हाथ में डिग्री, गले में ताबीज़ - भारत के पढ़े-लिखे अंधविश्वासी || आचार्य प्रशांत

संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो शिक्षा, अंधविश्वास और विज्ञान के बीच के संबंध पर चर्चा करता है। speaker यह बताते हैं कि कैसे विज्ञान की डिग्री प्राप्त करने के बावजूद लोग अंधविश्वास में विश्वास करते हैं।

  • शिक्षा में परिवर्तन की आवश्यकता है।
  • अंधविश्वास व्यक्ति की आंतरिक समस्या है, बाहरी नहीं।

शिक्षा और अंधविश्वास

speaker ने चर्चा की है कि लोग विज्ञान की उन्नत डिग्रियों के बावजूद अंधविश्वास पर विश्वास करते हैं। वे बताते हैं कि कैसे लोग बिना किसी वैज्ञानिक परीक्षण के विचारों को स्वीकार कर लेते हैं और इन विचारों को सोशल मीडिया पर फैलाते हैं।

अंधविश्वास और विज्ञान

speaker ने बताया कि अंधविश्वास का संबंध व्यक्ति की आंतरिक स्थिति से है, न कि बाहरी वस्तुओं से। उदाहरण के लिए, व्यक्ति दही या ताबीज़ को लेकर विश्वास करता है कि इसका कुछ प्रभाव होगा।

आधुनिक शिक्षा की सीमाएँ

speaker ने कहा कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में आत्म-प्रवेश की कमी है। कक्षाओं में आत्मज्ञान या आत्म-परीक्षा की शिक्षा नहीं दी जाती है, जिसकी वजह से व्यक्ति अपनी आंतरिक समझ नहीं बना पाता।

आध्यात्मिकता और विज्ञान

video में उद्धृत किया गया है कि विज्ञान और आध्यात्मिकता को अलग संतुलन में देखना महत्वपूर्ण है। speaker ने कहा कि सिर्फ बाहरी ज्ञान से दुनिया की समस्याओं का समाधान नहीं निकलता।

दुनिया की समस्याएं

speaker ने यह सवाल उठाया कि क्या विज्ञान या तकनीकी समाधान वास्तव में मानवता की समस्याओं का समाधान कर सकती है। उन्होंने बुरे हालातों का उल्लेख किया जैसे कि जलवायु परिवर्तन, जिसमें मानव की लालच और भौतिकवाद शामिल है।

स्वयं की पहचान

speaker ने कहा कि हमें अपने भीतर की पहचान की ओर ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल बाहरी ज्ञान पर केंद्रित है, लेकिन भीतर की खोज आवश्यक है ताकि व्यक्ति अपने अस्तित्व को सही तरीके से समझ सके।

आध्यात्मिकता की आवश्यकता

speaker ने सुझाव दिया कि आध्यात्मिकता से लोगों को अंधविश्वास से मुक्ति मिल सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि वेदांत में आस्था रखने वालों को इस सच्चाई को समझना चाहिए और उस ज्ञान की गहराई में जाना चाहिए।

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Transcript

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0:00 एक सवाल था कि साइंस में बड़ी-बड़ी डिग्री लेने के बाद भी लोग यहां पे सुपरस्टिशन में काफी विश्वास करते हैं। कुछ किसी ने कह दिया कि अरे ये ये इलाज काम करता है। वो बिना सोचे समझे कि [संगीत] इसका क्या टेस्टिंग हुई है? क्या हुआ है? वो सोच के उस पे अंधविश्वास करते हैं। WhatsApp फॉरवर्ड कर देते हैं वगैरह-वगैरह। तो ये हम कहां पे गलत है और ये एजुकेशन में कहां चेंज लाने की जरूरत है? अब आप जब किसी अंधविश्वासी आदमी को देखते हो तो आप देखते हो कि वो क्या कर रहा है। समझ लीजिए कि उसने उसने दही पकड़ रखी है और सोच रहा है कि मैं अगर दही को चाटूंगा तो मेरे ज्यादा नंबर आ जाएंगे। या वो बिल्ली को देख रहा है और कह रहा है कि वो बिल्ली रास्ता काट गई है तो कुछ मेरा नुकसान हो जाएगा। उसने गले में कुछ पहन रखा है। कुछ गंडा ताबीज कुछ डाल रखा है। हम सोचते हैं उसका जो संबंध है अंधविश्वास का वो ऑब्जेक्टिव

