Psalm 105:1-45 God Remains Faithful to His Covenant. #margsatyajeevan #msj

Marg Satya Jeevan www.youtube.com

संक्षिप्त सारांश

यह भजन परमेश्वर की विश्वासयोग्यता और वाचा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर केंद्रित है। भजनकार हमें परमेश्वर की स्तुति करने, उसके अद्भुत कार्यों का वर्णन करने और उस पर भरोसा रखने के लिए प्रोत्साहित करता है।

  • परमेश्वर अपनी वाचा को विश्वासयोग्यता से पूरा करता है।
  • हमें उसकी स्तुति और अद्भुत कार्यों का वर्णन करना चाहिए।
  • हमें सदैव उसके संप्रभु प्रावधान पर भरोसा रखते हुए उस पर निर्भर रहना चाहिए।
  • हमें धन्यवादी मन से उसके वचनों का पालन करना चाहिए और उसकी स्तुति करना चाहिए।

परमेश्वर की स्तुति और अद्भुत कार्यों का वर्णन

भजनकार लोगों को परमेश्वर की आराधना करने और उसके अद्भुत कार्यों का वर्णन करने के लिए बुलाता है। वह उत्साह से भरा हुआ है और आनंद, धन्यवाद और स्तुति के भाव को दिखा रहा है। वह आज्ञा देते हुए कहता है कि आओ उसके अद्भुत कार्यों का वर्णन करो और उसको धन्यवाद दो। परमेश्वर का नाम, उसके काम और उसका चरित्र ऐसा है कि हम उसकी स्तुति और आराधना करें। भजनकार चाहता है कि इस्राएल एक ऐसा समुदाय बन जाए जो सदैव परमेश्वर को स्मरण रखता हो और उसके अद्भुत कार्यों की घोषणा करने के लिए सदैव तैयार रहे। यह आराधना वाचा संबंधी है और परमेश्वर के कार्यों में निहित है। हमें उसके किए हुए अद्भुत कार्यों, आश्चर्य कर्मों और उसके मुंह से निकले हुए निर्णयों को स्मरण रखना चाहिए।

परमेश्वर की वाचा के प्रति विश्वासयोग्यता

भजनकार बताता है कि परमेश्वर अपनी वाचा के प्रति सदैव विश्वासयोग्य रहता है और अपने चुने हुए लोगों के लिए सदैव प्रावधान करता है। परमेश्वर अब्राहम को बुलाता है और उससे वाचा बांधता है कि वह उसे एक बड़ी जाति बनाएगा, उसे आशीष देगा, उसके नाम को महान करेगा और उसे भूमि देगा। परमेश्वर इस वाचा के प्रति विश्वासयोग्य रहता है और सक्रिय रीति से कार्य करता है। वह अपनी वाचा को सदा स्मरण रखता है और उस वाचा को हजारों पीढ़ियों के लिए उसने ठहराया है। उसने किसी भी मनुष्य को अपने चुने हुए लोगों पर अंधेर नहीं करने दिया और राजाओं को धमकी दी।

परमेश्वर का संप्रभु प्रावधान

भजनकार बताता है कि परमेश्वर निरंतर सक्रिय रीति से कार्य करता है और अपने लोगों को बचाता है, उनको छुड़ाता है और उनकी हानि नहीं होने देता है। जिस देश में उसके चुने हुए लोग थे, उसी देश में उसने अकाल भेजा, लेकिन इससे पहले उसने यूसुफ को उनसे आगे भेज दिया ताकि उनको छुटकारा दें। यूसुफ को दास होने के लिए बेच दिया गया, लेकिन परमेश्वर अपनी वाचा के प्रति विश्वासयोग्य रहते हुए पहले से ही प्रावधान करने के लिए यूसुफ को भेजता है। परमेश्वर अपनी दया में होकर कभी-कभी अपने लोगों को कष्टों में होकर जाने देता है और पापों के माध्यम से भी अपनी योजना को पूरी करता है। जब तक उसके वचन पूरे ना हो गए, तब तक यूसुफ कष्ट में रहा, फिर परमेश्वर ने उसको छुड़ाया और उसको सारे अधिकारियों के ऊपर नियुक्त किया।

इस्राएल का मिस्र में आगमन और छुटकारा

भजनकार बताता है कि परमेश्वर इस्राएल को मिस्र में लेकर आता है और उनको फलवंत करता है। परमेश्वर मिस्रियों के हृदय को फेर देता है और वह इस्राएलियों से घृणा करने लगते हैं। परमेश्वर मूसा और हारून को खड़ा करता है और वह हाम के देश में आश्चर्य कर्म करते हैं। परमेश्वर 10 विपत्तियां भेजता है और मिस्र के पलोठों को मार डालता है। उसी रात परमेश्वर इस्राएलियों को दासत्व से छुटकारा देता है। यह विपत्तियां दिखाती हैं कि परमेश्वर दुष्टों का न्याय करता है और अपने चुने हुए लोगों को छुटकारा देता है।

महान छुटकारा और परमेश्वर की वाचा

भजनकार बताता है कि इस्राएल का छुटकारा उस बड़े महान छुटकारे का एक चित्र था जो परमेश्वर भविष्य में करने वाला था। वह छुटकारा नई वाचा के अंतर्गत परमेश्वर ने किया, जिसमें होकर परमेश्वर ने संसार के पापियों को दुष्टों का उसने न्याय किया। परमेश्वर ने अपने ही इकलौते पुत्र यीशु मसीह को भेजा और वो हमारे पापों के बदले में मारा गया ताकि परमेश्वर ने जो प्रतिज्ञा अब्राहम से की थी, उसको यीशु मसीह के द्वारा उन लोगों के लिए पूरा करें जो यीशु पर विश्वास करते हैं। यदि हम मसीह में हैं, तो अब हम परमेश्वर के लोग हैं और उसकी नई वाचा के लोग हैं। कलीसिया परमेश्वर के लोग हैं और कलीसिया को परमेश्वर एक दिन इस संसार से निकालेगा और नई सृष्टि में लेकर जाएगा।

