तुम सुविधा और सुरक्षा चाहते हो, इसीलिए लोग तुम्हें दबाते हैं (झुकना छोड़ो!) || आचार्य प्रशांत (2025)

संक्षिप्त सारांश

इस वीडियो में आचार्य प्रशांत व्यक्ति के डर, समाजिक दबावों और सच्चाई के प्रति वफादारी के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वे बताते हैं कि डर और सामाजिक मानदंडों के कारण हम अक्सर अपनी वास्तविकता को छिपाते हैं और किस प्रकार हमें अपनी सीमाओं को पहचानना और तोड़ना चाहिए।

  • डर, समाज से दबाव और अपने व्यक्तित्व का छिपावा।
  • अपनी सच्चाई के प्रति वफादारी को स्थापित करना और सामाजिक मानदंडों से मुक्त होना।

समाज से डरने की कीमत

इस अध्याय में, आचार्य प्रशांत समाज द्वारा बनाए गए डर और सीमाओं के प्रभावों के बारे में बात करते हैं। वे यह स्पष्ट करते हैं कि समाज से डरने से हम अपने असली व्यक्तित्व को नहीं विकसित कर पाते और यह हमारी स्वतंत्रता को सीमित करता है। हमें स्वयं की पहचान बनाने और समाजिक मानदंडों से ऊपर उठने की आवश्यकता है।

नौकरी छोड़ने में डर लगता है

इस खंड में, आचार्य नौकरी छोड़ने के डर पर चर्चा करते हैं और बताते हैं कि कैसे कई लोग प्रतिकूलताओं और आर्थिक जिम्मेदारियों के कारण अपने सपनों को छोड़ देते हैं। वे इस बात पर जोर देते हैं कि शिक्षा और स्वतंत्रता के लिए हमें अपने डर को पहचान कर कदम उठाने चाहिए और किसी भी परिस्थिति में सुरक्षित रहने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

तुम इसलिए दब जाते हो

यहाँ, आचार्य प्रशांत यह बताते हैं कि क्यों लोग समाज के आगे दब जाते हैं और अपनी असली भावनाओं को छिपाते हैं। वे कहते हैं कि यह दबाव अक्सर व्यक्तिगत सीमाओं को मान्यता देने में असफलता का परिणाम होता है। उन्हें यह समझने की जरूरत है कि किसी भी चीज़ का विरोध करना हमारी जिम्मेदारी है।

गिल्ट मत पालो: तुम दोषी नहीं

इस खंड में, आचार्य प्रशांत बताते हैं कि हमें दूसरों की प्रतिक्रियाओं के लिए खुद को दोषी नहीं मानना चाहिए। वे यह स्पष्ट करते हैं कि हम अपनी सच्चाई पर खड़े रहकर अपने व्यक्तिगत अनुभवों से सीख सकते हैं और अपने भीतर एक सशक्तता उत्पन्न कर सकते हैं।

झुको मत, ठसक से जियो

यहाँ, आचार्य प्रशांत सिखाते हैं कि हमें दूसरों की अपेक्षाओं के सामने झुकना नहीं चाहिए। हमें अपने आप के प्रति ईमानदार रहना चाहिए और स्वस्थ आत्म-सम्मान बनाए रखना चाहिए। अपने अधिकारों और सीमाओं को पहचानते हुए, हमें ठण्ड और दृढ़ता से जीने की सलाह दी जाती है।

Testimonial

अंत में, एक व्यक्ति अपनी यात्रा साझा करता है और यह बताता है कि उसने आचार्य जी की शिक्षाओं से अपने जीवन में कैसे सुधार किया है। वह गीता समुदाय के महत्व और उसके साथ जुड़ने के अनुभवों के बारे में बात करता है, जिससे उन्होंने जीवन के अनेक पहलुओं में सकारात्मक बदलाव महसूस किया है।

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Transcript

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0:00 मैं पहने कर रहा हूं चुपके से अपने हथियार तुम्हारे ही बीच रहकर रंग बिरंगा वेश पहनकर हूं तुम में से एक [संगीत] अभी सतर्क हूं मैं खुद को भी नहीं जानने देता रंगों के पीछे क्या है बैल की तरह आ भिड़ने की साद तो बहुत है पर अब छिपाऊं क्या थोड़ा सा डरता हूं [संगीत] यहीं पर जिऊंगा यहीं पर हंसूंगा अपने हथियार खुर्चूंगा जब भी सांस लूंगा या बतीसी दिखाऊंगा या तो तुम मुझे बेनकाब कर दो या फिर अपने चोले में छिपे निरंतर पहने होते खंजरों [संगीत] से मैं खुद ही मारा जाऊंगा। तो एक कंफ्यूजन है कि रोज सोचती हूं कि छोड़ दूं पर नहीं कोई कंपनी जॉब नहीं दे रही। कोई बात नहीं मैं अपनी कंपनी क्रिएट कर दूंगा। वो तो करके दिखाने की बात होती है। तो इस पर होता है कि आपके भीतर आग कितनी है। कोई

0:47 नियम थोड़ी बना हुआ है कि सही काम करोगे और जीवन में आजाद जीना चाहोगे तो सब सुविधाएं छीन जाएंगी। सबसे गलत चीज होगी एक बिकी हुई जिंदगी जीना। जो अपनी सीमाएं त्यागने को तैयार हो जाता है, दुनिया में कोई उस पर दबाव नहीं बना सकता। सर मेरा सवाल सोशल मीडिया को लेकर है। सोशल मीडिया पर जरा सी बात पर लोग टूट जाते हैं। सच के साथ अगर वफा रखनी है तो बाकी जगहों पर बेवफा होना सीखो। सोशल मीडिया पर कितने लोगों को हर्ट कर दिया? क्या हो गया? क्यों तनाव में हो? इन्फ्लुएंसरर वगैरह वाली बिरादरी से हो क्या? कौन हो आप? ये देव अपना परिचय दें।

1:37 प्रणाम आचार्य जी। घर परिवार में कोई ऐसा हो जो बिल्कुल नालायक किस्म का हो फिर भी आप उसके पैर जाकर छू जाते हो। तो मेरा सवाल था कि हां ठीक है मतलब आपको पता है कि वह लायक नहीं है कि आप इज्जत करो या वो चीजें करो और आप अंदर से बिल्कुल अनछुए से रहते भी हो। मतलब आपके अंदर से कोई भाव नहीं है। लेकिन फिर भी आप सोशल नॉर्म्स के चलते या ऐसी चीजों के चलते पैर छू जाते हो। ये एक बात हुई। ऐसे ही कहीं और भी मौके होते हैं। वहां पे आप सोशल नॉर्म्स के चलते कुछ चीजें कर लेते हो। सोशल नॉर्म्स के चलते माने क्या? सोशल नॉर्म्स के डर में। ये बोलो ना खुल के। सोशल नॉर्म्स के चलते ऐसे जैसे वहां कोई चल रहा हो। वहां ऊपर कोई चल

