आचार्य प्रशांत के अध्यात्म की पूरी पड़ताल | An analysis of Acharya Prashant's philosophy

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संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो आचार्य प्रशांत के विचारों का विश्लेषण करता है, यह जांचता है कि वे कितने तार्किक हैं और हिंदू दर्शन पर उनके विचार कितने सही हैं। यह वेदों, उपनिषदों और गीता से जीवात्मा और पुनर्जन्म पर उनकी व्याख्या के विरुद्ध सबूत भी प्रस्तुत करता है। इसके अतिरिक्त, यह इस बात पर विचार करता है कि क्या आचार्य प्रशांत धर्म का उपयोग करके लोगों को तर्कसंगत बना रहे हैं, और जातिवाद पर उनके विचारों की जांच करते हैं।

  • आचार्य प्रशांत के विचारों का विश्लेषण
  • हिंदू दर्शन पर उनके विचारों की जाँच
  • वेदों, उपनिषदों और गीता से प्रमाण
  • जातिवाद पर उनके विचार

परिचय

इस भाग में, वक्ता बताते हैं कि वे आचार्य प्रशांत के विचारों का विश्लेषण करने जा रहे हैं, जिसके लिए उन्हें उनके विचारों को ध्यान से सुनना और समझना होगा। वक्ता बताते हैं कि आचार्य प्रशांत के पास लगभग 4500 वीडियो और 100 किताबें हैं, इसलिए इसमें समय लगेगा। वक्ता यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह विश्लेषण केवल वैचारिक होगा, व्यक्तिगत नहीं। वे केवल उनकी विचारधारा पर बात करेंगे, उनके व्यक्तिगत जीवन पर नहीं।

आचार्य प्रशांत के विचार संक्षेप में

आचार्य प्रशांत के यूट्यूब चैनल का विवरण बताता है कि वह एक अनोखे समाज सुधारक और सच्ची आध्यात्मिकता के शिक्षक हैं। वह सशक्तिकरण, पर्यावरण को बचाने, जानवरों के प्रति प्यार और जीवन को सही तरीके से जीने पर जोर देते हैं। वह एक ऐसे वैश्विक आंदोलन का नेतृत्व करते हैं जो सामाजिक बंधनों से मुक्ति की बात करता है जो हमें सच और शांति से दूर रखते हैं। आचार्य प्रशांत व्यक्तिगत भगवान की अवधारणा को खारिज करते हैं और ब्रह्म की बात करते हैं। उनके अनुसार, इस तरह की कोई इकाई जैसे आत्मा या जीवात्मा मौजूद नहीं है और न ही व्यक्ति का पुनर्जन्म होता है, बल्कि पुनर्जन्म वृत्ति का होता है।

क्या आचार्य प्रशांत एक तार्किक व्यक्ति हैं?

आचार्य प्रशांत के विचार ऊपरी तौर पर भले ही तर्कसंगत लगें, लेकिन वे पूरी तरह से तर्कसंगत नहीं हैं क्योंकि वे एक धार्मिक समूह के साहित्य का समर्थन करते हैं। सच्चाई यह है कि यह ग्रंथ, चाहे वह वेद हो या पुराण या उपनिषद, तमाम विसंगतियों से भरे पड़े हैं जो वर्तमान समय में इनकी उपयोगिता पर सवालिया निशान लगाते हैं। कोई भी ग्रंथ अपने समय के ज्ञान और परिस्थितियों के अनुसार ही रचा जाता है, लेकिन बदलते समय के साथ ज्ञान का दायरा भी बढ़ता है और सामाजिक परिस्थितियों में भी बदलाव आते हैं।

हिन्दू दर्शन पर आचार्य प्रशांत के विचार कितने सही?

यह कहना जल्दबाजी होगी कि आचार्य प्रशांत अध्यात्म का व्यवसाय कर रहे हैं। हो सकता है कि वास्तव में उनके दिमाग में समाज को बेहतर बनाने के लिए जो विचार हैं, जिनके बारे में उनका मानना है कि यह समाज और दुनिया को बेहतर बना सकते हैं, वे उन्हीं के प्रचार-प्रसार के लिए यह सब कर रहे हैं। उनका ऐसा कहना कि ईश्वर, आत्मा, कर्म फल, पुनर्जन्म आदि को लेकर जो प्रचलित मान्यताएं हैं, वे सब गलत हैं, हिंदू ग्रंथों में इनका वास्तविक कॉन्सेप्ट कुछ और है, जिसमें समय के साथ भ्रांतियां आ गई हैं, और फिर वे इन सब की सही व्याख्या करके बताते हैं।

वेदों, उपनिषदों और गीता से जीवात्मा और पुनर्जन्म पर आचार्य प्रशांत की व्याख्या के विरुद्ध सबूत

ऋग्वेद के प्रथम मंडल के सूक्त 164 का 38वां मंत्र कहता है कि जीवात्मा शरीर से आबद्ध होने की वजह से विभिन्न योनियों में जाती है और अपनी धारण करने की क्षमता की वजह से ही शरीरों को धारण करती और छोड़ती रहती है। इसी तरह दशम मंडल के सूक्त 16 के पांचवें मंत्र में अग्नि देव से प्रार्थना की जा रही है कि अविनाशी जीवात्मा दोबारा किसी शरीर से युक्त हो जाए। उपनिषदों में भी आप हिंदू धर्म की आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म, कर्मफल की इस फिलॉसफी को इसी प्रचलित रूप में देख सकते हैं।

क्या आचार्य प्रशांत धर्म का सहारा लेकर लोगों को रेशनल बना रहे हैं?

एक संभावना यह भी बनती है कि वह धर्म ग्रंथों की आड़ में लोगों को सही शिक्षा देना चाहते हैं। वह चाहते हों कि धर्म और धर्म ग्रंथों में लोगों की आस्था को खत्म किए बिना लोगों को इन सदियों पुरानी मान्यताओं से बाहर लाकर तर्कसंगत बनाया जाए। लेकिन ऐसा होता नहीं है। वह शायद आस्था के मनोविज्ञान को नहीं समझते। एक आस्थावान अपनी आस्था को बचाने के लिए तिनके का सहारा खोजने रहता है। वह सिर्फ उतनी ही बात सुनता और समझता है जितने से वह अपनी आस्था के सही होने के लिए तर्क जुटा सके।

आध्यात्मिक गुरुओं का दोहरा रवैया आचार्य प्रशांत भी अपवाद नहीं

आचार्य प्रशांत समेत लगभग सभी आध्यात्मिक गुरु एक बात जरूर करते हैं कि अहंकार ही सभी दुखों की जड़ है। अगर हमें खुद को और दुनिया को बेहतर बनाना है तो अहंकार का नाश करना बहुत जरूरी है। लेकिन सिर्फ एक जगह पर आकर उनकी जबान को लकवा मार जाता है, बस उस पर बोलने के लिए उनके पास शब्द नहीं होते, बल्कि कमाल की बात यह है कि वह उसे हर जतन से पोषित करते नजर आते हैं और वह है धार्मिक अहंकार।

जातिवाद पर आचार्य प्रशांत के विचार

आचार्य प्रशांत जातिवाद को वर्ग के समान बताकर यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि ऐसा भेदभाव दुनिया में कहां नहीं है। वह दिखाना चाहते हैं कि देखो यह भेदभाव तो सभी जगह हो रहा है। अपर क्लास का बंदा लो क्लास से भेदभाव करता है, उसके साथ उठता बैठता नहीं है, उसके घर में शादी नहीं करता। मार्केट भी भेदभाव करता है, गरीब आदमी महंगे रेस्टोरेंट में नहीं आ सकता, ब्रांड के शोरूम से शॉपिंग नहीं कर सकता।

उपनिषदों से जातिवाद के सबूत

छंदों के उपनिषद के अध्याय 5 के खंड 10 का सातवां मंत्र जाति व्यवस्था को एकदम क्लीयरली दिखाता है। यह मंत्र कहता है कि जो आचरण वाले जीव होते हैं, वह उत्तम योनियों ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को प्राप्त होते हैं और जो अशुभ आचरण वाले होते हैं, वह अशुभ योनियों जैसे कुत्ते, सूअर और चांडाल को प्राप्त होते हैं।

धर्मग्रंथों की अवैज्ञानिक बातों को तर्कों से सही सिद्ध करने की कोशिश करना

आचार्य प्रशांत तो लगता है हिंदू धर्म की हर अवैज्ञानिकता, विश्वास और रूढ़िवाद को प्रासंगिक बनाने का ठेका लिया है। क्या इस तरह के तर्कों से दुनिया के सभी धर्मों की अवैज्ञानिक और मूर्खतापूर्ण बातों को सही सिद्ध नहीं किया जा सकता? मुझे तो यह सीधे तौर पर संगठित धर्म के प्रति जो आजकल के युवाओं में जो विद्रोह पनप रहा है, उसे ही दबाने की कोशिश लगती है।

भगत सिंह से मिल सकने वाली प्रेरणा पर मिट्टी डालना

आचार्य प्रशांत ने भगत सिंह को भी नहीं छोड़ा। उनके महान बलिदान से युवाओं को मिल सकने वाली प्रेरणा को भी यह कहकर डाइल्यूट कर दिया कि वह पूरी तरह से भौतिकवादी नहीं थे। जबकि भगत सिंह का जेल में लिखा हुआ लेख 'मैं नास्तिक क्यों हूं' अपने आप में इतना क्रांतिकारी है कि यदि कोई युवा उसे पढ़े तो वह उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।

उपसंहार

आज के दौर में सभी के अंदर अपने धर्म, अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति को श्रेष्ठ साबित करने की एक चाह होती है। यह चाह हमारे अंदर भी है, लेकिन जब हम आज के दौर में इसे साबित करने की कोशिश करते हैं तो हमें वर्तमान में ऐसी कोई उपलब्धि नहीं दिखती जिसे दिखाकर हम अपनी श्रेष्ठता को साबित कर सकें।

