संक्षिप्त सारांश
यह वीडियो हमें याद दिलाता है कि मन संस्कारित तो जल्दी होता है, पर उसका स्वभाव निर्मल भी है। हमें सत्य के मार्ग पर अडिग रहना चाहिए, भले ही परिस्थितियाँ कितनी भी विपरीत क्यों न हों। व्यवस्था कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, सत्य हमेशा जीतता है। हमें अपने भीतर के "शल्य" को पहचानकर उससे छुटकारा पाना चाहिए और अपने धर्म का पालन करते हुए जादू को होने देना चाहिए। हमें निराशा से दूर रहकर उत्सव मनाना चाहिए, क्योंकि हम उस परम शक्ति के साथ हैं जो हमेशा विजयी होती है।
मुख्य बातें:
- मन का स्वभाव निर्मल है और सत्य हमेशा जीतता है।
- हमें अपने भीतर के "शल्य" को पहचानकर उससे छुटकारा पाना चाहिए।
- निराशा से दूर रहकर उत्सव मनाना चाहिए, क्योंकि हम उस परम शक्ति के साथ हैं।
आचार्य प्रशांत बताते हैं कि मन बहुत जल्दी संस्कारित हो जाता है, लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि मन का स्वभाव निर्मल भी है। जब मन गंदगी इकट्ठा करता है, तो उसे कष्ट होता है, क्योंकि यह उसके स्वभाव के विपरीत है। यदि मन की नियति ही गंदगी इकट्ठा करना होती, तो उसे कष्ट क्यों होता? लोग मुक्ति क्यों चाहते? इसलिए, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चेतना से उठने वाली कोशिश से संस्कारों को साफ किया जा सकता है। चेतना में इतनी ऊर्जा होती है कि वह मन की नहीं, बल्कि परम की होती है।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि हमें गहरा भरोसा होना चाहिए कि परम सत्ता एक ही है। यदि हमें यह भरोसा नहीं है, तो हमें नियतिवादी होना पड़ेगा और इधर-उधर भटकना पड़ेगा। "सत्यमेव जयते" किसी कारणवश ही कहा गया है। मानव जीवन एक युद्ध क्षेत्र है, और इस युद्ध क्षेत्र में सत्य को ही जीतना है। सत्य के अतिरिक्त कुछ भी जीतने योग्य नहीं है, क्योंकि सत्य के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं।
आचार्य प्रशांत बताते हैं कि जिन्होंने जाल बुने हैं, उन्होंने हमारे लिए कदम-कदम पर व्यवस्थाएं जोड़ी हैं। उनका तंत्र बहुत विशाल है और वे हमें क्षण भर के लिए भी नहीं छोड़ते। उनके पास ताकत, परंपरा और बहुमत सब कुछ है, लेकिन इसके बाद भी आध्यात्म का आकाश जगमगाता रहता है। भले ही कालेपन का क्षेत्रफल प्रकाश की तुलना में बहुत ज्यादा हो, लेकिन जगमगाहट तो सितारों की ही दिखती है। तमाम कालिमा के बावजूद बुद्ध चमक उठते हैं और हजारों-हजार बुद्ध चमकते ही रहे हैं। व्यवस्था की पूरी कोशिश के बाद भी जीतता सत्य ही रहा है।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि हमें हार मान लेने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि सत्य के अलावा कभी कोई विजय हो नहीं सकती। सत्य अपना मालिक खुद है और वह कैसे जीतता है, यह वही तय करेगा। यदि दो पक्ष लड़ रहे हैं और दोनों ही पक्ष सत्य हैं, तो चाहे यह जीते या वह जीते, जीता तो वही है। हमें यह सोचने की जरूरत नहीं है कि यदि बुद्ध ने 50 वर्षों तक कुछ बोला, तो उसका कोई प्रभाव हुआ कि नहीं। मनुष्य होकर जो हमारा धर्म है, हमें उसका पालन करना चाहिए। यदि एक व्यवस्था पूरी ताकत से आदमी को अंधा करने में लगी हुई है, तो मनुष्य के ही हाथ में ताकत है कि वह एक दूसरी व्यवस्था भी खड़ी करे।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि यूं ही नहीं कह दिया था कि सवा लाख से एक लड़ाऊं। भले ही बहुमत समाज के पास हो, लेकिन जगा हुआ एक बुद्ध सवा लाख पर भारी पड़ता है। आसमान पूरा काला हो, बीच में एक सितारा चमक रहा हो, तो आपकी नजर जाकर सितारे पर ही बैठेगी। धर्म में हमेशा ऐसा हुआ है कि चिड़ियों ने बाज को तोड़ दिया है। असंभव घटनाएं घटी हैं, जादू हुआ है। हमें जादू को होने देना चाहिए और सितारे को नहीं देखना चाहिए कि अंधेरा कितना घना है। अंधेरा जितना घना होगा, सितारे की चमक उतनी ही निखर कर सामने आएगी।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि हमें जिंदगी के साधारण मोलभाव में नहीं गिनना चाहिए कि उधर तो 100 हैं और हम दो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। चाहे बुद्ध हों, कबीर हों या कृष्णमूर्ति हों, यह खेल ऐसा ही चलता रहा है। हमें इसको अपनी पूरी ताकत से खेले जाना चाहिए। कबीर ने कहा है कि साधु ना चले जमात। साधु कब चले हैं जमात में? उनकी इतनी संख्या ही कभी नहीं हुई कि उनका कोई बहुत बड़ा दल बन सके। वह अकेला ही काफी होता है।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि जब आपके माध्यम से परम काम कर रहा होता है, तब आपको अनपेक्षित जगहों से मदद मिलेगी। हमें मन में यह भाव नहीं आने देना चाहिए कि सत्य हार सकता है। परम सत्ता कोई दूसरी भी हो सकती है, यह भाव मन में नहीं आना चाहिए। जादू होगा। जादू का मतलब है कुछ नहीं में से कुछ का प्रकट हो जाना। जहां कोई संभावना नहीं थी, वहां काम हो गया। हमें अपने को और अपनों को सहारा देना चाहिए। जो हमारे माध्यम से होना चाहता है, उसे रोकना नहीं चाहिए।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि यदि अड़चनें आएं और पीछे हटना पड़े, तो सीधे कहिए कि तेरी हार भी नहीं है तेरी। हार बहुत आएंगी, लेकिन फिर याद रखिएगा कि तेरी हार भी नहीं है तेरी, हार पटकथा ही कोई और लिख रहा है। हार भी उसकी मर्जी से हो रही है, तो हार में भी जीता हुआ है। हमें खेलना चाहिए और इंसान होने के नाते जो धर्म है, उस पर अडिग रहना चाहिए। चमत्कार होते हैं। कृष्ण आते हैं, वैसे नहीं आते हैं जैसी आपकी अपेक्षा हो, पर आते हैं। आप ही के माध्यम से आएंगे।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि जब इतने जाल बुने गए हैं हमारे चारों ओर, तो हमें भी थोड़ा बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए। हमसे किसने कहा है कि हम शस्त्र नहीं उठा सकते? कृष्ण पांडवों की ओर से खड़े भी हैं, तो भी लड़ना तो पड़ रहा है ना पांडवों को। उन्होंने चक्रव्यूह रचे हुए हैं, तो हमसे किसने कहा है कि हम अपनी बुद्धि का उपयोग करके चक्रव्यूहों को ना काटें?
