Mudda Aapka: DIGITAL अरेस्ट | 23 October, 2025

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संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो "डिजिटल अरेस्ट" के मुद्दे पर केंद्रित है, जो भारत में तेज़ी से बढ़ रहा है। इसमें बताया गया है कि कैसे साइबर अपराधी लोगों को डरा-धमका कर उनसे पैसे ऐंठते हैं, और इससे बचने के लिए क्या सावधानियां बरतनी चाहिए। मुख्य बातें:

  • डिजिटल अरेस्ट एक ट्रांसनेशनल साइबर क्राइम है जिसमें विदेशी साइबर क्रिमिनल शामिल हैं।
  • जागरूकता और डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण लोग आसानी से ठगी का शिकार हो जाते हैं।
  • बैंकों को केवाईसी (KYC) नियमों का सख्ती से पालन करना चाहिए और संदिग्ध लेनदेन पर नज़र रखनी चाहिए।
  • पुलिस साइबर अपराध को रोकने और अपराधियों को पकड़ने के लिए प्रयासरत है, लेकिन लोगों को भी सतर्क रहने की आवश्यकता है।

परिचय: डिजिटल अरेस्ट की बढ़ती समस्या

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सॉफ्टवेयर उत्पादक है, लेकिन डिजिटल साक्षरता दर केवल 0.80% है। देश में 90 करोड़ से ज़्यादा इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं, और कंटेंट क्रिएटर्स की संख्या भी दुनिया के औसत से छह गुना ज़्यादा है। नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल के अनुसार, 2024 के पहले तीन महीनों में लोग साइबर ठगी में 120 करोड़ से ज़्यादा रुपये गँवा चुके हैं। 2022 से 2024 के बीच डिजिटल अरेस्ट के मामलों में छह गुना से ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई है।

पीड़ित की आपबीती: कैसे होता है डिजिटल अरेस्ट

नरेश मल्होत्रा, जो एक पूर्व क्षेत्रीय प्रमुख हैं, बताते हैं कि कैसे उन्हें डिजिटल अरेस्ट के जाल में फंसाया गया। उन्हें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के फ़र्ज़ी आदेश दिखाए गए, और कहा गया कि उनके आधार कार्ड से टेरर फंडिंग हो रही है। उन्हें हर दो घंटे में रिपोर्टिंग करने और राष्ट्रीय गोपनीयता अधिनियम के तहत शपथ लेने के लिए मजबूर किया गया। यहां तक कि खर्च करने के लिए भी उन्हें अनुमति लेनी पड़ती थी। उन्हें लगभग डेढ़ महीने तक आतंकित करके रखा गया।

ट्रांसनेशनल साइबर क्राइम: डिजिटल अरेस्ट का अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क

प्रियांशु दीवान, एसीपी साइबर क्राइम, बताते हैं कि डिजिटल अरेस्ट एक ट्रांसनेशनल साइबर क्राइम है जिसमें विदेश में बैठे भारतीय और पाकिस्तानी मूल के लोग शामिल हैं, जिनके बॉस चीनी साइबर क्रिमिनल हैं। कंबोडिया में मैंगो पार्क नाम की एक जगह है जहाँ पर कॉल सेंटर्स हैं, जहाँ से ये ठगी का नेटवर्क चलाया जाता है। अपराधियों के पास वरिष्ठ नागरिकों का डेटा होता है, जिसका इस्तेमाल वे पुलिस वाले का रोब दिखा कर या पार्सल में ड्रग्स पकड़े जाने का डर दिखा कर करते हैं।

डिजिटल साक्षरता और जागरूकता की आवश्यकता

प्रियांशु दीवान और अमित दुबे साइबर सुरक्षा पर जागरूकता बढ़ाने और डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर ज़ोर देते हैं। अमित दुबे बताते हैं कि डिजिटल साक्षरता की कमी सिर्फ़ भारत की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे विश्व में है। उन्होंने यूके का उदाहरण दिया, जहाँ बैंकों को धोखाधड़ी के मामलों में पैसा लौटाना पड़ता है, चाहे गलती किसी की भी हो।

बैंकों की भूमिका और जिम्मेदारी

नरेश मल्होत्रा बैंकों की भूमिका और जिम्मेदारी पर सवाल उठाते हैं। उनका कहना है कि बैंकों को केवाईसी नियमों का सख्ती से पालन करना चाहिए और संदिग्ध लेनदेन पर नज़र रखनी चाहिए। वे बताते हैं कि "म्यूल अकाउंट्स" (भाड़े के खाते) बैंकों की मिलीभगत से ही बनते हैं। यदि किसी खाते में अचानक से बड़ी रकम आती है, तो बैंक को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए और पूछताछ करनी चाहिए।

पुलिस की कार्रवाई और साइबर सुरक्षा उपाय

प्रियांशु दीवान बताते हैं कि पुलिस साइबर अपराध को रोकने और अपराधियों को पकड़ने के लिए प्रयासरत है। गृह मंत्रालय द्वारा अक्टूबर महीने को साइबर सुरक्षा महीने के तौर पर मनाया जाता है। पुलिस जागरूकता कार्यक्रम चला रही है, साइबर एक्सपर्ट्स की मदद ले रही है, और साइबर कमांडोज़ को ट्रेनिंग दे रही है। जो बैंक कर्मचारी धोखाधड़ी में शामिल पाए जाते हैं, उन्हें गिरफ्तार भी किया जा रहा है।

