सबकुछ भगवान कर रहा है, या कोई और? || आचार्य प्रशांत (2021)

संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो इस बात पर केंद्रित है कि व्यक्ति अपने जीवन में चुनाव करने और अपनी बेड़ियों को काटने के लिए स्वतंत्र हैं। यह विचार कि परमात्मा या कोई बाहरी शक्ति हमारे कर्मों को निर्देशित कर रही है, एक भ्रम है। हमें अपनी गलत धारणाओं और संस्कारों से मुक्त होने के लिए स्वयं पर जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

  • व्यक्ति अपने जीवन में चुनाव करने के लिए स्वतंत्र हैं।
  • परमात्मा या कोई बाहरी शक्ति हमारे कर्मों को निर्देशित नहीं कर रही है।
  • हमें अपनी गलत धारणाओं और संस्कारों से मुक्त होने के लिए स्वयं पर जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

क्या हमारे पास स्वतंत्र चुनाव है?

आचार्य प्रशांत एक प्रश्न का उत्तर देते हैं कि क्या हमारे पास वास्तव में स्वतंत्र इच्छाशक्ति है, या क्या हमारे कर्म पूर्व निर्धारित हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि यह विचार कि परमात्मा हमारे कर्मों को निर्देशित कर रहा है, गलत है। हम ही अपने कार्यों के लिए जिम्मेदार हैं, चाहे वे अच्छे हों या बुरे। सत्य में, केवल सत्य ही है, और हमारी अपनी सत्ता है। जब हम कहते हैं कि कोई और हमसे कुछ करवा रहा है, तो हम जिम्मेदारी से बच रहे हैं।

सत्य और प्रार्थना

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सत्य अद्वैत है, और उससे अलग कोई दूसरा नहीं है। इसलिए, जब हम प्रार्थना करते हैं, तो हम वास्तव में स्वयं से ही प्रार्थना कर रहे होते हैं। सत्य को हमारे सांसारिक मामलों में कोई दिलचस्पी नहीं है। वह केवल अपनी माया छोड़ देता है ताकि हमें पता चले कि उससे ऊपर भी कुछ है। हमें अपने छोटे-मोटे झगड़ों में परमात्मा को शामिल नहीं करना चाहिए, बल्कि अपनी करनी की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

जिम्मेदारी और कष्ट

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि हम अक्सर जिम्मेदारी से बचने के लिए दूसरों को अपने कार्यों के लिए दोषी ठहराते हैं। लेकिन, अगर हम वास्तव में निर्विकल्प होते, तो हमें कष्ट नहीं होता। हमारा कष्ट इस बात का प्रमाण है कि हमारी अपनी सत्ता है, जो कष्ट पसंद नहीं करती। हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हम ही अपने कार्यों के लिए जिम्मेदार हैं, और जो कोई और करवा रहा है, वह हमारे भीतर बैठा हुआ अहंकार है।

कृपा और अहंकार

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि हमारा अस्तित्व एक कृपा है, लेकिन अगर हमारे जीवन में सब कुछ गड़बड़ है, तो यह हमारी अपनी अकृपा के कारण है। अहंकार वह है जिसकी अपनी कोई हस्ती नहीं है, लेकिन जो गलत धारणाओं और संस्कारों पर चलता है। हमें अहंकार से आजादी पाने के लिए यह मानना होगा कि हमारे पास आजादी का विकल्प है। हार से भी बदतर स्थिति यह है कि हम यह कह दें कि जीत का कोई विकल्प ही नहीं रहा।

बेड़ियों को काटना

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि अपनी बेड़ियों को काटना एक बहुत बड़ा काम है, जो शायद कभी भी पूरी तरह से पूरा नहीं हो सकता। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि हमें कोशिश करना छोड़ देना चाहिए। हमें हर रोज अपनी बेड़ियों से लड़ना चाहिए, जैसे हम किसी लाइलाज बीमारी से लड़ते हैं। यही एकमात्र काम है जो करने लायक है, बाकी सब तो नौटंकी है। असली काम तो अपने मन और शरीर की गंदगी को साफ करना है।