आचार्य प्रशांत बताते हैं कि वहां तंत्र है। वहां तुरंत सूचनाएं इधर से पहुंच जाती हैं कि कब कौन फिसल रहा है और उसको तुरंत जकड़ने के लिए तंत्र सक्रिय हो उठता है। उस तंत्र से अगर कोई बाहर हो रहा होता है, तो तुरंत सूचना पहुंच जाती है और एक पुलिस सक्रिय हो जाती है कि कोई छूट रहा है जेल से, वापस लेकर के आओ उसको। हमसे किसने कह दिया है कि हम एक दूसरे को अपना सहारा नहीं दे सकते?
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि अहंकार होता है जो कहता है कि जो करूंगा खुद ही करके दिखा दूंगा। एक कहानी में बाप बेटे से कह रहा है कि पत्थर उठा। बेटा पूरी कोशिश कर रहा है, लेकिन पत्थर नहीं उठ रहा है। अंत में बाप सहारा देता है और पत्थर उठ जाता है। बाप कहता है तेरी पूरी ताकत में यह शामिल है कि तू मेरी मदद ले। यह भी तेरी ताकत का एक हिस्सा है। तो हम क्यों नहीं मदद ले सकते अपने शुभिक्षुओं से? हमें किसने रोका है?
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि हम बुद्धिहीन नहीं हैं। हम समझते हैं कि यह पूरी व्यवस्था किस तरह से काम करती है। हम इसके दांव-पेचों से अवगत हैं। जब हम इस बात को समझते हैं, तो फिर दायित्व भी हमारा ही है। अगर पाते हैं कि अपना आपा कम पड़ता है, तो बेशक सलाह मांगिए, मदद मांगिए। इसमें कोई ओछापन नहीं है।
आचार्य प्रशांत पूछते हैं कि क्या हम यह कहना चाहते हैं कि अस्तित्व सिर्फ हमारी दुश्मनी करने के लिए खड़ा है? क्या हम मदद नहीं लेंगे अस्तित्व से? क्या हम यह कहना चाहते हैं कि वह तो मेरा दुश्मन है, उससे मदद कैसे लूं? समाज सड़ा हुआ है, उसने हमें गिरफ्त में ले लिया है, संस्कारित कर दिया है, अंधेरा बहुत घना है, ठीक है। लेकिन जो तारे चमक रहे हैं, वो दोस्त नहीं हैं तुम्हारे? किसने कह दिया कि उनको साथ ना लो? किसने कह दिया कि तुम उनके सहारे ना बनो और वो तुम्हारे सहारे ना बनें? बुद्ध को भी एक संघ बनाना पड़ा था, क्योंकि सम को सम का सहारा अति आवश्यक होता है।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि दो तरह के लोग होते हैं जिनकी हार पक्की होती है: जो युद्ध में उतरे ही नहीं और दूसरे वो जो युद्ध में तो उतरे पर उनकी मानसिकता हारने वाली रही। महाभारत में एक चरित्र आता है शल्य के नाम से, जो कर्ण का सारथी था। वह लगातार यही बोलता रहता था कर्ण को कि तुम्हारी औकात क्या है, तुम्हारी बिसात क्या है, तुम हारोगे। दूसरी ओर, अर्जुन का सारथी कृष्ण है। हमें अपने जीवन को शल्यों से नहीं भरना चाहिए, जो दिन रात हमें यही कह रहे हों कि तुम जीत नहीं सकते।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि कर्ण का पागलपन है कि जब दिख रहा है कि सामने ऐसा सारथी बैठा है, तब भी उस सारथी को ढोए जा रहा है। वह उसे निकाल फेंक सकता था और इतिहास बदल सकता था, पर कहीं ना कहीं कर्ण ने ठान रखा था कि हारना है। जिन्होंने भी महाभारत को सूक्ष्मता से पढ़ा है, उन्होंने पाया है कि कर्ण चाहता ही था कि हार जाऊं।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि हमें वैसा नहीं होना चाहिए। इनमें लाख ताकत होगी, पर ये किसी गिनती के नहीं हैं। ये जन्मते हैं, कीड़े-मकोड़ों की तरह होते हैं और मर जाते हैं। होंगे बहुमत में, होंगी बड़ी संख्याएं, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इन्होंने जीवन को ही नहीं पाया है, ये जिए ही नहीं हैं। हमें इनसे घबराना नहीं चाहिए।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि हम घबरा सकते हैं इन लोगों से, क्योंकि मन संख्या गिनता है। पर हमें आसमान की ओर देखना चाहिए और देखना चाहिए कि कितना काला है। पर क्या फर्क पड़ता है? आसमान की तुलना में चांद कुछ नहीं है, पर इस वक्त हमारे ऊपर अंधेरा नहीं है, चांदनी है। कभी किसी ने अंधेरे की प्रतीक्षा नहीं करी है, लोगों ने चांद, सूरज और तारों की प्रतीक्षा करी है।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि ये सब मन को पीछे धकेलने वाले ख्याल हैं कि किसी को कितना भी कह दो, कुछ हो नहीं सकता, कि बुद्धों ने जो करा, वो फ्रूटफुल नहीं रहा। कबीर का कहना है कि ना होते साधु जन तो जल मरता संसार। पूछा गया कि इतने साधु हैं, इतने संत हैं, उसके बाद भी संसार की दुर्दशा क्यों है? तो उत्तर यही दिया गया था कि जितना अभी बचा भी हुआ है, इसी कारण बचा हुआ है क्योंकि संत हैं, ना होते तो जल मरता।