0:00 मेरे घर में भी कुछ रिश्तेदार हैं जो इस धार्मिक यात्रा की तकरीबन 2 सालों से तैयारी कर रहे हैं। ना मंदिर में ना मस्जिद में ना काबे कैलाश में। देखो कब से चेतावनी दी हुई है ना काबे कैलाश में। हमने नहीं सुनी। 26 अगस्त को हिमालय में एक ग्लेशियर की झील टूटी। तकरीबन 1100 लोगों की मौत की कन्फर्मेशन आ चुकी है। मुझे उनका दुख है। इसीलिए ये सब बातें आपसे कह रहा हूं। मृतकों को सही श्रद्धांजलि यह होगी कि सच सामने लाया जाए। सच सामने नहीं लाओगे तो ऐसी मौतें और ज्यादा होंगी और निरंतर होंगी। प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम आकाश है। 26 अगस्त को हिमालय में एक ग्लेशियर की झील टूटी।
0:45 और इस दुखद घटना में तकरीबन 1100 लोगों की मौत की कंफर्मेशन आ चुकी है। अराउंड 4400 लोग हैं जो कि मिसिंग हैं और ये सब वहां पर मुक्ति की आशा में गए कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा कि उन्हें वहां पर शिव जी के दर्शन हुए हैं और उनके जैसे मानो सातों जन्मों के पाप धुल गए हैं। मेरे घर में भी कुछ रिश्तेदार हैं, कुछ बड़े हैं जो इस धार्मिक यात्रा की तकरीबन 2 सालों से तैयारी कर रहे हैं। इसके लिए धनराशि जोड़ रहे हैं। तो मेरा प्रश्न आपसे यह है कि यह लोग वहां जाकर क्या पाना चाह रहे हैं? आज की बात नहीं है। हमेशा से होता आया है।
1:32 भीतर मनुष्य के दुख बेचैनी उलझन वेदना रहते तो हैं। अनुभव तो होता है तकलीफ का। पर तकलीफ के कारण की जांच हम नहीं करते। तीर्थ स्थापित इसलिए करे गए थे कि सही नियत के साथ जब आप अपने रोजमर्रा के माहौल से बाहर निकलना चाहो
2:18 तो एक सही सुंदर उपयुक्त जगह उपलब्ध हो। घिरे हुए हो दुनिया भर के झंझटों में सब तरह के मायावी जंजाल है। उनको पकड़े हुए हो। और रोज वही चक्की चल रही है। उससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं। तो एक रास्ता तैयार कर दिया गया। कहा कि देखो अगर इतने दिनों में, इतने महीनों में या इतने सालों में एक बार इन जगहों पर जाओगे
3:05 तो पुण्य पाओगे, लाभ पाओगे। और यह अच्छी युक्ति थी। यह एक कारगर उपाय हो सकता था और कई लोगों पर यह उपाय सफल भी हुआ। इन पर सफल हुआ जिनकी नियत तो थी कि मुक्त जिए। जिनकी नियत तो थी कि अपने बंधनों से थोड़ा दूर जाएं। पर उनके आसपास का माहौल उन्हें चैन नहीं लेने देता था। जरा सी भी गुंजाइश नहीं छोड़ता था। वही घर वही दुकान वही रोजमर्रा के ढररे तो उनको कहा गया देखो तुम इतने महीने में
3:52 एक बार इतने दिन के लिए उस जगह पर चले जाया करो तुम्हें राहत मिलेगी बात बढ़िया कही गई और जिन्होंने सही नियत के साथ इस बात को सुना कार्वित किया उनको लाभ भी हुआ और सारी बात तो देखो नियत की है हां आज नहीं सदा से इंसान रहा ही बदनियत है। कोई क्षेत्र हो, कोई काल हो, कोई धर्म हो, कोई देश हो, मनुष्य तो मनुष्य है। और मनुष्य के पास दो वृत्तियां होती हैं भीतरी।
4:39 आत्मरक्षण और आत्म विगलन। भीतर एक जो बैठा हुआ है ना मैं भाव अहंकार वह दो तरफ से खचा रहता है। एक तरफ वो चाहता है कि मेरी पहचान मेरी कहानियां जो भी मैंने दुनिया भर का तामझाम इकट्ठा कर रखा है। जिसके बीच में मैं सुरक्षित अनुभव करता हूं। वो सब बचा रहे। और दूसरी तरफ की वृत्ति बिल्कुल विपरीत तरफ खिंचाव होता है। उसको बोलते हैं आत्म विगलन। उसी का नाम प्रेम भी है। जब अहंकार कहता है कि मैं मैं ऊब गया। मैं मैं बहुत दुखी हूं, परेशान हूं, बेचैन हूं। मुझे ऐसे नहीं जीना।
5:25 मुझे हटने दो, मुझे कम होने दो। यह कहानियां जिनमें मैं जी रहा हूं, इन कहानियों को मुझे परखने दो। यह आत्मविगिकलन, आत्मसमर्पण, प्रेम कई तरीकों से इंगित किया जाता है। तो अब इंसान है और इंसान के पास यह दो वृत्तियां हैं। इन वृत्तियों में से वो कौन सी चुनेगा यह बात नियत की होती है। यह बात अपने फैसले की होती है। वही असली फैसला है। वही मूल वही प्रारंभिक बात है कि आपने क्या चुना।
