इस प्रवचन ने ओशो को विश्वभर में प्रसिद्ध कर दिया ।

Osho Pravachan www.youtube.com

संक्षिप्त सारांश

इस वीडियो में ओशो ने वैज्ञानिक सोच और अंधविश्वास के बीच के अंतर पर चर्चा की है। उन्होंने बताया है कि अंधविश्वास कैसे लोगों को नुकसान पहुंचाता है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।

  • अंधविश्वास से ना जीकर वैज्ञानिक व्यवस्था में जीना चाहिए।
  • हमारी अतीत की हार का मुख्य कारण अवैज्ञानिक सोच रही है।

अंधविश्वास और वैज्ञानिक चिंतन

इस अध्याय में ओशो ने अंधविश्वास को वैज्ञानिकता से तुलना करते हुए बताया कि एक लड़का, जो विज्ञान की पढ़ाई कर रहा है, परीक्षा के समय भगवान को सहायता के लिए पुकारता है। उन्होंने यह पूछा कि भला भगवान की रक्षा की जिम्मेदारी किसकी होती है? ओशो ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय समाज को वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है, क्योंकि जीवन वैज्ञानिक कारणों पर आधारित है, न कि अंधविश्वासों पर।

अतीत की हार का कारण

ओशो ने सोमनाथ में हुए हमले का उदाहरण दिया, जहां पुजारियों ने कहा कि भगवान उनकी रक्षा करेगा। उन्होंने बताया कि राजाओं ने भी यही माना और अंत में भगवान की मूर्ति को खंडित किया गया। यह दर्शाता है कि जब हम अपनी सुरक्षा का ध्यान नहीं रखते हैं और रखरखाव केवल भगवान पर निर्भर करते हैं, तब हम नुकसान उठाते हैं।

खुद की सुरक्षा

ओशो ने यह बताया कि जब भगवान की मूर्ति इंसान बनाता है, तब उसे अपनी रक्षा खुद करनी पड़ती है। विश्वास के चलते हमने हज़ारों वर्षों की गुलामी झेली है। उन्होंने जोर देकर कहा कि हमारी पिछली हार केवल अंतर्विरोधों के कारण नहीं थी, बल्कि हमारी वैज्ञानिक सोच में कमी थी।

युद्ध की गलतियाँ

ओशो ने सिकंदर और पौरुस की लड़ाई का उल्लेख किया और बताया कि पौरुस के पास वैज्ञानिक बुद्धि की कमी थी। जबकि सिकंदर घोड़ों का प्रयोग कर रहा था, पौरुस हाथियों पर था, जो युद्ध में प्रभावी नहीं थे। इसी तरह, उन्होंने बाबर और अंग्रेजों की मिसाल दी, जहां भारतीय अपनी पुरानी तकनीकों पर निर्भर रहे और परिणामस्वरूप हार गए।

संख्यात्मक समस्या

ओशो ने जनसंख्या वृद्धि और इसके संभावित परिणामों की चर्चा की। उन्होंने चेतावनी दी कि अगले 10 से 15 वर्षों में भारत में अकाल पड़ सकता है, लेकिन किसी को इसकी चिंता नहीं है। उन्होंने कहा कि हमें जनसंख्या पर नियंत्रण रखने की आवश्यकता है, अन्यथा देश के लिए संकट होगा।

धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

ओशो ने बताया कि विज्ञान ने बाहरी जीवन को संभालने में मदद की है, लेकिन हमारे भीतर की स्थिति को नहीं। उन्होंने वैज्ञानिक बुद्धि को धार्मिकता से संबंधित करते हुए कहा कि हमें दोनों को मिलाकर चलने की आवश्यकता है ताकि एक सकारात्मक संतुलन बना सके। उनका लक्ष्य यह था कि धार्मिकता को एक विज्ञान के रूप में समझा जाना चाहिए, जो कि व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है।

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Transcript

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0:00 वैज्ञानिक पैदा करने का मतलब है अंधी श्रद्धा से मुक्ति। अब एमएससी पढ़ रहा है लड़का। वह सब अह विज्ञान की शिक्षा ले रहा है। लेकिन परीक्षा के वक़्त हनुमान जी के मंदिर के सामने मिल जाएगा। तब थोड़ा सोचना जरूरी है कि हनुमान जी की क्या गलती है? उनकी परीक्षा के लिए हनुमान जी की क्या जिम्मेवारी है? वो हनुमान जी को क्यों मुसीबत में फंसा देने के ख्याल में? नहीं लेकिन वो पांच आने की रुबत दे रहा है। वो कह रहा है एक नारियल चढ़ा दे। भारत में अगर हमें एक वैज्ञानिक समाज की दिशा में सोचना हो तो हमें वैज्ञानिक

