0:00 मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वह हर चीज को अपने नियंत्रण में रखना चाहता है। वह चाहता है कि परिस्थितियां उसकी मर्जी से चले। लोग उसकी इच्छा के अनुसार व्यवहार करें और भविष्य वैसा ही बने जैसा उसने सोच रखा है। लेकिन जीवन कभी किसी की इच्छा से नहीं चलता। जीवन अपनी धारा में बहता है और जो इस धारा के खिलाफ जाने की कोशिश करता है उसे केवल पीड़ा मिलती है। यही कारण है कि यह वाक्य इतना गहरा है छोड़ दो सब अपने आप ठीक हो जाएगा। क्योंकि जैसे ही तुम छोड़ते हो वैसे ही तुम्हारा संघर्ष समाप्त हो जाता है और जीवन अपने आप सही दिशा में बहने लगता है। पकड़ने का स्वभाव ही असुरक्षा से आता है। हमें लगता
0:45 है कि अगर हमने छोड़ दिया तो सब बिगड़ जाएगा। लेकिन असल में उल्टा होता है। जितना हम पकड़ते हैं उतना ही चीजें टूटती हैं। और जितना हम छोड़ते हैं उतना ही सब कुछ सहज और संतुलित हो जाता है। यह ऐसे है जैसे किसी फूल को कसकर पकड़ लो तो उसकी पंखुड़ियां टूट जाएंगी। लेकिन अगर उसे हल्के से छोड़ दो तो वह अपनी पूरी खूबसूरती से खिला रहेगा। जीवन भी ऐसा ही है। जब हम छोड़ते हैं तो जीवन खिलता है। यह समझना जरूरी है कि छोड़ना मतलब हार मानना नहीं है। छोड़ना मतलब है जीवन को उसके स्वभाव के अनुसार चलने देना। यह विश्वास करना कि अस्तित्व तुम्हें वही देगा जो तुम्हारे लिए सही है। हार मानना निष्क्रियता है लेकिन छोड़ना सक्रिय
1:33 विश्वास है। यह भरोसा करना है कि अगर मैंने पकड़ छोड़ी तो जीवन मुझे संभाल लेगा। यही भरोसा हमें गहरी शांति देता है। जब हम छोड़ना नहीं जानते तो हम चिंता में जीते हैं। हम हर समय यह सोचते रहते हैं कि कल क्या होगा? लोग हमारे बारे में क्या सोचेंगे? हमारी योजना सफल होगी या नहीं और यह चिंता हमारी ऊर्जा को खत्म कर देती है। लेकिन जैसे ही हम कहते हैं अब मैं छोड़ देता हूं वैसे ही हमारा मन हल्का हो जाता है। छोड़ना हमें चिंता से मुक्त करता है। और जब चिंता समाप्त होती है तब भीतर शांति और मौन का जन्म होता है। यही मौन हमें सबसे बड़ी शक्ति देता है। छोड़ना हमें प्रेम में भी गहराई देता है। जब हम किसी
2:19 को पकड़ कर रखना चाहते हैं तो प्रेम धीरे-धीरे बोझ बन जाता है। लेकिन जब हम छोड़ देते हैं और सामने वाले को स्वतंत्रता देते हैं तभी प्रेम अपनी असली गहराई में खिलता है। क्योंकि प्रेम का स्वभाव ही स्वतंत्रता है। अगर उसमें स्वामित्व और पकड़ है तो वह प्रेम नहीं है। वह कैद है और कैद कभी स्थाई नहीं होती। इसलिए जो सचमुच प्रेम करना जानता है वही छोड़ना जानता है और वही अनुभव करता है कि जब तुम छोड़ते हो तब प्रेम अपने आप लौट आता है और पहले से भी गहरा हो जाता है। जब तुम जीवन को कसकर पकड़ते हो तो हर चीज तुम्हारे लिए संघर्ष बन जाती है। तुम सोचते हो कि अगर मैंने नियंत्रण छोड़ा तो सब बिगड़ जाएगा। लेकिन देखो तुम्हारे
