Acharya Maan Vijaniyan 1989-(07-11-89)#vrindavanrassiddhant #jagatguruttam Shri kripalu Ji Maharaj

Vrindavan Ras Siddhant www.youtube.com

संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो गुरु और भगवान के बीच के संबंध पर केंद्रित है, जिसमें यह बताया गया है कि कैसे शास्त्रों में इनके स्थान को लेकर अलग-अलग बातें कही गई हैं। यह स्पष्ट किया गया है कि गुरु, भगवान की कृपा से ही शक्ति प्राप्त करते हैं और भक्तों के लिए भगवान तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। वीडियो में गुरुओं के विभिन्न प्रकारों और भगवान के विभिन्न स्वरूपों का भी वर्णन है, और यह निष्कर्ष निकाला गया है कि गुरु और भगवान वास्तव में एक ही हैं।

मुख्य बातें:

  • गुरु भगवान की कृपा से शक्ति प्राप्त करते हैं।
  • गुरु भक्तों के लिए भगवान तक पहुंचने का मार्ग हैं।
  • गुरु और भगवान वास्तव में एक ही हैं।

श्लोक का अर्थ

आचार्य मामित द्वारा बताए गए एक श्लोक के अर्थ पर चर्चा की गई है, जिसे भगवान श्री कृष्ण ने भागवत में स्वयं कहा है। यह श्लोक गुरु के महत्व को बताता है और भगवान और गुरु के बीच के संबंध को स्पष्ट करता है। शास्त्रों और वेदों में भगवान और गुरु के विषय में कई बातें लिखी गई हैं, जिससे लोगों में अक्सर भ्रम पैदा होता है।

भगवान और गुरु में संबंध

शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान से बड़ा कोई नहीं है और न ही कोई उनके बराबर हो सकता है। वहीं, दूसरी ओर, यह भी कहा जाता है कि भक्त और गुरु का स्थान भगवान से ऊंचा है। नारद जी ने भी कहा है कि भगवान और गुरु में कोई भेद नहीं है। इन विरोधाभासी बातों के बीच, यह निश्चय करना मुश्किल है कि भगवान बड़े हैं, गुरु छोटे हैं, या दोनों बराबर हैं।

गुरु का स्वरूप

गुरु कोई और नहीं, बल्कि हम में से ही एक है जो भगवान की शरणागति स्वीकार कर लेता है। भगवान की कृपा से उसे शक्ति मिलती है, और वह सच्चित आनंद से परिपूर्ण हो जाता है। गुरु को जो भी सचित आनंद या आठ गुण मिलते हैं, वह भगवान की कृपा से ही मिलते हैं।

गुरुओं के प्रकार

गुरुओं में कई कक्षाएं होती हैं, जैसे प्रेमा भक्ति का गुरु, स्नेह भक्ति का गुरु, मान भक्ति का गुरु, आदि। इसी प्रकार, भगवान के भी अनेक स्वरूप हैं, जैसे ब्रह्म, परमात्मा, भगवान, आदि। रस के आधार पर इनमें अंतर होता है।

भगवान की प्राप्ति का नियम

भगवान का एक नियम है कि वे सीधे जीव से संपर्क नहीं रखते। उनकी प्राप्ति के लिए किसी गुरु की शरण में जाना आवश्यक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि गुरु ही हमें अज्ञान से मुक्ति दिलाकर ज्ञान प्रदान करते हैं। वेद भी गुरु के माध्यम से ही समझने योग्य हैं।

ज्ञान का महत्व

ज्ञान हो जाने के बाद उस पर अज्ञान का अधिकार कभी नहीं हो सकता। भगवत प्राप्ति का अर्थ है कि जिस क्षण में जीव को भगवत प्राप्ति हुई, वह सदा के लिए हो गई। माया का अधिकार भगवान और भगवत प्राप्त महापुरुष पर नहीं हो सकता।

गुरु की आवश्यकता

हमें सबसे पहले अपने अज्ञान को समझना है और ज्ञान को प्राप्त करना है। यह सब गुरु के द्वारा ही संभव है। गुरु हमारी बिरादरी का होता है, इसलिए वह हमारे दुखों को समझता है। भगवान तो सदा आनंद में हैं, उन्हें हमारे दुखों का क्या पता?

