0:00 एक छोटा सा कन्फेशन करता हूं। जब मैं छोटा था, मुझे लगता था बैंक एक बिल्डिंग है जहां [संगीत] बेसमेंट में एक बहुत बड़ा लॉकर है जिसमें सबका पैसा डाला हुआ है और एक गार्ड है जो पूरी रात उस पैसे को घूर रहा है ताकि कोई चुरा ना ले। [संगीत] फिल्मों में यही दिखाया जाता है ना, बड़ा सा वॉल्ट गोल वाला दरवाजा और हीरो डायनामाइट लेकर घुस रहा है। भाई, मैं यहां आपका बबल फोड़ने आया हूं। आपका पैसा उस लॉकर में नहीं है। असल में जिस दिन आप पैसा डिपॉजिट करते हो उस दिन से वह पैसा किसी और की जेब में जाने की तैयारी कर रहा होता है। एक अजनबी जिसका नाम आपने कभी सुना भी नहीं वो आपके पैसों से अपना घर खरीद सकता है, बिजनेस शुरू कर सकता है या ईएमआई पे बाइक ले सकता है और बैंक बीच में
0:48 [संगीत] बैठ के चुपचाप प्रॉफिट कमा रहा होता है। अब सोचिए अगर एक छोटी सी ब्रांच इतना बड़ा गेम खेल रही है तो पूरा इंडियन बैंकिंग सिस्टम जिसमें लाखों ब्रांचेस हैं, करोड़ों कस्टमर्स हैं और एक आरबीआई नाम का बॉस है जो सबको कंट्रोल करता है वो कैसे चलता होगा? तो आज हम एक ही वीडियो में कवर करेंगे पूरी जर्नी। 1770 के एक फेल हो चुके बैंक से लेकर 2026 के यूपीआई वाले इंडिया तक। जहां 1 सेकंड में [संगीत] 700 से ज्यादा ट्रांजैक्शंस हो रहे हैं। हिस्ट्री, स्ट्रक्चर, आरबीआई और आज का गेम सब कुछ। चलिए शुरू करते हैं। सबसे पहले बेसिक्स केयर कर लेते हैं क्योंकि इसके बिना हिस्ट्री समझ नहीं आएगी। [संगीत] आप
1:34 ₹100 बैंक में डिपॉजिट करते हो। बैंक आपको उस पर इंटरेस्ट देता है। मान लो 4% सालाना जो आजकल एक टिपिकल सेविंग्स अकाउंट रेट है। अब बैंक यह ₹100 अपने पास नहीं रखता। वो यह पैसा किसी दूसरे इंसान को लोन के रूप में दे देता [संगीत] है। मान लो वो घर खरीदना चाहता है। उस बोरोअर से बैंक 8% इंटरेस्ट लेगा। तो जब बोरोअर बैंक को ₹18 वापस [संगीत] करता है, बैंक आपको ₹14 देता है और बैंक का प्रॉफिट बन जाता है ₹4। यही है स्प्रेड। जो इंटरेस्ट आप देते हो और जो इंटरेस्ट बैंक डिपॉजिट पर देता है, [संगीत] उसका डिफरेंस। यही बैंकिंग का सबसे पुराना और सबसे सिंपल बिजनेस मॉडल
2:19 है। लेकिन इसमें एक बड़ा रिस्क है। अगर आप अचानक अपना पैसा मांगने आ जाओ और बैंक ने वह पैसा पहले ही लोन में दे दिया हो तो बैंक के पास देने के लिए कुछ नहीं बचेगा। इसी वजह से रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया जिसे हम आरबीआई कहते हैं और जो हर बैंक का बॉस है एक रूल बनाता है। हर बैंक को अपने डिपॉजिट्स का एक फिक्स्ड परसेंटेज अपने पास कैश रिजर्व के रूप में रखना ही पड़ेगा। इसे कैश रिजर्व रेशियो सीआरआर कहते [संगीत] हैं जो अभी करीब 4% है। इसके अलावा एक और रेश्यो है स्टचटरी [संगीत] लिक्विडिटी रेशियो एसएलआर जो अभी 18% के आसपास है। [संगीत] इसका मतलब है कि डिपॉजिट्स का एक हिस्सा बैंक्स को