2:24 रहा हो वो सोशल नॉर्म है। सीधे बोलो ना कि सोशल नॉर्म के आगे डर में। उसके डर में है ना? उसके डर में। हां। तो मेरा सवाल ये था इसमें कि उसके कुछ फायदे भी मिल जाते हैं। हम्म। जब उसको फॉलो करते हैं तो उसके फायदे भी मिल जाते हैं। एक झटके में ईमानदारी खुल गई सारी। मैं वैसे ये शब्द इस्तेमाल करने ही वाला था कि उसके कुछ फायदे भी होते हैं। तो मेरा सवाल खास ये था कि क्या ये गलत होगा अगर हम उन फायदों के चलते ये चीजें कर लें। जबकि हम अंदर से जानते हैं कि कोई दम है नहीं इस चीज में। जब तक तुम्हें दिखाई दे रहा है कि सचमुच मजबूरी है छू लो। पर जितनी बार छुओ उतनी बार खुद से घिनाया भी करो।

3:12 बाहरी बदलाव तत्काल नहीं आ जाते। ठीक है। पर कम से कम हर ऐसा अवसर जरूरी है कि तुम्हें तुम्हारे प्रति घृणा से भर दे और ये बहुत जरूरी होता है। अपनी वर्तमान स्थिति से नफरत करना बहुत जरूरी होता है। वो नफरत नहीं उठेगी। कई लोग होते हैं वो नौकरी कर रहे हैं। कहते हैं क्या करें? बेहोशी में अब वह कर्जा ले लिया था। कर्जा खा पी लिया। चुकाना तो पड़ेगा ही। हां, ठीक है। लेकिन रोज सुबह जब कार्ड्स स्वाइप करो तो भीतर जहर उठना चाहिए। बिल्कुल उठना चाहिए। भले उसे तबीयत खराब हो जाए,

3:58 एसिडिटी हो जाए, सर दर्द हो जाए, जो हो जाए होता रहे। लेकिन मैं बिल्कुल नहीं चाहूंगा कि आप किसी गलत जगह, फालतू जगह जा रहे हो और मुस्कुराते हुए प्रवेश कर रहे हो कि यह तो कुछ नहीं माया है। क्या होता है? मैं जॉब करता था और अपने मेरे पास भी वजह थी जॉब करने की। मैंने भी कुछ कर्जे ले रखे थे जिनको चुकाना था। एजुकेशन लोन ही था सबसे पहले तो। उस समय पर मैंने एक पंक्ति लिखी थी। अब लिखी थी तो याद तो नहीं होगी दे दे मोबाइल। खोज के देना जरा सा मैं बताता हूं रुको और बड़े दिल से उठी थी बात क्योंकि

4:47 दिल से उठी थी इसीलिए मैंने अपने लिए जो समय सीमा तय करी थी मैं उससे पहले ही अपना कर्जा चुका करके कॉर्पोरेट से बाहर हो लिया कुछ ऐसी थी कि तुम ही में रहूंगा यही सांस लूंगा यही बती दिखाऊंगा होगा या तो तुम मुझे हां करना या तो तुम मुझे बेनकाब कर दो देखो या तो तुम मुझे बेनकाब कर दो नहीं तो अपने चोले में छिपे निरंतर पहने होते खंजरों से मैं खुद ही मारा जाऊंगा अच्छा लगता है याद करके 22 साल का था पर इतना पता था कि

5:34 मैं यहां हूं मुझे मुझे यहां होना नहीं चाहिए और इसी कारण जल्दी से जल्दी निकल पाया। उसका शीर्षक है पूर्व संध्या पर। किस चीज की पूर्व संध्या पर मुझे भी नहीं पता था। मुझे यह पता था कुछ होने जा रहा है। जो होने जा रहा है। मैं यह भी कह सकता था ऑन द ईव ऑफ़ एन एक्सप्लोजन। पर वो विस्फोट क्या था मैं जानता नहीं था। तो मैंने उसको डॉट डॉट डॉट लिखकर छोड़ दिया था। बस इतना पूर्व संध्या माने ऑन द ईयर ऑफ उससे एक दिन पहले

6:21 मैं वहां पर जो मेरी भौतिक व्यवस्थाएं थी उनको ही काटने के लिए गया था। सीधे-सीधे लोन था और उसके लिए ही एक एक रुपया जोड़ रहा था कि इसको जल्दी से जल्दी खत्म करो। लिखा था मैं बड़ी लगन से जतन कर रहा हूं खूब छुप छुप के इसलिए अब कविता काफी कम लिखता हूं। आगे सुनो क्या है? संदर्भ समझते हो इसीलिए बात पूरी खुलेगी। मैं पैने कर रहा हूं छुपके से अपने हथियार। तुम्हारे ही बीच रहकर किससे बात कर रहा हूं? उस माहौल से मैं पहने कर रहा हूं चुपके से अपने हथियार तुम्हारे ही बीच रहकर रंग बिरंगा वेश पहनकर हूं तुम में से एक अभी

7:09 तुम्हारे ही जैसे कपड़े पहनकर तुम में से हूं एक अभी बस अभी और यह जो रंग बिरंगे कपड़े पहने हैं इनके लिए सतर्क हूं मैं खुद को भी नहीं जानने देता रंगों के पीछे क्या है यह जो अभी मैंने रंग बिरंगा भेष बना रखा है तुम्हें जैसा ऐसा बना बैठा हूं। मैं खुद को भी अभी जानने नहीं दे रहा हूं कि इन रंगों के पीछे असली चीज क्या है? क्योंकि जो असली चीज है वो बड़ी जबरदस्त है। उसको जानना माने फिर कोई और कहानी शुरू हो जाएगी। इसीलिए अभी मुझे पता है कुछ है भीतर जो फटेगा पर अभी मैं उसको जानना भी नहीं चाहता। आगे सुनो। बैल की तरह आ भिड़ने की साध तो बहुत है।