गुरु का अनुभव

जो स्वयं रोगी रहा हो, वही किसी का इलाज कर सकता है। गुरु को हमारे क्लास का सब अनुभव होता है, इसलिए वह हमारे दुख को समझकर उसी के अनुसार हमारी मदद करता है। भगवान से हमारा लाभ तभी होगा जब हम उन्हें समझ पाएंगे, और यह गुरु के बिना संभव नहीं है।

गुरु और भगवान की समानता

भगवान कहते हैं कि वे तभी साथ देंगे जब हमारा अंतःकरण शुद्ध हो जाएगा। यह सारा काम गुरु ही करता है। भगवान तो बने-बनाए के साथी हैं। गुरु ही हमें शुद्ध करके भगवान के योग्य बनाते हैं।

गुरु का स्थान

गुरु ही प्रारंभ से लेकर अंत तक हमारे साथ रहते हैं। दिव्य प्रेम दान और दिव्य शक्ति भी गुरु के द्वारा ही मिलती है। वेदों और शास्त्रों में गुरु और भगवान को बराबर मानकर या केवल गुरु की भक्ति करने की बात कही गई है, लेकिन केवल भगवान की भक्ति नहीं हो सकती। इसलिए, अपने मतलब के दृष्टिकोण से गुरु का स्थान ऊंचा है।

आचार्यम मामिया

भागवत में श्री कृष्ण कहते हैं कि आचार्य को मुझसे बड़ा, छोटा या बराबर न मानो, बल्कि ऐसा मानो कि मैं ही हूं। गुरु ही भगवान हैं। महापुरुष इसलिए महापुरुष कहलाता है क्योंकि जब तक वह शरणागति करता है, तब तक वह अपना अलग अस्तित्व रखता है, लेकिन पूर्ण शरणागति के बाद वह भगवान के समान हो जाता है।

महापुरुष का कर्म

जब महापुरुष हो गया तो उसका मतलब है कि अब कुछ करना बाकी नहीं है। फिर भी, सारे महापुरुषों ने सब प्रकार के कर्म किए। यह उन्होंने नहीं किया, बल्कि गुरु घंटाल ने किया है। जब जीवात्मा परमात्मा की ओर सन्मुख हो जाती है, तो माया भाग जाती है, और भगवान गवर्नर हो जाते हैं।

भगवान का कार्य

महापुरुष का कार्य भगवान का कार्य होता है। भगवान कहते हैं कि आचार्य को मुझसे पृथक न मानो। मैं ही उसके प्राकृतिक शरीर में आचार्य रूप में बैठ जाता हूं। जैसे किसी को भूत लग जाता है, वैसे ही जब नंदपूत लग जाता है महापुरुषों को, तो नंदपूत ही वर्त करता है।

गुरु और भगवान एक

गुरु और भगवान एक ही हैं। यही इस वीडियो का आशय है।

Summarize any YouTube video in seconds

Get summaries like this one for any video, in your language, with the free Summ app.

Download on the Apple Store
Get it on Google Play

Transcript

YouTube Transcript Generator

0:01 ने प्रस्ताव किया है कि आप लोग प्रार्थना में श्लोक बोलते हैं आचार्य मामिया इसका अर्थ बता दे संक्षेप में अर्थ समझ लो भगवान श्री कृष्ण ने भागवत में स्वयं इस श्लोक को कहा आचार्य मामित नम बुद्ध सर्व देव मयो गुरु गुरु के विषय में श्री कृष्ण बता रहे हैं

0:48 गुरु का स्थान क्या है यानी भगवान और गुरु के विषय में जो अनेक प्रकार की बातें शास्त्रों वेदों में लिखी हैं। उससे भोले भाले लोगों को बहुत कंफ्यूजन होता है। कोई डिसीजन नहीं ले पाते। शास्त्रों वेदों में यह भी लिखा है कि भगवान से बड़ा कोई नहीं होता। और भगवान के बराबर भी कोई नहीं हो सकता। न समस्या दते वेद कह रहा है कि ना भगवान के बराबर कोई हो सकता है ना भगवान से बड़ा कोई हो

1:35 सकता है इसी बात को गीता में भी कहा नत समो कु और कॉमन सेंस से जब हम लोग सोचते हैं तो ठीक भी है उसका नाम ही ब्रह्म है महतो महान सबसे बड़े से बड़ा जो हो जिससे बड़ा कोई ना हो य परम ना परम किंचित यज वही भगवान है किंतु दूसरी बात यह भी कही जाती है शास्त्रों वेदों में कि भक्त का स्थान गुरु का स्थान भगवान से

2:22 ऊंचा मोते अधिक संत कर लेखे राम ते अधिक राम कर दाता अनेक स्त्रों पर गुरु के लिए ऐसे शब्द लिखे गए हैं कि वो भगवान से बड़े और तीसरी बात यह भी लिखी गई है कि यस देव परा भक्त यथा देव तथा गुरु तसते कथिता यथा प्रकाशते महात्म वेद कहता है जैसी भक्ति भगवान श्री कृष्ण के प्रति हो वैसी ही भक्ति गुरु के प्रति होनी चाहिए यानी बराबर तस में सजने भेदाभाव

