Rudrabhishek in Hindi | Powerful Shiva Mantra Explained | Bhaiyaji

संक्षिप्त सारांश

यह पॉडकास्ट भगवान शिव और रुद्राभिषेक के महत्व पर केंद्रित है। इसमें श्रावण मास में रुद्राभिषेक करने के लाभ, रुद्राभिषेक का सही समय और तरीका, और घर पर रुद्राभिषेक करने के नियम शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, यह शक्ति साधना और प्राण ऊर्जा के महत्व पर भी प्रकाश डालता है।

मुख्य बातें:

  • रुद्राभिषेक भगवान शिव को प्रसन्न करने और जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का एक शक्तिशाली उपाय है।
  • श्रावण मास में रुद्राभिषेक करना विशेष रूप से फलदायी होता है।
  • रुद्राभिषेक करते समय शुद्धता और भक्ति का ध्यान रखना चाहिए।
  • शक्ति साधना और प्राण ऊर्जा का अभ्यास साधकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

परिचय: भगवान शिव और रुद्राभिषेक

शिवा साइंस मेडिटेशन के प्रणेता भैया जी, भगवान शिव और रुद्राभिषेक के महत्व पर प्रकाश डालते हैं। वे बताते हैं कि कैसे भगवान शिव, जो कभी जन्म नहीं लेते और न ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं, महाकाल और महादेव के रूप में पूजे जाते हैं। श्रावण मास में सोमवार के व्रत, पूजा-पाठ और साधना का महत्व बताते हुए, भैया जी कहते हैं कि यह समय भगवान शिव को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए विशेष रूप से अनुकूल है।

श्रावण मास का महत्व और रुद्राभिषेक का अर्थ

भैया जी बताते हैं कि जब तक पार्वती से विवाह नहीं हुआ था, तब तक शिव रुद्र थे। शक्ति के बिना, शिव क्रोधित हो जाते हैं। रुद्र 10 दिशाओं में गए और एकादश रुद्र बन गए, जिनमें से प्रत्येक का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। कष्ट और पीड़ा एकादश रुद्र के कारण ही आती है। रुद्राभिषेक करने से रुद्र शिव बनना शुरू हो जाता है, जिससे हमारे अंदर सकारात्मक बदलाव आते हैं। जिस प्रकार गर्म स्वभाव के व्यक्ति को ठंडा करने के लिए ठंडा पानी पिलाया जाता है, उसी प्रकार रुद्र की अग्नि को शांत करने के लिए जल से अभिषेक किया जाता है। दूध, दही, घी, मधु और अन्य पवित्र वस्तुओं से अभिषेक करने से भगवान प्रसन्न होते हैं और हमारे जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

रुद्राभिषेक का महत्व और पौराणिक कथाएं

भैया जी बताते हैं कि रुद्राभिषेक एक ऐसी व्यवस्था है कि इसे करने के बाद परमात्मा से की गई प्रार्थना कभी निराश नहीं करती। वे रामचरितमानस की एक कहानी का उल्लेख करते हैं जिसमें भरत जी ने रुद्राभिषेक किया था जब उन्हें अशुभ संकेत मिले थे। भगवान राम ने भी लंका पर चढ़ाई करने से पहले रामेश्वरम में रुद्राभिषेक किया था। इससे पता चलता है कि रुद्राभिषेक कितना शक्तिशाली है, क्योंकि इसे स्वयं भगवान ने किया था। श्रावण मास में रुद्राभिषेक अवश्य करना चाहिए।

साधना और रुद्राभिषेक का सही तरीका

भैया जी कहते हैं कि हर साधक की अपनी स्थिति होती है, इसलिए साधना करने का तरीका अलग-अलग हो सकता है। रुद्राभिषेक करते समय फॉर्मेलिटी नहीं करनी चाहिए, बल्कि भक्ति और प्रेम से करना चाहिए। देसी गाय का दूध, दही और जल समर्पित करना चाहिए। महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए, यह भावना करनी चाहिए कि आप अपने अंदर के शिव को जल समर्पित कर रहे हैं। शक्ति के साधकों के लिए यह समय अमृत के समान है। प्राण शक्ति पर काम करने वाले साधकों के लिए यह अमृतकाल है, क्योंकि इस समय भगवती की ऊर्जा प्राण ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है।