बचाव के उपाय और अंतिम संदेश

अमित दुबे लोगों को सलाह देते हैं कि वे ऑनलाइन किसी के दबाव में आकर पैसा न डालें। अपने फोन में कम एप्लिकेशन रखें ताकि डेटा लीक न हो। ईडी और सीबीआई जैसे संस्थान सीधे ऑनलाइन समन नहीं भेजते हैं। नरेश मल्होत्रा का कहना है कि रिजर्व बैंक को उन बैंकों पर रोक लगानी चाहिए जहाँ म्यूल अकाउंट पाए जाते हैं। अंत में, सभी मेहमानों ने लोगों से सतर्क, जागरूक और शिक्षित रहने का आग्रह किया ताकि वे डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराधों से बच सकें।

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Transcript

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0:00 [संगीत] नमस्कार स्वागत है आपका संसद टीवी में। मैं हूं रामवीर श्रेष्ठ और आज का मुद्दा है डिजिटल अरेस्ट। भारत दरअसल चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सॉफ्टवेयर प्रोड्यूसर है। लेकिन साक्षरता दर जहां पर हमारे यहां 80% है। मगर डिजिटल साक्षरता दर की बात करें तो यह महज 0.80% है। मतलब 1% से भी कुछ कम। भारत में इस समय 777 से ज्यादा वेब लोकेशन आधारित ऑनलाइन प्लेटफार्म काम कर रहे हैं। सिर्फ

0:46 भारत में 90 करोड़ से ज्यादा इंटरनेट यूजर हो चले हैं। दुनिया भर में कंटेंट क्रिएटर्स का प्रतिशत मात्र 18 है। तो भारत में 115% से ज्यादा कंटेंट क्रिएटर हैं। यानी दुनिया से छह गुना ज्यादा। एनसीआरपी यानी नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल के मुताबिक 2024 के मात्र पहले 3 महीने में लोग साइबर ठगी में अपने 120 करोड़ से ज्यादा गवा चुके थे। 2022 से 2024 के बीच इन डिजिटल अरेस्ट के मामलों में छ गुना से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। आज का मुद्दा यह है कि अगला नंबर कहीं आपका तो नहीं। इसके लिए आपको क्या करना है? अगले आधे घंटे

1:32 आपकी और हमारी समझ बढ़ाने के लिए जो साथी मेहमान हमारे साथ हैं उनका परिचय मैं आपसे कराता हूं। हमारे साथ अमित दुबे हैं साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ हैं। संसद टीवी में आपका बहुत-बहुत स्वागत है अमित जी। हमारे साथ नरेश मल्होत्रा हैं। पूर्व क्षेत्रीय प्रमुख हैं पीएसयू बैंक से। हमारे साथ प्रियांंशु दीवान हैं। एसीपी साइबर क्राइम गुरुग्राम से। आप सभी का बहुत-बहुत स्वागत है संसद टीवी में और इस सारी चर्चा को मुझे ऐसा लगता है कि अह नरेश जी से हम इसे शुरू करते हैं और इसे सबसे पहले शायद नरेश जी तस्वीर सामने है। देश में डिजिटल साक्षरता मात्र 0.80%

2:21 बताई गई है। ऐसे में क्या मेरा सबसे पहला सवाल यही नहीं होना चाहिए कि हम लोगों को पहले तो यह पता चले कि यह डिजिटल अरेस्ट होता क्या है? बस ऐसा है डिजिटल अरेस्ट इस तरह से होता है जैसे गर्दन के ऊपर आके बंदूक रख दी जाए। जी और मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। मुझे एक पल में ही उन्होंने इतना धराशाही कर दिया कि मेरे ऊपर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आर्डर लगा दिए, हाई कोर्ट के आर्डर लगा दिए, मुंबई पुलिस के लगा दिए कि भैया आपको नेशनल क्राइम में लगा दिया है। नेशनल एनआईए एजेंसी ने पकड़ लिया है

3:08 और अगर आप कोपरेट नहीं करेंगे तो आपकी सारी फैमिली को हम को एक्यू्यूज बनाकर अरेस्ट कर लेंगे और आपकी छ महीने तक को बेल तक की एप्लीकेशन नहीं लग पाएगी। हम इस तहत उन्होंने मुझे हर दो घंटे में मेरे साथ रिपोर्टिंग लेते थे। हम और मेरे साथ नेशनल सीक्रेट एक्ट के तहत मेरे से शपथ लेते थे कि मैं किसी से बात नहीं करूंगा। हम यहां तक कि मेरे को खर्चा करने के लिए अप्रूवल के लिए भी मेरे को पहले अप्रूवल लेनी पड़ती थी। तब मैं खर्चा कर सकता था। कहीं जाना मेरे तो सर्जरी होके हटी थी। तब भी उसके बावजूद मुझे इतनी दिक्कत के साथ भी इन्होंने मुझे अरेस्ट में रखा। हम