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि हम जो कर रहे हैं, वो फ्रूटलेस नहीं है। अगर आदमी के जन्म को कुछ सार्थक बना सकता है, तो वह काम है जो हम कर रहे हैं। हमारा दिल हमेशा भरा हुआ होना चाहिए। नजर एक क्षण को झुकनी नहीं चाहिए। अस्तित्व हमारे साथ है, उनके साथ थोड़ी है। उनकी संख्या होगी, पर अस्तित्व हमारे साथ है।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि हम पर कोई बंदिश नहीं है। सत्य धर्म बंदिशें नहीं सिखाते हैं। हमें भी पूरी स्वतंत्रता है बुद्धि का और विवेक का उपयोग करने की। यदि जाल है, तो जाल को काटने की योग्यता हम में होनी चाहिए। उसमें विचार का प्रयोग करो, अकल लगाओ, जुगत बिठाओ। भदू बन के मत रहो कि मैं तो ऐसा हूं, मेरे साथ यह हो गया। मैं तो सच्ची बात बोलता हूं, पर मेरी पिटाई कर दी जाती है।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि एक बुद्ध अस्तित्व का बेटा है। अस्तित्व की बाहों में झूलता है। उसका चेहरा निखरा हुआ होता है, नूर होता है। उसकी आंखों में और उसके चेहरों में ठोकरें नहीं होतीं। वह उदास नहीं रहता। परम विश्वास होता है। उसकी आवाज नहीं कांपती, उसके पांव नहीं थरथराते। जो सबसे बड़ी ताकत हो सकती है, वह उसके साथ है। वह तो योद्धाओं में योद्धा होता है।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि हमें बेचारगी की शक्ल लेकर नहीं घूमना चाहिए कि मैं क्या करूं। मेरे ऊपर बड़ी बंदिशें हैं। मुझे यह कहा जा रहा है। मैं तो चाहता हूं, लेकिन हो नहीं पा रहा है। शल्य मत बनो। हमारा जो मन है, वही शल्य है। हम कर्ण हैं। हमारा मन शल्य है। समाज हमारे भीतर घुस के बैठ गया और हमें ही लगातार बता रहा है कि तू जीत नहीं सकता। हम सबके मन के भीतर समाज शल्य बन के बैठा हुआ है। वह हमसे कहता है आज नहीं तो कल कुचल दिए जाओगे। इसको निकाल बाहर करो।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि जब शेर जाता है जंगल में, तो बंदर होते हैं आसपास, खूब चैं चैं चीं चीं कर रहे होते हैं। और वहां वो दहाड़ मारता है, तो दो चार तो उसकी दहाड़ से ही नीचे गिर पड़ते हैं पेड़ से। यह संबंध होना चाहिए हमारा समाज से। बंदर कौन? जो बेचैन है। बंदर को कभी देखो ध्यान से। वह ऐसा लगता है जैसे पता नहीं कहां पहुंचना चाहता है, पता नहीं क्या पाना चाहता है। उसी को तो बंदर कहते हैं। कभी कोई बंदर देखा ध्यान से बैठा हुआ स्थिर?
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि हमने इनको इतनी बड़ी ताकत मान लिया है। हमें क्या लगता है इनमें कोई आत्मबल है? इन चेहरों का सूनापन देखो, आंखों का वीराना देखो। क्या दम है इनमें? बात बात पर तो ये शंकेत कपे हुए रहते हैं। और हम इन्हें भाव देकर के बैठते हैं कि 50 वर्षों तक कुछ भी कर ले, उससे कोई अंतर नहीं पड़ेगा। एक दहाड़ से अंतर पड़ जाता है। एक नजर काफी होती है यह ऐलान कर देने के लिए कि मैं मुक्त हूं।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि पहले यह ख्याल बिल्कुल मन से निकाल दो कि एक के अलावा कोई दूसरा है जिसके पास ताकत है, जिसकी सत्ता है, जो जीत सकता है। कोई दूसरा नहीं है। और हम उस एक के बेटे हैं। वो हमारे साथ खड़ा है। उसका हाथ है हमारे सर पे। हम कैसे हारेंगे? वो हमें काट भी दे, हार भी दे, हम तब भी नहीं हारेंगे। हम दोबारा आएंगे। जितना हमें ही है। हम फिर आएंगे। हम फिर आएंगे। हम ही कृष्ण हैं। हम ही बार-बार आते हैं।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि इन पर करुणा की दृष्टि रख लो, सो ठीक है। ये करुणा के पात्र हैं। जैसे बहके हुए बच्चे। पर बहके हुए बच्चे से हम डर जाएं, यह अजूबा कैसे? इन्हें कोई मैच्योरिटी थोड़ी मिली है। ये खिले थोड़े ही हैं, परिपक्व थोड़ी हुए हैं। ये तो बच्चे ही हैं। बच्चे की उंगली पकड़ी जा सकती है। और बच्चा ज्यादा नादानी करे, तो उसे डांटना भी पड़ेगा। पर हम डरे हुए हैं बच्चों से कि अरे बाप रे इतने सारे बच्चे हैं।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि लाख बार हारेंगे, तब भी नहीं हारे हैं, क्योंकि हम जो लड़ाई लड़ रहे हैं, वो हमारी है ही नहीं। वो हारी नहीं जा सकती। 100 बार हार लो हंसते-हंसते, और गहरी श्रद्धा रहे मन में कि मैं कल फिर आऊंगा, नए रूप में आऊंगा। यह जिस्म नहीं भी रहा, तो भी आऊंगा। हम खत्म हो जाएंगे। हम देह भर हैं। मैं फिर आऊंगा। मैं नहीं हारता। कभी नहीं हारता। मैं जीता ही हुआ हूं। सत्यमेव जयते।