0:45 चित्त कैसे निर्मित होता है इस दिशा की बात समझ लेनी जरूरी। जीवन चलता है कार्य कारण से अंधविश्वासों से नहीं। जिंदगी चलती है एक वैज्ञानिक व्यवस्था से हमारी कल्पनाओं श्रद्धाओं से नहीं सोमनाथ पर हमला हुआ तो सोमनाथ में 500 पुजारी थे करोड़ों रुपए की संपत्ति थी आसपास के राजपूत राजाओं ने उन्हें खबर भेजी कि हम रक्षा के लिए आए तो उन पुजारियों ने कहा पागल हो गए वो जो भगवान सबकी रक्षा करता है उसकी रक्षा तुम करोगे उनकी दलील तो बिल्कुल ठीक थी उनकी दलील से लड़ना मुश्किल हो गया और इसलिए मुश्किल हो गया कि वो राजा भी उसी दलील को मानते थे। उन्होंने कहा बात तो ठीक है। भगवान सबका

1:30 रक्षक है। हम उसकी रक्षा कैसे करेंगे? तो राजाओं का यह निवेदन कि हम रक्षा करने आए। पुजारियों ने इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि तो नास्तिकता की बात है। तुम और भगवान की रक्षा करोगे। भगवान सबकी रक्षा कर रहा है। पुजारी खड़े होकर प्रार्थना करते रहे और गजनी आया और उस मूर्ति को टुकड़े-टुकड़े कर दिया और भगवान ने कोई रक्षा नहीं की। वो मूर्ति बिखर गई। अंधविश्वास से जिए हम। वैज्ञानिक चिंतन से नहीं जिए। वैज्ञानिक चिंतन से जीते तो हम कुछ और ढंग से सोचते हैं। क्योंकि जब भगवान की मूर्ति आदमी बनाता है तो रक्षा भी आदमी को ही करनी पड़ेगी। हां उस भगवान की रक्षा की हमें कोई जरूरत नहीं जिसको हमने नहीं बनाया। वो अपनी

2:15 रक्षा करेगा। लेकिन जिस भगवान को हमने बनाया बनाएंगे हम और रक्षा भगवान करेगा। नहीं यह वैज्ञानिक चिंतन ना हुआ। इसमें बुनियादी भूल हो गई। इस भूल का हमने परिणाम भोगा। 1000 साल हम गुलाम थे। इस भूल के कारण हमारी पिछली 1000 वर्ष की दुख की, दरिद्र की, दीनता की, दुर्भाग्य की, हार की, पराजय की कथा, हमारे अवैज्ञानिक होने की कथा है। लोग हमें यही समझाते हैं कि फूट की वजह से हम हार गए। फूट की वजह से हम नहीं हारे। फूट सारी दुनिया में है। ऐसा कोई मुल्क नहीं है जिसमें फूट ना हो। ऐसी जमीन पर कोई कौन नहीं है जिसमें फूट ना हो। सब तरफ फूट है। लेकिन हम ही क्यों हारते चले गए? कुछ कारण थे। हमारी

3:01 वैज्ञानिक सूझ में बहुत कमी। इधर हिंदुस्तान सिकंदर आया। तो पौरुस उस सिकंदर से कमजोर आदमी ना था। और अगर दोनों मैदान में लड़ते तो सिकंदर के जीतने के कोई उपाय ना थे। पौरुष सिकंदर से बहुत मजबूत बहुत हिम्मत का आदमी था। सिकंदर ने भी स्वीकार किया है कि किसी आदमी से लड़ने में मजा आया तो पौरुस से मजा आया। लेकिन पौरुष के पास वैज्ञानिक बुद्धि ना थी। सिकंदर घोड़ों पर चढ़ के आया और पौरुष हाथियों पर चढ़ के लड़ने गए। अब हाथियों पे बारात वगैरह ठीक होती। बारात जा रही हो तो हाथी बड़ा अच्छा योग्य जानवर है। लेकिन युद्ध के मैदान पर हाथी बहुत महंगा है और बहुत खतरनाक है। ना तो उसकी चाल उतनी तेज है जितनी घोड़े की। वो

3:48 जगह भी ज्यादा घेरता है। जहां एक हाथी खड़ा हो वहां 10 घोड़े खड़े हो जाएंगे। वो जगह ज्यादा घेरता है। एक हाथी पर 10 घोड़े हमला कर सकते हैं। घोड़े गतिमान है, तेज हैं, चंचल है, जल्दी भागते हैं, जल्दी बसते हैं। हाथी के पास वो क्षमता नहीं है। वो बहुत शानदार शाही जानवर है। वो धीरे चलता है, आहिस्ता चलता है, बारात के लिए बिल्कुल ठीक है। युद्ध के लिए बिल्कुल ठीक नहीं। पौरुस हाथियों पर लड़ने गया। और पौरुस की हार सिकंदर से कम हुई। अपने हाथियों से ज्यादा हुई। सिकंदर ने भी अपने मित्रों को यह कहा कि पोरुस की हार उसके हाथियों के कारण हुई। लेकिन बिल्कुल अवैज्ञानिक चिंतन है। बाबर हिंदुस्तान आया तो वो तो बंदूक ले आया था। हम तलवारें लेकर लड़ने गए थे। अब बंदूक के सामने तलवार नहीं जीत सकती। कितना ही बहादुर