7:55 हुलक तो रोज उठती है कि यह सब छोड़ के सतर्कता अभी ही जाकर सीधे-सीधे भिड़ ही जाऊं। बैल की तरह आ भिड़ने की साद तो बहुत है। पर अब छिपाऊं क्या? थोड़ा सा डरता हूं। आगे है यहीं पर जिऊंगा यहीं पर हंसूंगा अपने हथियार खुरचूंगा जब भी सांस लूंगा या बत्तीसी दिखाऊंगा तुम्हारे बीच रह के सांस भी ले रहा हूं हंस भी रहा हूं तुम्हारे साथ लेकिन जितनी बार हंस रहा हूं तुम्हारे साथ समझ लो उतनी बार मैं अपने हथियार पहने कर रहा हूं या तो तुम मुझे बेनकाब कर दो या फिर अपने चोले में छिपे निरंतर पहने होते खंजरों से मैं खुद ही मारा जाऊंगा यह जो रंग बिरंगा

8:41 भैंस पहन रखा है इसके पीछे मैं अपने हथियार अपने खंजर तैयार कर रहा हूं तुम्हारे ही खिलाफ और क्योंकि अभी मैं डर रहा हूं थोड़ा तो मैं तुमसे कह रहा हूं तुम ही मुझे बेनकाब कर दो मेरा यह भेष उतार दो नहीं तो होगा क्या कि ये जो भीतर मैं अपने खंजर तैयार कर रहा हूं नहीं तो अपने चोले में छुपे निरंतर पहने होते खंजरों से मैं खुद ही मारा जाऊंगा। मैं यह कर नहीं पा रहा कि मैं तुरंत खुद ही सब कुछ छोड़छाड़ करके सामने आ जाऊं और बैल की तरह भिड़ जाऊं। तो अंत में मैं आग्रह कर रहा हूं अपने माहौल से कि एक काम करो ना तुम ही मुझे बेनकाब कर दो। तुम ही मुझे बेनकाब कर दो।

9:29 सामंजस्य एडजस्टमेंट नहीं कर लेना चाहिए। जहां किसी तरीके से झुकना भी पड़े, दबना भी पड़े, डरना भी पड़े, वहां कम से कम अपने लिए नापसंद तो उठे। इतना तो हो कम से कम। मेरे भी थे ऑफिस में लोग जिनको ना चाहते हुए भी सर बोलना पड़ता था। बहुत लंबे समय तक नहीं बोला पर जितने समय तक बोला उतने समय तक बोलना भी ऐसा था कि सर बन ना जाए। बोलता था सर बोला है।

10:17 पर जितनी बार सर बोला है उतनी बार इधर कुछ डोला है। कुर्सी पर खड़े होकर हाथ उठा रहे हैं दोनों। है ना? तो आपने बोला था कि कॉर्पोरेट जॉब में आपको रोज ऐसे गिनना आता था। मैं भी आई एम इन द सेम पोजीशन और रोज सोचती हूं कि रिजाइन कर लूं। पर कुछ और पर कुछ और परसेप्शनंस भी है कि जैसे अब तक जो जो कॉलेज में इंडिपेंडेंस नहीं था वो कॉर्पोरेट जॉब से मिला है और कुछ चीजें अच्छी भी मिली है। फ्रीडम मिला

11:04 है, एंपावरमेंट मिला है। मतलब रेंट अफोर्ड कर पा रही हूं। खाना न्यूट्रिशन अफोर्ड कर पा रही हूं। तो एक कंफ्यूजन है कि रोज सोचती हूं कि छोड़ दूं। पर फिर पर फिर पर फिर पर फिर पर फिर पर फिर पर फिर पर फिर पर फिर पर फिर पर फिर मैंने यह नहीं करा था कि मैंने भावुकता में आकर छलांग लगा दी थी। कैसी बातें हो रही हैं? रेंट, न्यूट्रिशन, खाना यह क्या बातें हो रही हैं? यह अरे भाई, एक जगह छोड़ोगे तो साथ में दूसरी जगह प्रबंध भी तो करोगे। हां, पर वो इमीडिएटली नहीं हो पाएगा ना। तो कौन कह रहा है कि अभी अगले सेकंड में करना है। इमीडिएटली किसने बोला? पर तुम वहां 5 साल में भी कुछ नहीं करो तो?

11:52 जब मैं कहता हूं कि बहुत देर मत कर देना तो उस बात को दूसरी अते दूसरे एक्सट्रीम पर ले जाकर नेगेट कर देते हो। कहते हो इतनी जल्दी कैसे छोड़ दें? अरे इतनी जल्दी नहीं होता। मुझे 3 साल लगे थे। तो चलो तुम्हें 5 साल लग जाए। पर कोई कहे मेरे 25 साल हो गए हैं। अभी बस 30-40 साल और लगेंगे। [हंसी] तो रेंट खाना पीना साधारण खर्चे बिल्कुल इनका ख्याल करो क्योंकि यह खर्चे तो करोगे ही और एकदम ठीक कह रहे हो ये खर्चे अगर खुद नहीं उठाओगे तो कहीं और से पैसे मांगने पड़ेंगे और

12:38 पैसे कहीं और से मांगोगे तो आजादी छीनेगी। मैं समझ रहा हूं क्या बोल रहे हो। बिल्कुल एक स्थिति होती है। उसको सीढ़ी के एक पायदान की तरह इस्तेमाल करते हैं और उसका इस्तेमाल करके उससे ऊपर बढ़ जाते हैं। आप यहां पर हो अच्छी बात है। अब इससे आगे बढ़ो। मतलब मैं कुछ लोगों से बात किया तो व्हाट दे टोल्ड कि बी ग्रेटफुल दैट एटलीस्ट यू हैव अ जॉब। यस बी ग्रेटफुल। बट देयर इज ऑलवेज समथिंग बेटर पॉसिबल। कौन कह रहा है कि ग्रेटफुल मत रहो। मतलब लोग बोलते हैं कि जॉब मार्केट भी खराब है और यू हैव यू ऑलरेडी हैव अ जॉब। सो हाउ कैन यू इवन थिंक ऑफ

13:23 यार इसका ना कोई जवाब होता नहीं है। ये तो चीजें करने की होती हैं। जिसे करना है वो कर डालेगा। आपको मार्केट भर के जॉब थोड़ी चाहिए। आपको एक जॉब चाहिए। ठीक है? जॉब मार्केट खराब है। फलाने इंस्टट्यूट में सिर्फ 100 ही तो सीटें हैं। मुझे 100 भी नहीं चाहिए। मुझे तो एक चाहिए। मैं निकाल लूंगा। नहीं मार्केट में कुछ भी नहीं है। एक भी जॉब नहीं बची तो कोई बात नहीं। मैं एक अलग सेक्टर ही क्रिएट कर दूंगा। नहीं कोई कंपनी जॉब नहीं दे रही। कोई बात नहीं। मैं अपनी कंपनी क्रिएट कर दूंगा। वो तो करके दिखाने की बात होती है। तो इस पर होता है कि आपके भीतर आग कितनी है। इसमें कोई

