जब DM मैडम को आम लड़की समझ कर इंस्पेक्टर नें थप्पड़ मारा और फिर इंस्पेक्टर के साथ जों हुवा...

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संक्षिप्त सारांश

यह कहानी माघमा देवी नाम की एक गरीब महिला और उसकी दो बेटियों की है, जो उच्च पदों पर आसीन हैं। एक दिन, एक भ्रष्ट इंस्पेक्टर उसकी अमरूद की टोकरी फेंक देता है। जब बेटियों को इस बारे में पता चलता है, तो वे अपनी माँ को न्याय दिलाने का फैसला करती हैं। छोटी बेटी, जो एक डीएम है, कानून के दायरे में रहकर अपनी माँ को इंसाफ दिलाती है और भ्रष्ट इंस्पेक्टर और नेता को गिरफ्तार करवाती है।

मुख्य बातें:

  • एक माँ का अपमान उसकी बेटियों को न्याय के लिए प्रेरित करता है।
  • कानून का सही इस्तेमाल करके शक्तिशाली लोगों को भी हराया जा सकता है।
  • परिवार का प्यार और समर्थन सबसे बड़ी ताकत है।

बाजार में अमरूद बेचने वाली माघमा देवी

माघमा देवी नाम की एक महिला बाजार में अमरूद बेचती है। उनकी दो बेटियां हैं: नंदिनी सिंह, जो फौज में अफसर है, और सावित्री सिंह, जो उसी शहर की डीएम है। माघमा देवी को अपनी बेटियों पर गर्व है, लेकिन वह अपनी बेटियों को बताए बिना बाजार में अमरूद बेचती रहती है।

इंस्पेक्टर अरुण चौधरी का दुर्व्यवहार

इंस्पेक्टर अरुण चौधरी माघमा देवी से बदतमीजी करता है और उसकी अमरूद की टोकरी सड़क पर फेंक देता है। एक लड़का, रोहित, यह सब रिकॉर्ड कर लेता है और वीडियो नंदिनी सिंह को भेज देता है।

नंदिनी और सावित्री का गुस्सा

नंदिनी वीडियो देखकर गुस्से में आ जाती है और अपनी बहन सावित्री को भेजती है। सावित्री भी गुस्से में है, लेकिन वह कानून के तरीके से अपनी माँ को इंसाफ दिलाने का फैसला करती है।

सावित्री का बदला

सावित्री एक साधारण सलवार सूट पहनकर थाने जाती है और इंस्पेक्टर अरुण चौधरी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की कोशिश करती है, लेकिन उसे अपमानित किया जाता है। तभी एक दबंग नेता, गंगा प्रसाद यादव, थाने आता है और सावित्री को पहचान लेता है।

गंगा प्रसाद यादव की पोल खुलती है

सावित्री के इशारे पर, जिले के बड़े अधिकारी थाने पहुंचते हैं और इंस्पेक्टर अरुण चौधरी और एसएचओ संदीप राणा को सस्पेंड कर दिया जाता है। गंगा प्रसाद यादव को भी गिरफ्तार करने का आदेश दिया जाता है।

गंगा प्रसाद यादव का पलटवार

गंगा प्रसाद यादव जेल से छूट जाता है और माघमा देवी को नशीले पदार्थों के आरोप में फंसा देता है। सावित्री अपनी माँ को बचाने के लिए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाती है और जांच से खुद को अलग कर लेती है।

रोहित की मदद

सावित्री रोहित की मदद से सीसीटीवी फुटेज हासिल करती है और पता लगाती है कि गंगा प्रसाद यादव ने ही माघमा देवी को फंसाया था।

गंगा प्रसाद यादव की गिरफ्तारी

सावित्री एक जाल बिछाती है और गंगा प्रसाद यादव, अरुण चौधरी और संदीप राणा को गिरफ्तार करवाती है। माघमा देवी को बाइ्जत बरी कर दिया जाता है।

खुशी का अंत

सावित्री अपनी माँ को अपने साथ ले जाती है और दोनों खुशी से रहने लगती हैं। जब नंदिनी छुट्टी पर आती है, तो तीनों साथ में हंसी-खुशी रहते हैं।