परमेश्वर का प्रावधान और स्तुति

भजनकार बताता है कि परमेश्वर इस्राएल को सोने और चांदी के साथ निकाल लाया और उनके कुलों में से कोई लड़खड़ाने ना पाया। मिस्र से छुड़ाने के बाद परमेश्वर ने उनको छोड़ नहीं दिया और उनके लिए यात्रा में भी प्रावधान करता रहा। परमेश्वर उनके लिए छाया का बादल और रात को प्रकाश देने के लिए आग प्रकट की और उनके मांगने पर बटेरे भेजी। चट्टानों को फाड़ा और जल निकला और मरुस्थल में नदी बहने लगी। यह सब दिखाता है कि परमेश्वर अपनी वाचा को स्मरण रखता है।

वाचा का स्मरण और आज्ञा का पालन

भजनकार इस पूरे भजन को सारांशित करते हुए फिर से इसी घटना को दोहराता है। वह कहता है कि परमेश्वर ने अपने सेवक इब्राहिम को दिया गया अपना पवित्र वचन स्मरण किया और अपनी प्रजा को आनंद के साथ और अपने चुने को जय जयकार के साथ निकाल लाया। उसने उनको जाति जाति के देश भी दिए कि वह अन्य जातियों के श्रम के फल पर अधिकार कर ले। परमेश्वर ने यह सब इसलिए किया ताकि वह उसकी विधियों को माने और उसकी व्यवस्था को पूरी करें और उसकी स्तुति करें। हमें इस बात को ध्यान रखना चाहिए कि परमेश्वर अपनी वाचा के प्रति सदैव विश्वासयोग्य है और वह अपनी प्रतिज्ञा को बिना पूरी किए नहीं छोड़ता है। हमें परमेश्वर के प्रावधान पर भरोसा करना चाहिए और हर एक परिस्थिति में परमेश्वर के कार्यों का वर्णन करना चाहिए।

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Transcript

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0:00 [संगीत] आप सबको जय मसीह की। आज हम साथ मिलकर के भजन 105 का अध्ययन करेंगे। यह भजन जो 105 है, यह परमेश्वर की विश्वास योग्यता के बारे में वर्णन करता है। यह बताता है कि परमेश्वर अपनी वाचा के प्रति, अपनी प्रतिज्ञाओं के प्रति सदैव विश्वास योग्य रहता है। अगर आप भजन 104 को और 105 को एक साथ पढ़ेंगे तो आप पाएंगे। भजन 104 में भजनकार परमेश्वर की महानता को उसके संप्रभु प्रावधान को सृष्टि के कार्य में देखता है। लेकिन जब हम भजन 105 पर आते हैं

0:47 तो भजनकार हमारा ध्यान इस्राइल के इतिहास पर केंद्रित करता है। वह हमको बताता है कि भजन कार बताता है परमेश्वर ना सिर्फ सृष्टि के कार्य में महान है लेकिन वह अपनी विश्वास योग्यता को छुटकारे के इतिहास में इसराइल के छुटकारे के इतिहास के द्वारा भी दिखाता हैं। सो यह भजन जिससे हम एक आज मुख्य बात देखने का प्रयास करेंगे वो यह है कि संप्रभु परमेश्वर विश्वास योग्यता के साथ अपनी वाचा को पूरी करता है। एक मुख्य बात जो आज हम देखने का प्रयास करेंगे वह यह है कि संप्रभु परमेश्वर विश्वास योग्यता के साथ अपनी वाचा को पूरी करता है और इस यदि परमेश्वर विश्वास योग्यता के साथ अपनी वाचा को पूरी

1:32 करता है तो फिर उसके प्रति उत्तर में उसके लोगों को क्या करना चाहिए यदि प्रभु जी विश्वास योग्य है संप्रभुता के साथ अपने विश्वास योग्यता के साथ वो अपनी वाचा को पूरी करता है तो हमें उसकी स्तुति और उसके अद्भुत कार्यों का वर्णन करना चाहिए जो पहली बात एक पद से लेकर के छे पद के बीच में हम देखेंगे वह यह है कि परमेश्वर की विश्वास योग्यता के कारण हमें उसकी स्तुति और उसके अद्भुत कार्यों का वर्णन करना चाहिए। और दूसरी बात सात पद से लेकर के 41 पद में हम देखने का प्रयास करेंगे। कि हमें सदैव उसके संप्रभु प्रावधान पर भरोसा रखते हुए उस पर निर्भर रहना चाहिए। हमें सदैव उसके संप्रभु प्रावधान पर भरोसा रखते हुए उस पर निर्भर रहना चाहिए। और तीसरी

2:17 बात जो 42 से 45 45 पद में हम देखेंगे वह यह है कि हमें धन्यवादी मन से उसके वचनों का पालन करना चाहिए और उसकी स्तुति करना चाहिए। सो आइए हम इस भजन की पहली बात को देखें कि हमें उसकी स्तुति और उसके अद्भुत कार्यों का वर्णन करना चाहिए। यदि आप इस भजन के आरंभ को देखेंगे तो जैसे कई सारे भजनों में यह लिखा होता है कि इसकी बैकग्राउंड क्या है? किस परिस्थिति में लिखा गया और किसने इस भजन को लिखा है। लेकिन भजन 105 में हमें ऐसा कुछ नहीं मिलता है। हमें स्पष्ट रीति से नहीं बताया गया कि इसका लेखक कौन है। लेकिन अगर आप पहला इतिहास उसके 16 अध्याय को पढ़ेंगे। विशेष रीति से आठ पद से लेकर के 16 पद तक तो आप वहां पर पाएंगे कि दाऊद वाचा के

3:06 संदूक को लेकर आता है और उसको तंबू में रखता है और उसके बाद वो एक भजन गाता है। परमेश्वर की स्तुति करते हुए वो एक गीत को गाता है और उस भजन के उस गीत के पहले 15 पद ठीक वही 15 पद हैं जो भजन 105 के पहले 15 पद है। सो इसलिए ऐसा लगता है कि इस भजन का लेखक दाऊद है क्योंकि जैसे यहां पर 15 पद मिलते हैं वैसे ही वहां पर भी उस भजन के पहले 15 पद है। सो हम कह सकते हैं कि इसका लेखक दाऊद है और इस भजन का आरंभ दाऊद करता है परमेश्वर की आराधना के साथ भजनकार लोगों को परमेश्वर की आराधना करने के लिए और उसके अद्भुत कार्यों का वर्णन करने के लिए बुलाता है। सो अगर आप पहले पद को देखेंगे यहां पर वो कहता है यहोवा का