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि अपनी बुद्धि को चलने दो उस परम के इशारों पे। पूरा-पूरा उपयोग होने दो बुद्धि का। हम जानते हैं हमें क्या करना है। अपनी पूरी सामर्थ्य को उस दिशा में लग जाने दो। कोई बंदिश नहीं है। बिल्कुल ही कोई बंदिश नहीं है। हम जो अद्वैत में काम करते हैं, उसमें हमें बहुत हारें मिल सकती हैं। 100 बार हारेंगे। कितना भी हारना, मुंह लटका के मत आना।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि हम जीते ही हुए हैं, क्योंकि हम लड़े थे। वो खत्म हो जाएंगे। उनकी कोई बिसात नहीं है। उनमें कोई ताकत नहीं है। वो खत्म हो जाएंगे। हम खत्म नहीं होंगे। मैं नहीं कह रहा हूं कि एक झटके में हम आसमान को रोशन कर देंगे। स्थिति शायद यही रहेगी हमेशा जैसी अभी है। पर तारे को ही हक है हंसने का। तारा ही हंसता है। अंधेरा थोड़ी हंस रहा है। हम हंसें। जब हमें लग रहा हो कि हम हार गए हैं, हम तब भी हंसें।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि हमसे ज्यादा किसी को हक नहीं है सेलिब्रेशन का। उत्सव कुछ पाने का होता है। जिन्होंने कुछ पाया नहीं है, बस प्यास है उनके पास, वो काहे की खुशी मना रहे हैं? खुशी मनाने का हक हमको है और पूरी-पूरी खुशी मनाओ। यही तो इनाम है ना हमारा। यही इनाम है कि हमारा जीवन उत्सव रहेगा। उनका जीवन खाली जाम रहेगा। सबको हक नहीं होता है दीप जलाने का, रंग खेलने का, गीत गाने का, मौज मनाने का। हमें हक है। पूरी मौज मनाया करो। बड़ी से बड़ी तबाही हो जाए, लगे कि जितनी कोशिशें की थी, सब व्यर्थ हो गई, उस क्षण में भी यह मत सोचना कि हम असफल हो गए। हमें पता भी नहीं है कि हमारे माध्यम से कौन खेल रहा है। वो हारने के लिए खेलता ही नहीं। तुम प्यादे हो उसके खेल के। तुम पिट भी गए, तो भी खेल वही जीत रहा है। यह जिहाद है। असली जिहाद है ये। जिन्होंने जिहाद शब्द पहली बार दिया था, अगर वो आज यहां मौजूद हों, तो आनंद मग्न हो जाएंगे। वो कहेंगे हां, अगर कोई समझा है जिहाद का अर्थ, तो ये लोग समझे। इसे कहते हैं जिहाद और जिहादी की तरह रहो।
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0:00 [संगीत] हम यह स्वीकार करने में तो तत्पर रहते हैं कि मन बहुत जल्दी संस्कारित हो जाता है। पर हम यह भूल जाते हैं कि उसी मन का अपना स्वभाव निर्मल ही
0:46 है। इसी कारण जब वो संस्कारित होता है, गंदगी इकट्ठा करता है तो कष्ट पाता है। अगर गंदगी इकट्ठा करना कंडीशंड हो जाना मन की नियति ही होती मन का स्वभाव ही होता तो मन को उसमें कष्ट क्यों होता? मन उससे छुटकारे की कोशिश क्यों करता? क्यों लोग कहते कि मुक्ति चाहिए? तो एक पक्ष को ही ना देखें। यही ना देखें कि मन पर संस्कार आ जाते हैं। नहीं
1:32 चेतना से चेतना से उठने वाली कोशिश से उनको साफ निश्चित रूप से किया जा सकता है। उसमें बल होता है। बल इसलिए होता है क्योंकि वह चेतना उस चेतना में इतनी ऊर्जा होती है वह मन की नहीं होती है वह परम की होती है तो इसीलिए उसको हल्का आंकना भूल होगी हां ठीक है होंगी बौद्ध धर्म में 80000 किताबें तो क्या कहना चाहते हैं कि 8000 किताबें लिखने वाले मूर्ख थे उन्हें पता था कि इन किताबों से किसी
2:18 की कोई मदद नहीं हो सकती फिर फिर भी उन्होंने किताबें लिखी। नहीं ऐसा तो नहीं है। ऐसा तो नहीं है। आज हम जब दोपहर बात कर रहे थे तो हमने कहा कि एक गहरा भरोसा होना चाहिए कि परम सत्ता एक ही है। वह भरोसा अगर हमको नहीं है तो फिर हमें नियतिवादी होना पड़ेगा। भरोसा अगर हमें नहीं है तो फिर हम इधर-उधर फटकारें खाएंगे।
3:10 यदि कहा गया है कि सत्यमेव जयते तो किसी कारणवश कहा गया है ना और हां जैसा हम मानव जीवन को जानते हैं वो युद्ध क्षेत्र ही है आदमी का मन युद्ध क्षेत्र ही है और उस युद्ध क्षेत्र में सत्य को ही जीतना है। सत्य के अतिरिक्त कभी कोई जीत ही नहीं सकता क्योंकि सत्य के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं जीतने के लिए।
4:15 देखिए कितनी व्यवस्थाएं जोड़ी है उन्होंने जिन्होंने जाल बुने हैं। उन्होंने आपके लिए कदम कदम पर और विशाल तंत्र है उनका। क्षण भर को भी वो आपको छोड़ते नहीं है। सब कुछ उनके साथ है। ताकत उनके पास है। परंपरा उनके पास है।
5:01 बहुमत उनके पास है। लेकिन उसके बाद भी आध्यात्म का आकाश जगमगाता ही रहता है। अगर आप एरिया को गिने, क्षेत्रफल को गिने तो निश्चित रूप से आकाश की ओर देखिए। कालेपन का क्षेत्रफल प्रकाश की तुलना में बहुत बहुत बहुत बहुत ज्यादा है। कोई तुलना ही नहीं है। लेकिन जगमगाहट तो सितारों की ही दिख रही है ना। तमाम कालिमा के बावजूद बुद्ध चमक उठते हैं और हजारों हजार बुद्ध चमकते ही रहे