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Transcript

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0:00 बाजार में एक रोड पर मागमा देवी रोज की तरह अपनी छोटी सी टोकरी लेकर मीठे पके हुए अमरूद बेच रही थी। उनकी दो बेटियां थी। दोनों ही हीरे की तरह पली बड़ी थी। बड़ी बेटी नंदिनी सिंह देश की सरहद पर फौज में अफसर थी। छोटी सावित्री सिंह इसी शहर की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट यानी डीएम थी। माघमा देवी को अपनी बेटियों पर बहुत नाज था। जब भी कोई पूछता अम्मा आपकी बेटियां क्या करती हैं? तो उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता। वह कहती एक देश की रक्षा करती हैं और दूसरी जिले की। लेकिन माघमा देवी आज भी कभी-कभी बाजार में अमरूद बेचने बैठ जाती पर अपनी बेटियों को कभी नहीं बताती। सब कुछ ठीक चल रहा था। तभी एक इंस्पेक्टर जिसका नाम अरुण चौधरी था अपनी बुलेट मोटरसाइकिल पर वहां आया। उसने बाइक

0:47 सड़क किनारे रोकी और सीधा माघमा देवी की टोकरी के पास आकर खड़ा हो गया। अरुण ने टोकरी में से एक अमरूद उठाया और बिना कुछ कहे मुंह में डाल लिया। मागमा देवी थोड़ी सकुचाई और बोली साहब अमरूद मीठे हैं। आप चाहे तो तोल दूं। अरुण चौधरी ने अकड़ते हुए जवाब दिया हां हां दे 1 किलो। मागमा देवी ने कांपते हाथों से अमरूद तोलकर पॉलिथीन में दे दिए। अरुण ने पैकेट लिया। फिर से एक अमरूद निकाला और सामने ही काट कर खाने लगा। कुछ देर तक चबाने के बाद उसने मुंह बनाते हुए कहा, "हू, "यह क्या बेचा है तूने? एकदम बेस्वाद।" अमरूद मीठा तो बिल्कुल भी नहीं है। मागमा देवी घबरा कर बोली नहीं साहब बहुत मीठे हैं। आप चाहे तो दूसरा छक्कर देख लीजिए। लेकिन अरुण

1:33 चौधरी हंसते हुए बोला चुप तेरे अमरूद का एक दाना भी मीठा नहीं। तूने मुझे बेवकूफ बनाया है। और सुन मैं एक रुपया भी नहीं दूंगा। समझी? मागमा देवी ने हिम्मत करके हाथ जोड़ते हुए कहा, साहब मेहनत से लाए हैं। कुछ तो पैसे दे दीजिए बस। यही सुनते ही अरुण चौधरी का पारा चढ़ गया। उसने गुस्से में झुककर पूरी टोकरी उठाई और सड़क की दूसरी तरफ जोर से फेंक दी। टोकरी पलट गई और सारे अमरूद सड़क गाड़ियों और नाली में बिखर गए। माघमा देवी हक्कीबक्की रह गई। उनकी आंखों में आंसू भर आए होठ कांपने लगे। उनकी मेहनत और इज्जत दोनों ही सड़क पर कुचली जा रही थी। आसपास भीड़ जमा हो गई थी। लोग तमाशा देख रहे थे। कानाफूसी कर रहे थे। लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हुई कि उस वर्दी वाले से कुछ कहे। फिर अरुण चौधरी

2:20 ने अपनी मूछों पर ताव दिया। बाइक स्टार्ट की और वहां से ऐसे चला गया जैसे कुछ हुआ ही ना हो। भीड़ में से किसी ने माघमा देवी की मदद नहीं की। लेकिन पास के ही एक घर की छत पर खड़ा एक नौजवान लड़का रोहित यह सब कुछ अपने मोबाइल फोन में रिकॉर्ड कर रहा था। उसका खून खौल रहा था। वह माघमां अम्मा को बचपन से जानता था और उनका बहुत सम्मान करता था। उसने वीडियो रिकॉर्ड करना बंद किया और सोचने लगा कि इस वीडियो का क्या किया जाए। उसे पता था कि मागमा अम्मा की एक बेटी फौज में है। उसने कहीं से उनका नंबर जुगाड़ किया था। उसने तुरंत वह वीडियो नंदिनी सिंह के WhatsApp पर भेज दिया और नीचे एक छोटा सा मैसेज लिखा। नंदनी दीदी। देखिए आज बाजार में आपकी मां