14:13 इसमें कोई कोई मतलब बाहर से आपको प्रिंसिपल बता करके कि ऐसे कर लो, ऐसे कर लो, ऐसे कर लो, ऐसे कर लो। तो तुम सच की सुरमा भी बनी रहोगी और सिक्योरिटी भी बनी रहेगी। ऐसे नहीं होता है। ऐसे नहीं होता है ना। अपने जहांजहां भी कंफर्ट्स हैं और जिसको फ्री टाइम वगैरह बोलते हो ना उसको एकदम कम कर दो और उसका इस्तेमाल करो अपनी आजादी तलाशने में कैसे नहीं मिलेगी यही तो कह रहे हो ना कि अभी अपने खानेपीने के लिए रेंट देने के

15:00 लिए खर्चों के लिए और न्यूट्रिशन बोला इन चीजों के लिए जिससे भी पे मास्टर से पैसा ले रहे हो लेना पड़ेगा तो ठीक है उसने तो घंटे बांध रखे होंगे ना कि दिन के इतने घंटे हमारे यहां काम करोगी करो उतने घंटे काम उसने दिन भी रखे होंगे कि पांच या छ दिन हमारे यहां काम करोगी तो करो पांच छ दिन काम उसके बाद भी तो समय है ना तो जो बाद समय है उसमें चिल क्यों मारना है उसके बाद जो समय उसमें रिलैक्स क्यों करना है उसमें जाकर फिर अपने लिए एक नई दुनिया तलाशो या नई दुनिया बनाना शुरू करो जाओ निकलो बाहर और अपने खर्चे कम करके रखो ताकि अपने पे मास्टर को उतने घंटे ना देने पड़े जितने अभी देने पड़ते हैं।

15:49 ये तो खुद ही करना पड़ता है। इसका कोई इलाज नहीं है कि ये कैसे करें, क्या करें, क्यों ना करें। मुझे धुन चढ़ती थी। मुझे अपना लोन जल्दी-जल्दी उतारना था। वो 5 साल वाला था। और भी कुछ खर्चे थे। लोन के अलावा भी। एजुकेशन लोन 5 साल का था। वही इसके अलावा और भी चीजें थी जो मैंने अपने दोस्तों से पैसे ले रखे थे। क्योंकि ये पक्का था कि घर से नहीं लूंगा। बहुत अच्छे रिश्ते थे घर से। कोई समस्या नहीं। पर ये अपने एक आदर्श कह लो, सिद्धांत कह लो, बात थी कि नहीं तो नहीं पांच साल का था। उसकी ईएमआई बंधी हुई थी। मैंने कहा इसको और जल्दी क्यों ना कर दें? मैंने जाकर ईएमआई बढ़वा दी।

16:35 और बढ़ा दो। और उस वक्त मैं एक अच्छी खासी एमएसी में काम कर रहा था। आई एम अहमदाबाद से निकलने के बाद। मैंने ईएमआई इतनी बढ़वा दी। इतनी बढ़वा दी कि एक महीना था उसके आखिरी के दो-चार दिन थे। उसमें मैं जाकर के ढाबे से तंदूरी रोटियां लेकर आता था और घर में अचार रखा हुआ था। उसके साथ खाता था। घर में तो अलग रहता था मैं। गुड़गांव में अपना अलग रहता था। वहां अचार रखा था। उसके साथ खाता था। फिर रोटियां पैक करा के ले जाता था। एक पेट्रोल पंप वाले से दोस्ती थी तो वो ₹10 का पेट्रोल डाल देता था। बाकी सब आंखें दिखा देते। ₹10 का बाइक पेट्रोल डालने का। ये तो अपने ऊपर। अब मैं इसको एक गाइडिंग प्रिंसिपल की तरह आपको थोड़ी बता सकता

17:20 हूं। आपको बता दूं। आप कह दो मुझे एनीमिया हो गया। मैं फिर उसके लिए थोड़ी जिम्मेदार हऊंगा और बिल्कुल एनीमिया हो सकता है। क्यों नहीं हो सकता? आप अचार के साथ रोटी खाओगे तो एनीमिया हो भी सकता है। अब ये तो खतरा खुद को उठाना है अपनी जिम्मेदारी पे कि कितनी दूर तक जाना है, कितनी दूर तक नहीं जाना है। मैंने दो काम करने शुरू कर दिए थे। मैं आता था। मैं उसके बाद शाम को आता था। और निकल जाता था अपने दूसरे काम पर। वो एक स्टार्टअप थी। वहां से मैं रात में लौट के आता था। 1 2 बज रहे होते थे। मैं जूते पहने-वहने सो जाता था

18:06 और उठ के फिर सुबह वैसे ही बाइक पर बैठकर के चला जाता था। यह तो अपनी आग पर है कि आजादी कितनी जल्दी चाहिए। आजादी कितनी जल्दी चाहिए। नहीं तो मैं भी कह सकता था बैंक तो खुश हो जाता। मैं कहता कि मैं 5 साल में नहीं 10 साल में चुकाऊंगा। बैंक को तो और इंटरेस्ट मिलता है। वो और खुश हो जाता। बल्कि उनको जब कहा कि जल्दी करूंगा तो उन्होंने मुझ पे प्रीपेमेंट पेनल्टी और लगाई। नहीं दे दूंगा। निकलने दो बाहर।

18:52 यह दोनों चीजें एक साथ नहीं चलती हैं। सच और सुविधा नहीं चलते एक साथ। लेकिन हां क्योंकि आपको भ्रम ना हो इसलिए बोले था उन सुविधाओं के हटने से ऐसा नहीं है कि कोई दुख आ जाता है। मौज और रहती है। आप यहां सामने खड़े हो सवाल पूछ रहे हो। इसलिए मुझे वो सब याद आ गया। वरना मुझे उन सब बातों का कोई दुख थोड़ी है। मैं बैठकर अफसोस थोड़ी मनाता हूं कि अरे तीन दिन तक मैंने तंदूरी रोटी और अचार खाया था बस। मुझे कोई इसमें अफसोस थोड़ी है क्या अफसोस होगा

19:43 पर आप जहां से सुन रहे हो आपको हो जाएगा रोटी और अचार खतरनाक और फिर कोई जरूरी भी नहीं है कि सुविधा छीने ही। मैं भी जो उदाहरण दे रहा हूं वो एक अति का दे रहा हूं। एक्सट्रीम का दे रहा हूं। उस एक्सट्रीम तक सबको जाना पड़े। यह भी जरूरी नहीं है। कोई नियम थोड़ी बना हुआ है कि सही काम करोगे और जीवन में आजाद जीना चाहोगे तो सब सुविधाएं छीन जाएंगी। यह भी कोई जरूरी नहीं है। हो भी सकता है कि छीने। हो सकता है ना भी छीने कम छीने वो भी हो सकता है कि बढ़ भी