4:36 आदमी पीछे खड़ा हो कुछ फर्क नहीं पड़ता। कितनी ही मजबूत मसल का आदमी हो क्या करेगा? तलवार क्या करेगी? गोली के सामने तलवार कुछ भी नहीं कर सकती। गोली बहुत वैज्ञानिक है। बड़ी विज्ञान तो उसमें यह है कि बहुत दूर से हमला कर सकती है। तलवार के लिए बहुत करीब होना चाहिए। तब हमला हो सकता है। गोली दूर से हमला कर सकती है। एक कमजोर आदमी डरपोक आदमी गोली से जीत जाएगा। बहादुर हिम्मतवर आदमी से जो तलवार लिए क्योंकि गोली फासले से हमला करती है। डिस्टेंस से हमला करती है। 50 फीट से भी दूर से हमला कर सकती है। तलवार के लिए तो 50 फीट की दूरी बेईमानी है। कुछ भी नहीं कर सकती। हिंदुस्तान हारा। तलवारों से लड़ा। फिर अंग्रेज आए लेकिन हम सीखते नहीं भूलों से। हम अपनी पुरानी भूलों के लिए ऐसे पक्के नियम बांधे हुए हैं कि हम उनको दोहराए चले जाते। अंग्रेज हिंदुस्तान में

5:23 आए तो वो तोपे ले आए थे। हम बंदूकों से लड़ रहे थे। फिर वही भूल हो गई। वो भूल निरंतर वही होती रही। आज भी अभी भी चीन के साथ जो हमारा उपद्रव हुआ उसमें वही भूल हुई। हमारे पास कम विकसित साधन है। आज चीन के पास दुनिया में चौथे नंबर के विकसित साधन है। चीन से हम जीत नहीं सकते। हां कविताएं हम कितनी करें? कविताओं से कुछ भी ना होगा। हिंदुस्तान पूरा का पूरा कवि हो गया था। पता है जब चीन से हमला हुआ तो गांव-गांव में कवि कहने लगे कि हम सोए हुए सिंह हैं। हमको छेड़ो मत। मैं तो बहुत हैरान हुआ। मैं इसलिए हैरान हुआ कि अब तक किसी सिंह ने कभी कविता नहीं की [हंसी]

6:09 और सिंह को छेड़ो तो पता चल जाता है कि क्या होता है। तो कुछ कहने की जरूरत नहीं होती। सारे हिंदुस्तान में कभी कविताएं करने लगे। रंगमंचों पर नाटक होने लगे। जैसे कि रंगमंचों के नाटकों कविताओं से कोई युद्ध जीते जाने वाले। और फिर हम हार गए और लाखों मील की जमीन चीन ने कब्जा कर ली। जिन्होंने कविताएं की थी उनमें से कोई पद्मश्री हो गए, कोई कुछ हो गए, कोई कुछ हो गए। अभी मैं गांव-गांव पूछता हूं कि वह पद्मश्री कहां है? जिन्होंने कहा था कि हम सीए हैं। हमें छेड़ो मत। वो जमीन का क्या होगा? दिल्ली में एक बड़े नेता से मैं कह रहा था। उन्होंने कहा वो जमीन बिल्कुल बेकार है। उसमें घास भी पैदा नहीं हो रहा। तो मैंने कहा अगर ऐसा ही था तो पहले से चुपचाप दे देनी थी। फिर झंझट क्यों करनी?

6:55 इतने आदमी क्यों मरवाए? और नहा कितनी कविता किस लिए की? पहले ही कहते थे कि जमीन बेकार है, संभालो। जब हार गए, तो कहते हो, "जमीन बेकार है। लड़े क्यों थे उस पर अगर जमीन बेकार थी।" तो फिर तुम जिम्मेदार हो हजारों लोगों के खून का। जिनको तुमने मरवाया वहां। जिनको तुमने मरवाया उनका जिम्मा किसका है? फिर अगर तुम कहते हो जमीन बेकार है, तो वहां लड़वाया क्यों अपने जवानों को, वहां जाके उनकी जान क्यों मरवाई? वहां उनको क्यों कटवाया? उन्हें नहीं कटवाना था, फिर चुपचाप पीछे हटाना था। और मैंने कहा और पता लगा लो कि मुल्क में जमीन कहां-कहां बेकार वो सबको सौंप दो नहीं किसी दिन झंझट हो जाए। हम कविताएं करते हैं। हम कल्पनाएं करते हैं। लेकिन कल्पनाएं और कविताएं जीवन के