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Transcript

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0:00 नमस्कार दोस्तों स्वागत है आप सभी लोगों का इस वीडियो में दोस्तों जैसा की आप सभी लोग काफी समय से डिमांड कर रहे हैं की मैं आचार्य प्रशांत पर अपने विचार रखो तो आज फाइनली मैं यह शुभ कम करने जा रहा हूं इस शुभ कम में हालांकि डर काफी लगी इसके लिए मैं आप सभी को सॉरी बोलना हूं लेकिन डर लगे की भी वजह थी क्योंकि अगर किसी के विचारों का विश्लेषण करना है तो उसे अच्छे से सुना और समझना पड़ता है जिन चीजों की बात वो कर रहा है उन्हें भी जांचना और परखना पड़ता है और इन सभी चीजों में समय लगता है और खासतौर पर तब जबकि जिनका मैं विश्लेषण कर रहा हूं उनका एक ह्यूज कंटेंट लगभग 4:30 हजार के आसपास वीडियो और 100 के आसपास की किताबें तो इतना समय लगा जायज हालांकि इसका मतलब आप यह मत समझ लेना की मैंने साड़ी वीडियो देख ली

0:46 जरूरी में चीज होती है किसी व्यक्ति की विचारधारा को समझना और वह कुछ जरूरी मुद्दों पर उसके विचारों को सुनकर आप समझ सकते हैं मैं चाहता था की मेरा ऐसा हो की जो इसे देखें वो इससे कुछ सिख सके मैंने अपनी तरफ से पुरी कोशिश की है अब यह कोशिश कितनी कामयाब हुई है ये आप बताएंगे और हां दोस्तों आपको मैं ये भी बता डन की ये विश्लेषण सिर्फ वैचारिक होगा पर्सनल नहीं यानी मैं सिर्फ उनके आईडियोलॉजी पर बात करूंगा उनकी पर्सनल लाइफ पर नहीं किसी भी पर्सनल लाइफ को टारगेट करना बहुत आसन होता है लेकिन ज्यादातर मामलों में ये गैर जरूरी होता है और इसका कोई भी फायदा नहीं होता कोई अपनी पर्सनल लाइफ में क्या कर रहा है इसके बजे वो जो सोशल लाइफ में कर रहा है हमें उसे पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि वहां वो

1:31 लोगों की जिंदगियां को प्रभावित कर रहा है कल मिलकर विचारों के कार्ड विचारों से हनी चाहिए मेरा ऐसा मानना है तो चलिए फिर डर किस बात की शुरू करते हैं [संगीत] दोस्तों हमारे देश को एक आध्यात्मिक देश की तरह जाना जाता है इसका करण है की आध्यात्मिक यहां बहुत सारे लोगों का जीवन दर्शन यहां से लोगों की तादाद बहुत ज्यादा है जिनके जीवन का तन बना धर्म और अध्यात्म के इर्द-गिर्दुना हुआ है विकसित देश में जहां धर्म और अध्यात्म का मार्केट लगातार गिर रहा है वहीं हमारे देश में ये तेजी से बाढ़ रहा है और इसीलिए यहां पर धर्म गुरुओं और कथावाचकों और आध्यात्मिक गुरुओं की अच्छी खासी तादात मौजूद है इस अपॉर्चुनिटी को बनाने के लिए हर रोज नए-नए लोग नए-नए इतिहास के साथ मार्केट में

2:17 उतरते रहते हैं अब जैसा की हर मार्केट में होता है की हर खरीदार की जरूर और पॉकेट के हिसाब से चीज मौजूद होती हैं वैसा ही यहां भी यहां भी हर किसी की बुद्धि और समझ के हिसाब से गुरु मौजूद जो पौधे रूप से थोड़े निकले पायदान पर है उनके लिए कथावाचक और चमत्कारी बाबा दुकान सजाकर बैठे हुए जो भौतिक रूप से थोड़ा बेहतर है उनको संभालने का बेड़ा आध्यात्मिक गुरु होने उठाया हुआ है जो अपनी लक्ष्यदार बटन में उन्हें उलझाए रखते हैं आजकल का जो पढ़ा लिखा यूथ है उसके अंदर अपने धर्म और संस्कृति को लेकर एक अटैचमेंट तो है पर धर्म की तमाम बटन को जब वो तारक और विज्ञान की कसौटी पर रखना है तो वो खड़ी नहीं उतरते और यहां से जो कनफ्लिक्ट जाम लेट है वो उसे परेशान करता है और वो उसका

3:02 समाधान चाहता है इस अपॉर्चुनिटी को समझकर ही कई आध्यात्मिक गुरु मार्केट में अपनी दुकान खोलकर बैठे हुए जो तमाम तर्कों को तर्कों से यह साबित करके दिखाई हैं की उनके धर्म और विज्ञान में कोई कनफ्लिक्ट नहीं है और उनका धर्म एकदम लॉजिकल और साइंटिफिक गुरु ऐसे भी है जिनके पास इस दुनिया को लेकर कुछ अपने इतिहास कुछ अपनी विचारों को दुनिया के सामने रखना के लिए धर्म का सहारा लेते हैं और जिसकी वजह है की ऐसा करने से उनके विचारों को आसानी से एक्सेप्टेंस मिल जाति क्योंकि वह जानते हैं की इस देश में लोग अपने धर्म से बहुत गहरी से अपने धर्म से तार कोई विचार को एक्सेप्ट करना उनके लिए मुश्किल हो जाता है उन्हें लगता है की ऐसा करके वह अपने धर्म के रास्ते से भटक रहे हैं लेकिन अगर कोई अपने इतिहास को यह कहकर सामने रखें की वह तो

3:50 आपको आपके ही धर्म के सही व्याख्या करके बता रहा है तो लोग उसे आसानी से एक्सेप्ट कर लेते हैं और मेरी समझ जो कहती है वो ये की आचार्य प्रशांत ऐसा ही कुछ कर रहे हैं ऐसा क्यों का रहा हूं इसके सबूत में आगे वीडियो में आपको दूंगा लेकिन फिलहाल इस दुनिया को लेकर उनके जो विचार हैं जो इतिहास है उन पर बात करते हैं और देखते हैं की वो कितने सही [संगीत] आचार्य प्रशांत के युटुब चैनल का डिस्क्रिप्शन उनके बड़े में बताता है की वह आज की दुनिया के एक अनोखे सबसे हटकर वन ऑफ किड सोशल रिफॉर्मर और सच्ची आध्यात्मिकता के शिक्षक वो नई सशक्तिकरण पर्यावरण को बचाने जानवरों के प्रति प्यार और जीवन को सही तरीके से जीने पर जोर देते हैं साथ वह अगुवाई करते हैं उसे ग्लोबल

4:35 मोमेंट की जो उन सामाजिक बंदों से मुक्ति की बात करती है जो हमें सच और शांति से दूर रखते हैं अगर ऊपरी तोर पर आचार्य प्रशांत के विचारों को देखा जाए तो वो बिल्कुल वैसे ही हैं जैसे किसी भी राशनल इंटेलेक्चुअल इंसान के होते हैं जैसे वो किसी पर्सनल गॉड की अवधारणा को खारिज करते हैं मतलब ऐसा गॉड जो की इस दुनिया में दखल देता है हमारे कर्मों को देखा है और उसके अनुसार हमें फल देता है हमारी प्रार्थनाओं को सुनता है कर्मकांड से प्रभावित होता है वह इसके बजे एक ब्रह्म की बात करते हैं ब्रह्म का मतलब है की इस पूरे यूनिवर्स में जो कुछ भी है वो सब इस ब्रह्म के भीतर ही ऐसे समझिए की ब्रह्म एक समुद्र के जैसा है और समुद्र के अंदर जो कुछ भी है वह सब लहरों के जैसा है लहरों का अपना अस्तित्व भले प्रतीत होता हो पर वास्तव में वह समुद्र का ही हिस्सा

5:22 है या कहें समुद्र ही है यानी अगर हम अपनी बात करें तो हम इस ब्रह्म रूपी समुद्र के अंदर खुद को एक लहर मां सकते हैं इस तरह से देखा जाए तो हम भी ब्रह्म का ही हिस्सा है या कहे की ब्रह्म ही है हम ब्राह्मणी का जो कॉन्सेप्ट है वो यही है अगर ब्रह्म के कॉन्सेप्ट को माना जाए तो फिर पूजा पाठ और कर्मकांड का कोई मतलब नहीं राहत इसी तरह वो आत्मा या सोल का जो प्रचलित कॉन्सेप्ट है जिसमें माना जाता है की हमारे अंदर कोई नॉन फिजिकल एंटी है जो हमें कॉन्शियस बनती है और जिसके बॉडी से निकाल जान पर हम मा जाते हैं और यह फूल किसी नई बॉडी में जाकर दोबारा जन्म भी लेती जिसे पुनर्जन्म कहते हैं आचार्य प्रशांत इस कॉन्सेप्ट को नहीं मानते उनके अनुसार इस तरह की कोई एंटी जैसे सोल या जीवात्मा कहते हैं वो एक्जिस्ट नहीं करती और ना ही व्यक्ति का पुनर्जन्म होता है

6:09 बल्कि पुनर्जन हम वृत्ति का होता है नहीं करता मैं व्यक्ति के पुनर्जन्म को स्वीकार करता हूं पुनर्जन्म तो होता है निश्चित रूप से होता है पर किसका हम वृत्त का पुनर्जन्म होता है व्यक्तिगत अहंकार का नहीं उनके अनुसार कोई भी जीव जो पैदा होता है उसके अंदर यह भाव होता ही जब कोई जीव मरता है तो यह भाव उसके शरीर के साथ ही खत्म हो जाता है लेकिन हर नए पैदा हुए जीव के अंदर यह भाव दोबारा पैदा होता है और इस तरह बार-बार यह भाव इस जीव जगत में पैदा होता राहत है और इसे ही आचार्य प्रशांत हम वृत्ति का पुनर्जन्म कहते हैं और ये व्यक्ति के पुनर्जन्म से एकदम अलग है क्योंकि मृत्यु के साथ ही एक व्यक्ति के