3:06 के साथ क्या हुआ। हजारों किलोमीटर दूर बर्फीली पहाड़ियों के बीच बॉर्डर की एक चौकी पर नंदिनी सिंह अपनी राइफल साफ कर रही थी। तभी उसके फोन पर WhatsApp का मैसेज टोन बजा। उसने फोन उठाकर देखा। एक अनजान नंबर से वीडियो आया था। उसने वीडियो प्ले किया। जैसे-जैसे वीडियो आगे बढ़ा, नंदिनी के चेहरे का रंग बदलता गया। उसकी शांत आंखें गुस्से से लाल हो गई। जब उसने इंस्पेक्टर अरुण चौधरी को अपनी मां की टोकरी उठाकर फेंकते देखा तो उसके हाथ कांपने लगे। उसकी मां जिसने उसे और उसकी बहन को पालने के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी। आज सड़क पर बेबस रो रही थी और लोग तमाशा देख रहे थे। उसके अंदर का फौजी जाग उठा। उसका मन किया कि अभी यहां से जाए और उस इंस्पेक्टर की वर्दी नोच ले। उसने अपने

3:52 दांत भीच लिए। उसकी सांसे तेज हो गई थी। उसने तुरंत वह वीडियो अपनी छोटी बहन डीएम सावित्री सिंह को फॉरवर्ड किया। वीडियो भेजते ही उसने सावित्री को फोन लगाया। सावित्री उस वक्त अपने ऑफिस में एक जरूरी मीटिंग में थी। उसने अपनी बड़ी बहन का फोन देखा तो मीटिंग रोक कर फोन उठाया और पूछा, हां दीदी सब ठीक है। ठीक है। कुछ भी नहीं है। बोली नंदिनी की आवाज में गुस्सा और दर्द साफ झलक रहा था। मैंने तुझे एक वीडियो भेजा है। उसे देख अभी के अभी देख। सावित्री ने फोन होल्ड पर रखा और WhatsApp खोला। वीडियो देखते ही उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। उसकी मां उसकी प्यारी मां सड़क पर बिखरे अमरूद के लिए रो रही थी। एक मामूली इंस्पेक्टर ने उसकी मां की इज्जत को सड़क पर रौंद दिया था। सावित्री

4:39 की आंखों में भी आंसू आ गए लेकिन उसने खुद को संभाला। वो एक डीएम थी। उसे भावनाओं में बहने का हक नहीं था। सावित्री ने कांपती आवाज में कहा, दीदी, मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती यह सब। यह सुनते ही नंदिनी फोन पर गुस्से में बोली, "मैं आ रही हूं। छुट्टी लेकर मैं उसको नहीं छोडूंगी। सावित्री नरम आवाज में बोली, नहीं दीदी, आपकी जरूरत देश की सरहद पर है। यह मेरा इलाका है। यह लड़ाई मैं लूंगी। मां को इंसाफ मैं दिलाऊंगी कानून के तरीके से। नंदिनी कुछ देर चुप रही। वह अपनी बहन की आवाज में छिपे इरादे को समझ गई थी। बोली, ठीक है। लेकिन उसे ऐसी सजा मिलनी चाहिए कि उसकी रूह कांप जाए। सावित्री ने कहा, आप चिंता मत करो दीदी। अब यह मेरा काम है और

5:26 फोन काट दिया। उसने मीटिंग में मौजूद सभी अफसरों से कहा, "यह मीटिंग यहीं खत्म होती है। आप सब जा सकते हैं।" सावित्री अपनी सरकारी गाड़ी में नहीं बल्कि एक प्राइवेट गाड़ी में बैठकर अपने पुराने घर की तरफ निकली। रास्ते में उसने अपने डीएम वाले कपड़े बदलकर एक साधारण सा लाल रंग का सलवार सूट पहन लिया। वह अपनी मां के पास एक बेटी बनकर जाना चाहती थी। डीएम बनकर नहीं। जब वह घर पहुंची तो मग्मा देवी एक कोने में चुपचाप बैठी थी। उनकी आंखें सूझी हुई थी। अपनी बेटी को अचानक देखकर वह घबरा गई। सावित्री तू यहां सब ठीक तो है। सावित्री कुछ नहीं बोली। वह बस अपनी मां के पास गई और उन्हें कसकर गले लगा लिया। मां की गोद में सिर रखकर वह अपने आंसू नहीं रोक पाई। मां आपने मुझे बताया क्यों