7:40 यथार्थ के संघर्ष में टिक नहीं सकती। वैज्ञानिक होने का अर्थ है जीवन के यथार्थ की पकड़। वो जो ऑथेंटिक रियलिटी है उसकी पकड़। जीवन के तथ्य की पकड़। जीवन की तथ्य की पकड़ हमारी बहुत कम रही। इसलिए हम बहुत दुर्दिन देखें। आने वाले भविष्य में जीवन के तथ्य को ठीक से पकड़ना जरूरी है। एक बात अंधविश्वास से नहीं वैज्ञानिक विचार से जीवन के तथ्य को पकड़ना होगा। अब जैसे आज हमारी संख्या बढ़ी चली जाती है। तो हम वही बातें कर रहे हैं जो हम हमें नहीं करनी चाहिए। हम कहते हैं बच्चे तो भगवान दे रहा है। अब ये ये तथ्य का पकड़ना ना हुआ। अगर बच्चे भगवान दे रहा है तो रूस के

8:26 साथ अलग नियम का उपयोग करता है। हमारे साथ अलग नियम का फ्रांस के साथ अलग नियम का हमारे साथ अलग नियम का। फ्रांस की 20 साल से जनसंख्या नहीं बढ़ी। तो भगवान भी बड़ा अद्भुत है कि यही यहीं बच्चे दिए चला जाता है। इधर हमसे नाराजगी क्या है उससे? यानी हमसे ज्यादा पूजा नहीं करता। हमसे ज्यादा कोई प्रार्थना नहीं करता। हम भजन कीर्तन नहीं अखंड चल रहे हैं। चाहे किसी की नींद हो पाए, चाहे ना हो पाए। रातरात भर चल रहे हैं। फिर भी फिर भी नाराज है कुछ हमसे। लेकिन हम यही कहे चले जाते हैं कि बच्चे तो भगवान देता है। हम क्या कर सकते हैं? नहीं बच्चे भगवान नहीं देता। बच्चे हम ही पैदा करते हैं। और हम चाहे तो बच्चे रोक सकते हैं। ये तो जीवन के तथ्य को पहचानना होगा। और अगर आज हम बच्चे नहीं रोकते तो हम 10 साल में उस जगह पहुंच जाएंगे जिस

9:12 जिस हालत में हम कभी भी नहीं पहुंचे थे। अभी पश्चिम के सारे वैज्ञानिक विचारक इस चिंता में पड़ गए हैं कि 10 साल या 15 साल के भीतर हिंदुस्तान में इतना बड़ा अकाल पड़ेगा जिसमें 10 करोड़ लोग भी मर सकते हैं। लेकिन हिंदुस्तान में किसी को फिक्र नहीं है। मैं बहुत हैरान हूं। वो कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में सेमिनार करते हैं कि हिंदुस्तान में 15 साल के बीच जो अकाल पड़ेगा उसमें कितने लोगों के मरने की संभावना है। लेकिन हिंदुस्तान में हमें कोई फिक्र नहीं है। हम सोचते भी नहीं। हम कहते 15 साल 15 साल बहुत लंबा बहुत अभी हमको 15 साल जब आएगा तब देखेंगे जब आग लग जाएगी घर में हम कुआं खोद लेंगे इतनी जल्दी कुआं खोदने की जरूरत क्या है 15 साल में हम इतनी संख्या पैदा कर लेंगे कि हमारा जीना बहुत मुश्किल हो जाए 1947 में

9:59 पाकिस्तान अलग हुआ था 20 साल में जितने पाकिस्तान में लोग गए थे उससे ज्यादा हमने पैदा कर लिया एक पाकिस्तान हमने पैदा कर लिया हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता कितना ही पाकिस्तान बनाओ हम फिर पैदा कर लेंगे इतनी बड़ी संख्या का बोझ, इतनी बड़ी संख्या का बोझ हमें जिंदगी को ठीक से जीने में समर्थ नहीं बना सकता। हम रोज दरिद्र होते चले जाएंगे। हम रोज दरिद्र हो रहे हैं। लेकिन तथ्य की हमारी पकड़ नहीं है। हम कहते हैं हम पुरानी बातें कहे चले जाते हैं कि दानेदाने पर लिखा है खाने वाले का नाम। बड़ी मजे की बात है। तो हम अभी अभी भी यह कहे चले जा रहे हैं। पर दाना भी तो होना चाहिए तब तो उस पर नाम होगा। दाना ही नहीं होगा तो नाम कैसे होगा?