3:06 नियंत्रण में अब तक क्या बिगड़ा और क्या सुधरा। कितनी बार तुमने सोचा कि चीजें तुम्हारे हिसाब से होंगी। लेकिन जीवन ने तुम्हें बिल्कुल अलग रास्ते पर धकेल दिया और बाद में जब तुमने पीछे मुड़कर देखा तो पाया कि वही रास्ता तुम्हारे लिए सबसे बेहतर था। यानी जो जीवन करता है वही तुम्हारे लिए सही होता है। लेकिन उस समय जब तुम पकड़ रहे होते हो तुम्हें लगता है कि सब गलत हो रहा है। यही कारण है कि छोड़ना ही सच्ची समझ है। यह स्वीकार करना कि जीवन को मुझसे ज्यादा जीवन खुद समझता है। छोड़ना हमें भीतर की उस गहराई से जोड़ता है जहां कोई डर नहीं है। डर हमेशा पकड़ से जुड़ा होता है। अगर मैंने छोड़ा तो मैं अकेला रह जाऊंगा। अगर मैंने छोड़ा
3:52 तो सब खो दूंगा। लेकिन सच्चाई यह है कि अकेलापन पकड़ से आता है। स्वतंत्रता छोड़ने से। जब तुम छोड़ते हो तो तुम भीतर के उस आकाश से जुड़ते हो जो हमेशा पूर्ण है। वहीं तुम्हें एहसास होता है कि वास्तव में तुम्हें किसी चीज की कमी नहीं थी। तुम पहले से ही संपूर्ण थे। पकड़ ने तुम्हें केवल इस सत्य से अंधा कर रखा था। छोड़ना यह भी सिखाता है कि हर चीज अस्थाई है। तुम चाहे कितनी भी कोशिश कर लो कुछ भी स्थाई नहीं हो सकता। रिश्ते बदलते हैं, परिस्थितियां बदलती हैं, शरीर बदलता है। समय बदलता है और यही अस्थाईपन जीवन को खूबसूरत बनाता है। अगर सब स्थाई होता तो
4:37 जीवन बोरियत बन जाता। लेकिन हम इस अस्थाईपन को स्वीकार नहीं करते। हम इसे पकड़ना चाहते हैं और यहीं से हमारी पीड़ा शुरू होती है। जब तुम छोड़ देते हो तो तुम जीवन के इस नृत्य को स्वीकार कर लेते हो। तब हर क्षण तुम्हें नया लगता है। हर अनुभव तुम्हें अनमोल लगता है। यह भी समझना जरूरी है कि छोड़ना निष्क्रियता नहीं है। लोग सोचते हैं कि छोड़ देना मतलब कुछ भी ना करना। लेकिन छोड़ना मतलब है परिणाम की पकड़ छोड़ देना। काम तो तुम करते हो। लेकिन उसके नतीजे को जीवन पर छोड़ देते हो। यही गीता का संदेश है। कर्म करो। फल की चिंता मत करो। जब तुम इस तरह छोड़ते हो तो तुम्हारा काम बोझ नहीं रहता। तुम आनंद से काम करते हो। और यही आनंद तुम्हें
5:24 सफलता भी देता है। छोड़ना रिश्तों में भी बहुत आवश्यक है। अक्सर लोग एक दूसरे को पकड़ कर रखते हैं। तुम मेरे हो। तुम कहीं और नहीं जा सकते। लेकिन यही पकड़ प्रेम को धीरे-धीरे मार देती है। प्रेम केवल स्वतंत्रता में फलता है। जब तुम छोड़ते हो तो सामने वाला अगर रुकेगा तो वह प्रेम से रुकेगा मजबूरी से नहीं। और अगर वह चला जाएगा तो यह भी तुम्हारे लिए वरदान ही होगा। क्योंकि जो तुम्हारे लिए सही होगा वही तुम्हारे पास रहेगा। इसलिए छोड़ना प्रेम की परीक्षा है। और जिसने प्रेम में छोड़ना सीख लिया उसने प्रेम का सार समझ लिया। जब तुम छोड़ते हो तो तुम जीवन को हां कहते हो। पकड़ना हमेशा ना है। तुम
6:10 कहते हो यह ऐसा ही होना चाहिए। नहीं तो मैं स्वीकार नहीं करूंगा। यही ना तुम्हें दुख देता है। लेकिन जब तुम छोड़ते हो तो तुम कहते हो जैसा है वैसा ही ठीक है। और इसी स्वीकार में शांति है। यही स्वीकार ध्यान का द्वार खुलता है। यही स्वीकार तुम्हें भीतर से मुक्त करता है। यही कारण है कि छोड़ने वाला व्यक्ति हमेशा प्रसन्न होता है। छोड़ना हमें बीमारी से भी मुक्त करता है। सोचो चिंता और तनाव से कितनी बीमारियां पैदा होती है। दिल की बीमारी, ब्लड प्रेशर, अनिद्रा, बेचैनी ये सब पकड़ का परिणाम है। क्योंकि हम हर चीज को पकड़ कर रखते हैं। इसलिए हमारा शरीर भी कस जाता है। लेकिन जब हम छोड़ते हैं तो