5:46 हैं। व्यवस्था की पूरी कोशिश के बाद भी जीतता सत्य ही रहा है। तो उसमें हार मान लेने की हथियार डाल देने की कोई जरूरत नहीं है। हम सत्य के अलावा कभी कोई विजय हो नहीं सकती। लेकिन सत्य अपना मालिक खुद है। वो कैसे जीतता है और किन तरीकों से जीतता है ये वही तय करेगा। क्योंकि जो दो पक्ष लड़ रहे हैं वह दोनों ही पक्ष सत्य हैं। तो यह जीते कि वह जीते जीता तो वही है। तो आपको कभी भी यह सोचने की जरूरत है
6:36 ही नहीं कि यदि मैं कुछ बोल रहा हूं यदि बुद्ध ने 50 वर्षों तक कुछ बोला तो उसका कोई प्रभाव हुआ कि नहीं। आकाश में कुछ प्रकाश फैला कि नहीं फैला। सोचने की जरूरत नहीं है। फैला हो तो भी सत्य जीता है और नहीं फैला हो तो भी सत्य ही जीता है। जो भी जीता है वह सत्य है। आप समझ रहे हैं? मनुष्य हो के जो हमारा धर्म है, हम उसका पालन करें। यदि एक व्यवस्था है जो पूरी ताकत से लगी हुई है। आदमी को अंधा करने में और वह मनुष्यों की ही बनाई हुई
7:22 व्यवस्था है। तो मनुष्य के ही हाथ में ताकत है कि वह एक दूसरी व्यवस्था भी खड़ी करे। और यह जो दूसरी व्यवस्था है भले बहुमत इसके पास ना हो पर इसके पीछे एक दूसरी बहुत बड़ी ताकत है। यूं ही नहीं कह दिया था कि सवा लाख से एक लड़ाऊं। और चिड़ियों से मैं बाज तोड़ाऊं। होगा बहुमत समाज के पास होंगे वो सवा लाख जगा हुआ एक बुद्ध काफी है सवा लाख पे भारी
8:10 पड़ेगा आसमान पूरा काला हो बीच में एक सितारा चमक रहा हो आपकी नजर जाकर के सितारे पे ही बैठेगी और धर्म में हमेशा ऐसा हुआ है कि चिड़ियों ने बाज को तोड़ दिया है। असंभव घटनाएं घटी हैं। जादू हुआ है। आप जादू को होने दीजिए। जिन निक्कू की बात हो रही है। उन निकू के माध्यम से पता नहीं कितनी जिंदगियों में जादू हुआ। बिल्कुल हुआ। आज भी हो रहा है। अभी भी हो रहा है। ठीक।
8:55 अभी हो रहा है। सितारे को नहीं देखना है कि अंधेरा कितना घना है। डर नहीं जाना है उसे। बल्कि गौर करिएगा अंधेरा जितना घना होगा सितारे की चमक उतनी ही निखर के सामने आएगी। तो जो जिंदगी का साधारण मोलभाव है हां व्यापार की जो साधारण भाषा है उसमें मत गिन लीजिएगा कि अरे उधर तो 100 हैं और हम दो
9:43 यह कोई बात हुई क्या फर्क पड़ता है उधर 100 है उधर अगर 100 की जगह एक अरब होते तो और मजा आता कोई यह सदा की बात रही है। चाहे बुद्ध हो, चाहे कबीर हो, चाहे कृष्णमूर्ति हो। और यह खेल ऐसा ही चलता रहा है। आप इसको अपनी पूरी ताकत से खेले जाइए। क्यों कबीर ने नहीं कहा है कि साधु ना चले
10:33 जमात। साधुओं कब चले हैं जमात में? सच तो यह है कि उनकी इतनी संख्या ही कभी नहीं हुई कि उनका बहुत बड़ा कोई दल बन सके। वो अकेला ही काफी होता है। हम सिंहों के नहीं लेड़े हंसों की नहीं पात जब आपके माध्यम से परम काम कर रहा होता है
11:19 तब आपको अनपेक्षित जगहों से मदद मिलेगी। आप बस मन में यह भाव मत आने दीजिएगा कि सत्य हार सकता है। हम जिसको मैं दोपहर में कह रहा था कि परम सत्ता कोई दूसरी भी हो सकती है। यह भाव बस मन में मत आने दीजिएगा। जादू होगा। जादू जानते हैं क्या है? कुछ नहीं में से कुछ का प्रकट हो जाना जादू है।
12:05 यही तो जादू होता है। जहां कुछ नहीं था वहां आ गया कुछ। जहां कोई संभावना नहीं थी वहां काम हो गया। यही तो जादू कहलाता है। आप अपने को अपने का सहारा दीजिए। आप अपनों को सहारा दीजिए। जो आपके माध्यम से होना चाहता है उसको रोकिए मत। उसको आगे बढ़ने दीजिए। और फिर उसमें अड़चनें आए पीछे हटना पड़े हार दिखाई दे तो सीधे कहिए कि तेरी हार भी नहीं है तेरी हार
12:51 हम हारें बहुत आएंगी हारी हुई ही लड़ाई है लेकिन फिर याद रखिएगा कि तेरी हार भी नहीं है तेरी हार पटकथा ही कोई और लिख रहा है। हार भी उसकी मर्जी से हो रही है। तो हार में भी जीता हुआ है। आप खेलिए और इंसान होने के नाते मनुष्य होने के नाते जो धर्म है उस पर अडिग रहिए। चमत्कार होते हैं। यूं ही नहीं कह गए हैं कृष्ण की अदा धर्म से भवती
13:39 भारत कृष्ण आते हैं। वैसे नहीं आते हैं कि जैसी आपकी अपेक्षा हो पर आते हैं। आप ही के माध्यम से आएंगे। हां आप तय ही कर लें। यह नहीं आने देना है तो फिर नहीं आएंगे। और थोड़ा आंखें खोलिए। जब इतने जाल बुने गए हैं आपके चारों ओर तो आप भी थोड़ा बुद्धि का प्रयोग करिए।