10:46 दाना भी पैदा करना जरूरी है। आज अमेरिका में चार किसान जो मेहनत करते हैं उसमें एक किसान की मेहनत का हम भोजन कर रहे हैं। ये कब तक चलेगा? अमेरिका पे बोझ भारी हो गया है। और अमेरिका की जनता अमेरिका पे दबाव डालती है कि अब ज्यादा नहीं। क्योंकि क्या मतलब है देने का? कोई मतलब नहीं है देने का। आज हम मजे से जी रहे हैं एक अर्थ में। चुपचाप खाने पीने को मिल जाता है तो हमें कोई फ़िक्र नहीं। लेकिन हमारे लिए मेहनत अमेरिका का किसान कर रहा है। कनाडा का किसान हमारे लिए मेहनत कर रहा है। दवा हमारे लिए कोई भेज रहा है। खाना कोई भेज रहा है। कपड़े के लिए कोई फ़िक्र कर रहा है। ये कितनी देर चल सकता है। दुनिया के ऊपर निर्भर होके हम कितनी देर समर्थ हो सकते हैं। और अगर ये दीनता हमारी बढ़ती चली जाती है और हम तथ्यों को नहीं पकड़ते।

11:34 तो हमारे अतिरिक्त और कोई जिम्मेदार नहीं होगा। तो मैं यह कह रहा हूं कि हम तथ्य को पकड़े। अब तथ्य यह है कि संख्या जरा भी आगे नहीं बढ़नी चाहिए। तो हम शायद कोई उपाय कर सकें कि मुल्क को किसी तरह बचाया जा सके। अन्यथा अगर 10 करोड़ लोग मरे अकाल में तो जो बचेंगे जिंदा उनकी हालत भी जिंदा जैसी नहीं रह जाएगी। अगर एक गांव में 500 की बस्ती में 5000 10000 आदमी एकदम से मरने की हालत में पहुंच जाए तो बाकी लोग भी अधमरी हालत में हो जाएंगे। उनकी उनकी जिंदगी भी ठीक अर्थ में जिंदगी नहीं रह जाएगी। आज वैसी हालत है। लेकिन हम तथ्य पर सोचने के आदि नहीं है। हम कहते हैं जिसने पैदा किया है वो फिक्र करेगा।

12:20 हम कहते हैं कि जब उसने हमें मुंह दिया है तो वो हमको रोटी भी देगा। जिसने चोंच दी है वह चुून भी देता है। यह हमारी ख्याल है। इस तरह नहीं चल सकता है। जिंदगी के और सारे पहलुओं पर सोचने पर ख्याल में आएगा इस तरह नहीं चल सकता है। आज भी हम ज्योतिषी के पास जाकर अपना हाथ दिखला रहे हैं कि हमारी उम्र कितनी है। जबकि सारी दुनिया उम्र बढ़ाए चली जा रही है। रूस में 1917 में उम्र थी 23 वर्ष। औसत उम्र आज रूस की रूस की औसत उम्र है 68 वर्ष। प्रतिवर्ष एक वर्ष औसत उम्र बढ़ी। आज स्वीडन और स्विट्जरलैंड की औसत उम्र है 78 वर्ष। बेल्जियम जैसे मुल्कों की उम्र औसत उम्र है 82 वर्ष। वो अपनी उम्र बढ़ाए चले

13:07 जा रहे हैं। सोचे थोड़ा हमारी उम्र है 29 वर्ष। औसत उम्र। 29 वर्ष जब हमारी औसत उम्र है तब हमारे यहां 70 80 साल का बूढ़ा बहुत आसानी से मिल जाता है। जिनकी उम्र 80 साल औसत उम्र है उनके यहां अगर 200 साल का बूढ़ा मिलने लगे तो कोई कठिनाई है? कोई कठिनाई नहीं। आज रूस में 150 वर्ष के ऊपर हजारों लोगों की संख्या में उम्र के लोग हैं। जब 150 वर्ष की उम्र तक कोई बूढ़ा आदमी जीता है तो जवानी का स्पैन बढ़ जाता है। क्षेत्र बढ़ जाता है। वो 100 वर्ष तक जवान होता है। अभी बटन असल में 92 वर्ष की उम्र में शादी की तो हम बहुत हैरान हुए कि 92 वर्ष का बुड्ढा शादी करता है। हम गलती में हैं। असल में 92 वर्ष का बुड्ढा ही नहीं है। वो हम 92 वर्ष हमारे ख्याल से हमारे ख्याल से तो मरा हुआ आदमी शादी कर रहा है। 92 वर्ष का बुड्ढा भी कहां होता