6:11 बात यह नहीं है कि बाहर क्या चुना। बात यह है कि भीतर अपने लिए क्या चुना। मैं कोई भी काम दोनों तरह की नियतों से कर सकता हूं। खुद को बचाने के लिए और खुद को घटाने के लिए। कोई भी काम कोई भी काम करा जा सकता है दोनों ही नियतों से और हो सकता है बाहर बाहर से वो दोनों ही काम वो दोनों ही कर्म बिल्कुल एक जैसे दिखाई दे लेकिन उनके पीछे जो इरादा है वो बिल्कुल अलग होगा जमीन आसमान का अंतर होगा इरादों में ज्यादातर समय मनुष्य की प्रजाति ऐसी है कि उसकी नियत त खुद को बचाने की ही होती है।
6:59 100 में से 90 बार जाने 99 बार वो इसी में लगा रहता है कि मैं आत्मरक्षण के पक्ष में फैसला करूंगा। किसी तरह खुद को बचा के रखो। खुद को बचाओ माने जो मैंने अतीत की कहानियां पकड़ रखी हैं, जो भविष्य के मेरे सपने हैं, जो मेरी आशाएं हैं, जो मेरे आइडेंटिटी स्टेटमेंट्स हैं, यही है सेल्फ, द ईगो। इसको मुझे किसी तरह से बचाना है क्योंकि यही जिंदगी है मेरी भाई। तो वो दोनों नियतों से संचालित हो सकता है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि 100 में से 99 बार वो चुनता यही है कि काम कोई भी करूं खुद को भीतर और बचाने के लिए करूंगा। कोई
7:46 भी काम हो, कोई भी काम जब कोई भी काम वह खुद को बचाने की ही नियत से करता है ज्यादातर तो तीर्थ यात्रा तीर्थटन भी वो खुद को बचाने के लिए ही करता है। और इसका संबंध मात्र अभी जो भयानक त्रासदी हुई है और जो दुखद मौतें हुई है उनसे नहीं है। यह बात सदियों पुरानी है। मनुष्य हर कर्म का दुरुपयोग करता है। मनुष्य अपने जीवन के हर विषय का कोई जगह हो, कोई इंसान हो, कोई चीज हो, कोई विचार हो, कोई भी चीज उसके हाथ लग जाए, उसका दुरुपयोग ही करना। दुरुपयोग से क्या आशय है? उस चीज का इस्तेमाल अपनी सच्चाई तक
8:32 पहुंचने के लिए नहीं करा। उस चीज का इस्तेमाल अपनी सच्चाई से बचने के लिए करा। अब तीर्थों की स्थापना की गई थी कि तीर्थ दर्पण की तरह काम करें। आपको आपका वास्तविक चेहरा दिखाएं। भीड़ से दूर और आप तीर्थों में निवेशित हो जाएं। पहाड़ों के ऊपर है। समय निकाले। पैदल चलकर जाएं और वहां अपना चुपचाप बैठे जहां दुनिया भर के काम धंधे और झंझट आपको वापस पुरानी दुनिया में नहीं खींच रहे हैं। यह था सिद्धांत और सुंदर सिद्धांत था। लेकिन इस सिद्धांत का तो देखो शुरू से ही दुरुपयोग हो गया। आज नहीं हो रहा है। एकदम पीछे चले जाओ।
9:19 आचार्य शंकर संतों से भी पहले का समय तो क्या बोल रहे हैं वह जब लोगों को देखा कि वो इसी में लगे हैं कि वहां जाना है तीर्थ ताकि पुण्य इकट्ठा कर लेंगे। वहां जाना है तीर्थ ताकि कुछ सुख मिलेगा मनोकामना पूरी हो जाएगी और लगे हुए हैं वो दुनिया भर की विधियां लगाने में कि यह सब विधियां लगाऊंगा तो अहंकार को सुख और सुरक्षा मिल जाएंगे तो क्या बोले ना पुण्यम निर्वाण षटका में आप पढ़ चुके हैं कई बार न पुण्यम ना पापम ना सौख्यम ना दुखम
10:09 ना मंत्रो ना तीर्थ ना वेदा ना यज्ञा बोल रहे अगर तुम्हारी नियत खराब है तो इनमें से कोई नहीं काम आएगा ना मंत्र काम आएगा ना तीर्थ काम आएगा वेद भी काम नहीं आएगा यज्ञ भी काम नहीं आएगा कोई ऑटोमेटिक बात नहीं है कि वहां चले गए तो वहां जाने भर से तुमको पुण्य मिल जाएगा या मुक्ति मिल जाएगी कुछ नहीं होने वाला। फिर आगे अपने बारे में बोलते हैं अहम भोजनम न भोज्यम न भोक्ता
10:54 और कौन हूं मैं अपने बारे में क्या बोला? क्योंकि कैलाश की बात हो रही है तो इसीलिए याद रखो चिदानंद रूप शिवोहम शिवोहम शिवत तो मेरे भीतर है। शिवत तो मेरे भीतर है। और यह बात आज से लगभग समझो 1500 साल पहले 1500 साल पहले आचार्य शंकर बता गए। और आचार्य शंकर का महादेव शिव से क्या रिश्ता है वह हम जानते ही हैं। यहां भी वो यही कह रहे हैं। शिवोहम शिवोहम वेद और वेदांत से आचार्य शंकर का क्या रिश्ता है वो भी हम जानते ही हैं। और 1500 साल पहले भी आम आदमी तीर्थों का दुरुपयोग कर ही रहा था। तो उनको बोलना पड़ा