3:05 गवर्नमेंट बॉन्ड्स, गोल्ड [संगीत] या सिक्योरिटीज जैसी सेफ चीजों में इन्वेस्ट करना ही होगा। तो टोटल मिला के आपके डिपॉजिट का लगभग 22% आरबीआई के रूल्स के हिसाब से लॉक हो जाता है सेफ्टी के लिए और बचा हुआ 78% बैंक लोन देने के लिए इस्तेमाल [संगीत] करता है। यह पूरा सिस्टम तभी चलता है जब लोगों का बैंक पर भरोसा हो और यह भरोसा एक दिन में नहीं बना। इसके पीछे [संगीत] 250 साल से ज्यादा की कहानी है। चलिए थोड़ा पीछे चलते हैं। बैंकिंग का कांसेप्ट दुनिया में मॉडर्न फॉर्म में सबसे पहले कहां आया? 11वीं सदी के इटली में। उस वक्त इटली यूरोपियन ट्रेडिंग का सेंटर था और पीसा जैसे शहर में मर्चेंट्स [संगीत] को ट्रेड के लिए साथ-साथ अलग
3:52 करेंसीज हैंडल करनी पड़ती थी। इसलिए मनी चेंजर्स बेंचों पर बैठ के करेंसी एक्सचेंज करते थे। और इटालियन शब्द बैंको से ही हमें मिला शब्द बैंक। अब भारत की बात करें। यहां बैंकिंग कोई नया कांसेप्ट नहीं था। वेदों में भी उसी यानी ब्याज पर पैसा देना का जिक्र मिलता है और कुसीदिन नाम का शब्द साहूकार के लिए इस्तेमाल होता था। सदियों तक भारत में हुंडी सिस्टम चलता था। एक तरह का क्रेडिट इंस्ट्रूमेंट [संगीत] जिससे एक शहर से दूसरे शहर पैसा ट्रांसफर हो जाता था। बिना फिजिकली कैश ले जाए। यह इंडीजीनियस बैंकर्स का सिस्टम था [संगीत] और यह आज भी कहीं-कहीं इस्तेमाल होता है। मॉडर्न वेस्टर्न स्टाइल बैंकिंग भारत में
4:38 शुरू होती है 1770 में जब कोलकाता में बैंक ऑफ हिंदुस्तान खुला। लेकिन यह बैंक ज्यादा चल नहीं पाया। 1832 तक बंद हो गया। उसके बाद 600 से ज्यादा छोटे-छोटे बैंक्स खुले प्री इंडिपेंडेंस पीरियड में और इनमें से ज्यादातर फेल हो गए। फ्रॉड, मिसमैनेजमेंट और कमजोर रेगुलेशन की वजह से। लेकिन कुछ इंपॉर्टेंट बैंक्स भी बने इस पीरियड में। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने तीन प्रेसिडेंसी बैंक्स बनाए। बैंक ऑफ बंगाल 1806, बैंक ऑफ बॉम्बे 1840 और बैंक ऑफ मद्रास 1843। यह तीनों बैंक्स क्वासी सेंट्रल बैंक की तरह काम करते थे। मतलब आरबीआई आने से पहले
5:25 यह ही करेंसी और क्रेडिट कंट्रोल करते थे अपने-अपने रीजन में। 1921 में इन तीनों को मर्ज करके बनाया गया इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया। जो उस वक्त का सबसे बड़ा बैंक था। और 1955 में [संगीत] इंडिपेंडेंस के बाद इसी इंपीरियल बैंक को नेशनलाइज करके नाम दिया गया स्टेट बैंक ऑफ इंडिया एसबीआई जो आज भी इंडिया का सबसे बड़ा पब्लिक सेक्टर बैंक है। इस पीरियड में एक और दिलचस्प फैक्ट भारत का पहला पूरी तरह इंडियन ओनड और इंडियन मैनेज्ड कमर्शियल बैंक था सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया जो 1911 में बना और इसे इंडिया का पहला सच्चा स्वदेशी बैंक भी कहा जाता है। पंजाब नेशनल बैंक भी इसी