6:11 नहीं? मागमा देवी ने सिसकते हुए कहा, "क्या बताती बेटी? मैं नहीं चाहती थी कि तुम लोगों को कोई परेशानी हो और वह पुलिस वाला है। छोड़ उसकी बात। आज तू इतने दिनों बाद आई है। आज मैं बहुत खुश हूं। सावित्री ने अपनी मां के आंसू पोंछे और उनका हाथ अपने हाथ में ले लिया और बोला, अब आप गरीब और अकेली नहीं है। मां। आपकी बेटी इस जिले की मालिक है। मैं वादा करती हूं जिसने भी आपके साथ ऐसे दुर्व्यवहार किया है, उसे उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। आपकी खोई हुई इज्जत मैं वापस लाऊंगी। मंदमा देवी ने अपनी बेटी की आंखों में एक अलग ही आत्मविश्वास देखा। वह बस चुपचाप उसे देखती रही। उस रात सावित्री ने एक पूरा प्लान बनाया। वह जानती थी कि अगर वह डीएम बनकर

6:56 थाने जाएगी तो सारे पुलिस वाले उसके पैरों में गिर जाएंगे और असली गुनहगार कभी सामने नहीं आएगा। उसे उन्हेंगे हाथों पकड़ना था। अगली सुबह उसने उसने पीला सलवार सूट पहना और अपने सबसे भरोसेमंद अफसर एस अ डीएम विकास को फोन किया। विकास मैं तुम्हें एक काम दे रही हूं और यह बात हम दोनों के बीच ही रहनी चाहिए। उसने कहा जी मैडम हुकुम कीजिए। बोली मैं अभी सिविल ड्रेस में शहर के कोतवाली थाने में एक पर लिखवाने जा रही हूं। अपनी पहचान छिपाकर। मैं चाहती हूं कि तुम ठीक 2 घंटे बाद जिले के एसपी, डीएसपी और बाकी बड़े पुलिस अफसरों की टीम के साथ थाने पहुंचो। जब तक मैं इशारा ना करूं कोई कुछ नहीं। बोलेगा विकास ने कहा, ठीक है मैडम जैसा आप कहें। सावित्री ने फोन रख

7:44 दिया। दोस्तों, अब खेल शुरू होने वाला था। सावित्री ने एक साधारण सा पीले रंग का सलवार सूट पहना। चेहरे पर दुपट्टा डाला और एक आम नागरिक की तरह ऑटो पकड़ कर कोतवाली थाने पहुंची। थाने का माहौल वैसा ही था जैसा उसने सोचा था। एक हवलदार ऊंघ रहा था और इंस्पेक्टर अरुण चौधरी और एसएओ संदीप राणा चाय पीते हुए हंसीज़ाक कर रहे थे। सावित्री डरते-डरते उनकी टेबल के पास गई। जी मुझे एक शिकायत दर्ज करवानी है। एसएओ संदीप राणा ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। क्या हुआ? किसने परेशान किया? जी कल बाजार में इंस्पेक्टर साहब ने। जैसे ही उसने इंस्पेक्टर का नाम लिया अरुण चौधरी चौकन्ना हो गया। उसने सावित्री को घूर कर देखा क्या इंस्पेक्टर साहब ने नाम क्या है

8:31 तेरा और किस इंस्पेक्टर की बात कर रही है? जी आप ही थे। आपने कल बाजार में एक बुजुर्ग महिला के अमरूद की टोकरी सड़क पर फेंकी थी। मैं उनकी बेटी हूं। सावित्री ने अपनी आवाज में थोड़ी घबराहट लाने की कोशिश की। यह सुनते ही अरुण और संदीप जोर-जोर से हंसने लगे। ओो तो तू उस बुढ़िया की बेटी है। अरुण ने मजाक उड़ाते हुए कहा तो क्या हुआ? सड़क पर गंदगी फैलाएगी तो लाठी पड़ेगी ना। चल भाग यहां से कोई एफआईआर नहीं लिखी जाएगी। सावित्री ने थोड़ा साहस दिखाते हुए कहा, लेकिन यह गैरकानूनी है। आपने वर्दी का गलत इस्तेमाल किया है। एसएओ संदीप गढ़जा तू हमें कानून सिखाएगी ज्यादा जुबान चलाई तो तुझे ही अंदर कर दूंगा।

