NCERT | CBSE | Class - 11 | भारत का संविधान सिद्धांत और व्यवहार | भारतीय संविधान में अधिकार | भाग-1

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संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो भारतीय संविधान में अधिकारों पर केंद्रित है, जिसमें मौलिक अधिकारों का अर्थ, उनकी आवश्यकता और संविधान में उनकी सुरक्षा के प्रावधानों पर चर्चा की गई है। वीडियो में अधिकारों के घोषणा पत्र, मौलिक अधिकारों और कानूनी अधिकारों के बीच अंतर, और समानता के अधिकार पर विशेष जोर दिया गया है।

  • मौलिक अधिकारों का महत्व और उनकी सुरक्षा।
  • समानता के अधिकार का विस्तृत विवरण (अनुच्छेद 14-18)।
  • संविधान की प्रस्तावना में समानता का महत्व।

अध्याय 1: अधिकारों की आवश्यकता और घोषणा पत्र

यह अध्याय अधिकारों की आवश्यकता और अधिकारों के घोषणा पत्र के बारे में बताता है। 1982 के एशिया गेम्स के दौरान मजदूरों के शोषण की घटना का उल्लेख करते हुए, यह स्पष्ट किया गया है कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के बिना नागरिकों का शोषण हो सकता है। अधिकारों का घोषणा पत्र एक ऐसा दस्तावेज है जो नागरिकों के अधिकारों को सूचीबद्ध करता है और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करता है। लोकतांत्रिक देशों में, इन अधिकारों को संविधान में शामिल किया जाता है ताकि किसी व्यक्ति, संगठन या सरकार द्वारा इनका उल्लंघन न हो।

अध्याय 2: भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार

इस अध्याय में भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डाला गया है। 1928 की नेहरू समिति की रिपोर्ट में पहली बार अधिकारों के घोषणा पत्र की मांग की गई थी। मूल संविधान में सात मौलिक अधिकार थे, लेकिन वर्तमान में छह हैं। मौलिक अधिकारों की सुरक्षा का प्रावधान संविधान में ही किया गया है, और न्यायपालिका को इनकी रक्षा करने की शक्ति दी गई है। मौलिक अधिकार कानूनी अधिकारों से अलग हैं, क्योंकि इन्हें साधारण कानून द्वारा बदला नहीं जा सकता; इसके लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता होती है।

अध्याय 3: समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)

यह अध्याय समानता के अधिकार पर केंद्रित है, जो अनुच्छेद 14 से 18 तक संविधान में वर्णित है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण की बात करता है, जिसका अर्थ है कि कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होंगे। अनुच्छेद 15 धर्म, मूल वंश, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को रोकता है। अनुच्छेद 16 रोजगार में अवसर की समानता सुनिश्चित करता है, जबकि अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता (छुआछूत) को समाप्त करता है, और अनुच्छेद 18 उपाधियों का अंत करता है।

अध्याय 4: प्रस्तावना में समानता और आरक्षण

यह अध्याय संविधान की प्रस्तावना में समानता के महत्व और आरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है। प्रस्तावना में प्रतिष्ठा की समानता और अवसर की समानता की बात की गई है। संविधान सरकार को बच्चों, महिलाओं और सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष योजनाएं बनाने की अनुमति देता है। आरक्षण अवसर की समानता को पूरा करने के लिए आवश्यक है, क्योंकि यह वंचित वर्गों को समान स्तर पर लाने में मदद करता है। संविधान निर्माताओं का मानना था कि आरक्षण के बिना, अवसर की समानता वास्तविक रूप से प्राप्त नहीं की जा सकती।

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Transcript

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0:00 बच्चों आज अपन अपनी पुस्तक भारत का संविधान सिद्धांत और व्यवहार की अध्याय संख्या दो भारतीय संविधान में अधिकार का अध्ययन करने जा रहे हैं अधिकार एक जाना माना सा शब्द लगता है बहुत बार बोलचाल में अपन कम में लेते हैं अधिकार भारतीय संविधान में अधिकार इसका क्या तात्पर्य है की भारतीय संविधान अपने नागरिकों को कौन-कौन से अधिकार देता है किस तरह के अधिकार देता है क्या आवश्यकता है इन अधिकारों की चलिए एक कहानी से शुरुआत करते हैं अपने इस अध्याय की कहानी नहीं का सकते एक तथ्यात्मक अपन कहे की घटना है ये बात है 1982 की 1982 में एशिया गेम्स का आयोजन होना था तो उससे पहले हमारी भारतीय सरकार

