0:00 कहने को तो बोलते हैं कि बहुत प्रेम है और मां-बाप अपने बच्चों से बहुत प्रेम करते हैं। सोसाइटी यह सिखाती है कि मां-बाप के प्रति तुम्हारा एक ऋण है जो कि तुमको देना है। तो इस लेनदेन के रिश्ते में प्रेम कहां है? आप शुरुआत करते हो मां-बाप और बच्चों के रिश्ते से। क्या? उनका आपस में जैसा रिश्ता है वैसे ही उनका अपने बालक से होता है। हम जब मिलते हैं तो उसमें देखा है हम कितनी कैलकुलेशंस के साथ मिलते हैं। कुंडली मिलाने से लेकर के दहेज गिरने से लेकर के तो जब इतने कैलकुलेटिव हैं हम तो बच्चे के साथ भी क्या [संगीत] करेंगे? कैलकुलेशंस। उन दोनों में से किसी ने कभी प्रेम का प जाना है। उन्होंने आपस में जो करा है गणनाएं। वही फिर वो किसके साथ करते हैं? बच्चे के साथ भी करते हैं आरओआई कितना लगाएं कितना वसूलें गिनवाते हैं तुम इतने
0:46 छोटे पैदा हुए थे मां-बाप ने तुम्हें पालपस के देखो कितना बड़ा कर दिया ना क्या करा था खींचा था बड़ा कर दिया नहीं देखो तुम तुम स्कूल गए तुम कॉलेज गए मां-बाप ने फीस भरी ना भर के दिखाते जमाना ठोक बजा देता बिल्कुल पर तुम्हें कपड़े तो सब मां-बाप ने पहनाए मुझे नंगा चला के दिखा देते [हंसी] उनकी मजबूरी है ये प्यार नहीं है ये अंधकार की मज मजबूरी है। तुम अब वो मजबूरी के नाते वो सब कुछ करोगे जो सामाजिक कोड ऑफ कंडक्ट है वो तुम्हें करना पड़ेगा और तुमको तुम्हें पता है तुम जैसे स्कूल में जाते हो। तुम मुझे बोलो आप मुझे सरकारी पाठशाला में डाल दो। चुनौती है। डाल के दिखाओ।
1:32 तुम्हारी हिम्मत नहीं है। प्यार के नाते नहीं कर रहे हो। क्या प्यार? कैसे प्यार? पर लोकधर्म। हम जिसको प्रेम बोलते हैं वो नौटंकी है। वो एक फिल्मी कांसेप्ट है जो खोपड़े में डाल दिया गया है। हेलो सर। तो अभी आपने एक सेंटेंस बोला था कि प्रेम में कोई दाता नहीं है। प्रेम में कोई दाता दाता नहीं है। तो उसी से रिलेटेड मेरे मन में एक सवाल था कि कहीं ना कहीं अगर हम देखें एक माता-पिता का अपने बच्चे के साथ जो रिश्ता होता है उसमें कहने को तो बोलते हैं कि बहुत प्रेम है और मां-बाप अपने बच्चों से बहुत प्रेम करते हैं। लेकिन हम जानते हैं कि ऐसे बहुत मतलब ज्यादातर
2:18 मां-बाप अपने बच्चों के साथ जस्टिस तो नहीं कर पाते। जिस तरह की वो उनको सीख देते हैं, जिस तरह की उनको बातें सिखाते हैं, सही नहीं है और कहीं ना कहीं बहुत सारा ट्रॉमा ऑफलोडिंग होता है। तो उसमें उस सिलसिले में मुझे यह जानना था कि उसके बाद जब बच्चे बड़े होते हैं तो कहीं ना कहीं अगेन सोसाइटी ये सिखाती है कि मां-बाप के प्रति तुम्हारा एक ऋण है जो कि तुमको देना है। तो इस लेनदेन के रिश्ते में प्रेम कहां है? और अगर प्रेम नहीं है तो क्या वाकई बच्चों का कोई ऋण बनता है उन माता-पिता के प्रति? नहीं वेव्ड अगर सवाल इसलिए है कि क्या लोन वेवर
3:05 मिलेगा? [हंसी] तो मिलेगा। कोई ऋण नहीं है। आज इसको दूसरे तरीके से करते हैं। ठीक है? क्योंकि वह वाला तरीका तो 5700 बार हो चुका है। आज इसको दूसरे छोर से पकड़े करें। एक स्त्री है, एक पुरुष है, अभी बच्चा नहीं है। एक स्त्री है, एक पुरुष है। ठीक है? इनके शरीर ही बने हैं मिलने के लिए। मिलने के लिए और मिलने के