6:55 तोर पर जो कुछ भी हम हैं हमारा व्यक्तित्व हमारी यादें वो सब कुछ खत्म हो जाता है अगर इस कॉन्सेप्ट को मैन तो पुनर्जन्म के जितने भी केसेस के बड़े में हम पढ़ने सुनते हैं वह सब झूठ सिद्ध होते हैं और खुद आचार्य प्रशांत अपनी वीडियो में यह का चुके हैं की व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता और पुनर्जन के जितने भी कैसे है वह सब झूठ इसी तरह कंफर्म सिद्धांत पर उनका कहना है की हम जो कर्म करते हैं उसका फल भविष्य में नहीं बल्कि अभी मिल जाता है क्योंकि बड़ा कम करने के लिए आपको बड़ा आदमी होना पड़ता है इस तरह से कम फल सिद्धांत का जो प्रचलित रूप है जिसमें ऐसा माना जाता है की प्रारब्ध के करण वर्तमान और वर्तमान के कर्म हमारा भविष्य निर्धारित करते हैं इसका वो विरोध करते हैं वैसे तो पुनर्जन्म को खारिज करते ही कर्म फल सिद्धांत भी अपने आप खारिज होने लगता है क्योंकि आमतौर पर ऐसा माना जाता

7:42 है की पिछले जन्म के कर्मों के फलस्वरूप ही हमें वर्तमान जन्मे मिला है और अगर पुनर्जन को ही मानता ना दी तो फिर वर्तमान जन्म किसका फल है इसको एक्सप्लेन करना मुश्किल है तो अगर इन सब विचारों पर गौर करें तो उनके विचार और किसी राशन व्यक्ति के विचारों में कोई अंतर नहीं लगता इसके साथ ही एनवायरनमेंट और एनिमल राइट्स पर उनके विचार गौर करने लायक है इस मामले में वो शायद बाकी आध्यात्मिक गुरुओं से काफी आगे जो इन विषयों पर बात तो करते हैं पर उन्हें इन मुद्दों की सही समझ नहीं और इसीलिए इस पर उनके सुझाव इन प्रैक्टिकल और तारक बचकाना होते हैं आचार्य प्रशांत पूर्ण शाकाहार का समर्थन करते हैं जिसको वैगनआईएसएम कहा जाता है इसमें किसी भी एनिमल प्रोडक्ट को इस्तेमाल ना करने की सलाह दी जाति जिससे एक तो एनिमल क्वालिटी में कमी आई है और दूसरा यह एनवायरनमेंट के

8:27 लिए भी अच्छा है इसके साथ ही वह स्त्रियों को आत्मनिर्भर बनाने और सशक्त बनाने की बात करते हैं लकी इसमें वो काफी आगे तक चले जाते हैं साथ ही वो युवाओं का मार्गदर्शन भी करते हैं आजकल के युवा करियर को लेकर जी तरह के स्ट्रेस से गुर्जर रहे हैं उसको लेकर वो काफी कुछ कहते हैं और बताते हैं की किस तरह से वो अपनी जिंदगी को एक सही और बैलेंस जी सकते हैं इसके साथ ही हम किस तरह से एक बेहतर समाज बना सकते हैं इस दुनिया को कैसे एक बेहतर दुनिया बना सकते हैं इस पर भी वो काफी कुछ कहते हैं अध्यात्म का वास्तविक स्वरूप क्या है और ये हमारे लिए किस तरह से उपयोगी होता है इस पर भी वो काफी बात करते हैं भारतीय दर्शन और उसमें भी खासतौर पर उपनिषदों को वो काफी महत्व देते हैं और ऐसा कहते हैं की इनमें हीरो छुपी हुए अगर इनको समझ लिया गया और अपना लिया गया तो

9:14 मानव जाति की लगभग साड़ी समस्याएं खत्म हो शक्ति और भी बहुत सारे मुद्दे हैं जिन पर वो बात करते हैं लेकिन ये कुछ में में मुद्दे हैं जिन पर मैंने उनके विचार सुनें और इस वीडियो में मैं इन्हीं पर बात करने वाला ऊपरी तोर पर देखने पर आचार्य प्रशांत के विचार भले राशन लगे पर वह पुरी तरह से राशनल नहीं है और जिसकी वजह है की वो एक धार्मिक समूह के लिटरेचर को एंडोर्स करते हैं और भले ही वह कितना ही कहे की इन ग में कोई अंधविश्वास कोई वैज्ञानिकता कोई ऐसी बात नहीं है जो हमारे समाज को गलत दिशा देती है सच्चाई ये नहीं सच्चाई ये है की यह ग्रंथ फिर चाहे वो वेद हो या पुराण या फिर उपनिषद तमाम ऐसी विसंगतियां से भरे पड़े हैं जो की वर्तमान समय में इनकी

9:59 उपयोगिता पर सवालिया निशान लगाते हैं कोई भी ग्रंथ अपने दूर के ज्ञान और परिस्थितियों के अनुसार ही रचा जाता है लेकिन बदलते समय के साथ ज्ञान का डेरा भी बढ़ता है सामाजिक परिस्थितियों में भी बदलाव आते हैं और जिसकी वजह से हमें तमाम ऐसी चीज देखने को मिलती है जिन्हें आज स्वीकार नहीं किया जा सकता पर क्योंकि लोगों का अपने धर्म से गहरा जुड़ाव होता है इसलिए ऐसी बटन को जब भी उनके सामने लाया जाता है तो वह आशाए हो जाते हैं उनका दिमाग को कम करने के लिए कोई रास्ता खोज रहा होता है संक्षेपित है यानी यह मूल ग्रंथ का हिस्सा नहीं है बल्कि इनको बाद में किसी के द्वारा किसी गलत उद्देश्य से जोड़ा गया है या फिर ये या फिर कोई ये तारक दे की इसका ये अर्थ नहीं है बल्कि तो इसका तो कुछ और अर्थ है या फिर ये बातें तो सांकेतिक है

10:45 या नहीं यहां पर तो मेटाफोर में बात की गई है तो ये तारक अपने धर्म से जुड़ाव रखना वाली व्यक्ति को एकदम से समझ ए जाते हैं क्योंकि ये तारक उसे एहसास दिलाते हैं की उसकी आस्था गलत नहीं है और इसीलिए जितने भी मॉडर्न गुरु हैं वो आपको इसी तरह के तारक देते हुए मिलेंगे क्योंकि ऐसा करके वो आसानी से भीड़ चुडा सकते हैं ना केवल मॉडर्न गुरु बल्कि आजकल तो इंस्टाग्राम और युटुब पर भी तमाम ऐसे शॉर्ट वीडियो बनाने वाले ए गए हैं जो अपनी वीडियो के जारी यही बताते हैं की आपका धर्म कितना साइंटिफिक जिसमें क्यों की वीडियो

11:32 है की हम में से ज्यादा लोगों ने अपने जीवन में कभी खुद से अपना कोई धर्म ग्रंथ पढ़ा ही नहीं होता ज्यादा लोग अपनी जिंदगी भाग दौड़ में इस कादर उलझे हुए हैं की उनके पास इसके लिए समय ही नहीं जो लोग किसी तरह पढ़ने का साहस भी जुड़ने हैं वो या तो इन्हें भक्ति भाव से पढ़ने हैं या फिर उनके मां में कहानी ना कहानी ये भाव जरूर होता है की इनमें बड़े ऊंचे स्टार की बात है इनको समझना उसके बस की बात नहीं है ऐसे में कहानी कोई ऐसी चीज भी दिखे जो की उसके आम सेंस या मोरल साइंस को जब जोर तो भी वो उसे इग्नोर करके आगे बाढ़ जाते हैं इसके साथ ही ज्यादा लोगों ने अपने स्कूल कॉलेज की पढ़ाई के अलावा कोई ढंग का लिटरेचर भी अपने जीवन में कभी नहीं पढ़ा होता ऐसे लिटरेचर जिससे इस दुनिया के बड़े में उनकी सोच विकसित हो सके जो उन्हें ना केवल अपनी बल्कि दुनिया की बाकी संस्कृति

12:17 और उनके इतिहास से परिचित कर सकें जो उन्हें यह बता सके की विचारक केवल हमारे यहां नहीं बल्कि पुरी दुनिया में पैदा हुए हमें से ज्यादा लोग भारत के विश्व गुरु होने के गुमान में पलकर कप्पा हुए घूमते रहते हैं और कभी इतना भी नहीं सोचते की विश्व गुरु का टाइटल हमें बाहर के लोगों ने दिया हमने खुद को दे दिया अपने मुंह अपना गुणगान करते हुए हम लोग कुछ इस तरह की बातें करते हैं की जब पश्चिम के लोग नंगे घूम रहे थे तब यहां पर उच्च कोटी का दर्शन रचा जा रहा था ये बातें हम तब करते हैं जबकि हम में से जाकर लोग फैट और फैट माइथॉलजी और हिस्ट्री फिलासफी और साइंस जैसी बेसिक चीजों के फर्क नहीं समझते हमारे लिए आस्था ही फैक्ट में था की इतिहास और दर्शन ही विज्ञान बन जाता है हमारी यही अज्ञानता मुदिता और सच की खोज