0:46 ने कुछ फ्लावर का निर्माण करने के लिए स्टेडियम का निर्माण करने के लिए कुछ ठेकेदारों की सेवाएं ली उन ठेकेदारों ने पूरे देश भर से निर्धन मिस्त्री और मजदूर को कहें पर उन्होंने अप्वॉइंट किया और उनकी सेवाएं ली उनसे बहुत ही कहीं की अपन अमानवीय परिस्थितियों में कार्य करवाया और उन्हें बहुत कम मजदूरी दिन कुछ सामाजिक कार्यकर्ता थे उन्होंने जब इसमें हस्तक्षेप किया न्यायालय में याचिका लगे और न्यायालय के सामने ये बात कहीं की अपन सिद्ध करने का प्रयास किया की हमारे संविधान द्वारा प्रदत शोषण के विरुद्ध अधिकार का यहां पर उलझन हो रहा है क्योंकि किसी को भी उसके परिश्रम मिक्स से यानी की

1:31 जितनी मजदूरी उसको न्यूनतम मिलनी चाहिए उससे कम मजदूरी पर कार्य करवाना एक तरह से बेगारी या फिर बंधवा मजदूरी है न्यायालय ने इस बात को माना और न्यायालय ने उसे सरकार को आदेश जारी किया की जो भी मिस्त्री और मजदूर थे उनको उनका उचित मेहनताना दिया जाए उनको उनकी उचित मजदूरी उनकी जो न्यूनतम देवी मजदूरी जो भी है वह उनको मिलने चाहिए यानी की शोषण के विरुद्ध अधिकार है इसको हमारी न्याय पालिका ने लागू करवाया और आदेश दिया किसको सरकार को तो सोचिए अगर ऐसे कोई अधिकार हमें संविधान ना देता तो क्या होता शोषण के विरुद्ध अधिकार ही नहीं और भी अधिकार हैं जो हमें

2:16 हमारा संविधान देता है और हमारा संविधान ही उन अधिकारों की सुरक्षा के प्रावधान भी करता है यही जानेंगे आज अपन अपने अध्याय में तो सबसे पहले तो अपन ये जानते हैं की इस अध्याय के अध्ययन के बाद आप किन-किन बटन का ज्ञान कर पाएंगे तो सबसे पहले तो आप ज्ञान कर पाएंगे भारतीय संविधान कौन-कौन से मौलिक अधिकार प्रधान करता है अपने नागरिकों को यानी की भारतीय संविधान के द्वारा कौन-कौन से मौलिक अधिकार हमें दिए जाते हैं उन अधिकारों को सुरक्षित कैसे किया जाता है उन अधिकारों की व्याख्या वी सुरक्षा करने में न्यायपालिका की क्या भूमिका रही है यानी की आज तक हमारा संविधान ग 1950 में तब से लेकर आज

3:02 तक उन मौलिक अधिकारों को लागू करने में हमारी न्यायपालिका ने क्या भूमिका निभाई ये अपन जान पाएंगे अब हम जान पाएंगे मलिक अधिकारों और राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में क्या अंतर है तो ये साड़ी बातें अपन जान पाएंगे इस पूरे अध्याय का अध्ययन करने के बाद में सबसे पहले अपन जानते हैं अधिकारों का घोषणा पत्र क्या होता है तो कोई भी ऐसा पत्र कोई भी ऐसा दस्तावेज जो की नागरिकों के अधिकारों की घोषणा करता है जो यह बताता है की कौन-कौन से अधिकार देश के नागरिकों को प्राप्त हैं या देश की नागरिकों को दिए जा रहे हैं और किस प्रकार उनकी व्यवहार में उनको लाया जा रहा है किस