रुद्राभिषेक का सही समय और सोमवार का महत्व

भैया जी बताते हैं कि सोमवार का दिन रुद्राभिषेक के लिए विशेष रूप से शुभ होता है, क्योंकि सोमवार चंद्रमा का दिन है और चंद्रमा शीतलता से जुड़ा है। भगवान शिव चंद्रमा को अपने मस्तिष्क पर धारण करते हैं और गंगा को अपनी जटाओं में रखते हैं ताकि वे अपनी अग्नि को शांत रख सकें। सोमवार को ग्रह, तिथि, नक्षत्र, योग और वार सभी जल तत्वों का समर्थन करते हैं, जिससे रुद्र को शिव बनाना आसान हो जाता है। इस समय रुद्राभिषेक करने से हजारों गुना अधिक फल मिलता है।

रुद्राभिषेक का समय और शक्ति साधना का महत्व

भैया जी कहते हैं कि रुद्राभिषेक किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन ब्रह्म मुहूर्त में करना सबसे अच्छा होता है, क्योंकि उस समय सभी ऊर्जाएं हमें समर्थन करती हैं। शिव की साधना दिन में और शक्ति की साधना रात को की जाती है। हालांकि, रात की साधना हर कोई नहीं कर सकता, क्योंकि इससे जठराग्नि कम हो सकती है। रात की साधना केवल वरिष्ठ साधकों को गुरु की आज्ञा से ही करनी चाहिए। शक्ति की साधना करने वाले रात को 12:00 बजे तुरिय संध्या करते हैं।

घर पर रुद्राभिषेक और शिवलिंग की स्थापना

भैया जी कहते हैं कि रुद्राभिषेक घर पर भी किया जा सकता है, लेकिन यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वहां पर्याप्त शुद्धता और व्यवस्था हो। भगवान को स्थापित करने के लिए एक अलग कमरा या आंगन में एक साफ-सुथरी जगह होनी चाहिए। शिवलिंग को तुलसी के गमले में नहीं रखना चाहिए, क्योंकि उसे पर्याप्त स्थान नहीं मिलता और उसे ठोस जमीन मिलनी चाहिए। यदि आप भगवान की स्थापना कर रहे हैं, तो यह आपकी जिम्मेदारी है कि आप उस स्थान को साफ और व्यवस्थित रखें।

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Transcript

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0:00 फॉर्मेलिटी मत करो कि तुमने पानी डाल दिया, दूध डाल दिया, पैकेट फाड़ के तुम दूध कर रहे। वह नहीं। आप कितने भी मॉडर्न हो जाओ, देसी गाय का दूध अगर कहीं मिलता है >> तो हम सुबह करना चाहिए या शाम को करना चाहिए? कैसे करना चाहिए? किसी भी समय हम कर सकते हैं। जैसे कई लोग शमशान में जाके अलग-अलग क्रियाएं करते हैं और कई लोग रात को 12:00 बजे भी उसको कर रहे होते हैं। आरती भी कर रहे होते हैं। तो किस समय हमारे लिए सही रहेगा? मैं एक्चुअल साधक हूं और कर्मकांड मुझे उतने बेहतर मुझे आते नहीं है और मैं कर्मकांड के बारे में जानता भी नहीं हूं। लेकिन एक रुद्रा अभिषेक ऐसी व्यवस्था है कि जब भी किया रुद्रा अभिषेक और परमात्मा के सामने रुद्रा अभिषेक के बाद में हाथ जोड़ के अगर परमात्मा से कोई प्रार्थना कर ली तो कभी

0:47 भगवान ने निराश नहीं किया। भगवान ने वो दिया और दिया [संगीत] नमः शिवाय जो ना कभी जन्मा है ना कभी मृत्यु को प्राप्त करते हैं। ऐसे महाकाल महादेव के बारे में आज हम इस पॉडकास्ट के अंदर जानने वाले हैं। हमारे साथ में मौजूद हैं शिवा साइंस मेडिटेशन के प्रणेता परम पूज्य भैया जी। भैया जी नमः शिवाय। >> नमः शिवाय। >> भैया जी श्रावण मास में बोला जाता है कि सोमवार के व्रत करो, पूजा पाठ करो, साधना करो। उसका क्या महत्व है हमारे जीवन में? >> एक्चुअल पार्वती के साथ जब तक विवाह नहीं