13:02 के प्रति उदासीनता तथ्यों को जचने में आलस और साथ में अपनी धार्मिक अहंकार को दुष्ट करने की भावना कुछ चालक लोगों के लिए बिजनेस अपॉर्चुनिटी में बादल जाति है [संगीत] वैसे यह कहना जल्दबाजी होगी की आचार्य प्रशांत अध्यात्म का बिजनेस कर रहे हो सकता है वास्तव में उनके दिमाग में समाज को बेहतर बनाने के लिए जो इतिहास है जिसे उनका ऐसा मानना है की ये समाज ये दुनिया बेहतर हो शक्ति है वो उन्हें के प्रचार प्रसार के लिए सब कर रहे हैं अब उनका अल उद्देश्य क्या है ये तो वही बेहतर बता सकते हैं मैं तो सिर्फ वो जो कर रहे हैं वो कितना सार्थक है इस का विश्लेषण कर सकता हूं और जब मैं वो जो कर रहे हैं उसका विश्लेषण करता हूं तो मुझे उसमें कई ऐसी चीज नजर आई है जो मुझे परेशान करती हैं

13:47 जैसे वह जी तरह का दवा हिंदू धर्म की फिलासफी को लेकर करते हैं वह मुझे सही नहीं लगता अगर उनकी बटन को सही माना जाए तो ईश्वर आत्मा कर्म फल सिद्धांत अवतार बाद पुनर्जन को लेकर जैसी प्रचलित मान्यताएं हैं वह सिर्फ खारिज हो जाति है आप कहेंगे की आप तो खुद इन चीजों में विश्वास नहीं करते तो आपको क्या समस्या है आपको तो खुश होना चाहिए और इसके लिए उनकी तारीफ करनी चाहिए हां मेरा ऐसा मानना है की समाज को इस तरह की रूढ़िवादी मान्यताओं से ऊपर उठाना चाहिए लेकिन जी तरह आचार्य प्रशांत इन मान्यताओं को खत्म करना छह रहे हैं वो सही नहीं है उनका ऐसा कहना की यह ईश्वर आत्मा कर्म फल पुनर्जन वगैरा को लेकर जो प्रचलित मान्यताएं हैं वो सब गलत है हिंदू ग में इनका वास्तविक कॉन्सेप्ट कुछ और है जिसमें

14:34 समय के साथ भारतीय ए गई हैं और फिर वो इन सब की सही व्याख्या करके बताते हैं वही जिसे अभी हमने पीछे डिस्कस किया था की आत्मा का मतलब जीवात्मा होता है और वो कोई ऐसी आदित्य नहीं है जिसके शरीर से निकाल जान से शरीर मा जाता है बल्कि वो हम व्यक्ति को दिया हुआ एक नाम है और पुनर्जन जीवात्मा का नहीं बल्कि हम व्यक्ति का होता है और कर्म फल भी जो है वो भी पिछले जन्म का नहीं बल्कि अभी तुरंत का मिलता है और इस तरह की और भी बात है यकीन मानिए वह कितना ही जोर देकर इन सब बटन को कहे पर मुझे ये खाने में कोई भी चेक नहीं है की वो यहां पर झूठ बोल रहे इन सभी सब्जेक्ट्स पर हिंदू धर्म की जो प्रचलित मान्यताएं हैं वह बिल्कुल अपने ग के अनुकूल ही है हिंदू धर्म के लगभग सभी ग्रंथ इन्हीं मान्यताओं का समर्थन और

15:20 प्रतिपादन करते हैं अगर आप इन मान्यताओं को उसे तरह से बादल दें जैसा आचार्य प्रशांत ने किया तो आपको लगभग हर ग्रंथ की हर दूसरी तीसरी लाइन में मानवाने अर्थशने पढ़ेंगे तब कहानी जाकर ग में लिखी बटन का कोई लॉजिक बनाया जा सकेगा फसल में ये हिंदू धर्म की कर फिलासफी है जो आपको हर छोटे-बड़े ग्रंथ में मिलेगी इसमें इस तरह का फ़िर बादल जैसा की आचार्य प्रशांत ने किया है पुरी हिंदू फिलासफी को शीर्षासन करने जैसा है हकीकत यह है की सभी हिंदू ग्रंथ फिर चाहे वो वेद हो पुराण हो उपनिषद हो सभी में यह फिलासफी इसी प्रचलित रूप में जगह-जगह पर दिखाई देती है वेदों की बात करें जैसे ऋग्वेद के प्रथम मंडल के सूक्त 164

16:06 का 38वां मंत्र कहता है की जीवात्मा शरीर से आबंध होने की वजह विभिन्न योनियों में जाति और अपनी धरण करने की क्षमता की वजह से ही शरीरों को धरण करती और छोड़ती रहती है इसी तरह दशम मंडल के सूक्त 16 के पांचवें मंत्र में अग्नि देव से प्रार्थना की जा रही है की अविनाशी जीवात्मा दोबारा किसी शरीर से युक्त हो जाए तो वहीं दशम मंडल के ही 59 वन सूक्त के चाटे मां में परमात्मा द्वारा जीवात्मा को नेत्र प्राण आदि देने की बात हो रही है वेदों में और भी कई मंत्र है जो पुनर्जन्म की बात करते हैं पुराने की बात करें तो वहां तो आप चप्पे-चप्पे पर पुनर्जन्म और अवतार वाद को देख सकते हैं लेकिन बहुत सारे लोग पुराने को प्रमाणिक नहीं मानते इसलिए मैं उनका जिक्र यहां पर नहीं कर रहा हिंदू लिटरेचर में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण उपनिषदों को दिया जाता

16:51 है आचार्य प्रशांत भी उपनिषदों को ही महत्व देते हैं और वो खुद को उपनिषद मर्मदर्शी की तरह पेस करते हैं और दवा करते हैं की वह जो बता रहे हैं वो वास्तव में उपनिषदों का ही ज्ञान है तो आई वो प्रश्नों के बड़े में नहीं जानते उन्हें बता डन की उपनिष्णु की संख्या 100 से ऊपर है कुछ विद्वानों से 108 बनाते हैं लेकिन इनमें से मंत्र 11 उपनिषद ही ऐसे हैं जिन्हें प्रमाणिक माना जाता है जिनके नाम है ईश्वर किनो उपनिषद कठोतनिषद प्रश्न उपनिषद मुंडक उपनिषद मांडू के उपनिषद तैरतरी उपनिषद तारे उपनिषद चांदो की उपनिषद रहदे को अपने शब्द इनमें से 10 के ऊपर आदि शंकराचार्य ने टीका लिखी थी जिसका मतलब है की ये प्राचीन है इसलिए इन्हें

17:38 प्रमाणिक माना जाता है उपनिषदों में भी आप हिंदू धर्म की आत्मा परमात्मा पुनर्जन कर्मफल की इस फिलासफी को इसी प्रचलित रूप में देख सकते हैं जैसे ईश्वर से अपने शब्द का तीसरा मंत्र देखिए जो ये कहता है की आत्महत्या करने वाले लोग मार्कर असुरों के लोगों को प्राप्त होते हैं अब यहां जीवात्मा भी है कर्म फल भी है और पुनर्जन भी और वो भी प्रचलित रूप में जो आचार्य प्रशांत बताते हैं उसे रूप में नहीं यह जीवात्मा कोई हम वृद्धि यानी मैं की भावना जैसी आम टेंडेंसी नहीं है जिसका पुनर्जन हो रहा है बल्कि उसका व्यक्तिगत अस्तित्व तभी तो उसे कर्म फल के अनुसार यानी मिल रही है आदि शंकराचार्य पर कठोतनिषद के द्वितीय अध्याय की द्वितीयावली का सातवां मंत्र भी मोर लगता

18:25 है जो यह कर्म के अनुसार जीवात्मा भिन्न भिन्न योनियों को प्राप्त होती है दूसरे अध्याय की तीसरी बाली का चौथ मंत्र भी कुछ ऐसा ही का रहा है की शरीर के नष्ट होने से पहले परमात्मा को जान लो वरना निकॉन कल्पन तक नाना प्रकार के लोकन में शरीर धरण करना पड़े इन मेट्रो पर आदि शंकराचार्य का भया भी अगर आप देखेंगे तो वहां भी यही लिखा हुआ है कुछ ऐसा ही का रहा है की ईस्ट और पोर्ट कर्मो को श्रेष्ठ माने वाले लोग अपने पुण्य कर्मो से पहले स्वर्ग में जाते हैं उसके बाद मनुष्य लोग या फिर इससे भी नीचे के लोगों में जाते का दसवां मंत्र कहता है की यह जीवात्मा ना तो स्त्री है ना पुरुष और ना ही नपुंसक यह जी शरीर को ग्रहण करता है यह इस से हो

19:11 जाता है 11वां मंत्र भी कहता है की जीवात्मा कर्मों के अनुसार मिलने वाले शरीरों को बार-बार प्राप्त होता राहत है जैसे पतंजलि योग सूत्र के साधना पद के 12वीं सूत्र के अनुसार कर्म संस्कारों के मौजूद रहने तक उनके अनुसार जन्म आयोग और भोग प्राप्त होते हैं इस तरह योग वशिष्ठ की उत्पत्ति प्रकरण को यदि आप पढ़े और उसमें भी यदि 55वे सर को आप पढ़े तो वहां पर ये फिलासफी बहुत ही अच्छे से एक्सप्लेन की गई इसे पढ़कर जीवात्मा की क्रमानुसार कैसी गति होती है उसका पुनर्जन्म किस तरह से होता है और वह किस तरह दूसरे शरीरों को प्राप्त करती है इस बड़े में सारे संदेह खत्म हो जाते हैं और ये फिलासफी उसे फिलासफी से दूर-दूर तक मैच नहीं करती जो आचार्य प्रशांत अपने प्रवचनों में बताते