3:08 भगवान के अवतार नारद जी ने भी यही कहा कि भगवान और गुरु में कोई भेद नहीं है ये अनेक प्रकार की बात हो गई हम क्या निश्चय करें भगवान बड़ा है, गुरु छोटा है कि गुरु बड़ा है, भगवान छोटा है कि दोनों बराबर है। तीन में कोई ना कोई बात होगी। सभी ठीक है। वैसे तो भगवान बड़ा है। ये तो ठीक ही है। आप समझ ही गए होंगे। और दूसरी प्रकार से समझ लीजिए और कि गुरु नाम की जो चीज है वो क्या है? हम ही लोग तो है हम ही लोगों में से कोई

3:57 गुरु बन जाता है। कैसे बन जाता है? उसने सरेंडर कर लिया। भगवान की शरणागति स्वीकार कर ली। 10% तो भगवत कृपा हो गई। तो भगवान ने अपनी शक्ति दे दी। जो तीन शक्तियां भगवान के पास बड़ी बड़ी है सच्चित आनंद वो हमारे पास भी है क्योंकि हम उनके अंश है लेकिन थोड़ी थोड़ी लिमिट में है जैसे समुद्र की एक बूंद हमारा ज्ञान हमारा आनंद हमारा जीवन सब लिमिटेड है बहुत थोड़ी सी मात्रा का है जब भगवत कृपा हो गई तो अनंत जीवन क्योंकि ये शरीर की बीमारी समाप्त हो गई।

4:43 अब दह मिलेगा सदा के लिए मिल गया। ज्ञान भी अनंत मात्रा का मिल गया। वो सर्वज्ञ हो गया। महापुरुष आनंद भी वो अनलिमिटेड हैप्पीनेस अनंत आनंद जो प्रेमंद है जिसमें भगवान सदा लीन रहते हैं वो भी मिल गया। भोग मात्र साम लिंग इस वेदांत सूत्र के अनुसार सोते काम ब्रह विपिता जिस आनंद में भगवान सदा है उसी आनंद में वो जीव वि लीन हो गया वही तो गुरु है तो ये जो गुरु को सचित आनंद का या यू समझ लो आठ गुण का जो भी ये सामान मिला ये भगवान की कृपा से

5:32 ही को मिला है। अगर मान लो दे भी दिया है भगवान ने और कल को उनको मौज में आवे छीन ले तो गुरु जी कहां जाएंगे? तो जीरो बटे 100 हो जाएंगे। ऐसी लीलाएं भगवान ने की है। आप लोगों ने तमाम इतिहास में सुना है, पढ़ा है। ये जो बड़े-बड़े राक्षसों के आप नाम सुनते हैं। रावण है, कुंभकरण है, शिशुपाल है, दंतभक्त है। ये सब राक्षस कौन थे? ये सब भगवान के पार्षद लोग थे। गुरुओं में बहुत सारे क्लास होते हैं। वैसे तो गुरु शब्द का इतना ही अर्थ है जिसने भगवान को प्राप्त कर लिया वो गुरु

6:19 हो गया महापुरुष हो गया लेकिन उनमें बहुत सारी कक्षाएं हैं। प्रेमा भक्ति का गुरु, स्नेह भक्ति का गुरु, मान भक्ति का गुरु, प्रणय भक्ति का गुरु, राग भक्ति का गुरु, अनुराग भक्ति का गुरु, भावा देश भक्ति का गुरु, महाभाव भक्ति का गुरु, अनेक कक्षाएं हैं गुरुओं में। उसी प्रकार जैसे भगवान की भी अनेक कक्षाएं मैंने आप लोगों को बहुत बार बताई है। वह ब्रह्म भी है, परमात्मा भी है, भगवान भी है। वो महा विष्णु का स्वरूप भी उसका है, द्वारिकाधीश का स्वरूप भी उसका है, मथुराधीश का भी उसका है और वृंदावन का भी उसका है। लेकिन एक से एक अधिक रस वैलक्षण

7:06 से अस्तर हो जाता है। कोई दो चार भगवान नहीं लेकिन रस लक्षण से जैसे एक गन्ना आप लोग देखते हैं गन्ना ईख तो गन्ने से आप लोग क्या मिलता है मिठास गन्ने को चूसते हैं लोग या रस निकाल के पीते हैं कैसा लगा मीठा अब उसका गुड़ बन गया और मीठा हो गया अब उसकी शक्कर बन गई और मीठा हो गया अब उसकी चीनी बन गई और मीठी हो गई। अब उसकी मिश्री बन गई और मीठी हो गई। तो चीज तो एक ही है लेकिन उसकी

7:51 विलक्षणता विशेषता बढ़ती जाती है। ऐसे ही गुरु का मतलब हो ये तो सिद्ध है। माया की निवत्त हो गई। दोष पंच क्लेश पंच को सब समाप्त हो गए। सदा को आनंद में हो गया। फिर भी रस से यह सब अंतर उसमें होते हैं। तो भगवान बड़ा है तो ठीक ही है। यह भी ठीक है। और गुरु बड़ा है यह भी ठीक है। ये कैसे ठीक है जी? इस तरह से ठीक है कि भगवान का एक कानून है। मैं डायरेक्ट जीव से कॉन्ट नहीं रखता शरणागति की। वैसे तो मैं प्रत्येक जीव के प्रत्येक क्षण के प्रत्येक आइडियाज को नोट करता