6:12 लिस्ट में आता है। 1894 में लाहौर में इंडियन नेशनलिस्ट्स ने बनाया और आज भी एक लीडिंग इंडियन बैंक है। अब तक हमारे पास बैंक्स तो थे, लेकिन एक सेंट्रल अथॉरिटी नहीं थी जो सबको कंट्रोल [संगीत] करे। यह गैप फिल हुई 1935 में जब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना हुई। दिलचस्प बात यह है कि आरबीआई शुरू में एक प्राइवेटली ओनड बैंक था। गवर्नमेंट का इसमें कोई शेयर नहीं था। आरबीआई को बनाने की सिफारिश 1926 में हिल्टन यंग कमीशन जिसे रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस भी कहते हैं ने दी थी। [संगीत] उन्होंने रिपोर्ट में कहा था कि भारत को एक प्रॉपर सेंट्रल बैंक चाहिए। आरबीआई ऑफिशियली एस्टैब्लिश हुआ 1
6:57 अप्रैल 1935 को [संगीत] और उसका लीगल फ्रेमवर्क आरबीआई एक्ट 1 साल पहले ही 1934 में पास [संगीत] हो गया था। आरबीआई का पहला हेड क्वार्टर था कोलकाता क्योंकि ब्रिटिश ट्रेड ज्यादातर ईस्ट इंडिया कंपनी के थ्रू वहीं से होता था। लेकिन जैसे-जैसे टाइम बढ़ा यह रियलाइज हुआ कि एक कॉर्नर में लोकेटेड हेड क्वार्टर से पूरे इंडिया को कंट्रोल करना प्रैक्टिकल नहीं है। इसलिए 1937 में आरबीआई का हेड क्वार्टर बॉम्बे आज का मुंबई शिफ्ट कर दिया गया जहां आज भी है। आरबीआई के पहले गवर्नर थे सर ओसबोन स्मिथ। 1935 से 1937 [संगीत] और पहले इंडियन गवर्नर थे सीडी देशमुख जो बाद में इंडिपेंडेंट इंडिया के पहले
7:43 फाइनेंस [संगीत] मिनिस्टर भी बने। अब सबसे इंपॉर्टेंट मोमेंट 1949 में आरबीआई का नेशनलाइजेशन हुआ। मतलब [संगीत] जो प्राइवेट ओनरशिप थी वो गवर्नमेंट ने खरीद ली। इसी के साथ आरबीआई बन गया सच [संगीत] में इंडिया का सेंट्रल बैंक जिसका काम है मॉनिटरी पॉलिसी सेट करना। करेंसी प्रिंट करना। हां, आरबीआई नोट्स प्रिंट करता है, लेकिन कॉइंस [संगीत] मिंट नहीं करता, वह अलग डिपार्टमेंट का काम है। बैंक्स को रेगुलेट करना और पूरी इकॉनमी में क्रेडिट फ्लो कंट्रोल करना। इंडिपेंडेंस के तुरंत बाद एक बड़ी प्रॉब्लम थी। भारत का ज्यादातर बैंकिंग सेक्टर प्राइवेट प्लेयर्स के हाथ में था और यह बैंक्स मोस्टली अर्बन और इंडस्ट्रियल एरियाज को सर्व करते थे। गांव
8:29 में रहने वाले लोग आज भी साहूकारों पर डिपेंड करते थे जो उनसे बहुत ज्यादा इंटरेस्ट लेते [संगीत] थे। गवर्नमेंट को रियलाइज हुआ कि अगर बैंकिंग सेक्टर को डेवलप करना है, एग्रीकल्चर, स्मॉल इंडस्ट्रीज [संगीत] और रूरल इंडिया तक पैसा पहुंचाना है तो कंट्रोल अपने हाथ में लेना ही पड़ेगा। तो 1969 में एक हिस्टोरिक डिसीजन लिया गया। 14 मेजर प्राइवेट बैंक्स का नेशनलाइजेशन कर दिया गया। मतलब गवर्नमेंट ने उनके मेजर शेयर्स खरीद लिए और [संगीत] उन्हें पब्लिक सेक्टर बैंक्स बना दिया। यह वह बैंक्स थे जिनके डिपॉजिट्स ₹50 करोड़ से ज्यादा थे। इसका रिजल्ट क्या हुआ? बैंकिंग अचानक सिर्फ शहर तक सीमित नहीं रही। [संगीत] ब्रांचेस गांव-गांव में खुलने लगी।