9:17 सरकारी काम में बाधा डालने के जुर्म में निकल। यहां से सावित्री वहीं खड़ी रही और बोली, मैं फिर लिखवाए बिना नहीं जाऊंगी। बहस बढ़ रही थी कि तभी एक हवादार भागता हुआ अंदर आया। उसकी सांसे फूली हुई थी। सर सर गंगा प्रसाद यादव जी थाने में आ रहे हैं। गंगा प्रसाद यादव का नाम सुनते ही अरुण और संदीप दोनों के चेहरे का रंग बदल गया। गंगा प्रसाद शहर का एक बहुत बड़ा और दबंग नेता था जिसके इशारे पर पुलिस वाले नाचते थे। दोनों इंस्पेक्टर अपनी कुर्सी से ऐसे उछले जैसे करंट लग गया हो। अरे जल्दी करो गेट खोलो। संदीप ने हवलदार को डांटा और दोनों भागकर गेट की तरफ गए जैसे कोई बहुत बड़ा साहब आ रहा हो। एक सफेद सफारी गाड़ी थाने के अंदर आकर रुकी। उसमें

10:02 से सफेद कुर्ता पायजामा पहने गंगा प्रसाद यादव उतरा। अंदर आते ही उसने अपने मजाकिया अंदाज में कहा क्या? हाल है चौधरी कामधाम अच्छा। चल रहा है ना कोई मुर्गावर्गा फंसाया कि नहीं? आज अरुण और संदीप हाथ जोड़कर मुस्कुराने लगे। अरे साहब आपकी कृपा है। आइए बैठिए। लेकिन तभी गंगा प्रसाद की नजर कोने में खड़ी सावित्री स्त्री पर पड़ी। सावित्री को देखते ही उसके चेहरे की हंसी गायब हो गई। उसके माथे पर पसीना आ गया और उसके होश उड़ गए। वह जिस लड़की को एक आम लड़की समझ रहा था, उसे पहचानते ही उसकी सिट्टी पिट्टी गुम हो गई। वह तेजी से आगे बढ़ा और सावित्री के सामने जाकर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। उसका सिर

10:48 झुका हुआ था। नमस्ते मैडम आप आप यहां इस वक्त मुझे फोन कर लिया होता। मैं हाजिर हो जाता। उसकी आवाज में हकलाहट साफ थी। इंस्पेक्टर अरुण और एसएओ संदीप हैरान रह गए। उनकी आंखें फटी की फटी रह गई। यह हो क्या रहा है? यह तो उस बुढ़िया की बेटी है। गंगा। प्रसाद जी इसके सामने हाथ क्यों जोड़े खड़े? हैं जिसज गंगा प्रसाद यादव के सामने पूरा झेला झुकता है। वह इस साधारण सी दिखने वाली लड़की के सामने हाथ जोड़े क्यों खड़ा है? यह लड़की है कौन? अरुण ने धीरे से संदीप से पूछा। यह क्या हो रहा है? संदीप ने भी घबराहट में सिर हिला दिया। इससे पहले कि वे कुछ समझ पाते थाने के बाहर गाड़ियों के रुकने की आवाज आई। एक के बाद एक लाल बत्ती वाली गाड़ियां थाने

11:36 के सामने आकर रुकी। गाड़ियों से डीएसपीएस, डीएम और जिले के कई बड़े आईएएस एंड आईपीएस अफसर उतरे और तेजी से थाने के अंदर आए। वे सब आकर चुपचाप सावित्री के पीछे लाइन बनाकर खड़े हो गए। जैसे अपने सीनियर को रिपोर्ट कर रहे हो। अब थाने में सन्नाटा था। सिर्फ पंखे की घर-घर की आवाज आ रही थी। अरुण चौधरी और संदीप राणा पत्थर के बुद्ध बन चुके थे। उनके हलक सूख गए थे। माथे पर पसीने की बूंदे चमक रही थी। तभी डीएसपी ने आगे बढ़कर गुस्से में अरुण चौधरी की तरफ देखकर कहा, इंस्पेक्टर तमीज से खड़े हो जाओ। तुम झले कि डीएम मैडम सावित्री सिंह के सामने खड़े हो। डीएम मैडम यह शब्द किसी बम की तरह थाने में फटा। अरुण और संदीप के पैरों तले जमीन