3:52 धन्यवाद करो और उससे प्रार्थना करो और देश देश के लोगों में उसके कार्यों की चर्चा करो और अगर आप इसकी भाषा पर ध्यान देंगे तो वो ये नहीं कह रहा है कि हमको करना चाहिए वो यहां पर आज्ञा दे रहा है वो कह रहा है धन्यवाद करो उसका वर्णन करो उससे प्रार्थना करो उसकी चर्चा करो उसके लिए भजन गाओ और फिर वो आगे इसी तरह से बढ़ते हुए बहुत सारी आज्ञाएं देता है परमेश्वर की आराधना करने के लिए और उसके कार्यों की चर्चा करने के लिए वो एक तरह से यहां पर आज्ञा दे रहा है और ऐसा लग रहा है कि भजनकार यहां पर उत्साह से भरा हुआ है। यह भजन 88 के भजनकार के समान यह विलाप नहीं कर रहा। वो यहां पर दुखी नहीं है। वो यहां

4:37 पर निराश नहीं है। वो यह नहीं कह रहा है कि प्रभु जी आप तो मुझे भूल गए हैं। लेकिन इसके विपरीत भजनकार यहां पर आनंद धन्यवाद और स्तुति के भाव को दिखा रहा है। और इसीलिए वो आज्ञा देते हुए कहता है आओ उसके अद्भुत कार्यों का वर्णन करो। उसको धन्यवाद दो। प तीन में वह कहता है उसके पवित्र नाम पर गर्व करो। प्रचार में वो कहता है उसके सामर्थ्य को खोजो और उसके दर्शन के खोजी हो। और यह सब बातें जो स्तुति आराधना करने के लिए जो यहां बात कर रहा है वो उसके चरित्र को दिखाता है। ये दिखाता है परमेश्वर है कौन? उसका नाम, उसके काम, उसका चरित्र ऐसा है कि हम उसकी स्तुति और आराधना करें और ना सिर्फ ये उसने जो कार्य किए हैं इतिहास में विशेष

5:23 रीति से इसराइल के इतिहास में जब ये भजनकार देखता है तो वो इस उन बातों को देखकर उसके अंदर इस बात की भावना उमड़ती है कि ना सिर्फ वो प्रभु की स्तुति करें, लेकिन देश- देश के लोगों में वह परमेश्वर के नाम की, उसके काम की चर्चा करें। सो यह दिखाता है कि प्रभु जी स्तुति आराधना के योग्य हैं और उनके कार्य इतने अद्भुत हैं कि हम सदैव उनकी चर्चा करते रहे और ऐसा कहने के द्वारा भजनकार यह चाहता है कि इसराइल जो उस समय परमेश्वर के लोग हैं वो एक ऐसा समुदाय बन जाए जो सदैव परमेश्वर को स्मरण रखता हो और उसके अद्भुत कार्यों की घोषणा करने के लिए सदैव तैयार रहे। और यह यहां पर जो आराधना है वह एक तरह से

6:10 वाचा संबंधी आराधना है क्योंकि यह परमेश्वर के कार्यों में निहित है उन कार्यों में जो प्रभु ने अपने लोगों के लिए किया है। वो आराधना यह किसी के मूड पर निर्भर नहीं है कि उनका मन करेगा तो आराधना करेंगे नहीं तो नहीं करेंगे। यहां पर आज्ञा है कि हम उसकी स्तुति और गुणगान करें। लेकिन प्रश्न यह है वो क्यों जानता है इन बातों को? क्यों वो इस तरह से बोल पा रहा है? वह क्यों कह रहा है कि हमको स्तुति करना चाहिए। अगर आप पद पांच को देखेंगे तो कह रहा है कि उसके किए हुए अद्भुत कार्यों को और उसके आश्चर्य कर्मों और उसके मुंह से निकले हुए निर्णयों को स्मरण करो। वह चाहता है कि जो कुछ प्रभु जी ने बोला है, जो कुछ भी उसने काम किया है, हम उनको

6:56 स्मरण रखें और जब उनको हम याद रखते हैं, जब हम प्रभु जी के हर एक काम को, उसकी दया को, उसकी कृपा को स्मरण रखते हैं, तो हमारा हृदय उसकी आराधना के लिए प्रेरित होता है। और जब हम भूल जाते हैं उन बातों को तो कई बार हम निराशा में, भय में और हताशा में चले जाते हैं। लेकिन जब हम उसके कामों का स्मरण रखते हैं तो हमारे विश्वास को बढ़ाने में और प्रभु की स्तुति करने में हमारी सहायता करता है। तो आइए हम आज के समय में सोचे कि वह कौन सी बातें हैं जिनको हम पूरे सप्ताह स्मरण रखते हैं वो कौन सी बातें हैं जिन पर हम अपना मन लगाते हैं जब हम बातचीत करते हैं तो हमारी बातचीत का मुख्य केंद्र क्या होता है? क्या वह परमेश्वर और उसके कार्य है या फिर हम स्वयं और अपनी उपलब्धियों को गिनाते

7:43 हैं या फिर हम अपनी चिंताओं को गिनाते हैं। परमेश्वर चाहता है कि उसके लोग सदैव उसको स्मरण रखें। उसमें आनंदित रहें क्योंकि परमेश्वर के कार्यों को भूलना हमें उससे दूर ले जाएगा और उसके कामों को स्मरण रखना हमारे विश्वास को बढ़ाएगा। लेकिन इतना ही नहीं भजनकार यहीं पर रुक नहीं जाता है। भजनकार परमेश्वर के चुने हुए लोगों को स्तुति करने की बात करते हुए आज्ञा देते हुए बस यहीं पर नहीं रुकता है। वो आगे बढ़ता है और उनको बताता है कि क्यों हमको स्तुति करना चाहिए। आखिर वो कौन सी बात है? वो कौन से काम है जो प्रभु जी ने किए हैं जिनके लिए उसको हमें स्तुति