1:32 हुआ तब तक शिव क्या हो गया? रुद्र हो गया। जब शक्ति के साथ में शक्ति का प्रागट्य ना हो। या तो सती होनी चाहिए या तो पार्वती होनी चाहिए। एक ऐसा समय भी आया जब सती ने शरीर छोड़ दिया और पार्वती उस समय जप तप कर रही थी या उन्होंने जन्म लिया था तो उसके बीच में शक्ति का जो प्रागट्य था वो नहीं हुआ था तो उस समय क्या था शिव रुद्र हो गया क्रोध में हो गया क्योंकि भगवती सती ने जिस हिसाब से प्राण छोड़े और पीड़ा से प्राण छोड़े उनके अंदर जो दक्ष के कारण जो उनके अंदर क्रोध आया उसके कारण सती ने जब प्राण छोड़े तो उस समय क्या हो गया भगवान रूद्र हो गए तो वह जो रुद्र हुए और उन्होंने उस रुद्र ने अलग-अलग दिशा में गया तो अलग-अलग दिशा का अलग-अलग प्रभाव

2:19 होता है। तो उस दिशा में जाने के बाद में अलग-अलग दिशा में जाने के बाद वो 10 रुद्र हो गए। 10 दिशाओं में गया तो 10 रुद्र हो गए और उसके बाद में वही रूद्र जब अपने अंदर प्रवेश किया तो एकादश रुद्र हो गए। तो जो एकादश रुद्र होते हैं वो हमारे जीवन में अगर इसमें से एक भी रुद्र अगर उसकी ऊर्जा कंट्रोलोल्ड ना हो तो हमारे जीवन में उसका बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। जैसा यह यूनिवर्स है वैसा हमारा शरीर है। लेकिन हमारा शरीर भी अपने आप में एक छोटा सा यूनिवर्स है। इसमें जब एक भी रुद्र की एनर्जी डिस्टर्ब होती है तो उससे जुड़ी जो व्यवस्थाएं हैं, हमारे जीवन में बहुत कठिन हो जाती है। तो उसमें क्या होता है कि

3:04 हमारे ग्रंथों में लिखा है कि जितनी भी कष्ट या पीड़ा आती है, वह एकादश रुद्र के कारण ही आती है। एकादश रुद्र में कोई भी एक रुद्र है या दो रुद्र है उनके कारण हमारे शरीर में पीड़ा या तकलीफ आती है तो उस रुद्र को जब आप अभिषेक करते हो तो वो जो शिव का जो नीचे का पार्ट है वो भगवती का शरीर है और जो ऊपर है वो भगवान शिव है लिंग है जो वो भगवान शिव है तो जब आप रूद्रा अभिषेक करते हो तो वो जो रूद्र होता है वो शिव बनना प्रारंभ कर देता है और जो उसमें शिवलिंग में जो परिक्रिया चल रही है उसका एक आंशिक असर आपके अंदर भी आता है। जब जैसे कोई आप कहते हो ना कि हमारे पंजाबी में कहते हैं ओए ठंडा रख ठंडा वो उनका सर गर्म होता है। हाथ में

3:51 तलवार होती है। शरीर ऐसा होता है तो वहां बड़े लोग जो होते हैं गुरु लोग कहते हैं कि तुम्हारे शरीर में ताकत है। तुम्हारे साइड में कपाड़ है, कृपाड़ है। तो तुम अपना यह भेजा ठंडा रखो। इसलिए उनको पगड़ी बांधने को बोलते हैं कि गर्म नहीं होना चाहिए। यह ठंडा होना चाहिए ताकि तुम सही डिसीजन ले सको। गुस्से में कोई डिसीजन ना लो। तो उस समय क्या होता है? और आपके घर में भी जब आपके फादर या आपके हस्बैंड या आपका कोई बेटा वगैरह उसको शांत करना होता है तो आप उसको बोलते बैठ शांति से बैठो। एक गिलास ठंडा-ठंडा पानी पियो। आराम से चाय-वा पियो या कुछ खाना खा लो। फिर अपन बात करेंगे। तो जब भी किसी को ठंडा करना होता है तो आप ठंडा पानी पिलाते हो या कुछ

4:37 ऐसा या कुछ भी चलो आइसक्रीम खाएंगे चलो ऐसे करेंगे ऐसे रुद्र क्या होता है उसमें अग्नि की ऊर्जा बहुत रहती है क्योंकि भगवती जल स्वरूपा है और शिव अग्नि स्वरूपा है अब जल तो अपने आप से विलुप्त हो गया ना भगवती तो अब चली गई सती तो चली गई और पार्वती के रूप में वो आने वाली है तो अब सिर्फ अग्नि अग्नि रह गई रुद्र के अंदर अग्नि की बहुत अधिक मात्रा रहती है। तो अब उस अग्नि को शांत करने के लिए आप जल से उसको जल से ही पूरा करोगे ना तो जो रुद्रा अभिषेक होता है वह जल होता है। फिर उसमें गंगाजल मिलाओ। आप थोड़ा गुलाब जल मिलाओ। फिर उसके बाद में आप जो पंचामृत है, दूध है, दही है, घत है, मधु है, पंच पंचामृत