13:53 है हमारे पास? हमारे हिसाब से तो पोस्टमस मैरिज है यह। आदमी मर चुका होगा। अब कहां शादी कर रहा है? मर जाना था 70 साल में। 22 साल हो चुके मरे हुए। अब शादी कर रहा है। नहीं लेकिन बट्टन रसल 92 वर्ष में भी स्वस्थ है, ताज़ा है, प्रसन्न है, आनंदित है, शादी कर सकता है। सारी दुनिया उम्र बढ़ाए चली जाती है। और हम कहते उम्र तो भाग्य में लिखी है। और सारी दुनिया को हम नहीं देखते कि उम्र बढ़ती चली जा रही है। भाग्य में कैसी लिखी? सिर्फ हमारे भाग्य में लिखी और किसी के भाग्य में नहीं लिखी। सारी दुनिया में आदमी का स्वास्थ्य अच्छा हुआ है, उम्र बढ़ी है, मस्तिष्क अच्छा हुआ है, बुद्धि बढ़ी है, प्रतिभा बढ़ी है। लेकिन हम भाग्य को मानकर बैठे हुए। हम कहते हैं भाग्य में जो लिखा है वो हो रहा

14:38 है। ये तथ्य को छोड़ना है और कल्पनाओं में जीना है। हमने बहुत मुसीबत में ये कल्पनाएं घड़ी थी। अब हमें छोड़ देनी चाहिए। असल में बहुत तकलीफ में एक ही सहारा था हमारे पास कि हम यह कहते कि यह तकलीफ हमारा भाग्य है। इस भांति सहने में सुविधा हो जाती थी। बहुत मुसीबत हो तो यह कह के कि हमारा भाग्य सहने में सुविधा मिल जाती है। संतोष करने में रास्ता बन जाता है। कंसोलेशन के लिए सांत्वना के लिए व्यवस्था हो जाती है। हमने हजारों वर्ष की दुख और परेशानी में भाग्य की धारणा विकसित की और हमने कहा सब भाग्य जैसा है वैसा होता है। जब ये मान लिया कि जैसा है वैसा होता है। तो फिर हमारे भीतर पीड़ा मिटाना बदलना सब समाप्त हो गया। हम चुपचाप राजी

15:25 हो गए। जिंदगी के लिए परिवर्तन की और क्रांति की संभावना विदा हो गई। तो मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि जीवन के चारों तरफ जगत में जो हो रहा है उसे देखकर तथ्यों को पहचान कर हमें अपने अब तक के डायरेक्टिव्स अब तक के जो मार्गदर्शक सूत्र थे भारत के वो बदल देने पड़ेंगे। हमें कहना पड़ेगा उम्र भाग्य से तय नहीं होती और संख्या भी परमात्मा निर्णित नहीं करता है। संख्या भी हम निर्णित करते हैं और उम्र भी हम निर्णित कर सकते हैं और जितना मनुष्य विकसित हो रहा है निर्णय अधिकतम उसके अपने हाथ में आता चला जा रहा है। वो बहुत सी चीजें निर्णय कर रहा है। आज रूस में कोई जरूरत नहीं है कि वो किसी खेत पर पानी ना गिरे

16:12 तो भगवान की तरफ प्रतीक्षा करनी पड़े और अच्छा है। मैं कहता हूं भगवान को जितनी ज्यादा फुर्सत हम दें उतना ही हम भगवान के प्रेमी हैं। छोटे-छोटे काम में उसको खींचना अभद्रता है। आपके खेत में पानी नहीं गिरा। आप बैठे हैं हाथ जोड़े कि भगवान इसमें पानी गिराओ। अब भगवान आपके खेत में पानी गिराएं। और भी कुछ काम है उनके पास कि बस आपके खेत में पानी गिराना कोई बहुत बड़ी घटना है? नहीं। सारी दुनिया का आदमी कहता है हम अपने हाथ में ले लेते हैं। जो हम कर सकते हैं वो हम करते हैं। आज रूस में जहां उन्हें पानी गिराना है वहां वे पानी गिरा लेते। जहां पानी नहीं गिराना है वहां नहीं गिराते। क्योंकि बादल से पानी गिराने का सूत्र समझ में आ गया। बहुत कठिन नहीं है मामला। बादल किस तरफ जाता है वह भी उसे ले जाया जा

