0:00 मेरे प्रिय आत्मन क्या तुमने कभी इस बात पर गौर किया है? कभी इस गहरे सन्नाटे में अपने भीतर झांक कर देखा है कि जिस क्षण तुम सृजन के शिखर पर होते हो, जिस क्षण तुम्हें लगता है कि तुम जीवन का सबसे बड़ा सुख भोग रहे हो। ठीक उसी क्षण तुम मृत्यु के सबसे करीब भी खड़े होते हो। तुम्हें लगता है कि यह महज एक शारीरिक क्रिया है। तुम्हें लगता है कि यह शरीर की एक जरूरत है जिसे पूरा करके तुम हल्का महसूस करते हो। लेकिन क्या तुम जानते हो कि जिसे तुम राहत कहते हो, जिसे तुम कुछ पलों का मजा कहते हो, वह दरअसल तुम्हारे अपने ही अस्तित्व का, तुम्हारे अपने ही मस्तिष्क का, तुम्हारे अपने ही भेजे का निचोड़ कर
0:47 बाहर फेंक दिया जाना है। आज मैं तुमसे उस विज्ञान की बात करने जा रहा हूं जो विज्ञान की प्रयोगशालाओं में भी अभी पूरी तरह से नहीं उतरा है। लेकिन तुम्हारे दृश्यों ने, तुम्हारे मनीष्यों ने हजारों साल पहले अपनी अंतर्दृष्टि से उसे देख लिया था। विज्ञान आज हैरान है। आधुनिक चिकित्सा शास्त्र आज स्तब्ध खड़ा है। एक ऐसे तथ्य के सामने जिसे झूठ लाया नहीं जा सकता। और वह तथ्य यह है कि तुम्हारे शरीर की वह सफेद ऊर्जा, वह बीज जिसे तुम इतनी आसानी से नालियों में बहा देते हो और तुम्हारी रीड की हड्डी के भीतर बहने वाला वह पवित्र पानी, वह द्रव, उन दोनों का रासायनिक ढांचा, उन दोनों की बनावट, उन
1:36 दोनों का स्वभाव एक जैसा क्यों है? प्रकृति कभी कोई संयोग नहीं करती। प्रकृति व्यर्थ के खेल नहीं खेलती। अगर उसने वीर्य को और मस्तिष्क के उस द्रव को एक जैसा बनाया है तो उसके पीछे एक बहुत गहरा राज छिपा है। एक ऐसा राज जो अगर तुम्हारी समझ में आ गया तो तुम इंसान से देवता होने की यात्रा पर निकल पड़ोगे। और अगर समझ में नहीं आया तो तुम महज एक मशीन बनकर रह जाओगे। एक ऐसी मशीन जो भोजन को गोबर में बदलने के अलावा और कुछ नहीं करती। जरा सोचो तुम्हारे मस्तिष्क को प्रकृति ने सबसे सुरक्षित तिजोरी में रखा है। खोपड़ी
2:22 की मजबूत हड्डियों के नीचे और वहां भी वह सूखा नहीं रखा गया है। तुम्हारा दिमाग तुम्हारा मस्तिष्क एक विशेष प्रकार के तरल पदार्थ में एक विशेष प्रकार के पानी में तैर रहा है। विज्ञान इसे अपनी भाषा में कुछ भी कहे लेकिन योग की भाषा में यह वही सोम रस है। यह वही ऊर्जा है जो अगर नीचे बहे तो जीवन का जन्म देती है और अगर ऊपर चढ़े तो तुम्हें नया जन्म देती है। समस्या यह है कि तुम्हें कभी किसी ने बताया ही नहीं कि तुम्हारे भीतर खजाना कहां है। तुम भिखारी की तरह बाहर कटोरा लेकर सुख मांग रहे हो। जबकि तुम्हारे भीतर ही वह रसायन बन रहा है जो तुम्हें सम्राट बना सकता है। आज हम इस भ्रम को तोड़ेंगे। आज हम शरीर के
3:12 उस रसायन शास्त्र में उतरेंगे जिसे समझना हर उस व्यक्ति के लिए अनिवार्य है जो होश में जीना चाहता है। तुम जिसे काम वासना कहते हो, तुम जिसे सेक्स कहते हो वह सिर्फ दो शरीरों का मिलन नहीं है। वह तुम्हारे शरीर की पूरी मशीनरी का तुम्हारे रोएं रोएं की मेहनत का परिणाम है। कभी तुमने सोचा है कि जो भोजन तुम करते हो उसका होता क्या है? तुम खाना खाते हो। शरीर उसे पचाता है। वह भोजन पहले रस बनता है। फिर उस रस से रक्त बनता है। खून बनता है। उस खून को शरीर और पकाता है और तपाता है। तब जाकर मांस बनता है। मांस से मज्जा बनती
3:57 है। मेद बनता है। हड्डियां बनती हैं। और जब यह सारी प्रक्रिया पूरी हो जाती है। जब शरीर अपनी पूरी क्षमता, अपनी पूरी अग्नि लगा देता है। तब अंत में सबसे आखिर में जो सार तत्व निकलता है, जो इस पूरे शरीर का निचोड़ है, वह वीर्य बनता है। यह एक दिन की कमाई नहीं है। वैज्ञानिक कहते हैं और तुम्हारे आयुर्वेद के ग्रंथ भी यही कहते हैं कि भोजन को वीर्य बनने में महीनों का समय लगता है। इसे एक उदाहरण से समझो। जैसे एक किसान गन्ने के खेत में खड़ा है। हजारों गन्ने हैं। वह उन सबको काटता है। उन्हें कोलहू में डालता है। उन हजारों गन्नों को पेर कर जो रस निकलता है, वह अभी