9:14 एग्रीकल्चर और स्मॉल बिजनेसेस को लोनस मिलने लगे। फाइनेंशियल इंक्लूजन का पहला बड़ा पुश यही था। 1980 में एक और राउंड हुआ। छह और बैंक्स नेशनलाइज किए गए। टोटल गिनती पहुंच गई 20 नेशनलाइज्ड बैंक्स तक। इसका मकसद था कमांडिंग हाइट्स ऑफ द इकॉनमी पर कंट्रोल रखना और क्रेडिट को सिर्फ प्रॉफिट के लिए नहीं बल्कि सोशल गुड के लिए इस्तेमाल [संगीत] करना। लेकिन हर चीज का एक डाउन साइड भी होता है। जैसे-जैसे गवर्नमेंट कंट्रोल बढ़ा बैंक्स में एफिशिएंसी कम होती [संगीत] गई। कंपटीशन नहीं था तो कस्टमर सर्विस, इनोवेशन और प्रॉफिटेबिलिटी सब पीछे रह गए। बैड लोंस जिन्हें हम [संगीत] आज एनपीएज नॉन
10:00 परफॉर्मिंग एसेट्स कहते हैं बढ़ने लगे। भारत को रियलाइज हुआ कि 100% गवर्नमेंट कंट्रोल भी परफेक्ट सॉल्यूशन नहीं है। 1991 में भारत एक सीवियर बैलेंस ऑफ पेमेंट्स क्राइसिस में फंस गया। [संगीत] फॉरेन रिजर्व्स इतने कम रह गए थे कि सरकार को अपना गोल्ड तक प्लेज करना पड़ा। इसी क्राइसिस ने भारत को फोर्स किया इकोनॉमिक लिबरलाइजेशन की तरफ [संगीत] और बैंकिंग सेक्टर इससे अलग नहीं था। गवर्नमेंट ने एक कमेटी बनाई जिसकी लीडरशिप की श्री एम नरसिमम ने। इसीलिए इसे नरसिंहम कमेटी कहते हैं। कमेटी ने 1991 में अपनी रिपोर्ट दी और सुझाव दिया कि पब्लिक [संगीत] और प्राइवेट बैंक्स को इक्वल ट्रीटमेंट मिलना चाहिए। फॉरेन बैंक्स इंडियन बैंक्स के साथ जॉइंट [संगीत] वेंचर्स कर सकें और सबसे
10:46 इंपॉर्टेंट नए प्राइवेट बैंक्स को लाइसेंस दिया जाए। 1993 में आरबीआई ने 10 नए प्राइवेट बैंक्स को लाइसेंस दिया। यहीं से आए वो नाम जो आज हर इंडियन जानता है। HDFC बैंक, ICICI बैंक, Axis Bank, पहले UTI बैंक, Indusind [संगीत] बैंक। यह भारत के बैंकिंग सेक्टर में प्राइवेट प्लेयर्स की असली वापसी थी। 1940 के बाद पहली बार। इसके बाद रिफॉर्म्स का सिलसिला चलता रहा। इंटरेस्ट रेट्स डीरेगुलेट हुए। कैपिटल एडिक्वसी नॉर्म्स आए और बैंकिंग टेक्नोलॉजी में इन्वेस्ट होना शुरू हुआ। 2000 के दशक में कोर बैंकिंग सॉलशंस आए। फिर नेट बैंकिंग फिर क्रेडिट कार्ड्स का बूम। 2014 में एक और इंपॉर्टेंट चीज हुई।
11:34 प्रधानमंत्री जनधन योजना पीएमजेडीवाई ल्च हुई जिसमें करोड़ों जीरो बैलेंस बैंक अकाउंट्स खोले गए आधार और मोबाइल टेक्नोलॉजी के थ्रू ताकि हर इंडियन चाहे वो कितना भी गरीब हो फॉर्मल बैंकिंग सिस्टम का हिस्सा [संगीत] बन सके। इसी साल आरबीआई ने एक नया कांसेप्ट इंट्रोड्यूस किया। पेमेंट्स बैंक्स और स्मॉल फाइनेंस बैंक्स जैसे Airtel पेमेंट्स बैंक, Paytm पेमेंट्स बैंक, इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक। अब हम आ गए प्रेजेंट में। तो आज इंडियन बैंकिंग सिस्टम का स्ट्रक्चर कैसा दिखता है? सबसे टॉप पर है आरबीआई। पूरे सिस्टम का रेगुलेटर और बॉस। उसके नीचे आता है बैंकिंग सिस्टम। जो दो ब्रॉड कैटेगरीज में बट जाता है। शेड्यूल बैंक्स और नॉन
