पैसा, नाम, ताकत - कमाएँ कि नहीं? || आचार्य प्रशांत (2020)

संक्षिप्त सारांश

इस वीडियो में आचार्य प्रशान्त ने शक्ति, पहचान और प्रसिद्धि के महत्व के बारे में चर्चा की है। उन्होंने बताया है कि सत्य के साधकों का क्या रवैया इन चीजों के प्रति होना चाहिए और कैसे वे अपने उद्देश्य की पूर्ति में इनका सही उपयोग कर सकते हैं।

  • शक्ति और पहचान हासिल करना आवश्यक है।
  • समाज की भलाई के लिए संसाधनों का उचित उपयोग जरूरी है।

प्रस्तावना

वीडियो की शुरुआत में, परमिंदर सिंह का सवाल उठाया गया है कि आधुनिक समाज में बाहर की दुनिया में शक्ति, पहचान और प्रसिद्धि को कितना मूल्य दिया जाता है। ऐसे में सत्य के साधक को क्या करना चाहिए, यह चर्चा का मुख्य बिंदु है।

सत्य के साधकों का उद्देश्य

आचार्य प्रशान्त ने बताया कि सत्य के साधक की जीवन का उद्देश्य अपनी मुक्ति और दूसरों का कल्याण है। यह दोनों बातें आपस में संबंधित हैं। व्यक्ति को चाहिए कि वे अपनी मुक्ति के लिए और दूसरों की भलाई करने के लिए निरंतर प्रयास करें। उनका यह भी कहना है कि छोटे, लाभहीन उद्देश्यों में फंस जाने से बचना चाहिए।

संसाधनों का उचित उपयोग

आचार्य ने कहा कि नेतृत्व और सहायता के लिए विभिन्न प्रकार के संसाधनों का प्रबंधन करना आवश्यक है। उन्होंने यह भी बताया कि यह समझना महत्वपूर्ण है कि अपनी मुक्ति और दूसरों की भलाई के लिए संसाधनों को इकट्ठा करते समय सामाजिक दृष्टि से उनके उपयोग का मूल्यांकन करना उचित नहीं है।

धन और शक्ति की आवश्यकता

वीडियो में धन, शक्ति और पहचान के महत्व पर जोर दिया गया है। आचार्य का कहना है कि अगर ये संसाधन सत्य के साधक के पास हैं, तो वे अपनी मुक्ति और दूसरों की भलाई के लिए अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं। उन्होंने धन कमाने को एक खुशी की बात बताई, जब उसका उद्देश्य सकारात्मक हो।

प्रसिद्धि का उद्देश्य

आचार्य प्रशान्त ने बताया कि प्रसिद्धि का सही उपयोग वही है जब इसे समाज के उत्थान के लिए प्रयोग किया जाए। वे कहते हैं कि समाज में आने वाले बदलावों के लिए पहचान बनाना महत्वपूर्ण है। प्रतिष्ठा हासिल करने से साधक की आवाज अधिक लोगों तक पहुंच सकती है।

अध्यात्म और संसाधनों का महत्व

वीडियो में यह भी कहा गया कि आध्यात्मिकता केवल व्यक्तिगत मुक्ति तक सीमित नहीं हो सकती। दुनिया की समस्याओं के प्रति संवेदनशील रहना और संसाधनों का सही उपयोग करना आवश्यक है। आचार्य ने कहा कि समाज की भलाई के लिए विस्तार से काम करना होगा, जिसमें धन और शक्ति दोनों आवश्यक हैं।

संघर्ष का प्रतिपादन

आचार्य प्रशान्त इस बात पर जोर देते हैं कि किसी भी व्यक्ति के लिए यह अस्वीकार्य है कि वे अपने उद्देश्यों को छोड़ दें। उन्होंने कहा कि हार नहीं मानना चाहिए, क्योंकि यह बहुत से लोगों के लिए ट्रैक बनाता है। समाज की मुश्किलों का सामना करने के लिए किसी भी साधक को हारने का अधिकार नहीं है।