8:28 और प्रशंसा और आराधना देना चाहिए। वो यह बात है कि परमेश्वर अपनी वाचा के प्रति सदैव विश्वास योग्य रहता है। वह अपने चुने हुए लोगों के लिए सदैव प्रावधान करता है। इसलिए हमको उसकी स्तुति करना चाहिए। अगर आप पश्चात से और आगे देखेंगे तो आप यहां पर पाएंगे भजनकार यहां पर बता रहा है कि परमेश्वर हर एक परिस्थिति में अपने लोगों के लिए प्रावधान करता है और विशेष रीति से सात पद में अगर आप देखेंगे तो कह रहा है कि हमारा परमेश्वर यहोवा है। किसका परमेश्वर यहोवा है? अगर इससे पहले छह पद में देखेंगे तो वहां पर कुछ लोगों का वर्णन किया गया। एक समूह की बात की गई है जो उसकी स्तुति आराधना करेंगे जिनको प्रभु जी स्मरण रखता है वो इब्राहिम के वंश है

9:14 वो उसके चुने हुए लोग हैं वो याकूब की संतान है परमेश्वर के विशेष वाचा के लोग उनको प्रभु स्मरण रखता है और उनसे बांधी गई वाचा को वो कभी नहीं भूलता और इसीलिए वह आगे बोलता है आठ पद में कि वह अपनी वाचा को सदा स्मरण रखता आया है परमेश्वर अपनी बातों को अपनी प्रतिज्ञाओं को अपनी वाचाओं को जो उसने अपने लोगों से की है उनको भूलता नहीं है। लेकिन लेकिन अगर हम बार-बार बात कर रहे हैं वाचा की तो ये वाचा है क्या? यह कौन सी वाचा है जिसके प्रति वह सदैव विश्वास योग्य रहता है जिसको सदा स्मरण रखता आया है भजनकार किस वाचा की बात कर रहा है यह वाचा हमको विशेष रीति से उत्पत्ति उसके 12 से 17 अध्याय के

10:00 बीच में मिलती है हम वहां पाते हैं कि परमेश्वर अब्राहम को बुलाता है और उससे कहता है कि तू अपने देश को अपने कुटुंबियों को अपने पिता के घर को छोड़कर उस देश को चला जा जो मैं तुझे दिखाऊंगा और फिर परमेश्वर उसे वाचा बांधते प्रतिज्ञा करते हुए कहता है मैं तुझे एक बड़ी जाति बनाऊंगा। मैं तुझे आशीष दूंगा। मैं तेरे नाम को महान करूंगा और मैं तुझे भूमि अर्थात एक देश दूंगा और मैं तेरे साथ रहूंगा और तुझ में पृथ्वी के सब घराने आशीष पाएंगे। यह वाचा परमेश्वर ने अब्राहम से बांधी थी और इसी वाचा के प्रति वह पुराने नियम में हम देखते हैं विश्वास योग्य रहता है। पुराना नियम हमको बार-बार

10:48 बताता है कि प्रभु अपनी वाचा के प्रति जो उसने इब्राहिम से बांधी थी उसके प्रति वह विश्वास योग्य रहता है और सात से 15 हमको बताता है कि परमेश्वर ना सिर्फ विश्वास योग्य है लेकिन वो सक्रिय रीति से कार्य कर रहा है। वो ऐसा नहीं कि वाचा बांध के भूल गया है लेकिन वो स्मरण रखता है। उसको स्मरण रखता है। याद रखता है और उसके अनुसार कार्य करता है। पद आठ बताता है कि वह अपनी वाचा को सदा स्मरण रखता है और उस वाचा को वो हजारों पीढ़ियों के लिए उसने ठहराया है। पद 10 में हम देखते हैं कि वह याकूब के लिए एक विधि ठहराता है। पद 14 में हम देखते हैं क्योंकि उसने अपने लोगों से वाचा बांधी थी। कुलपिताओं से वाचा बांधी थी। इसलिए उसने किसी भी मनुष्य को अपने चुने हुए लोगों पर अंधेर नहीं करने

11:33 दिया। इतना ही नहीं उसने राजाओं को धमकी दी। उसने राजाओं को धमकी दी और पद 15 बताता है क्या धमकी दी? उसने धमकी देकर कहा मेरे अभिषकों को मत छुओ और मेरे नबियों की हानि ना करो। यह दिखाता है कि परमेश्वर अपनी वाचा के अनुसार कार्य कर रहे हैं। उसको स्मरण रख रहे हैं और सदैव उस पर ध्यान रखते हुए अपनी दृष्टि को अपने लोगों पर लगाए रखते हैं। भले ही उसके लोग कम है। संख्या में कम है। भले ही वह निर्बल है। भले ही वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूम रहे हैं, चल फिर रहे हैं, जा रहे हैं। इन सब बातों के बावजूद भी प्रभु जी अपनी वाचा को नहीं भूलते हैं। उसने जिस दिन वाचा बांधी थी उस दिन से लेकर जब तक उसने पूरी

12:20 नहीं कर लिया तब तक उसने विश्वास योग्यता के साथ कार्य किया। सो जब यहां पर हम देखते हैं परमेश्वर निरंतर सक्रिय रीति से कार्य करता है। वह अपने लोगों को बचाता है। उनको छुड़ाता है। उनकी हानि नहीं होने देता है। तो क्या इसका मतलब यह है कि फिर उनके ऊपर कभी कोई कष्ट संकट दुख नहीं आएगा। यदि प्रभु जी सदैव कार्य करते हैं सक्रिय रीति से कभी भूलते नहीं है तो क्या इसका मतलब यह है कि फिर उसके लोगों के ऊपर कभी कोई कष्ट नहीं आएगा। इसका उत्तर हमें 16 से 23 में मिलता है। अगर आप आगे देखेंगे 16 पद में तो वो हमको बताता है कि जिस देश में उसके चुने हुए लोग थे उसी देश में उसने अकाल भेजा। उसने अकाल भेजा और उसने