20:29 जाए कौन जाने बात निष्कामता की है कि छीनेगी कि मिलेगी बढ़ेगी कि बचेगी हमें उसकी परवाह नहीं है नहीं है देखो हम ऐसे समझो समझोगे अगर झूठ और दबाव और बंधन इनके सामने मजबूर होना पड़ रहा है ना तो इसका मतलब कहीं ना कहीं अपने हाथ बांध रखे हैं मत

21:15 बांधो मत बांधो सबसे गलत चीज होगी एक बिकी हुई जिंदगी जीना उससे बचने के लिए जो भी करना पड़े करो। जो भी अपने ऊपर शर्तें लगा रखी हैं वो सारी शर्तें हटा दो। अगर यह शर्त लगा रखी है कि नहीं नहीं मैं तो वही काम करूंगी जो समाज में इज्जत के माने जाते हैं। समाज जिस भी नजर से देखता हो। ईमानदारी की रोटी खा रहे हैं तो कर रहे हैं वो काम। आपको नहीं लगता वाइट कॉलर जॉब तो ना लगे। आजाद तो है ना? तो वह जो मदर कंस्ट्रेंट है उससे बचने के लिए और जितने भी अपने ऊपर कंस्ट्रेंट्स

22:03 लगा रखे हैं वो सारे हटा दो। सारे हटा दो। ये ये मैं नहीं कम्युनिकेट कर पा रहा हूं। नहीं समझ रहे हो? ठीक है। फिर अगर कोई आप पर दबाव बना लेता है, आपको प्रेशराइज कर लेता है तो वो इसलिए कर लेता है क्योंकि आपने अपने लिए और सीमाएं तैयार कर रखी होती हैं। वह उन सीमाओं का सहारा लेकर, वह उन्हीं

22:50 सीमाओं को इस्तेमाल करके आपको प्रेशराइज कर लेता है। समझ रहे हो? इसके भीतर कुछ है। ठीक है? और मैं उसके साथ बड़ी गरिमाहीन तरीके की बदतमीजी करना चाहता हूं। इसके भीतर कोई है। अब अपना नाम बताओ। वसुधा। वसुधा। इसके भीतर वसुधा है। बहुत सही है। वसुधा माने धरती। पूरी पृथ्वी ही ऐसी है। इसके भीतर कोई है और मैं उसके साथ बदतमीजी करना

23:36 चाहता हूं। ठीक है? और मैं कर रहा हूं। इसको लात भी मार रहा हूं। सब कुछ कर रहा हूं। सब कुछ कर रहा हूं। मैं कैसे सफल हो जा रहा हूं? इसकी बेइज्जती करने में, इस पर दबाव बनाने में। कैसे सफल हो जा रहा हूं? कैसे सफल हो रहा हूं? मैं नहीं सफल हो रहा। यह जो भीतर है ना, इसने अपने लिए सीमा चुन रखी है। जो ही मैं इसके साथ बदतमीजी करूं, इसे लात मारू, यह घोषणा कर दे कि मुझे इस सीमा का आदर करना ही नहीं है। तो यह जो भीतर है उसका क्या होगा? वो बच जाएगी। मैं इस पर इसलिए छा जाता हूं। मैं इसको दबाव में डाल लेता हूं। डोमिनेट कर लेता हूं क्योंकि इसने इस बाउंड्री को

24:23 पकड़ रखा है। हो सकता है इस बाउंड्री में इसको इज्जत मिलती हो, सहारा मिलता हो, सुरक्षा मिलती हो। तो मैं इस बाउंड्री का इस्तेमाल करके इसके भीतर जो वसुधा है, उसके साथ दुर्व्यवहार कर जाता हूं। जैसे ही वसुधा ने कहा कि मुझे यह बाउंड्री चाहिए ही नहीं। वैसे ही वह इस बाउंड्री से ही नहीं मुक्त हुई। उसके साथ जो भी कोई दुर्व्यवहार करता है उससे भी मुक्त हो गई। ये गुब्बारा है। ये गुब्बारा है। ठीक है ना? प्रेशर वाली चीज ज्यादा समझ में आएगी क्योंकि उसमें प्रेशर रहता है। एयर प्रेशर। आप उसको एक तरफ से दबाए जा रहे हो। दबाए जा रहे हो। दबाए जा रहे हो।

25:09 प्रेशर बढ़ाए जा रहे हो। किस पर प्रेशर बना रहे हो? हवा पर। हवा पर। है ना? वो हवा इतना प्रेशर क्यों झेल रही है बेचारी? क्योंकि उसने उस सीमा उस बाउंड्री को रिस्पेक्ट दे रखी है। और फिर एक क्षण आता है जब हवा कहती है मुझे इस सीमा को रिस्पेक्ट नहीं देनी। मुझे अपनी सीमाओं को सुरक्षित नहीं रखना। नहीं सम्मान करना मुझे इन लक्ष्मण रेखाओं का। और वह गुब्बारे को फाड़ देती है और आजाद हो जाती है। उसको सचमुच कौन दबा रहा था? मैं

25:54 या वो सीमाएं जो उस हवा ने अपने लिए बना रखी थी। जो अपनी सीमाएं त्यागने को तैयार हो जाता है। दुनिया में कोई उस पर दबाव नहीं बना सकता। दुनिया वाले तुम्हारे ही द्वारा तय की गई सीमाओं का इस्तेमाल करके तुम्हें कैद कर लेते हैं। आ रही है बात समझ में कुछ हम वो भूला मत करो। वेदांत की जो बात है ना हम देहास्म आखिरी बात यही होती है कि शरीर बचाना है जो तैयार हो गया ना कि शरीर भी नहीं बचाना

26:41 उसको कोई नहीं दबा सकता जो तैयार हो गया कि देखो बदतमीजी करोगे तो मुझे शरीर की भी रक्षा करनी नहीं है अपने उसको कोई नहीं दबा सकता और खासकर महिलाओं में जिस दिन महिला ने कह दिया कि मैं सड़क पर भी रहने को तैयार हूं तुम बड़े से बड़ा बड़ा डर मुझे यही दिखाते हो ना सड़क पर आ जाऊंगी। मैं सड़क पर भी आने को तैयार हूं। अब कोई नहीं दबा सकता तुमको। करोड़ों महिलाएं हैं जो जिंदगी में बदतमीजियां झेल रही हैं और बंधन बर्दाश्त कर रही हैं। सिर्फ इसलिए क्योंकि उनके खोपड़े में बात बैठा दी गई है। सड़क पर आ जाओगी। सड़क पर आ जाओगी। जिस दिन उसने कह दिया आ जाऊंगी तो आ जाऊंगी। सड़क पर भी जी लेंगे। अब कोई नहीं दबा सकता तुमको।