0:47 यूनिवर्स से है। बिल्ली से है, दही से है या ताबीज से है। ऑब्जेक्टिव यूनिवर्स से है नहीं। तो नतीजा क्या निकला है? पढ़ा लिखा अंधविश्वासी आदमी जो कि रॉकेट ल्च करता है मुहूर्त देख के। रात में 3:00 बजे जब अचानक नींद खुल जाती है तो पसीने में पाते हैं अपने आपको। कौन सी साइंस आपकी मदद कर देगी अब? और वहां हम बिल्कुल निरक्षर हैं। इलिटरेट हैं। हमें कुछ नहीं पता अपने बारे में क्योंकि जिन्होंने हमारा पाठ्यक्रम तय करा है। ये जो सब करिकुला है जहां से आ रहे हैं शायद वो खुद भी प्रशांत वेरी हैप्पी टू सी यू हियर। अ मेरे को आपके वीडियो देख के बड़ा अच्छा लगा कि आप सुपरसिशन के अगेंस्ट बोलते हैं, रैशनलिटी की तरफ बोलते हैं। एक सवाल था कि

1:32 हमने साइंटिफिक टेंपर अपने कॉन्स्टिट्यूशन में डाल दिया और साइंस पढ़ना हमारे लिए कंपलसरी है हर बच्चे के लिए। फिर भी साइंस में बड़ी-बड़ी डिग्री लेने के बाद भी लोग यहां पर सुपरस्टिशन में काफी विश्वास करते हैं। या फिर उनका साइंटिफिक या वैज्ञानिक मानसिकता नहीं है। कुछ किसी ने कह दिया कि अरे ये ये इलाज काम करता है। वो बिना सोचे समझे कि इसका क्या टेस्टिंग हुई है क्या हुआ है। वो सोच के उस पे अंधविश्वास करते हैं। WhatsApp फॉरवर्ड कर देते हैं वगैरह-वगैरह। और अगर आप देखो कि पिछले हजार 2000 3000 साल पहले जो नॉलेज हमारे सभ्यता में आई थी तो वो बिना जिज्ञासा के बिना सत्य की खोज के नहीं आई होगी। किसी ने ये नहीं कहा होगा कि मेरे पूर्वजों ने सब कुछ ढूंढ लिया है। तो अब मुझे कुछ ढूंढने की जरूरत नहीं है। बस मैं पूर्वजों

2:19 को मान के चलूं। तो अभी क्या ऐसा है कि हम वो दोबारा नॉलेज को आगे बढ़ाने के लिए नहीं सोच पाते। या तो हम पाश्चात्य नॉलेज पे पूरा डिपेंडेंट रह जाते हैं या फिर जो हमारे पूर्वजों ने बोल दिया उसको सत्य मान के कि उससे आगे हमें हमें उसकी टेस्टिंग भी नहीं करनी है। तो ये हम कहां पे गलत है और ये एजुकेशन में कहां चेंज लाने की जरूरत है कि ये आगे बढ़ाया जा सके। वंडरफुल। प्रोफेसर सेठी मेरे बैचमेट हैं आईटी दिल्ली से। सो ग्रेट टू बी रिसीविंग अ क्वेश्चन फ्रॉम हिम। वंडरफुल। देखिए पहली बात सुपरस्टिशन का इलाज साइंस

3:05 नहीं है। यह बहुत बड़ा सुपरस्टिशन है कि सुपरस्टिशन को आप साइंस से काट दोगे। साइंस क्या है? साइंस एक बाहरी चीज है और सुपरस्टिशन बाहरी चीजों को विषय बनाता है। ऑब्जेक्ट बनाता है। सुपरस्टिशन नहीं है बाहर। सुपरस्टिशन का ऑब्जेक्ट है बाहर। सुपरस्टिशन यहां है। और साइंस यहां घुसने से इंकार करता है। साइंस बहुत ईमानदार है। साइंस कहता है इंसान के दिल में क्या है? उससे हमें कोई लेना देना नहीं। साइंस कहता है मुझे तो ये पता करना है इसके अंदर क्या है। इसको देखने वाले के अंदर क्या है? साइंस उस क्षेत्र में जाता ही नहीं। साइंस ने अपनी जो बाउंड्री है, सीमा वो बहुत ऑनेस्टली डिलिनेट कर रखी है। ठीक है ना? आई विल डील मायसेल्फ वि द ऑब्जेक्टिव वर्ल्ड दैट इज अमिनेबल टू द सेंसेस एंड टू