3:53 तो मेरे को इन्होंने लगभग बॉम्बे हाई कोर्ट, मुंबई पुलिस, सुप्रीम कोर्ट, रिजर्व बैंक सबके ऑर्डर्स दिए। आपने भाई मेरा दोष क्या है? नहीं मैंने पूछा ना बोले आपका आधार कार्ड के ऊपर अकाउंट खुला है जिससे टेरर फंडिंग हुई है। ओके। और टेरर फंडिंग के तहत आपको अरेस्ट किया गया है। हम और उसमें जितना इस खाते से पैसा फंडिंग के लिए आमदम इक्विपमेंट खरीदा गया है। तो आपको कहीं नहीं आपके लिए हम अरेस्ट भेज रहे हैं। तो मैंने बोला मैं अपनी फैमिली को बोलूं। बोले नहीं अभी किसी को नहीं बोल सकते आप। हम

4:38 और बोलेंगे तो हम सबको को एक्यू्यूज बनाते जाएंगे। हम और रोज इन्होंने मेरे को बोला कि आपकी फैमिली हमारे साथ को एक्यूज़ रहेगी। हम तो इस इस डर खफट के साथ मेरे को इन्होंने अरेस्ट में रखा डेढ़ महीना हम और मुझे रोज कभी सुप्रीम कोर्ट का आर्डर दिखा देते थे कभी रिजर्व बैंक का हम और लगभग टेरर करके रखा था। हम हम परंतु मेरा एक सबसे बड़ा मुद्दा यह है कहने का कि ये कैसे परपेट्रेट होता है फ्रॉड हम ये तो हुआ क्योंकि स्कैम स्टर्स का तो काम ही है कि स्कैम करना हम परंतु इन्होंने पैसा किस तरह निकाला गया है वो मैं आपको विधि या रास्ता दिखाता हूं

5:26 कि इन लोगों ने क्या किया है चैनल इनका सबकी तरफ बैंकिंग है हम क्योंकि बैंक के जरिए से ही पैसा गया बिल्कुल एक एक पेमेंट बैंक है, एक कलेक्टिंग बैंक है। हम तो बैंक की जिम्मेदारी बिल्कुल कॉम्प्रोमाइज की गई है। क्योंकि केवाईसी का नाम लगभग नाम ना मात्र हुआ है। हम केवाईसी का मतलब होता है नो योर कस्टमर। हम परंतु 90% अकाउंट्स में कस्टमर बैंक नहीं जाता। बैंक कस्टमर को नहीं देखता। हम यह सारे आउटसोर्स किए होते हैं। केवाईसी बिल्कुल अकाउंट ओपनिंग वो कोई कभी पान वाला भी कोई केवाईसी कर देता है कभी कोई सबोर्डिनेट आदमी बाहर का

6:14 डेली बेस वर्कर होता है वो केवाईसी करता है उसके पास आधार भी हो जाता है आपका सारा डाटा कॉम्प्रोमाइज होता है वो कहां पे इस्तेमाल करेगा ये किसी को अंदाजा नहीं रहता हम और ये जिस बैंक का केवाईसी वीक है उस बैंक को ही यह अपना ऑपरेट करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। हम नरेश जी मैं आपके पास फिर आऊंगा दोबारा। आपकी कहानी हमारे बाकी जो दो मेहमान हैं उनको जरूर समझ में आ गई है। हमारे साथ में जो बाकी मेहमान है उसमें प्रियांंशु दीवान हमारे साथ में हैं। एसीपी साइबर क्राइम है गुरुग्राम से। प्रियांंशु ये आपने नरेश जी की कहानी को

6:59 आपने सुना। वो पढ़े लिखे आदमी हैं। ठीक है? एक बैंक से जुड़े रहे हैं और वो खुद ठगे गए हैं। और मैं तो देखता हूं कि हम सबके चारों तरफ कोई ना कोई एक आदमी ऐसा है या एक से ज्यादा जिनके पास ठगी की या तो उनके साथ कोशिश की गई या वो उसकी गिरफ्त में आ गए। इसको आप ये ये बैंकिंग की समस्या है। यह जो ठगा गया है उसकी समस्या है या इसमें पुलिस भी कहीं आती है? प्रियांंशु देखिए आपने एक बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल उठाया सभी के लिए। पहली बात तो मैं बताना चाहूंगा कि भारतीय कानून प्रणाली के अंदर

7:44 डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई भी चीज नहीं होती। ठीक। जो भारत में नए तीन कानून आए थे भारतीय बीएएस, बीएएसएस और बीएसएफ हम उसमें पुलिस के पास फिजिकल अरेस्ट का प्रावधान है और डिजिटल अरेस्ट नाम की भारतीय कानून में कोई जगह है ही नहीं। ठीक है? दूसरी बात है कि जो कि काफी ज्यादा चौंकाने वाली बात है जो कि पूरे भारतवर्ष को जानने की काफी ज्यादा इसको जरूरत है वह यह है कि जो डिजिटल अरेस्ट का फ्रॉड है ये एक ट्रांस नेशनल साइबर क्राइम है। मतलब इसमें विदेश में बैठ के कुछ भारतीय हैं। पाकिस्तानी मूल के व्यक्ति हैं और इनके जो बॉसेस हैं वो कहीं चाइनीस साइबर क्रिमिनल हैं। जिनके थ्रू ये कंप्लीट नेक्सेस चल रहा है। हम