4:44 भी बहुत पानी जैसा है। फिर वह उसे कढ़ाई में चढ़ाता है। उसे घंटों तक आग पर तपाता है। सारा पानी जल जाता है। तब जाकर नीचे थोड़ा सा गुड़ या शक्कर बचती है। वीर्य तुम्हारे शरीर की वही शक्कर है वही अंतिम सार है और तुम क्या कर रहे हो तुम उस सार को जिसे बनाने में तुम्हारे शरीर के एक-एक सेल ने एक-एक कोशिका ने काम किया। तुम उसे एक पल के झटके में एक छोटी सी सिहरन के लिए बाहर फेंक देते हो। और जब तुम उसे फेंक देते हो, तो तुम कहते हो मुझे बड़ा हल्का महसूस हो रहा है। यह हल्कापन नहीं है। यह खालीपन है। यह दिवालियापन है। तुमने अपनी तिजोरी खाली कर दी और तुम्हें
5:29 लग रहा है कि बोझ उतर गया। बोझ नहीं उतरा। तुम अपनी शक्ति खो बैठे। अब यहां एक बहुत गहरी बात समझनी होगी। और इसे बहुत ध्यान से सुनना। क्योंकि यही वह मोड़ है जहां आदमी चूक जाता है। तुम्हारे वीर्य में और तुम्हारे नर्वस सिस्टम में तुम्हारे स्नायु तंत्र में एक गहरा संबंध है। आधुनिक विज्ञान ने जब वीर्य का विश्लेषण किया जब उन्होंने माइक्रोस्कोप के नीचे रखकर देखा कि इसमें क्या है तो उन्हें वही तत्व मिले जो तुम्हारे दिमाग की कोशिकाओं में पाए जाते हैं। लेसीथिन फास्फोरस और बहुत से ऐसे सूक्ष्म प्रोटीन जो केवल और केवल मस्तिष्क के निर्माण में काम आते हैं। लेसीथिन और फास्फोरस ये दो नाम याद
6:18 रखना। यह वे तत्व हैं जो तुम्हारी नसों के तार हैं। जैसे बिजली के तार में तांबा होता है वैसे ही तुम्हारी नसों में। जिससे तुम सोचते हो, जिससे तुम महसूस करते हो, जिससे तुम्हारी याददाश्त बनती है, वह सब इन्हीं तत्वों से बना है। अब गणित बिल्कुल सीधा है और बड़ा क्रूर है। शरीर के पास फास्फोरस का भंडार सीमित है। तुम जो खाते हो, उससे शरीर थोड़ा सा फास्फोरस निकालता है। अब शरीर के सामने दो रास्ते हैं। या तो वह उस फास्फोरस को उस कीमती रसायन को तुम्हारे दिमाग को दे दे ताकि तुम्हारी बुद्धि कुशाग्र हो तुम्हारी याददाश्त तेज
7:05 हो तुम्हारे चेहरे पर एक ओझ हो एक तेज हो या फिर वह उस फास्फोरस को इकट्ठा करके वीर्य के रूप में नीचे बहा दें। ज्यादातर लोग 99% लोग दूसरे रास्ते पर हैं। वे अपने दिमाग का भोजन अपनी जनेंद्रियों से बाहर फेंक रहे हैं। इसीलिए तुम पाओगे कि जैसे-जैसे व्यक्ति काम वासना में ज्यादा लिप्त होता जाता है। उसकी बुद्धि मोटी होती जाती है। उसे चीजें याद नहीं रहती। उसके भीतर एक धुंध छा जाती है। आज की युवा पीढ़ी जिस समस्या से सबसे ज्यादा जूझ रही है, वह है ब्रेन फोग दिमाग में कोहरा। सब कुछ धुंधला
7:51 है। निर्णय नहीं ले पाते। आत्मविश्वास की कमी है। छोटी-छोटी बातों पर घबराहट होती है। क्यों? क्योंकि जिस इंजन को पेट्रोल चाहिए था, तुमने उसका पेट्रोल तो जमीन पर गिरा दिया। अब तुम धक्के मार रहे हो। तुम्हारा दिमाग सूखा पड़ा है। जिस द्रव में जिस तरल में तुम्हारे मस्तिष्क को तैरना चाहिए था, वह स्तर नीचे गिर गया है। इसे ऐसे समझो कि एक तालाब था जिसमें कमल खिले थे। तुमने तालाब का पानी नाली खोलकर बहा दिया। अब पानी नहीं है तो कमल तो मुरझाएंगे ही। कमल तो सड़ेंगे ही। तुम्हारा दिमाग आज उसी सूखे तालाब की तरह हो गया है। तुम शिकायत करते हो कि पढ़ाई
8:38 में मन नहीं लगता। तुम शिकायत करते हो कि ध्यान नहीं लगता। ध्यान लगेगा कैसे? ध्यान के लिए ऊर्जा चाहिए। ध्यान कोई थोथी बात नहीं है। ध्यान के लिए एक जबरदस्त ऊर्जा का प्रवाह चाहिए जो ऊपर की तरफ जाए और तुम्हारे पास ऊर्जा ही नहीं बची। तुम तो रोज अपनी बैटरी डिस्चार्ज कर देते हो और फिर तुम उम्मीद करते हो कि बल्ब जलेगा बल्ब नहीं जल सकता। प्रकृति का नियम बड़ा निष्ठुर है। वो तुम्हें नहीं रोकेगी। अगर तुम गड्ढे में गिरना चाहते हो तो गुरुत्वाकर्षण तुम्हें नीचे खींचने के लिए तैयार है। पानी हमेशा नीचे की तरफ बहता है। यह उसका स्वभाव है। वीर्य भी ऊर्जा भी हमेशा नीचे की तरफ बहना चाहती है। क्योंकि