11:41 कि यह सब जो तुम कर रहे हो यह तुम खुद को धोखा दे रहे हो। आत्म प्रवंचना है। मत करो यह सब। भीतर अपने जाओ भीतर बात आ रही है समझ में तब से अगर समझाना पड़ रहा है तो इससे निष्कर्ष क्या निकलता है अगर तब से समझाना पड़ रहा है तो क्या निष्कर्ष निकलता है हम तभी से ऐसे ही हैं। बस तब इतनी बड़ी ट्रेजडीज़ नहीं होती थी क्योंकि तब वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का पीपीएम इतना बढ़ा नहीं था। तब क्लाइमेट चेंज
12:27 की बीमारी इतनी आगे तक नहीं बढ़ गई थी इसीलिए त्रासदियां नहीं हो रही थी। नहीं तो आम आदमी तो तब भी गड़बड़ कर रहा था। सभी नहीं कुछ रहे होंगे बिरले जो बिल्कुल सही नियत के साथ जा रहे हैं और वहां ऊपर तीर्थों की स्थापना भी स्वयं आचार्य शंकर ही कर रहे हैं तो कुछ तो रहे होंगे जिनके पास प्रेम था जो अपनी सुरक्षा से ज्यादा सत्य को महत्व देते थे पर वैसे कुछ ही लोग थे ज्यादातर लोगों को बहुत दुर्भाग्य की बात है कि असली चीज समझ में नहीं आई पर्यटन जैसा बन गया।
13:13 पर्यटन जैसा इतना ही नहीं है। इसमें तो स्मृति भी जैसे आम आदमी को देख के दुखी हो रही है। श्रुति तो है ही जो कह रही है कि भीतर घुसो अपने और देखो स्वयं को। स्मृति भी दुखी हो रही है। स्कंद पुराण कहता है कि आत्म तीर्थ को छोड़ के जो लोग दूसरे तीर्थों को जाते हैं वो वैसे ही हैं जैसे कोई परम रत्न को छोड़ के कांच के टुकड़े बटोरे। ये ये पुराण है।
14:01 बात आ रही है समझ में? हम ऐसे ही रहे भाई बस बीच-बीच में बहुत बहुत घातक त्रासदियां हो जाती हैं। इतनी दुखद और इतनी सारी मौतें हो जाती हैं। और हम जो उसका असली कारण है उसको छुपाने की कोशिश करने लग जाते हैं। दो है असली कारण। अभी जो हुआ है। पहला क्लाइमेट क्राइसिस और दूसरा आम आदमी के भीतर बैठा अज्ञान। और आप मीडिया में देखेंगे तो इन दोनों ही कारणों की बिल्कुल चर्चा नहीं हो रही है। बाकी सब कारणों की चर्चा हो रही है कि अरे अर्ली वार्निंग सिस्टम नहीं थे। अरे चीन ने कुछ कर दिया। अरे इसने कुछ कर दिया। 50 तरह की बातें हो रही हैं। परंतु जो मूलभूत बातें हैं उनकी कोई चर्चा नहीं कर रहा। क्या
14:46 कि भाई क्लाइमेट क्राइसिस से हुआ है ये और हो ही रहा था और लगातार हो रहा है। आगे भी होगा। कोई नहीं बात करना चाहता। सब छुपाने में लगे हुए हैं। और जो दूसरी चीज है जिसकी चर्चा करने तो और लोग डरेंगे क्योंकि मामला संवेदनशील हो जाता है। वो यह है कि देखो तीर्थों के महत्व को और तीर्थ के सिद्धांत को हमने ठीक से समझा नहीं है। हम मृतकों के प्रति पूरी संवेदना, पूरी सहानुभूति रखते हैं। लेकिन मृतकों की ही खातिर मृतकों को सही श्रद्धांजलि यह होगी कि सच सामने लाया जाए। सच सामने नहीं लाओगे तो ऐसी मौतें और
15:32 ज्यादा होंगी और निरंतर होंगी। बात आ रही है समझ में? अभी हम कल ही बात कर रहे थे ना कबीर साहब की। देखो फिर वह प्रासंगिक हो गए। भुला ही नहीं पाता मैं। सब बन तो तुलसी भए और पत्थर शालिग्राम सब नदियां गंगा भई जब पायो आत्म राम। वहां वहां स्कंद पुराण है जो आत्म तीर्थ की बात कर रहा है। यहां पर संत शिरोमणि है वह आत्माराम की बात कर रहे हैं। आत्माराम की
16:18 बात कर रहे हैं। माने ये भीतर आत्मा आत्मा माने अहंकार का न्यून ना हो जाना। अहंकार का लगभग विलुप्त हो जाना ही आत्मा है। वही असली चीज है। मोको कहां ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास में। अरे वो यहां है भाई। ना मंदिर में ना मस्जिद में ना काबे कैलाश में। ना तीर्थ में ना मूरत में ना एकांत निवास में मो को कहां ढूंढे रे बंदे मैं तो तेरे पास में फिर आगे कहते हैं मैं श्वासन की श्वास में
17:04 तुम अपने भीतर तो देखो जैसे ही तुम अपने झूठ से अपनी कहानियों से अपनी मक्कारियों से मुक्त हो जाते हो तो वह जो शुद्ध रिक्तता बचती है वही आत्मा है वही सत्य है वही परम है नाम ले लेकर बोल रहे हैं ना मंदिर में ना मस्जिद में ना काबे कैलाश में देखो कब से चेतावनी दी हुई है ना काबे कैलाश में हमने नहीं सुनी हमें ज्ञानियों की संतों की बातें सुननी ही नहीं है