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Transcript

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0:00 [संगीत] आचार्य जी जब हम यह बात करते हैं कि बेड़ियां काटनी है या पुराने ढरों से बाहर निकलना है तो जैसा कि आपने एक गीता के सत्र में कहा था कि जब कृष्ण कहते हैं कि या तो मेरी सुन ले या तो मेरी माया की सुन ले। तो हमें ऐसा कर्म करना चाहिए जो कि हमारे बंधनों को काटे। तो मेरा सवाल ये है कि क्या हमारे पास वो इंडिपेंडेंट चॉइस है भी कि वो कर्म कर्म करने की कि वो बंधन काटे क्योंकि अल्टीमेटली करवा तो अ कृष्ण ही रहे हैं ना। तो फिर तो ये सवाल पूछना ही बेकार है। क्यों पूछ रहे हो? अगर तुम्हारे पास

0:47 चॉइस ही नहीं है तो। जिसके पास चॉइस ना हो वो कौन हुआ? वो यह हुआ यह यह मैंने उठाया तो उठ गया मैंने गिराया इसके पास अपनी कोई चॉइस कोई सत्ता कोई विकल्प कोई एजेंसी नहीं है ये सवाल पूछे तो मैं जवाब दूं तुम्हें क्यों जवाब दूं कहीं ऐसा तो नहीं कि विकल्प है पर विकल्प का खतरा ना उठाना पड़े इसलिए हम ऐसा स्वांग करना चाहते हैं कि मैं मैं क्या करूं? मेरे पास तो चॉइस है ही नहीं। वही मैं क्या करती देवदास? मैं मजबूर थी। मेरे पास क्या नहीं थी? चॉइस नहीं थी।

1:35 देवदास काहे पारो बन रहे हो? आचार्य जी जैसा मेरा इस सत्र तक आना। हम्। अह अह या जो भी मैं कर्म कर रहा हूं, तो मतलब मैं यह पूछना चाह रहा था कि मेरी मतलब ऐसा कोई करवा रहा है या मतलब यह मेरी कोई नहीं करवा रहा। यह बात एकदम दिमाग से निकाल दो कि तुमसे यह बात परमात्मा करवा रहे हैं। कृष्ण करवा रहे हैं। अकर्ता है। अकर्ता अकर्ता अकर्ता जो कुछ हो रहा है तुम कर रहे हो। यह प्रपंच है सारा माया का पसार और इसके सूत्रधार तुम मात्र हो कोई और नहीं अच्छा कर रहे हो तुम कर रहे हो किसके लिए अच्छा कर रहे हो

2:22 बुरा कर रहे हो तुम कर रहे हो किसके लिए बुरा कर रहे हो सत्य में तो तुम हो ही नहीं तो किसके लिए अच्छा किसके लिए बुरा करोगे पागल सत्य में तो कौन है सत्य सत्य भर है। किसी दूसरे की सत्ता ही नहीं। पर तुम्हारे लिए तुम्हारी सत्ता है ना? तो तुम जब बोलते हो मैं थोड़ी कर रहा हूं। मुझसे वो करवा रहे हैं। तो बात वहीं पे गलत हो जाती है। तुमसे वो क्यों करवाएगा? उसके लिए तो तुम उसके लिए तो तुम हो ही नहीं। तुम किसके लिए हो? फॉर हुम डू यू एक्सिस्ट? सत्य अद्वैत है। उसके अलावा कोई दूसरा नहीं। तुम प्रार्थना किससे कर रहे हो? कोई है नहीं। कोई नहीं है। इसीलिए जब प्रार्थना की जाती है तो बार-बार समझाता