13:07 रोटी का सहारा बिल्कुल तोड़ दिया। यह कैसी बात है? अभी तक वह सुरक्षा कर रहा है, देखभाल कर रहा है। लेकिन अब उसने क्या किया? अकाल को भेजा। लेकिन उसके प्रावधान को देखे। इससे पहले कि वो अकाल को भेजें। पद 17 हमको बताता है। उसने पहले एक व्यक्ति को अर्थात यूसुफ को पहले ही उनसे आगे भेज दिया ताकि उनको छुटकारा दें या उनको अकाल के समय में उनके लिए प्रबंध करें। हालांकि यूसुफ को दास होने के लिए बेच दिया गया। हालांकि युसुफ के जीवन में कष्ट आते हैं। उसको दुखों का सामना करना पड़ता है। लेकिन फिर भी परमेश्वर अपने वाचा के प्रति अपनी वाचा के प्रति विश्वास योग्य रहते हुए वह पहले से ही प्रावधान

13:53 करने के लिए यूसुफ को भेजता है। और जब वह यूसुफ को यूसुफ को भेजता है तो यूसुफ की कहानी हमको याद दिलाती है कि परमेश्वर आप दयालु परमेश्वर है और अपनी दया में होकर के कभी-कभी वो अपने लोगों को कष्टों में होकर जाने देता है और ना सिर्फ जाने देता है लेकिन कई बार वो जब लोग दुष्टता करते हैं जब लोग पाप करते हैं जब लोग बुराई करते हैं उन पापों के माध्यम से भी प्रभु जी अपनी योजना को पूरी करता है जैसा कि पद 17 और 18 हमको दिखाते हैं। उसके पैरों में बेड़िया डालकर उसको जकड़ दिया गया और लोहे के जंजीरों में वो जकड़ा रहा। ये यूसुफ पहले उसके भाइयों ने उसको बेच दिया और जब उसको बेचा तो मिस्र में गया और

14:38 पोथफर बिना उसने सच्चाई का पता लगाए उसने युसुफ को बंदी गृह में डलवा दिया और वहां पर वो बेड़ियों से जकड़ दिया गया। लेकिन उस समय भी परमेश्वर अपने वचन के अनुसार कार्य कर रहा था। भले ही उसके लोग यूसुफ विशेष रीति से कष्टों में होकर जा रहा लेकिन अभी भी परमेश्वर अपनी बड़ी योजना में होकर कार्य कर रहा है। अभी भी वो अपनी वाचा को पूरी करने के लिए तत्पर है। तो चाहे अकाल का आना हो चाहे यूसुफ का मिस्र में बेचा जाना हो चाहे जेल में डाला जाना हो। इन सब बातों के माध्यम में माध्यम से परमेश्वर कार्य कर रहा और उसको हम कैसे देखते हैं। आगे देखिए। 19 पद में लिखा है कि जब तक उसके वचन पूरे ना हो गए और यहोवा का वचन

15:24 जो यहोवा ने कहा था जो परमेश्वर ने कहा था उस वचन ने युसुफ को सिद्ध ना कर दिया तब तक वो ऐसी स्थिति में रहा फिर एक समय आया परमेश्वर ने उसको छुड़ाया राजा स्वयं दूत भेजकर उसको बचाता है और उसको भवन में लेकर राजमहल में लेकर आता है। उसको सारे अधिकारियों के ऊपर नियुक्त करता है ताकि वह मिस्र के अधिकारियों को मिस्र के बुजुर्गों को यूसुफ ज्ञान सिखाए। उनको बताया कि क्या करना है तो एक समय कष्ट रहा लग रहा था लेकिन परमेश्वर एक बड़ी योजना के अंतर्गत कार्य कर रहा था और उसने उनको यूसुफ को वहां पर भेज दिया और यह जो योजना है जिसके द्वारा प्रभु जी यहां पर काम कर रहे हैं। इस बात को युसुफ भी समझ गया था। इसलिए जब उसके भाई वापस आते हैं मिस्र में उनको लगता है कहीं ऐसा ना हो कि युसुफ

16:09 हमसे बदला ले। तो उस समय युसुफ कहता है अपने भाइयों से कहता है कि यहां पर युसुफ अपने भाइयों से बोलते हुए कहता है क्या मैं परमेश्वर के स्थान पर हूं? अगर आप उत्पत्ति 50 उसके 20 को पढ़ेंगे तो कहता है क्या मैं अपने क्या मैं परमेश्वर के स्थान पर हूं? तुमने तो मेरे साथ बुराई करने की ठानी थी। परंतु परमेश्वर ने उसी को भलाई के लिए ले लिया ताकि बहुत से लोगों के प्राण बचे। तो यूसुफ भी उस योजना को समझ गया था कि प्रभु जी ने क्यों उसको वहां पर भेजा है। सो भजनकार यहां पर हमको बताना चाहता है। अकाल और कष्ट यह मात्र कोई संयोग नहीं है। यह सब परमेश्वर की बड़ी योजना के साधन थे। ताकि परमेश्वर याकूब और उसके पुत्रों को

16:57 मिस्र देश में लेकर आए। उनको एक बड़ी जाति बनाए और फिर वहां से निकालकर वापस उस प्रतिज्ञा के देश में ले जाए ताकि उस वाचा को परमेश्वर पूरी कर सके जो उसने अब्राहम के साथ बांधी थी। इसलिए जब हमारे जीवन में कोई ऐसी घटना घटती है, कोई अप्रिय घटना घटती है या हमको लगता है हम किसी ऐसे संकट में फंस गए जहां से बच निकलना असंभव है। तो उस समय हमको परमेश्वर की बड़ी योजना को ध्यान देना चाहिए कि पूरे इतिहास में होकर वह अपने लोगों के लिए कोई कार्य कर रहा है और उस कार्य के द्वारा वो एक दिन अपने लोगों को उस प्रतिज्ञा के देश में ले जाएगा जिसका वर्णन हमें प्रकाशित वाक्य 21 और 22 अध्याय में मिलता है। सो भले यहां

17:43 पर कष्ट है लेकिन एक दिन प्रभु जी अपने लोगों को उन्नत करेगा और इसके साथ ही हमको इस बात को भी याद दिलाता है कि कभी भी परमेश्वर अपनी वाचा को नहीं भूलता और जब कभी वह हमको परखता है तो अपने वचन के द्वारा वो हमको सिद्ध करता है ताकि हम उसकी योजना के अनुसार उपयोग किए जा सके और इसके बाद पद 23 से 25 में हम एक और बात को देखते हैं और वो बात है कि ना सिर्फ यूसुफ वहां पर था। लेकिन जब यूसुफ उस देश का अधिकारी बन जाता है तो परमेश्वर इसराइल को मिस्र में लेकर आता है। अर्थात याकूब को हाम के देश में लेकर आता है। यहां पर मिस्र मिस्र को हाम का देश इसलिए कहा जा रहा क्योंकि ये वंशावली से संबंधित