5:26 है। उनसे जब आप उनका अभिषेक करते हो तो उससे क्या होता है? दूध में निर्मलता है, पौष्टिकता है, वह पवित्र है। तो वह जब दूध आप उनके ऊपर प्रवाहित करते हो तो वो आप भगवान को जो देते हो भगवान उसको मल्टीप्लाई करके वो आपके जीवन में डाल देते हैं। अब आप दूध से स्नान करोगे तो जो वो पौष्टिकता है दूध की जो वो निर्मलता है या जो उसकी दिव्यता है वो वो गुण आपके शरीर में आपके जीवन में वो भगवान डाल देंगे। मल्टीप्लाई करके। अब दही है उसकी जो भी गुण है वो आपको दे देंगे या मधु है उसके जो गुण है वो आपके जीवन में डाल देंगे तो अपन जब अपने सीनियर को कुछ देते हैं तो वो सीनियर उससे कई गुना ज्यादा करके हमें वापस देता है आध्यात्म में यह

6:13 प्रक्रिया है आध्यात्मिक की ये व्यवस्था है तो हम जो दे रहे हैं वो हमें वापस मिलता है तो उससे क्या होता है हमारा जीवन ज्यादा बेहतर हो सकता है इसलिए रुद्रा अभिषेक अवश्य और मेरे खुद के भी अनुभूतियां है मैं एक्चुअल साधक हूं और कर्मकांड मुझे उतने बेहतर मुझे आते नहीं है और मैं कर्मकांड के बारे में जानता भी नहीं हूं। लेकिन एक रुद्रा अभिषेक ऐसी व्यवस्था है कि जब भी किया रुद्रा अभिषेक और परमात्मा के सामने रुद्रा अभिषेक के बाद में हाथ जोड़ के अगर परमात्मा से कोई प्रार्थना कर ली तो कभी भगवान ने निराश नहीं किया। भगवान ने वह दिया और दिया। तो रुद्रा अभिषेक एक कहानी एक मैंने रामचरितमानस में पढ़ा था कि भरत जी अपने ननिहाल गए थे। भगवान श्री राम को वनवास

7:00 हुआ था। तो उस समय क्या हुआ कि भरत जी के जो बाम अंग जो फड़कने लगे कुछ ऐसे अपशगुन होने लगा भरत जी के साथ कि कुछ-कुछ होता था। तो भरत जी समझ गए कि कुछ तो हो रहा है। और भरत जी ने वहां से अपने नाना जी से परमिशन लेके और तुरंत वो निकले। तो निकलने के पहले वो इतने ज्यादा उनको समझ में आ गए कि कुछ हो रहा है। तो उन्होंने रुद्रा अभिषेक किया था। उस समय का जो नॉलेज था, जो ज्ञान था क्योंकि वो वशिष्ठ जी से उन्होंने वो लिया था ना तो वशिष्ठ जी ने उन्हें ज्ञान दिया था। वशिष्ठ जी ब्रह्मा के मानस पुत्र थे तो वो शुद्ध ज्ञान था। उस समय जो उन्होंने किया था वो रुद्रा अभिषेक किया था। रावण के ऊपर जो लंका पे चढ़ाई करने के लिए समुंदर किनारे भगवान ने

7:48 शिवलिंग स्थापना की थी। रामेश्वरम रुद्रा अभिषेक किया था। भगवान राम ने स्वयं रुद्रा अभिषेक किया था। तो इसका मतलब यह है कि जब भगवान राम रुद्रा अभिषेक करते हैं कुछ ना कुछ तो पावरफुल है जो परमात्मा स्वयं करता है तो वो कोई हल्का नहीं हो सकता और श्रावण मास में तो करना ही चाहिए। तो एक साधक ने श्रावण मास में किस तरह से अपनी साधना को क्या वो रुद्रा अभिषेक से कर सकता है या क्या कर सकता है कि वो उस भीतर की ज्योति को और प्राप्त कर सके और उसकी तरफ बढ़ सके। हर साधक की एक अपनी स्थिति होती है। वह किस स्थिति पर है? उससे आगे की व्यवस्थाएं जब तक हर साधक की अलग-अलग हो और ये उसके उत्तर भी अलग-अलग