3:51 लिए शब्द होता है मीटिंग। मीटिंग उससे अलग एक शब्द होता है कंज्यूमिंग। एक्सपेक्टिंग इन दोनों शब्दों में अंतर देख पा रहे हैं आप। मीटिंग वर्सेस कंज्यूमिंग। आपने नहीं चुना था कि आपकी नारी देह होगी। किसी ने नहीं चुना था कि उसकी पुरुष देह होगी। वो ठीक है। वो प्रकृति का काम है। उसकी अपनी भीतरी करोड़ों गणनाएं हैं। जिनके फल स्वरूप एक मनुष्य पैदा हुआ है स्त्री देह में। वहां सब चल रहा है। पता नहीं क्या-क्या। अब तो हम थोड़ा बहुत जानने भी लग गए हैं। एक्स एक्स एक्स व आप समझते हो। आपको पता होता है कि एक वो एग
4:37 सेल होती है और मिलियंस स्पर्म्स होते हैं। आपको ये भी पता होता है प्रोबेबिलिटीज क्या होती हैं। 100 बातें अब आप जानते हो। भीतर जो जेनेटिक कोड है उसकी कॉम्प्लेक्सिटी भी अब हम समझने लग गए हैं। है ना? जेनोम प्रोजेक्ट ये 50 चीजें हम जानने लग गए हैं। तो प्रकृति ऐसी अनंत गणनाएं कर रही है। और उन अनंत गणनाओं के फल स्वरूप रिजल्टेंट में एक मनुष्य यह खड़ा हुआ है। यह मत वह मनुष्य अपने आप में तो कुछ नहीं है। वह उन गणनाओं का एक तरह से मटेरियलाइजेशन है। ठीक है ना? वैसे ही एक दूसरा मनुष्य खड़ा हुआ है। उसकी पुरुष देह है। अब ये दोनों देहें मिल सकती हैं।
5:24 मिलेंगी कि नहीं मिलेंगी वो बात प्रोबेलिस्टिक हो जाती है। ठीक। और उस मिलन से बच्चा पैदा हो सकता है। बच्चा पैदा होगा कि नहीं होगा यह बात फिर से प्रोबेबिलिस्टिक हो जाती है। हम नहीं जानते पैदा होगा कि नहीं हो भी सकता है। पैदा होगा तो लड़का होगा कि लड़की होगा कि क्या होगा? काला होगा कि गोरा होगा स्वस्थ होगा, अस्वस्थ होगा हम नहीं जानते। वो सब फिर संभावना प्रोबेबिलिटी के दायरे में आ जाता है। ठीक है ना? इसमें किसी की व्यक्तिगत सत्ता पर्सनल एजेंसी क्यों चाहिए? क्यों चाहिए? यह सब जो भी हो रहा है, इसके होने के लिए
6:12 स्त्री का मैं क्यों चाहिए और पुरुष का मैं क्यों चाहिए? आंखें देखने का काम कर सकती हैं। बुद्धि है क्योंकि मनुष्य हो। स्मृति भी है, पढ़ा है, लिखा है, वाणी है, प्रश्न कर सकते हो। कान है, उत्तर सुन सकते हो। ठीक। तर्क है और गहरी जिज्ञासा कर सकते हो और उसके बाद शरीर है ठीक है तो संसर्ग भी कर सकते हो सेक्स
7:03 ठीक है इसमें मैं क्यों चाहिए मैं क्यों चाहिए सवाल पूछ रहा हूं। इसमें मैं की क्या जरूरत है? और अगर अभी तक मैं है तो औलाद भी फिर उस मैं की ही तो अभिव्यक्ति होगी ना। और क्या होगी? देखो जैसे कर्ता को देखा जाता है कर्म को नहीं है ना उसी तरीके से यह जो
7:50 संतान पैदा करने का कर्म होता है वह भी ना अच्छा होता है ना बुरा होता है। यह जो दो व्यक्ति हैं अगर यह ईगो ड्रिवन है तो इनका यूनियन भी बुरा है और बुरा किस अर्थ में है? बंधन बढ़ेगा, दुख बढ़ेगा और कुछ बुरा माने मोरली बुरा नहीं। तो इनका यूनियन भी बुरा है और उस यूनियन का जो प्रोडक्ट है, उस मिलन का जो उत्पाद है, जो संतान पैदा हुई है, उसको भी और दुख मिलेगा ही मिलेगा। मां बनना प्राकृतिक काम है हम जो ना तो अच्छा है ना बुरा है
8:40 ना वर्जित है ना अनुमोदित है वास्तव में तुम्हारा उससे कोई लेना देना नहीं होना चाहिए हो गया तो हो गया नहीं हुआ तो नहीं हुआ मेरा उससे लेना देना क्यों नहीं होना चाहिए क्योंकि मेरा मुझसे कोई लेना देना नहीं होना चाहिए ईगोलेस रिलेशनशिप क्यों नहीं हो सकती? हम सोचते हैं कि अगर संबंध है तो संबंध बनाने वाले दो होंगे। क्यों होंगे भाई? क्यों होंगे? संबंध स्वयं क्यों नहीं बन सकता? ईगोलेस रिप्रोडक्शन क्यों भी क्यों नहीं हो सकता? ईगोलेस सेक्स भी क्यों नहीं हो सकता?