18:30 उसका नाम है। अगर आप नूह के वंशजों के बारे में पढ़ेंगे। उत्पत्ति छह उत्पत्ति छह अध्याय में और उसके बाद भी तो आप वहां पर पाएंगे नूह के तीन बेटे थे शेम हाम और येथ और उन्हीं में से यह एक बेटा हाम है जिसके वंशज मिस्र देश में रहते हैं और परमेश्वर हाम को वहां पर लेकर आता है। और जब परमेश्वर यहां पर हाम का देश कह रहा है या भजनकार जब यहां पर हाम का देश कहता है तो हमको बताना चाहता है कि याकूब भले ही हाम के वंशजों की भूमि पर है परंतु परमेश्वर जो याकूब का परमेश्वर है वह सब राष्ट्रों का प्रभु है और वह अपने लोगों को छुटकारा देने में संभव है। चाहे उसके

19:16 लोग जिस भूमि पर हो चाहे जिस देश में हो वह सदैव अपने लोगों को छुटकारा देने में सक्षम है। और फिर हम इस योजना के आगे आगे बढ़ते हैं। इस योजना के अगले भाग को देखते हैं। 24 पद में जहां पर लिखा है परमेश्वर ने जो अब्राहम से वाचा की थी कि मैं तुझे बहुत बढ़ाऊंगा तेरे वंश को बढ़ाऊंगा उसको हम देखते हैं कि परमेश्वर यहां पर धीरे-धीरे पूरी करना आरंभ कर देता है। 24 पद में लिखा है वो अपने प्रजा को बहुत ही उसने फलवंत किया। इतना फलवंत किया कि वह अपने विरोधियों से अधिक हो गए। ऐसा लग रहा है कि इसराइलियों की संख्या मिस्री लोगों से भी अधिक हो गई। इस बात को बता रहा लेकिन दूसरी ओर हम देखते हैं 25 पद में परमेश्वर ने मिस्रियों के हृदय को फेर

20:02 दिया और वह इसराइलियों से घृणा करने लगते हैं और उनके साथ छल पूर्वक व्यवहार करने लगते हैं। यह एक तरह से दिखाता है कि परमेश्वर सब तरह की बातों पर संप्रभु है। वह लोगों के मनों को भी बदलता है लेकिन उसके बीच में भी होकर वो कार्य करता है। और ना सिर्फ यह लेकिन आगे हम पढ़ते हैं कि उसने ना सिर्फ संख्या में बढ़ाया इसराइलियों को लेकिन उसने अपनी योजना के अंतर्गत उसने मूसा और हारून को खड़ा किया और मूसा और हारून जब आते हैं तो वह हाम के देश में आश्चर्य कर्म करते हैं और यहां पर ये जो आश्चर्य कर्म है वो परमेश्वर के द्वारा भेजी गई 10 विपत्तियां हैं। उन 10 विपत्तियों में से परमेश्वर यहां आठ के बारे में बात करता है और नौवीं विपत्ति को

20:48 सबसे पहले रखते हुए वो 28 पद में कहता है कि उसने अंधकार भेजा और अंधेरा कर दिया और फिर 29 पद में बताता है कि उसने उनके जल को लहू बना दिया और उनकी मछलियों को मार डाला। 32 और 31 में वो कहता है उनके देश और घरों मेंढक आए। उसने आज्ञा दी तो डांस के दल आ गए और कुटकियां उमड़ पड़ी और 32 33 में लिखा है उसने मिश्रियों के ऊपर ओले बरसाए और उनकी फसलों को और वृक्षों को तहस-नहस कर दिया। और फिर 34 और 35 पद बताते हैं कि इसके बाद भी अगर कुछ बच गया था तो उसने टिड्डियों को बुलाकर सब कुछ नष्ट करवा दिया। लेकिन विडंबना की बात यह है यहां पर इतना सब कुछ होने के बाद भी इतनी तबाही होने के

21:35 बाद भी फिरौन का हृदय हठी बना रहा। उसने परमेश्वर का विरोध किया और उसके लोगों को जाने नहीं दिया। तब परमेश्वर ने फिरौन के देश के इसराइल के के छुटकारे के कारण मिस्रियों के सब पैलोठों को उसने मार डाला। और जिस रात मिस्र के पलोटे मारे गए उसी रात परमेश्वर ने इसराइलियों को छुटकारा दिया। उसी रात इसराइली लोगों को दासत्व से छुटकारा मिल गया और यह विपत्तियां दिखाते हैं कि परमेश्वर दुष्टों का न्याय करता है और अपने चुने हुए लोगों को छुटकारा देता है। तो यह छुटकारा इसको सारे इसराली लोग स्मरण रखते हैं। बार-बार जब वह पर्व मनाते हैं

22:22 तो अपने आने वाली पीढ़ी को इस छुटकारे के बारे में बताते हैं। उनके लिए यह बहुत बड़ी बात थी। लेकिन यह वास्तव में वास्तविक छुटकारा नहीं था। वह बड़ा छुटकारा नहीं था जिसकी योजना परमेश्वर ने जगत की उत्पत्ति से पहले बनाई थी। यह छुटकारा उस बड़े महान छुटकारे का एक चित्र था। एक छाया चित्र था जो परमेश्वर भविष्य में करने वाला था और वह छुटकारा वो महान छुटकारा नई वाचा के अंतर्गत परमेश्वर ने किया। जिसमें होकर परमेश्वर ने संसार के पापियों को दुष्टों का उसने न्याय किया। लेकिन विचित्र बात इस नए छुटकारे की यह है कि उसने पापियों के दंड को उनके ऊपर नहीं उंडेला।