6:56 हमारे शरीर की जकड़न भी खुलने लगती है। हमारा मन शांत होता है। शरीर सहज होता है और स्वास्थ्य अपने आप लौट आता है। यानी सचमुच जब तुम छोड़ देते हो, सब अपने आप ठीक हो जाता है। छोड़ना हमें यह भी सिखाता है कि जीवन का नियंत्रण हमारे हाथ में नहीं है। हम सोचते हैं कि हम सब कुछ नियंत्रित कर सकते हैं। लेकिन क्या यह सच है? क्या हम अपनी सांस को रोक सकते हैं? क्या हम अपने दिल की धड़कन को आदेश दे सकते हैं? क्या हम सूर्य को कह सकते हैं कि आज मत उगना। जीवन का सबसे छोटा नियम भी हमारे नियंत्रण में नहीं है। तो फिर हम क्यों यह भ्रम पालते हैं कि हम जीवन को पकड़ सकते हैं? यह भ्रम ही हमारी पीड़ा है। और जब हम इसे छोड़ते हैं तो हमें पहली
7:42 बार यह अनुभव होता है कि नियंत्रण की जरूरत ही नहीं है। जीवन पहले से ही सही चल रहा है। छोड़ना आत्मसमर्पण है। आत्मसमर्पण मतलब यह मानना कि मैं अकेला कुछ नहीं कर सकता। मुझे अस्तित्व पर भरोसा करना होगा। यह भरोसा ही तुम्हें हल्का करता है। जब तुम समर्पण करते हो तो जीवन तुम्हें अपने कंधों पर उठा लेता है। और तभी तुम महसूस करते हो कि जो काम तुम अकेले नहीं कर सकते थे वही काम जीवन तुम्हारे लिए कर देता है। यही समर्पण सबसे बड़ी शक्ति है। यही समर्पण सबसे बड़ा विश्वास है। और अंततः छोड़ना तुम्हें परम स्वतंत्रता देता है। पकड़ हमेशा तुम्हें कैद करती है। पकड़ का मतलब है डर, लालसा, असुरक्षा। लेकिन जब
8:28 तुम छोड़ते हो तो तुम इन सबसे ऊपर उठ जाते हो। तुम अब स्वतंत्र हो जाते हो और यही स्वतंत्रता असली आनंद है। यही स्वतंत्रता मुक्ति है। यही स्वतंत्रता आत्मा की पूर्णता है। इसलिए यह वाक्य केवल शब्द नहीं है। यह जीवन का सबसे गहरा सत्य है। छोड़ दो। सब अपने आप ठीक हो जाएगा। छोड़ने का अर्थ केवल बाहरी परिस्थितियों से हाथ खींच लेना नहीं है बल्कि भीतर के संघर्षों को समाप्त करना भी है। हम में से हर कोई अपने भीतर किसी ना किसी दर्द, किसी ना किसी स्मृति, किसी ना किसी अपमान या अपेक्षा को पकड़े बैठा है। यही पकड़ हमें बार-बार अतीत में खींच ले जाती है और वर्तमान को जीने से रोक देती है।
9:15 जब हम कहते हैं छोड़ दो सब अपने आप ठीक हो जाएगा। तो इसका पहला अर्थ यही है कि उन पुराने बोझों को गिरा दो जिन्हें ढोते ढोते तुम थक चुके हो। जब अतीत का बोझ गिरता है तभी वर्तमान हल्का हो जाता है और भविष्य अपने आप उज्जवल बनने लगता है। हम यह भी भूल जाते हैं कि जीवन का हर अनुभव हमें कुछ ना कुछ सिखाने आता है। लेकिन हम उस सीख को पकड़ कर दुख बना लेते हैं। जैसे किसी ने तुम्हें धोखा दिया। यह तुम्हें सिखाने आया था कि विश्वास आंख बंद करके नहीं सजग होकर करो। लेकिन तुमने धोखे को पकड़ लिया और अब हर रिश्ते में वही डर लेकर चलते हो। यही पकड़ तुम्हें नए प्रेम, नई संभावनाओं, नई स्वतंत्रता से रोकती है।