3:54 द माइंड। जो कुछ आंख से दिखाई देता हो या इंद्रियों को अनुभव होता हो या कम से कम मन जिसको कंसेप्चुअलाइज कर सकता हो उससे साइंस बात करता है। अब [नाक से की जाने वाली आवाज़] आप जब किसी अंधविश्वासी आदमी को देखते हो तो आप देखते हो कि वो क्या कर रहा है। समझ लीजिए कि उसने उसने दही पकड़ रखी है और वो सोच रहा है कि मैं अगर दही को चाटूंगा तो मेरे ज्यादा नंबर आ जाएंगे। या वो बिल्ली को देख रहा है और कह रहा है कि वो बिल्ली है। बिल्ली रास्ता काट गई है तो कुछ मेरा नुकसान हो जाएगा। या वो किसी और चीज को लेके कोई और कोई और चीज बताओ जिसको लेकर सुपरस्टिशन रहता है उसने गले में कुछ पहन रखा है कुछ गंडा ताबीज कुछ डाल रखा है तो हमारी आंखें हमको बताती हैं कि जैसे सुपरस्टिशन का ताल्लुक बिल्ली से है दही से है या ताबीज से है या वो सूर्य ग्रहण चंद्र ग्रहण को सोच रहा है कि सूर्य ग्रहण

4:39 चंद्र ग्रहण से बाहर निकलोगे तो तुम्हारा अपशकुन हो जाएगा। हम सोचते हैं उसका जो संबंध है अंधविश्वास का वो ऑब्जेक्टिव यूनिवर्स से है। ऑब्जेक्टिव यूनिवर्स से है नहीं। ऑब्जेक्टिव यूनिवर्स में सुपरस्टिशन के ऑब्जेक्ट्स होते हैं। सुपरस्टिशन का सब्जेक्ट तो यहां बैठा हुआ है ना। उसके बारे में हमने कुछ करा ही नहीं। तो नतीजा क्या निकला है? पढ़ा लिखा अंधविश्वासी आदमी जो कि रॉकेट ल्च करता है मुहूर्त देख के। भारत में खूब होता है। रॉकेट ल्च किया जा रहा है। पहले मुहूर्त देखा जाता है। कितने बजे रॉकेट ल्च होगा। हम कोई लड़ाई भी करनी होगी। सीमा पर आ गया है तो पहले देखा जाएगा कि उचित मुहूर्त क्या है जवाब देने का। आप बोर चले जाइए। आप सोचेंगे कि भाई ये तो

5:26 आईटी नगरी है यहां पर तो और वहां आपको जितना अंधविश्वास मिलेगा आप कहेंगे चल क्या रहा है यहां पर? और जवान लोग एकदम पढ़े लिखे लोग जो अपने आप को मोड बोलेंगे और सारी वही लाइक रो और यह सब कर रहे होंगे और भीतर ही भीतर उनमें गजब अंधविश्वास होगा। कोई बता रहा होगा कि कुछ भी चलता है कि वह कैलाश पर्वत पर एलियन स्पेसक्राफ्ट लैंड करते हैं। कोई कुछ बता रहा हो, कोई कुछ बता रहा होगा। अंधविश्वास का गढ़ बना बैठा है बोर। वजह हमने जो भी शिक्षा दी है ना वो बाहर की दी है। हम सब बहुत पढ़े-लिखे लोग हैं। हमें एकदम पता है कि दुनिया में चल क्या रहा है। अभी इस कमरे में जो कुछ है उसके बारे में आपसे पूछूंगा। आप सब कितने बढ़िया तरीके से बता दोगे। मुझसे तो

6:12 कहीं ज्यादा अच्छे तरीके से आप बता दोगे। कुछ पूछूं? मैं पूछूं कि यह जो है जरा इसके कुछ मॉलिक्यूलर कॉन्स्टिट्यूशन का बताइए। आप तुरंत बता दोगे। यह जो लाइट है इसके बारे में पूछूंगा आप बता दोगे। यह जो ऑडियो सिस्टम है आप सब जानते हो। आप सब कुछ जानते हो। आप अपने बारे में कितना जानते हो। अपने बारे में नहीं जानते तो भीतर जो छुप करके बैठा हुआ है दुश्मन वो फिर बैठा ही रह जाता। हमें उसका नहीं पता होता। सुपरस्टिशन साइंस से नहीं स्पिरिचुअलिटी से दूर होगा। और मैं वह पगापंथी अध्यात्म की बात नहीं कर रहा हूं। मैं वो जो फ्रॉड स्पिरिचुअलिटी है उसकी बात नहीं कर रहा हूं। मैं बात कर रहा हूं रिगरस स्पिरिचुअलिटी की जिसके पास बस एक जिज्ञासा होती है। यह भीतर से देखने वाला है कौन? केन उपनिषद पूछता है कौन है