23:08 लेकिन उसने उस न्याय को अपने ही परलोटे के ऊपर उंडेला। जब परमेश्वर ने उस महान छुटकारे को किया आज से लगभग 2000 वर्ष पहले तो उसने अपने ही इकलौते पुत्र यीशु क्र्रीस्ट को भेजा और वो पैलोठा पुत्र जो परमेश्वर का पैलोठा है वो हमारे और आपके पापों के बदले में मारा गया हमारे और आपके पैलो नहीं लेकिन परमेश्वर का पैलोठा हम जैसे पापियों के बदले में मारा गया ताकि परमेश्वर ने जो प्रतिज्ञा जो वाचा अब्राहम से की थी अब्राहम से बांधी उसको यीशु मसीह के द्वारा उन लोगों के लिए पूरा करें जो यीशु पर विश्वास करते हैं और उसको अपने उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण करते हैं। अगर आप गलातियों उसके 3 16 को

23:54 पढ़ेंगे तो वहां लिखा है और तुम मसीह यीशु के हो और यदि तुम मसीह के हो तो अब्राहम की संतान हो और प्रतिज्ञा के अनुसार उत्तराधिकारी भी हो। अगर हम मसीह में हैं, अगर हम विश्वासी हैं, अगर हम यीशु पर विश्वास करते हैं तो अब हम परमेश्वर के लोग हैं। अब हम परमेश्वर के छुड़ाए गए लोग हैं। अब हम उसकी नई वाचा के लोग हैं। अब हम परमेश्वर का वो स्थान है। वह लोग हैं जिनमें परमेश्वर वास करता है। कलीसिया परमेश्वर के लोग हैं। और कलीसिया को परमेश्वर एक दिन इस संसार से निकालेगा और नई सृष्टि में नए देश में जो प्रतिज्ञा की भूमि है वहां पर लेकर जाएगा। यह छुटकारा जो इसराइल का छुटकारा है, वह इस महान

24:41 छुटकारे की ओर संकेत करता है। तो जैसे परमेश्वर ने इसराइल के लिए यूसुफ, मूसा और महामारियों को भेजकर उनको छुड़ाया। वैसे ही हम एक तरह से देखते हैं कि उसने अपने पुत्र यीशु को भेजकर हमें छुटकारा दिया ताकि हम उसके प्रावधान के द्वारा यीशु के द्वारा बच जाए और यह छुटकारा जो यीशु के द्वारा हुआ यह कोई साधारण छुटकारा नहीं था। यह यीशु के पास की विजय को दिखाता है। यह दिखाता है कि यीशु ने पाप और मृत्यु पर विजय को प्राप्त कर लिया और इसी तरह की झलक को हम 37 पद से आगे भी देखते हैं। जहां पर लेखक कहता है कि वो इस्राइल को सोने और चांदी के साथ निकाल लाया और उसके कुलों में से कोई लड़खड़ाने ना पाया। यह

25:28 विजय की भाषा है। यह ऐसा नहीं कि बस किसी तरह से वो लोग जीवित बच निकले। लेकिन यह दिखाता है कि जब परमेश्वर किसी को समस्या से बचाता है तो सामर्थ्य के साथ निकालता है और वह विजय भाव में उनको निकालता है और जब वो मिस्र से निकलते हैं तो वो ढेर सारा सोना और चांदी लेकर आते हैं। यह सोना चांदी उन्होंने चोरी नहीं की थी। लेकिन मिस्रियों ने उनको दान दिया था क्योंकि वो इतने खुश थे कि ये लोग जा रहे हैं वहां से। वो आनंदित थे क्योंकि वह डरे हुए थे। उनको लग रहा था अगर यह हमारे बीच में रहेंगे तो यहोवा परमेश्वर उनको नष्ट कर देगा। तो यह छुटकारा परमेश्वर की विजय को दिखाता है। लेकिन मिस्र से छुड़ाने के बाद परमेश्वर ने उनको छोड़ नहीं दिया और उनके लिए जब वो यात्रा में थे तब भी प्रावधान करता रहा। 39 से 41 में हम देखते हैं कि

26:17 उन कि परमेश्वर उनके लिए छाया का बादल और रात को प्रकाश देने के लिए आग प्रकट की और उनके मांगने पर बटेरे भेजी। उन्हें स्वर्गीय रोटी से तृप्त किया। चट्टानों को फाड़ा और जल निकला और मरुस्थल में नदी बहने लगी। यह सब दिखाता है कि परमेश्वर के संप्रभु प्रावधान को उसने केवल छुटकारा नहीं दिया लेकिन बाद में उनके लिए बाद में भी प्रावधान करता है ताकि रात में रेगिस्तानी ठंड से उनको बचा सके। उनको लाइट दे सके। इसलिए उसने आग भेजा और दिन की चिलचिलाती गर्मी से बचाने के लिए परमेश्वर बादल का खंभा बनकर उनके साथ चलता रहा। और यह सब उसने इसलिए किया क्योंकि वह अपनी वाचा को स्मरण रखता है। और फिर इसके बाद 42 से 45 पद में हम देखते हैं कि भजनकार

27:05 इस पूरे भजन को जो अभी तक उसने बताया उसको समराइज करता है। उसको सारांशित करते हुए फिर से इसी घटना को मानो एक तरह से दोहराता है। अगर आप 45 देखेंगे वहां पे लिखा है क्योंकि उसने अपने सेवक इब्राहिम को दिया गया अपना पवित्र वचन स्मरण किया और इसी बात को हम पद आठ में पाते हैं। लिखा है वो अपनी वाचा को सदा स्मरण रखता आया। स्मरण रखता आया है, तो क्या किया उसने? छुटकारा दिया। और उसी बात को हम 44- 43 में देखते हैं। लिखा है ना सिर्फ उसने स्मरण किया, लेकिन अपनी पर प्रजा को आनंद के साथ और अपने चुने को जय जयकार के साथ निकाल लाया। वाचा स्मरण किया। उनको गुलामी से निकाल लाया जय जयकार के साथ क्योंकि विजय के भाव में उसने निकाला और इतना ही

27:50 नहीं उसने वाचा को पूरी किया। 44 पद को देखिए यहां पे लिखा है उसने उनको उनको जाति जाति के देश भी दिए कि वह अन्य जातियों के श्रम के फल पर अधिकार कर ले। सो यह दिखाता है। फिर से उसी कहानी को एक तरह से सारांशित करते हुए भजनकार कहता है। वह वाचा को स्मरण रखता है। उनको छुटकारा देता है और जो वाचा उसने की थी जो प्रतिज्ञा बांधी थी उसको पूरी करता है। लेकिन प्रश्न यह है उसने इन सब बातों को क्यों किया? उसने ये सब क्यों किया? इसका उद्देश्य क्या था? भजनकार अपने लोगों को 45 पद में एक उद्देश्य बताता है। वह कहता है उसने यह सब इसलिए किया ताकि वह उसकी विधियों को माने