19:57 हैं आप खुद पढ़ कर चाट कर सकते हैं अब जब इतनी बात की है तो लगे हाथों गीता की भी बात कर ही लेते हैं क्योंकि अचार प्रशांत गीता के बड़े में भी ऐसा ही दवा करते हैं गीता के द्वितीय अध्याय का 27वां श्लोक कहता है जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु अवश्य होगी और जिसकी मृत्यु हुई है उसका जन्म भी जरूर होगा मार्कर स्वर्ग मिलने की बात हो रही इसी अध्याय का 51 वर्ष लोग कहता है की बुद्धिमान मनुष्य कर्म से पैदा होने वाले फलों का त्याग करके जन्म के बंधन से मुक्त होकर परमपद को प्राप्त हो जाते जीवात्मा भले परमात्मा का अंश हो लेकिन उसकी एक पर्सनल आईडी पर्सनल असिस्टेंट के बाद स्वर्ग मिलने की बात हो रही है तभी

20:43 तो मिनीषी यानी बुद्धिमान मनुष्य के जन्म के बंधन से मुक्त होने की बात हो रही है आचार्य प्रशांत जैसा बताते हैं वो कोई हम मृत्यु जैसी आम टेंडेंसी नहीं है अध्याय कर के श्लोक नो में तो स्पष्ट कहा जा रहा है की जो ये जान लेट है की मेरे जन्म और कर्म दिव्या है वो डे को त्यागने के बाद पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता इस लोक में स्पष्ट रूप से बेहद तत्व यानी देहात त्यागने की बात हो रही इसी अध्याय के श्लोक पांच में तो कृष्णा स्पष्ट रूप से का रहे हैं की तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं वहीं चाटे श्लोक में कृष्णा स्वयं अपने पुनर्जन्म की बात कर रहे हैं जिसे हम अवतार बात की तरह जानते हैं की वह साधुओं की रक्षा करने और दोस्तो के विनाश के लिए युग युग में उतार लेते हैं की योग से जो लोग भ्रष्ट हो जाते हैं वह पुण्य कर्म करने वाले लोगों के लोगों को

21:30 प्राप्त होकर वहां बहुत समय रहकर शुद्ध लोगों के यहां जन्म लेते हैं की महात्मा लोग मुझे प्राप्त करके दुखों के घर प्राप्त नहीं होते अब यहां भी इंडिविजुअल के पुनर्जन्म की बात हो रही है नेवी अध्याय का तीसरा श्लोक कहता है की धर्म पर श्रद्धा ना रखना वाले लोग मुझे प्राप्त ना होकर बार-बार इस मृत्यु संसार में लौटते रहते हैं नव्या अध्याय का 21वां श्लोक कहता है की वेदों का आश्चर्य लिए हुए सा कम कर्म करने वाले लोग विशाल स्वर्ग लोक को भोग कर पुण्य छन होने पर मृत्यु लोक में ए जाते हैं 13 अध्याय में तो कृष्णा ऊंची नीची यानी में जन्म का करण भी बता रहे हैं वो कहते हैं की प्रकृति में स्थित पुरुष यानी जीवात्मा प्रकृति जन गुना का भोक्ता बंता है और इसी की वजह से वो ऊंची

22:17 नीची योनियों में जन्म लेट राहत है 15 अध्याय का आठवां श्लोक कहता है की जी तरह व्यू अपने साथ गंदे ले जाति है इस तरह जीवात्मा जी शरीर को त्यागता है उससे मां और इंद्रियों को लेकर नए शरीर में चला जाता है दोस्तों मैंने इतने सारे रेफरेंस दिए हैं जिन्हें आप खुद चेक कर सकते हैं इन सारे रेफरेंस में आचार्य प्रशांत की फिलासफी कहानी भी नहीं है यदि पुनर्जन्म एवं वित्तीय भावना जो की सभी जीवन के आम टेंडर सी है उसका होता है जैसे की अगर पेशाब कहते हैं तो फिर इसके लिए व्यक्ति सूचक संज्ञाओं का प्रयोग क्यों किया गया व्यक्तियों की बात क्यों की गई की जैसे की वो लोग जो फल फल करते हैं उनका यह यह होता है और अगर यह आम टेंडेंसी है तो इसकी किसी व्यक्ति के कर्मों के अनुसार गति कैसे होती क्योंकि व्यक्ति के साथ जो कुछ व्यक्तिगत था वह तो आपके अनुसार मार्कर

23:02 खत्म हो गया अगर आप कहते हैं की यह पुनर्जन्म स्वर्ग नरक जीवन के दौरान ही मां की अवस्था के परिवर्तन को कहते हैं तो फिर बेहद त्यागने की बात क्यों की और फिर ऊंची नीची योनियों की बात क्यों की गई यह साड़ी बातें केवल तभी सेंस बना शक्ति हैं जब आप व्यक्ति के पुनर्जन्म और उसकी कर्मों के अनुसार गति को स्वीकार करें अगर आप हिंदू ग का अध्ययन करें तो वहां आपको यही फिलॉसफी मिलेगी जहां जीवात्मा को परमात्मा का अंश बताया गया लोगों पर माया का पर्दा पड़ा है जिसकी वजह से वो खुद को भोक्ता माने लगती है जिसकी वजह से वह कर्म फलों के अधीन हो जाति है और उसका कर्म फल के अनुसार बार-बार ऊंची नीची योनियों में पुनर्जन्म होता है इससे मुक्ति का रास्ता है की वो अपने असली स्वरूप को पहचाना जब वो पहचान लेती है तो इस जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाति

23:49 इसे ही मुक्ति या मोक्ष कहा जाता है अगर आप इसे ध्यान में रखकर किसी भी हिंदू धर्म ग्रंथ को पढ़ेंगे तो उसकी हर लाइन एकदम परफेक्ट सेंस बनाएगी आचार्य प्रशांत जो व्याख्या की है उसे पर जाएंगे तो हर लाइन पर कंफ्यूज होंगे शाब्दिक अर्थो के साथ छेड़छाड़ करनी पड़ेगी और उन्हें तोड़ मरोड़कर आचार्य प्रशांत की व्याख्या के अनुकूल बनाना पड़ेगा यहां तक की आदि शंकराचार्य भी कच्छ का गए वैसे तो पुराने लोग सही हुए ऐसा कोई जरूरी नहीं है लेकिन अगर कोई कहता है कोई इतना

24:36 बड़ा दवा करता है की सारे गलत है बस साहिब मुझे ही पता है तो उसे दाव को साबित करने के लिए उसे सबूत भी उतना ही बड़ा देना चाहिए एक्स्ट्राऑर्डिनरी क्लेम रिक्वायर्स एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी इवेंट्स लेकिन आचार्य प्रशांत की तरफ से एक्स्ट्राऑर्डिनरी तो छोड़िए बल्कि अभी तक कोई ऑर्डिनरी एविडेंस भी नहीं दिया गया है ऐसा नहीं है की दुनिया में प्राचीन साहित्य सिर्फ हमारे पास है बाकी संस्कृतियों के पास भी असिएंट नॉलेज इंसियेंट विजडम की धरोहर है जैसे पश्चिम के पास ग्रीक फिलॉस्फर्स की एक पुरी परंपरा है जिन्होंने वहां की सभ्यता और संस्कृति की नींद राखी थी और उनका इंस्टेंट लिटरेचर भी काफी रिच पर वो इसे हमारी तरह सर पर उठाई नहीं घूमते वह सोक्रेट्स प्लेटो एरिस्टोटल की गलत सिद्ध हो चुकी बटन को तोड़ मरोड़कर सही सिद्ध करने का प्रयास नहीं करते

25:22 हैं की ज्ञान लगातार विकसित होता है अगर नया ज्ञान पुराने ज्ञान को गलत सिद्ध कर रहा है तो पुराने को कर नए को अपना नीला ही समझदारी परम पुराने को छोड़ते ही नहीं हम उसे ही जोड़ तोड़कर प्रासंगिक बनाने की कोशिश करते रहते हैं क्योंकि इससे हमारा अहंकार जुड़ा की हमारे पूर्वज कभी गलत नहीं हो सकते और इसीलिए मैं कहता हूं की हमसे ज्यादा अपने प्राचीन साहित्य अपनी प्राचीन धरोहर के साथ बदसलू की दुनिया में कोई भी नहीं करता किसी साहित्यकार की रचना के अर्थो को तोड़ना मरोड़ना और उससे वो अर्थ निकालना जो की वहां नहीं है बेईमानी और धूर्त के अलावा कुछ भी नहीं सोचिए आप एक लेखक हो और आपकी किसी रचना के साथ ऐसा कोई करें तो आपको कैसा लगेगा मुझे नहीं पता चेहरे प्रशांत जानबूझकर ऐसा कर

26:08 रहे हैं या अनजाने में पर जो भी है वो गलत है वैसे एक संभावना यह भी बंटी है की वह धर्म ग की आड में लोगों को सही शिक्षा देना चाहते वह चाहते हो की धर्म और धर्म ग में लोगों की आस्था को खत्म किया बिना लोगों को इन सदियों पुरानी मान्यताओं से बाहर लाकर राशनल बनाया जाए पर ऐसा होता नहीं वो शायद आस्था के मनोविज्ञान को नहीं समझते एक आस्थावान अपनी आस्था को बचाने के लिए तिनके के सहारे खोजना राहत है वह सिर्फ उतनी ही बात सुनता समझना है जितने से वो अपनी आस्था के सही होने के लिए