7:00 जो शब्दों को बाहर प्रेषित करता है और जब शब्द बाहर प्रेषित होते हैं तो जाना कहां चाहते हैं? हां श्रोत्रस श्रोत्रम कौन है जो कानों के पीछे बैठकर सुनता है और वो किसको सुनने के लिए इतना बेचैन है कि जीवन भर सुनता ही जाता है सुनता ही जाता है कौन है जो आंखों के पीछे बैठा है और क्या खोज रहा है वो जो आंखें कभी स्थिर नहीं होती आंखें हमेशा ऐसे ऐसे जिंदगी भर आंखें कुछ खोजती रहती हैं जिसको खोज रही है आंखें कभी मिलता नहीं कौन है ये जिज्ञासा करते हैं कि भीतर कौन है कौन है जिसकी तलाश में मन जीवन भर सोचता रहता है सोचता ही जाता है सोचता ही जाता है पर सोच कभी कभी किसी निष्पत्ति पर नहीं पहुंच पाती। कौन है जिसके लिए मन सोच रहा है? कौन है जो मन को सोचने के लिए भेजता है। सोच का स्रोत है और कौन है जो उसी सोच का गंतव्य भी है? सोच कहां से

7:48 चलती है और कहां जाना चाहती है? आदि अंत क्या है? इन प्रश्नों पर हमारी शैक्षणिक व्यवस्था कभी विचार करती नहीं ना। हम लोगों ने ह्यूमैनिटीज के कुछ कोर्सेज करे थे। वो बहुत अच्छे थे। पर उसमें सेल्फ इंक्वायरी का कोई कोर्स नहीं था। थर्ड सेमेस्टर से लेकर के हमारे सिक्स्थ सेमेस्टर तक एक-एक कोर्स कंपलसरी होता था ह्यूमैनिटीज का। बहुत अच्छे कोर्सेस थे। बहुत अच्छी बात है। पर उसमें एक कमी रह गई। हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था में एजुकेशन ऑफ द सेल्फ जैसा कुछ नहीं है। हम बाहर बाहर का बताते रहते हैं क्या चल रहा है। भीतर क्या चल रहा है उसका हमें पता नहीं। जबकि जीना आपको किसके साथ है। आपको सब कुछ बता दिया गया है सिंपल पेंडुलम के बारे में। आप पेंडुलम के साथ जिंदगी जिओगे क्या? आप इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स को खूब जानते हो। आपके प्राण वहां जाकर अटके हुए

8:34 हैं क्या? आप जीते किसके साथ हो दिन रात? किसके साथ जीते हो? आप अपने साथ जीते हो? आप अपने साथ जीते हो और रात में 3:00 बजे जब अचानक नींद खुल जाती है तो पसीने में पाते हैं अपने आपको। कौन सी साइंस आपकी मदद कर देगी अब? और वहां हम बिल्कुल [गला साफ़ करने की आवाज़] निरक्षर हैं। इलिटरेट हैं। हमें कुछ नहीं पता अपने बारे में। क्योंकि जिन्होंने हमारा पाठ्यक्रम तय करा है ये जो सब करिकुल है जहां से आ रहे हैं शायद वो खुद भी अपने बारे में बिल्कुल अनभिज्ञ थे ना उन्हें यह पता था वो कौन है ना उन्हें इस बात की जरूरत पता थी कि आने वाली पीढ़ियों को बच्चों को छात्रों को सेल्फ में एजुकेट करो मैं रिलीजियस एजुकेशन की बात नहीं कर रहा किसी को ऐसा तो नहीं लग रहा मैं नहीं कह रहा हूं कि सबको ले जाकर के किसी पंथ में दीक्षित कर देना है भाई मैं बहुत सीधी