17:50 बस पहले नहीं सुनते थे तो परिणाम किसी तरीके से हमारी सहनशीलता के दायरे के भीतर रहते थे। हो जाता था बर्दाश्त। अब क्लाइमेट क्राइसिस ने यह कर दिया है कि उनकी बात नहीं सुनोगे तो बड़ा भारी दुख झेलना पड़ेगा। कम्युनिटी से भी किनहीं के दूर के रिश्तेदार वहां गए थे और अभी तक उनकी कोई खबर नहीं है। यह हम सबके लिए भी एक व्यक्तिगत त्रासदी जैसी है।
18:40 पर टूर ऑपरेटर चल रहे हैं। ना जाने कितने कितने करोड़ कितने करोड़ नहीं कितने सैकड़ों करोड़ या कितने हजारों करोड़ का उसमें रेवेन्यू आ रहा है। पर्यटन वालों का भी और बाबाओं का आश्रमों का भी कि चलो चलो चलो तुमको घुमा के लाते हैं। तो कोई सच्चाई को क्यों बाहर आने देगा? सबको यही संदेश दिया जा रहा है कि तुम जहां हो वहां सत्य नहीं मिलेगा। सत्य किसी विशेष जगह पर किसी विशेष विषय में स्थापित है। तो तुम अपने आप को बदलो मत। बस दूर जाकर के उस जगह को उस विषय को हासिल कर लो। वहां चले जाओ। वहां जाकर के या वहां जाकर के कुछ हासिल करके तुम्हें शांति और
19:27 मुक्ति मिल जाएंगे। ऐसा होता है क्या? ऐसा होता है क्या? हमें भ्रमित किया जा रहा है। हम भ्रमित होते रहे लगातार पानी में मीन प्यासी मोहे सुन सुन आवत हांसी कब की बात है ये आज की बात नहीं है। आत्मज्ञान बिना नर भटके कोई मथुरा कोई काशी। लोगों ने उनसे कहा कि अब आप मरने वाले हैं। क्या कर रहे हैं आप? मगहर जा रहे हैं। काशी में पूरे जीवन रहे। लोक धर्म कहता है कि काशी में मरने से स्वर्ग इत्यादि मिलता है। और आप उल्टा कर रहे हैं। अब मृत्यु की
20:13 घड़ी आई है तो आप काशी छोड़ रहे हैं और वहां जा रहे हैं जहां कहते हैं मरना नहीं चाहिए। पाप लगता है। बोले जो कबीरा काशी मरे तो राम ही कौन निबोरा अगर एक सच्चे आदमी को इन सब चीजों की भी जरूरत पड़ने लगी बाहरी विषयों की तो राम फिर किस काम के हैं? मेरे पास मेरे राम है। मुझे बाहरी किसी विशेष स्थान की जरूरत नहीं है। किसी स्थान की जरूरत नहीं है। जैसे जैसे मृगा ना भी कस्तूरी बन बन फिरत उदासी। पानी में मीन प्यासी। मोहे सुन सुन आवत हासी
21:03 है हाजिर तोहे दूर दिखावे दूर की बात निरासी पानी में मीन प्यासी मोहे सुन सुन आवत हासी आत्म ज्ञान बिना नर भटके कोई मथुरा [गाना गाने की आवाज़] कोई काशी लोग तब भी भटक रहे थे लोग आज भी भटक रहे हैं समझाने वालों ने तब भी समझाया समझाने वाले आज भी समझा रहे हैं बस भटकने के अंजाम अब कहीं ज्यादा त्रासद हो गए हैं और बहुत लोगों के स्वार्थ जुड़ गए हैं
21:50 आपको भटकाने में बहुत सारा पैसे का लेनदेन होता है बहुत सारे व्यवसाय चलते हैं ट्रांसपोर्ट के, हॉस्पिटिटी के, गाड़ियां चल रही हैं। होटल बन रहे हैं। कुछ आ रही है बात समझ में? भीतर की सफाई करी नहीं बाहर। हम बोलिए जी अभी मैं यह [नाक से की जाने वाली आवाज़] तीर्थयात्रा करवाने वाली चार पांच कंपनियों की वेबसाइट देख रहा था तो वहां पर वो लिखते हैं कि यह सिर्फ प्रार्थना
22:39 नहीं है एक गारंटी है। एक जगह लिखा है परिक्रमा सात जन्मों के पाप धो देती है। एक और जगह लिखा है कि बार-बार यहां परिक्रमा करने से सीधे मोक्ष मिल जाता है। और और एक लिखा है यही वह जगह है जहां भौतिकता और आध्यात्मिकता के बीच का पर्दा बहुत पतला है। पांचों वेबसाइट में इस तरह की गारंटीज लिखी हुई हैं। लेकिन कहीं भी कोई खतरे की चेतावनी या जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान इसके जिन्होंने यह लिखा है उन्होंने तो लिखा है चलो उनका धंधा है उनके स्वार्थ है। कि आम आदमी को किसने रोका था और सब भी जो
23:27 लिखा हुआ है श्रुति में, शास्त्रों में, संतवाणी में वह पढ़ने से आप जाकर ना जाने किस व्यापारी की वेबसाइट पढ़ने को तैयार हो। पर ज्ञानियों ने आपको जो समझाया वो आप पढ़ने को तैयार नहीं हो। बोलो दोष किसको दूं? आप अगर खुद बहकने को तैयार हो तो दुनिया आपको क्यों ना बहकाए और क्यों ना लूटे और याद रखो हम नहीं कह रहे हैं कि तीर्थटन व्यर्थ होता है। हम कह रहे हैं तीर्थ पर जाने से पहले जांच लेना चाहिए कि अपनी नियत क्या है। और अगर हम यह जांचे कि हमारी नियत क्या है तो