8:38 हूं। ये महापुरुष का नहीं गुरु का नहीं ये भगवान का है। लेकिन मुझको प्राप्त करने के लिए किसी गुरु की ही शरण में जाना होगा। ये एक आकाट के नियम है भगवान का। क्यों है भगवान जाने? एक नियम बना दिया उन्होंने कि भाई महापुरुष के द्वारा ही मुझको प्राप्त कर सकता है कोई। और अगर आप लोग जानने चाहते हैं क्यों बना दिया तो बता भी दे इसलिए बना दिया कि भगवान कहते हैं भाई देखो मैं तो तुम लोगों को मिलूँगा नहीं तुम लोग पहले ये जानना चाहोगे भगवान कौन है मैं कौन हूं माया कौन है ये इंद्रिय मन

9:28 बुद्धि क्या है शरीर क्या है संसार क्या है संसार में जो सुख मिलता है वह क्या है ये तमाम बातें जो अज्ञान संबंधी आपके मस्तिष्क में भरी हुई है अनादि काल से ये सब समझना ठीक ठीक ये कौन समझाएगा अगर आप कहे कि साहब भगवान ने वेद में समझा दिया है हमें गुरु की आवश्यकता नहीं तो भगवान ने ही वेद में कहा है कि मेरे वेद को कोई पढ़ना मत वरना सब उल्टा हो जाएगा वो भी तुमको को गुरु के द्वारा ही समझना पड़ेगा। चाहे वेद की किताब लेके गुरुजी समझावे और चाहे वेद को ना छुए ऐसे ही समझा दे। उनके पास तो ज्ञान है ही है। उनको वेद

10:17 की आवश्यकता नहीं है कि वो पढ़े। क्योंकि ज्ञान हो जाने के बाद उस पर अज्ञान का अधिकार कभी नहीं हो सकता। एक बार ज्ञान हुआ सदा को हो गया। एक बार आनंद मिला किसी को तो उस पर दुख का अधिकार कभी नहीं हो सकता। वो सदा को मिल गया। आप लोग बोलते हैं ना कल बड़ा आनंद आया। कल आनंद आया आज तो बोर हो गए। कल आनंद आया आज बोर हो गए। तो आनंद धोखा है। आनंद तो ऐसा होता है जिसके ऊपर अनंत काल तक दुख का अधिकार ना हो सके। कोई सुख लिक जिन सपने

11:04 स्वप्न में भी अगर वो वास्तविक सुख का एक आभास मिल जाए तो दुख की हिम्मत है तो सामने आवे ये भगवत प्राप्ति का मतलब ये होता है कि जिस क्षण में जीव को भगवत प्राप्ति हुई सदा को हो गई ऐसा नहीं है कि वो 10 महीने 10 साल द युग के लिए हुई है। उसके बाद फिर वो संसार में भव बंधन में आएगा। ऐसा नहीं तो उसी प्रकार जब माया का अधिकार ही नहीं हो सकता भगवान के ऊपर तो फिर भगवत प्राप्त महापुरुष पर कैसे होगा? इसलिए भगवान संबंधी आनंद पर दुख का अधिकार नहीं होगा। इसलिए भगवान संबंधी ज्ञान पर अज्ञान का अधिकार नहीं

11:51 होगा। यानी यह सब विषय नित्य है, सनातन है, शास्त्र है। एक बार मिल जाए सदा को मिल जाता है। तो ज्ञान तो सदा हो गया महापुरुष को। अब तो ऐसा है नहीं कि वेद पढ़े, शास्त्र पढ़े, पुराण पढ़े, हां, एक्टिंग में ऐसा भी किया है महापुरुषों ने। स्वयं भगवान ने किया है। गुरु गृह पढ़ गए रघुराई अवल्प काल विद्या सब पाई। श्री कृष्ण भी पढ़ने गए थे। राम भी पढ़ने गए थे। ये पढ़ने गए थे। क्या पढ़ने गए थे? का ख ग ये सब पढ़ने गए थे। बाकायदा

12:38 पट्टी लेकर कैसे लग रहे होंगे जिनकी कृपा से समस्त ज्ञान सर्वेंट बनकर हाथ जोड़े खड़े रहते पढ़ने जा रहे ऐसे महापुरुषों ने भी तमाम ने किया है एक्टिंग भगवान ने गुरु बनाया भी एक्टिंग देखो संतों ने भी सिद्ध संतों ने जो गोलोक से आते हैं अवतार ले उन्होंने भी गुरु बनाया किसी ने नहीं बनाया। उनके ऊपर कोई शासन नहीं है। खपती लोग हैं। जो मन में आए किया ऐसे लोगों को सुखदेव परमहंस ने कहा यद पंकज पराग से तप्ता