10:01 जब तुम कहते हो छोड़ दो तो तुम अनुभव को स्वीकार करते हो लेकिन उसकी पीड़ा को पकड़े नहीं रहते। और तब वह अनुभव तुम्हारे लिए ज्ञान बन जाता है। बोझ नहीं। छोड़ने का संबंध विश्वास से गहरा है। जो जीवन पर भरोसा करता है वही छोड़ सकता है और जो भरोसा नहीं करता वही कसकर पकड़ता है। हमें लगता है कि अगर हमने छोड़ दिया तो सब बिखर जाएगा। लेकिन जिस पल हम भरोसा करते हैं और छोड़ देते हैं, उसी पल हमें पता चलता है कि जीवन हमारी सोच से कहीं अधिक बुद्धिमान है। जीवन हमें वही देता है जिसकी हमें सच में आवश्यकता है। भले ही वह हमारी इच्छाओं के खिलाफ क्यों ना हो। यही कारण है कि छोड़ना एक आध्यात्मिक छलांग है। यह छलांग हमें सीधे अस्तित्व की
10:48 गोद में पहुंचा देती है। यह भी देखो कि छोड़ना केवल दुख से मुक्ति नहीं है बल्कि सुख से भी मुक्ति है। क्योंकि सुख को पकड़ना भी उतना ही कष्ट देता है जितना दुख को पकड़ना। अगर तुम्हारे जीवन में कोई सुखद अनुभव आता है और तुम चाहते हो कि यह हमेशा बना रहे तो यह चाहत ही तुम्हें पीड़ा देगी। क्योंकि जीवन का नियम है हर चीज बदलनी है। सुख भी बदलेगा, दुख भी। और जो यह समझ लेता है वह सुख को भी पकड़ता नहीं और दुख से भी डरता नहीं। वह दोनों को अनुभव करता है और छोड़ देता है। यही संतुलन यही शांति का मार्ग है। छोड़ना एक अभ्यास नहीं है बल्कि एक समझ है। यह तब घटता है जब तुम पूरी तरह देख लेते हो कि पकड़ने से केवल दुख मिला है। जब यह बोध
11:34 गहराई से उतरता है तो पकड़ अपने आप गिर जाती है। तुम्हें प्रयास करने की जरूरत नहीं रहती। जैसे गर्म लोहे को हाथ से छोड़ने के लिए तुम्हें किसी प्रयास की जरूरत नहीं होती। तुम अपने आप उसे गिरा देते हो। वैसे ही जब तुम देख लेते हो कि पकड़ ही तुम्हारे दुख का कारण है तो तुम सहज ही छोड़ देते हो। छोड़ना हमें रिश्तों में सच्चा प्रेम सिखाता है। अधिकांश लोग प्रेम को पकड़ समझते हैं। वे कहते हैं अगर तुम मुझसे प्रेम करते हो तो केवल मेरे रहो। लेकिन यह पकड़ है प्रेम नहीं। असली प्रेम कहता है तुम स्वतंत्र रहो। चाहे मेरे साथ रहो या ना रहो। मैं तुम्हें प्रेम करता रहूंगा। यह प्रेम तभी संभव है जब तुमने पकड़ छोड़ दी हो। और यही प्रेम सबसे गहरा सबसे सच्चा होता है। इसमें ना डर है ना असुरक्षा ना अपेक्षा केवल
12:23 स्वतंत्रता और समर्पण है। छोड़ने से हमारी सृजनशीलता भी खिलती। जब तुम लगातार भविष्य की चिंता करते रहते हो और सब कुछ नियंत्रित करने की कोशिश करते हो तो तुम्हारा मन बंधा रहता है। और बंधा हुआ मन कुछ नया नहीं कर सकता। लेकिन जब तुम छोड़ते हो तो तुम्हारा मन खुल जाता है। उसमें नई ऊर्जा आती है। नए विचार आते हैं। नया उत्साह आता है। यही कारण है कि महान रचनाकार, कवि, संगीतकार और संत सभी ने कहा है कि उनकी सबसे बड़ी रचनाएं तब हुई जब उन्होंने पकड़ छोड़ दी। और अस्तित्व के प्रवाह को अपने ऊपर से बहने दिया। छोड़ना हमें मृत्यु से भी मुक्त करता है। मृत्यु
13:08 को हम सबसे बड़ा डर मानते हैं क्योंकि हमें लगता है कि यह सब छीन लेगी। लेकिन जिसने छोड़ना सीख लिया उसके लिए मृत्यु भी भयावह नहीं है। उसने पहले ही सब छोड़ दिया है। रिश्तों की पकड़, इच्छाओं की पकड़, अहंकार की पकड़। उसके पास अब कुछ भी बचा नहीं है जिससे मृत्यु छीन सके। और यही कारण है कि संत मृत्यु के समय भी मुस्कुराते हैं। उनके लिए मृत्यु केवल अंतिम मुक्ति है। यह भी समझो कि छोड़ना मतलब जीवन से भागना नहीं है। कई लोग सोचते हैं कि छोड़ देना मतलब जिम्मेदारी छोड़ देना, रिश्ते छोड़ देना, साधारण कर्तव्य छोड़ देना। लेकिन ऐसा नहीं है। छोड़ना