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Transcript

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0:02 [संगीत] परमिंदर सिंह हैं। उनका सवाल है कि बाहर की दुनिया में सबसे ज्यादा मूल्य ताकत को और नाम पहचान को दिया जाता है। तो ऐसे में सत्य के साधक का ताकत पावर और

0:47 पहचान प्रसिद्धि या ख्याति के प्रति क्या रवैया होना चाहिए? परमिंदर आपको एक मंजिल तक पहुंचना है और जिस मंजिल तक आप पहुंचना चाहते हैं, उसी की राह में धीरे-धीरे आपको यह भी पता लगने लगता है कि वहां अकेले पहुंचा जा नहीं सकता। तो फिर आपको समझ में आता है कि जीवन का उद्देश्य

1:35 होता है अपनी मुक्ति और सबका दूसरों का कल्याण। हम यह जीवन का उद्देश्य है। इसलिए हम लगातार चल रहे हैं, क्रिया कर रहे हैं, गति कर रहे हैं। इसीलिए हम सांस ले रहे हैं, जी रहे हैं। हां, हम इस उद्देश्य से अगर अनभिज्ञ हो, तो हम इधर-उधर के तमाम छोटे-मोटे विविध लाभहीन उद्देश्य बना लेंगे। जिनसे ना हमें कुछ मिलना है ना दूसरों का

2:22 कुछ भला है। पर आपने बात करी है सत्य के साधक की तो मैं समझता हूं सत्य के साधक को तो यह छोटी सी बात पता ही है कि वो जी किस लिए रहा है। वो जी रहा है। दोहराते हैं अपनी मुक्ति के लिए और दूसरों के कल्याण के लिए और यह दोनों बातें एकदम अंतर संबंधित है। अपनी मुक्ति दूसरों के कल्याण बिना हो नहीं सकती और दूसरों का कुछ भला करोगे तो अपनी मुक्ति में सहायता मिलेगी। हम अब यह आपको करना है। कैसे करोगे आप? काम छोटा नहीं है।

3:09 यह करने के लिए आपको तमाम तरह के उपकरणों का, युक्तियों का, संसाधनों का इस्तेमाल करना पड़ेगा। है ना? बल्कि काम इतना बड़ा है। चाहे अपनी मुक्ति की बात करो, चाहे दूसरों की भलाई की। काम इतना बड़ा है कि जितने संसाधन आपको मिल जाए कम ही पढ़ने हैं। जितनी आपको इधर-उधर से सहायता मिल जाए कम ही पढ़नी है। दूसरों की संख्या देखिए कितनी ज्यादा है। और खुद को ही जीतना आदमी को इतना मुश्किल पड़ता है। दूसरों की मदद करें कि वह स्वयं को जीत लें। यह तो सोचिए कितना मुश्किल काम होगा।

3:57 तो लगभग असंभव काम है। विराट उपक्रम है। तो इसमें तो जहां कहीं से भी और जिस भी प्रकार की सहायता मिलती हो, संसाधन मिलते हो, तत्काल झपट लेने चाहिए ना। अब इसमें हम यह ख्याल तो कर ही नहीं सकते कि उस संसाधन के ऊपर तमंगा क्या लगा हुआ है। हम कि सामाजिक दृष्टि से या नैतिक दृष्टि से वो संसाधन अच्छा माना जाता है कि बुरा माना जाता है। वो तरकीब वो युक्ति वो तरीका ऊंचा माना जाता है कि नीचा माना जाता है। ये ऊंचानीचा का ख्याल करने का वक्त ही

4:44 नहीं है क्योंकि आपात स्थिति है। इमरजेंसी सिचुएशन है और मरीज बहुत सारे हैं और हर मरीज की हालत बहुत खराब है। आप भी उन्हीं मरीजों में से एक हैं। तो जहां से जो बन पड़े सब कुछ करो। अब अगर आपको अपनी सहायता के लिए दूसरों की सहायता के लिए ताकत की या नाम पहचान की प्रसिद्धि की जरूरत पड़ती है तो जरूर जरूर आप ताकत अर्जित करें। दुनिया में कुछ भी करने का सिर्फ और सिर्फ यही उद्देश्य हो सकता है। दुनिया में कुछ