24:15 हम पाएंगे कि 90 95% लोगों की तो नियत मुक्ति की नहीं है। अगर नियत ही मुक्ति की नहीं है तो तीर्थ में जाकर क्या होगा? वहां आप पशुओं को परेशान कर रहे हो। वो याद है जब हम हमने केदारनाथ में शिविर करा था। पर वहां जब मैंने रास्ते में मरे हुए सब देखे थे घोड़े खच्चर तो उस पर मैंने कुछ बोला था वो बात दूर तक गई थी वायरल भी हुई थी कि तुम पशुपति के यहां जा रहे हो पशुओं का शोषण करके यह बात पशुपति कभी माफ
25:03 करेंगे क्या करेंगे नियत साफ होती तो आप यह करते और आप यह कर रहे हो तो फिर बताओ दुखद परिणामों से कैसे आपको बचाएं? जहां जा रहे हो वहां गंदगी भी कर रहे हो। जहां जा रहे हो वहां कूद-फाद कर रहे हो। जाने वाले ज्यादातर ज्स ही हैं। यह भक्ति है। सचमुच ऋषिकेश से मेरा इतना पुराना और प्यारा संबंध रहा है। और ऋषिकेश तो आने वाले शायद दो तिहाई तीन चौथाई यही होंगे। जजी
25:50 आना है, बीियर पीनी है, राफ्टिंग करनी है, मजे लेने हैं। वापस जाना है। इससे मुक्ति मिलेगी। इससे ज्ञान मिलेगा। इससे जीवन में स्पष्टता और बोध मिलेगा। यह तीर्थ का दुरुपयोग नहीं है तो क्या है? आप बताइए। बोलिए ना वही ऋषिकेश के ऊपर मैंने कितनी बार देखा वहां वाइल्ड फायर आग लगी हुई है जल रहे हैं जंगल उसमें ना जाने कितने पशु भी मर रहे हैं महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा में संत एकनाथ हम नामते हैं उनका नाम संत ज्ञानेश्वर संत एकनाथ फिर संत तुकाराम तो वो चले वहां से
26:38 कि जा रहा हूं और गंगाजल लेकर के आऊंगा जिसको आज कावड़ बोलते हैं और गए और गंगाजल लिया और वहां से अपना पैदल पैदल आ रहे हैं और बड़ी सख्त शर्त होती है कि पानी गिरना नहीं चाहिए। पानी पीना नहीं है। पानी को रखना नहीं है। यह सब बातें होती हैं। और वो अपना पानी लेकर आ रहे हैं। गंगाजल वहां रामेश्वरम जाना था। उनको वहां शिवलिंग है। वहां पानी चढ़ाना था। रास्ते में उनको मालूम है कौन मिला मरता हुआ? और वो जा रहे थे और लोग जा रहे बाकी लोग देख रहे थे यह रास्ते में मर रहा है तो उसके अगल-बगल से रास्ता बदल के निकल जा
27:24 रहे थे। वही मिला जिसको हम केदारनाथ में इतना मरता हुआ पाते हैं। वही पशु एक गधा था। वो मर रहा था। प्यास से तड़प के मर रहा था। और यह इतनी लंबी पद यात्रा करके आए सोचे महाराष्ट्र से चले हैं। वहां गंगा तक गए हैं। फिर वहां से पानी लेकर पैदल पैदल आ रहे हैं। पहुंचने वाले हैं। देखा वो मर रहा है। तो रुक गए। पानी निकाला खोला उसको पिला दिया। आसपास के जो लोग थे वो चकित हो गए। कुछ क्रोधित भी हो गए। बोले ये क्या कर रहे हो? इतनी मेहनत करी और उसके बाद यह कर दिया।
28:10 यह तो शास्त्र विरुद्ध है। ऐसा नहीं करना था। यह परंपरा विरुद्ध भी है। ऐसा नहीं करना था। तो उन्होंने जो कहा वह बात केदारनाथ के संदर्भ में हमारे हृदयों पर छप जाने जैसी है। वो बोले कि जिन पशुपति के पास मैं जा रहा था गंगाजल अर्पित करने वही इस पशु का रूप लेकर मेरे सामने आ गए हैं। मैं इस पशु की उपेक्षा करके आगे नहीं जा सकता। [प्रशंसा] यह होती है तीर्थ यात्रा। भीतर हृदय साफ होना चाहिए। निर्मलता होनी चाहिए। अगर इरादे ही ठीक नहीं है और आप
28:57 मौज मस्ती के लिए तीर्थों पर जा रहे हैं तो यह कोई अच्छी बात नहीं है। और क्षमा कीजिएगा। मैं जिन्हें चोट लगी है, जो गायब है, जिनकी मृत्यु हुई है, मैं उनके प्रति पूरी संवेदनशीलता रखता हूं। मुझे उनका दुख है। इसीलिए यह सब बातें आपसे कह रहा हूं। कुछ आ रही है बात समझ में? पहला तीर्थ यहां है। और जब आप इस तीर्थ की निकटता कर ले तो फिर जाइए। ऐसी जगहों पर जो आपके पुराने विषयों से
29:43 दूर हो। यह है प्रक्रिया। जैन परंपरा में उन्होंने अपने महापुरुषों को तीर्थंकर कहा। बोले जिसकी संगति से हृदय हमारा निर्मल हो जाता है, अहंकार घटने लगता है वो तीर्थंकर है हमारे लिए [गला साफ़ करने की आवाज़] है। वो उसके होने से तीर्थ हो गया। जिसके सानिध्य में जिसकी वाणी से जिसके होने से अहंकार घटने लगे वो तीर्थंकर हो गया। ये हुई असली बात। इस विषय से संबंधित किसी को कुछ कहना है?