27:12 उन्हें इन्हीं जगह पर और अध्ययन करने की जरूर इस तरह की मीठी गोलियां देने से कोई भी व्यक्ति राशनल नहीं बंता बचपन से बुद्धि पर चढ़ाई गई पर्दों को भेजना के लिए उसे झिंझोदना पड़ता है उसे बार-बार सोने पर मजबूर करना पड़ता है कुछ ऐसा करना पड़ता है ताकि वो अपनी आस्थाओं मान्यताओं पर पुनर्विचार करें रेसनलिटी सही मैनो में तभी आई है जब कोई इंसान खुद से निष्पक्ष होकर चीजों का विश्लेषण करना सिख जाए अपनी आस्थाओं मान्यताओं पर बिना डेयर और विचलित हुए सवाल करना सिख जाए आचार्य प्रशांत जो लोगों को दे रहे हैं वो एक आस्था ही वो का रहे हैं की देखो तुम्हारा धर्म गलत नहीं वो तो बड़ा लॉजिकल और साइंटिफिक है लेकिन लोगों से समझना में थोड़ी सी गलती हो गई हमसे थोड़ा समझना में भूल गई अब जो मैं

27:58 बता रहा हूं वो सही इसलिए [संगीत] होना नहीं शिखा रहे बल्कि नई बैसाखियां ही पड़ा रहे वो सिर्फ थोड़े ज्यादा बेहतर तर्कों से अपने धर्म को डिफेंड करना शिखा रहे और इसीलिए उनका कोई शिष्य कभी खुद को इस काबिल नहीं पाएगा की वो अपने धर्म पर निष्पक्ष होकर सवाल करने का साहस कर सके वो करेगा भी कैसे जब खुद उसका गुरु ही ऐसा नहीं कर का रहा सच्चा गुरु वही है जो अपने केले को इतनी काबिलियत दे की वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके हर जवाब के लिए गुरु का मुंह देखने के बजे खुद से चीजों का विश्लेषण करना सिख सके यहां तक की अगर

28:45 उसका गुरु भी कोई गलत बात कहता है तो उसे भी टॉक सके पर अफसोस आचार्य प्रशांत के चेलों में मुझे ऐसी कोई काबिलियत नहीं दिखती वो बस अपने गुरु की ही बटन को तोता की तरह दऔरते कभी भी उन बटन पर खुला दिमाग से विचार नहीं करते और इसीलिए धर्म की इन वीडियो आचार्य प्रशांत समेत लगभग सभी आध्यात्मिक गुरु एक बात जरूर करते हैं की अहंकार ही शब्दकोषों की जड़ एगो इसे डी रूट ऑफ जो डी इवोल्वेस इन डी वर्ल्ड अगर हमें खुद को और दुनिया को बेहतर बनाना है तो अहंकार का नस करना बहुत जरूरी और वो हर तरह के अहंकार पर खूब चोट करते हैं नथुने फूला-फुला कर

29:31 उनका समूल नस करने की शिक्षा देते हैं लेकिन सिर्फ एक जगह पर आकर उनकी जवान को लकवा मार जाता है बस उसे पर बोलने के लिए उनके पास शब्द नहीं होते बल्कि कमल की बात यह है की वह उसे हर जतन से पोषित करते नजर आते हैं और वो है धार्मिक अहंकार मेरा धर्म सबसे बेस्ट है मेरा धर्म सबसे लॉजिकल है मेरा धर्म सबसे साइंटिफिक जरूर नहीं है हमारे देश के बंटवारे की वजह भी यह धार्मिक आज भी ये अहंकार देश में दो बड़ी कम्युनिटी के बीच नफरत की वजह बना हुआ इन्हीं नफरतों पर राजनीतिक रोटियां से की जा रही सरकारें बन रही हैं और किसी

30:17 स्पिरिचुअल गुरु के पास इस पर बोलने के लिए दो शब्द नहीं है और इसीलिए मैं कहता हूं की अध्यात्म धर्म के मायाजाल का आखरी हटकाना है जो उन लोगों को धर्म के बड़े में घेर रखना में कम आता है जो वाक्य के मुकाबला बौद्धिक रूप से थोड़े बेहतर है जो थोड़े ज्यादा ओपन माइंडेड है जो अच्छे पढ़े लिखे हैं जिन्हें कथा प्रवचनों और कर्मकांडों के जारी धर्म के बड़े में नहीं रॉक जा सकता और इसीलिए आप देख सकते हैं की आचार्य प्रशांत के पास ऐसे ही लोगों की भीड़ इनमें से ज्यादातर आजकल का पढ़ा लिखा यूथ और बड़े दुख की बात है की जाति और अगर उसे ही पुरातन पेंट को धोने और उसे जिंदा रखना पर लगा दिया जाए तो किसी देश के लिए इससे ज्यादा बड़ा कुछ नहीं हो सकता ऐसे देश में कभी कोई क्रांतिक नहीं हो शक्ति पश्चिम देश में

31:02 क्रांतियां हुई है क्योंकि वहां धार्मिक विचारों के उत्तर भी जो विचारक थे उनका भी सम्मान था प्राचीन कल से लेकर वर्तमान तक वहां फ्री थिंकर्स की एक परंपरा देखने को मिलती जैसे सोक्रेट्स प्लेटो एरिस्टोटल कॉपरनिकस गैलीलियो नीत से बटन रीसेल मार्क्स डार्विन आइंस्टीन स्टीफन हॉकिंस रिचर्ड हॉकिंस और ये तो कुछ नाम है जो मुझे याद ए रहे हैं वास्तव में ऐसे हजारों नाम है जिम से क्यों के साथ उसे दूर के पुरातन पंक्तियां ने काफी बड़ा भी किया उन्हें मारा भी गया या अपना भी दी गई लेकिन बावजूद इसके उनके विचार जिंदा रहे और जिसकी वजह सिर्फ एक हो शक्ति है की भले वहां पुरातन पंथ्यों का दबदबा रहा हो लेकिन फिर भी समाज में एक वर्ग ऐसा जरूर था जो इन फ्री थिंकर्स को सम्मान देता तभी इनके विचार इनका लिटरेचर

31:47 सरवाइव कर पाया जबकि हमारे यहां ऐसे विचारक ऐसा साहित्य ढूंढे से नहीं मिलता जो धर्म से इधर कोई विचार रखना पश्चिम में रिलिजियस फिलॉस्फर्स के अलावा भी ऐसे फिलॉस्फर्स खूब देखने को मिलते हैं जिन्होंने धर्म से अलग अपने स्वतंत्र विचार रखें लेकिन हमारे यहां धर्म और फिलॉसफी आपस में गुथे हुए अस्तित्व और जीवन संबंधी जब कोई सवाल हमारे सामने आता है तो हम धर्म से अलग होकर उसे पर विचार कर ही नहीं पाते और यही नहीं अगर कोई धर्म का सहारा लिए बिना हमारे सामने अपने विचार रखें तो हम उसे एक्सेप्ट नहीं कर पाते हमारी ये बीमारी नई नहीं बल्कि सदियों पुरानी तभी तो चारबाग जैसी परंपरा का कोई साहित्य आज तक बरामद नहीं होता फैसला फ्री थिंकर्स को सम्मान दिया है उन्हें एक्सेप्ट किया है यही वजह है की आज के दूर

32:34 के लगभग सभी आधुनिक विचार फिर चाहे वो वैज्ञानिक क्रांति हो आधुनिक शिक्षा तकनीकी शिक्षा लोकतंत्र सब के सब वहीं जन्मे लेकिन यह सब देख कर भी अभी हमने सबक नहीं लिया हम आज भी इस पुरातन पेंट में उलझे हुए और आज भी उसे किसी तरह जिंदा रखना की जुगत में लगे हुए आज भी हम वेदों उपनिषदों में समस्याओं के हाल खोजें अभी हम इतने मैच्योर नहीं हुए हैं की किसी फ्री थॉट को एक्सेप्ट कर सके आज भी अगर हमें कुछ सीखना हो तो हमें वेदों उपनिषदों का हवाला देकर समझना पड़ता है आज भी अगर कोई विचारक अपने विचारों को रखना के लिए वह भी क्या करें वह भी समाज को जानता है की यह अभी कितना इमैच्योर है अगर वेदों उपनिषदों का हवाला दिए बिना उसने कोई बात

33:19 कहीं तो उसे कोई सुनेगा ही नहीं ये एक दुष्चक्र है जिसमें हमारा समाज फस हुआ है रिजेक्शन के डर से बिना वेदों ऑपरेशन के कोई विचार नहीं रखना और जब बार-बार वेदों उपनिषदों का महिमामंडन होता है तो समाज इनके मुंह से बाहर नहीं निकाल पता इस दुष्चक्र को तोड़ने का एक ही तरीका है की विचारों को रिएक्शन के डर और भीड़ जताने के मुंह से बाहर आना पड़ेगा खुशी की बात है की आज सोशल मीडिया की बदौलत इसकी शुरुआत हो चुकी आज काफी लोग हैं जो फ्री थिंकर्स को पढ़ सुन रहे हैं हालांकि अभी संख्या थोड़ी कम है पर यह लगातार बाढ़ रही है अगर अपनी ही बात करूं तो आज जब मैं यह वीडियो बना रहा हूं तो लगभग 6000 लोग हैं जिन्होंने मेरे चैनल को सब्सक्राइब किया हुआ है और यह तब है जबकि आज तक मैंने ₹1 भी प्रमोशन पर खर्च नहीं किया है और ना ही किसी धर्म संप्रदाय का तुष्टिकरण किया है

34:06 मेरे जैसे और भी कई चैनल है जो ऐसा ही कम कर रहे और उनके पास भी सब्सक्राइबर्स की अच्छी खासी संख्या तो जो लोग ऐसा बहन देते हैं की अभी यह समाज इतना मैच्योर नहीं है वो इस तरह के चैनल से सिख सकते हैं कभी एन कभी तो शुरुआत करनी पड़ेगी किसी एन किसी को तो शुरुआत करनी पड़ेगी जितनी डर करेंगे बदलाव की शुरुआत उतनी ही डर से होगी हमारे समाज को मीठी गली की जरूर नहीं है इसे कुछ ऐसा चाहिए जो इसे जोड़े जगे मीठी गोलियां बहुत दी जा चुकी है और परिणाम हमारे सामने आध्यात्मिक गुरु समाज को जागरूक करने के नाम पर मीठी गोलियां ही देते ए रहे तो थोड़ा बहुत बदलाव की उम्मीद भी बंटी है यह उसे पर भी मिट्टी डालकर चले जाते हमारा समाज वैसे भी यह स्थिति वादी