8:35 हो सकते हैं। एक प्रश्न का उत्तर लेकिन मैं एक बात कहता हूं कि अगर सहज और सरल हो फॉर्मेलिटी मत करो कि तुमने पानी डाल दिया, दूध डाल दिया, पैकेट फाड़ के तुम दूध कर रहे। वो नहीं। आप कितने भी मॉडर्न हो जाओ। देसी गाय का दूध अगर कहीं मिलता है लोटे में भर के ले जाओ थोड़ा दही लेकर जाओ आपसे कुछ नहीं होता तो आप जल बस समर्पित कर दो आपको भगवान का महामृत्युंजय मंत्र आता है उस महामृत्युंजय मंत्र को करते हुए आप जल समर्पित करो और उस समय ऐसी भावना करो कि आपके अंदर जो भगवान शिव के जहां भी जो चीजें सुप्त रूप से हैं आप उनके ऊपर यह जल समर्पित कर रहे हो या दूध समर्पित कर रहे हो क्योंकि जो बाहर है वो

9:20 आपके अंदर है। उस समय आपने यह फील करना है कि जो आपके अंदर लिंग शरीर है आप उस पे दूध समर्पित कर रहे हैं। उस पे जल समर्पित कर रहे तो वो लिंग शरीर उनमें वाइबेशंस होती हैं, स्पंदन होती है और वो आपके लिए बेहतरीन व्यवस्था है। यह है और दूसरी बात क्या होता है कि जो शक्ति के साधक होते हैं, शक्ति साधकों के लिए यह समय अमृत के समय अमृत के समान होता है। इस समय अगर अच्छी तरह से साधना करी जाए तो शक्ति जो रहती है वो अच्छे से कृपा करती है और इस समय विशेष रूप से जो प्राण शक्ति पर काम करने वाले साधक हैं उनके लिए तो अमृतकाल है। एक्चुअल हमारे जो 10 प्राण होते हैं प्राण अपान उदान ब्यान समान फिर उसमें नाग

10:08 क्रक्कर धनंजय देवदत्त ये सब प्राण होते हैं। तो इन प्राणों पे यह बहुत सीक्रेट है और यह बहुत कम साधकों या साधुओं को पता होता है। इसके बारे में ग्रंथों में उतना ज्यादा लिखा नहीं गया और जितना लिखा गया है वह किसी एक मील के पत्थर के जैसा है। बहुत ज्यादा स्पष्ट नहीं। इसके बारे में साधना करतेकरते उस स्थिति पर एक साधक आता है जहां उसकी बुद्धि के अंदर प्रज्ञा की या रतंबरा की जागृति होती है तो उसको खुद भगवती सरस्वती की कृपा से ही प्राण के बारे में नॉलेज मिलता है। तो ऐसे कोई साधक हैं जो प्राण पे कार्य करते हैं तो उनके लिए यह अमृत काल है। इस समय वो जो भगवती की ऊर्जा रहती है वो प्राण ऊर्जा में

10:54 कन्वर्ट हो जाती है और साधक बेहतरीन होता है। >> तो जैसे बोलते हैं शिव जी को जल चढ़ाना है तो सुबह चढ़ाया करो या शाम को 4:00 बजे बाद चढ़ाया करो तो क्या ऐसा समय फिक्स होता है तो कौन से समय पे चढ़ाना चाहिए या क्या उसका सिर्फ सोमवार को चढ़ाना चाहिए ऐसा कुछ है >> सोमवार का क्या मतलब है सोमवार को सोम मतलब चंद्र होता है चंद्र में क्या होता है? भगवान चंद्रमा को अपने मस्तिष्क पर धारण करते हैं। उसका रीजन क्या है? और भगवान गंगा को अपने जटाओं में रखते हैं। तो उसका रीजन एक है कि भगवान के अंदर इतनी अग्नि रहती है। वो थर्ड आई होती है उसमें से

11:39 हमेशा परमात्मा के थर्ड आई से अग्नि निकलती रहती है। तो इतनी अग्नि रहती है। वो थर्ड आई इतनी पावरफुल रहती है कि मैं आपको इसके बारे में क्या बोलूं मैं? मतलब यहां पे जलन जैसी इरिटेशन होती है। अगर किसी की थर्ड आई ओपन होनी है या कुछ ऐसी प्रोसेस है तो यहां पे क्या होता है जलन होती है और उस समय क्या होता है कि आप पानी का एक बूंद भी अगर सर के ऊपर जाए ना तो ऐसा लगता है जैसे गर्म तवा के ऊपर एक बूंद पानी गिरा हो छन की ऐसी कोई बड़ी उस समय तकलीफ होती है। अग्नि जब सिर्फ अग्नि हो तो शरीर जलने लगता है तो भगवान के जो तीसरे थडाई है या अग् शिव नेत्र है उसमें