28:36 और उसकी व्यवस्था को पूरी करें और उसकी स्तुति करें। परमेश्वर अपने लोगों को छुटकारा देता है ताकि वह उसकी आज्ञाओं का पालन कर सके। उसकी व्यवस्था के अनुसार चल सके और जब वह उन कामों का स्मरण करें तो सदैव उसकी स्तुति कर सके। तो आइए हम अपने जीवन के बारे में विचार करें। आज जब हमको परमेश्वर ने एक महान छुटकारा दे दिया। हमें नई वाचा के लोग बना दिया है। हमको उसने मसीह के द्वारा पापों से बचा लिया और अपने न्याय को उसने अपने पुत्र पर मुंडेलने के द्वारा हम पर एक महान उपकार किया है। तो फिर हमें क्या करना चाहिए? पहली बात हमें इस बात को ध्यान रखना चाहिए कि परमेश्वर अपनी वाचा

29:24 के प्रति सदैव विश्वास योग्य है और वह अपनी प्रतिज्ञा को बिना पूरी किए नहीं छोड़ता है। वो कभी भी ऐसा नहीं होता कि परमेश्वर अपनी वाचा को अपनी प्रतिज्ञा को भूल जाए। वह सदैव उसको स्मरण रखता है। तो भले हम संकट में हो, कष्टों में हो, हम प्रार्थना कर रहे हो और हमको लगे कि शायद प्रभु जी हमारी प्रार्थना पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। उस समय भी हमें स्मरण रखना चाहिए कि परमेश्वर इतिहास में होकर के अपनी बड़ी योजना के अंतर्गत अभी भी काम कर रहे हैं और उन्होंने हमको भला नहीं। उन्होंने हमको भुलाया नहीं दिया है। इसके साथ ही हमें परमेश्वर के प्रावधान पर भरोसा करना चाहिए। हमें उस पर निर्भर होना चाहिए क्योंकि जब हमको लगता है प्रभु ने हमको छोड़ दिया वह

30:10 तब भी हमारी भलाई के लिए किसी ना किसी रीति से कार्य कर रहा होता है। इसलिए हमें हर एक परिस्थिति में परमेश्वर के कार्यों का वर्णन करना चाहिए। क्योंकि यह हमको उसकी आज्ञा मानने के लिए और उसकी स्तुति करने के लिए प्रेरित करता है। जब जब हम परमेश्वर के महान कार्य को स्मरण करेंगे तब तक तब तब हमारे हृदय में उसके प्रति धन्यवाद, कृतज्ञता और स्तुति का भाव आएगा। और इतना ही नहीं हमको इस बात को स्मरण रखना चाहिए कि इतिहास में परमेश्वर सब कुछ को निश्चित कर दिया है। वह जानता है कि हर एक घटना हर एक समय में हर एक युग में कब क्या होने वाला है। सो इसलिए हमको

30:56 उसमें आश्वासन रखना चाहिए। हमको इस बात को मान के चलना चाहिए कि प्रभु जी हमारी भलाई के लिए आज भी कार्य कर रहे हैं। भले ही उस भलाई को हम अभी ना महसूस करें। एक दिन नई सृष्टि में अवश्य ही हम उसको महसूस करेंगे। लेकिन हमको यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रभु जी निश्चय ही अपनी वाचा के अनुसार कार्य कर रहे हैं। इसलिए अब हम उसकी नई वाचा के लोग होने के कारण ऐसे ना जिए जैसे कि हम मानो मिस्र की गुलामी में हैं। ऐसे ना जिए जैसे कि मानो हम पापों की गुलामी में हैं। हम ऐसे जिए कि अब हम प्रभु के छुड़ाए गए लोग हैं। उसकी महिमा उसकी स्तुति करते हुए उसकी आज्ञाओं और विधियों का पालन करें और विशेष रीति से हम अपने बारे में सोचें जब आजकल हम नियमित

31:45 रीति से हर रविवार को नहीं मिल पा रहे हैं। उस समय हम कैसे अपने कलीसिया के लोगों को उत्साहित करते हैं कि वह परमेश्वर के दर्शन के खोजी हो। हम कैसे उनको प्रेरित करते हैं। कैसे उनको उत्साहित करते हैं। कैसे उनसे बात करते हैं कि हमारी कलीसिया के भाई बहन जब भले ही हम नियमित रीति से ना मिले, भले ही हम अलग-अलग स्थिति में होकर जाएं, फिर भी हम निरंतर परमेश्वर को स्मरण रखें, उसके खोजी बने, उसके पीछे चलते रहें। तो कैसे हम अपने शाम का उपयोग करते हैं? कैसे हम अपने दिन का उपयोग करते हैं। कितना अधिक हमारे अंदर इस बात की चाह रहती है कि हम दूसरे भाई बहनों से मिल लें। उनको उत्साहित करें। उनको प्रभु के मार्ग में बढ़ाने में सहायता करें। और

32:30 इतना ही नहीं जब हम अपने घर में हैं जो अपने बच्चों के साथ हैं तो यह भजन हमको स्मरण दिलाता है कि हम परमेश्वर के महान छुटकारे की कहानी को अपने बच्चों को बताएं। उनको बताएं कि परमेश्वर कैसे विश्वास योग्य है। वह नियमित रीति से सदैव अपनी वाचा को अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है। और उसके साथ ही साथ यह जो महान उद्धार हमने प्राप्त किया उसका वर्णन हम सदैव प्रयास करें कि हम दूसरों से भी कर सकें ताकि वह लोग भी प्रभु यीशु पर विश्वास करें और इस महान उद्धार को महान छुटकारे को वह लोग भी अनुभव करें और एक दिन वो परमेश्वर के प्रतिज्ञा के स्थान में नई वाचा में नए देश में जो नया यरूशलेम है वहां पर वह भी पाए जाए। आइए हम

33:16 प्रार्थना करें। परमेश्वर को धन्यवाद दें। [संगीत]

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