5:32 भी कमाने का अर्जित करने का सिर्फ और सिर्फ यही उचित प्रयोजन हो सकता है। क्या? कि अगर यह चीज मेरे पास होगी तो मुझे अपनी मुक्ति की मंजिल तक पहुंचने में मदद मिलेगी। अगर यह चीज मेरे पास होगी, तो इससे मैं दूसरों की बेहतर सहायता कर पाऊंगा। तो अपने उपक्रम की खातिर अगर आपको पैसा इकट्ठा करना पड़े जरूर करिए। ताकत इकट्ठी करनी पड़े जरूर करिए। दुनिया में अपनी नाम पहचान बनानी पड़े, बढ़ानी पड़े जरूर बढ़ाइए। यहां कुछ भी वर्जित नहीं है।

6:20 यहां पर छोटे बड़े का ख्याल नहीं किया जा सकता। आप कह रहे हैं कि दुनिया बहुत मूल्य देती है ताकत को और प्रसिद्धि को। दुनिया इन उपकरणों को मूल्य तो देती है पर उनका इस्तेमाल करना नहीं जानती। उनका वह इस्तेमाल करती है मंजिल तक पहुंचने के लिए नहीं मंजिल से और दूर जाने के लिए। पैसा दुनिया भी कमाती है। मैं कह रहा हूं पैसा आप भी कमाइए। उद्देश्य उपक्रम अलग होना चाहिए। दुनिया पैसा कमा रही है ताकि अपने अहंकार को और घना कर सके। दुनिया पैसा कमा रही है ताकि उन्हीं पैसों से अपने लिए और मोटी मजबूत बेड़ियां गढ़ सके। आप पैसा कमाइए ताकि उस पैसे से आप बेड़ियों को काटने

7:08 वाले औजार गढ़ सके। इन दोनों बातों में अंतर समझिएगा। बेड़िया गढ़ने के लिए भी पैसा चाहिए और आरा बनाने के लिए भी पैसा चाहिए। आरा जानते हो ना? बेड़ी काटने का औजार। लोग पैसा कमा रहे हैं। उससे वह बेड़ियां खरीद के ला रहे हैं। आप पैसा कमाइए। उससे आप आरा खरीद के लाइए। यह मत कह दीजिएगा कि साहब हम तो आध्यात्मिक आदमी है। हमें पैसे से क्या ताल्लुक? नहीं नहीं नहीं पैसा बहुत जरूरी है। पैसा नहीं होगा तो आरा कहां से लाओगे? और मैं नहीं कह रहा कि हमेशा जो बेड़ी है सामने वो किसी आरे से

7:53 ही कटेगी। हो सकता है कि जो संसाधन चाहिए हो वो सूक्ष्म हो धन से खरीदा ना जा सकता हो। अगर वो संसाधन सूक्ष्म हो तो आप सूक्ष्म साधना करें। कोई दिक्कत नहीं। आपके सामने जो चुनौती है जो बेड़ी है अगर वह सूक्ष्म है ऐसी कि वह किसी सूक्ष्म आरे से कटेगी जो बाजार में नहीं बिकता पैसे से तो आप सूक्ष्म साधना करिए और सूक्ष्म आरे से काट दीजिए उस बेड़ी को पर बहुधा बेड़ियां बहुत ही स्थूल होती हैं और स्थूल चीज तो दूसरी किसी स्थूल चीज से ही कटती है ना जो सबसे अकाट्य धातु होती है उसको काटने

8:40 के लिए फिर आपको क्या चाहिए होता है मालूम है हीरा हीरा तो महंगा आता है बाजार में भाई और हो सकता है कोई आपके इर्दगिर्द जिसने जबरदस्त प्लैटिनम की बेड़ियां धारण कर ली हो क्यों प्लैटिनम की ज्वेलरी नहीं देखी क्या? हम है कोई आपके परिवेश में जो प्लैटिनम की ज्वेलरी आभूषण गहने धारण करके बैठ गई है जो है वास्तव में जंजीरे ही हथकड़ियां ही है पर उसके हिसाब