12:25 क्या होता है वो अग्नि स्वरूप है तो वो परमात्मा उस समय उसके कारण जब अग्नि ज्यादा होती है तो क्या होता है क्रोध आता है चिड़चिड़ापन आता है तो उसको बैलेंस करने के लिए भगवान क्या करते हैं सबसे ज्यादा ठंडी नदी अगर आप देखो तो गंगा है सबसे ज्यादा ठंडी नदी गंगा है उससे ठंडी मुझे नहीं लगता कोई है और उससे वेग उसका प्रबल है गंगा का बाहर से शांत लगेगी लेकिन आप नीचे कूदो तो वो उठा के ऐसे खींच के ले जाती है प्रबल वेग रहता है ऊपर से देखने से पता नहीं चलता है इसमें नीचे इतना तेज है एक तो वेग है और ऊपर से वो ठंडी है बहुत ठंडी है और तीसरा यह भगवान ने चंद्रमा को धारण किया है तो वो इसको बहुत ठंडा रखते हैं तो जो चंद्रमा की 16

13:11 कलाएं हैं वह शीतलता से जुड़ी हुई है चंद्रमा शीतलता से जुड़ा है। सूर्य अग्नि से जुड़ा है। चंद्रमा जल से जुड़ा है। चंद्रमा जल का पोषण करता है और सूर्य अग्नि का पोषण करता है। तो उस समय क्या होता है कि जो आप रुद्रा अभिषेक कर रहे हो रुद्र की एनर्जी को शांत करना है आपने तो आपको जल की सारी कलाएं चाहिए। तो वो सोमवार का दिन जो रहता है वो चंद्रमा का दिन रहता है। सोम ही ना सोम मतलब चंद्रमा तो उस समय उसकी कलाएं ज्यादा प्रखर होती है। तो सोमवार को जो आप अभिषेक करते हो उस समय ग्रह तिथि, नक्षत्र, योग, वार सब उसमें सपोर्ट करते हैं जल तत्वों को और वो

13:58 अग्नि को कम करते हैं। रुद्र को शिव बनाने में ज्यादा आसान होता है। जब ये सारी सृष्टि जल को सपोर्ट कर रही है। उस समय अगर आप वो कार्य करो तो वो जो रुद्र के अंदर की अग्नि है वो आसानी से कंट्रोल हो जाएगी। वो शिव बनने को तैयार हो जाएगा। आप कोई काम कर रहे हो सिर्फ आप कर रहे हो। लेकिन उस समय ग्रह भी आपको सपोर्ट कर रहे हैं। नक्षत्र भी आपको सपोर्ट कर रहा है। तिथि भी आपको सपोर्ट कर रही है। योग भी आपको सपोर्ट कर रहा है। वार भी आपको सपोर्ट कर रहा है। सब सपोर्ट कर रहा है। पूरी प्रकृति आपको सपोर्ट कर रही है। आप जो कार्य कर रहे हो वो पूरी प्रकृति उसको सपोर्ट करे। तो उस समय क्या है? आपका कार्य हजारों गुना ज्यादा पावरफुल हो जाता है। इसलिए सोमवार को किया जाता है।

14:44 >> तो जैसे आपने बताया हमें रुद्रा अभिषेक करने के क्या-क्या फायदे हो सकते हैं और हमारे अंदर भी चेंजेस आ सकते हैं। तो हम सुबह करना चाहिए या शाम को करना चाहिए? कैसे करना चाहिए? किसी भी समय हम कर सकते हैं। जैसे कई लोग शमशान में जाके अलग-अलग क्रियाएं करते हैं और कई लोग रात को 12:00 बजे भी उसको कर रहे होते हैं। आरती भी कर रहे होते हैं। तो किस समय हमारे लिए सही रहेगा? एक्चुअल रुद्रा अभिषेक तो ब्रह्म मुहूर्त में किया जाए तो सबसे बेहतर है क्योंकि उस समय जो रहती ऊर्जाएं सब हमें सपोर्ट करती हैं। जो भी ऋषि मुनि होते हैं उस समय अपनी ऊर्जाओं को फ्लो करते हैं और देखा भी जाए तो जैसे भगवान आप जब सुबह उठते हो तो अभिषेक करते हो। स्नान करते हो। अभिषेक मतलब स्नान तो हम उसको भगवान का स्नान ही तो कहेंगे। स्नान के बाद में

