गया कुबेर से छीना था रावण ने भले लंका का राज्य हमने लंका का राज्य विभीषण को दिया है तुम पर आधिपत्य किसका कुबेर पर जाओ कुबेर के पास पहुंच गया ध्यान अब उसमें प्रज्ञा शक्ति प्राण शक्ति थी या नहीं पुष्पक यान से कहा कुबेर के पास चले जाओ कुबेर के पास पहुंच गया इसका अर्थ हमारे ऋषि मुनि जो थे अच्छा महा यंत्र ले लीजिए तोप बंदूक ये सब सब ले लीजिए यह जो गायत्री मंत्र के अनुलोम और विलेम से ही सारे ब्रह्मास्त्र बनते हैं सूत समहिता अ संहिता एक एक मंत्र में एटम बम से अधिक शक्ति होती है मंत्र ही हमारे यहां क्या बन जाते थे

1:44:43 पाशुपतास्त्र ब्रह्मास्त्र हमारे ऋषि मंत्र से जो काम ले लेते थे और अंत में यह जो यंत्र बनते इनका सिद्धांत क्या है पृथ्वी पानी प्रकाश पवन आकाश आदि में अनुग सिद्धांत है उनका नाम मंत्र होता है उस सिद्धांत को यंत्र तक पहुंचाने की प्रक्रिया प्रोसेस मेथड विधा का नाम तंत्र होता है और यन मंत्र तंत्र की घाटी पार कर ले मंत्र तंत्र की घाटी पार कर ले तो यंत्र का रूप धारण करता है तो हमने संकेत किया तो आज के प्रवचन का सारांश हुआ वेद विहीन विज्ञान का अर्थ होता है गीता के आठवे अध्याय के अनुसार तमोगुण हमारे जीवन में उलिक होता है सर्वथा

1:45:31 विपरीत बोध होता है तब हम वेद विज्ञान विहीन हो जाते हैं रजोगुण का उल्लेख होता यथावत प्रजा नाथ कुछ यथार्थ कुछ यथार्थ सत्व गुण का उदक होता है तो यथावत हमको विज्ञान होता है तो सत्व गुण का उदय होने पर वेद विज्ञान की अभिव्यक्ति होती है वेद विज्ञान सम्मत जो विकास होता है अंत में वही विकास विकास है नहीं तो संयुक्त परिवार का विलो रुग्णता की पराकाष्ठा आर्थिक विपन्नता आदि की पराकाष्ठा एक वाक्य और कहकर दो वाक्य कहकर प्रवचन को विराम देते हैं पदम पुराण एका क्रिया दव अर्थ करी प्रसिद्धा पदम पुराण एका क्रिया

1:46:17 व्यर्थ करी प्रसिद्धा हां वो मालूम है वो आप ही की कथा है आप ही तर्पण उस ढंग से करते होंगे एका क्रिया दथ करी प्रसिद्धा पद्म पुराण का वचन है कोई कह सकते हैं ना यह जो वैदिक लोग हैं य व्यवहार के दुश्मन है इसका उदाहरण पदम पुराण ने दिया एक सज्जन पित्रों के लिए देवताओं के लिए तर्पण कर रहे थे बैठे कहां थे आम का विरवा था प था देवता पिता तो तृप्त हो रहे थे हम भी तृप्त हो रहा था क्या घाटा लगा घाटा लगा आम का भी पोषण हो गया देवता भी तृप्त हो गए यज्ञ आप ले

1:47:04 लीजिए यज्ञ में जितनी सामग्री हम खरीदते हैं कोई भी यज्ञ करना चाहे उन सामग्रियों को बेचने वाले को लाभ होता है या नहीं यज्ञशाला बनाने वाले मजदूर को लाभ होता है या नहीं यज्ञ कराने वाले पंडित को लाभ होता है या और अंत में जब ब्राह्मण भोजन और समष्टि

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