9:34 अर द ईगो यस बट वी डोंट इंटेंड टू रिमेन दैट वे। डू वी थ्रू द क्वेश्चन आर वी क्वेश्चनिंग द ईगो और डिफेंडिंग इट? व्हेन यू से वी आर द ईगो दैट्स फाइन बट दैट्स नॉट मेयरली अ स्टेटमेंट ऑफ़ फैक्ट। इट्स अ डिफेंस ऑफ़ द सिचुएशन। अ स्टेटमेंट ऑफ़ फैक्ट इज़ मोस्ट वेलकम। बट वी हैव टू बी केयरफुल व्हेन द स्टेटमेंट इज एक्चुअली बीइंग इनवर्डली यूज्ड टू मेंटेन द स्टेटस को। वी आर ईगो बट वी डोंट इंटेंड टू रिमेन दैट वे डू वी डू वी और जो
10:22 हो रहा है वो तो हो ही रहा है। जो हो रहा है वो तो हो ही रहा है। वो तो हमारी साधारण स्थिति और साधारण अनुभव है। उससे अलग जहां कोई बात हुई तहां आपत्ति खड़ी हो गई। बट दिस इज़ यूटोपियन। मैं जो बोल रहा हूं अगर यूटोपियन है तो जो हमारी जिंदगी है वो डिस्ट्रोपियन है कि नहीं है तो वह क्यों नहीं बोला माय लाइफ इज डिस्ट्रोपियन मैं आपको किसी ओर पॉइंट कर रहा हूं इशारा कर रहा हूं तुरंत आपने उसको यूटोपिया घोषित कर दिया और यह जो हम जिंदगी जी रहे हैं जो डिस्ट्रोपिया है उसके बारे में कुछ नहीं बोला अब क्या करें द मैन इज फुल ऑफ ईगो द वुमन इज फुल ऑफ ईगो एंड द रिलेशनशिप इज फुल ऑफ हेल। वो चलेगा।
11:09 पर अगर मैं इगोलेस रिलेशनशिप की बात कर रहा हूं तो तत्काल क्या बन गई? यूटोपिया। आत्मवलोकन कहां है? [हंसी] आप शुरुआत करते हो मां-बाप और बच्चों के रिश्ते से। या उनका आपस में जैसा रिश्ता है वैसा ही उनका अपने बालक से होता है। वह दोनों ही कौन सा आपस में स्वस्थ रिश्ता रखते हैं? अहंकार खुद एक अस्वस्थता का नाम है ना। और वही जाकर के कोई पुरुष या स्त्री पकड़ लाती है। वही कहती है कि नहीं अभी मैं प्लानिंग कर रही हूं। वी आर प्लानिंग टू हैव अ बेबी।
11:56 यू नो कुछ भी इसको ऐसे कहेंगे आपके संसर्ग में निस्ग कहां है? निस्ग माने सहजता। हम जब मिलते हैं तो उसमें देखा है हम कितनी कैलकुलेशंस के साथ मिलते हैं। काफी सारी कैलकुलेशंस गणनाएं तो हमें खुद भी पता होती हैं। और जो हमें नहीं पता होती वह हमारे पीछे चल रही होती हैं। कुंडली मिलाने से लेकर के दहेज गिरने से लेकर के ये कोई छोटी-मोटी गणना थोड़ी है कि उसके
12:43 चेहरे पर लाइट पड़ रही है तो कितनी अब्सॉर्ब हो रही है और कितनी इधर आ रही है। न्यूटन ने सिद्धांत दिया था ब्लैक बॉडी रेडिएशन का। आप यह गणना है। आप जब कहते हो ना किसी का रंग देख रहा हूं। बस आप यह देख रहे होते हो कि जो रोशनी पड़ी उसके चेहरे ने अब्सॉर्ब कितनी कर ली और रिफ्लेक्ट कितनी कर ली। हम इस हद तक भी कैलकुलेट कर रहे हैं। तो जब इतने कैलकुलेटिव हैं हम तो बच्चे के साथ भी क्या करेंगे? कौन से दो मां-बाप हैं जिनका संसर्ग सहज होता है? होता है क्या? अब अब कल्पना मत करने लग
13:28 जाएगा। आप कल्पना करोगे। मैं आपकी बात समझ रहा हूं। तो ईटोपिया नहीं लगेगा। क्योंकि मैं बोलने जा रहा हूं कि जैसे वृक्ष पर फल लग जाए। आप कहोगे ऐसे थोड़ी प्रेग्नेंट हो जाएंगे कि वृक्ष पर फल लग गया। फट से फिर से हदोला इधर फेंक दोगे। कि औरतों के वृक्षों पे फल लगा रहे हैं। ऐसा थोड़ी होता है। पूरी प्लानिंग करनी पड़ती है। सोचना पड़ता है, देखना पड़ता है। गिव मी अ चांस। गिव द अल्टरनेट रियलिटी अ लिटिल स्पेस। ये कमरा इतना बड़ा है। प्रकाश के स्रोत को हमने जरा सी जगह दे दी। काफी हो गया ना। अपने जीवन में प्रकाश के स्रोत को थोड़ी तो जगह दीजिए। वो आता नहीं है कि यूटोपिया और ये सब शुरू कर देते हो आप। प्रकाश इस
14:13 पूरे कमरे को मांग भी नहीं रहा है। वो स्रोत क्या बोल रहा है। कितनी जगह ली है उसने? इतनी सी जगह दे दो। पूरा जो यह जिंदगी का कमरा है रोशन हो जाएगा। पर उतना भी नहीं देना चाहते। इतनी इनटोलरेंस अभी भी बहुत लोग भीतर से बिल्कुल कलप रहे होंगे। क्या बोल दिया कि हमारी डाली पर अमरूद लगेगा। ऐसे थोड़ी होता है। थोड़ा सा थोड़ा सा इस संभावना को मौका तो दो। उस मौके की कल्पना मत करो। आप कल्पना कर रहे हो वही बने बने जो आप हो और वही बने बने जो आप हो आप उसकी कल्पना करोगे तो
15:00 कल्पना हमेशा विकृत भी होगी, भयावह भी होगी। हमारे बच्चे ही बहुत गलत प्रक्रिया से पैदा हो रहे हैं। उसमें शरीर और सब बाद में आता है। सबसे पहले क्या आता है? अहंकार आता है। हम यहां भी जब बोलते हैं ना कि अरे बस हार्मोनल सर्ज थी तो आपने बच्चा पैदा कर दिया या कि सोशल कंपल्शन था तो आपने बच्चा पैदा कर दिया। वह बात भी आधी है। हमारे बच्चों का मां और बाप दोनों का एक ही नाम है। अहंकार शरीर भी नहीं समाज भी नहीं। वो कहां से
15:46 आते हैं? वो इल्लुजन से आते हैं। अहंकार माने इल्लुजन। भ्रम। इस पूरी दुनिया में जो भी पैदा हो रहा है एक भ्रम से पैदा हो रहा है। तो अब बताओ जिन्होंने पैदा करा शरीर से और यह जो संतान पैदा हुई है इनमें क्या रिश्ता होगा? क्या रिश्ता होगा? क्या-क्या तो नहीं अरमान होते हैं कि कोई जीवन में आएगा तो ऐसा हो जाएगा, वह हो जाएगा। और विशेषकर जब सेक्सुअल एक्टिविटी होनी होती है तो देखा है वह कितनी ज्यादा फैंसीफुल होती है। देखा है