9:24 वहां ढलान है। वहां जाना आसान है। बच्चे पैदा कर लेना बहुत आसान है। काम वासना में बह जाना बहुत आसान है। जानवर भी यही कर रहे हैं। पशु पक्षी भी यही कर रहे हैं। इसमें कोई विशिष्टता नहीं है। लेकिन अगर तुम्हें ऊपर उठना है तो तुम्हें गुरुत्वाकर्षण के नियम के खिलाफ जाना होगा। तुम्हें पानी को ऊपर चढ़ाना होगा। और यही वह विज्ञान है जो इंसान को जानवर से अलग करता है। जरा अपने शरीर की व्यवस्था को देखो। रीढ़ की हड्डी तुम्हारे शरीर का मेरुदंड। यह सिर्फ हड्डियों की एक माला नहीं है जो तुम्हें सीधा खड़ा रखती है। यह एक सीढ़ी है। यह पृथ्वी से स्वर्ग तक जाने की सीढ़ी है। और इस सीढ़ी के भीतर
10:11 एक रास्ता है। एक बहुत बारीक नाली है। जिससे होकर ऊर्जा ऊपर जा सकती है। जब वीर्य शरीर में बनता है और उसका उपयोग संतान उत्पत्ति के लिए नहीं किया जाता तो शरीर क्या करता है? क्या वह उसे सड़ा देता है? नहीं। अगर शरीर स्वस्थ है और ऊर्जा का प्रवाह सही है तो एक चमत्कार घटित होता है। उसे ही योग में उर्ध्वेयता होना कहते हैं। लेकिन इससे पहले कि हम उस चमत्कार की बात करें। तुम्हें अपनी बीमारी को और गहराई से समझना होगा। तुम जिसे प्रेम कहते हो, वह अक्सर सिर्फ हवस होती है। और हवस का मतलब है दूसरे का उपयोग करके अपने भीतर
10:58 की खांच खुजा लेना। जब वीर्य का स्खलन होता है, जब वह ऊर्जा शरीर से बाहर निकलती है, तो शरीर को एक झटका लगता है। तुमने महसूस किया होगा उस क्रिया के बाद एक गहरी उदासी छा जाती है। लैटिन में एक कहावत है हर जीव सहवास के बाद उदास होता है। क्यों? क्योंकि तुमने अपने जीवन का एक अंश खो दिया। तुमने अपनी मृत्यु को थोड़ा करीब बुला लिया। आयुर्वेद स्पष्ट कहता है मरणम बिंदु पातेन जीवनम बिंदु धारणात बिंदु का गिरना वीर्य का गिरना मृत्यु है और बिंदु को धारण कर लेना उसे ऊपर उठा लेना ही जीवन है। यह कोई नैतिक शिक्षा नहीं है। मैं तुम्हें कोई नैतिकता नहीं सिखा रहा। मैं
11:43 तुम्हें यह नहीं कह रहा कि यह पाप है। पाप पुण्य की भाषा मैं नहीं बोलता। मैं विज्ञान की भाषा बोलता हूं। मैं कारण और परिणाम की भाषा बोलता हूं। अगर तुम हाथ आग में डालोगे तो हाथ जलेगा। यह पाप नहीं है। यह विज्ञान है। उसी तरह अगर तुम अपनी जीवन ऊर्जा को, अपने वाइट ब्लड को, अपने सफेद रक्त को क्योंकि वीर्य और कुछ नहीं। तुम्हारा सफेद खून है। अगर तुम उसे यूं ही बहाते रहोगे तो तुम मानसिक रूप से, शारीरिक रूप से और आत्मिक रूप से कंगाल हो जाओगे। तुम्हारे भीतर जो चिड़चिड़ापन है, जो बात-बात पर गुस्सा आता है, वह और कुछ नहीं। तुम्हारे नर्वस सिस्टम की कमजोरी
12:29 है। तुम्हारी नसें कमजोर हो गई हैं क्योंकि उनका भोजन वह लेसीथिन और फास्फोरस जो उन्हें चिकनाई देता था, जो उन्हें ताकत देता था, वह तो तुम बहा आए। अब सूखी नसें आपस में रगड़ खा रही हैं। जैसे मशीन में तेल ना हो तो वह आवाज करती है। गर्म हो जाती है। वैसे ही तुम्हारा दिमाग गर्म हो रहा है। तुम डिप्रेशन की बात करते हो। डिप्रेशन क्या है? ऊर्जा का निम्न स्तर पर होना। जब तुम्हारे पास ऊर्जा ही नहीं है तो तुम उत्साह कहां से लाओगे? उत्साह के लिए उमंग के लिए भीतर एक भरा पूरापन चाहिए। एक योगी की आंखों में देखो। एक ऐसे व्यक्ति की आंखों में देखो जिसने अपनी