3:49 प्रकार उनकी रक्षा की जा रही है तो इन सब बटन का प्रावधान जी दस्तावेज में है वह कहलाता है अधिकारों का घोषणा पत्र हम देखते हैं क्या होता है लोकतांत्रिक देश में लोकतांत्रिक देश में नागरिकों के अधिकारों को संविधान में सूचीबद्ध किया जाता है यहां ये बात महत्व पूर्ण है की अन्य जो शासन प्रणालियों हैं वहां आवश्यक नहीं है की नागरिकों को मूल अधिकार मिले या ना मिले लेकिन लोकतांत्रिक शासन प्रणाली जी देश में है वहां पर नागरिकों को कुछ मूल अधिकार जिनको मौलिक अधिकार भी कहा जाता है वो दिए जाते हैं यानी की वो संविधान सूचीबद्ध कर देता है की इस देश के नागरिकों को ये ये अधिकार मिलेंगे संविधान

4:36 द्वारा प्रधान किया गए और संरक्षित अधिकारों की ऐसी सूची को अधिकारों का घोषणा पत्र कहते हैं अभी मैंने आप लोगों को बताया ही था घोषणा पत्र क्या होता है संविधान द्वारा सूची पद ऐसी जो सूची होती है ऐसा जो दस्तावेज होता है वह अधिकारों का घोषणा पत्र कहलाता है नागरिक के अधिकारों को किसी अन्य व्यक्ति या निजी संगठन से खतरा हो सकता है तो सबसे बड़ी बात की अधिकारों का घोषणा पत्र तो चलो ठीक है हमारे संविधान ने दे दिया उसमें इस बात को तो सूचीबद्ध कर दिया गया की नागरिकों को कौन-कौन से अधिकार प्राप्त हैं लेकिन उन अधिकारों को खतरा हो सकता है किसी समूह से हो सकता है किसी निजी संगठन से हो सकता है या फिर किसी अन्य व्यक्ति से हो सकता है तो ये संविधान

5:22 इस बात का भी प्रावधान करता है की सरकार कौन-कौन से कार्य करके और संविधान के द्वारा दिए गए इन अधिकारों की रक्षा करेगी अब कई बार ऐसा होता है की सरकार के द्वारा भी अधिकारों को खतरा हो सकता है सरकार की तीन अंग हमारे कार्य पालिका न्यायपालिका और हमारी विधायक का तो इन किसी इन अंगों में से भी किसी अंग के द्वारा हमारे देश के नागरिकों के संविधान को खतरा हो सकता है उसकी संभावना को इनकार नहीं किया जा सकता तो इस बात की भी व्यवस्था हमारा संविधान करता है की इन सरकारे के द्वारा भी हमारे नागरिकों के जो मूल अधिकार हैं

6:07 वो संक्षिप्त रहे वो सुरक्षित रहे तो इस प्रकार के प्रावधान इसमें किया जाते हैं चलिए आगे देखते हैं भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार अपन चर्चा करते हैं की भारतीय संविधान में मूर्ख से मौलिक अधिकार हैं और किस प्रकार इनकी मांग उठाई गई चलिए अपन थोड़ा सा पीछे चलते हैं 1928 की जो नेहरू समिति की रिपोर्ट थी उसमें भी विदेशी सरकार से अधिकारों के घोषणा पत्र की मांग की गई थी यानी की आजादी से पहले ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के द्वारा जो की राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व कर रही थी उसके द्वारा भी ब्रिटिश सरकार से अधिकारों की मांग की जा रही थी की उसे सरकार को भी अधिकार देने चाहिए हमारे देश

6:53 के नागरिकों को यानी की जो हमारी संविधान सभा बनी उसे संविधान सभा में वही नेता थे उसे वक्त राष्ट्रीय आंदोलन के नेता थे तो वह लोग पूर्णतया प्रतिबंध थे इस बात के लिए की हमारे देश के नागरिकों को मूल अधिकार प्राप्त होने चाहिए तो हमारे संविधान में जो मूल संविधान था उसमें साथ मौलिक अधिकारों का समावेश किया गया था वर्तमान में हमारे संविधान में छह मौलिक अधिकार हैं देखते हैं वन 1928 में मोतीलाल नेहरू समिति ने अधिकारों के घोषणा पत्र की मांग उठाई थी संविधान में इन अधिकारों को मौलिक अधिकारों की संज्ञा दी गई है जो मूल अधिकार नागरिकों को दिए गए हैं संविधान में उन्हें हमारे संविधान में मौलिक