16:36 इंटरनेट पर इतनी बड़ी इंडस्ट्री है पोर्न एडल्ट एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री वो इतनी बढ़ गई कि उसको इंडस्ट्री का नाम देना पड़ा। अब वहां से आते हैं बच्चे। और क्या होता है? और क्या पूजा करने जाते हो? और आज के समय में कौन है जो जो संतान के लिए आगे बढ़ा है पोर्न देखे बिना कौन है? वही फैंसी है, वही सपना है, वही कामना है, वही इल्लुजन है कि ऐसा कुछ होगा। इतना सुख मिलेगा, इतनी चरम तृप्ति मिलेगी।
17:30 इतनी गहरी बेहोशी कि वो इतनी बड़ी इंडस्ट्री बन गई जिसमें से कोई प्रोडक्ट नहीं है इल्लुजन के अलावा मैं उसको किसी भी तरीके से मोरली रॉन्ग या एथिकली अनसाउंड नहीं बोल रहा हूं। मैं बस यह कह रहा हूं कि वहां और कुछ है क्या? भ्रम के अलावा कोई प्रोडक्ट, कोई सर्विस कुछ हो तो बताओ। कोई स्क्रीन से बाहर कूद करके पांव दबाने लगता है। ऐसा होता है होता है। और वही अर्ज वही जो अर्ज होती है जिसके केंद्र में ही क्या है? भ्रम मात्र वही फिर संतान बन जाती है। संतान तो जन्म ले
18:15 ही नहीं रही। भ्रम ने शरीर ग्रहण कर लिया है। वो संतान नहीं पैदा होती है। क्या पैदा होता है? इल्यूजन एंबोडी। वो जो भ्रम खोपड़े में था उसी ने एक देह पाली और मैं चिल्लाने लग गया। और कहते बधाई हो लड़की हुई है। समझ में आ रही है बात? यह यह तो बैकग्राउंड है। अब इसके बाद हमें हेल्दी रिलेशन चाहिए मां-बाप और बच्चों के बीच में। क्या हेल्दी रिलेशन? वो कौन है जिसने पैदा करा है?
19:03 डॉक्टर चिल्ला रहे हैं। 35 की हो गई तो पैदा नहीं कर पाएगी। घर वाले चिल्ला रहे हैं। समाज चिल्ला रहा है। टीवी चिल्ला रहा है। कमर्शियल्स चिल्ला रहे हैं। और 35 के तुम्हारे कितनी बुद्धि है? कितनी अकल है? क्या जानते हो? कितना स्वयं को समझा है? जीवन को कितना जाना है? वो जो पैदा भी करा है वो और क्या है? भ्रम के एक पिंड के अलावा तुमने क्या पैदा करा और अचानक से तुम्हारी गोद में कुछ आ गया। चलो फिर भी तुम तो मां हो। तुम्हारी गोद में आ गया है। वो जो पिता कहलाता है उसको तो कुछ चाहिए भी नहीं था। उसके तो जबरदस्ती ले जाकर के थमा दिया। ले लो पालो ये तुम्हारी है।
19:50 हंसने की बात नहीं है। ये आप सामाजिक दबाव और नैतिक पहरे हटा दीजिए और फिर देखिए कि कितने बाप बचते हैं। माएं बचेंग बाप नहीं बचेंगे क्योंकि उसे बाप बनना ही नहीं था। वो तो 9 महीने पहले निवृत्त हो गया था। [हंसी] उसका काम उतना ही था। वो तो फंस गया। कह रहा है ये वाज़ दिस पार्ट ऑफ द डील? [नाक से की जाने वाली आवाज़]
20:39 अब तुम्हें क्यों ताज्जुब हो कि बाप भ्रूण हत्या करवा रहा है मां पर दबाव डाल रहा है कि वो पैदा हुई है और बाप तभी से उसको बोझ की तरह देख रहा है। कह रहा है इसकी दहेज के लिए पैसे जोड़ो अभी से कि पापा की परी भी बन रहे हो तो उसमें आशय यही है कि पराया धन है आए ही कहां से हो आए ही कहां से हो अंधकार से आए हो वही अंधकार एक बच्चे के रूप में मूर्त रूप धारण करके पैदा हो गया है
21:24 अब फिर यह ज्यादा बड़ी ज्यादा ऊंची डिमांड हो जाती है छोटे मुंह बड़ी बात कि मुझे अपनी मां और बाप से प्रेम चाहिए। उनमें आपस में ही नहीं है। तुम्हें कैसे करें? कैसे करें बताओ? उन दोनों में से किसी ने कभी प्रेम का प जाना है? वह बच्चे को कहां से प्रेम वगैरह कर लेंगे? उन्होंने आपस में जो करा है गणनाएं वही फिर वो किसके साथ करते हैं? बच्चे के साथ भी करते हैं। आरओआई कितना लगाएं, कितना वसूले? यह कोई इल्जाम नहीं है। यह मैं प्रक्रिया
22:10 बता रहा हूं। यह मैं दोषारोपण नहीं कर रहा। जो प्रोसेस चलता है उसकी जो इनएविटेबल नेक्स्ट स्टेप्स हैं वह गिनवा रहा हूं। इनएविटेबल यह मैं नहीं बोल रहा हूं कि मां-बाप चाहे तो प्यार कर सकते हैं। मैं कह रहा हूं प्यार कर ही नहीं सकते। क्योंकि प्यार कोई कर्म नहीं होता जो करा जाएगा। प्यार कर्ता की प्रकाशित स्थिति का नाम होता है। जब कर्ता ही नहीं प्रकाशित है तो उस भीतरी अंधकार से तुम बाहर किसी को चूम भी लो तो प्यार थोड़ी हो गया। तुम चूम ही नहीं लो। तुम उसका पालन पोषण कर लो। लोग गिनवाते हैं। तुम इतने छोटे
22:56 पैदा हुए थे। मां-बाप ने तुम्हें पालपस के देखो कितना बड़ा कर दिया ना। क्या करा था? खींचा था। बड़ा कर दिया। नहीं देखो तुम तुम स्कूल गए। तुम कॉलेज गए। मां-बाप ने फीस भरी ना भर के दिखाते। ना भर के दिखाते जमाना ठोक बजा देता बिल्कुल कुछ करने का सवाल तो तब पैदा होता है ना जब ना करने का भी विकल्प हो पर तुम्हें कपड़े तो सब मां-बाप ने पहनाए मुझे नंगा चला के दिखा देते उनकी मजबूरी है ये पे प्यार नहीं है यह प्यार नहीं है इल्जाम नहीं है
23:42 यह अंधकार की मजबूरी है। इसको इल्जाम नहीं कहते। हम जैसे हैं उसमें यह सब होकर रहता है। उसको रोका ही नहीं जा सकता। माता जी यहां बैठी हैं। मेरे ननिहाल की तरफ कहावत चलती है। एक ऐसी सी थी अजीब सी घूंघट में छुपी रही। किसी ने उसको देखा नहीं। वो ब्याह हो गया। वो आ गई। बाद में पता चला ये तो बड़ी गड़बड़ है। तो वो मचल के कहती है भयो ब्याह। मोर करे हो का। ठीक बोला? यही है ना?