9:26 से आभूषण है तो उस प्लैटिनम को काटने के लिए तो सिर्फ और सिर्फ हीरा ही उपयोग में आएगा हीरा तो महंगा आता है आपको हीरा खरीदना पड़ेगा। अब कमाइए ना पैसा। यह हुआ पैसे का सार्थक उपयोग। यह हुआ पैसे का सार्थक उपयोग। उसने पैसे का क्या इस्तेमाल करा है? अपने लिए बेड़ियां खरीदने के लिए। आपके पास भी पैसा होना चाहिए ताकि आप वो हीरा खरीद सको जिससे उसकी बेड़ी काटी जा सकती है। बात समझ में आ रही है? तो इस तरह की बात तो करिएगा ही नहीं कि अरे अध्यात्म में पैसे का क्या काम अति मूर्खतापूर्ण बात है

10:12 यह अरे एक आध्यात्मिक विश्वविद्यालय भी खड़ा करना है तो स्वर्ग से थोड़ी उतरेगा इसी जमीन पर खड़ा करना पड़ेगा संसाधन लगेंगे धन लगेगा अभी मैं आपसे बात भी कर रहा हूं तो यह बात करने में बहुत सारे संसाधन लग रहे हैं और उनके पीछे बहुत सारे धन का व्यय हो रहा है। इस धन का व्यय हो रहा है आपकी बेड़ियां काटने के लिए सबको आध्यात्मिक मंजिल तक पहुंचाने के लिए। अब यही बात प्रसिद्धि और ताकत पर भी लागू होती है। आप कह रहे हैं कि जीने का उद्देश्य है दूसरे का भला करना। ठीक? आपकी होगी बड़ी

10:58 कामना, बड़ी तमन्ना दूसरों का भला करने की। अरे आप दूसरों का भला करोगे कैसे? जब आपकी आवाज ही नहीं पहुंचेगी दूसरों तक। आज से 400 साल पहले का युग तो है नहीं कि फकीर बाबा निकल गए और पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गए किसी गांव में और 40 लोग जमा हो गए और कुछ चर्चा वगैरह हो गई। सत्संग हो गया, भजन हो गया और फिर बाबा आगे बढ़ गए दूसरे गांव की तरफ और ऐसे करके भगवत प्रचार हो गया। अब तो ऐसे होगा नहीं भगवत प्रचार। तब तो एक ही तरीका है प्रचार का। क्या जिसमें धन लगता है? तमाम तरह का

11:44 मीडिया होता है। और जो लोग मीडिया चला रहे हैं वह तो आध्यात्मिक नहीं है ना। उन्होंने तो समाज सेवा नहीं करनी है ना। मीडिया चलाने के पीछे उनका उद्देश्य तो धन कमाना है। तो वह आपको मुफ्त में ही प्रसिद्धि तो दिला नहीं देंगे। वह आपको मुफ्त में कुछ नहीं दिला देंगे। वह किसी को भी मुफ्त में कुछ नहीं दिला देंगे क्योंकि वह बाजार में बैठे ही हैं मुनाफा अर्जित करने के लिए। तो वो क्यों आपको यूं ही प्रसिद्ध कर देंगे और आपका संदेश सब तक पहुंचा देंगे। आप कहेंगे पर मेरा संदेश बहुत उच्च कोटि का है। मेरा संदेश कोई व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं है।