12:21 शेड्यूल बैंक्स। [संगीत] शेड्यूल बैंक्स वो होते हैं जो आरबीआई एक्ट के सेकंड शेड्यूल में लिस्टेड हैं। मतलब बड़े, [संगीत] एस्टैब्लिश्ड और रेगुलेटेड बैंक्स। नॉन शेड्यूल बैंक्स छोटे और कम रेगुलेटेड होते हैं। शेड्यूल्ड बैंक्स आगे [संगीत] दो पार्ट्स में बंटते हैं। कमर्शियल बैंक्स और कोऑपरेटिव बैंक्स। कमर्शियल बैंक्स वो हैं जो प्योरली बिजनेस के [संगीत] लिए बने हैं। सस्ता पैसा लेना और महंगा लोन देना, प्रॉफिट कमाना। यह आगे चार कैटेगरीज में बढ़ते हैं। पब्लिक सेक्टर बैंक्स [संगीत] जिनमें गवर्नमेंट की मेजॉरिटी स्टेक है। इसमें एसबी और नेशनलाइज्ड बैंक्स [संगीत] आते हैं। प्राइवेट सेक्टर बैंक्स जिनमें गवर्नमेंट का कोई स्टेक नहीं जैसे HDFC, ICICI,
13:09 Axis [संगीत] Kotak, फॉरेन बैंक्स जिनका हेड क्वार्टर किसी दूसरे देश में है लेकिन इंडिया में ऑपरेट करते हैं। जैसे [संगीत] सिटी बैंक, HSBC, स्टैंडर्ड चार्टर्ड। फन फैक्ट इंडिया का पहला फॉरेन बैंक था एचएसबीसी [संगीत] और पहला एटीएम भी एचएसबीसी ने ही इंट्रोड्यूस किया था। 1987 में मुंबई में रीजनल रूरल बैंक्स आरआरबीस यह गवर्नमेंट ओनड होते हैं लेकिन स्पेसिफिकली किसी रीजन के रूरल डेवलपमेंट के लिए बनाए जाते हैं। सेंट्रल गवर्नमेंट, स्टेट गवर्नमेंट और एक स्पॉन्सर बैंक तीनों मिलके इन्हें ऑपरेट करते हैं। दूसरी तरफ है कोऑपरेटिव बैंक्स जो बिल्कुल
13:54 कोऑपरेटिव सोसाइटी जैसी होती हैं। मेंबर्स ही इस बैंक के ओनर्स होते हैं। मेंबर्स ही डिपॉजिट करते हैं और मेंबर्स ही लोन लेते हैं। प्रॉफिट भी मेंबर्स में ही बांटा जाता है। इसके अलावा है डेवलपमेंट बैंक्स जैसे [संगीत] नाबार्ड जो एग्रीकल्चर और रूरल डेवलपमेंट के लिए स्पेसिफिक क्रेडिट प्रोवाइड करते हैं। यह पूरा स्ट्रक्चर एक पिरामिड की तरह काम करता है। आरबीआई टॉप पे कंट्रोल और मॉनिटरी पॉलिसी सेट करता है [संगीत] और नीचे हर टाइप का बैंक अपना स्पेसिफिक रोल प्ले करता है। चाहे वह अर्बन मिडिल क्लास का सैलरी अकाउंट हो या एक [संगीत] किसान का क्रॉप लोन। एक क्विक लेकिन जरूरी टेंजेंट। 2008 में दुनिया भर के बैंक्स एक बहुत बड़े क्राइसिस में फंस
14:41 गए थे। बहुत सारे मेजर बैंक्स ने अपना ट्रेडिशनल सेफ बिजनेस मॉडल छोड़ दिया था और शॉर्ट टर्म हाई रिस्क फाइनेंसियल प्रोडक्ट्स में इन्वेस्ट करना शुरू कर दिया था। बिल्कुल गैंबलिंग जैसा। लेमन ब्रदर्स जैसा जॉइंट बैंक ऑलमोस्ट किसी को भी होम लोन दे रहा था। बिना प्रॉपर चेकिंग के। जब लोग लोंस रीप नहीं कर पाए, पूरा सिस्टम कोलैप्स [संगीत] हो गया। मिलियंस ने अपनी जॉब्स खोई और ट्रिलियंस ऑफ डॉलर्स इवापोरेट हो गए। [संगीत] भारत इससे लार्जली बचा रहा क्योंकि इंडियन बैंक्स का रेगुलेशन कंजर्वेटिव था। सीआरआर, एसएलआर और आरबीआई की स्ट्रिक्ट ओवरसाइट ने यहां वो फाइनेंशियल गैंबलिंग होने नहीं दी। यह एक बड़ा रीजन है कि आज भी जब लोग पूछते हैं इंडियन बैंक्स इतने स्टेबल क्यों हैं?