13:54 मतलब है परिणाम की आसक्ति छोड़ देना। तुम अपने कर्तव्य को पूरी सजगता और ईमानदारी से करते हो लेकिन उसके नतीजे को पकड़ कर नहीं बैठते। यही वास्तविक त्याग है। यही सच्चा ध्यान है। यही कर्म योग है। और अंततः छोड़ना हमें वही देता है जिसकी हम हमेशा तलाश में रहते हैं। शांति, स्वतंत्रता और आनंद। जब तुम पकड़ते हो तो तुम्हें लगता है कि तुम पा रहे हो। लेकिन वास्तव में तुम खो रहे होते हो। और जब तुम छोड़ते हो तो तुम्हें लगता है कि तुम खो रहे हो लेकिन वास्तव में तुम पा रहे होते। यही जीवन का सबसे गहरा रहस्य है और यही इस वाक्य का सार है। छोड़ दो सब अपने आप ठीक हो जाएगा। छोड़ना हमें यह सिखाता है कि जीवन को
14:41 नियंत्रित करने की हमारी कोशिशें कितनी व्यर्थ हैं। हम सोचते हैं कि अगर हम पर्याप्त योजनाएं बना लें, पर्याप्त सुरक्षा जमा कर लें, पर्याप्त रिश्ते पकड़ कर रखें तो सब कुछ हमारे नियंत्रण में रहेगा। लेकिन क्या कभी किसी का जीवन पूरी तरह उसके नियंत्रण में रहा है? सबसे शक्तिशाली राजा भी मौत को रोक नहीं पाया। सबसे अमीर व्यक्ति भी दुखों से मुक्त नहीं हुआ और सबसे बुद्धिमान दार्शनिक भी भविष्य को नहीं बदल पाया। इसका अर्थ यही है कि नियंत्रण का विचार ही भ्रम है। और जब हम यह भ्रम छोड़ देते हैं, तभी हमें समझ आता है कि जीवन पहले से ही अपने संतुलन में है। हमें कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।
15:27 पकड़ हमेशा भय से जन्म लेती है। हम रिश्ते पकड़ते हैं क्योंकि हमें अकेले होने का डर है। हम धन पकड़ते हैं क्योंकि हमें भविष्य में असुरक्षा का डर है। हम प्रतिष्ठा पकड़ते हैं क्योंकि हमें सम्मान खोने का डर है। लेकिन जो व्यक्ति छोड़ देता है, वह इन सभी डरों से मुक्त हो जाता है। उसने समझ लिया है कि असली सुरक्षा केवल भीतर है। अगर भीतर शांति है तो बाहरी असुरक्षा भी तुम्हें हिला नहीं सकती। यही छोड़ना है। बाहर की पकड़ छोड़कर भीतर की शक्ति को पहचान लेना। छोड़ना हमें वर्तमान से जोड़ता है। पकड़ हमेशा अतीत या भविष्य से जुड़ी होती है। तुम अतीत की किसी याद को पकड़ कर बैठे हो या भविष्य की किसी संभावना को और इसी कारण तुम वर्तमान में
16:14 नहीं जी पाते। लेकिन जीवन केवल वर्तमान में है। यही क्षण सत्य है। जीवन केवल जब तुम छोड़ते हो तो तुम्हारा मन अतीत और भविष्य से मुक्त होकर वर्तमान में टिक जाता है। यही वर्तमान ध्यान है। यही वर्तमान जीवन का उत्सव है। जब हम छोड़ते हैं तो हमें यह अनुभव होता है कि जीवन का हर अनुभव अस्थाई है। सुख आएगा और जाएगा। दुख आएगा और जाएगा। सफलता आएगी और जाएगी। असफलता भी। लेकिन हम इन्हें पकड़ कर बैठ जाते हैं और चाहते हैं कि यह स्थाई हो जाए। यही चाहत हमें दुख देती है। लेकिन जब हम छोड़ देते हैं तो हम हर अनुभव को एक यात्री की तरह देखते हैं। वह आता है हमें