12:29 मेरा संदेश तो पूरे समाज के उत्थान के लिए है। तो मेरा संदेश तो सब तक पहुंचना चाहिए ना। साहब आपकी नजर में आपका संदेश बहुत कीमती होगा। Facebook की नजर में नहीं है। Facebook तो प्रसिद्धि दे देगा किसी अथनंगी तस्वीर को वो वायरल हो जाएगी और आपने ऊंची से ऊंची बात कह दी होगी। उसको देखेंगे कुल जने 56 छह लाइक एक कमेंट। बात समझ में आ रही है? तो जितनी आप कोई वाहियात बात कर दें, कोई जादू टोने की बात कर दें, कोई अंधविश्वास से भरी हुई बात कर दें। कोई कामनाओं को उत्तेजित करने वाली बात कर दें, वो बातें तुरंत आगे बढ़

13:16 जाएंगी। आध्यात्मिक बातें भी बहुत बढ़ जाती हैं आगे। वो इस तरीके की हो कि तुम कौन सी क्रिया कर लो जिससे तुम्हारे भीतर दिव्य शक्ति जागृत हो जाएगी। वो बात आगे बढ़ जाएगी। ऐसी हर बात आगे बढ़ जाएगी जिससे आप भी डूबते हो और पूरा जमाना भी डूबता हो। आपको अगर अपनी बात आगे बढ़ानी है, आपको अगर प्रसिद्ध होना है, आपको अगर पहचान चाहिए तो उसके लिए तो आपको पैसा खर्चना पड़ेगा। सोशल मीडिया पैसा मांगेगा। पहचान बनाइए। जरूर बनाइए। बिना पहचान बनाए आप दूसरों का भला कैसा करेंगे? पहचान बनाइए। पहचान बनाने के लिए भी कमाइए। यही पहचान का सार्थक उपयोग है कि

14:04 किसी तक आपका नाम पहुंचा तो नाम के साथ-साथ ऊपर वाले का फरमान पहुंचा। आपका नाम उस तक इसलिए नहीं पहुंचा है कि वो आपका मुरीद हो जाए। आपका नाम उस तक इसलिए पहुंचा है ताकि आपके माध्यम से वह उस पार निकल जाए, तर जाए, मुक्त हो जाए। यह प्रसिद्धि का सार्थक उपयोग है। और बिल्कुल जैसे मैंने पैसे के मामले में सावधान करा था कि कह मत दीजिएगा कि अरे आध्यात्मिक आदमी पैसा क्या करेगा? वैसे ही यह कह मत दीजिएगा कि आध्यात्मिक आदमी प्रसिद्धि का क्या करेगा? आध्यात्मिक आदमी को नाम से ख्याति से क्या लेना देना

14:50 मूर्खों वाली बात है या तो अोरी हो जाए अवधूत हो जाए किसी श्मशान में बस जाए या पहाड़ों में किसी गुफा में वास करे कह दे कि मुझे इस समाज से दुनिया से कोई लेना देना नहीं मुझे दिख गया है सब मिथ्या है पर अगर वह समाज के बीच रह रहा है अगर उसे जन सामान्य से अभी कोई वास्ता है तो वह एक ही रिश्ता रख सकता है ना दुनिया से क्या कि मैं दुनिया के बीच हूं दुनिया के उत्थान के लिए और दुनिया का अगर उत्थान करना है तो दुनिया तक अपनी आवाज तो पहुंचानी पड़ेगी ना उसके लिए ताकत भी चाहिए नाम भी चाहिए प्रसिद्धि चाहिए पैसा चाहिए सब चाहिए तो आप यह सब बेशक अर्जित

15:35 करें पर यह सब जब आप अर्जित करें तो याद रखें कि यह सब संसाधन आप कमा रहे हैं अपने लिए नहीं परमार्थ के लिए अपने शद्र संकीर्ण स्वार्थ के लिए ना पैसा कमाइए ना प्रसिद्धि यह सब आप अर्जित करें और परमार्थ के लिए ही करें बल्कि पैसे की शोभा ही किसी ऐसे के हाथों में है जो पैसे का पारमार्थिक उपयोग करना जानता हो। प्रसिद्धि होनी ही उसकी चाहिए। जिसके नाम के साथसाथ उसका नाम सब तक पहुंच जाए जिसका