7:39 अधिकारों की संज्ञा दी गई है मौलिक अधिकार इतने महत्वपूर्ण है की इनकी रक्षा का प्रावधान भी स्वयं संविधान करता है यह एक बहुत इंपॉर्टेंट बात है जो की हमें याद रखती है की मौलिक अधिकारों की सुरक्षा कौन करता है इसका प्रावधान कौन करता है तो मौलिक अधिकारों की सुरक्षा का सावधान हमारे संविधान द्वारा किया गया है हमारा संविधान न्यायपालिका को कुछ ऐसी शक्तियां देता है कुछ इस तरह के प्रावधान करता है की हमारे मूल अधिकारों की रक्षा होती है देखते हैं मौलिक अधिकार मौलिक अधिकार जो कानूनी अधिकार है उनसे किस तरह से अलग है तो जो साधारण कानूनी अधिकार है वो साधारण कानून बनाकर लागू किया जा सकते हैं और

8:25 साधारण कानून के द्वारा ही उनको खत्म भी किया जा सकता है समाप्त भी किया जा सकता है उनमें कमी की जा शक्ति है उनमें बढ़ोतरी की जा शक्ति है लेकिन मूल अधिकारों से अलग हैं उन मूल अधिकारों में कोई भी कमी या फिर कोई कटौती या फिर उनका समाप्त करना यह कार्य हमारी सरकार साधारण कानून के द्वारा नहीं कर शक्ति तो कैसे कर शक्ति है केवल और केवल संविधान संशोधन के द्वारा केवल संविधान संशोधन के द्वारा ही मूल अधिकार में परिवर्तन संभव है यह मूल अधिकार हैं वो निरंकुश और अस्मित नहीं है भले ही यह हमारे संविधान में दिए गए हैं संविधान द्वारा संरक्षित हैं और संशोधन के द्वाराहिन में परिवर्तन किया जा

9:11 सकता है तो इस बात से स्पष्ट हो गया की यह निरंकुश नहीं है यह अस्मित नहीं है संविधान इनके ऊपर कुछ औचित्य पूर्ण प्रतिबंध भी लगाएं जा सकते हैं और किन-किन परिस्थितियों में किस प्रकार के प्रतिबंध इन पर लगाएं जा सकते हैं इस बात की व्याख्या भी हमारा संविधान करता है देखिए इनकी गारंटी है वो स्वयं संविधान देता है यानी की सभी नागरिकों को यह मौलिक अधिकार प्राप्त होंगे इस बात की गारंटी हमारे संविधान द्वारा दी जाति है सरकार के कार्यों से मौलिक अधिकारों के हनान को रोकने की जो शक्ति है वह न्यायपालिका के पास है यानी की सरकार भी अगर कोई ऐसा कार्य करें की जिससे नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनान हो रहा है तो उसको भी रोकने की शक्ति अभी-अभी मैंने आपको बताई

9:58 थी ये बात की उसको रोकने की शक्ति है वह न्यायपालिका को दी गई है हमारे संविधान में कुछ ऐसे प्रावधान हैं कुछ कहें की अपन ऐसे ही बटन का समावेश किया गया है की हमारी न्याय पालिका है वो यहां पर इस कार्य में समर्थ हो जाति है की सरकार द्वारा भी अगर मौलिक अधिकारों का हनान किया जा रहा हो तो वो हमारे मूल अधिकारों की रक्षा करने में सक्षम होगी यहां देखिए जैसे की अपुन ने बात की थी की सुरक्षा भी संविधान द्वारा यानी की मौलिक अधिकार हमें प्रदत भी संविधान द्वारा किया जा रहे हैं और इनकी सुरक्षा भी संविधान द्वारा की जा रही है और उसकी सुरक्षा के लिए हमारे संविधान ने हमारी न्याय पालिका को समर्थ बनाया है हमारी न्याय पालिका को शक्तियां