14:28 आपसे किसने कहा है कि आप शस्त्र नहीं उठा सकते? कृष्ण खड़े भी हैं पांडवों की ओर से तो भी लड़ना तो पड़ रहा है ना पांडवों को। ऐसा तो नहीं है कि बिना लड़े जीत गए। आपसे किसने कहा है कि आप ना लड़िए? उन्होंने चक्रव्यूह रचे हुए हैं। तो आपसे किसने कहा है कि आप अपनी बुद्धि का उपयोग करके चक्रव्यूहों को ना काटिए। आपसे किसने कहा है? वहां तंत्र है। वहां तुरंत सूचनाएं इधर से पहुंच जाती
15:14 हैं कि कब कौन फिसल रहा है और उसको तुरंत जकड़ने के लिए तंत्र सक्रिय हो उठता है। तो इस बात को तो हम तुरंत कह देते हैं कि उधर पूरा एक तंत्र सक्रिय है जो लगातार लोगों को अपनी गिरफ्त में रखे रहता है और उस तंत्र से अगर कोई बाहर हो रहा होता है तो तुरंत सूचना पहुंच जाती है और एक पुलिस सक्रिय हो जाती है हम कि कोई छूट रहा है जेल से वापस लेकर के आओ उसको ऐसा ही होता है कि नहीं होता है तो आपसे किसने कह दिया है कि आप एक दूसरे को अपना सहारा नहीं दे
16:01 सकते। किसने कह दिया है? देखिए अहंकार होता है जो कहता है कि जो करूंगा खुद ही करके दिखा दूंगा। वो कहानी सुनी है ना कि बाप बेटे से कह रहा है कि पत्थर उठा। वो बेटा पूरी कोशिश कर रहा है। बाप कह रहा है अपनी पूरी ताकत लगा। अपनी पूरी ताकत लगा। उठ जाएगा। उससे उठ नहीं रहा
16:47 है। बाप कह रहा है ना ना पूरी ताकत लगाएगा तो उठ जाएगा। नहीं उठ रहा है। वो लगा रहा है पूरा जोर। अंत में बाप सहारा देता है पत्थर उठ जाता है। बाप कहता है तेरी पूरी ताकत में यह शामिल है कि तू मेरी मदद ले। यह भी तेरी ताकत का एक हिस्सा है कि जब मैं तेरा ही हूं, तेरा शुभिक्षु ही हूं, तो तू सीधे-सीधे मेरे पास आकर कहे कि मदद करो तो हम क्यों नहीं मदद ले सकते अपने शुभिक्षुओं से? हमें किसने रोका है? ऐसा तो नहीं है कि हम बुद्धिहीन हैं।
17:38 यह जो पूरी व्यवस्था है, यह किस तरह से काम करती है, हम इसको समझते तो हैं ही। ऐसा तो नहीं कि नहीं समझते। इसके दांव पेचों से अवगत हैं हम। हम एक औसत आदमी जितना समझता है उससे कहीं ज्यादा समझते हैं हम कि यह व्यवस्था कैसे अपने चंगुल में रखती है। जब इस बात को समझते हैं तो फिर दायित्व भी हमारा ही है ना। और अगर पाते हैं कि अपना आपा कम पड़ता है तो बेशक आप भी सलाह मांगिए मदद
18:32 मांगिए उसमें कोई ओछापन नहीं है। या आप यह कहना चाहते हैं कि अस्तित्व सिर्फ आपकी दुश्मनी करने के लिए खड़ा है। मदद नहीं लेंगे आप अस्तित्व से? यह कहना चाहते हैं कि वह तो मेरा दुश्मन है। उससे मदद कैसे लूं? बताओ ना। वह तुम्हारी मुखालफ़त करने आता है। तुमको मानने में कोई दिक्कत नहीं होती। तुम कहते हो हां बिल्कुल सही बात है। समाज सड़ा हुआ है। मुझे गिरफ्त में ले लिया है। संस्कारित कर दिया है। अंधेरा बहुत घना है। ठीक। और जो तारे
19:18 चमक रहे हैं वो वो दोस्त नहीं है तुम्हारे। किसने कह दिया कि उनको साथ ना लो। किसने कह दिया कि तुम उनके सहारे ना बनो और वो तुम्हारे सहारे ना बने। बुद्ध को भी एक संघ बनाना पड़ा था। क्योंकि सम को सम
20:05 का सहारा अति आवश्यक होता है। दो तरह के लोग होते हैं जिनकी हार पक्की होती है। जो युद्ध में उतरे ही
20:51 नहीं और दूसरे वो जो युद्ध में तो उतरे पर उनकी मानसिकता कैसी रहे महाभारत में एक चरित्र आता है शल्य के नाम से वो कर्ण का सारथी था वो लगातार यही बोलता रहता था कर्ण को कि तुम्हारी औकात क्या है तुम्हारी बिसात क्या अरे देखो उधर तुम हार हारोगे तुम हारोगे और इस व्यक्ति को कर्ण ने अपने पास बिठा रखा था सारथी और वो दिन रात कर्ण के कानों में यही जहर डाल रहा है अब उधर है अर्जुन जिसका सारथी है कृष्ण और इधर है कर्ण जिसका सारथी है शल्य बात बहुत सीधी सी है कि अब क्या होगा तुम्हें किसने कहा है कि अपने जीवन
21:38 को शल्यों से भर दो जो दिन रात तुम्हें यही कह रही हूं कि तुम जीत नहीं सकते। बोलो और पागलपन है कर्ण का कि जब दिख रहा है कि सामने ऐसा सारथी बैठा है तब भी उस सारथी को ढोए जा रहा है। निकाल फेंक बाहर कर सकता था। इतिहास बदल सकता था। पर कहीं ना कहीं कर्ण ने ठान रखा था
22:24 कि हारना है। जिन्होंने भी महाभारत को सूक्ष्मता से पढ़ा है। उन्होंने पाया है कि कर्ण चाहता ही था कि हार जाऊं। वैसे मत हो जाइए। देखिए इनमें लाख ताकत होगी। पर ये किसी गिनती के नहीं है। ये जन्मते हैं। कीड़े मकोड़ों की तरह होते हैं और मर जाते हैं। होंगे बहुमत में होंगी बड़ी संख्याएं
23:09 उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इन्होंने जीवन को ही नहीं पाया है। यह जिए ही नहीं है। आप इनसे घबराते क्यों हो? आप घबरा सकते हो इन लोगों से? सुन रहे हो ना ये आवाजें? घबरा सकते हो आप घबरा जाते हो और कुछ नहीं बस इसलिए क्योंकि मन संख्या गिनता है बहुत बड़ी तादाद है