13:17 ऊर्जा को संभाला है। उसकी आंखें तुम्हें चुंबक की तरह खींचेंग। उसके पास बैठना तुम्हें अच्छा लगेगा। वह कुछ ना भी बोले तो भी उसकी मौजूदगी में तुम्हें शांति मिलेगी। क्यों? क्योंकि उसका बायो इलेक्ट्रिसिटी का सर्किट, उसकी जैव विद्युत का परिपथ पूरा हो गया है। उसका बल्ब पूरी रोशनी से जल रहा है और तुम तुम्हारा बल्ब टिमटिमा रहा है। कभी जलता है कभी बुझता है। क्योंकि वोल्टेज ही नहीं है। यह जो रीड की हड्डी का पानी है जिसे डॉक्टर सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड कहते हैं। यह वही कच्चा माल है जिससे तुम्हारा दिमाग काम करता है। और वीर्य इसी का सघन रूप है।
14:04 जब तुम वीर्य बचाते हो तो शरीर उसे वापस सोख लेता है। इसे रिअ्सॉर्प्शन कहते हैं। वह वापस खून में मिलता है, लेकिन अब वह साधारण खून नहीं रहता। अब वह ओजस बन जाता है। वह एक सूक्ष्म ऊर्जा बन जाती है जो सीधे तुम्हारे मस्तिष्क को, तुम्हारे पीनियल ग्लैंड को, तुम्हारी तीसरी आंख को पोषण देती है। लेकिन आज की स्थिति क्या है? आज आदमी डर में जी रहा है। उसे लगता है कि अगर उसने सेक्स नहीं किया तो उसे कोई बीमारी हो जाएगी। उसे लगता है कि वीर्य अगर बाहर नहीं निकला तो वह दिमाग में चढ़ जाएगा और पागल कर देगा। यह सब भ्रांतियां हैं जो उन लोगों ने फैलाई हैं जो तुम्हें कमजोर रखना चाहते हैं। बाजार
14:50 चाहता है कि तुम कमजोर रहो क्योंकि तुम कमजोर रहोगे तो तुम उनकी दवाइयां खरीदोगे। तुम उनके मनोरंजन के साधन खरीदोगे। तुम पोर्नोग्राफी खरीदोगे। एक शक्तिशाली व्यक्ति, एक ऊर्जावान व्यक्ति बाजार का गुलाम नहीं होता। वह अपना मालिक खुद होता है। तुम्हें समझना होगा कि यह शरीर एक अद्भुत यंत्र है। इसमें रूपांतरण की क्षमता है। कोयला ही हीरा बनता है। कोयले और हीरे में रासायनिक रूप से कोई फर्क नहीं है। दोनों कार्बन है। बस फर्क इतना है कि कोयला कच्चा है और हीरा वह है जो बहुत दबाव और बहुत ताप में पक गया है। वीर्य तुम्हारा कोयला है। अगर यह नीचे गिर
15:37 गया, तो यह कोयला बनकर रह जाएगा। राख हो जाएगा। लेकिन अगर यह तप की आग में जागरूकता की आग में तप गया और रीड की हड्डी के रास्ते ऊपर चढ़ गया तो यही हीरा बन जाता है। यही अमृत बन जाता है। पुराने जमाने में दृश्यों ने इसे अमृत कहा। उन्होंने कहा कि सिर के भीतर तालू के ऊपर से अमृत टपकता है। लोग समझते हैं कि यह कोई कविता है। यह कविता नहीं है। यह शरीर क्रिया विज्ञान का एक तथ्य है। जब तुम्हारी यौन ऊर्जा पूरी तरह से मस्तिष्क में पहुंच जाती है तो वहां की ग्रंथियां एक विशेष प्रकार का स्राव करती हैं। वह स्राव इतना आनंददायक होता है, इतना नशीला
16:24 होता है कि उसके सामने शराब, ड्रग्स या सेक्स का सुख फीका पड़ जाता है। उसे ही संतों ने राम रस कहा है। उसे ही अमृत कहा है और तुम उस अमृत के सागर के किनारे प्यासे मर रहे हो। तुमने अपने ही हाथों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है। और मजे की बात यह है कि तुम कुल्हाड़ी मारने को ही जीवन का आनंद समझ रहे हो। जब तक तुम इस बुनियादी भूल को नहीं सुधारोगे तब तक कोई ध्यान, कोई पूजा, कोई प्रार्थना काम नहीं आने वाली। क्योंकि प्रार्थना करने के लिए भी होश चाहिए और होश के लिए ऊर्जा चाहिए। मेरी बात को गौर से समझना। मैं तुम्हें सेक्स विरोधी नहीं बना रहा हूं। मैं
17:11 तुम्हें सेक्स से ऊपर उठने की बात कह रहा हूं। और ऊपर वही उठ सकता है जिसके पास सीढ़ी हो। तुमने अपनी सीढ़ी ही जला दी है तापने के लिए। अब तुम खड़े होकर रो रहे हो कि मैं ऊपर कैसे जाऊं। यह जो तुम्हारे भीतर घबराहट है, यह जो आत्मविश्वास की कमी है, यह जो तुम लोगों की आंखों में आंखें डालकर बात नहीं कर पाते, इसका कारण मनोवैज्ञानिक नहीं है। इसका कारण जीव वैज्ञानिक है। तुम्हारी जड़े सूख गई। एक पेड़ जिसकी जड़ों में पानी ना हो उसके पत्ते तो पीले पड़ेंगे ही। तुम पत्तों पर हरा रंग पोतने की कोशिश कर रहे हो। तुम मोटिवेशनल वीडियो देखते हो। तुम किताबें पढ़ते हो कि कॉन्फिडेंस कैसे बढ़ाएं? अरे