10:46 दी हैं आगे देखते हैं अपन सबसे पहले जो अपना अधिकार आता है वो आता है संता का अधिकार जो छह मूल अधिकार हैं संता का अधिकार दूसरा है स्वतंत्रता का अधिकार तीसरा है शोषण के विरुद्ध अधिकार धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार शिक्षा एवं संस्कृति का अधिकार और संवैधानिक उपचारों का अधिकार ये छह अधिकार हमारे मूल अधिकार हैं मौलिक अधिकार हैं संविधान में शामिल किया गए हैं एक और था संपत्ति का अधिकार वह भी हमारे जो मूल संविधान था उसमें मौलिक अधिकार के रूप में शामिल किया गया था लेकिन उसको हटाकर अब एक साधारण कानून अधिकार बना दिया गया है मूल अधिकार अब छह हैं तो इसमें जो पहले मूल अधिकार है संता का अधिकार वह

11:31 अपने जानते हैं क्या है संता का अधिकार संता यानी सामान्य का अधिकार ये हमारे संविधान में अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18 तक समाहित है यानी की अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18 तक है वह हमें सामान्य का अधिकार प्रधान करते हैं तो देखिए क्या कहता है अनुच्छेद 14 अनुच्छेद 14 यह कहता है की कानून के समक्ष सामान्य और कानून का सम्मान संरक्षण यानी की भारत के प्रत्येक नागरिक पर सारे के सारे कानून हैं वो समाज रूप से लागू होंगे और सबके लिए कानून समाज होंगे चाहे कोई गरीब हो चाहे कोई अमीर हो चाहे कोई नेता हो चाहे कोई राजा हो कोई कुछ भी हो लेकिन कानून सबके लिए समाज

12:17 होंगे यानी की कोई कानून जितना आप पर लागू होता है जितना आपके लिए है उतना ही वो हमारे देश के प्रधानमंत्री के लिए भी है राष्ट्रपति के लिए भी है हमारे देश के अमीर से अमीर व्यक्ति के लिए भी है गरीब से गरीब व्यक्ति के लिए भी है यानी की कानून के समक्ष सभी समाज हैं कानून सबके लिए समाज होगा समाज नियम होंगे समाज कायदे होंगे और समाज रूप से वो लागू भी किया जाएंगे अब चलते हैं अनुच्छेद 15 की और अनुच्छेद 15 में कहता है धर्म मूल वंश लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा धर्म के आधार पर मूल वंश के आधार पर जाति के आधार पर लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव किसी भी

13:03 नागरिक के साथ नहीं किया जाएगा इस बात का प्रावधान अनुच्छेद 15 करता है अगर किसी व्यक्ति के साथ इस तरह का भेदभाव किया जाता है तो वो इसके विरुद्ध न्यायालय में जा सकता है और न्यायालय द्वारा उसकी सनी की जाएगी और उसकी इस मौलिक अधिकार की रक्षा की जाएगी अनुच्छेद 16 कहता है रोजगार में अवसर की सामान्य छुआछूत का अंत यह है अनुच्छेद 17 और उपाधियां का अंत यह है अनुच्छेद 18 16 रोजगार में अवसर की सामान्य यानी की रोजगार प्राप्त करने के सब को समाज अवसर मिलेंगे लेकिन यहां अब बात उठ शक्ति है आरक्षण की फिर बाद में आरक्षण में ऐसा क्यों होता है वहां कैसे

13:48 अवसरों की सामान्य रही तो हमारे संविधान निर्माता ने इसकी व्याख्या भी बहुत अच्छे से की है अपन ने जो अपना दूसरा खंड है राजनीति विज्ञान का उसके अंदर अपन पढ़ेंगे एक जो सबसे पहले चैप्टर है की विशेष परिस्थितियों के साथ विशेष वार्ताओं यानी की कोई अधिक वंचित वर्ग है जिसको की बहुत ज्यादा आवश्यकता है तो उसके लिए थोड़ा सा सहयोग या फिर कुछ विशेष साधन जुटे जा सकते हैं ताकि वो भी सामान्य के स्टार पर ए सके सामान्य का जो कहें की अपन अधिकार है उसका उपभोग कर सके तो इसलिए जो पिछड़ी वर्ग हैं जो वंचित वर्ग है अल में उनको समानता की स्टार पर लाने के लिए ही आरक्षण की व्यवस्था की गई है तो जो आरक्षण की