23:55 इनकी कीड़े मकोड़ों की तरह लगातार हर जगह यही है यही है यही है देखो फिर से आसमान की ओर देखो। देखो कि कितना काला है। पर क्या फर्क पड़ता है। आसमान की तुलना में चांद कुछ नहीं है। पर ध्यान से देखो कि इस वक्त हमारे ऊपर अंधेरा नहीं है। चांदनी
24:43 है। आसमान की तुलना में चांद की क्या औकात है? कुछ है? हम्म। पर इस वक्त हमारे ऊपर अंधेरा नहीं है, चांदनी है। कभी किसी ने अंधेरे की प्रतीक्षा नहीं करी है। लोगों ने चांद सूरज की प्रतीक्षा करी है। तारों की प्रतीक्षा करी है। ये सब मन को पीछे धकेलने वाले ख्याल हैं कि किसी को कितना भी कह दो कुछ हो नहीं सकता कि बुद्धों ने जो करा वो फ्रूटफुल
25:29 नहीं रहा। है कबीर का कि ना होते साधु जन तो जल मरता संसार। पूछा गया कि इतने साधु हैं, इतने संत हैं उसके बाद भी संसार की दुर्दशा क्यों है? तो उत्तर यही दिया गया था कि जितना अभी बचा भी हुआ है इसी कारण बचा हुआ है क्योंकि संत हैं ना होते तो जल मरता। बिल्कुल ही जल मरता। बहुत महत्व
26:15 है। कुछ ऐसा नहीं है कि तुम जो कर रहे हो, तुम जो हो वो फ्रूटलेस है। बिल्कुल ऐसा नहीं है। अगर आदमी के जन्म को कुछ है जो सार्थक बना सकता है तो वह काम है जो तुम कर रहे हो। तुम्हारा तो दिल हमेशा भरा हुआ होना चाहिए। नजर एक क्षण को झुके
27:04 ना। अस्तित्व तुम्हारे साथ है। उनके साथ थोड़ी है। उनकी संख्या होंगी। पर अस्तित्व उनके साथ नहीं है। अस्तित्व तुम्हारे साथ है। और कोई बंदिश नहीं है तुम पर। सत्य धर्म बंदिशें नहीं सिखाते हैं। तुम्हें भी पूरी स्वतंत्रता है
27:51 बुद्धि का विवेक का उपयोग करने की। यदि जाल है तो जाल को काटने की योग्यता तुम में होनी चाहिए। उसमें विचार का प्रयोग करो। अकल लगाओ। जुगत बिठाओ। भदू बन के मत रहो कि मैं तो ऐसा हूं मेरे साथ यह हो गया। मैं तो सच्ची बात बोलता हूं पर मेरी पिटाई कर दी जाती है। कहां तो सत्यमेव हो जाते हैं और कहां खड़े हो जाओ कि मैं तो सत्य की राह पर चल रहा हूं और दर-दर ठोकरें ही खाता हूं। दरदर ठोकरें
28:37 खाता है। एक बुद्ध ना अस्तित्व का बेटा है। अस्तित्व की बाहों में झूलता है। उसका चेहरा निखरा हुआ होता है। नूर होता है। उसकी आंखों में उसके चेहरों में ठोकरें नहीं खाता। वो उदास नहीं रहता। परम विश्वास होता है। उसकी आवाज नहीं कांपती। उसके पांव नहीं थरथराते। जो सबसे बड़ी ताकत हो सकती है वह उसके साथ
29:24 है। वो तो योद्धाओं में योद्धा होता है। वो बेचारगी की शक्ल ले नहीं घूमता कि मैं क्या करूं। मेरे ऊपर बड़ी बंदिशें हैं। मुझे यह कहा जा रहा है। मैं तो चाहता हूं लेकिन हो नहीं पा रहा है। शल्य मत बनो। तुम्हारा जो मन है वही शल्य है। तुम कर्ण हो। तुम्हारा मन शल्य है। समाज तुम्हारे भीतर घुस के बैठ गया और तुम्हें ही लगातार बता रहा है कि तू जीत नहीं सकता। तू हमसे जीत नहीं सकता। हम सबके मन के भीतर समाज शल्य बन के बैठा
30:09 हुआ है। है कि नहीं है? बोलो। वो तुमसे कहता है आज नहीं तो कल कुचल दिए जाओगे। इसको निकाल बाहर करो। शेर जब जाता है जंगल में बंदर होते हैं आसपास खूब चै च ची ची ची ची कर रहे होते हैं और वहां वो दहाड़ मारता है तो दो चार तो उसकी दहाड़ से ही नीचे गिर पड़ते हैं पेड़ से यह संबंध होना चाहिए तुम्हारा समाज
30:54 से यह बंदर बंदर कौन जो बेचैन है? बंदर को कभी देखो ध्यान से। वो ऐसा लगता है जैसे पता नहीं कहां पहुंचना चाहता है। पता नहीं क्या पाना चाहता है। उसी को तो बंदर कहते हैं। कभी कोई बंदर देखा? ध्यान मत शांति से बैठा हुआ स्थिर। यह बंदर हैं। एक दहाड़ मारोगे यह नीचे गिर पड़ेंगे। तुमने इनको इतनी बड़ी ताकत मान लिया। तुम्हें क्या लगता है इनमें कोई
31:40 आत्मबल है? इन चेहरों का सूनापन देखो, आंखों का वीराना देखो। क्या दम है इनमें? बात बातबात पर तो यह शंकेत कपे हुए रहते हैं। क्या दम है इनमें? और तुम इन्हें भाव देकर के बैठते हो कि 50 वर्षों तक कुछ भी कर ले उससे कोई अंतर नहीं पड़ेगा। एक दहाड़ से अंतर पड़ जाता है। एक नजर काफी होती है यह ऐलान कर देने के लिए कि मैं मुक्त हूं। एक नजर काफी होती है।
32:33 पर पहले यह ख्याल बिल्कुल मन से निकाल दो कि एक के अलावा कोई दूसरा है जिसके पास ताकत है जिसकी सत्ता है जो जीत सकता है। कोई दूसरा नहीं है। और तुम उस एक के बेटे हो। वो तुम्हारे साथ खड़ा है। उसका हाथ है तुम्हारे सर पे। तुम कैसे हारोगे? वो तुम्हें काट भी दे, हार भी दे। तुम तब भी नहीं हारोगे। तुम दोबारा आओगे। जितना तुम्हें