13:28 योग प्रभाव विधता कर्म बंधा चरती माना स्वयं चरती यानी स्वेच्छाचारी होते हैं महापुरुष लोग क्योंकि शास्त्र वेद के कानून कायदे तो तब तक लागू होंगे किसी पर जब तक भगवत प्राप्ति ना कर ले भगवत प्राप्ति करने के बाद ब्रह्म विद सुत मूर्ख फिर वो महापुरुष वेद के मस्तक पर पैर रखकर चलता है उसका गुलाम नहीं स्वतंत्र है वो किसी कानून कायदे के बंधन में नहीं है।

14:14 मौज में आई कानून कायदे का पालन किया। कर्म धर्म का पालन किया। अरे राज्य किया है ध्रुव प्रहलाद अंबरी तमाम संतों ने। और मौज में आए रात उसने। मौज में आई जीव कल्याण के लिए प्रचार कर रहा है संसार वालों के साथ उनकी गालियां खा रहा है अपमान सह रहा है और मौज में आई धार में जाओ तुम लोग मरो हम जा रहे हैं अपना अकेले भजन करेंगे अपना श्यामा श्याम से प्यार करेंगे तुम लोगों को अकल में कभी नहीं आएगा हम क्यों खोपड़ा भंजन करें कुछ ऐसे होते हैं अलग-अलग ढंग के महापुरुष हिस्ट्री में हमारे हुए हैं ऐसी ऐसी विचित्र विचित्र बातें उन महापुरुषों की है जहां सरस्वती बृहस्पति

15:01 की बुद्धि विछिन्न हो जाती है। तो हमको जो पहला काम करना है वो क्या है? अपने अज्ञान को समझना है और ज्ञान को प्राप्त करना है। ये पहला काम हम लोग अपने को शरीर मानकर शरीर संबंधी सुख के लिए ज्ञान अर्जित करते हैं। शरीर संबंधी सुख के लिए प्रयत्न करते हैं और शरीर इंद्रिय संबंधी विषयों के सुख को पाके विभोर होते हैं और फिर दुखी होते हैं। फिर विभोर होते हैं। इतना बड़ा आश्चर्य उसी मां से उसी बाप से उसी बीवी से उसी पति से उसी बेटे से हजार

15:48 बार सुख मिला हजार बार घृणा हुई ये दोनों का क्यों होता है पता नहीं होता है क्यों होता है ये पता नहीं उसी बेटे को चिपकाने को व्याकुल है मां जो स्कूल से आया था एक बार दो बार तीन बार जाओ बेटा खेलो जाओ खाना खा लो मम्मी हमको प्यार करेंगे हट प्यार करेगा हो गया प्यास उसी बीवी के लिए दीवाना उसी बीवी से 10 मिनट बाद अबाउट चल ये जोकरी का हमारा यह नाटक है प्यार है ये क्या है समझने की चेष्टा कभी नहीं पागल तरीके से उसी को बार-बार पाखाने को उसी को मुंह में डालते हैं फिर उल्टी करते हैं फिर उसी को खा लेते हैं फिर उल्टी करते है

16:36 अनंत जन्म बीत गए और फिर कहते हैं, "हां बड़े काबिल है।" हमको कोई मूर्ख मत कहना। हां, हमको बेवकूफ कहा। तुम्हारी हिम्मत कैसे पड़ी ऐसी? अरे, तुम्हारे समाज बेवकूफ तो जानवर भी नहीं है। पशु-पक्षी भी साल में एक बार विषय भोग करते हैं। तुम कितने विषयों का सेवन कर चुके। एक एक इंद्रिय के अनंत विषय और फिर भी अभी बीमारी बढ़ती जा रही और फिर भी होश नहीं आया तो ये जितना सारा अज्ञान है इस अज्ञान को कौन समझाएगा भगवान तो समझाने आएगा नहीं वो तो सर्व व्यापक है निराकार रूप में है सर्वत्र और अगर साकार रूप में आ भी जाए

17:25 राम कृष्ण बन के तो आप पहचानेंगे नहीं उसको भी गाली देंगे ये श्री कृष्ण लड़कियों के पीछे घूमता है फंगा राम सीता के लिए देखो कैसे पागल हो के घूम रहे हैं ऐसा भी होना चाहिए मनुष्य में कुछ पावर होनी चाहिए विल पावर ये विल पावर निकली है पाश्चात्य देशों ने निकाला है विल पावर ये विल पावर क्या होती है विल पावर की कोई वैल्यू है ये तो मानसिक शक्ति मन तो परिवर्तनशील है। तीन गुण के अंदर इसकी पावर क्या होगी? अभी इतनी बड़ी पावर अभी अप डाउन हो गया। सब हो गया।