12:22 खिसक गई। उन्हें लगा जैसे किसी ने उनके कानों में पिघला हुआ शीशा डाल दिया हो। वे कांपते हुए सावित्री को देखने लगे जिसे वे कुछ देर पहले अमरूद वाली की बेटी कहकर बेइज्जत कर रहे थे। सावित्री की आंखों में अब एक आम लड़की की घबराहट नहीं बल्कि एक डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट का रब और गुस्सा था। उसने अपनी ठंडी और कड़क आवाज में कहा इंस्पेक्टर अरुण चौधरी एनएसएचओ संदीप राणा दोनों की आत्मा तक कांप गई। यू आर सस्पेंडेड विद इमीडिएट इफेक्ट। सावित्री ने आदेश दिया एसडीएम साहब इन दोनों के खिलाफ वर्दी की ढांस दिखाने एक आम नागरिक को अपमानित करने और अपनी ड्यूटी ना करने के जुर्म में फर्ज दर्ज कीजिए। साथ ही इनके खिलाफ एक विभागीय जांच भी बिठाई जाए।

13:07 एसपी साहब ने तुरंत अपने मातहतों को इशारा किया और दोनों इंस्पेक्टरों की बेल्ट और टोपी उतरवा दी गई। कल तक जो शेर बने घूम रहे थे, आज बीगी बिल्ली की तरह सिर झुकाए खड़े थे। तभी नेता गंगा प्रसाद यादव ने हिम्मत करके कहा मैडम नादान है गलती हो जाती है माफ कर दीजिए मैं समझा दूंगा इनको सावित्री ने घूमकर गंगा प्रसाद को ऐसी नजरों से देखा कि वह कांप गया नेताजी यह नादान नहीं सरकारी वर्दी में छुपे गुंडे हैं और जहां तक समझाने की बात है तो अब इन्हें कानून समझाएगा और बेहतर होगा कि आप इस मामले से दूर रहें वरना जांच की आंच आप तक भी पहुंच सकती है। गंगा प्रसाद यादव का चेहरा सफेद पड़ गया। वह समझ गया कि इस नई डीएम से टकराना आसान नहीं है। वह चुपचाप

13:53 सिर झुकाकर वहां से खिसक गया। लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सी नफरत और गुस्सा था जो सावित्री ने पढ़ लिया था। अगली सुबह सब समझ रहे थे कि डीएम बेटी ने मां को इंसाफ दिलाया। सब कुछ ठीक लग रहा था। लेकिन सावित्री एक दिन रात को जब खाना खा रही थी, तभी उसके पर्सनल फोन पर एक अननोन नंबर से कॉल आया। उसने फोन उठाया। हेलो दूसरी तरफ से कोई कुछ नहीं बोला। बस एक भारी सांस लेने की आवाज आई। फिर एक बदली हुई मशीनी आवाज में कोई बोला डीएम साहिबा शहर में नहीं हो ज्यादा उड़ने की कोशिश मत करो। इंस्पेक्टर तो बस मोहरे थे। खेल तो अब शुरू होगा। सावित्री ने कड़क आवाज में पूछा। कौन बोल रहा है? वही जिसकी दुम पर तुमने पैर रख दिया है। कहकर उस आदमी ने

14:39 फोन काट दिया। सावित्री के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई। वह समझ गई थी कि गंगा प्रसाद यादव इतनी आसानी से हार मानने वालों में से नहीं है। यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई थी बल्कि अब और भी ज्यादा खतरनाक होने वाली थी। उसे अब सिर्फ अपनी मां की इज्जत ही नहीं बल्कि उनकी जान की भी फिक्र होने लगी थी। उसने तुरंत ही एसपी को फोन किया और अपनी मां के घर के आसपास सादी वर्दी में दो पुलिस वालों को तैनात करने को कहा। वह अपनी मां को डराना नहीं चाहती थी। लेकिन कोई भी खतरा मोड़ लेना भी नहीं चाहती थी। अगले कुछ दिन शांति से गुजरे। सावित्री को लगा शायद उसकी चेतावनी काम कर गई और गंगा प्रसाद यादव पीछे हट गया है। लेकिन वह तूफान से पहले की शांति थी। एक सुबह जब माघमा देवी बाजार में अपने अमरूद

15:25 की टोकरी लगाकर बैठी ही थी कि अचानक पुलिस की तीन गाड़ियां वहां आकर रुकी। उनमें से एक नया इंस्पेक्टर उतरा जिसे सावित्री नहीं जानती थी। उसने माघमा देवी की टोकरी की तरफ इशारा करते हुए कहा हमें सूचना मिली है कि इन अमरूदों की आड़ में नशीले पदार्थों की तस्करी हो रही है। तलाशी लो इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता एक सिपाही ने अमरूदों के नीचे से भूरे रंग के नशीले पदार्थ निकाले और चिल्लाया सर मिल गया। नशीला पदार्थ बाजार में हड़कंप मच गया। लोग कान्हा फूंसी करने लगे। देखो डीएम की मां नशीले पदार्थ बेचती है। माघमा देवी सन रह गई। वह रोते हुए बोली नहीं, साहब, यह मेरा नहीं है। किसी ने मुझे फंसाया है, लेकिन किसी ने उनकी एक ना सुनी। पुलिस