3:09 हूं उपनिषद समागम में सारी प्रार्थनाएं स्वयं से ही की जाती हैं। सत्य के लिए सत्य के अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है। उसकी कोई रुचि नहीं है बाबा तुम्हारे इन झमेलों में पड़ने की कि नई नौकरी लगवा दे, पुराना ब्रेकअप करवा दे और बोलो भगवान ने करा दिया। हे ईश्वर तूने क्या कर दिया? वो क्या करता है? वो क्या करता है? वह कुछ नहीं करता। कुछ नहीं करता, कुछ नहीं करता, कुछ नहीं करता। उसने अपनी माया छोड़ रखी है। यह भी क्यों कहते हैं उसने छोड़ रखी है। ताकि हमें पता हो कि माया के पार जाया जा सकता है। ताकि हमें पता हो कि माया से ऊपर भी कुछ है। वरना हम डर जाते, परेशान हो जाते हैं कि माया इतनी बड़ी है। भाई माया

3:54 से जीतेंगे कैसे? तो फिर हम क्या बोल देते हैं? माया पति है वो। कृष्ण बोल देते हैं मेरी माया है मम माया तुम्हें हौसला रहे कि माया का भी कोई बाप है डर नहीं जाओ हम लेकिन ये जो तुम्हारे लगातार दिन भर के ये छोटे मोटे सब लफड़े हैं इसमें परमात्मा सत्य कृष्ण इनको बीच में काहे को ला रहे हो अपनी करतूत अपनी करनी फिर बोलते अरे हे भगवान तूने क्या किया उसने वो क्यों मैं तो ऐसे भगवान का चरित्र सोचता हूं कई बार बड़ी हंसी आती है जो वह सब कुछ लगने में करने में उत्सुक होगा जो तुम मुझसे करवाते रहते हो बात बातबात में ओ माय गॉड ओ माय गॉड प्रगा न्यूज़ ओ माय गॉड उसको क्या मतलब है तुम्हारे इन हरकतों

4:42 से चाय गिरा दी ओह माय गॉड मोच आ गई हे भगवान आप माने जिम्मेदारी फंस गए। इसीलिए जबरदस्ती किसी और को बीच में लाते हैं ताकि क्या ना उठानी पड़े? जिम्मेदारी। मैं यहां नहीं आया हूं। मुझसे तो किसी दैय प्रेरणा ने आपके पास आने को कहा था। आचार्य श्री तुम मत ही आते तो ज्यादा अच्छा [हंसी] था। ये क्या बात है? तुम मुझसे यह बोल रहे हो कि तुम मेरे पास आए भी हो और अपनी मर्जी से नहीं आए। मुझे अच्छा लगेगा।

5:31 छी कोई तुमसे मिलने आए डेट वेट करते होगे। और बोले मैं नहीं आई हूं। मुझे मेरे भैया ने भेजा है। तुम्हें कैसा [संगीत] लगेगा? मुझे अच्छा लग रहा है ये सुनके कि तुम बोल रहे हो नहीं मैं नहीं आया हूं। मुझसे तो फलानी दिव्य प्रेरणा ने यह काम कराया है। तुम्हारी अपनी कोई सत्ता, कोई ताकत है कि नहीं है? तुम कहना चाहते हो नहीं है। नहीं है तो फिर तुम्हें बात पे कष्ट क्यों होता है? यह बताओ। इसको कभी तकलीफ होती है? मैंने इसको उठा दिया। मैंने इसे पटक दिया। मैंने इसे तोड़ दूं। तकलीफ होगी। तुम्हें कष्ट होता है ना? हां। तो तुम्हारा कष्ट इस बात का प्रमाण है कि तुम्हारी एक सत्ता है अपनी जो कष्ट पसंद नहीं करती। अन्यथा तुम्हें कष्ट नहीं हो

6:18 सकता था किसी बात पर अगर तुम इतने ही निर्विकल्प होते तो और निर्विकल्पता की पहचान भी यही होती है। आदमी कष्ट के पार निकल जाता है। तुम्हें होता है ना कष्ट तो विकल्प है। ठीक है? कभी दोबारा मत बोलना। मैं नहीं कर रहा कोई और करवा रहा है। तुम कर रहे हो। जो कोई और करवा रहा है वो बोलो मैं हूं। बिल्कुल ऐसा हो सकता है कि तुम जो कर रहे हो तुम्हें पता नहीं है कौन करवा रहा है। जो करवा रहा है वह तुम्हारे भीतर बैठा हुआ मैं है। उसका नाम आत्मा नहीं है। उसका नाम अहंकार है। यह बिल्कुल हो सकता है कि कोई काम तुम करो और बोलो मुझे नहीं पता ये काम कैसे हो गया। मुझसे किसने करवा दिया। मानता हूं सबके साथ ऐसा होता है। इट हैपेंड इनस्पाइट ऑफ मी। ऐसे बोल देते हैं ना हम। मुझे नहीं मालूम ये कैसे हो गया।