14:35 व्यवस्था है वो सामान्य अवसर की सामान्य के लिए एक कहे की अपन पूरक का ही कार्य करती है उसको बढ़नी ही है उसमें कोई अवरोध या बड़ा उत्पन्न नहीं करती है इस क्षमता जिसको छुआछूत भी कहा जाता है हम सभी जानते हैं की हमारे भारत में यह एक बहुत बड़ी सामाजिक बुराई रही है छुआछूत इसका भी अंत हमारे संविधान द्वारा किया गया है ये किसी के साथ भी अगर छुआछूत का बर्ट किया जाएगा तो उसके विरुद्ध भी कानून कार्यवाही हो शक्ति है उपादियों का अंत शिक्षा और सी से जुड़ी उपाधियां के शिवाय किसी भी व्यक्ति को कोई उपाधि नहीं दी जाएगी पहले बड़ी-बड़ी उपाधियां दी जाति थी किसी को राजा की उपाधि किसी को राज की उपाधि किसी को महाराजा की उपाधि तो असमानता के स्टार

15:21 को प्राप्त करने के लिए सबको सामान्य का दर्ज देने के लिए अनुच्छेद 18 इन उपाधियां का अंत करता है तो यह था हमारा सामान्य का अधिकार जो हमें हमारा संविधान देता है दिखाना आपने किस तरह से धर्म वंश लिंग जाति आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता किस तरह से कानून के समक्ष सभी लोग समाज हैं सबको अवसरों की समाज अप होगी रोजगार में अस्पृश्यता का अंत है और उपाधियां का अंत है और यह है हमारा सामान्य का मूल अधिकार जो की हमें हमारा संविधान प्रधान करता है और इसकी रक्षा किस तरह से करता ही करती है हमारी न्यायपालिका ये भी अपन जान लेंगे अपने इसी चैप्टर के अंदर सबसे पहले अपन बात कर लेते हैं हमारी

16:08 देश की प्रस्तावना की हमारे भारतीय संविधान की जो प्रस्तावना है उसकी जो सामान्य का मूल अधिकार हमें दिया गया है ये मूल अधिकारों के अंतर्गत तो है ही है बाकी इसके शिवाय प्रस्तावना में भी दो-तीन बार सामान्य शब्द का इस्तेमाल किया गया है तो देखते हैं अपन प्रतिष्ठा के सामान्य और अवसर की सामान्य इन दो बटन का समावेश किया गया है हमारे जो संविधान की प्रस्तावना है उसमें एक तो कहा गया है प्रतिष्ठा की सामान्य यह बड़ी महत्वपूर्ण बात है प्रतिष्ठा की सामान्य मतलब क्या मतलब की कोई भी व्यक्ति मनुष्य होने के नाइट ही वह एक तरह अपन कहें की गरिमापूर्ण आचरण का अधिकारी हो जाता है तो प्रत्येक व्यक्ति के साथ उसकी प्रतिष्ठा का मां सम्मान किया

16:55 जाए उसकी गरिमा का ध्यान रखा जाए और एक मनुष्य होने के नाइट ही उसको एक सम्मान की दृष्टि से देखा जाए तो वो प्रतिष्ठा के समानता अवसर की सामान्य पैन जानी थी रोजगार में अवसर की सामान्य समाज के सभी वर्गों को समाज अवसर मिले हमारे प्रस्तावना की मूल भावना रही है की समाज में जितने भी वर्ग हैं जैसे की अपन ने सामान्य के अधिकार में भी पढ़ा था की ना तो धर्म के नाम पर किसी के साथ कोई भेदभाव होना चाहिए ना जाति के नाम पर होना चाहिए ना वंश के नाम पर होना चाहिए ना लिंग के नाम पर होना चाहिए मतलब की इन किसी भी आधारों में से किसी भी आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए तो यही मूल भावना हमारे संविधान की प्रस्तावना की भी है संविधान

17:41 स्पष्ट करता है की सरकार बच्चों महिलाओं तथा सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी वर्गों की बेहतरीन के लिए विशेष योजनाएं वी निर्णय लागू कर शक्ति है वही ए गई ना आरक्षण वाली बात की भाई आरक्षण लागू होता है तो उसके लिए बाद में किस प्रकार से अपन का सकते हैं की सबके लिए समाज अवसर है तो यहां हमारा संविधान ये कहता है की जो पिछड़ा वर्ग है चाहे वो महिलाएं हैं चाहे वो कोई पिछड़ी जाति है तो उन सबको सामान्य के स्टार पर लाने के लिए उनके जीवन स्टार को ऊंचा उठाने के लिए सरकार है वो कुछ विशेष प्रावधान कर शक्ति है इस बात की छठ हमारे संविधान द्वारा ही दी जाति है आरक्षण अवसर की सामान्य के अधिकार को पूरा