30:31 इसी मुद्दे से संबंधित पूछिए क्योंकि हमने नेपाल हादसे में क्लाइमेट वाले पक्ष पर तो खूब बात करी लेकिन तीर्थटन वाले पक्ष पर अभी बात नहीं करी तो अच्छा है कि ये मुद्दा इन्होंने उठाया। हम बोलिए। नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम देवाशीष आचार्य है और मैं गीता सत्र से डेढ़ साल से जुड़ा हूं। पहले तो बहुत-बहुत धन्यवाद आपका और शिक्षक दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं। मेरा सवाल इसी से संबंधित है। मैं कुछ भारत से ही पिछले 13 सालों के कुछ आंकड़े देख रहा था। तीर्थ यात्रा से संबंधित। यहां जो जो आपदाएं
31:19 क्लाइमेट जलवायु और जलवायु परिवर्तन की वजह से हुई है। जैसे भूस्खलन, लैंडस्लाइड्स जैसे बादल का फटना या अभी-अभी हमने ग्लेशियर का टूटना देखा है। उसकी वजह से तीर्थ मार्गों पर सवा हजार लोगों की मौत हो चुकी है। कब? 13 सालों में पिछले यह रिकॉर्डेड मौतें हैं। इतने लोगों को हमने खोया है और पता नहीं कितने ज्यादा लोगों को हमने सच में खोया होगा। यह तो रिकॉर्डेड है। हमने 2013 की आपदा हम भूल नहीं सकते। केदारनाथ में 6000 से भी ज्यादा लोगों को हमने खोया। 1 लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर फंसे
32:09 पता नहीं कितने दिनों तक और लगभग 4 अरब डॉलर का इसमें कुल नुकसान हुआ था। फिर इसी से संबंधित पिछले साल हमने अगस्त में चौसती करके जो गांव है इ्तवाड़ जम्मू एंड कश्मीर में वहां पर हमने लगभग 70 लोगों को खोया वहां भी इसी बाढ़ के चलते और उस समय वहां पर 1200 लोग मौजूद थे। यानी हर 18 लोगों में से एक ऐसा इंसान था जो लौटा ही नहीं।
32:58 उसके ठीक तीन हफ्ते बाद अगस्त 2025 में वैष्णो देवी में हमने लगभग 34 लोगों को खोया। मौसम की चेतावनी पहले से दे दी गई थी। पर यात्रा रोकी नहीं गई। फिर अभी हमने नेपाल में इतने लोगों को ऑलरेडी खो दिया है और इसकी गिनती अभी जारी है। इतने लोग मिले ही नहीं है। यह सब आंकड़े सामने होने के बावजूद ये इन जगहों पे ये तीर्थ यात्राएं रोकी क्यों नहीं जाती? क्या कौन रोकेगा? कौन रोकेगा?
33:45 अगर बाहर की तरफ जाना रोकोगे तो भीतर आना पड़ेगा ना। भीतर आने से अहंकार बहुत बचता है। कुछ भी करवा लो बाहर कहीं भी भेज दो। चाहे मनोरंजन की तरफ, चाहे तीर्थटन की तरफ मुझे दर्पण मत दिखाओ। मेरे सामने मेरा यथार्थ मत लाओ। इतनी हजारों मौतें। बाप रे बाप। और इनमें जो आदमी जा रहा है उसका जो खर्चा हो रहा है वो अलग। और जो तबाहयां हो रही हैं उनका खर्चा अलग। सब क्यों? ताकि इस उस छोटे से काम से हम बच सके। जो सीधा है प्रत्यक्ष है
34:31 आत्मवलोकन आत्मविकलन। बस भागना है। बाहर की ओर भागना है। और चाहे टूर ऑपरेटर हो, चाहे गुरु लोग हो, एक बात दोनों में साझी है। दोनों आपको बोल रहे हैं। जाओ बाहर की तरफ जाओ। वहां कुछ खास है। तुम्हारे दुखों का इलाज तुमसे बाहर कहीं है। मैं अपने दुख का कारण आप हूं। बाहर मुझे भेज के तो तुम मुझे ही झांसा दे रहे हो। पर फिर जब तय कर लिया हो कि खुद को नहीं देखना है तो फिर चाहे पर्यटन हो चाहे ऑपरेटर हो चाहे गुरु जी हो उनकी बात बड़ी प्यारी
35:17 लगती है कहते देखो बिल्कुल सही बोल रहे हैं वहां चले जाओ कुछ होगा खास जगह हैं खास जगह हैं वहां जाओ वहां चमत्कारिक ऊर्जा वगैरह होती है वहां चले जाओ बहुत पापी हो गुरु जी ने कहा वहां जाओ जाके नहा लेना पाप धुल जाएंगे या कुछ और कर देना दान दक्षिणा कर देना पाप धुल जाएंगे और ज्ञानियों ने बोला नहाए धोए क्या हुआ जो मन मैल ना जाए नींद सदा जल में रहे भोगत वास ना जाए हम आप लोग गाते हैं ना बाबा बुले शाह को
36:04 कि मक्के गयो मुक्ति नाही मक्के गयो गल मुकदी नाही 100 हज कर आइए और गंगा गयो गल मुकदी नाही 100-100 गोते खाइए बुल्ले शाह गल ताो मुकदी वहां पर है मुक्ति जदो मैं दिलो गवाइए मुक्ति उस जगह पर मिलेगी जहां आपके दिल से मैं भाव हटता हो वही है तीर्थ की शुरुआत वही मुक्ति मिलनी