24:28 अब कर क्या लोगे? अब अब तुम कुछ करके दिखा दो। अब तो मैं पत्नी हूं तुम्हारी तो तुम्हें मुझे पालना भी पड़ेगा और यह भी करना पड़ेगा। वह भी करना पड़ेगा। वैसे ही भयो जन्म मोर करे हो का। अब तो बच्चा पैदा हो गया है। तो तुम अब वो मजबूरी के नाते वो सब कुछ करोगे जो सामाजिक कोड ऑफ कंडक्ट है। वो तुम्हें करना पड़ेगा। समाज में तुम अमीर कहलाते हो और यही तुम्हारी मंशा रही है, कामना रही है, तुम्हारा स्टेटस सिंबल रहा है। तो तुम्हें अपने बच्चे को भी अब एक महंगे स्कूल में डालना पड़ेगा। यह तुमने बच्चे पर एहसान नहीं कर दिया है। यह तुम्हारे अहंकार का इनविटेबल फॉल आउट है। और तुमको तुम्हें पता है तुम जिस स्कूल में जाते हो
25:13 [हंसी] तो मुझसे बोलो आप मुझे सरकारी पाठशाला में डाल दो। चुनौती है डाल के दिखाओ। तुम्हारी हिम्मत नहीं है। प्यार के नाते नहीं कर रहे हो। यह प्यार नहीं है। यह तुम्हारे एल्गोरिदम का नेक्स्ट स्टेप है। एल्गोरिदम प्रोसेस होता है ना स्टेप बाय स्टेप। श्रंखला की एक कड़ी फिर अब ये होना है। फिर यह होना है, यह होना है। तो ये तुम्हारे एल्गोरिदम का नेक्स्ट स्टेप है। और प्यार एल्गोरिथ्मिक नहीं होता।
26:00 लोकधर्म ने बहुत ज्यादा महिमामंडित कर दिया है यह। पहले तो जो पतिप का रिश्ता है उसको और दूसरा फिर जो यह मां बच्चे का और बाप बेटे का जो रिश्ता है इनको फालतू ही ग्लोरिफाई कर दिया है। इसमें कुछ नहीं है। ग्लोरियस सब कुछ हो सकता है। अगर भीतरी मुक्ति हो, भीतरी आजादी हो, फिर तो छोटा से छोटा कर्म भी ग्लोरियस होगा। महान होगा। पर जब भीतर ही अंधेरा है तो आप बोलो कि वैसे तो मेरे भीतर अंधेरा है पर मैं अपनी बीवी से बहुत प्यार करता हूं। मत
26:46 वैसे तो मैं एकदम राक्षसी हूं। पूतना हूं लेकिन अपने बच्चे के लिए जान दे सकती हूं। मारो इसको झूठी। अभी कहीं निकला यही बोर में कोई कोई लड़की ही है। उसका मामला निकला कि वह कोमा में चली गई। उसकी बड़ी सर्जरी वर्जरी करने लग पड़ी। कारण क्या निकला? वो पिछले एक साल से सिर्फ मांस खा रही थी। और वो भी पैकेज्ड। उसको लत लग गई थी। वो सिर्फ क्या करती थी कि मुझे तो यही अच्छा लगता है और कॉलेज गोइंग लड़की है
27:32 वह। मुझे तो यही पसंद है और जा रही है और जहां पर फ्राइड चिकन और यह सब मिल रहा है खरीद रही है खा रही है वो इतनी बीमार हो गई उसका पूरा पेट सड़ गया पता नहीं उसकी जान बची कि नहीं बची क्या हुआ अब ये मां बनेगी कि नहीं बनेगी और फिर यह बोले कि मैं अपने बच्चे से प्रेम करती हूं तो यह कैसी बात होगी बोलो जब मनुष्य भीतर से घोर अंधकार में है तो आप उसके किसी कर्म को महिमामंडित कैसे कर सकते हो? कोई बात बनती है? कोई तुक है?