7:04 आपको पता नहीं है पर जो कर रहा है वह आप ही हैं। द हिडन पार्ट ऑफ योरसेल्फ। और उसको ट्रुथ नहीं बोलते। ना आत्मा बोल देना कि मेरी आत्मा ने करवाया। वो तुम्हारे भीतर के जानवर ने करवाया। आत्मा नहीं है जानवर। हम ठीक है। उसी को जीतना है। उसी को फतह करना है। और फतह करना एक संकल्प की बात है। संकल्प नहीं लिया जा सकता विकल्प के अभाव में। अगर विकल्प ही नहीं है तो बेटा संकल्प कैसे उठाएगा? ठीक। नहीं। ठीक। जिम्मेदारी काहे को? आचार्य जी साहब एक वीडियो और मैंने देखा

7:50 था आपका उसमें आपने कहा था कि ये जो भी हो मतलब जैसे मैं मेरा जो एक्जिस्टेंस है वो भी एक मतलब उसमें मेरी कुछ खासियत नहीं है। वो भी एक कृपा ही मानो कि कि मैं इतने मतलब मेरा जो भी बॉडी का प्रेशर है वो इतना है कि वो यू नो बाहर का सब कुछ झेल पा रहा है और जो भी चीजें मेरे अराउंड हो रही है वो भी एक कृपा ही मानो। तुम उसके काबिल नहीं थे कि वो तुम्हें मिल पाता। वैसा तुम्हारे जीवन में अगर सब कुछ अच्छा ही होता ठीक है जैसे 700 मिलीमीटर एचजी कि एकदम सेट है कम ज्यादा नहीं होता हम एटमॉस्फेरिक प्रेशर तो तुम कह देते कि कृपा है कृपा है तुम्हारे जीवन में कृपा वाली चीजें हैं

8:36 कितनी जीवन का कुल लेखाजोखा बताओ संतुष्ट हो सब कुछ मिलाजुला के रख दो टेबल पर और बताओ संतुष्ट हो और अगर कुल मिलाजुला के मामला गड़बड़ी निकल रहा है तो इसको कृपा बोले हम तो कृपा होगी अपनी जगह कृपा से कहीं ज्यादा बड़ी तो वो अकृपा है जो तुमने अपने ऊपर कर रखी है ना तो हम किसकी बात करें कृपा की या अकृपा की बोलो अृपा की बात करेंगे ना वो हमने अपने ऊपर कर रखी है हम कौन उसी को अहंकार बोलते हैं वही अहंकार है जिसकी अपनी कोई हस्ती नहीं पर जो गलत धारणाओं पर, विचारों पर, उल्टे ज्ञान पर, फालतू के संस्कारों पर चलता है उसी ने

9:22 हमें परेशान कर रखा है। हम और उससे आजादी मिले इसके लिए सबसे पहले तुम्हें मानना पड़ेगा कि तुम्हारे पास आजादी का विकल्प है। इसने कह दिया कि आजादी कोई विकल्प होती ही नहीं। उसको मिलेगी क्या खाक? ठीक है। हार से भी बदतर स्थिति होती है जब तुम कह देते हो कि जीत का अब विकल्प ही नहीं रहा। 100 बार हार लो। लेकिन ऐसा मत कह देना कभी कि जीत कोई विकल्प ही नहीं है। हम आचार्य जी जब भेड़ियां जो काटना है या जो बंधन है वो काटने का काम तो बहुत बड़ा