15:28 जवाब है स्ट्रांग रेगुलेशन और आरबीआई का केयरफुल कंट्रोल। और अब बात करते हैं उस चीज की जिसने [संगीत] पूरा गेम ही बदल दिया। यूपीआई यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस जो एनपीसीआई ने 2016 में ल्च [संगीत] किया था। सोचो 2016 में सिर्फ 21 बैंक्स यूपीआई से जुड़े थे और [संगीत] पहले महीने में सिर्फ 373 ट्रांजैक्शंस हुई थी और आज मई 2026 में यूपीआई ने एक रिकॉर्ड बनाया 23.2 बिलियन ट्रांजैक्शंस जिनकी टोटल वैल्यू थी 29.90 लाख करोड़। सिर्फ 1 महीने में आज करीब 700 से ज्यादा बैंक्स यूपीआई नेटवर्क में हैं और भारत हर दिन 66 करोड़ से ज्यादा
16:14 ट्रांजैक्शंस प्रोसेस करता है। आईएमएफ ने भी ऑफिशियली यूपीआई को दुनिया का सबसे बड़ा रियल टाइम रिटेल पेमेंट सिस्टम डिक्लेअ [संगीत] किया है। भारत अकेला ग्लोबली सारे रियल टाइम पेमेंट्स का लगभग [संगीत] 49% शेयर रखता है जो ब्राजील के पिक्स से तीन गुना ज्यादा है। एक चाय वाला भी आज क्यूआर कोड दिखाकर पेमेंट ले रहा है और यह कोई छोटी बात नहीं है। यह है फाइनेंसियल इंक्लूजन का सबसे बड़ा रेवोल्यूशन जो भारत ने देखा है। तो देखा आपने एक 1770 के फेल हो चुके बैंक से शुरू होकर ब्रिटिश प्रेसिडेंसी बैंक्स फिर इंपीरियल बैंक फिर एसबीआई फिर आरबीआई का नेशनलाइजेशन फिर 1969 और 1980 के नेशनलाइजेशन वेव्स फिर 1991 की
17:01 लिबरलाइजेशन जिसने HDFC ICICI जैसे जॉइंट्स दिए और अब यूपीआई जिसने पूरी दुनिया को दिखाया कि डिजिटल पेमेंट्स कैसे [संगीत] होनी चाहिए इंडियन बैंक बैंकिंग सिस्टम की यह जर्नी किसी भी बॉलीवुड स्टोरी से कम नहीं है। और अगली बार जब आप अपना फोन निकाल के एक सेकंड में ₹10 का पेमेंट करोगे एक पल के लिए सोच लेना इस एक टैप के पीछे 250 साल की हिस्ट्री, एक नेशनलाइजेशन, एक लिबरलाइजेशन और एक आरबीआई का साइलेंट कंट्रोल चल रहा है। अगर यह वीडियो हेल्पफुल लगा तो लाइक करो। अपने उन दोस्तों को भेजो जो अभी भी सोचते हैं बैंक का पैसा लॉकर में होता है और चैनल को सब्सक्राइब करना मत भूलना क्योंकि अगली
17:47 वीडियो में हम डीप डव करेंगे आरबीआई की मॉनिटरी पॉलिसी और क्रेडिट कंट्रोल मेजर्स में जो एग्जाम में भी आता है और रियल लाइफ में भी काम आता है। मिलते हैं अगली वीडियो में। तब तक के लिए अपना पैसा बैंक में रखो। टेंशन मत लो। सिस्टम [संगीत] समझ चुके हो