33:19 ही है। तुम फिर आओगे। तुम फिर आओगे। तुम ही कृष्ण हो। तुम ही बार-बार आते हो। वो जो कहते हैं ना कृष्ण का काम कोई पूरा नहीं हो गया है। कि एक बार अर्जुन को बोल दिया तो अब वो अब वो बार-बार लौट-लौट के आते हैं। इन पर करुणा की दृष्टि रख लो सो ठीक है। ये करुणा के पात्र
34:08 हैं। जैसे बहके हुए बच्चे तो करुणा के पात्र तो हो सकते हैं। पर बहके हुए बच्चे से तुम डर जाओ। यह अजूबा कैसे? इन्हें कोई मैच्योरिटी थोड़ी मिली है। ये खिले थोड़े ही हैं, परिपक्व थोड़ी हुए हैं। ये तो बच्चे ही हैं। बच्चे की उंगली पकड़ी जा सकती है। और बच्चा ज्यादा नादानी करे तो उसे डांटना भी पड़ेगा। पर तुम डरे हुए हो बच्चों से कि अरे बाप रे इतने सारे बच्चे
34:54 हैं। लाख बार हारोगे तब भी नहीं हारे हो क्योंकि तुम जो लड़ाई लड़ रहे हो तुम्हारी है ही नहीं वो हारी नहीं जा सकती 100 बार हार लो हंसते-हंसते हार लो और गहरी श्रद्धा रहे मन में कि मैं कल फिर आऊंगा नए रूप में आऊंगा। यह जिस्म नहीं भी रहा तो भी
35:40 आऊंगा। तुम खत्म हो जाओगे। तुम देह भर हो। मैं फिर आऊंगा। मैं नहीं हारता। कभी नहीं हारता। मैं जीता ही हुआ हूं। सत्यमेव जयते सत्यमेव जयते मैं जीता ही हुआ हूं।
36:30 अपनी बुद्धि को चलने दो उस परम के इशारों पे पूरा पूरा उपयोग होने दो बुद्धि का तुम जानते हो तुम्हें क्या करना है? अपनी पूरी सामर्थ्य को उस दिशा में लग जाने दो। कोई बंदिश नहीं है। बिल्कुल ही कोई बंदिश नहीं है। देखो हम जो अद्वैत में काम करते हैं उसमें तुम्हें बहुत हारें मिल सकती हैं।
37:17 100 बार हारोगे। कितना भी हारना मुंह लटका के मत आना। क्योंकि तुम जीते ही हुए हो। लड़े थे। हम क्योंकि तुम लड़े थे। वो खत्म हो जाएंगे। उनकी कोई बिसात नहीं है। उनमें कोई ताकत नहीं है। वो खत्म हो जाएंगे। तुम खत्म नहीं होगे।
38:10 बात समझ में आ रही है? मैं नहीं कह रहा हूं कि एक झटके में तुम आसमान को रोशन कर दोगे। स्थिति शायद यही रहेगी हमेशा जैसी अभी है। पर तारे को ही हक है हंसने का। तारा ही हंसता है। अंधेरा थोड़ी हंस रहा है। तुम हंसो। जब तुम्हें लग रहा हो कि तुम हार गए हो, तुम तब भी हंसो। हम और तुमसे ज्यादा किसी को हक नहीं है सेलिब्रेशन का। नहीं तुम्हें हक लगता है सेलिब्रेशन
38:56 का? अरे उत्सव कुछ पाने का होता है। जिन्होंने कुछ पाया नहीं है, बस प्यास है उनके पास वो काहे की खुशी मना रहे हैं? काहे की उनकी होली और काहे की उनकी दिवाली है? तुम्हारे पास है क्या खुशी मनाने के लिए? खुशी मनाने का हक तुमको है और पूरी पूरी खुशी मनाओ। यही तो इनाम है ना तुम्हारा। यही इनाम है कि तुम्हारा जीवन उत्सव रहेगा। उनका जीवन खाली जाम रहेगा।
39:41 और जहां पर रुका वहां पर खाली जाम है खाली जाम है खाली वहां बस यही रहेगा तुम क्यों इतने निराश से रहते हो कि सब कुछ है उसके बाद भी तुम मानते हो कि तुम्हारा जाम खाली है सबको हक नहीं होता है दीप जलाने का, रंग खेलने का, गीत गाने का, मौज मनाने का। तुम्हें हक है। पूरी मौज मनाया करो। बड़ी से बड़ी तबाही हो जाए। लगे
40:28 कि जितनी कोशिशें की थी, सब व्यर्थ हो गई। उस क्षण में भी यह मत सोचना कि तुम असफल हो गए। कुछ नहीं। तुम्हें पता भी नहीं है कि तुम्हारे माध्यम से कौन खेल रहा है। वो हारने के लिए खेलता ही नहीं। वो कभी हारने के लिए खेला ही नहीं है। तुम प्यादे हो उसके खेल के। तुम पिट भी गए तो भी खेल वही जीत रहा है। शतरंज में कई बार प्यादे की कुर्बानी हो जाती है। पर प्यादे को मायूस नहीं होना
41:16 है। वो मरा भी है तो भी जीत गया है। समझ रहे हो ना बात को? तुम्हें पूरा दृश्य दिखाई नहीं देता। टोटल पिक्चर देख नहीं पाते इसलिए मायूस हो जाते हो। तुम कहते हो कि मैं ही तो लड़ाई लड़ रहा था। जैसे शतरंज का प्याजा सोचे कि इस पूरे शतरंज के खेल में वही तो महत्वपूर्ण है और वो देखे कि मैं मर गया, मैं हार गया। तो कहे कि इसका मतलब खेल खत्म हो गया। नहीं प्यादे के पिट जाने से खेल खत्म नहीं हो जाता। तुम लड़ो अड़ो। यह जिहाद है। असली जिहाद है
42:07 ये। वास्तविक अर्थों में जिहाद है ये। जिन्होंने जिहाद शब्द पहली बार दिया था। अगर वो आज यहां मौजूद हो और हैं तो आनंद मग्न हो जाएंगे। वो कहेंगे हां अगर कोई समझा है जिहाद का अर्थ तो यह लोग समझे। इसे कहते हैं जिहाद और जिहादी की तरह रहो। [संगीत] हम हम [संगीत]