28:19 कोई है तो बता दो। मां भयानक रूप से अंधविश्वासी है। इतनी अंधविश्वासी है कि उसको लगता है कि बेटी पैदा ही बाबा जी के प्रसाद से हुई है। इतनी अब उस मां का वो जो बेटी पैदा हुई है उससे क्या रिश्ता होगा? प्रकाश का, होश का, ईमानदारी का, प्रेम का हो सकता है क्या? पर बच्चे खड़े हो जाएंगे। मासूमियत से सवाल करेंगे। व्हाई आर माय पेरेंट्स नॉट लविंग टुवर्ड्स मी? बिकॉज़ यू टू विल नेवर बी लविंग टुवर्ड्स योर किड्स?
29:07 जब भीतरी कर्ता एक है तो उसके कर्मों को अलग-अलग करके देखना भी कोई होशियारी नहीं। जिंदगी के कंपार्टमेंट्स नहीं होते हैं। आई एम सो एनवियस ऑफ माय नेबर। बट आई एम सो प्रोटेक्टिव ऑफ माय किड। नो नो आप कहोगे कि आपके अनुभव में ऐसा आता है। हो सकता है अनुभव में ऐसा आता हो। पर उस अनुभव की सतह से थोड़ा नीचे जाइए तो कुछ पता चलेगा। इफ यू आर टुडे एनवियस ऑफ योर नेबर देन यू आर पोटेंशियली एनवियस ऑफ इवन योर ओन किड
30:00 बात आ रही है समझ में? जिंदगी के कंपार्टमेंट्स नहीं होते हैं क्योंकि सब कर्मों का कर्ता एक ही है। मैं अपने शरीर को सजाती हूं, संवारती हूं और खूब गहने बहने से उसको लोड करती हूं और पॉलिशिंग फिनिशिंग कराती हूं। पेंटिंग कराती हूं। यह सब करके सर्विसिंग करा करके अपने आप को सामने डोल की तरह प्रेजेंट करती हूं। तो वो जो मेरी बेटी पैदा हुई है क्या मैं उसको भी बेबी डॉल नहीं बनाऊंगी? बस पूछ रहा हूं। बोलो
30:45 और आप अपनी बेटी को बेबी डॉल बनाओ। यह प्रेम है। बोलो। और जो महिला खुद को डोल बनाती हो वह बेटी को बेबी डोल कैसे नहीं बनाएगी? जिस महिला के भीतर यह एल्गोरिदम बैठ गया हो कि अपने आप को सजाओ सवारो बेबी डॉल बनो और उसके बाद एक बढ़िया सा लड़का देख लो उसकी ट्रॉफी वाइफ बन जाओ अब वो तुम्हें खूब पालेगा रुपए पैसे भी देगा और तुम्हें बस उसको खुश करके रखना है।
31:33 क्या वह अपनी बेटी को भी यही सब करने के लिए तैयार नहीं करेगी? बोलो करेगी कि नहीं करेगी? वो सिर्फ इसलिए कि आपके शरीर से एक प्राणी का जन्म हो गया है। आप प्रेमपूर्ण हो जाएंगे। ऐसा हो सकता है क्या? तो यह उम्मीद भी क्यों करनी कि मां-बाप और बच्चों में प्रेम का रिश्ता होगा। रिश्ता तो आत्मज्ञान और प्रेम का होता है। हम
32:23 सुगंधित बह रही हो हवा तो वह हवा आपके घर में भी प्रवेश करती है तो सुगंध लेकर आती है ना। इसको बोलते हैं कि मां-बाप का बच्चों के लिए प्यार। हम जैसे थे हम वही खुशबू किसी और की जिंदगी में भी लेकर आए। और वो खुशबू इसलिए लाए क्योंकि वैसे हम हैं। वही तो लाएंगे जो हम हैं। हमारे पास सिर्फ हमारी बदबू होगी तो बच्चे की जिंदगी में भी क्या भरेंगे? बदबू भरेंगे नहीं। वो बच्चा उसी बदबू की पैदाइश है। सुनने में बहुत बुरा लग रहा होगा। लगे क्या कर सकते हैं? ऐसा है तो है। अब क्या
33:09 करें? मुझे भी बुरा लगता है सुनने में। अपनी बात मैं कभी नहीं सुनता। मुझे अपना मूड खराब करना है ये सब सुन के। परलोक धर्म एकदम विक्षिप्त बाप हो और पगलिया मां हो। और उन्होंने आधा दर्जन औलादें पैदा कर रखी हैं। और कहेंगे बड़ा प्यार है। बड़ा प्यार है। देखो कितना प्यार है। क्या प्यार है? कैसे प्यार है?