36:49 है मक्के गए हो भी नहीं और गंगा गए हो भी नहीं बात आ रही है कुछ समझ में इंसान बड़ा अद्भुत जीव है। खुद का सामना करने से बचने के लिए वह बड़ी से बड़ी कीमत चुकाने को तैयार हो जाता है। कई बार अपने प्राणों की कीमत भी चुका देता है। सारा अध्यात्म इसलिए है कि बाहर की दिशा से आपने जो आशा लगा रखी है वो हटे। क्योंकि आपके दुख का कारण बाहरी नहीं है।
37:36 आपके दुख का वास्तविक कारण भीतरी ही है। आप अपने दुश्मन स्वयं है। इसीलिए आपको दुख है। संत लल्लेश्वरी है जिनको लालदेव भी कहते हैं। उन्होंने एक बात बोली कितनी सुंदर वो निर्वस्त्र रहती थी। लोगों ने पूछा क्यों? बोले गुरु के पास गई। गुरु ने बस एक बात बोली बाहर कुछ नहीं है। भीतर जैसे हो वैसे ही बाहर हो जाओ। भीतर जैसे हो वैसे ही बाहर हो जाओ। तो मैंने कहा फिर बाहर का वस्त्र भी मेरे किस काम का? आपको वस्त्र त्यागने को नहीं कह रहे हैं। ये एक एक्सट्रीम उदाहरण लग सकता है। पर समझिए कि जानने वालों ने
38:23 किस गहराई तक ईमानदारी प्रदर्शित करी है। उन्होंने कहा दुनिया मेरे दुख का कारण है। नहीं तो दुनिया में जगहें बदल के दुनिया में कुछ पा करके मेरा दुख मिटने का नहीं है। मेरे दुख का कारण मैं हूं और इस बात को मुझे ईमानदारी से देखना होगा, स्वीकार करना होगा। आत्म राम आत्म तीर्थ बस आत्मज्ञान और आत्मज्ञान नहीं है तो आत्म ज्ञान बिना नर भटके कोई मथुरा कोई काशी पानी में मीन प्यासी मोहे सुन सुन आवत हासी
39:17 आचार्य जी इसी से संबंधित कुछ पैसों से रिलेटेड आंकड़े भी हैं। भारत में तीर्थ यात्रा का कारोबार सरकारी आंकड़ा है कि घरेलू तीर्थ यात्राएं 2021 में लगभग 68 करोड़ हुई थी और 2022 में 143 करोड़ कमाई भी लगभग दोगुनी 65000 करोड़ से 1 लाख 34000 करोड़ और अकेले महाकुंभ जो 2025 में हुआ 45 दिन तक चला
40:02 लगभग 66 करोड़ लोगों का आगमन करीब सवा लाख करोड़ का खर्च और इसका मतलब यह है कि जो हर व्यक्ति वहां स्नान करने आया था उसने औसतन ₹1800 वहां गवाए और वापस लौट गया। अब यही पैसा आम आदमी की नजर से देखें क्योंकि भारत में हमें पता है कि कितने लोगों की कमाई बहुत कम है। खाने को भी लाले पड़े हुए हैं। देखो इसके पीछे बात मनोवैज्ञानिक है। आप कितने भी गरीब हो दुख सताता है। बेचैनी परेशान करती है। तो आप अपनी आमदनी से कहीं
40:49 ज्यादा भी खर्चा करने को तैयार हो जाते हैं। अगर आपको कोई यह भरोसा दिला दे, आपसे कोई यह वादा कर दे कि वहां चले जाओ, तुम्हारी मनोकामनाएं पूरी हो जाएंगी। हमारे देखे तो हमें दुख इसलिए है ना कि हमारी इच्छाएं पूरी नहीं हुई। तो ज्यादातर लोग जो जाते हैं वो कहते हैं नौकरी मिल जाए, शादी हो जाए, घर बन जाए, तरक्की हो जाए। लड़का पैदा हो जाए। यही होती है इच्छाएं। और जब इतनी बड़ी इच्छा है तो उस इच्छा की पूर्ति के लिए फिर इंसान अपनी कमाई से कहीं ज्यादा खर्च कर देता है। सामने कोई खड़ा है जो बोल रहा है बता तेरी क्या इच्छा है बेटा? बोल रहा है बाबा जी
41:38 नौकरी चाहिए, पत्नी चाहिए और बच्चा चाहिए। कहा हां सब मिल जाएगा। बस इतना पैसा यहां रख और वहां चला जा तो वह रख देता है उतना पैसा। आचार्य जी जैसे गरीब परिवारों की ही बात करूंगा तो वह अपने बच्चों की पढ़ाई में लगभग महीने में 127 रुपए खर्च करते हैं महीने में और यह औसतन जो एक तीर्थ यात्रा का एक दिन का खर्चा एक इंसान का आता है वह है लगभग ₹2700 तो मतलब उनके अभी बात करी तो कम कमाता हूं पर इसीलिए तो कमाता हूं ना कि इच्छाएं पूरी हो जाए। बाबा जी ने बोल दिया या परंपरा से बात चल
42:25 रही है या टूर ऑपरेटर ने बोल दिया कि वहां चले जाओ तुम्हारी सारी इच्छाएं पूरी हो जाएंगी। तो कमाई भले कम हो इच्छा पूर्ति के लिए मैं कई हजार सामने रख दूंगा। हर तरह से लूटते हैं हम। पैसे से भी लूटते हैं। जो भीतर बेचैनी है वह तो नहीं ही मिटती। जेब भी खाली हो जाती है। और यह सब क्यों होता है? क्योंकि धर्म के नाम पर लोकधर्म चल रहा है। जो आत्मज्ञान से बिल्कुल दूर है। भले ही हमारे सब शास्त्रों ने, ग्रंथों ने बार-बार कहा हो कि तीर्थ यहां है, आत्मराम यहां है। भले ही गीता बार-बार अहंकार के विगलन का संदेश दे रही हो।