9:19 सच्ची शुद्ध चीज की बात कर रहा हूं मेरी भीतरी प्रक्रिया क्या है? उसको जानने में कुछ धार्मिक या मजहबी एंगल आ गया क्या? कोई इसमें समस्या है? आप अगर स्वयं को जानने लगोगे तो सेकुलरिज्म रुक जाएगा। बाधा पड़ जाएगी कुछ। लेकिन सेकुलरिज्म वगैरह के नाम पर हमने क्या करा? हमने आत्मज्ञान से सेल्फ नॉलेज से ही वंचित कर दिया। एक नहीं दो-तीन पीढ़ियों को। तो क्या उसका नतीजा निकलता है? नतीजा यही निकलता है कि हमें समझ में नहीं आता। हम सोचते थे जैसे-जैसे हाईली एजुकेटेड होगा वैसे-वैसे उसकी जिंदगी में एक निखार और नूर आएगा। हम देखते हैं कितना पढ़ा लिखा है और गजब के अपराध कर रहा है। और आज दुनिया के सामने जो समस्याएं खड़ी हैं। आप

10:05 मुझे बताओ उनका कोई टेक्नोलॉजिकल सॉल्यूशन है क्या? रूस कह रहा है यूक्रेन पर अब न्यूक्लियर बम गिरा दूंगा। बताओ कौन सी टेक्नोलॉजी रोक सकती है रूस को? कोई टेक्नोलॉजी है जो इंसान की हिंसा और हवस और वैशीपन को रोक सके? उस ऐसी कोई टेक्नोलॉजी है? जल्दी बोलो। क्लाइमेट चेंज को रोक पाने वाली कौन सी टेक्नोलॉजी? एंड क्लाइमेट चेंज इज अ प्रोडक्ट ऑफ ह्यूमन ग्रीड एंड द लस्ट फॉर कंसमशन। कोई टेक्नोलॉजी है जो कार्बन चेंज ग्रीन टेक्नोलॉजी वगैरह मत बोल देना। उससे नहीं रुकने वाला बाबा। बेकार की बातें नहीं। कोई टेक्नोलॉजी है जो हमें समझा सके कि जितना हम कंज्यूम कर रहे हैं हमें उतना

10:51 कंज्यूम करने की जरूरत नहीं है। आज की जितनी दुनिया की समस्याएं हैं उनका हल ना विज्ञान के पास है ना टेक्नोलॉजी के पास है। उसका हल आत्मज्ञान के पास है। लेकिन उससे हम डरते हैं। हमको लगता है दंगे हो जाएंगे। और वो जो डर है उसकी भी वजह है। देखो भारत को जो आजादी मिली थी वो विभाजन के साथ मिली थी। खूनी दंगों खूनी मजहबी दंगों के साथ मिली थी। तो इसलिए उस वक्त बहुत ज्यादा सतर्कता बरतनी पड़ी और फिर अति हो गई। अति हो गई। अति ये हो गई कि बिल्कुल ही खत्म कर दिया। नहीं तो मैं वजह जानना चाहता हूं। चार साल के बीटेक प्रोग्राम में और उसके बाद एमटेक प्रोग्राम होते हैं और ना जाने कितने और प्रोग्राम होते हैं। एक भी कोर्स क्यों नहीं होता सेल्फ इंक्वायरी पर। और सेल्फ इंक्वायरी बिल्कुल वैसे ही होती

11:39 है जैसे आप बाहर की दिशा में इंक्वायरी करते हो। सवाल पूछो जो उत्तर आए उसको जांचो परखो। गजब दर्जे की ऑब्जेक्टिविटी होती है उसमें जबकि वो बात सब्जेक्ट को लेकर के हो रही है। यही वजह थी कि जो कुछ भी मैंने पढ़ाई लिखाई करी, जो भी मुझे करियर मिल रहे थे उनसे ज्यादा मुझे जरूरी लगा यह काम करना। मैंने कहा यार बाकी तो सब ठीक है लेकिन हम आधी शिक्षा दे के लोगों को दुनिया में धकेल दे रहे हैं और वो दुनिया में फिर करेंगे क्या दुनिया आज कहां पर आकर के खड़ी हो गई है और उसका जो नतीजा है ना वो वो हमारी एजुकेशन ही है। आप एजुकेशन में हो इसलिए आपसे और ज्यादा बोल रहा हूं। हम सिक्स्थ मास एक्सटिंशन फेज में प्रवेश कर चुके हैं ना ये हम जानते हैं कि नहीं जानते हैं?