17:59 कॉन्फिडेंस कोई बाजार में मिलने वाली चीज नहीं है। कॉन्फिडेंस तुम्हारे भीतर की ऊर्जा की गूंज है। जब भीतर ऊर्जा लबालब भरी होती है तो कॉन्फिडेंस अपने आप आता है। उसे बुलाना नहीं पड़ता। शेर कभी कॉन्फिडेंस की क्लास लेने नहीं जाता। उसकी ताकत ही उसका कॉन्फिडेंस है। तुमने अपनी ताकत गवाह दी है। और अब तुम समाज के सामने एक मुखौटा लगाकर जी रहे हो। लेकिन इस मुखौटे के पीछे एक डरा हुआ थका हुआ इंसान है। एक ऐसा इंसान जिसका दिमाग अब साथ नहीं दे रहा जिसे बातें याद नहीं रहती। जो कोई भी गहरा चिंतन करने में असमर्थ है। कोई भी बड़ा काम करने के लिए चाहे वह व्यापार हो,
18:44 कला हो या विज्ञान हो। एक एकाग्रता की जरूरत होती है। और एकाग्रता का मतलब है सारी ऊर्जा का एक बिंदु पर इकट्ठा हो जाना। लेकिन तुम्हारी ऊर्जा तो छिद्रित घड़े, काले घड़े जिसमें छेद हो की तरह है। तुम कितना भी भर लो वह नीचे से बह ही जाएगा। इसलिए सबसे पहले इस बात को स्वीकार करो कि तुम अब तक जो करते आए हो वह तुम्हारे ही खिलाफ था। यह शरीर तुम्हारा मंदिर है और तुमने इसे कूड़ा घर बना दिया है। लेकिन अभी भी देर नहीं हुई है। जब तक सांस है तब तक संभावना है। यह विज्ञान इतना सटीक है कि अगर तुम आज से अभी से सही
19:31 दिशा में मुड़ जाओ तो तुम्हारा शरीर अपनी मरम्मत खुद कर लेगा। तुम्हारा मस्तिष्क फिर से उसी द्रव से भर जाएगा। वह सूखापन खत्म हो जाएगा। वह धुंध छंट जाएगी। लेकिन उसके लिए तुम्हें उस प्रक्रिया को समझना होगा। उस कीमिया को समझना होगा जो वीर्य को ओजस में बदलती है। वो कीमिया क्या है? वह ऊपर उठने का विज्ञान क्या है? यह केवल रोकने की बात नहीं है। अगर तुमने सिर्फ रोक लिया और उसे ऊपर जाने का रास्ता नहीं दिया तो वह सड़ जाएगा। वह तुम्हें बीमार कर देगा। इसलिए बहुत से लोग जो ब्रह्मचर्य का पालन बिना समझ के करते हैं, वे विक्षिप्त हो जाते हैं। पागल हो जाते हैं।
20:17 ऊर्जा को रुकना नहीं है। ऊर्जा को बहना है लेकिन नीचे नहीं। ऊपर मेरे प्रिय आत्मन अब हम उस यात्रा पर कदम रख रहे हैं जो पशु को परमात्मा बनाती है। अब तक हमने बात की कि तुम कैसे लूट रहे हो। कैसे तुम अपनी ही संपदा को नालियों में बहा रहे हो। अब हम बात करेंगे कि उस संपदा को उस ऊर्जा को कैसे बचाया जाए और सिर्फ बचाया ही ना जाए बल्कि उसे कैसे रूपांतरित किया जाए। क्योंकि याद रखना ऊर्जा को केवल बचाना काफी नहीं है। अगर तुमने पानी को सिर्फ रोक दिया, बांध बना दिया तो वह पानी सड़ जाएगा। उसमें कीड़े पड़ जाएंगे। पानी को
21:02 बहना चाहिए। अगर वह नीचे नहीं बहेगा तो उसे ऊपर बहना होगा। ठहराव मृत्यु है। प्रवाह जीवन है। तुम्हारे शरीर के बीचों बीच जो रीड की हड्डी है जिसे हम मेरुदंड कहते हैं। वह केवल हड्डियों का एक ढांचा नहीं है। वह तुम्हारे जीवन का सबसे बड़ा राजमार्ग है। वह वह रास्ता है जो नर्क को स्वर्ग से जोड़ता है। जो मूलाधार को सहस्रार से जोड़ता है। मूलाधार जहां तुम्हारी सेक्स ऊर्जा तुम्हारी काम वासना सोई पड़ी है। जैसे एक कुंडली मारे हुए सांप और सहस्त्रार जो तुम्हारे मस्तिष्क के सबसे ऊपरी हिस्से में है जहां चेतना का हजार पंखुड़ियों वाला कमल खिलता
21:49 है। विज्ञान कहता है कि रीड की हड्डी के अंदर एक बहुत बारीक नली है। डॉक्टर उसे स्पाइनल कॉर्ड कहते हैं। लेकिन योग उसे सुषुम्ना कहता है। यह सुषुम्ना ही वह तार है जिससे बिजली ऊपर चढ़ती है। जब वीर्य नीचे बहता है, तो वह सृष्टि का निर्माण करता है। बच्चे पैदा होते है। लेकिन जब यही वीर्य यही ऊर्जा तप की गर्मी से भाप बनकर ऊपर उठती है, तो वह तुम्हारे भीतर के सोए हुए भगवान को तुम्हारे भीतर के बुद्ध को जन्म देती है। इस प्रक्रिया को समझो। इसे विज्ञान की भाषा में उर्ध्वपातन या सब्लीमेशन कहते हैं। जैसे पानी को अगर तुम गर्म करो तो वह क्या बनता है? वह भाप बन जाता है। पानी का स्वभाव है नीचे बहना