17:01 कुछ सिखाता है और चला जाता है। यही दृष्टि हमें हल्का बनाती है। यही दृष्टि हमें शांत बनाती है। छोड़ना प्रेम की सबसे बड़ी परीक्षा है। अगर तुम्हारा प्रेम पकड़ पर आधारित है तो वह धीरे-धीरे दम तोड़ देगा। लेकिन अगर तुम्हारा प्रेम छोड़ने पर आधारित है तो वह और गहरा होगा क्योंकि प्रेम का स्वभाव स्वतंत्रता है। अगर तुम किसी को सचमुच प्रेम करते हो तो तुम उसे उड़ने की स्वतंत्रता दोगे और अगर वह फिर भी तुम्हारे पास लौटता है तो यह प्रेम की सच्चाई है। अगर नहीं लौटता तो यह भी ठीक है क्योंकि प्रेम कभी स्वामित्व नहीं मांगता। प्रेम छोड़ना है और छोड़ने में ही प्रेम की गहराई है। यह भी समझो कि छोड़ना आलस्य या भागना नहीं है। कई लोग सोचते हैं
17:48 कि अगर सब छोड़ देंगे तो क्या जीवन रुक नहीं जाएगा? नहीं। छोड़ना मतलब है अपना काम पूरी ईमानदारी से करो। लेकिन परिणाम को पकड़ कर मत बैठो। यह वही है जो कृष्ण ने गीता में कहा। कर्म करो। फल की चिंता मत करो। जब तुम फल की पकड़ छोड़ते हो तो कर्म एक बोझ नहीं रहता। वह एक खेल बन जाता है और यही खेल ही जीवन को हल्का करता है। आनंदमय बनाता है। छोड़ना हमें गहरी स्वतंत्रता देता है। पकड़ हमेशा कैद है। अगर तुम रिश्ते को पकड़ कर रखोगे तो वह कैद है। अगर तुम धन को पकड़ोगे तो वह भी तुम्हें कैद कर देगा। अगर तुम प्रतिष्ठा को पकड़ोगे तो तुम हर समय लोगों की नजरों में जिओगे। लेकिन जब तुम छोड़ते हो तो तुम
18:34 स्वतंत्र हो जाते हो। अब तुम किसी पर निर्भर नहीं हो। अब तुम अपने भीतर जीते हो। और यही स्वतंत्रता ही असली आनंद है। छोड़ना आत्मा की परिपक्वता है। बच्चा खिलौनों को पकड़ कर रखता है और रोता है अगर कोई छीन ले। लेकिन धीरे-धीरे वह समझता है कि खिलौना सब कुछ नहीं है। वैसे ही जब हम जीवन में परिपक्व होते हैं तो हमें समझ आता है कि रिश्ते धन प्रतिष्ठा सब अस्थाई है और इन्हें पकड़ कर रोने का कोई अर्थ नहीं है। जब यह परिपक्वता आती है तब हम छोड़ना सीखते हैं और यही आत्मा की सबसे बड़ी वृद्धि है। जब तुम छोड़ते हो तो तुम्हारे भीतर हल्कापन आता है। यह हल्कापन ध्यान का द्वार है। पकड़ हमेशा बोझ बनाती
19:21 है और बोझ लेकर कोई उड़ नहीं सकता लेकिन जब तुम छोड़ते हो तो तुम हल्के हो जाते हो और यह हल्कापन तुम्हें ऊंचाइयों तक ले जाता है। यही हल्कापन तुम्हें परमात्मा की ओर ले जाता है। यही हल्कापन मुक्ति का अनुभव कराता है। अंततः छोड़ना तुम्हें यह अनुभव कराता है कि जीवन पहले से ही संपूर्ण है। हम सोचते हैं कि हमें इसे पकड़ कर संपूर्ण बनाना है। लेकिन जब हम छोड़ते हैं तो हमें पता चलता है कि जीवन तो पहले से ही पूर्ण था। केवल हमारी पकड़ ने हमें अधूरा महसूस कराया और जैसे ही पकड़ गिरती है अधूरापन भी गिर जाता है। तब हम पहली बार अनुभव करते हैं कि वास्तव में सब कुछ पहले से ही ठीक है।
20:08 यही इस वाक्य का गहरा सार है। छोड़ दो सब अपने आप ठीक हो जाएगा। छोड़ने का सबसे बड़ा वरदान यह है कि यह हमें हमारे भीतर के मौन से जोड़ता है। जब तक हम पकड़ते रहते हैं तब तक हमारा मन लगातार भागता रहता है। हम सोचते हैं यह मेरे पास रहे यह ना छीने यह बना रहे। और यही पकड़ एक निरंतर शोर पैदा करती है। लेकिन जैसे ही तुम छोड़ते हो भीतर का शोर धीरे-धीरे शांत होने लगता है। तब मौन प्रकट होता है। और यही मौन हमें उस परम सत्य से जोड़ता है जो शब्दों से परे है। यही कारण है कि ध्यान का सार यही है। पकड़ छोड़ो और मौन में उतर जाओ। जब तुम छोड़ते हो तो जीवन तुम्हें यह दिखाता है कि वास्तव में कुछ भी तुम्हारा