16:11 उन्हें जबरदस्ती जीप में बिठाकर ले गई। यह खबर आग की तरह पूरे शहर में फैल गई। न्यूज़ चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज़ चलने लगी। डीएम सावित्री सिंह की मां नशीले पदार्थ के आरोप में गिरफ्तार। यह गंगा प्रसाद यादव का मास्टर स्ट्रोक था। उसने सावित्री पर सीधा हमला नहीं किया बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी उसकी मां पर वार किया था। अब सावित्री एक अजीब दुविधा में फंस गई थी। अगर वह अपनी शक्ति का इस्तेमाल करके मां को छुड़ाती तो उस पर पद का दुरुपयोग करने का आरोप लगता और अगर वह चुप रहती तो उसकी बेगुनाह मां जेल में सड़ती। सावित्री के ऑफिस में फोन की घंटियां बजने लगी। मीडिया मंत्री सीनियर अधिकारी हर कोई जवाब मांग रहा था। तभी उसकी बहन आर्मी ऑफिसर अवनीिका का फोन

16:59 आया। उसकी आवाज में गुस्सा और बेचैनी थी। बहन यह क्या हो रहा है? मैं आ रही हूं। मैं उस गंगा प्रसाद को नहीं छोडूंगी। सावित्री ने गहरी सांस ली और अपनी आवाज को स्थिर करते हुए कहा, नहीं दीदी, तुम्हें आने की जरूरत नहीं है। अगर हम भी उनकी तरह गैरकानूनी काम करेंगे, तो उनमें और हम में फर्क क्या रह जाएगा? यह लड़ाई अब कानून के दायरे में ही लड़ी जाएगी और जीतेगी भी। सावित्री ने तुरंत एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। पूरा मीडिया हॉल खचाखच भरा था। कैमरों की फ्लैश लाइट उसकी आंखों में चुभ रही थी। उसने माइक संभाला और कहा, "मैं जानती हूं आप सबके मन में क्या सवाल है।" "मेरी मां पर गंभीर आरोप लगे हैं।" कानून सबके लिए बराबर है। चाहे वह एक आम नागरिक हो या डीएम की मां। इसलिए मैं इस केस की

17:44 जांच से खुद को अलग करती हूं ताकि जांच पर कोई असर ना पड़े। एसपी साहब एक स्पेशल टीम बनाकर इस मामले की निष्पक्ष जांच करेंगे। मुझे भारत के कानून पर पूरा भरोसा है। दूध का दूध और पानी का पानी होकर रहेगा। सावित्री का यह दांव देखकर गंगा प्रसाद यादव भी हैरान रह गया। उसे लगा था कि सावित्री बौखलाकर कोई गलत कदम उठाएगी। लेकिन उसने तो बड़ी समझदारी से खुद को जांच से अलग कर लिया था। लेकिन सावित्री सिर्फ कानून के भरोसे नहीं बैठी थी। उसने रोहित को बुलाया। वही लड़का जिसने पहला वीडियो बनाया था। सावित्री ने कहा, "रोहित मुझे तुम्हारी मदद चाहिए। तुम बाजार में रहते हो। वहां की हर हरकत पर तुम्हारी नजर रहती है। पता लगाओ उस दिन मां की टोकरी के पास कौन-कौन आया था। कोई भी अजीब हरकत, कोई भी नया चेहरा मुझे हर छोटी बड़ी

18:31 जानकारी चाहिए। रोहित अपनी डीएम दीदी की मदद करने के लिए तुरंत तैयार हो गया। उसने बाजार के दूसरे दुकानदारों और अपने दोस्तों से पूछताछ शुरू कर दी। दो दिन की कड़ी मेहनत के बाद उसे एक सुराग मिला। पास की एक दुकान के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में एक आदमी मागमा देवी की टोकरी के पास कुछ रखते हुए दिखा था। उसका चेहरा साफ नहीं था, लेकिन वह वही आदमी था जिसे लोगों ने सस्पेंड हुए इंस्पेक्टर अरुण चौधरी के साथ कई बार देखा था। सबूत मिल चुका था। यह सारा खेल गंगा प्रसाद यादव ने अपने पिट्ठू सस्पेंड हुए इंस्पेक्टरों के जरिए रचा था। अब बारी सावित्री की थी। उसने एसपी के साथ मिलकर एक जाल बिछाया। उन्होंने यह झूठी खबर फैलाई कि सीसीटीवी फुटेज में नशीला पदार्थ रखने वाले का