8:30 आपको जान के आश्चर्य होगा कि गुरुग्राम पुलिस ने पिछले दो महीने में तकरीबन छह लोगों को गिरफ्तार किया है और उनके थ्रू हमें पता चला है कि कंबोडिया में मैंगो पार्क नाम की एक जगह है जहां पर ऑर्गेनाइज तरीके से तकरीबन 2020 फ्लोर के कई सारे कॉल सेंटर्स हैं और उनके पास और उनके ऊपर कोई चाइनीस बॉसेस हैं हम और वो तीन लेयर में लोगों के साथ ठगी करते हैं और सबसे ज्यादा जो चौंकाने वाली बात यह है कि भारत से जितने भी सीनियर सिटीजन है जो भी वरिष्ठ नागरिक हैं उनका कुछ ना कुछ डाटा जो है वो क्रिमिनल्स के पास कहीं ना कहीं डाटा से पहुंच गया। तो जैसे मल्होत्रा साहब ने बताया

9:16 कि या फिर तो बैंक से या फिर अन्य कोई इंस्टीट्यूशन से जो भी वरिष्ठ नागरिक हैं उनका डाटा वहां पर पहुंच गया है और उनको यह स्क्रिप्ट्स सिखाई जाती है। उनको बताया जाता है कि ऐसे आपने या फिर तो पुलिस वाले का रोब दिखा के करना है कि आपके सिम कार्ड जो है वो एक इललीगल गतिविधि में पकड़ा गया है। या फिर आपका जो पार्सल है उसमें ड्रग्स पकड़े गए हैं। और उसके बाद जब वीडियो कॉल पर दूसरी तरफ कोई पुलिस की जो वर्दी पहनकर जो व्यक्ति बातचीत कर रहा होता है उसको भी पूरी पूरी वो स्क्रिप्ट बताई जाती है जिसके कारण ये पूरे भारत में ये सर्व्यापक है डिजिटल अरेस्ट का ठगी और इस पे मैं सभी के सभी आपके चैनल के माध्यम से लोगों को यही बताना चाहूंगा फिर से कि ये जो साइबर क्राइम है ये एक क्रिमिनल

10:02 एक्टिविटी है। आप प्लीज घबराएं ना। पुलिस कभी भी किसी को वीडियो कॉल के माध्यम से कभी संपर्क नहीं करती और यह सारे के सारे जो भी क्रिमिनल हैं यह विदेश में बैठे हैं कंबोडिया लाउस वियतनाम में एक जो अनुमान है जो कि इन क्रिमिनल्स से हमें पूछताछ में पता चला कि तकरीबन 400 भारतीय पाकिस्तानी नेपाली मूल के कई वासी हैं जो वहां पर बैठ के एक ऑर्गेनाइज तरीके से सारे के सारे ये ठगी को अंजाम दे रहे हैं और कई कई सारे भारतीय इसकी चपेट में पिछले गत एक दो वर्ष में आए हैं। हम और ये सारा नेटवर्क भारत के बाहर भी है और भारत के भीतर भी है। राइट? देखिए जो भी इस समय हमारे पास टेक्निकल

10:49 एविडेंसेस आ रहे हैं जिसमें हम आईपी एड्रेस देखते हैं। तो जो ये फोन कॉल हो रही है और जो ये वर्दी में बैठे व्यक्ति हैं जो आपसे बात कर रहे हैं। ये सभी के सभी बाहर बैठे हैं। ओके। इसमें हमारे साथ साइबर विशेषज्ञ हैं वो भी अच्छे से बताएंगे। भारत के खाते यूज़ हो रहे हैं। एक साइबर की जब हम तफ्तीश करते हैं, साइबर इन्वेस्टिगेशन में एक टर्मिनोलॉजी होती है जिसको हम कहते हैं म्यूल अकाउंट्स। हम म्यूल अकाउंट्स मतलब भाड़े के खाते। तो कुछ भारतीयों ने कुछ लालच के कारण अपने खाते दिए जिसमें कि ये सारे पैसे घुमाए जाते हैं पूरे भारत में। और ऐसा नहीं किसी राज्य स्पेसिफिक के खाते हैं। सारे के सारे राज्यों के कई व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने खाते दिए हैं और यह सारे प्रोसीड्स को काफी घुमा के क्रिप्टो करेंसी के माध्यम से विदेश में लेके जाया जाता है।

11:34 हम तो जैसे आपने कि एक बहुत ही एक चौंकाने वाला फिगर बताया कि इस वर्ष पिछले पहले चार महीने में तकरीबन 100 करोड़ 120 करोड़ हम डिजिटल अरेस्ट के फ्रॉड से गए जो कि एक बहुत बड़ी वैल्यू है और इसके ऊपर सरकार भी मंथन कर रही है और सभी के सभी जितने भी फील्ड यूनिट्स हैं हमारे जितने भी जिले की साइबर क्राइम यूनिट्स हैं उस पर पूरे-पूरे नकेल कसने की जरूरत है। लेकिन इसमें सबसे ज्यादा जरूरी जो है वो है व्यक्तियों का जागरूक होना। जब तक साइबर लिटरेसी नहीं आएगी जब तक डिजिटल लिटरेसी नहीं आएगी तब तक ये साइबर ठगी की जो दर है वो दिन प्रतिदिन क्या वो बढ़ती जाएंगी। हम लेकिन दुबे साहब ये ये जो साइबर लिटरेसी की जो बात डिजिटल लिटरेसी की बात