16:23 कोई नाम ही नहीं। आज की दुनिया उल्टी चल रही है। किनका नाम फैला हुआ है? जिनके नाम के साथसाथ सब तरह की बेहूदगियां आप तक पहुंच जाती हैं। उनका नाम सबसे ज्यादा प्रचलित है। और जिनका नाम आपको पता ही होना चाहिए उनके नाम से आप बिल्कुल परिचित वाकिफ नहीं। तो सही आदमी का ना सिर्फ अधिकार है। यह बल्कि उसका फर्ज है, जिम्मेदारी है, उत्तरदायित्व है कि वह अपने आप को प्रसिद्ध

17:09 बनाए। अगर आप जानते हो कि आप कोई सही काम कर रहे हो और उसके बाद भी आप प्रसिद्धि नहीं अर्जित करते तो आप अपने ही आराध्य के प्रति गुनहगार हो गए। वह आपसे पूछेगा कि अगर तुम सेवा कर रहे थे, मेरी आराधना कर रहे थे मेरी तो तुमने अपने आप को प्रसिद्ध क्यों नहीं किया? आप कहेंगे वो प्रसिद्धि के लिए पैसा चाहिए। मेरे पास था नहीं। तो आपका गला पकड़ के पूछेगा वो तो पैसा कमाया क्यों नहीं तुमने? एक से एक गलीच लोग पैसा कमा लेते हैं अपनी अंधी कामनाएं, वासनाएं पूरी करने के लिए।

17:55 उनकी कामनाओं में इतना दम होता है कि वह कामना के लिए पैसा कमा ले जाते हैं और तुम्हारी तो कामना मैं था सर्वश्रेष्ठ सर्वोपरि सर्वोच्च और तुम मेरे लिए भी कमा नहीं पाए। तुम्हें क्या माफी दें? किसी को अपनी बीवी के लिए गहने बनवाने हैं। वह लाखों करोड़ों कमा लेता है। किसी को विदेश में बंगला खरीदना है और जीवन भर दुनिया घूमनी है वह भी कमा लेता है। कोई दुनिया पर अपनी ठसक जमाना चाहता है वह भी कमा लेता है। और तुम्हारे सामने उद्देश्य

18:45 था दुनिया भर की मुक्ति। तुम तब भी नहीं कमा पाए। तुम्हें कैसे माफ करें? बात समझ में आ रही है? तो कमाना मैंने कहा सही आदमी का अधिकार ही नहीं है। उसका फर्ज है। कर्तव्य है। एक घटिया आदमी नहीं कमा रहा उसे माफ किया जा सकता है। पर एक सही आदमी के पास अगर संसाधन नहीं है, ताकत नहीं है, प्रसिद्धि नहीं है तो मैं कह रहा हूं कि वह अपने ही उद्देश्य के सामने अपराधी गुनहगार हो गया। या तो तुम बहुत बड़ा उद्देश्य रखते नहीं। तुम कहते मुझे भी एक आम मध्यमवर्गीय

19:32 जिंदगी बितानी है। मैं नहीं हूं सत्य का साधक वगैरह। मुझे भी एक छोटी-मोटी जिंदगी बितानी है। छोटी मोटी जिंदगी बितानी है। तो ठीक है। उस छोटी जिंदगी के लिए छोटे साधन पर्याप्त है। तो तुम अपनी छोटी-मोटी कुछ कमाई कर लेते। कर लेते। जिनके पास बड़ा लक्ष्य हो वो कैसे दिखाई दे सकते हैं? छोटे साधनों में लिप्त कि लक्ष्य तो मेरे पास बहुत बड़ा है और पैसे हैं कुल 5000 ये तुम क्या कर रहे हो? तुम असीम को चवन्नी चढ़ा रहे हो। उसका नाम है असीम। जब वो असीम है तो