22:36 लेकिन भाप का स्वभाव है ऊपर उठना। पानी कभी ऊपर नहीं जा सकता जब तक कि वह भाप ना बने। ठीक वैसे ही तुम्हारी काम वासना तुम्हारा वीर्य वह पानी है। वह हमेशा नीचे ही बहेगा। तुम उसे कितना भी रोकने की कोशिश करो, तुम उसे कितना भी नियमों में बांधो वह नीचे ही रास्ता खोजेगा। और अगर तुमने जबरदस्ती उसे रोका तो वह तुम्हारे व्यक्तित्व में विकृतियां पैदा कर देगा। तुम कुंठित हो जाओगे। तुम गुस्से से भर जाओगे। तो रास्ता क्या है? रास्ता दमन नहीं है। रास्ता दमाना नहीं है। रास्ता है ताप। रास्ता है अग्नि। उस ऊर्जा को इतनी
23:22 गर्मी दो कि वह पानी से भाप बन जाए। और वह गर्मी कहां से आएगी? वह गर्मी आएगी जागरूकता से। वह गर्मी आएगी ध्यान से। पुराने जमाने के ऋषि मुनि इसे तप कहते थे। तप का मतलब जंगल में एक पैर पर खड़े होना नहीं है। तप का मतलब है गर्मी पैदा करना। जब तुम्हारे भीतर काम वासना जगे। जब तुम्हें लगे कि ऊर्जा नीचे बहना चाहती है। उस क्षण तुम क्या करते हो? तुम बेहोश हो जाते हो। तुम उस वासना में बह जाते हो। तुम यंत्रवत हो जाते हो। उस क्षण तुम्हें होश नहीं रहता। बस एक पागलपन सवार होता है कि कैसे इस ऊर्जा को बाहर फेंक दूं। यहीं पर तुम्हें क्रांति करनी है। यहीं पर तुम्हें उर्ध्वरेता बनना है। जब काम वासना
24:09 उठे तो उसे शत्रु मत समझो। उससे लड़ो मत। लड़ोगे तो हार जाओगे। क्योंकि वह ऊर्जा तुमसे बहुत बड़ी है। वह प्रकृति की ऊर्जा है। उससे लड़ना नहीं है। उसका स्वागत करना है। आंखें बंद कर लो और उस ऊर्जा को देखो। बस देखो कि भीतर एक तूफान उठ रहा है। जैसे तुम समुद्र के किनारे बैठकर लहरों को देखते हो। वैसे ही अपने भीतर उठती हुई काम वासना की लहरों को देखो। यह देखना यह साक्षी भाव यह विटनेसिंग ही वह आग है। जैसे ही तुम वासना को होश पूर्वक देखते हो एक चमत्कार घटता है। वह ऊर्जा जो बाहर जाने के लिए नीचे जाने के लिए तड़प रही थी वह अचानक रास्ता बदल लेती है। तुम्हारा
24:57 देखना उसे ऊष्मा देता है। उसे गर्मी देता है और वह वीर्य वह ऊर्जा अपनी स्थूलता छोड़कर सूक्ष्म होने लगती है। वह भाप बनने लगती है। और क्योंकि सुषुमना नाली वहां मौजूद है। वह ऊर्जा अपने आप बिना किसी प्रयास के रीड की हड्डी के रास्ते पर चढ़ने लगती है। तुम्हें कुछ करना नहीं है। तुम्हें कोई पंप नहीं लगाना है। यह स्वतू है। जैसे ही पानी भाप बनता है, वह आकाश की तरफ उठता है। जैसे ही वीर्य ओजस बनता है, वह मस्तिष्क की तरफ उठता है। और जब यह ऊर्जा मस्तिष्क में पहुंचती है, जब यह मेरुदंड के सारे चक्रों को भेदती हुई तुम्हारे सिर के भीतर प्रवेश करती है तो
25:44 वहां जो घटना घटती है उसे ही संतों ने अमृत वर्षा कहा है। वहां तुम्हारे मस्तिष्क में जिसे विज्ञान पीनियल ग्लैंड या पिट्यूटरी ग्लैंड कहता है और जिसे योग शिव नेत्र या तीसरा तिल कहता है वहां एक घर्षण होता है। यह नई ऊर्जा यह ताजा ओजस जब वहां की सूखी कोशिकाओं से टकराता है तो एक विस्फोट होता है। प्रकाश का विस्फोट आनंद का विस्फोट तुम्हारे सिर के भीतर से एक रस टपकने लगता है। यह कोई कवि कल्पना नहीं है। योगी इसे स्वाद से जानता है। वह मीठा होता है। शहद से भी ज्यादा मीठा। जब
26:30 वह रस टपकता है तो तुम्हारा पूरा शरीर, तुम्हारा पूरा अस्तित्व एक ऐसी मस्ती में डूब जाता है जो इस संसार की किसी भी शराब में नहीं है। और तब तुम्हें पहली बार पता चलता है कि तुम किस हीरे को कौड़ियों के भाव बेच रहे थे। वह जो थोड़ा सा सुख तुम्हें नीचे गिराने में मिलता था, उससे करोड़ों गुना ज्यादा सुख उस ऊर्जा को ऊपर उठाने में है। लेकिन इस यात्रा के लिए तुम्हें अपनी जीवन शैली में अपने रोजमर्रा के जीवन में कुछ बदलाव करने होंगे। तुम कचरा खाकर मंदिर नहीं बना सकते। आज मैं तुम्हें कुछ बहुत व्यावहारिक सूत्र देने जा रहा हूं। जिन्हें तुम्हें आज से ही अभी से ही अपने जीवन में उतारना है। पहला