12:22 जो प्रियांंशु कर रहे हैं अभी तो वो 1% तक भी नहीं पहुंची है। और वो 100% लोग जो जो नेट का यूज़ कर रहे हैं, डिजिटलाइज्ड हो चुके हैं। यह 99% जब तक यह इलिटरेट रहेंगे डिजिटली, तो क्या तब तक वो ठगे जा ठगे जाते रहेंगे? तब तक कोई रिस्पांसिबिलिटी कहीं किसी इंस्टीट्यूशन के थ्रू नहीं ली जाएगी। जैसे मल्होत्रा साहब ने कहा कि एक बैंक जो है डिलीवर है दूसरा रिसीवर है। एक तरफ से पैसा जा रहा है दूसरी तरफ रिसीव हो रहा है। ऐसे में जहां रिसीव हो रहा है उसको कुछ रिस्पांसिबल हो सकता है वो। अगर उसका अपने कंज्यूमर के साथ कोई कोई रिलेशन

13:09 है, कोई पहचान है, कोई प्रोफाइल है, कोई चेक पोस्ट है, क्या है? क्या है? इसे रोका जा सकता है। देखिए सर पहले तो ये समझ लीजिए कि डिजिटल लिटरेशन जो लिट लिटरेट होना ये जो प्रॉब्लम है ये सिर्फ भारत की नहीं है। ये पूरे विश्व की है। हर जगह ये प्रॉब्लम है। हर जगह साइबर क्राइम है। तो यदि हम यही मान के चलेंगे जब तक हम 100% लोगों को सिखा नहीं देंगे तब तक ये होता रहेगा। तो ये प्रोसेस तो बहुत लंबा होने वाला है। इसके दूसरे वर्क अराउंड भी है। जैसे यूके में पिछले साल अक्टूबर में एक लॉ पास कर दिया गया कि चाहे गलती विक्टिम की हो या बैंक की हो। पैसा बैंक को देना पड़ेगा पांच दिन के अंदर 90000 लौटाना ही पड़ेगा। तो सारी रिससिबिलिटी उन्होंने बैंक को दे दी। क्यों दे दी? क्योंकि आपने तो पैसा बैंक में ट्रांसफर किया है। यदि आपने पैसा

13:56 बैंक ट्रांसफर किया है तो उस पैसे को ट्रेस करना उस पैसे की जिम्मेवारी बैंक की ही होगी। आपके नहीं होगी क्योंकि आपने कैश में तो दिया नहीं है। इतनी सी बात को लेकर मेरे ख्याल से बैंक को रिससिबल बनाया जा सकता है। अभी क्या होता है कि हम चार चीजें सिखा देंगे जो डिजिटल लिटरेचर हम लिटरेसी फैलाते हैं। पांचवा आ जाएगा। फिर 10 चीजें सिखाएंगे फिर 11वा आ जाएगा। तो ये कंटीन्यूस प्रोसेस है। इस चीज को हम पूरी तरह सेशन नहीं बना सकते कि हम सबको सिखा ही देंगे कि किसी ना किसी को तो अकाउंटेबल बनाना पड़ेगा। और प्रियांंशु जी ने एक बड़ी अच्छी बात की कि जो म्यूल अकाउंट्स होते हैं म्यूल अकाउंट्स बनते तो बैंकों की सहमति से ही है ना। बैंकों को तो पता है और कई बार बैंक का कोई ना कोई इसमें इनवॉल्व

14:42 होता है। तो ऐसे में बैंकों को यह चीज पुख्ता करनी पड़ेगी कि ये चीज इतनी कन्वीनिएंट ना हो जाए कि आप ब्यूरो अकाउंट क्रिएट कर दे वो व्यक्ति है ही नहीं। कोई आम आदमी नहीं बोल रहा है दुबे जी। ये बात जो है एक एक्स रीजनल हेड बोल रहा है। ठीक है? जो खुद भी ठगी का शिकार हुआ है। जो पीएसयू बैंक का एक्स रीजनल हेड है। यह बात वह बोल रहे हैं। वह यह बात बोल रहे हैं कि जो रिसीवर बैंक है उसको अकाउंटेबल बनाया जाना चाहिए। जी जी दुबे जी बिल्कुल। और ये जो शिकार हुए हैं वो सारे के सारे बहुत वेल एजुकेटेड वेल अवेयर डिजिटली लिटरेट लोग हैं। ये ऐसे लोग नहीं है जिनको आप कह दें कि नहीं इनको पता नहीं था। हां ये बात और है कि उनको किस तरीके से भरमाया गया और वो

15:29 शिकार हो गए उसके लेकिन कहीं एजुकेशन या अवेयरनेस के पर्सेक्टिव से बाकी लोगों से वो कहीं आगे ही थे तो ऐसे में हम ये मान के चले कि नहीं नहीं हम लिटरेसी फैला देंगे उस साइबर क्राइम रुकेगा तो मेरे ख्याल से गलत रहेगा आज तक किसी कोई ऐसा केस आपके सामने आया कि कोई रिक्शे वाले ने कहा हो कि मुझे दो महीने डिजिटल अरेस्ट करके रख और ₹750 निकल गए ऐसा तो नहीं हुआ क्या मल्होत्रा जीत एक बात और बताने की कोशिश कोशिश करिए आप कि बैंक के बारे में जो आपने यह कहा कि बैंक को यह रिस्पांसिबिलिटी लेनी चाहिए रिसीवर बैंक को तो क्या बैंकों के पास इस तरह का कोई इंफ्रास्ट्रक्चर है उनके पास प्रोफाइल तो है हर कंज्यूमर का लेकिन उसके चेक पोस्ट उसका प्रोफाइल और ये ये पैसा