43:10 पर हमें बात सुननी ही नहीं है। जब काम भरा हो आंख में तो सच नजर नहीं आता है। हम आंतरिक स्पष्टता की कमी सिर्फ आपका धार्मिक जीवन नहीं खराब करती। वह आपको भौतिक रूप से भी लुटवाती है। इसीलिए बोलता हूं गुड स्पिरिचुअलिटी गुड इकोनॉमिक्स। जो व्यक्ति आध्यात्मिक नहीं है वो सच से तो दूर रहेगा ही। मुक्ति से तो
43:58 हाथ धोएगा ही। वह पाएगा कि उसकी जेब भी कटी। जीवन भर लुटता ही रहा। श्रुति धर्म आत्मज्ञान का धर्म है। आप सनातनी हैं। वहां सबसे बड़ी बात है आत्मज्ञान। वेदों को हम कहते हैं ना हमारे सर्वोच्च ग्रंथ हैं। वैदिक धर्म के हैं ना हम और वेदांत वेदों का दर्शन है। और वहां बार-बार समझा समझा के एक ही बात कही जा रही है। अपने भीतर जाओ, अपने भीतर जाओ और इसीलिए दुनिया लगी रहती है कि आप किसी
44:47 भी तरह वेदांत से दूर रहे। क्योंकि अगर आप वेदांत की तरफ आ गए तो ना जाने कितनों के धंधे बंद हो जाएंगे। कितनी सारी धार्मिक दुकानें बंद हो जाएंगी। जादू टोना चमत्कार एनर्जी वाइब्रेशन ओरा दिव्य अनुभूतियां सब बंद हो जाएगा। एक तो आप खुद ही सच्चाई से दूर रहना चाहते हो और दूसरे आपको सच्चाई से दूर रखने में ना जाने कितनों का स्वार्थ है। कुल मिलाकर
45:34 नतीजा भयानक दुखद त्रासदी और कुछ से बिल्कुल सीधा संबंधित होगा। प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी मेरा प्रश्न थोड़ा बाहर से मतलब भारत से बस नहीं है रिलेटेड डाटा थोड़ा बाहर जाते हैं जब हम देखते हैं कि ऐसे ही जो तीर्थ यात्रा है वो फ्रांस जैसे देशों में भी होते हैं। वहां का जो तीर्थ यात्रा है उसे लुर्द कहते हैं। वहां लगभग लगभग आचार्य जी 30 लाख यात्री आते हैं। लेकिन हमें वहां इस प्रकार से कोई भी बड़ी घटना देखने नहीं मिलती। तो आचार्य जी इसके पीछे कारण क्या
46:19 है कि एक तरफ जहां भारत में पूरी व्यवस्था मिलकर भी इसको इतने अच्छे से एग्जीक्यूट नहीं कर पा रही है और इतने लोगों को अपनी जान गवानी पड़ रही है और एक तरफ फ्रांस है जहां इतने बड़े-बड़े भैया वहां हिमालय नहीं है वो कहां ग्लेशियर पिघलेगा क्या बोल रहे हो नहीं जानते हो हां अंधविश्वास की कीमत सब चुकाएंगे इस तरह से नहीं तो दूसरे दूसरे तरीके से फ्रांस में भी अभी वाइल्ड फायर लगी थी। इतने लोग मरे। इसी साल एक दिन जब मैं लंदन दौरे पर था एक दिन पेरिस में इतनी गर्मी हो गई। इतनी गर्मी हो गई कि कुछ लोगों ने जाकर के पानी
47:08 में डूब के जान दे दी। वो दूसरे तरीके से भुगतेंगे। जब वहां यंग फोल्ड माउंटेंस जैसे हिमालय हमारे कच्चे पहाड़ हैं। जब वह है ही नहीं तो क्या ध्या यही तो फिर क्लाइमेट इनजस्टिस भी होता है ना कि जो एमिशन कर रहे हैं उनका कम नुकसान होगा जो एमिशन उतने ज्यादा नहीं कर रहे हैं उनका ज्यादा नुकसान हो रहा है आपको खुशी होगी इस नाते जो हमारी अपनी ऐप है जिसमें हमारे गीता और बाकी सब कार्यक्रम चलते हैं यहां पर बुद्ध हैं गीता है उपनिषद हैं अष्टावक्र हैं। यह मुझे मिले मेरी जिंदगी बदली। यह तुम्हें मिलेंगे तुम्हारी जिंदगी भी बदलेगी। सच पूछिए तो मतलब लाखों नहीं तो कम से कम हजारों जिंदगियां तो हैं जो बिल्कुल बदली
47:54 हैं। 2 लाख से अधिक गीता प्रतिभागियों के साथ जुड़े आचार्य प्रशांत [संगीत] ऐप पर। पहला महीना बिल्कुल फ्री गीता मिशन का पूरा एक्सेस। ऐप पर आपको मिलेंगे नियमित लाइव सत्र। हर दिन आचार्य प्रशांत के विशेष संवाद। गीता कम्युनिटी का एक्सेस, गीता परीक्षा, चयनित समाचार, ऑडियो बुक्स, कोर्ट्स और भी बहुत कुछ। Google Play स्टोर या Apple ऐप स्टोर पर आचार्य प्रशांत सर्च करें और अभी डाउनलोड करें।