27:26 यह देह ही तुम्हारा स्वर्धारित बंधन है। इसलिए वेदांत कहता है ना हम देहास में सारे बंधनों में मूल बंध यही है देह भाव। नहीं तो मछली जैसे हो जाओ ना कबीर साहब की। जो ही जल से बिछड़े झट से त्यागे देह। कौन उसको बंधन में लाएगा? बोलो। आप सोचते हो आपने मछली पकड़ ली। कोई नहीं पकड़ सकता मछली को। आपको भ्रम हो रहा है कि आपने मछली पकड़ ली है। मछली कहती है मैंने सागर पकड़ रखा है

28:13 और तुम मुझसे सागर छुड़वाओगे। मैं जिंदा ही नहीं रहूंगी। लो पकड़ के दिखा दो मुझको। ऐसे हो जाओ ना। हो जाओ ऐसे। अब देखते हैं कि कौन जो सबसे बड़ी सीमा थी क्या देह उसने वो सीमा भी तोड़ दी बोलिए रखो रखो बंधन में कैसे रख लोगे बंधन में हम जिएंगे ही नहीं बंधन में कैसे रख लोगे हमको तुम्हें लाश मिलेगी हमारी अब देखते हैं कौन आपको दबा सकता है वहां तक जाने के लिए नहीं बोल रहा हूं। कोई जरूरत नहीं है। ठीक है? एकदम नहीं। एकदम भी नहीं।

29:00 देयर आर लेयर्स ऑफ कंस्ट्रेंट्स। अगर 10 लेयर्स हैं तो जो पहली चार हैं उनको ही हटा दो तो बहुत आजादी मिल जाएगी। मैंने 10वीं की बात करी है। 10वीं की नौबत नहीं आती। हम एकदम नहीं। ठीक है? पहली चार लेयर्स उनको ही हटा दो। वो सेल्फ इंपोज्ड हैं, सेल्फ क्रिएटेड हैं। ठीक है? हम सर, मेरा सवाल सोशल मीडिया को लेकर है। सोशल मीडिया पर जरा सी बात पर लोग टूट जाते हैं। एक साधारण पोस्ट के कारण लोग आपस में एक दूसरे के खिलाफ हो जाते हैं। तो मेरा सवाल यह है कि लोग अपने राय पर इतने अड़े हुए क्यों हैं? राय पर अड़े हुए नहीं है। सच्चाई बिल्कुल

29:47 विपरीत है। उन्हें पता है कि उनकी राय दो कौड़ी की है। उन्हें पता है कि उनकी राय दो कौड़ी की है। इसीलिए वो इतनी जल्दी आहत हो जाते हैं। उसको पता होता है कि उसकी बात में दम है। वो इतनी जल्दी टूट थोड़ी जाता है। इसी शब्द का आप इस्तेमाल किया ना आपने कि लोग जल्दी टूट क्यों जाते हैं? हम दुर्जन कुंभ कुम्हार के एक ही धक्का दरार नहीं सुना है और सोना सज्जन साधुजन टूट जुड़े 100 बार आपको पता होता है कि आप बिल्कुल व्यर्थ की और बेवकूफी की बात बोल रहे हो आपको पता होता है आप झूठ बोल रहे हो और फिर भी

30:33 जिंदगी से आपकी उम्मीद ये होती है कि आपके झूठ को सम्मान मिले और जब आपके झूठ को सम्मान नहीं मिलता कोई उसमें खोट निकाल देता है कोई उसकी की दरार दिखा देता है तो आप बिल्कुल दरक जाते हो, ढह जाते हो। आपको पता ही हो अगर आपको पता ही हो अगर कि आप कौन हो और कैसे हो तो दूसरे की राय का आप पर क्या सचमुच बहुत असर पड़ने पाएगा? नहीं पड़ेगा ना। और जो अभी चलता है कि ओ क्विक टू टेक ऑफेंस

31:18 ईजीली ऑफेंडेड। इसका मतलब क्या है? इसका मतलब है हम सब लोग झूठ में जी रहे हैं। गहरे झूठ में जी रहे हैं। झूठ कह रहा है इसीलिए वलनेरेबिलिटी बहुत है। असुरक्षा बहुत है। सिर्फ यही नहीं है कि कोई झूठ का पर्दाफाश करे तो हमें बुरा लगेगा। ऐसा भी होता है कि आपने यूं ही मजाक में बिना किसी नियत के किसी से कोई हल्कीफुल्की बात कह दी वो तो भी बुरा मान गया। वो बुरा इसलिए मान गया क्योंकि वो टूटने को तैयार बैठा था। आपकी गलती नहीं है।

32:05 आपकी गलती नहीं है। झूठ की प्रकृति ही यही है कि वो सदा टूटने को तैयार बैठा होता है। लेकिन जब वो टूटता है तो इल्जाम दूसरे पर लगाता है कि दूसरे ने कुछ कर दिया। नहीं मैं क्या करूं? मैं अगर आचार्य जी सत्र सुनूंगा या ऐसे करूंगा आपकी बात आगे बढ़ाऊंगा तो घर वालों को चोट लग जाएगी। यह तुम्हारे घर वाले कैसे हैं? जिनको सच्चाई से चोट लग जाती है। और जिसको सच्चाई से चोट लग रही है वो तो झूठ के भीतर घुस कर बैठा हुआ है। तो उसको अगर चोट लग रही है तो तुम थोड़ी जिम्मेदार हो। किसी ने चुन लिया हो कि शरीर पर घाव ही

32:52 घाव रखूंगा तो उसको तो हवा चले तो भी चोट लग जाएगी। हवा थोड़ी जिम्मेदार हो गई या हो गई। यह यह है। यह पानी का गिलास है। इसको पटक-पटक के इसमें कई तरीके की दरारें डाल दी जाए और उनको एक के ऊपर एक बड़ी सावधानी से बैठा के छोड़ दिया जाए और मैं इतनी दूर से आकर के फूंक मारूं तो क्या हो सकता है? वो गिर जाए। तो फूंक थोड़ी जिम्मेदार थी। पर आप लोग भी बहुत जल्दी अपने ऊपर दोष ले लेते हैं। अपनी नजरों में अपराधी बन जाते हैं। मैंने मां का दिल तोड़ दिया। मां का