20:21 खासकर इस काल में उसकी सेवा करने के लिए संसाधन भी असीम चाहिए और तुम चवन्नी लेकर खड़े हो जाते हो कि ये मेरी ओर से भेंट है। तुम्हें लाज नहीं आती। तुम अपराधी नहीं हो गए। भाई कोई छोटा सा आपका लक्ष्य हो, मिशन हो तो चवनियां चल जाएंगी। बूट पॉलिश करानी है। ठीक है। ₹ चल जाएंगे। शायद ₹ में वह भी नहीं होता आजकल। पर अनंत आपका कोई लक्ष्य हो और सत्य के साधक का लक्ष्य तो देखो अनंत ही होता है। आप ये नहीं कह सकते कि मैं सत्य का साधक हूं। मैं तो एकांत साधना करता हूं। एकांत साधना जो सत्य का साधक कर रहा है

21:07 उसको कुछ पता नहीं सत्य का। सत्य की ओर बढ़ना तो सदा एक सार्वजनिक उपक्रम होगा। यह काम अकेले-अकेले नहीं होता व्यक्तिगत तौर पर प्राइवेटली कि साहब हम वो एक कोने में छुप के अंधेरे में आधे घंटे ध्यान कर लेते हैं। इससे हमें मुक्ति मिल जाएगी। यह काम तो सार्वजनिक तौर पर होगा और सार्वजनिक तौर पर होगा तो संसाधन लगेंगे ना भैया उन संसाधनों को जुटाने में शर्म कैसी उन संसाधनों को जुटाने में आलस

21:57 कैसा शर्म आनी चाहिए उनको जो संसाधन इकट्ठा कर रहे हैं स्विट्जरलैंड में हनीमून मनाने के लिए उनको कतई शर्म नहीं आती। वो गड्डी पे गड्डी इकट्ठी कर लेते हैं और खुलेआम बताते हैं कि यह जो मैंने इकट्ठा करा है इससे अब मैं पहाड़ के ऊपर अपनी वासना ठंडी करूंगा। बहुत गर्म हो रखा हूं। एकदम पहाड़ पर चढ़ जाऊंगा हनीमून में। कुछ ठंड मिलेगी। उनको लाज नहीं आती। आध्यात्मिक आदमी लाज से मना रहता है कि अरे मैं तो आध्यात्मिक आदमी हूं। मैं रुपए पैसे की बात कैसे करूं? मैं इकट्ठा कैसे करूं? मैं अपनी प्रसिद्धि कैसे पढ़ाऊं? और उसको लाज आ रही हो ना आ रही

22:46 हो। दुनिया उसके ऊपर चढ़ जाती है कि यह देखो ये अपने आप को आध्यात्मिक बोलते हैं। और देखो पैसे का कितना लेनदेन है इनके यहां। देखो यह अपने आप को आध्यात्मिक बोलते हैं और अपना प्रचार कर रहे हैं। अपना विज्ञापन दे रहे हैं। प्रसिद्धि बढ़ाना चाहते हैं। अपना नाम चमकाना चाहते हैं। एक से एक मूर्ख अपना प्रचार अपना विज्ञापन करें। आपको कोई आपत्ति नहीं होती। पर सच का संदेश वाहक उस संदेश का प्रचार करें तो आपको आपत्ति हो जाती है। आप ग्लानी से भर जाते हो और आपको आपत्ति हो जाती है तो

23:31 संदेशवाहक भी अक्सर लज्जित हो जाता है। आज के प्रश्नकर्ता भी कुछ ऐसे ही लज्जा से और संशय से भरे हुए हैं। तो कह रहे हैं बाहर की दुनिया में तो यही सब चलता है। पैसा पहचान ताकत ख्याति तो मैं क्या करूं? अरे क्या करूं? क्या? यही अगर हथियार है तो इन हथियारों को कमाओ भी और चलाना भी सीखो। लड़ाई में उतरे हो। तो बिना हथियार के जीत लोगे क्या? और बात तुम्हारी व्यक्तिगत नहीं है कि तुम कह दो नहीं साहब हमें कोई हथियार वगैरह नहीं चाहिए। हम तो बस जा करके अपनी कुर्बानी दे देंगे। बिना हथियार के ही दुश्मन से भिड़ जाएंगे। 2 मिनट में गला कटाकर खत्म कर देंगे खेल