15:32 फिर उनका श्रृंगार करते हैं। वस्त्र वगैरह है, तिलक है या जो भी है तो वह स्नान ही है ना। हम साधारण व्यक्ति हम उनको बोलते हैं हम स्नान करके आते हैं। लेकिन भगवान को हम अभिषेक कराते हैं। तो अभिषेक आप सुबह उठ के ही करोगे ना। स्नान आप सुबह ही उठकर करोगे। लेकिन इसमें क्या होता है? जैसे शिव की साधना दिन में करते हैं और शक्ति की साधना रात को करते हैं अपन। जो लेकिन ध्यान रखिए इसमें बड़ी बहुत बड़ी चीज है। बहुत सारे साधक क्या करते हैं? रात को साधना करना शुरू कर देते हैं। उसका सीक्रेट एक है कि आप आपकी जो पिंगला नाड़ी है, वो अग्नि तत्व से जुड़ी है। वो दिवस है और आपकी नाड़ी इड़ा नाड़ी जल तत्व से

16:18 जुड़ी है। है ना? वह रात्रि है। तो आपका जीवन का लाइफ का साइंस क्या है कि आपका शरीर अगर ठंडा हो जाए तो आप मरना शुरू कर देते हो। डेड बॉडी ठंडी हो जाती है। तो आप आपके अंदर अगर अग्नि कम हो गई तो आपकी मृत्यु निश्चित आपकी तरफ आ रही है या बढ़ रही है। तो जो दिन की साधना करते हैं और इतनी साधना कर लेते हैं कि उनकी अग्नि भयानक बढ़ जाए। उसके बाद में वह रात्रि की साधना करें तो उनको खतरा नहीं है। रात की साधना हर कोई नहीं कर सकता। अगर रात की साधना करेगा तो मोस्टली लोगों के आपने देखा होगा डाइजेशन की प्रॉब्लम होती है। मतलब जठराग्निअ अग्नि कम होती है और अब वो रात की साधना कर रहे हैं। मतलब जल तत्व को बढ़ा रहे हैं तो अग्नि उसमें क्या होगी?

17:04 और मंद हो जाएगी ना। एक तो तुम्हारी अग्नि वैसे ही मंद है। ऊपर से तुम ई नाड़ी पे आ गए या रात्रि में साधना कर रहे तो तुम अग जल तत्व को बढ़ा रहे हो अपने शरीर में। तो जब जल तत्व बढ़ेगा तो अग्नि और कम होगी और अग्नि कम होगी तो आप मृत्यु के करीब जाओगे। तो अग्नि की साधना सीनियर जल की साधना जो रात को होती है वो बहुत सीनियर साधकों को ही मिलती है और वो गुरु आज्ञा से मिलती है। जब आपका फायर एलिमेंट का वर्क कम लगभग कंप्लीट हो जाता है। पिंगला का काम लगभग कंप्लीट होता है तब गुरु आज्ञा से इड़ापे जाते हैं। तो उस समय जो तुरिय साधना होती है रात को 12:00 बजे के करीब जो तुरिय साधना होती है, संध्या होती है। एक संध्या सुबह होती है वो 6:00 बजे की जब सूर्य उदय होता है। एक संध्या होती

17:51 है 12:00 बजे की। एक संध्या होती है शाम के 6:00 बजे की या 7:00 बजे की वो समय के हिसाब से बदलती जाती है। जब सूर्य अस्त होने को होता है उस समय संध्या बोलते हैं। और एक संध्या होती है तुरिय संध्या। वह रात को 12:00 बजे होती है। तो जो शक्ति की साधना करते हैं, वह रात को करते हैं। तो उनके हिसाब से वह जो होता है, वह तंत्र में बदल जाता है। रात की साधना मतलब तंत्र हो गया वो। अब कौन किस हिसाब से किसका तंत्र क्या है और कौन किस तंत्र में गया है या कौन सी कौन सी साधना कौन कैसी साधना कर रहा है उसका अलग-अलग विधियां होती हैं और अलग-अलग समय और तरीके होते हैं। उसको किसी एक व्यवस्था में नहीं बोला जा सकता है कि यह ऐसा होता है क्योंकि कोई अलग