16:16 कैसे उगा ये ठगा गया है या ट्रांसफर हुआ है वो कैसे वो ट्रेस करें उस चीज को एक बात जो मूल्य अकाउंट है कोई रूल में म्यूल अकाउंट नहीं होता। यह खाते ऐसे हैं जिसमें000 1500 का बैलेंस है और अगर इसमें करोड़ों की ट्रांजैक्शन आएगी तो एकदम से ब्रांच मैनेजर को सतर्क हो जाना चाहिए कि भैया यह पैसा कहां से आया है? नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट जो है जिसके तहत ये प्रोटेक्शन मांगते हैं। उसमें भी यह लिखा हुआ है कि कलेक्टिंग बैंक केवल उसका पैसा ले सकता है जो लीगली लॉफुली उसका पैसा क्लाइंट के लिए है। चोरी का डिसऑनेस्टी का बर्गलरी का पैसा बैंक कोई

17:02 कलेक्ट नहीं कर सकता। ये स्कैम का पैसा कोई बैंक कलेक्ट नहीं कर सकता। यह नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट 1881 में बना है। उसमें लिखा हुआ है। आप 1881 का नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट पढ़ लीजिए। लेकिन बैंक ऐसा करते हैं। बैंक इस पर लापरवाही करते अगर करते हो तो यह स्कैम नहीं होगा ना। क्योंकि यह जो स्कमस्टर्स होते हैं यह बैंक वो देखते हैं जो वीक है। अब मैं आपको उदाहरण बताऊं। Yes बैंक, हम Indusind बैंक, ICICI बैंक इन तीनों बैंकों के सीईओस को फाइनेंसियल के तहत बंद कर चुके हैं आप। हम और अगर सीईओ जो मेन आदमी है अगर उसी को

17:48 बंद किया हो तो उसके नीचे आप ये सोच सकते हैं कि कंप्लायंस क्या होगा? हर किसी को ये होगा कि मेरा बॉस चोर है तो मेरे को भी चोरी करने दो। हम यह तो नेचुरल है। इफ द बॉस इज डूइंग समथिंग रोंग तो नीचे वाले भी कहेंगे यार उतने उसने तो बहुत बड़ी चोरी की। मैंने तो बहुत छोटी कर रहा हूं। लेकिन बैंकिंग के मामले में इस तरह का कोई केस पीएसयूस के साथ में नहीं है शायद। हां ये प्राइवेट बैंक में मैं कह रहा हूं ना प्राइवेट बैंक में होता है। हां। उनको होता है कि अकाउंट खोलो चाहे किसी भी सूरत में और वहां पर उनको कॉम्प्रोमाइज करते हैं। अकाउंट ओपनिंग केवाईसी कोई नाम की चीज कंप्लायंस होती ही नहीं है। हम हम तो सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि जब खाता कम

18:34 कमजोर खाते से खोला जाएगा तो निश्चित रूप से वो स्कैम में जाएगा। हम कलेक्टिंग बैंक की जिम्मेदारी है कि वह अगर ₹1000 का खाता है उसमें अगर एक करोड़ आए तो उसको पहले पूछेगा कि भैया पैसा कहां से आया तेरे पास ये हम तब मैं आगे जाने दूंगा नहीं तो मैं नहीं धोने दूंगा इंटरनेशनल लॉ में भी ये लिखा हुआ है कहीं से भी ऐसा बिग मनी आए यू हैव टू फॉलो नॉर्म्स टू फॉलो द डिसिप्लिन ऑफ़ द अकाउंट अगर पैटर्न ऑफ़ द अकाउंट में ट्रांजैक्शंस ऐसी नहीं है तो आप वो पैसा नहीं देंगे पपस जरूर पूछेंगे हम हर हर रेमिटेंस मतलब बैंक जो है वह लूट का माल रखने की जगह नहीं है सीधी सी बात नहीं है नहीं बिल्कुल प्रियांंशु हमारे साथ हैं

19:20 प्रियांंशु एक बात और भी है जिसको आपकी तरफ से समझाया जाना चाहिए पुलिस के लेवल पर साइबर क्राइम को कंट्रोल करने के लिए जो पुलिस का जो तंत्र है इंफ्रास्ट्रक्चर है उसमें क्या कुछ काम चल रहा है यह चाहे चाहे वो लिटरेसी का माम मामला हो, चाहे वह उसे कंट्रोल करने का मामला हो, चाहे वह लोगों को सेव करने का मामला हो, वहां पर क्या चल रहा है? देखिए, पहले तो मैं आपको बताना चाहूंगा कि अक्टूबर महीने को गृह मंत्रालय द्वारा साइबर सुरक्षा महीने के तौर पर मनाया जाता है। ठीक है? और इसमें जितनी भी विभिन्न यूनिट्स हैं पुलिस की वो तीन बेसिक कामों पर काफी ज्यादा ज्ञान मंथन कर रही है। हम