20:54 नहीं था। जिस शरीर को तुम मैं कहते हो, वह भी तुम्हारा नहीं है। यह प्रकृति ने दिया है और एक दिन वापस ले लेगी। जिस रिश्ते को तुम मेरा कहते हो, वह भी तुम्हारा नहीं है। लोग आते हैं और अपने समय पर चले जाते हैं। जिस धन को तुम मेरा कहते हो, वह भी एक भ्रम है। तुम उसे यहां से ले नहीं जा सकते। यानी कुछ भी तुम्हारा नहीं है। और जब यह सच्चाई समझ आती है तब छोड़ना सहज हो जाता है। और यही सहजता तुम्हें मुक्ति देती है। छोड़ना केवल आत्मिक मुक्ति ही नहीं देता। यह तुम्हें व्यावहारिक जीवन में भी शांत और संतुलित बनाता है। सोचो अगर तुम हर छोटी-छोटी बात पकड़ कर रखोगे किसी की कही हुई कड़वी बात।
21:41 किसी का किया हुआ अपमान, किसी की गलती तो तुम्हारा मन हमेशा भारी रहेगा। लेकिन अगर तुम छोड़ देते हो तो तुम हल्के हो जाते हो। तब तुम रिश्तों को नई शुरुआत देने लायक हो जाते हो। तब तुम अपने काम पर ध्यान दे पाते हो। तब तुम शांति से जी पाते हो। यानी छोड़ना ना केवल आध्यात्मिक साधना है बल्कि रोजमर्रा के जीवन का सबसे बड़ा उपाय है। छोड़ने का अर्थ है जीवन को उसके असली रंग में देखने की क्षमता पाना। पकड़ हमेशा हमारी दृष्टि को धुंधला कर देती है। हम चीजों को वैसे नहीं देखते जैसी वे हैं। बल्कि वैसे देखते हैं जैसे हम चाहते हैं। और यही चाहत हमें भ्रमित करती है। जब तुम छोड़ते हो तो तुम्हारी आंखें साफ हो जाती हैं। तब तुम देख पाते हो कि लोग जैसे हैं वैसे ही ठीक हैं।
22:28 परिस्थितियां जैसी हैं जब देखो कि सूलथा जब देखो कि जब देखो सूत वैसी ही ठीक है। और जीवन जैसा है वैसा ही सुंदर है। यही दृष्टि ध्यान है। यही दृष्टि करुणा है। छोड़ना हमें मृत्यु के रहस्य से भी जोड़ता है। मृत्यु को हम हमेशा खोना मानते हैं। लेकिन जिसने छोड़ना सीख लिया उसने समझ लिया कि मृत्यु खोना नहीं है बल्कि लौटना है। लौटना उस स्रोत की ओर जहां से हम आए थे। यह वही अंतिम छोड़ना है जब हम सब कुछ गिराकर खाली होकर लौट जाते हैं। और जिसने जीवन में छोटे-छोटे छोड़ने सीखे हैं, उसके लिए यह अंतिम छोड़ना भी सहज हो जाता है। तब मृत्यु भी एक उत्सव है, एक मुक्ति है। छोड़ना हमें प्रेम का असली रूप दिखाता है।
23:15 अक्सर लोग प्रेम को पकड़ समझते हैं। तुम मेरे हो केवल मेरे। लेकिन यह पकड़ प्रेम का गला घूंट देती है। प्रेम तब तक प्रेम नहीं है जब तक उसमें स्वतंत्रता ना हो। जब तुम कहते हो तुम स्वतंत्र हो चाहे मेरे साथ रहो या ना रहो। तभी प्रेम खिलता है। यही कारण है कि माता का प्रेम सबसे शुद्ध माना जाता है। वह बच्चे को पकड़ कर नहीं रखती। वह उसे स्वतंत्र करती है। और यही स्वतंत्रता प्रेम की सबसे बड़ी पहचान है। छोड़ना हमें साहस देता है। डर हमेशा पकड़ से आता है। लेकिन जिसने छोड़ दिया वह निडर हो जाता है। क्योंकि अब उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा। जिसने सब छोड़ दिया, वह