18:10 स्पिरिचुअल पावर पावर है। आत्म शक्ति एक शक्ति है वो तो ठीक है। विल पावर तो ये जो हमारे अंदर अनेक प्रकार के अज्ञान है। इनको समझना फिर ज्ञान क्या ग्रहण करना है उसको प्राप्त करना। यह सब गुरु के द्वारा ही होगा। वह हमारी बिरादरी का है इसलिए भी हमारे काम का है क्योंकि वह पहले हमारे सब दुखों को भोग चुका है वो हमारी दयनीय दशा को जानता है उसको अनुभव हो चुका था पहले सब हमारी तरह वो भी चप्पल खा चुका है अनंत जन्म में और भगवान तो सदा आनंद में है उन्हें क्या पता वो तो अपना अपनी सीट पर सदा से एक तरीके के थे वो वो कोई भी

18:56 व्यक्ति तभी किसी का इलाज कर सकता है जो स्वयं रोगी रहा हो। डॉक्टर लोग देखो इंजेक्शन लगवा लगाते हैं, दांत निकालते हैं। अनेक प्रकार के ऑपरेशन करते हैं। लेकिन अगर डॉक्टर साहब का खुद का दांत नहीं निकाला गया कभी तो दूसरे के दांत को निकालते समय पूरी ताकत से झटका देते हैं, वो चिल्लाता रहे। इससे उनको क्या मतलब? एक गुरु जी ने एक राजकुमार को सब विद्याएं पढ़ा दी। तो उन्होंने कहा कि बेटा अब कल एक पाठ और पढ़ाएंगे उसके बाद तुमको पाठ कर देंगे। उन्होंने कहा अच्छा गुरु जी।

19:44 तो राज्य भर में खबर हो गई। राजा ने खबर किया कि बस कल का पाठ और पढ़ाना है। उसके बाद हमारा बेटा पूर्ण समस्त विद्याओं में पारंगत हो जाएगा। तो उन्होंने कमरा बंद किया और एक बड़ा बेंच लिया और मारना शुरू किया उसको। इतने बेंच लगाए गुरु जी ने कि वो युवक तो बेहोश हो गया। जब बेहोश हो गया दरवाजा खोल दिया। लेकिन जब तक मार खाता रहा चिल्लाता रहा तो बाहर आवाज आई। तो लोग राजा साहब के पास गए कि आज गुरु जी पागल हो गए हैं। राजकुमार को मारे जा रहे हैं। वो चिल्ला रहा है बेचारा और अब उसका बोलना बंद हो गया है। शायद मर गया। कोई दुश्मनी तो नहीं हो सकती गुरु जी की।

20:31 इतने दिन से उन्होंने अपने बच्चे की तरह पढ़ाया है। फिर आज क्या हो गया गुरु जी को? राजा को भी क्रोध आ गया। हां मेरे बेटे को मार डाला गुरुजी। हो सकता है किसी का मस्तिष्क विकृत हो जाए तो अपने बाप को मार डाले। संसार में संभव नहीं है। अरे भाई जब मस्तिष्क ही नॉर्मल नहीं है तो आदमी कुछ भी कर सकता है। थोड़ी देर में वो तो होश होश में आ गया। लेकिन तमाम कट गया था शरीर में उसके बेट से। तो राजा साहब ने आर्डर किया कि गुरु जी को दरबार में बा इ्जत पेश किया जाए।

21:18 उन्हें राजा की हैसियत से बुलाने का अधिकार है। लेकिन वो गुरु है इसलिए हथकड़ी ला के मत लगाना। बा इ्जत सम्मान सहित आओ। और सब बड़े-बड़े उनके जो मंत्री लोग बैठे हैं। अब कोर्ट केस होगा। अब गुरु जी बता रहे क्यों महाराज? कोई भी हो राज्य के अंतर्गत गलत काम करने का अधिकार किसी को नहीं है। और गुरु जी ने बता दिया कि भाई ऐसा है मैंने इसलिए मारा है कि कल कोई राजा बनेगा और पब्लिक जो अपराध करेगी उसके लिए दंड विधान करेगा। तो दंड विधान करने में जब तक स्वयं को अनुभव ना हो और राजा अहंकार में

22:06 तो रहेगा ही। कोई भी राजा हो नेचर का नियम है और उसने एक मामूली सी चोरी की और उसने कहा 500 भैं और 500 भेंट में वो मरेगा कि जिएगा ये कुछ आईडिया तो है ही नहीं उसको राजा को उसने गिनती बोल दिया 2000 10 बेत लगाओ खबरदार एक बेत भी कम ना होने पाए और वो मरने के बाद भी लगाए जा रहा उसको गिनती पूरा करना है तो मैंने इसलिए इसकी पिटाई की है इसको अनुभव रहे तो दंड कितनी लिमिट का देना है किस अपराध में ये जान रहे तो महापुरुष को हमारे क्लास का सब अनुभव है पहले से है ही है इसलिए वो हमारे