18:38 तंत्र कर रहा है तो उसकी विधि अलग होगी। तो मोस्टली अगर देखा जाए तो अगर आपके सवाल कि कब करना चाहिए? तो ब्रह्म मुहूर्त में कर लीजिए। उस समय ना तो रात होती है ना दिन होता है। उस समय काल नहीं लगता। रात्रि काल समाप्त हो जाता है। सुबह लगभग पौ:45 बजे से ब्रह्म मुहूर्त चालू होता है और प्रातः काल आता नहीं है। तो यह काल से परे होता है यह समय। ब्रह्म मुहूर्त होती है। तो उस समय आप जो भी करते हो वो बेहतरीन होता है आध्यात्मिक ऊर्जाओं के लिए। >> तो क्या हम रुद्रा अभिषेक घर पर कर सकते हैं? हां आप रुद्रा अभिषेक घर पर कर सकते हैं। आराम से कर सकते हैं। लेकिन उस समय आपने यह देखना चाहिए कि क्या उतनी शुद्धि से हो रहा है क्या उतनी व्यवस्था से हो

19:24 रहा है। उसमें एक चीज आपने देखनी चाहिए। आपके घर में क्या एक अलग रूम है या एक आंगन में कोई ऐसी जगह है जहां पर आप उतनी अच्छी तरीके से भगवान को स्थापित करके आप उनकी सेवा कर सको। ऐसा नहीं होना चाहिए कि बाजू में बाथरूम है और आपने यहां पे शिवलिंग स्थापना कर दी। ऐसे नहीं एक उस एनर्जी को वो एनर्जी फैलती है। उसको एक एनर्जी एक स्पेस चाहिए। उतना स्पेस और उसके साथ में वहां पर उतने साफ सुथरी व्यवस्थाएं भी होनी चाहिए। कई लोग क्या रहता है? नाली के किनारे मंदिर बना देते हैं। उस पर कोई कुत्ता आकर गंदा कर जाता है। कोई बंदर आकर कुछ कर जाता है। जानवर कुछ कर जाते हैं। फिर उसमें मकड़ी के जाले

20:10 लग जाते हैं। अगर आप भगवान की स्थापना कर रहे हैं तो आपकी एक जवाबदारी है कि आप उनको वहां पे आपने उनका आवाहन किया है। वहां पर स्थापना किया है तो आपकी जवाबदारी है कि उस स्थान को साफ सुथरा रखोगे और व्यवस्थित रखोगे। अगर आपके घर में इतनी जगह है और आप उनको अच्छी तरीके से रख सकते तो अवश्य करिए। >> सर कहते हैं ना कि शिवलिंग को घर में स्थापित नहीं करना चाहिए तो क्या घर पर हम अंदर रख सकते हैं या कई लोग तुलसी में रख देते हैं और उसकी नियमित पूजा हमेशा करनी चाहिए। क्या है मैम? तुलसी में आप सिर्फ एक्चुअल वो शिवलिंग तुलसी में शालिग्राम रखे जाते हैं। शालिग्राम जो है ना भगवान श्री नारायण का एक स्वरूप है। उनको भगवान

20:58 को एक स्त्री ने श्राप दिया था तो वो शालिग्राम तुलसी के साथ रहते हैं। जो शिवलिंग होता है उसका नीचे का पार्ट होता है और उसके ऊपर लिंग होता है। उसको शिवलिंग कहते हैं। हो सकता है कि कोई वहां पे भी शिवलिंग रखे लेकिन मुझे लगता है कि तुलसी के गमले में शिवलिंग को रखना मतलब थोड़ा सा उसको उतना स्पेस नहीं मिलता और वो उतना मिट्टी है ना नीचे तो उसको एक सॉलिड मतलब जमीन तो मिलनी चाहिए कि वो हिले ना तो वो मुझे ज्यादा बेहतर नहीं लगता। अच्छा >> दूसरी बात क्या होती है कि आप तुलसी के ऊपर रखोगे फिर कहीं कोई कौवा आएगा कोई पक्षी आएगा फिर कुछ उधर पे आपने चढ़ा दिया तो उस पे वो थोड़ा सा भगवान तो भगवान है

21:46 उनको कुछ नहीं लेकिन अपन ने देखना है कि अगर वो मेरे परमात्मा है तो क्या अपन उनके साथ यह सही है कि उनको घर के बाहर रख दिया कोई ऊपर से छाया भी नहीं है धूप भी लग रही है उनको सब कुछ हो रही है। ऐसा मुझे उतना उचित नहीं लगता। अगर करना है तो ठीक से करो।

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