16:57 सकता है। आखिर बादल को भी तो लगाम बांधी जा सकती है। वह भी इस गांव के ऊपर से गुजरे यह व्यवस्था की जा सकती है। हवाएं उसे किस भांति यहां से ले जा सकती हैं वह जाना जा सकता है। और फिर बादल ठंडा किया जा सके। ऊपर हवाई जहाज तो बर्फ फेंका जा सके तो उसका भरा हुआ पानी नीचे छलक जाता है। तो उन्होंने तो अब पानी बरसाने की व्यवस्था कर ली। लेकिन हम हम आज इस 20वीं सदी में भी अगर पानी ना गिरे तो यज्ञ कर रहे हैं। हम यज्ञ करेंगे अगर पानी ना गिरे तो और मजा ये है कि हम हजारों साल से यज्ञ कर रहे हैं। फिर भी हमने अब तक ये नहीं सीखा कि यज्ञ इतना करने पर भी पानी नहीं गिरा है। लेकिन हम उसे दोहराए चले जाएंगे। फिर मैं ये नहीं कहता हूं। मैं ये कहता हूं कि यज्ञ भी जिन्हें करना हो वो भी प्रयोगशाला में सिद्ध करके दिखा दें कि हम

17:43 ये यज्ञ किया ये बदली से पानी गिरा दिया। वो प्रयोगशाला में सिद्ध कर ले तो सारी दुनिया के काम की हो जाएगी बात सारी दुनिया यज्ञ कर लेगी लेकिन हम वो भी सिद्ध करके क्या बताएंगे हमारा चेहरा कुछ भी सिद्ध करने का नहीं रह गया हमारा चेहरा हमारी असफलता की गवाहियां दे रहा है हम सारी दुनिया में आज अपनी असफलता की कहानी बनकर खड़े हो गए जीवन को वैज्ञानिक बनाना हो तो उसके सारे नियमों पर पुनर्विचार की जरूरत है ये एक और दूसरी बात फिर दोहरा दूं अंत में वो ये कि इसका ये मतलब नहीं है कि विज्ञान सब कुछ है। इसका यह मतलब नहीं है कि विज्ञान हमने सीख लिया तो सब सीख लिया कि खेत पर हमने पानी गिरा लिया तो सब आ गया। इसका यह मतलब भी नहीं है कि हमने बीमारियां ठीक कर ली तो हम जिंदगी के

18:29 सब सूत्र पा गए। इसका यह मतलब भी नहीं है कि हमने आदमी की उम्र बढ़ा ली तो हमने आदमी का आनंद भी बढ़ा दिया। इसका यह मतलब नहीं है। पश्चिम ने उम्र भी बढ़ा ली, स्वास्थ्य भी बढ़ा लिया, बीमारियां भी कम कर ली। कुछ बीमारियां तो इतिहास की घटना हो गई। बच्चों को पता ही नहीं कि ये बीमारियां कभी होती थी। जिंदगी ज्यादा व्यवस्थित हो गई लेकिन ज्यादा आनंदित नहीं हो गई। ज्यादा दुखी हो गई। ये बहुत चमत्कार की घटना घटी है पश्चिम में। सारी सुविधा बढ़ गई है। समृद्धि बढ़ गई। स्वास्थ्य बढ़ गया लेकिन शांति कम हो गई। शांति एकदम खो गई है। शांति का कोई पता ही नहीं रहा। आदमी 150 साल जीने लगा है। लेकिन कैसे जिए ये भूल गया। ज्यादा जीने से क्या होगा? आखिर कैसे जिए ये भी तो पता होना चाहिए। नहीं तो 150 साल की उम्र भी

19:17 दंड हो जाएगी। आनंद रह जाएगी। हजार साल आदमी जिए और कष्ट में, दुख में, चिंता में, पीड़ा में तो एक तरफ पश्चिम में उम्र बढ़ी, दूसरी तरफ आत्महत्या बढ़ गई। अभी बड़े मजे की बात है। एक तरफ वैज्ञानिक कोशिश में लगा है उम्र बढ़ाने की और दूसरी तरफ आदमी है। कहते हैं कि हमें जिंदा नहीं रहना। हमें मरना है। आत्महत्या बढ़ती जा रही है। हर सेकंड एक आत्महत्या यूरोप में हो रही है। एक घंटा मैं बोलूंगा यहां तो कितनी आत्महत्या हो जाएंगी। हर सेकंड एक हो रही। एक मिनट में 60 लोग सारे पश्चिम में आत्महत्या कर लेंगे। एक घंटे में 60 गुण 60 इतने लोग अपने को समाप्त कर लेंगे। 24 घंटे इसी क्रम से आत्महत्या चल रही है। इतना जीवन दुखी हो जाए तो भी सोचना जरूरी है। तो मेरा मानना है पश्चिम भी अधूरा है।