12:25 440 पीपीएम बोलता हूं तो क्या याद आता है? और कितना होना चाहिए? और जब आप नेट जीरो की बात करते हो तो आप कह रहे हो 2050 आप बच जाओगे। आप बच जाओगे क्या? ये किसने कर दिया? लैक ऑफ टेक्नोलॉजी ने कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ा दी है। कार्बन डाइऑक्साइड इसलिए बढ़ गई क्योंकि हम गवार हैं। हम कबीलों में रहते हैं इसलिए इतनी बढ़ गई है। आप सब यहां बैठे हो। सब 18 से 22 24 साल के बीच के हो गए। राइट? ठीक? जानते हो? कार्बन डाइऑक्साइड 280 से 440 तुम्हारे जीवन काल में हुई है। यह पढ़े लिखों की करतूत है। ये अनपढ़ों, जाहिलों, गवारों ने अशिक्षितों ने नहीं कर दिया। ये हमने करा है। ये हमारी पढ़ाई ने करा है। ये हमारी

13:12 शिक्षा व्यवस्था है। और उसमें भी और सुनो। जो कम पढ़ा लिखा आदमी है कम एमिशन करता है। दुनिया के सबसे ज्यादा एमिशन करने वाले सबसे ज्यादा पढ़े लिखे और अमीर लोग हैं और सबसे प्रतिभा संपन्न लोग हैं। जब 2008 में इकोनॉमिक बबल बर्स्ट हुआ था तो मैंने पूछा अपने आप से। तो मैंने कहा ये बैंक इसमें सब दिवालिया हुए हैं उसमें तो मेरे बैचमेट्स सब मैनेजर हैं। ये लिमन ब्रदर्स ये तो मेरे कैंपस में आता था और सब पागल रहते थे उसमें घुसने के लिए। और दर्जन दर्जन लोग इसमें जाते थे। इन्होंने इतनी मूर्खतापूर्ण हरकत कैसे कर दी? ये जो हम पढ़े-लिखे लोग है ना हम दुनिया को नाश की कगार पर ले आए। कगार में

13:58 नहीं ले आए हैं। नाश शुरू हो चुका है। यह हमने करा है। क्योंकि हमारी जो शिक्षा है एकदम आधी अधूरी है और हम उसमें ही बहुत गौरव अनुभव करते रहते हैं। हमको लगता है हम सब जानते हैं। हमें यह पता है ना मुझे इसके बारे में पता है। मुझे उसके बारे में पता है। मुझे उसके बारे में पता है। सबके बारे में पता है। ये कुछ नहीं पता। 30-40 साल में 150% बढ़ोतरी कार्बन एमिशंस में जनसंख्या जिस हिसाब से कम से कम भारत की बात करूं बढ़ रही है। हम खुश हो जाते हैं कि ग्रोथ रेट ऑफ

14:45 पापुलेशन नीचे आ रहा है और फिर स्टेबलाइज कर जाएगा। हम ये तो अभी बात ही नहीं कर रहे हैं कि हमें डीग्रोथ चाहिए। बोथ इन टर्म्स ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पापुलेशन उसकी हमें बात ही नहीं समझ में आ रही। कितनी स्पीशीज प्रतिदिन एक्सटिंक्ट हो रही हैं हम जानते हैं क्या? जो नेचुरल रेट ऑफ एक्सटेंशन ऑफ स्पीशीज होना चाहिए। उससे 1000% ज्यादा दर से प्रतिदिन स्पीशीज एक्सटिंक्ट हो रही हैं। एक्सटिंशन का मतलब समझते हो? वह पेड़, वह पौधा, वो जानवर, वो चिड़िया वो अब कभी लौट कर नहीं आएंगे। आप यहां बैठे हुए हो आपको नहीं पता चल रहा होगा।

15:30 वो कभी अब लौट कर नहीं आएगा। हम खा गए उसको। और जितनी स्पीशीज हम पिछले 20-40 साल में खा गए, उतनी पिछले 5 लाख साल में नष्ट नहीं हुई थी। यह पढ़े लिखों की करतूत है। हम कहते हैं हम अच्छे लोग हैं क्योंकि हम पढ़े लिखे हैं और पढ़ाई से इंसान की बेहतरी होती है। यह बेहतरी हो रही है। बोलते अधचल गगरी छलकज जाए। आधा ज्ञान ज्यादा खतरनाक होता है। हमें आधा ज्ञान मिल रहा है। उपनिषद कहते हैं जिनके पास अविद्या होती है पर विद्या नहीं होती। वो जाकर के एक गहरे कुएं में गिरते हैं। अविद्या जानते हो क्या होता है? यह जो हमारे यूजुअल सब्जेक्ट्स होते हैं। आप