33:38 दिल तुमने तोड़ नहीं दिया। मां का दिल टूटा ही हुआ था। और तुम जिम्मेदार नहीं हो उसके। तुम क्यों अपराधी बन रहे हो? तुम क्यों अपराधी बन रहे हो? भीतर तो वह होना चाहिए जिसको अखंड कहते हैं। अटूट कहते हैं। आत्मा के लिए तो यह नाम है। तुम्हारे भीतर कोई ऐसा कैसे बैठा है जो बात में टूट जाता है और चोट खा जाता है। और उसको आप लोग कई ऐसे भी कह देते हो वो नो वो नो मेरी मिनी बहुत सेंसिटिव है। वो सेंसिटिव नहीं है। वो माया है। और मिनी नहीं है। वो मैक है। मैक्रो माया उसका नाम है।

34:26 क्यों है? क्योंकि अगर आपने उससे धोखे से भी 1% भी सच बोल दिया तो तुरंत रूठ और टूट जाती है। आप में से कितने लोग ऐसे लोगों को जानते हो जिनके साथ होते हुए यह पूरा ख्याल रखना पड़ता है कि कहीं गलती से भी जरा सा भी सच ना निकल जाए मुंह से। अब मेरा सवाल ऐसे लोगों के साथ हो क्यों? क्यों? और साथ ही साथ मेरी सहानुभूति ऐसे लोगों के साथ जी कैसे पाते होगे जहां पता है कि सच बोला नहीं कि रिश्ता टूटने की नौबत आ सकती है। जी कैसे लेते हो?

35:13 कैसे? बड़ी सावधानी बरतनी पड़ती होगी। हम लगातार सच की नीति करनी पड़ती होगी। ये कुछ भी बोलना सच मत बोलना। नहीं तो पापा बुरा मान जाएंगे या मिनी रूठ जाएगी। जहां दोषी हो ना वहां अपने आप को दोषी माना करो

35:59 और सही जगह पर खुद को दोषी मानने के साथ यह भी चलता है कि जहां दोषी नहीं हो वहां ठसक से खड़े हो जाया करो बोल के कि मेरी कोई गलती नहीं है तुम मुझे गिल्टी नहीं महसूस करा सकते। आई एम नॉट गिल्टी एंड आई विल नॉट बो डाउन। आई विल नॉट फील स्मॉल। आई विल नॉट अपोलजाइज। मेरी कोई गलती नहीं है। पर ये दोनों बातें एक साथ चलती हैं। हम सब सच के द्रोही हैं। वहां हम अपनी गलती मानते नहीं। और जहां आपकी गलती नहीं वहां आप गलती मानने को बड़े तत्पर रहते हो। उल्टा करो पूरी बात को। दोष तो हमारा है पर दोष हमारा यह है कि

36:46 जिंदगी मिली है आजादी और सच्चाई से जीने के लिए। अगर हम किसी के सामने दोषी हैं भी तो सत्य के सामने दोषी हैं। हम वहां दोषी हैं। वहां सर भी झुकाओ माफी भी मांगो। और इसका अर्थ यह होगा कि जहां दोषी नहीं हो वहां पर नजरें मत झुका लिया करो। भले ही कोई कितने अपने जख्म दिखाए, भले कोई कितने अपने आंसू बहाए और यह सब आपको अपराधी महसूस कराने के तरीके होते हैं कि देखा तुम्हारी वजह से मुझे इतना हर्ट हो गया। अभी कम हुआ है और कराऊं? कुछ नहीं करना पड़ेगा। दो चार सच और बोलने पड़ेंगे। बस मैं नहीं कह रहा हूं ऐसे लोगों से उलझो।

37:31 मेरा तो सवाल यही था कि ऐसों के आसपास पाई क्यों जाते हो? और आप तो सोशल मीडिया की बात कर रहे हो। यह तो शायद घर वाले भी नहीं है। ऐसे तो अगर घरवाले भी हो, दोस्त भी हो तो उनसे भी बचकर चलना चाहिए। आप तो अनजान लोगों की बात पूछने आ गए कि सोशल मीडिया पर ऐसे लोग मिलते हैं जो जल्दी से हर्ट हो जाते हैं। अरे हो जाते हैं जल्दी से हर्ट। तुम्हें क्या करना है? ब्लॉक करो, आगे बढ़ो। छोटी सी जिंदगी है। हां। इसमें मूर्खों की मूर्खताएं गिनोगे तो पता नहीं चलेगा कब बर्बाद हो जाएगी। 800 करोड़ लोग हैं दुनिया में। सबकी मूर्खता गिनने का और झेलने का ठेका लिया

38:18 है क्या आपने? आगे बढ़ो ना। अटके क्यों पड़े हो? यह सब बहुत गलत मूल्य हैं। अतीत के प्रति वफादारी, जगह के प्रति वफादारी, जमीन के प्रति वफादारी, हवा के प्रति वफादारी, दिल्ली नहीं छोडूंगा। 800 एक्यू आ जाए तो भी नहीं छोडूंगा। दिल्ली दिल वालों की दिल ही दिल बचेगा। फेफड़ा तो गया। ये सब व्यर्थ के मूल्य हैं। सच के साथ अगर वफा रखनी है तो बाकी जगहों

39:04 पर बेवफा होना सीखो। बेधड़क धड़ल्ले के साथ बेहिचक बेवफा होना सीखो। विदाउट अपोलॉजी। यह नहीं कि अच्छा काम भी डर डर के छुप छुप के कर रहे हो। पर्दे के पीछे रजाई में छुप के पर्दा गिरा के जो बात मैं आपको बोल रहा हूं उस मुझ पर भी लागू होती है ना। मेरी भी जिंदगी छोटी सी है। क्या आप चाहते हो मैं ऐसे लोगों को पकड़ के चलता रहूं जो मेरी सुनना नहीं चाहते। मेरी बात समझ नहीं रहे या जिनकी वफादारी कहीं और है। बोलो जल्दी बोलो। आप यहां आए हो मेरी संगत करने के लिए। यह

39:51 मेरा बड़बोलापन है या साधारण सत्य है? बोलिए। सीधी सी बात है ना ये। जो मेरी संगत करना चाहते हो जिन्हें मेरी दोस्ती प्यारी लगती है वो यहां पर आए। आपको मुझसे प्यार है तो रहो नहीं तो बाहर जाओ। अब यह बात बोलते हुए क्या मुझे विनम्रता दर्शानी चाहिए? नहीं ना? क्या यह बात बोलकर मुझे खुद को दोषी और अपराधी मानना चाहिए। नहीं ना? तो आप इतनी जल्दी दब क्यों आते हो? झुक क्यों जाते हो? जो आपका अस्तित्वगत अधिकार है उसके लिए सीधे खड़े हो के क्यों नहीं बोलते? हां। इतनी बार बोला वो कोई सिर्फ सिद्धांत नहीं