22:52 दुख को हमारी दयनीय दशा को समझ करके उसी के अनुसार चलेगा और उसी के अनुसार दवा करेगा हमारी हेल्प करेगा और फिर भगवान जब मिल ही नहीं अथवा मिलने पर हमारी समझ में आ ही नहीं सकता तो भगवान से हमारा लाभ ही क्या होगा? इसीलिए भगवान ने कहा भाई भाई मैं तो तब साथ दूंगा नाम निर्मल मन जन सो मोहि पावा। जब तुम्हारा अंतःकरण बिल्कुल शुद्ध हो जाएगा। निर्मल यानी कंप्लीट सर। यानी सारा काम खत्म हो गया तो भगवान कहते अच्छा मैं आ रहा हूं।

23:39 यह सारा काम जो गोबर गणेश का किया है तो महापुरुष ने किया। भगवान तो बने बने के साथी है। एक बाप एक लड़की को पैदा करता है। मां उसका पाखाना पेशाब साफ करती है। उसका जितना भी कला का उसकी ज्ञान है। विद्या का हर एक का करते करते 18 20 साल तक तो मां-बाप ने इतना खर्च किया तन मन धन हर एक से प्रयत्न किया और लड़की को सुशील योग्य कलावती बनाया और एक पतिदेव आए इंटरव्यू लेने उन्होंने कहा ठीक है ठीक है पसंद है अगर ऐसा कह दिया तो बड़ी कृपा है वरना 10 20 लड़कियों को कैंसिल कर दे क्या ठिकाना तो भगवान तो उस पति के समान है कि जब सारा

24:28 काम गुरु ने कर दिया शुद्धि भी कर दी सबकी तैयार कर ली। हां। उस कमरे में और तो कोई नहीं है। कौन से कमरे में? जहां मुझे आना है ड्राइंग रूम में। अंका ड्राइंग रूम है। कोई राक्षस तो नहीं। अब क्या राक्षस रहेगा? कोई मनुष्य, मां-बाप, बेटा, स्त्री पति। लोगों को निकाल बाहर किया है। कोई देवी देवता बिल्कुल नहीं जी। बिल्कुल खाली है। मैं आता हूं। तो हमारे स्वार्थ के दृष्टिकोण से गुरु ही प्रारंभ से लेकर अंत तक यानी वो दिव्य प्रेम दान वो दिव्य शक्ति जो अंत में

25:16 मिलती है आंख में, कान में, नासिका में जिसके द्वारा हम भगवान का दर्शन स्पर्श आदि प्राप्त करते हैं वो भी गुरु के द्वारा होगा। इसीलिए वेदों शास्त्रों में हमारे यहां दो प्रकार की उपासना बताई गई है। या तो गुरु और भगवान को बराबर मानकर यथा देवे तथा गुरु भक्ति करो या तो केवल गुरु की भक्ति कर लो लेकिन केवल भगवान की भक्ति नहीं हो सकती। तो अपने मतलब के दृष्टिकोण से गुरु का स्थान ऊंचा है। इसलिए संतो ने लिख दिया भाई भगवान भगवानेंस नहीं जो गुरु जी के हमारे और बराबर है।

26:02 ये तो बात ठीक है ये कि जो शक्तियां भगवान में है वही शक्तियां गुरु में भी आ गई इसलिए बराबर है ये भी ठीक तो ये तीन बातें प्रया शास्त्रों में मिलती है। तीनों बातें सही है लेकिन यह चौथी बात है जो यहां भागवत में श्री कृष्ण ने कहा। भागवत में श्री कृष्ण ने कहा आचार्य मामिया आचार्य माने गुरु को मुझसे बड़ा मत मानो। मुझसे छोटा ना मानो, मेरे बराबर ना मानो। फिर क्या ऐसा मानो कि मैं ही हूं

26:48 यानी गुरु ही भगवान है। ऐसा मानो भगवान के बराबर नहीं दो। ये महापुरुष जो होता है वो इसलिए महापुरुष कहलाता है कि जब तक महापुरुष करता है शरणागति करता है करता है साधक है तब तक तो वो अपना अलग अस्तित्व रखता है और जब कंप्लीट सरेंडर किया तो पूर्ण शरणागति का मतलब वर्क बंद अब वो कुछ नहीं करेगा तते विष्णु हो गया माने