16:17 जितने भी कोर्सेस पढ़ते हो वो अविद्या के अंतर्गत आते हैं। अविद्या माने सांसारिक ज्ञान। सांसारिक ज्ञान है, आत्मज्ञान नहीं है। बहुत गहरे गड्ढे में जाकर के गिरोगे। वो यह भी कहते हैं कि आत्मज्ञान है, सांसारिक ज्ञान नहीं है तो और ज्यादा गड्ढे गहरे में जाकर गिरोगे। फिर कहते हैं जिसको दोनों है विद्या और अविद्या वह राजा हो जाता है। उसको फिर मौत भी नहीं डराती। अमर हो जाता है वह। हम जिसको कहते हैं विद्यालय वो अविद्यालय है। उसमें सब दुनिया भर की बाहरी बातें ही बताई जा रही हैं। विद्या तो तब है जब भीतर का भी अपना भी माने मन का आई का मैं का अहम का कुछ पता

17:02 चलना शुरू हो। तो जब मैं ऐसी जगहों को संबोधित करता हूं जो धार्मिक है या आध्यात्मिक है तो मैं उनसे कहता हूं भाई तुम ये सब शास्त्र और ग्रंथ यही पढ़ाते रहोगे [गला साफ़ करने की आवाज़] कुछ दुनियादारी की भी तमीज दोगे अपने लोगों को कि नहीं दोगे क्योंकि वो विद्या दे रहे हैं और अविद्या नहीं दे रहे और आपसे मैं कह रहा हूं आप सिर्फ अविद्या ले रहे हो विद्या नहीं ले रहे आपकी भी हालत उन्हीं जैसी होगी आधा अधूरा उनका भी ज्ञान आधा अधूरा फिर आपका भी ज्ञान बात बनेगी नहीं मैं एक दो बातें इसमें और बोलूंगा सुपरस्टिशन पर देखो सुपरस्टिशन क्या होता है? अंधविश्वास किसको बोलते हो?

17:48 अंधविश्वास किसको बोलते हो? जाना नहीं मान लिया। यही अंधविश्वास है ना? पता नहीं है लेकिन मान ऐसे रहे जैसे सब पता हो। जांचा परखा नहीं उसको सत्य घोषित कर दिया। यही है ना सुपरस्टिशन? यही है ना? आपको कैसे पता कि एक मोटा सैलरी पैकेज होना ही होना चाहिए। यह सुपरस्टेशन नहीं है? बोलो। आपको कैसे पता कि यहां से निकलने के दो-चार साल के बाद शादी करनी ही चाहिए या 10 साल के बाद। यह सुपरस्टेशन नहीं है क्या? आपको कैसे पता जिंदगी तभी पूरी होगी जब घर में दो नन्हे मुन्ने आ जाएंगे। यह सुपरस्टेशन नहीं है क्या? बोलो यह सुपरस्टेशन नहीं है क्या? आपको

18:33 कैसे पता मैं पूछ रहा हूं कब जांचा कब परखा सवाल कब करा? इंक्वायरी जिज्ञासा कहां है? पर माने बैठे हो और पढ़े-लिखे लोग ये बातें मान रहे हैं कि नहीं मान रहे हैं? सब सुपरस्टिशियस हैं। लेकिन सुपरस्टीशियस होने का इल्जाम बस उन बेचारों पर लगता है। जो सड़क पर रेंग रेंग के जा रहा होगा कि मैं ऐसे जा रहा हूं तो देवता प्रसन्न हो जाएंगे वरदान देंगे। है सुपरस्टीशियस। और हम जो कर रहे हैं वो सुपरस्टिशन क्यों नहीं है? हमारे पास गुड लाइफ की एक तस्वीर है। और गुड लाइफ क्या होती है? ग्रीन कार्ड डॉलर इनकम। ठीक। शिकागो में घर है। बहुत बढ़िया। आपको कैसे पता यही गुड लाइफ है? आपको कैसे पता इसको ही गुड लाइफ बोलते हैं। आपको लाइफ ही नहीं पता क्या होती है? आपको गुड लाइफ कैसे पता? ये सुपरस्टिशन