24:00 सबसे साहसी इंसान है। वह किसी से नहीं डरता। वह जीवन को भी स्वीकार करता है और मृत्यु को भी। और यही साहस उसे भीतर से अिग बनाता है। यही साहस उसे संत बना देता है। जब तुम छोड़ते हो तो तुम अनुभव करते हो कि जीवन पहले से ही पूर्ण है। हमें लगता है कि हम अधूरे हैं और हमें चीजों को पकड़ कर खुद को पूर्ण करना होगा। लेकिन यही भ्रम है। जब हम छोड़ते हैं तब हमें पता चलता है कि हम पहले से ही पूर्ण थे। पकड़ ने ही हमें अधूरा महसूस कराया था। पकड़ गिरते ही अधूरापन भी गिर जाता है। और तभी आत्मा का असली अनुभव होता है पूर्णता का अनुभव। छोड़ना हमें यह भी सिखाता है कि समय को पकड़ना असंभव है। हम
24:47 चाहते हैं कि अच्छे पल रुक जाए और बुरे पल जल्दी बीत जाए। लेकिन समय हमारी इच्छा से नहीं चलता। समय अपने नियम से चलता है और जब हम समय को पकड़ने की कोशिश छोड़ देते हैं तो हम हर पल का आनंद ले पाते हैं। चाहे वह अच्छा हो या बुरा हम उसे अनुभव करते हैं और छोड़ देते हैं। यही जीवन को सरल बनाता है। यही जीवन को आनंदमय बनाता है। छोड़ना हमें कृतज्ञ बनाता है। जब हम पकड़ते हैं तो हम हमेशा और चाहते हैं। हमें कभी संतोष नहीं होता। लेकिन जब हम छोड़ते हैं तो हमें यह अनुभव होता है कि हमारे पास कितना कुछ है। यह शरीर, यह सांस, यह आकाश, यह धरती सब कितना अद्भुत
25:33 है। और यही कृतज्ञता हमें भीतर से भर देती है। जब हम कृतज्ञ होते हैं, तब जीवन हमें और देता है और यही कृतज्ञता हमें समृद्ध बनाती है। छोड़ना हमें यह समझाता है कि जीवन का असली खजाना बाहर नहीं भीतर है। बाहर की चीजें बदलती रहती हैं। अगर हम उन्हें पकड़ कर रखेंगे तो हम हमेशा असुरक्षित रहेंगे। लेकिन भीतर की शांति, भीतर का प्रेम, भीतर का मौन यह सब स्थाई है। इन्हें पाने के लिए केवल एक चीज करनी है। बाहर की पकड़ छोड़ देनी है। और जैसे ही हम छोड़ते हैं, हम भीतर की संपत्ति से जुड़ जाते हैं। यही संपत्ति हमारी असली पहचान है। छोड़ना हमें ध्यान की ओर ले जाता है। ध्यान कोई क्रिया नहीं है जिसे
26:18 करना हो। ध्यान तब होता है जब पकड़ गिर जाती है। जब विचारों की पकड़, इच्छाओं की पकड़, अहंकार की पकड़ सब गिर जाती है। तब भीतर मौन उतरता है। और यही मौन ध्यान है। यही मौन मुक्ति है। यही मौन परमात्मा का अनुभव है। छोड़ना हमें यह भी सिखाता है कि जीवन एक धारा है। यह लगातार बह रहा है। अगर हम इसे पकड़ना चाहेंगे तो केवल संघर्ष करेंगे। लेकिन अगर हम इसके साथ बहेंगे तो आनंद अनुभव करेंगे। नदी की धारा के साथ बहने वाला कभी डूबता नहीं। केवल वही डूबता है जो धारा के खिलाफ तैरता है। जीवन भी वैसा ही है। छोड़ दो और धारा के साथ बो सब अपने
27:03 आप ठीक हो जाएगा। छोड़ना हमें भीतर की गहराई तक ले जाता है। जब तक हम पकड़ते हैं, हम सतह पर रहते हैं। लेकिन जैसे ही हम छोड़ते हैं, हम गहराई में उतरते हैं। वहीं हमें आत्मा का अनुभव होता है। वहीं हमें परमात्मा का अनुभव होता है। सतह पर केवल संघर्ष है। गहराई में शांति है। और गहराई तभी मिलती है जब पकड़ छोड़ी जाती है। अंततः यह वाक्य छोड़ दो। सब अपने आप ठीक हो जाएगा। केवल सलाह नहीं है। यह जीवन का नियम है। अस्तित्व पहले से ही संतुलित है। हमें केवल अपनी पकड़ छोड़नी है। और जैसे ही हम छोड़ते हैं, सब अपने आप ठीक होने लगता है। यही शांति है, यही मुक्ति है, यही प्रेम है, यही ध्यान है।
27:49 [संगीत]