20:03 इसलिए मैं आपसे कहता हूं वैज्ञानिक बुद्धि लानी है और वैज्ञानिक बुद्धि के आधार पर धार्मिक चिंतन को खड़ा करना है। धार्मिक चिंतन से मुक्त नहीं हो जाना है। विज्ञान के आधार पर धर्म का चिंतन खड़ा करना है। धर्म का चिंतन बहुत भिन्न बात है। धर्म को ना तो मतलब है आपकी उम्र से। ना धर्म को मतलब है आपके खेत में पानी से ना धर्म को मतलब है आपके मकान से ना आपके कपड़े से धर्म को तो सीधा मतलब है आपसे आप कैसे हैं भीतर आनंदित शांत प्रफुल्लित परमात्मा के प्रति कृतज्ञता से भरे हुए धन्यवाद से भरे हुए प्रार्थना से भरे हुए प्रेम से भरे हुए आप कैसे हैं विज्ञान आपको छोड़ के सब व्यवस्था कर लेगा और आप छूट जाएंगे लेकिन

20:51 धर्म आपकी भी व्यवस्था करना चाहता है भीतर से कि आप भी विकसित हो सके। एक छोटी सी कहानी अपनी बात मैं पूरी करूंगा। मैंने सुना है कि राम जब रामतीर्थ जब जापान गए तो टोक्यो के एक बड़े मकान में आग लग गई थी। वो उस मकान के सामने ठहरे हुए थे। मकान में आग लग गई है। रात को हजारों लोग मकान की आग बुझाते हैं। राम बाहर आकर खड़े होकर देख रहे हैं। मकान का मालिक रो रहा है। छाती पीट रहा है। लोग सामान निकाल रहे हैं। बाहर तिजोरियां, कपड़े, बहुमूल्य, फर्नीचर वो सब निकाला जा रहा है। सब सामान निकल गया है। फिर उन लोगों ने आके मकान के मालिक को पूछा कुछ और जरूरी रह गया हो तो बता दें। क्योंकि अब आखिरी बार मकान के भीतर जाया जा सकता है। उसके बाद लपटें इतनी बढ़ जाएंगी कि भीतर जाना असंभव है।

21:37 उस मकान के मालिक ने कहा मुझे कुछ भी होश नहीं है। मुझे कुछ समझ में नहीं आता। तुम एक दफा और जाके देख लो। कुछ बचा सको तो बचा लो। वे लोग भीतर गए। भीतर जाके वे बहुत मुश्किल में पड़ गए। मकान मालिक का इकलौता बेटा भीतर ही सोता रह गया था। वे उसकी लाश को ले बाहर आए। वो तो मर चुका था। वे बाहर चिल्लाते रोते छाती पीटते आए और उन्होंने मकान मालिक को कहा कि हमसे बड़ी भूल हो गई। हम तो मकान का सामान बचाने में लग गए और मकान का मालिक भूल गए। वो मर ही गया है। रामतीर्थ ने अपनी डायरी में लिखा कि आज इस मकान में जो घटना घटी है उसे देखकर मुझे ख्याल आता है कि सारी दुनिया में यह घटना घट रही है। आदमी सामान को बचाने में लग गया है और आदमी खुद मालिक सामान का भीतर

22:24 मरा जा रहा है। समाप्त हुआ जा रहा है। विज्ञान सामान को बचा सकता है। आदमी को नहीं। विज्ञान बाहर की सारी व्यवस्था को बचा लेगा। आत्मा को नहीं। इसलिए दूसरी बात निरंतर ध्यान में रखनी जरूरी है कि वैज्ञानिक बुद्धि अधार्मिक बुद्धि ना हो जाए। वैज्ञानिक बुद्धि धार्मिक बुद्धि हो। वैज्ञानिक बुद्धि धर्म के विपरीत ना चली जाए। वैज्ञानिक बुद्धि बाहर की व्यवस्था करें और धर्म को मनुष्य के भीतर की व्यवस्था करने दे। और धर्म भी एक विज्ञान ही है। धर्म परम विज्ञान है। धर्म है चेतना का विज्ञान। बाहर जो है उसकी खोज साइंस है। भीतर जो है उसकी खोज धर्म है। और मनुष्य दोनों तरफ फैला है। बाहर भीतर

23:10 भी। इन दो में से हम एक को काटेंगे तो मनुष्य मर जाएगा। पूर्व ने बाहर को काटा, पश्चिम ने भीतर को काटा। आने वाले भविष्य में भारत के युवकों को ध्यान रखना है कि हम दोनों के समन्वय को उपलब्ध हो सके। अगर यह समन्वय हो सका तो भारत के जीवन में सुख भी और आनंद भी सुख मिलता है बाहर से आनंद मिलता है भीतर से अगर यह संभव हो सका समन्वय तो शक्ति भी और शांति भी शक्ति मिलती है बाहर से और शांति मिलती है भीतर से संभव हो सकती है परमात्मा करे यह संभव हो सके मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुना उससे बहुत अनुग्रहित हूं और अंत में सबके भीतर बैठे प्रभु को प्रणाम करता हूं मेरे प्रणाम स्वीकार

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