19:18 चेहरा साफ-साफ आ गया है और पुलिस उसे पकड़ने ही वाली है। यह खबर सुनते ही गंगा प्रसाद यादव के कैंप में खलबली मच गई। उसने तुरंत अरुण चौधरी को फोन किया। वह आदमी पकड़ा नहीं जाना चाहिए। उसको कुछ करो वरना हम सब पकड़े जाएंगे। गंगा प्रसाद को नहीं पता था कि उसका फोन पहले से ही पुलिस के सर्िलांस पर था। अरुण चौधरी और संदीप राणा उस आदमी को ठिकाने लगाने के लिए जैसे ही शहर के बाहर एक सुनसान जगह पर पहुंचे, सावित्री और एसपी ने अपनी पूरी टीम के साथ उन्हें घेर लिया। हाथों पकड़े जाने पर दोनों ने गंगा प्रसाद यादव के खिलाफ अपना मुंह खोल दिया। अगली सुबह जब गंगा प्रसाद यादव अपने घर पर बैठकर चाय पी रहा था और अपनी जीत का जश्न मनाने की सोच रहा था। तभी दरवाजे पर जोरदार दस्तक हुई। उसने

20:04 दरवाजा खोला तो सामने डीएम सावित्री सिंह एसपी और भारी पुलिस फोर्स को देखकर उसके होश उड़ गए। वह हकलाते हुए बोला यह यह क्या हो रहा है मैडम? सावित्री ने अपनी आंखों में इस्पात जैसी कठोरता कहा। खेल खत्म हो गया नेताजी। आपके मोहरे पकड़े जा चुके हैं और उन्होंने आपके सारे राज उगल दिए हैं। आपके पास कोई सबूत नहीं है। गंगा प्रसाद चिल्लाया। आप मुझे हाथ नहीं लगा सकती। एएसपी ने आगे बढ़कर उसके हाथ में अरेस्ट वारंट थमाते हुए कहा, सबलियों हियर इज द प्रूफ रीड वर्जन ऑफ योर सेंटेंसेस। हमारे पास आपकी फोन रिकॉर्डिंग है जिसमें आप एक गवाह के खिलाफ अभिशब्द बोल रहे थे। अब आप हमारे साथ थाने चलेंगे। गंगा प्रसाद यादव का राजनीतिक साम्राज्य एक ही पल में

20:49 ढह गया। उसे हथकद्दियां पहनाकर पुलिस जीप में ले जाया गया। उसी शाम माघमा देवी को बाइ्जत बरी कर दिया गया। जब वह जेल से बाहर आई तो सावित्री उन्हें लेने आई थी। मां बेटी एक दूसरे के गले लगकर रो पड़ी और बोली, अब आपको अमरूद बेचने की जरूरत नहीं है। अगली सुबह मागमा देवी को अपनी गाड़ी में बैठाकर अपनी पोस्टिंग पर लेकर चली गई और दोनों साथ में हंसी-खुशी रहने लगे। जब उसकी बड़ी बहन की आर्मी से छुट्टी मिलती, तो वह भी आ जाती। तीनों साथ में हंसी-खुशी रहते। तो दोस्तों, यह कहानी केवल मनोरंजन और शिक्षा के उद्देश्य से बनाई गई है। इसमें दिखाए गए सभी पात्र घटनाएं और संवाद काल्पनिक हैं। किसी भी वास्तविक व्यक्ति, संस्था या घटना से इनका कोई संबंध नहीं है। कृपया इसे केवल कहानी के रूप में

21:36 देखें और इसका आनंद लें। हम किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं चाहते। अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो तो इसे लाइक करें और ज्यादा से ज्यादा लोगों तक शेयर करें। कमेंट करके बताएं कि आपको सावित्री का कौन सा कदम सबसे अच्छा लगा और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें क्योंकि हम आपके लिए ऐसे ही प्रेरणादायक कहानियां लाते रहेंगे। धन्यवाद।

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