24:18 अपना। बात कोई तुम्हारी अकेले अपने की है। तुम्हारे अकेले अपने की बात होती तो मैं कहता हां ठीक है जाओ भिड़ जाओ। दो मिनट में अपना गला कटा दो। खेल खत्म पैसा हजम। तुम पर जिम्मेदारी कितने लोगों की है। तुम पर जिम्मेदारी सबकी है। तुम्हें अधिकार ही नहीं है हारने का? क्योंकि तुम्हारी हार सिर्फ तुम्हारी नहीं है। तुम्हारी हार उन सब की हार हो जाएगी जिनकी तुमने जिम्मेदारी उठाई है। तुम्हें हक किसने दिया हारने का? तुम्हें हक किसने दिया कि तुम कहो कि मैं तो बस जाकर के 2 मिनट में गला घटा करके आ जाऊंगा। तुम्हें जितना पड़ेगा तुम्हारा धर्म है जितनातना। क्योंकि यह लड़ाई तुम्हारे अपने लिए नहीं है। यह लड़ाई सबके लिए है। तुमने हारना

25:06 बर्दाश्त कैसे कर लिया? लजा क्या रहे हो? लड़ो जीत के दिखाओ। हार यहां कोई विकल्प है ही नहीं। दुनिया अगर ताकत की भाषा समझती है तो ताकत अर्जित करो। दुनिया अगर पैसे की बात सुनती है तो पैसा होना चाहिए तुम्हारे पास। हां, शर्त बस एक है कि तुम्हारी बात सदा सच्ची रहे। यह ना हो कि पैसा आ गया तो बात में झूठ आ गया। जितना तुम्हारी बात में सच्चाई हो, ईश्वर करे उतना ही तुम्हारे हाथों में

25:52 पैसा हो। उतना ही तुम्हारे नाम का प्रचार हो। उतनी ही तुम्हारी वाणी में ओझ हो। सच चाहता है यह सब कुछ। सच मांगता है ये सब कुछ। सच का अधिकार है ये। ऊंची से ऊंची लड़ाई के लिए महंगे से महंगे अस्त्र और आयुध चाहिए होते हैं। हां या ना? गली में दो छोकरे भिड़ रहे हैं तो रामपुरी भी चल जाता है। कोई दिक्कत नहीं। रामपुरी भी ना मिले तो सड़क पर ही गिट्टी पड़ी हुई है। वही उठा के दे मारी। वही मिसाइल बन गई। चल जाता है। क्योंकि टच्चे स्तर की

26:39 लड़ाई है ना। और जब तुम ऊंची से ऊंची लड़ाई लड़ रहे हो तो तुम्हारे पास आयुद्ध भी ऊंचे से ऊंचे किस्म के गुणवत्ता के होने चाहिए। और वह सस्ते नहीं आएंगे। उनके लिए बड़ा मूल्य चुकाना पड़ेगा। वह मूल्य चुकाओ, अर्जित करो। दुनिया की हालत देखो। अभी वो अध्यात्म नहीं चल सकता जिसमें तुम्हें दुनिया से कोई लेना देना नहीं। एकदम नहीं चल सकता। वैसे अध्यात्म को मैं गैर जिम्मेदाराना मानता हूं। प्रजातियां खत्म हो रही हैं। पृथ्वी डूब

27:26 रही है। देख ही रहे हो अभी किस तरीके से महामारी फैली हुई है। और यह कोई आखिरी महामारी नहीं है। इस काल में तुम कहो कि नहीं मुझे तो दुनिया से कोई लेना देना नहीं। समाज से कोई संपर्क नहीं, कोई संबंध नहीं। मेरी अकेली व्यक्तिगत की मुक्ति हो जाए। बहुत है तो तुम पगले हो। पहली बात तो तुम्हें अध्यात्म पता नहीं। दूसरी बात तुम्हारी जो मंशा है वो पूरी होने से रही। [संगीत]

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