34:53 समाज यह चला रहे किसी जगह तुम इसको नाम कष्ट दे सकते हो कहानी पे नाम क्लास का दे सकते हो कहानी कुछ और बोल सकते हो जातिवाद को क्लास के समाज बता कर ये दिखाने की कोशिश करते हैं की ऐसा भेदभाव दुनिया में कहां नहीं है मतलब वो दिखाना चाहते हैं की देखो यह भेदभाव तो सभी जगह हो रहा है अपार क्लास का बांदा लो क्लास से भेदभाव करता है उसके साथ उठाता बैठता नहीं है उसके घर में शादी नहीं करता मार्केट भी भेदभाव करता है गरीब आदमी

35:39 महंगे रेस्टोरेंट में नहीं ए सकता बहन के शोरूम से शॉपिंग नहीं कर सकता और फिर सिया सुन्नी कैथोलिक प्रोटेस्टेंट में भी भेदभाव है तो यह भेदभाव कहां नहीं है अब जरा ध्यान दीजिए आम आदमी के लिए यहां से क्या मैसेज ए रहा है यही जा रहा है की हम जो कर रहे हैं वो इतना भी बड़ा नहीं हमें जातिवाद पर ज्यादा शर्मिंदा होने की जरूर नहीं हम कोई दुनिया से हटकर कोई अनोखा कम नहीं कर रहे साड़ी दुनिया ऐसी तो है पुरी वीडियो में इसी तरह के तारक देकर मुद्दे को डाइल्यूट करने का प्रयास किया गया है और सॉल्यूशन के नाम पर कुछ नहीं शिवा को समझना और अपने केवल यही नहीं वो दुनिया की हर समस्या के लिए को ही समाधान की तरह प्रस्तुत करते हैं जैसे मानो यही हर मर्द की दवा हो अध्यात्म वीडियो के साथ यही तो दिक्कत है वह मुझे आदर्श ऊंचे लक्षण की बातें करते

36:26 एक जादू समाधान जो साड़ी समस्याओं को चुटकी बजाते ही खत्म कर देगा उनकी साड़ी चर्चा को कैसे अचीव किया जाए उसका कोई रोड मैप इनके पास नहीं होता ओशो के शब्दों में कहूं तो वो मंदिर के शिखर की चर्चा करते हैं लेकिन मंदिर की नीव कैसी राखी जाए इसकी ना कोई चर्चा होती है और ना ही कोई प्लानिंग आप खुद सोचिए मंदिर का शिखर भले ही कितना सुंदर और भाव हो बिना नेम रखें क्या उसे बनाया जा सकता अच्छी-अच्छी लुभावनी बातें की जा शक्ति और यही वजह है हमारे देश में ऊंचे आदर्श की सिर्फ बातें होती हम सिर्फ बातें करके ही अपने कर्तव्य की धरातल पर कुछ भी नहीं बदलते समस्या पहले

37:12 की ही तरह मोबाइल खड़ी रहती है दुनिया के इतिहास से हमने इतना भी नहीं शिखा की सभ्यताएं कई पड़ाव से होती हुई विकसित होती यह विकास चरण बैंड होता है एक ही जादुई समाधान से दुनिया में आज तक कोई सभ्यता साड़ी बुराइयों से मुक्त होकर ना विकसित हुई है ना हो शक्ति हमें यह भी समझना पड़ेगा की धरातल पर कोई बदलाव होने से पहले कोई भी सभ्यता एक के गहरी विमर्श से गुजराती क्या सही है और क्या गलत है इस पर वहां लगातार एक सोशल रिस्पांस चला है तब कहानी जाकर कोई क्रांतिक होती है कोई क्रांति घटित हो सके इसके लिए सबसे पहले कम है समस्या या बुराई को पहचाना और उसे बार-बार सोशल दिस कोर्स में लाना इसके लिए बड़े साहस की जरूर पड़ा है लेकिन यह अध्यात्म वादी कभी यह साहस नहीं दिखा सकते वो सिर्फ मुद्दों को डाइल्यूट कर सकते हैं जैसा आचार्य प्रशांत यहां कर रहे हैं

37:57 आचार्य प्रशांत जातिवाद को बाकी सामाजिक भेदभावों के बराबर बोल रहे हैं जबकि जातिवाद पुरी दुनिया में एक ऐसा अनोखा सिस्टम है जहां कोई भी व्यक्ति जन्म से ही नीचे हो सकता है और यही नहीं फिर वो चाहे जीवन में कितने ही प्रयास कर ले चाहे कितनी ही ऊंची से ऊंची शिक्षा ले ले चाहे कितना भी धन काम ले चाहे कितना भी बड़ा सामाजिक योगदान दे दें वो कभी ऊंचा नहीं हो सकता समाज में उसकी स्थिति निकली ही रहेगी ऐसे कई उदाहरण मौजूद है जहां एक तथाकथित नीचे जाति के ऑफिसर का एक तथाकथित ऊंची जाति के चपरासी ने अपमान किया दलित के उत्पीड़न का एक लंबा इतिहास है और आज भी दलित के उत्पीड़न के कैसे हर साल भर रहे हैं जातिगत भेदभाव की जेड हिंदू धर्म में मौजूद और कमल की बात है की आज भी कई धर्मगुरु इसे खुला आम पोषित करने का कम कर

38:43 रहे हिंदू धर्म पुरी दुनिया में एकमात्र धर्म है जो अपने ही लोगों के साथ भेदभाव करता है इस पर जब बात की जाति है तो आचार्य प्रशांत उपनिषदों का नाम लेकर इसे डिफेंड करने की कोशिश करते हैं वो कहते हैं की उपनिषदों में दिखाओ कहां जाति है जबकि हकीकत यह है की हिंदू धर्म की पुरी फिलासफी इस जातिवाद को और जस्टिफाई करने और जो निकली जातियां हैं उन्हें इस भेदभाव के लिए तैयार करने का कम करती है ये फिलासफी कहती है की हमें हमारे कर्मों के अनुसार यानी मिलती है अच्छे कर्म करने वाले क्यों नहीं में जाते हैं बुरे कर्म करने वाले निकली यानी में अगर आप निकली जाति में पैदा हुए हैं तो इसमें दोष आपके पिछले जन्म के कर्मों का है जो ऊंची जाति में पैदा हुए हैं वो अज्ञानी गनहीन होकर भी पूजनीय क्योंकि वह पुण्य आत्मा है तभी तो उनका जन्म ऊंची जाति में हुआ है और आपको बता डन की उपनिषद भी इस फिलासफी से

39:29 छूट नहीं क्योंकि यह हिंदू धर्म की कर फिलासफी है लेकिन इस पर कोई मतभेद नहीं आचार्य प्रशांत कहते हैं की उपनिषदों में जातिवाद नहीं है उसको कैसे जाना जाए जीवन मरण से कैसे मुक्त हुआ जाए उनका फॉक्स यहां पर वहां समाज की बात ही नहीं तो जब वह उनका सब्जेक्ट ही नहीं है तो वहां पर जातिवाद इतना क्लीयरली जैसा की बाकी ग में दिखता है यह तो कुछ ऐसी बात हुई की इतिहास की किताबें में मठ के फार्मूले ढूंढ के दिखाओ पर बावजूद इसके हमें ऑपरेशन में जाति व्यवस्था के दर्शन हो जाते हैं जैसे छंदों के उपनिषद के अध्याय 5 के खंड 10 का सातवां मंत्र जाति व्यवस्था को एकदम क्लीयरली दिखता है ये मंत्र कहता है की जो आचरण वाले जीव होते

40:16 हैं वह उत्तम योनियों ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य को प्राप्त होते हैं और जो अशुभ आचरण वाले होते हैं वह अशुभ यानी हो जैसे कुत्ते सूअर और चांडाल को प्राप्त होते हैं की प्रथम वाली का सातवां और आठवां मंत्र बताता है की ब्राह्मण अतिथि का सम्मान किस तरह किया जाना चाहिए जिसे ना करने पर क्या-क्या दुष्परिणाम भगत नहीं पद सकते गीता के तीसरी अध्याय का 35 वर्ष लोग कहता है की अच्छे आचरण वाले दूसरे के धर्म से गन रहित अपना धर्म श्रेष्ठ अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारी शुरुआती वास्तव पर ठप्पा लगा रहे यह कहकर की कर वर्णों की रचना उन्हें द्वारा श्लोक में वो कहते हैं की मेरी शरण में आकर तो ये जो है पाप यानी स्त्री वैश्य शुद्ध भी परम गति को प्राप्त हो जाते हैं

41:02 मतलब यहां तो स्त्री वैश्य शूद्रों को भी पाप यानी यानी अशुभ कर्मों से जो यूनी प्राप्त होती है वो बता दिया गया है खाने का मतलब ही जाति व्यवस्था की जेड हमें उपनिषदों में भी देखने को मिल जाति है आचार्य प्रशांत का यह दवा की उपनिषदों में जाति विवाद नहीं है एकदम गलत है और जी तरह वो अपने तर्कों से इस बेहद महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे को डाइल्यूट करने की कोशिश करते हैं वह हमारे समाज के लिए अच्छा नहीं उनका यह प्रयास एक सामाजिक क्रांति जो हमारी संस्कृति पर लगे इस बदनुमा दक को दो शक्ति है उसे रोकने उसे पर मिट्टी डालने का ही कम करता है अफसोस यह की ऐसे लोग युवाओं के आइडियल बन जाते तो होना चाहिए जो की क्रांतिकारी विचारों वाला निडर हो बहादुर हो जो रूढ़ियों को