20:07 नंबर एक तो हम जागरूकता पर बहुत काम कर रहे हैं। तो अगर मैं गुरुग्राम पुलिस की बात करूं तो हम स्कूल्स में जागरूक जागरूकता में आपने एक बात यह बताई कि अगर कोई वीडियो कॉल आपको आता है और वीडियो कॉल में सामने वाला आदमी वर्दी पहन कर बैठा है और वह पुलिस की वर्दी पहन कर बैठा है तो इसका मतलब आप मान लीजिए कि वह पुलिस वाला नहीं है। बिल्कुल बिल्कुल बल्कि मैं आपको यह भी बताना चाहूंगा कि अगर कोई पुलिस वाला आपको वीडियो कॉल करके या फिर कहे कि डिजिटली अरेस्ट हो क्योंकि पुलिस हमेशा फिजिकल अरेस्ट की बात करती है। डिजिटल अरेस्ट कानून में है ही नहीं और हमारे जितने भी वरिष्ठ नागरिक हैं इनका डाटा या फिर तो कहीं से शेयर हो रहा है, लीक हो रहा है। उसकी वजह से ठगी के शिकार हो रहे हैं। तो हम जागरूकता में एकजुट होकर कई सारे

20:53 प्रोग्राम्स करते हैं। स्कूल्स में, कॉलेजेस में, आरडब्ल्यूएस में जिससे कि लोगों के अंदर एक जागरूकता आए। साइबर लिटरेसी की बात है। हम दूसरा मैं आपको बताऊंगा कि पुलिस जो है कई सारे साइबर एक्सपर्ट्स हैं। हमारे साथ दुबे साहब भी जुड़े हुए हैं यहां पर। तो हम अपनी भी स्किल कैपेसिटी बिल्डिंग की बात कर रहे हैं क्योंकि हमने देखा है कि दिन प्रतिदिन तकरीबन 1000 से ज्यादा कंप्लेंट्स पूरे भारत में रिपोर्ट हो रही हैं। बिल्कुल। तो उसको देखते हुए कैसे उसको टैकल किया जाए, कैसे उस पे कंट्रोल किया जाए, क्या उसमें हम मशीन लर्निंग के मॉडल्स इंप्लीमेंट किए जाए? हम उस पर भी हम तकनीकी विकास कर रहे हैं और हर जिले में अब विभिन्न एक साइबर यूनिट बनाई जा रही है। जिसमें कि जैसे हमारे जो माननीय गृह मंत्री साहब हैं उनके उनके

21:40 ऑफिस के थ्रू साइबर कमांडोस का भी एक ट्रेनिंग कोर्स डिफाइन किया गया है। जी। तीसरा आपको जान के ताज्जुब होगा कि जहां पर भी जैसे मल्होत्रा साहब ने कहा कि केवाईसी कंप्लायंसेस बहुत वीक है। ये साइबर कमांडोज़ का कोर्स कौन कौन उसको उस पाठ्यक्रम को कौन पढ़ाएगा? कोई देखिए साइबर कमांडोस के जो भी हमारे कोर्सेज हैं वो जो प्रतिष्ठित इंस्टीटश हैं जैसे आईआईटीस हैं, आईएम है, आईआईएससी हैं। यहां पर जाके इन केस डेडिकेटेड कोर्सेज हैं जो कि काफी प्रोफेसर्स ने बनाए हैं। जिससे कि पुलिस के भी जो एक स्किल कैपेसिटी है वो अब काफी ज्यादा डेवलप हो रही है। हम्म। इसके अलावा सबसे ज्यादा इंपॉर्टेंट बात ये है कि जहां पर भी बैंकर्स की गलती आ रही है या टेलीकॉम कंपनीज की गलती आ रही

22:27 है वहां पर हम बैंकर्स को भी अरेस्ट कर रहे हैं और टेलीकॉम कंपनीज जो भी उनके कर्मचारी उनको गिरफ्तार कर रहे हैं। हम आपको जान के अचंभा होगा कि गुरुग्राम पुलिस ने गत डेढ़ साल में तकरीबन 40 बैंक कर्मचारियों को गिरफ्तार किया है। हो तो जहां पर भी केवाईसी कंप्लायंसेस में कटौती है या फिर बैंक वाले जानबूझ के अपने खाते आगे किसी को डिस्ट्रीब्यूट कर रहे हैं। उनके खिलाफ भी जो भी न्यायिक कारवाई है कानूनी कारवाई है वो सारी की सारी हम कर रहे हैं। हम बाकी आपके माध्यम से मेरा सभी लोगों से फिर से एक निवेदन यही रहेगा कि डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई भी चीज नहीं होती है। पुलिस कभी भी किसी को वीडियो कॉल नहीं करती है। पुलिस कभी भी किसी को डराती समय बहुत कम रह गया है। अमित दुबे हमारे साथ हैं। डिजिटल एक्सपर्ट हैं। आखिर में

23:14 आप इस पूरी की पूरी समस्या पर अपना जो नजरिया और कोई एक ऐसा उपाय जिससे हम इस समस्या पर पार पा सके, काबू पा सकें आप बता सकें तो अच्छा होगा। देखिए सबसे बड़ी बात यह है कि कभी भी ऑनलाइन चाहे किसी भी व्यक्ति कोनेट किया जाए या किसी भी संस्था को आज पुलिस कोनेट किया जा रहा है। कल पासपोर्ट ऑफिस को आरटीओ कोसनेट करके भी कॉल आ सकते हैं। आपने डरना नहीं है और किसी के दबाव में आकर कभी कोई पैसा कहीं नहीं डालना। इतनी सी बात आप याद रखेंगे क्योंकि ये चीजें बदलती रहेंग और हमेशा मोटर इवॉल्व करती है और जैसा कि प्रियांंशु जी ने बताया कि कहीं ना कहीं आपका डाटाकि बाहर है इसलिए आपको कॉल आ रहा है तो जितना अपने फोन में नंबर ऑफ एप्लीकेशनेशंस आप कम रखेंगे जिससे कि वो आपकी एक्टिविटीज या आपके बैंक