18:26 करने के लिए जरूरी है जैसे की अभी अपन ने बात भी की थी की जो अवसर की सामान्य है वो तभी पुरी हो पाएगी जब आरक्षण की व्यवस्था को लागू किया जाएगा अपन बात कर रहे हैं उसे वक्त की जब हमारा संविधान बन रहा था और जब आरक्षण की व्यवस्था उसे मूल संविधान में की तैयार रही थी तब संविधान निर्माता की यह सोच थी की अगर अपन अवसर की सामान्य दे रहे हैं तो इसके लिए हमें आरक्षण की व्यवस्था करनी पड़ेगी कैसे करनी पड़ेगी की कुछ तब के इतने वंचित थे की वह ना तो शिक्षा की पहुंच तक थे समाज में भी वो एक अपेक्षित वर्ग थे आर्थिक रूप से भी वो बहुत ज्यादा गरीब थे तो ऐसे वर्गों को ऊंचा उठाने के लिए की भाई ठीक है रोजगार

19:12 के लिए मां लीजिए की भारती तो निकाल दी या फिर मां लीजिए की स्कूल तो खोल दी सबके लिए लेकिन वह ऐसा वंचित वर्ग है ऐसा गरीब वर्ग है ऐसा अपेक्षित वर्ग है की वो स्कूल तक ही नहीं पहुंच का रहा है की वो जो रोजगार के लिए भारती निकली है उनके लिए आवेदन ही नहीं कर का रहा है तो फिर अवसर की सामान्य उसे प्राप्त नहीं हो रही है तो उसे वर्ग को भी अवसर की सामान्य देने के लिए हमारे संविधान निर्माता ने आरक्षण की व्यवस्था की थी तो ये था हमारा समानता का अधिकार की किस तरह से हमारा यार हमारा संविधान सॉरी हमारा संविधान इस बात की व्यवस्था करता है की समाज में किसी भी व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होगा किसी भी व्यक्ति के साथ

19:59 धर्म मूल वंश लिंग जाति आदि के आधार पर कोई दुर्व्यवहार नहीं किया जाएगा सबको अवसरों की सामान्य प्राप्त होगी सबको समाज अवसर मिलेंगे कानून सबके लिए समाज होंगे कोई विशेष अधिकार प्राप्त वर्ग समाज में नहीं होगा तो एक तरह से हमारे नागरिकों को सामान्य का मतलब की समाज में एक बहुत अच्छी खासी सामान्य हर स्टार पर चाहे वो सामाजिक स्थिति है चाहे वो आर्थिक स्थिति है इस तरह का प्रयास हमारे संविधान द्वारा किया गया है अभी जो अपन ने पढ़ाई इस वीडियो में इसके अपन ले लेते हैं अब दो प्रश्न पहले क्वेश्चन है की भारतीय संविधान में मूल्य का अधिकार और कानूनी अधिकार में क्या अंतर है इसके बड़े में पढ़ने जाना ही था की जो कानूनी अधिकार हैं उनको सरकार कानून बनाकर लागू कर शक्ति है

20:46 बनाकर हटा शक्ति है कानून बनाकर उसमें अपन कहें की कटौती कर शक्ति है बढ़ोतरी कर शक्ति है लेकिन मूल अधिकारों में सरकार ऐसा कुछ नहीं कर शक्ति मूल अधिकारों में ऐसा कुछ परिवर्तन करने के लिए सरकार को संविधान में संशोधन करना पड़ेगा सामान्य का मूल अधिकार क्या है वर्णन कीजिए यह भी अभी अभी अपन ने पढ़ा की हमारा संविधान अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18 तक सामान्य का अधिकार प्रत्येक देश के नागरिक को प्रधान करता है अगले वीडियो में अपन पढ़ेंगे अपना अगला अधिकार जो है स्वतंत्रता का अधिकार धन्यवाद

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