41:48 तोड़े नहीं सोच को बढ़ावा दें समाज को पुरातनपान से आजाद करें ना की कोई डरपोक जो धर्म के खिलाफ मुंह खोलना से डेयर और लोगों को खुश करने के लिए नए-नए तर्कों से इस पुरातन पेंट को पूरा संगीत सिद्ध करने की कोशिश करें आचार्य प्रशांत तो लगता है हिंदू धर्म की हर वैज्ञानिकता विश्वास और रूढ़िवाद को प्रासंगिक बनाने का ठेका लिया है प्रकृति में जो सबसे बड़ा तो हमको दिखाई पद सकता है हनुमान जाकर के सीधे इस को जीत ले प्रकृति को जीत लेना जरा सोचिए क्या इस तरह के तर्कों से दुनिया के सभी धर्म की वैज्ञानिक और मुक्त पूर्ण बटन को सही सिद्ध नहीं किया जा सकता मुझे तो यह सीधे तोर पर संगठित धर्म के

42:34 प्रति जो आजकल के युवाओं में जो विद्रोह पर अपर है उसे ही दबाने की कोशिश लगती है इसका सीधा सा उद्देश्य की हम तुम्हें इन मूर्खताओं इन पुरातनपान से आजाद नहीं होने कवि चमत्कार हो तो कभी कभी अध्यात्म के नाम पर हम तुम्हें इसी में उलझा कर रखेंगे तुम्हारी सोच को कभी आजाद नहीं होने देंगे तुम्हें कुछ नया नहीं सोने देंगे युवाओं के आइडियल होने चाहिए भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी जो ये जानते हुए भी की कोई स्वर्ग नहीं है कोई पुनर्जन नहीं है फिर भी अपने पवित्र उद्देश्य के लिए इतने समर्पित थे की हंसते हुए फैंसी के फंडे पर झूम गए लेकिन आचार्य प्रशांत ने उनको भी नहीं छोड़ उनके महान बलिदान से युवाओं को मिल सकते वाली प्रेरणा को भी यह कहकर डाइल्यूट कर दिया की वह पुरी तरह से भौतिक वादी नहीं थे

43:20 जबकि भगत सिंह का जय में लिखा हुआ लेख मैं नास्तिक क्यों हूं अपने आप में इतना क्रांतिकारी है की यदि कोई युवा उसे पढ़े तो वो उसे प्रभावित हुए बिना नहीं र सकता वो हमारे दिमाग के तमाम झलों को बहुत आसानी से साफ कर सकता है लेकिन अगर आचार्य प्रशांत की इस वीडियो को देखकर कोई उसे पड़ेगा तो शायद उसके भीतर वो क्रांतिक ना हो जो पहले हो शक्ति थी क्योंकि ये वीडियो क्रांति के जनों पर मट्ठा डालने के लिए ही बनाई गई है कुछ तो होगा ना जो भौतिकता से ऊंचा होगा जिसके लिए तुम अपनी भौतिकता निछावर कर रहे हो मैन तो मां रहे हो ना की इस भौतिक शरीर से ऊंचा कुछ होता है भगत सिंह ने उसे ऊंचे लक्ष्य को नाम दिया था आजादी जैसा की मैंने इस वीडियो को शुरू में ही बताया था धार्मिक लोग कॉग्निटिव शिकार होते हैं वो अपनी आस्था को बचाने के लिए तीन के सहारे खोजने रहते हैं

44:08 यहां पर आचार्य परेशान का यह कहना की कुछ तो था जिसे भगत सिंह इस भौतिकता से ऊपर मानते थे यह धार्मिक लोगों को अपनी आस्था को बचाएं रखना के लिए एक बहुत बड़ा सहारा है वह जा सुनकर निश्चित होकर सो सकते हैं और यही तो आचार्य प्रशांत समेत सभी आध्यात्मिक गुरु चाहते हैं की लोगों को मीठी गोलियां देकर आराम से सोनी दिया जाए लोगों के दिमाग में यदि किसी वजह से धन के प्रति कोई संदेह का स्कूल करता भी है तो अपने लक्ष्यदार तर्कों से उसका शमन करके उसे वापस सुला दिया जाए की टेंशन मत लो हमने सब चेक कर लिया है थोड़ी सी समझना में गलती हुई है बाकी सब बढ़िया है सब चंदा सी जो इसे वेल सो जो आराम से अल में सभी के अंदर अपने धर्म अपनी सभ्यता अपनी संस्कृति को श्रेष्ठ साबित करने की एक छह होती यह छह हमारे अंदर भी लेकिन जब हम आज के दूर में इसे साबित करने की कोशिश करते

44:53 हैं तो हमें वर्तमान में ऐसी कोई उपलब्धि नहीं दिखती जिसे दिखाकर हम अपनी श्रेष्ठ को साबित कर सकें प्रेजेंट में तो जो कुछ भी है फिर चाहे वो डेमोक्रेसी हो या फिर केपीटलाइज्म या फिर इंटरनेशनल या फिर साइंटिफिक रिवॉल्यूशन सिस्टम जो भी वैसे आए भले ही आज हम सब इसके मजे ले रहे हैं लेकिन इनके जारी यदि हम खुद को बेहतर साबित करने की कोशिश भी करें तो भी जीत पश्चिम के सिद्धांतों की होगी लिहाजा हम खुद को धोखा देने के लिए एक झूठ करते हैं की भारत का पुरातन ज्ञान दुनिया में सबसे श्रेष्ठ है हमारे पुरातन सिद्धांत ही वास्तव में विश्व का कल्याण कर सकते हैं आज दुनिया में जो भी खराबी है वह हमारे पुरातन सिद्धांतों को नापने की वजह से अगर दुनिया ने अपना ले तो ये दुनिया बेहतर हो शक्ति है हालांकि हम इतना भी नहीं सोचते की अगर ऐसा है तो यह सिद्धांत हमारा

45:40 कल्याण क्यों नहीं कर सकते क्यों हम सैकड़ो सालों तक गुलाम रहे आज भी हम इन साड़ी गली सिद्धांतों को नए नए लेवल चिपका कर बेचे की कोशिश कर रहे इनकी अलग तरह से व्याख्या करके इनकी प्रासंगिकता साबित करने की कोशिश कर रहे पश्चिम से आई हुई प्रगति का पूरा फायदा उठाते हुए भी हम आज इन पश्चिम सिद्धांतों में कीड़े निकाल रहे हैं और अपने सिद्धांतों को उनसे श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश कर रहे यह कुछ ऐसा है जैसे कोई हकीम अपने नुस्खे को हर बीमारी का रामबन इलाज बताते हुए प्रचार करें जबकि खुद उसका जीवन अंग्रेजी दवाइयां के सहारे चल रहा दोस्तों अगर वास्तव में हमें खुद को और अपने देश को आगे बढ़ाना है तो हमें इन बेवकूफियां से जितनी जल्दी हो सके आजाद होना होगा हमें सच्चाई का सामना करना होगा भले सच्चाई कितनी ही कड़वी हो सबसे मुंह

46:26 चुराना खुद को तसल्ली देने के लिए कल्पनाओं के हवाई के लिए खड़े करना हमें कहानी नहीं लेकर जाएगा आचार्य प्रशांत को सुनने वाले लोग ज्यादातर पड़ी लिखी हुआ है इसलिए मेरी चिंता और भी ज्यादा है क्योंकि वही है जो इस देश की दिशा और दिशा को बादल सकते हैं इसलिए उन्हें इस लुभाब ने झूठ से जितना जल्दी हो सके मुक्त होने की जरूर है पश्चिम ने इनको आतंक सिद्धांतों से पीछा छुड़ाया तभी वहां विकास हुआ तभी वहां विज्ञान और लोकतंत्र की दोस्तों आज हमारे देश को आजाद हुए 75 साल पूरे हो चुके हैं इस बीच एन जान कितनी पीडिया जवान हो चुकी लेकिन आज भी 21वीं साड़ी में हम लोग इस पुरातनपान को धोरे बल्कि जैसे-जैसे हमारी आर्थिक संपन्नता बड़ी है हम और जोर शोर से इस पुरातन पेंट का समर्थन करने मुझे की बात है की आधुनिक विज्ञान के दिए हुए साधनों से ही पुरातन पेंट और पुंगापंथ

47:13 का प्रचार किया जा रहा है दोस्तों इस षड्यंत्र को समझिए ये हमारी भाभी पीडिया को बर्बाद कर देगा हमारी और हमारे देश की भलाई इसी में है की हम जितना जल्दी हो सके इस सबसे पीछा चुडा लेने इसके अलावा कोई और रास्ता नहीं है और अंत में मेरी बटन से यदि किसी को तकलीफ पहुंची हो तो उसके लिए मैं माफी मांगता हूं हो सकता है इस वीडियो को देखकर आपको गुस्सा आए लेकिन मैं कहूंगा की कमेंट में कुछ भी अनौप्शन आप लिखने के बजे यदि वीडियो में कहानी भी किसी बात को आप तारक से काटेंगे तो मुझे अच्छा लगेगा मेरी पुरी कोशिश रहेगी की ऐसे कमेंट्स का मैं जवाब डन आपने इस वीडियो को अंत तक देखा इसके लिए मैं आपका आभारी हूं वीडियो अगर अच्छा लगा हो तो उसे लाइक जरूर कीजिएगा और अगर आपको लगे की ये बातें और लोगों तक भी पहुंचनी चाहिए तो इसे शेर भी कर दीजिएगा अगर आप चैनल को सपोर्ट करना चाहते हैं तो उसकी जानकारी डिस्क्रिप्शन में मौजूद तो मिलते हैं जल्दी एक नई

47:58 वीडियो तब तक के लिए गुड बाय और टेक केयर [संगीत]

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