27:17 सूत्र अपने भोजन के प्रति जागना। तुम जो खाते हो वही तुम बनते हो। जैसा अन्न वैसा मन। अगर तुम बहुत ज्यादा मसालेदार, बहुत ज्यादा तामसिक भोजन करते हो, बहुत ज्यादा मिर्च, बहुत ज्यादा लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा तो तुम इस ऊर्जा को कभी ऊपर नहीं उठा पाओगे। क्यों? क्योंकि यह चीजें शरीर में उत्तेजना पैदा करती हैं। यह चीजें तुम्हारे खून में गर्मी तो पैदा करती हैं, लेकिन वह गर्मी तप की नहीं ज्वर की होती है, बुखार की होती है। यह चीजें काम वासना को सीधे नीचे के केंद्रों पर चोट करती हैं। जब तुम बहुत गणिष्ठ भोजन
28:04 करते हो तो शरीर की सारी ऊर्जा उसे पचाने में और उस जहर को संभालने में लग जाती है। और जो उत्तेजना पैदा होती है, वह तुम्हें विवश कर देती है कि तुम सेक्स की तरफ भागो। एक योगी का भोजन सात्विक होता है। सात्विक का मतलब है हल्का सुपाच्य और जो शरीर में शीतलता लाए, शांति लाए। ताजे फल, हरी सब्जियां, दूध, घी यह चीजें तुम्हारे वीर्य को गाढ़ा करती हैं। और याद रखना जो चीज गाढ़ी होती है, उसे बहाना मुश्किल होता है। जो चीज पतली होती है, पानी जैसी होती है, वह जरा से सुराग से बह जाती है। आज का आदमी जो फास्ट फूड खा रहा है, जो रसायनों
28:51 से भरा खाना खा रहा है, उसका वीर्य पानी जैसा पतला हो गया है। इसलिए उसे रोकने की क्षमता ही खत्म हो गई है। स्वप्नदोष की बीमारी, शीघ्रपतन की बीमारी यह सब तुम्हारे गलत भोजन का परिणाम है। तो आज से अपने भोजन को बदलो। उसे पवित्र करो। उसे प्रसाद जैसा बनाओ। दूसरा सूत्र विचारों का उपवास। तुम अपने दिमाग में 24ों घंटे क्या भर रहे हो? तुम्हारी आंखें क्या देख रही हैं? तुम्हारे कान क्या सुन रहे हैं? आज का पूरा समाज सिनेमा विज्ञापन सब तुम्हें वासना से भर रहे हैं। जहां देखो वहां नग्नता है। जहां देखो वहां उकसावा है। अगर
29:37 तुम 24ों घंटे काम वासना के चित्र देखोगे तो रात को सपने भी वैसे ही आएंगे और ऊर्जा नीचे ही बहेगी। तुम्हें अपनी आंखों पर पहरा बिठाना होगा। इसका मतलब यह नहीं कि तुम आंखें फोड़ लो या पट्टी बांध लो। इसका मतलब है चुनाव। तुम्हें चुनना होगा कि तुम्हें अपने भीतर क्या जाने देना है। जब भी कोई ऐसा दृश्य सामने आए, जब भी कोई ऐसा विचार आए तो उसे पकड़ो मत। उसे मेहमान की तरह आने दो और जाने दो। उसे चाय नाश्ता मत कराओ। हम क्या करते हैं? एक कामुक विचार आया और हम उसे पकड़ कर बैठ जाते हैं। हम उसे अपनी कल्पना में विस्तार देते हैं। हम उसके साथ खेलने लगते हैं। यही गलती होती है। विचार का आना तुम्हारे हाथ में नहीं
30:24 है। लेकिन विचार को पकड़ना या छोड़ देना तुम्हारे हाथ में है। जैसे ही विचार आए तुरंत अपने को झकझोर दो। लंबी गहरी सांस लो। अपनी रीड की हड्डी को सीधा करो। और अपना ध्यान अपनी श्वास पर ले आओ। तुम पाओगे कि वह विचार आया और चला गया बिना तुम्हें स्पर्श किए। तीसरा सूत्र रीड को सीधा रखना। तुमने कभी गौर किया है? जब तुम उदास होते हो तो तुम झुक जाते हो। तुम्हारे कंधे लटक जाते हैं, रीड मुड़ जाती है और जब तुम काम वासना से भरे होते हो तब भी तुम झुकने लगते हो। एक ऊर्जावान व्यक्ति, एक जागरूक व्यक्ति हमेशा सीधा बैठता है। रीड की हड्डी का सीधा होना बहुत