34:01 प्यार दूसरे के साथ अच्छी-अच्छी चीजें करने का नाम नहीं होता। प्यार कोई चीज करने का नाम नहीं होता और प्यार में सब चीजें अच्छी-अच्छी हो जाती हैं। लेकिन किसी चीज को अच्छा अच्छा करने को प्यार नहीं कहते। यह जो करने वाला है ना जो करने वाला है भीतर जब यह होश में होता है खुद को जानता है तो फिर इससे जो भी चीज होती है वो प्रेमपूर्ण होती है। प्रेम कोई विशिष्ट खास बात नहीं है कि फूल खिल रहे हैं, तारे झड़ रहे हैं, वायलन बज रहा है, दुपट्टा उड़ रहा है। यह नहीं प्रेम है कि कुछ खास होगा तो
34:48 कहेंगे प्रेम है। भीतर की आंख खुली हो जो कुछ भी सहज हो रहा है छोटे से छोटा बड़े से बड़ा सब प्रेम है सब प्रेम है कोई दूसरा चाहिए भी नहीं आप अकेले ही रास्ते में चले जा रहे हो वो प्रेम है ये प्रेम है किससे है यूटोपियन बातें करते [हंसी] अकेले चले जा रहे हैं। क्या बोल रहे हैं? प्रेम है। या तो इन्हीं का नाम प्रेम होगा तो कहेंगे ये प्रेम है जो चला जा रहा है। ऐसे ही है।
35:35 अकेले भी चलोगे वो भी प्रेम होगा। मिट्टी के ऊपर तुम्हारे जो पद चिन्ह बनेंगे ना वो भी प्रेम होगा। तो फिर आचार्य जी एक पर्टिकुलर कर्म के प्रति प्रेम को हम लोग कैसे डिफाइन करेंगे जो हावर्ड ड्रार का प्रेम था आर्किटेक्चर के प्रति तो वो तो फिर कैसे और एक जगह आप उसमें सत्र में बोलते हैं कि आईआईटी में जब आप थे तो उस समय जो बच्चा खेल में अच्छा था वो पढ़ाई में भी अच्छा था तो ये तो अभी आप जो बता रहे हैं उससे मैच करता है। फिर एक पर्टिकुलर कर्म के प्रति प्रेम को कैसे जिससे बोला था बोला था जो ड्रामेटिक्स में अच्छा है वो इसमें भी अच्छा है वो यह समझाने के लिए बोला था कि [नाक से की जाने वाली आवाज़] एक्सीलेंस कर्ता में होती है वो फिर यदि इस कर्म में
36:22 झलकेगी तो उस कर्म में भी झलकेगी यदि मैं आपके सामने बैठकर के चाहता हूं कि जो बोलूं उसमें उत्कृष्टता रहे तो जब मैं खेलने जाता हूं तो उसमें भी उत्कृष्टता रखना चाहता हूं। इस बात के लिए तुमने प्रवाह तोड़ दिया। यह क्लियर नहीं था आचार्य जी मुझे कि एक पर्टिकुलर कर्म के प्रति प्रेम को क्या कहते हैं? एक पर्टिकुलर कर्म के प्रति कोई नहीं प्रेम होता है। प्रेम होगा तो प्रत्येक कर्म में झलकेगा और कुछ वो ऐसा नहीं होगा कि मिश्री मिठाई जैसा है कि हर कर्म में आपने शक्कर चुपड़ दी है। प्रेमी है ना हम तो चाय भी ऐसे पीते हैं। [हंसी] [प्रशंसा]
37:20 मैं करूं क्या मुझे कुछ प्रेम में कोई चकाचौंध नहीं होती कोई विशिष्टता कोई स्किन इंटिलेशन नहीं होता। आपको जो प्रेम के नाम पर दिया जाता है, वह बस डोपामिन स्पाइक है। आप उत्तेजना को, एक्साइटमेंट को प्रेम समझते हो। इसीलिए जब मैं बोल रहा हूं कि कोई सहज चला जा रहा है, यह भी प्रेम है तो उतर ही नहीं रही दिमाग में बात। कह रहे, प्रेम है तो घुंघरू तो बजे नहीं अभी। उसके बिना प्रेम कैसे हो सकता है?" और वह रेनबो इंद्रधनुष उसको तो लेकर आओ। और चंपा के फूल झड़े
38:08 उसके बिना प्रेम कहां से? ये प्रेम है क्या? हीर रझा, लैला मजनू आपको लगता है प्रेम है और बुद्ध ध्यान में बैठे हुए हैं बस। अध मुंदी अध खुली आंखों से इस जगत को देख रहे हैं। आपको लगता ही नहीं यह प्रेम है। नहीं लगता ना? क्योंकि पहली बात तो वहां कोई उत्तेजना नहीं। दूसरी बात वहां कोई लड़की नहीं। जोड़ा बने कम से कम। लैला है तो मजनू हो। बुद्ध के साथ तो कोई
38:53 है ही नहीं। तो प्रेम किससे कर रहे हैं? प्रेम के लिए कोई विषय नहीं चाहिए। प्रेम भीतरी बात है। और प्रेम फिर सब विषयों में परिलक्षित होता है। सब कर्मों में बराबर का होता है। हम जिसको प्रेम बोलते हैं वो नौटंकी है। वो एक फिल्मी कांसेप्ट है जो खोपड़े में डाल दिया गया है। वो इतना विकृत है कि जब आप सेक्स करते हो तो बोलते हो मेकिंग लव। सोचो मेकिंग लव।
39:40 यहां शांति से बैठे हो आप। आपको बहुत पता है आपके अगल-बगल पड़ोस में कौन है? कुछ पता है? कुछ पता है क्या? अगर शांति से बैठे हो, ध्यान से सुन रहे हो तो यह प्रेम है। हां। तो दो तो हो गए ना। अगल-बगल वाले का नहीं पता। आपका तो पता है। तो मामला तो अभी भी डुअलिस्टिक है। मुझे अगल-बगल वाले का नहीं पता पर मंच पर कौन है उसका तो पता है। ठीक है। मैं मंच पर नहीं था। आप बस शांति से बैठे हुए थे। प्रेम है। किसके लिए? मैं पूछूंगा किसके द्वारा? जब तक कोई बैठा हुआ है जो कह रहा है मैं करूंगा प्रेम तब तक वह प्रेम नहीं करेगा। शोषण नहीं करेगा।