23:59 बैलेंससेस लीक ना हो उतना आप सेफ रहेंगे। तो थोड़ा सा डिजिटल फुटप्रिंट को आप कम कर दीजिए। मैं अखबारों में पढ़ रहा था उसमें खबर कुछ इस तरह से थी कि अगर ईडी या जांच एजेंसीज अपना समन भेजती हैं तो उस समन के ऊपर एक क्यूआर कोड भी रहेगा उसे स्कैन करके जिसके खिलाफ समन भेजा गया है वो वेरीिफाइड कर सकता है कि ये समन रियल समन है या कोई फेक समन भेजा गया है बिल्कुल बिल्कुल और दूसरी बात है सर कि लोग सीधे सुप्रीम कोर्ट का नाम लेके डरा देते हैं। सुप्रीम कोर्ट से ऐसे नोटिस इशू नहीं होते। हम हमेशा एक इवोलशन प्रोसेस होता है। पहले डिस्ट्रिक्ट कोर्ट होता है। फिर आप उसमें भी बहुत लंबी कवायद होती है। फिर जाके हाई कोर्ट जाता है। फिर सुप्रीम कोर्ट यहां पर सीधे आपको सुप्रीम कोर्ट से नोटिस कभी भी नहीं आया। ऐसा इतना बड़ा आपने कुछ नहीं किया हुआ। तो आप थोड़ा सा अवेयर रहे इस

24:47 चीज़ को लेके कि ईडी, सीबीआई, एनसीबी ऐसे काम नहीं करते हैं। इनके काम करने के एक तरीके हैं। पर जो लिंक भेजे जाते हैं वो लिंक आप चेक कर सकते हैं। वो नॉर्मली क्लोन लिंक होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के क्लोन लिंक होते हैं। वैसे ही वेबसाइट दिखती है। तो उसको आप कई सारी वेबसाइट है एप्लीकेशन है। मूवी आर्मर करके एक ऐप है। उसप स्कैन करके देख लीजिए कि भाई ये ऑथेंटिक है कि नहीं है। लेकिन सबसे बड़ी बात जो है कि आप आखिर में मल्होत्रा जी आप भी कुछ कहना चाहेंगे? मैं मेरा तो यह कहना है कि रिजर्व बैंक को जिन बैंकों में म्यूल अकाउंट कहते हैं उन बैंकों के ऊपर रोक लगा दें कि जब तक आपके सारे अकाउंट्स केवाईसी कंप्लायंट नहीं होंगे आप और खाते नहीं खोल सकते यहां तो बैंक नए खाते खुलते जाएंगे कमजोरी के साथ वो केवाईसी नहीं फॉलो कर रहे बिल्कुल बहुत-बहुत शुक्रिया आपका आप तीनों

25:34 का बहुत-बहुत शुक्रिया इस बहुत ही संवेदनशील और गंभीर मसले पर अपनी राय रखने के और एक तरह से देश को जगाने के लिए क्योंकि स्टेप्स को समझना जरूरी है, अवेयर भी करना जरूरी है, अलर्ट करना भी जरूरी है, एजुकेट करना भी जरूरी है। यह सारे काम बहुत जरूरी हैं। और फिर उन सब चीजों को इफेक्टिव बनाया जा सकता है। तो, हम पूरे एक और जिस तरह से एक बात की है यहां पर प्रियांंशु ने भी बात की है कि डिजिटल कमांडोज़ ये ये एक फोर्स ये भी आगे चलकर के हमें उसकी जरूरत पड़ेगी। यहां पर मल्होत्रा साहब ने अब एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है कि जो बैंक है वो अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। अगर वह रिसीवर बैंक है और वहां उसके खाते में

26:20 ₹1000 था और अचानक से एक करोड़ आ जाता है और वह उसको जाने देता है। ठीक है? तो यह अपने आप में बैंक भी इस मामले में उसको भी अपनी जवाबदेही उसकी भी तय की जानी चाहिए। ऐसे तमाम मसले हैं। लेकिन इन सबके बीच में एक बड़ा मसला यह है कि जो ठगा जा रहा है वो कितना अवेयर है। वो कितना अलर्ट है। वो कितना एजुकेट है। और इसे आप बहुत आसानी से समझ सकते हैं। समझाने की कोशिश भी की है हमारे मेहमानों ने। ना तो सुप्रीम कोर्ट आपको कोई समन भेज रहा है। ना ईडी कोई आपको समन भेज रही है ऑनलाइन। पुलिस तो ऑनलाइन कुछ करती ही नहीं है। फिर आप फिर भी ठगे जा रहे हैं और ऐसा रोजाना 1000 लोग करीब ठगे जा रहे हैं। और इसमें बहुत बड़ा पैसा

27:06 आपकी जेब से निकल कर ठगों के हाथ में चला जा रहा है। इससे आप अगर अलर्ट रहें, आप अवेयर रहें, आप खुद को एजुकेट करें इस मामले में, तो आप इससे आसानी से बच सकते हैं। फिलहाल मुद्दा यही था। इस मुद्दे और यह मुद्दा पूरी तरह से आपके लिए था और फिलहाल मुझे भी इस मसले पर इजाजत दें। नमस्कार। [संगीत]

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