19:20 नहीं है। लेकिन यहां कोई नहीं बैठा होगा जो इस बात पे सवाल उठाए कि मैं कैसे मान लूं? यही गुड लाइफ है। हम सुपरस्टिशियस कैसे नहीं है? एक-एक चीज जो हम मानते हैं और बिल्कुल मान ही लेते हैं। उसको कहते हैं बट ऑब्वियसली यह ऑब्वियसली क्या होता है? नहीं तो कॉमन सेंस की बात है ना। ये क्या कॉमन सेंस है? सारी कॉमन सेंस सुपरस्टिशन कैसे नहीं है? ये हर चीज जिसको आप बोलते हो ये ये सुपरस्टिशन कैसे नहीं है? ऑब्वियसली वगैरह बोलो ना। और कोई उस पर सवाल उठाए तो कहोगे कूल नहीं है। क्योंकि हर चीज में यह मीन मेख निकालता रहता है। इससे कुछ भी बोलो तो पूछता है बट कैसे? वो आपको अच्छा नहीं लगेगा बंदा। ये सुपरस्टिशन की निशानी नहीं है क्या कि कोई

20:05 आपके सामने आकर कहे कि साबित करो। दिखाओ हाइपोथेसिस क्या था? फिर दिखाओ प्रॉब्लम सॉल्विंग प्रोसीजर क्या था? और फिर दिखाओ कि कंक्लूजन क्या आया है। कोई आपसे यह सब बोले तो आप कहोगे यह सब तो करा ही नहीं। या सारी जो इंटेलेक्चुअल रिगर है वो मैथ्स और फिजिक्स के लिए रिजर्व कर छोड़ी है। सोच खूब सकते हैं। इंटेलेक्चुअली बिल्कुल डिसेक्ट कर देंगे सिचुएशन को प्रॉब्लम को। लेकिन सिर्फ तब जब वो हां सर्किट थ्योरी बिल्कुल मैथमेटिक्स डिफरेंशियल इक्वेशन फोड़नी है वहां दिमाग पूरा लगा दोगे। जिंदगी फोड़नी है उसमें दिमाग कौन लगाएगा?

20:55 हम सुपरस्टिशन को अगर काटना है तो प्योर स्पिरिचुअलिटी को अपनाओ। और मैं किसी रिलीजियस एफिलिएशन की बात नहीं कर रहा हूं। वेदांत में तो भाई देवी देवता और ईश्वर और भगवान के लिए भी कोई विशेष जगह नहीं है। वहां तो बात सिर्फ सत्य की होती है। वो नहीं कह रहे हैं कि तुम किसी पंथ के अनुयाई बन जाओ। कल्ट वगैरह से कोई लेना देना नहीं। इसीलिए जो पुराने पारंपरिक ढंग के धार्मिक लोग होते हैं। उनको वेदांत फूटी आंख नहीं सुहाता। वो कहते हैं इसमें तो एथीज्म है। कहते हैं यह तो नास्तिकता है इसमें।

21:44 समझ में आ रही है बात तो आप अनुकूल नहीं हो जाओगे अगर आप उपनिषद पढ़ने लगोगे तो मजा आएगा कोशिश करके देख सकते हैं शुरुआत तो कर सकते हैं ऑनलाइन सब उपलब्ध है अष्टावक्र गीता की एक कॉपी लें पढ़ें कोई दिक्कत तो नहीं आ जाएगी ना नहीं कह रहे कि मान लो लेकिन ये तो देखो कि वो कह क्या रहा है किसी बंदे ने कोई बात कही है उसको सुन लेने में भी कोई नुकसान है क्या शुरुआत तो करें आपको खुशी होगी इस नाते जो हमारी अपनी ऐप है जिसमें हमारे गीता और बाकी सब कार्यक्रम चलते हैं। [संगीत] यहां पर बुद्ध हैं, गीता है, उपनिषद है, अष्टावक्र हैं। यह मुझे मिले, मेरी जिंदगी बदली। यह तुम्हें मिलेंगे तुम्हारी जिंदगी भी बदलेगी। सच पूछिए तो मतलब लाखों नहीं तो कम से कम हजारों जिंदगियां तो हैं जो

22:30 बिल्कुल बदली हैं। 2 लाख से अधिक गीता प्रतिभागियों के साथ जुड़े [संगीत] आचार्य प्रशांत ऐप पर। पहला महीना बिल्कुल फ्री गीता मिशन का पूरा एक्सेस ऐप पर आपको मिलेंगे नियमित लाइव सत्र हर दिन आचार्य प्रशांत के विशेष संवाद गीता कम्युनिटी का एक्सेस गीता परीक्षा चयनित समाचार ऑडियो बुक्स कोर्ट्स और भी बहुत कुछ Google Play स्टोर या Apple App स्टोर पर आचार्य प्रशांत सर्च करें और अभी डाउनलोड करें हम [संगीत]

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