10:10 है और धर्म वहां पे आ गया कि हम अपनी चेतना का उत्थान करना है और अपने स्वभाव में लौटना है। तो स्वभाव में लौटने के लिए तो कितना वक्त लगेगा इसमें तो इसकी कोई डेफिनेशन भी नहीं है। कोई टाइम तो उसमें हम डिटरमिन नहीं कर सकते कितना टाइम लग लगेगा। तो फिर क्या उसमें उसके बाद के जो अर्थ और काम है उनकी बारी आएगी कि बस केवल धर्म ही रहेगा। आप में से कितने लोगों को कोई ना कोई ऐसी बीमारी है जो कभी भी पूरी तरह से ठीक नहीं होने वाली। ऐसी बीमारी छोटी बीमारी हो, बड़ी बीमारी हो पर कोई ऐसी बीमारी जो पता है कि कभी भी पूरी तरह ठीक नहीं होगी। मैनेज हो सकती है। पर कभी भी यह खत्म नहीं हो सकती। रेडिकेट नहीं हो सकती। कितने लोगों को है? इलाज नहीं

10:56 करते। पूरी तरह से कभी उसका अंत नहीं आएगा। सत्य भी अनंत है। तो कुछ करोगे नहीं। कि यह पूरी तरह तो कभी होना नहीं है। तो कुछ करें ही क्यों? करते हो और जान लगा के करते हो। जितना संभव है उतना सब कुछ करते हो। तुम्हारी बेड़ियां भी वैसे ही हैं। हमें नहीं पता उनसे पूर्ण मुक्ति मिल सकती है कि नहीं। वह भी समझ लो जैसे डायबिटीज की तरह है कि हो गई तो हो गई। पता नहीं कभी इससे पूर्ण मुक्ति मिल सकती है कि नहीं। तो क्या हो गया? रोज रोज उससे लड़ना है। जितना हो सके उसको दबा के रखना

11:44 है या उसे छा जाने देना है अपने ऊपर। बोलो तो वैसी सी बात है। ये कोई तर्क नहीं है कि बेड़ियां काटने का काम तो बहुत बड़ा है। निसंदेह बहुत बड़ा है। बहुत बड़ा नहीं। मैं मानने को तैयार हूं कि अनंत भी है। यह भी हो सकता है कि आपकी आखिरी सांस तक पूरा ना हो। यह भी हो सकता है कि इतिहास में आज तक किसी की भी आखिरी सांस तक वो काम पूरा ना हुआ हो। तो भी वो काम करना है। वही काम बस करने लायक है। बाकी सब तो ऐसे ही है। अंड उसको आप फालतू ही बोलते हैं कि काम कर रहा हूं। वो काम थोड़ी है। वह तो नौटंकी।

12:31 सुबह कार्ड स्वाइप करके सिस्टम में लॉग इन कर लिया। यह काम थोड़ी शुरू किया है। काम तो एक ही होता है। और ये मैं कोई मुहावरे के तौर पे मैं मेरेिकली नहीं बोल रहा हूं। यह सच्चाई है। काम जिंदगी में बस एक होता है। यह जो शरीर में मन में बेवकूफियां और गंदगियां पड़ी हुई है। इनकी सफाई इसके अलावा कोई काम नहीं होता। हम जिसको काम वर्क ऑक्यूपेशन धंधा पेशा व्यवसाय यह तो असली काम ना करने का बहाना है। असली काम ना करना पड़े तो हमने अपने

13:17 दिन को भर लिया है किसी झूठे नकली काम से। ऑफिस जा रहे हैं। बहुत तरक्की कर ली है काम में। मैंने बहुत तरक्की कर ली है खुद को झांसा देने में। वो जो एक केंद्रीय काम था जीवन का सीधा सरल वो ना करना पड़े इसके लिए क्या-क्या नहीं कर डाला। बहुत बड़े उद्योगपति बन गए। पांच फैक्ट्रियां डाल ली। ये कर लिया वो कर लिया। बहुत बड़ा काम कर लिया। कुल मिला के किस लिए? ताकि असली काम ना करना पड़े। [संगीत]

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