40:36 है कि सही जगह सर झुका दो तो कहीं और झुकाना नहीं पड़ता। जो सही है उसकी परवाह कर लो तो फिर किसी और की परवाह करनी नहीं पड़ती कि उसको अच्छा लग गया कि बुरा लग गया कि हर्ट हो गया कि क्या हो गया हो गया तो हो गया जो हर्ट नहीं होंगे वो क्या करेंगे तुम्हें अमर कर देंगे या मरोगे तुम्हारे साथ मरेंगे होते हो हर्ट तो हो जाओ हमने जान के कुछ ऐसा करा नहीं कि किसी को दुख दें। तुम अगर दुखी हो रहे हो तो उसका कारण तुम्हारे भीतर है। मेरे भीतर नहीं है।

41:25 तो तुम्हारी बदनियती के लिए मैं खुद को अपराधी क्यों घोषित करूं? सोशल मीडिया पर कितने लोगों को हर्ट कर दिया? क्या हो गया? क्यों तनाव में हो? एक तो वहां कोने में खड़ा कर दिया। जैसे स्कूल में होता है कि उठा के वहां खड़ा कर देते हैं। कान पकड़ने की देर है बस। अब कैसे खड़ा करा वहां पे? यहां पे क्यों नहीं कर रहे? हां। कितने लोग हर्ट हो गए? जी मेरा नहीं है बट किसी का भी। अपना तो कभी होता ही नहीं। जल्दी बताओ। इतने? जल्दी बोलो। हजारों होंगे। हजारों को हर्ट किया।

42:13 इन्फ्लुएंसरर वगैरह वाली बिरादरी से हो क्या? कौन हो आप? [हंसी] हे देव अपना परिचय दें। अदारों कैसे हर्ट कर लिए? नहीं मैं अपनी बात तो नहीं कर रहा था। वैसे मैं अपनी बात अगर है नहीं तो करने लायक नहीं है ना। अपनी तो जिंदगी है। अपनी जिंदगी तो अपनी बात किसी और की बात क्यों करें? दुनिया की सारी समस्याएं तो हमारे ठीक ना होने से है ना? तो बात भी किसकी करेंगे? अपनी करेंगे ना। वहां साधारण आदमी क्या कर

43:00 रहा है, क्या नहीं कर रहा? उससे हमें मतलब वी आर द वर्ल्ड। हम खुद को ठीक कर लें दुनिया ठीक हो जाएगी। ठीक है जाइए। धन्यवाद जी। जो मैं कहना चाहता हूं और आपसे बहुत बहुत तीव्रता से कहना चाहता हूं। वो यह है कि इंसान हो आप। आप आपकी सीमाएं हैं। ठीक वैसे जैसे मैं इंसान हूं मेरी सीमाएं हैं। आप किसी का भला भी करना चाहोगे तो एक सीमा

43:48 से आगे आप नहीं कर सकते। आप किसी को चोट से, दुख दर्द से बचाना भी चाहोगे तो एक सीमा से ज्यादा नहीं बचा सकते। और किसी को बचाना या ना बचाना प्राथमिक रूप से आपकी जिम्मेदारी नहीं है। उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है क्योंकि सब एडल्ट्स हैं। सबको अपनी-अपनी जिंदगी देखनी है। तो अगर आप कुछ ऐसा जान रहे हो और जी रहे हो जो सही है और उसकी वजह से लोगों को बुरा लगता है, ठेस लगती है तो उसके लिए आप दोषी नहीं हो। अपने ऊपर से यह बोझ उतार दो। अस्तित्व की अदालत आपको बाइ्जत बरी करती है।

44:35 खुश एक्सोनरेटेड विद ऑनर्स हैप्पी रिलीव्ड गुड। कितने लोग भीतर ही भीतर ये ग्लानी पाल कर बैठे रहते हो कि नहीं ये सब बातें तो ठीक है बट ये सब बातें अगर हम करेंगे तो सोसाइटी में फैमिली में दुनिया में लोग हर्ट हो जाएंगे। कितने लोग ये डर या ग्लानी लेके बैठे हो? छोड़ो ना यार। नमस्ते आप सभी को। मेरा नाम कृष्णा है। मैं आचार्य जी से लगभग एक साल से जुड़ा हुआ हूं और पहले YouTube पर सुनता था। लेकिन जब मैं कम्युनिटी पर गीता ऐप पर आया

45:21 तो यहां पर इतनी गहराई से हर चीजों के ऊपर हर मुद्दों के ऊपर बातचीत यहां पर एप्लीकेशन में हर तरीके की करंट [संगीत] अफेयर्स फिलॉसोफी बुक्स मूवीज हर तरीके की चीजें और एक [संगीत] पूरा स्टूडेंट्स का साथ हर कम्युनिटी में हर तरीके के लोगों से सीखने का मौका और उसमें आचार्य जी की पुरानी जितनी [संगीत] भी दो साल की रिकॉर्डिंग्स है वो सारी मिल जाती है और उससे काफी बेहतरी मिली है जो YouTube पे देखने को नहीं मिलता है वो पूरा [संगीत] का पूरा एक गीता एप्लीकेशन पे मिलता है, गीता कम्युनिटी पे मिलता है और जीवन [संगीत] में ऐसे बदलाव आए हैं कि पता तो चल रहा है कि क्या नहीं करना है। क्या करना है इसका तो नहीं क्या नहीं करना है। मेरी [संगीत] पुरानी आदतें छूटी है। काफी कुछ जीवन में दिखने लगा है। ये समझने लगा है कि पहले [संगीत] विद्या और अविद्या का मतलब समझने लगा है कि कुछ ऐसे शब्द थे जो

46:09 जीवन में कभी थे ही नहीं। बोध, विवेक इनके बारे में पता चला है। तो इसके [संगीत] लिए मैं जितना भी ग्रेटट्यूड फील कर सकता हूं आचार्य जी के लिए उतना कम है। और कम्युनिटी का मैं बहुत-बहुत थैंक यू हूं कि वो और भी लोगों तक और तेजी से बढ़ रही है। और मैं आप सब से अनुरोध करूंगा कि गीता कम्युनिटी से [संगीत] जुड़िए। तब आपको और भी संस्कृत में और भी अच्छे-अच्छे तरीके से आपको समझने का और देखने का मौका मिलेगा कि [संगीत] कि चीजें क्या होती है? समझ क्या होती है? विवेक क्या होता है? बहुत क्या होता है और यही धन्यवाद

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