31:11 जरूरी है। क्योंकि अगर नली मुड़ी हुई होगी तो पानी ऊपर कैसे चढ़ेगा? अगर पाइप मुड़ा हुआ है तो प्रवाह रुक जाएगा। दिन में जितनी बार याद आए अपनी रीड को सीधा करो। जैसे ही तुम रीड सीधी करते हो, तुम अचानक पाओगे कि तुम्हारी चेतना का स्तर बदल गया। तुम ज्यादा सजग हो गए। तुम ज्यादा होश में आ गए और जो व्यक्ति होश में है वह कभी भी अपनी ऊर्जा को बर्बाद नहीं कर सकता। बर्बादी हमेशा बेहोशी में होती है। चौथा सूत्र रात की तैयारी ज्यादातर ऊर्जा का स्खलन रात को होता है नींद में। क्योंकि नींद में तुम बेहोश होते हो। पुराने संस्कार, पुराने दबे हुए विचार नींद में सिर उठाते हैं। इसलिए सोने से पहले की 45
31:59 मिनट बहुत कीमती है। आज के लोग क्या करते हैं? बिस्तर पर पड़े पड़े मोबाइल देखते हैं, रील्स देखते हैं, दुनिया भर का कूड़ा कचरा दिमाग में भरते हैं और उसी को देखतेदे सो जाते हैं तो रात भर दिमाग उसी कचरे को घुमाता रहता है। सोने से पहले ठंडे पानी से अपने पैर धो लो। यह एक बहुत पुराना उपाय है। पैर के तलवों का और जनेंद्रियों का गहरा संबंध है। पैर ठंडे होने से गर्मी सिर की तरफ जाती है। फिर बिस्तर पर बैठकर रीड सीधी करके 10 मिनट सिर्फ 10 मिनट अपनी आती जाती सांस को देखो। या किसी शांत संगीत को सुनो या किसी
32:46 महापुरुष के वचन पढ़ो ताकि तुम एक उच्च अवस्था में एक पवित्र भाव में नींद में प्रवेश करो। अगर तुम प्रार्थना के भाव में ध्यान के भाव में सोओगे तो रात भर वह ध्यान तुम्हारे भीतर चलता रहेगा। तुम्हारी नींद भी योग बन जाएगी। और सुबह तुम एक ऐसी ताजगी, एक ऐसी शक्ति के साथ उठोगे जो तुमने बचपन के बाद कभी महसूस नहीं की होगी। मेरे दोस्तों, यह शरीर वीणा है। अगर इसके तार ढीले हैं तो इसमें से बेसुरा संगीत निकलेगा। अगर तार बहुत कसे हुए हैं तो टूट जाएंगे। इसे साधना है। इसे ट्यून
33:31 करना है। वीर्य और मस्तिष्क एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक तरफ सृजन है। दूसरी तरफ मोक्ष है। चुनाव तुम्हारा है। तुम शिकायत मत करना कि जमाना खराब है कि माहौल खराब है। कीचड़ में ही कमल खिलता है। यह कलयुग, ये शोरगुल, ये वासनाओं का बाजार, यह सब कीचड़ है और तुम कमल हो। तुम्हें इसी कीचड़ से पोषण लेना है। लेकिन इस कीचड़ से ऊपर उठकर खिलना है। जिस दिन तुम्हारी ऊर्जा तुम्हारा ओजस तुम्हारे मस्तिष्क को पूरी तरह से सराबोर कर देगा उस दिन तुम्हें असली स्मृति आएगी। तुम्हें याद आएगा कि तुम कौन हो। अभी तुम भूल गए हो। अभी तुम अपने को शरीर समझ रहे हो। नाम समझ रहे हो, रूप समझ रहे हो। जिस दिन वह
34:19 रसायन वह केमिकल पूरा हो गया उस दिन पर्दा गिर जाएगा और तुम पाओगे कि तुम वह नहीं हो जो जन्मता है और मरता है। तुम वह शाश्वत ऊर्जा हो। तुम वह ब्रह्म हो जिसका ना कोई आदि है ना कोई अंत। यही वह राज है जो तुम्हारे ऋषियों ने तुम्हारे पूर्वजों ने खोजा था। उन्होंने प्रयोगशालाओं में टेस्ट ट्यूब के साथ प्रयोग नहीं किए थे। उन्होंने अपने शरीर को ही टेस्ट ट्यूब बनाया था। उन्होंने अपनी चेतना को ही आग बनाया था और उन्होंने पाया कि आदमी के भीतर भगवान बनने का पूरा नक्शा मौजूद है। तो आज से अभी से एक संकल्प लो। यह संकल्प किसी और के लिए नहीं खुद के लिए है। यह
35:04 संकल्प है अपनी शक्ति को पहचानने का। यह संकल्प है बिखराव से केंद्र की ओर आने का। यह संकल्प है मृत्यु से अमृत की ओर जाने का। शुरुआत में कठिनाई होगी। पुरानी आदतें तुम्हें खींचेंग। शरीर मांगेगा। मन तड़पेगा लेकिन घबराना मत। हर बार जब तुम गिरो फिर खड़े हो जाना। हर बार जब तुम हारो फिर से लड़ने मत लगना। बस जाग जाना। धीरे-धीरे जैसेजैसे तुम इस रस का स्वाद चखोगे, जैसे-जैसे तुम्हारे चेहरे पर वह तेज वह चमक आने लगेगी। तुम्हें खुद ब खुद नीचे जाने का मन नहीं करेगा। जिसके हाथ में हीरा लग जाए, वह फिर
35:51 पत्थरों से नहीं खेलता। तुम्हारे भीतर वह हीरा है। उसे खोजो, उसे निखारो और अपने जीवन को एक उत्सव बनाओ। आज के लिए इतना ही पर्याप्त है।