27:35 करना कर चुका करना कर चुका जब आनंद प्राप्त कर लिया तो उसके बाद क्यों बिल्कुल नहीं हो सकता अब कर्म क्यों होगा खाली घड़े को आप डूबाइए कुएं में सरोवर में हौज में भाग भाग भाग भाग भाग भाग भाग भाग भाग भाग भर गया चुप अब नहीं बोलेगा पानी भर गया ऊपर तक वर्क बंद शांत रहेगा उभरा हुआ घड़ा चुप हो गया मक्खन को पकाया पटक पक पट पट पट पट पट पट चुप घी बन गया अब नहीं बोलेगा

28:28 परित हो गया पूर्ण हो गया तो जब महापुरुष हो गया तो उसका मतलब अब भी कुछ करना बाकी है फिर काहे का महापुरुष कुछ पाना हो तब तो कुछ करना हो पाना खत्म इसलिए करना खत्म फिर भी सारे महापुरुषों ने सब प्रकार के कर्म किए काम का क्रोध का लोभ लोभ का मोह का ईर्ष्या का द्वेष का अच्छा बुरा सब प्रकार का काम किया भरा पड़ा है इतिहास ये कैसे किया ये उन्होंने नहीं किया ये गुरु ने नहीं किया गुरु घंटाल ने किया है यानी जो गवर्नर है जो अंदर बैठा हुआ है

29:16 अभी आप लोग जो वर्त करते हैं ये जीवात्मा है क्यों देखिए और इसके पीछे माया है और इसके पीछे भगवान है। ये माया काम करा रही है आपसे। इसलिए सब गड़बड़ हो रहे हैं। और ये जीवात्मा इस परमात्मा की ओर पीठ किए हैं। जब ये जीवात्मा अभाव होकर के शरणागत हो गई। सन्मुख हो गई। परमात्मा तो माया भाग गई। यह अंधकार तभी तक रहेगा जब तक प्रकाश सामने ना आवे। प्रकाश आया अंधकार का कहीं नामो निशान नहीं। उसकी राख भी नहीं मिलेगी। अब माया समाप्त हो गई तो ये भगवान गवर्नर

30:03 हो गया। अब जीव चुप आराम सदा के लिए। यह वैद रिस्क जो डॉक्टर लोग बताते हैं उससे भी बहुत आगे है। कोई बढ़ ही नहीं सदा के लिए आनंदमय हो गया। अब उससे जो कर्म होगा वो नहीं कर रहा है। वो क्यों करे? उसका कर्म तो भगवान करता है। अब माया नहीं रही। और जीव परिपूर्ण हो गया। अब भगवान गवर्नर है इसलिए हम लोग जितने भी संतों के ग्रंथ है उनको मानते हैं। तुलसीदास की रामायण बिल्कुल सही है। क्यों? उस तुलसीदास की

30:51 लिखी हुई नहीं है। राम की लिखी हुई है। तुलसीदास की लिखी हुई होती तो एक एक अक्षर को काट के रख देते। वो भगवान की वाणी है। वो महापुरुष का कार्य भगवान का कार्य होता है। तो भगवान कहते हैं आचार्यम मामिया आचार्य को मुझसे पथक ना मानो। मैं ही उसके प्राकृतिक शरीर में आचार्य रूप में बैठ जाता हूं। जैसे संसार में किसी को भूत लग जाता है। आप लोगों ने कभी देखा हो जीवात्मा कोई जीवात्मा किसी जीवात्मा के भीतर जाकर हावी हो गई। वो अंगूठा छाप था व्यक्ति।

31:38 इस साल वो नहीं आए। हमारे महू छावनी में एक स्त्री थी। अभी है जिंदाओं उसके कई कई भूत लगे हुए थे। मैं वहां मैं वो दिन रहा हूं। पढ़ा हूं [संगीत] कम से कम 52 साल पहले की बात है तो वो बे पढ़ी लिखी मारवाड़ी स्त्री संस्कृत में बात करे जब वो भूत आ जाए और जब वो चला जाए तो फिर का अपना वही मारवाड़ी शुरू हो गई हां तो जैसे किसी को भूत भूत लग जाता है तो जब तक वो भूत रहता है उसी का वर्क होता

32:24 है। जिसको लगता है वो कुछ नहीं करता। ऐसे ही जब नंदपूत लग जाता है महापुरुषों को तो नंदपूत ही वर्त करता है। फिर वो जीवात्मा कुछ भी नहीं करती। उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं कोई मतलब नहीं। भोले भाले लोग समझते हैं। अर्जुन ने मर्डर किया। हनुमान जी ने लंका जला दिया। तुम्हें कैसे मालूम मैंने आंखों देखा? अरे यह आंखें सब धोखे की है। इसके चक्कर में ना रहना। तुम इन आंखों से जो देखते हो या इस बुद्धि से जो डिसीजन लेते हो, वो सब माइक है, धोखा है। तो भगवान का अभिप्राय इतना ही है। कुछ लम्बा मैं बोल गया। सॉरी।

33:11 ओ गुरु और भगवान एक ही है। ये आशय है इसका। की जय।

Share

YouTube Video Summaries