40:29 प्रेम सहज हो जाता है भीतर वाले की अनुपस्थिति में। जब तक प्रेमी है वो प्रेम की राह में बाधा है। प्रेमी का हटना माने प्रेम है। बस अब उस प्रेम पर ठप्पा, स्टैंप, ब्रांड नहीं लगा होगा। आप ये नहीं कह पाओगे दिस इज लव। या दिस पर्टिकुलर एक्ट इस कैरेक्टराइजेस लव। तब नहीं कह पाओगे। तो साधारण सी बात है। बहुत साधारण सी बात है। नाचने नहीं लग जाओगे कि जिंदगी में प्यार आ गया। अब मैं नाच रहा हूं। नाच भी सकते हो। मना कौन कर रहा है? पर नाचने को ही प्रेम नहीं कहोगे।
41:15 किसी कर्म विशेष को प्रेम नहीं कहोगे। किसी स्थिति विशेष को प्रेम नहीं कहोगे। किसी व्यक्ति विशेष के प्रेमी नहीं हो जाओगे। स्वयं ही विशेष नहीं रह जाओगे। और जब तक वह जो भीतर बैठा है विशेष बना हुआ विशिष्ट विषूर्ण तब तक ये उम्मीद करना कि उसकी हरकतों से कुछ अच्छा भी हो सकता है। कुछ शुभ हो सकता है। बच्चा है छोटा बच्चे का कल्याण हो सकता है। ये सब उम्मीदें यूटोपियन है।
42:00 [हंसी] दे अभी अभी हावर्ड रार्क था वो फिक्शन से था अब मारी क्यूरी चले गए मारी क्यूरी भी आपके लिए बेटा उतनी ही फिक्शन है जितनी हावर्ड रॉर्क आप उनके घर में गए आपको क्या पता उनकी जिंदगी का? तो फिर अपनी जिंदगी में झांकने की जगह पहले गए प्रातभाषिक तल पर कल्पना उठाई किसकी? हॉवर्ड रार्क की। अब मारी को पकड़ रहे हो तुम्हें क्या पता उनका? आपके पास अपनी जिंदगी उपलब्ध है कि नहीं? तो आप दूसरे की रसोई में क्यों झांक
42:46 रहे हो? आपके सामने वो रखा हुआ है जिसको मैं कह रहा हूं कि ज़हर है। आप उसको देखने की जगह आप जाकर देख रहे हो वो क्या खा रहा है, वो क्या खा रहा है? आपने कहा था फैसला अकारण होता है बिना कार्य कारण के जो प्रेम के कर्म की बात होती है पर मेरे जीवन में तो सब कुछ कार्य कारण से ही चल रहा है तो तुम्हारा जीवन गड़बड़ है ठीक करो तो इसमें मैं क्या करूंगा आप भी सर कोई भी विशिष्ट काम कोई भी काम कर सकते थे ना पर आपने यही काम चुना हम लोग को सुधारने का हम लोग के लिए करने का अभी के लिए हो रहा है मैंने कहा कि यही करता रहूंगा [हंसी] तो वही एक पल पर तो कोई ना कोई काम हो ही रहा होगा कुछ ऐसा नहीं है कि चुनाव होना है। मैं चुने को अनचना भी कर सकता हूं। गायब हो जाऊंगा। क्या कर लोगे?
43:34 तुम्हारा जो मेंटल मॉडल है ना कि एक कोई खास व्यक्ति होता है। व्यक्ति को आचार्य जी ने काट दिया। तो एक कोई खास काम होता है आदमी जिसके लिए जान लुटा देता है। तो पहले जो सामने आइडल थी वो एक स्त्री की थी। अब वो स्त्री की नहीं है। अब वो एक प्रोफेशन की है। तो पर्सन से हट के प्रोफेशन पे आ गए पर आइडलाइज जरूर करना है। माने विषय जरूर बनाना है कि मैं हूं और वो है जिससे प्यार है और उसको रखने में किसको साफ बचा गए? स्वयं को अहंकार को अरे भाई अभी यह है तो है। दूसरी बात यह भी कितना रहता है? महीने में 15 दिन और जिन दिनों में रहता भी है तुम कभी 2 घंटा कभी 4 घंटा। तुम्हें क्या लग रहा है? इसके अलावा मैं विलुप्त
44:20 हो जाता हूं। इस एक कर्म के अलावा मेरे पास कोई और दूसरा कर्म ही नहीं है। नहीं है। सचमुच नहीं है। मैंने चूज़ क्या किया है? 100 कर्म है उसमें से यह भी है। और जिस दिन यह नहीं होगा मैं जो कुछ भी कर रहा होगा। यदि प्रेम है तो उसमें भी झलकेगा। यदि उत्कृष्टता है तो उसमें भी झलकेगी। और अगर नहीं है तो ना इसमें होगी ना उसमें होगी। बिल्कुल हो सकता है मैं यहां से हट के किसी दिन बावर्ची बन जाऊं। क्यों नहीं हो सकता? और फिर मैं अगर रोटियां बनाऊंगा तो बढ़िया बनाऊंगा। तो फिर वो सर नेचुरल टैलेंट की बात बिल्कुल मिथ्या है।
45:05 [हंसी] बैठो बैठो। प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी मेरा प्रश्न था कि जैसे धीरे-धीरे जैसे मैं अपने आपको मैंने सुनना शुरू किया मैं मेरा झुकना धीरे-धीरे कम हो गया लोगों के सामने खासकर रिश्तेदारों के सामने इसका एक बहुत अच्छा परिणाम भी आया कि कबीरों के सामने झुकना शुरू किया बुद्ध के सामने झुकना शुरू किया लेकिन जब भी ये चीज होती है मेरे जीवन में तो अक्सर घर वालों की तरफ से एक तर्क आता है जो आपने ही दिया है कि चांद से रोशनी तो दाग नहीं तो वो बोलते हैं रिश्तेदारों से चलो उनमें जो अच्छाई है कम से कम तो उसको तो प्रणाम कर दो उसके नाते उनका पैर छू लो तो वहां मैं
45:51 थोड़ा ये हो जाता हूं कि हां कुछ तो अच्छाई हो सकती है क्या पता [हंसी] तो इतनी देर से हम बात कर रहे हैं एक केंद्र की भाई कह रहे हैं नहीं केंद्र कुछ भी हो उस केंद्र के बावजूद कुछ अच्छाई होती है किसी में और कुछ बुराई होती है और तुमने ने मुझसे सुनने के बाद सीखा है कि किसी के सामने झुकना नहीं है। अब तुम सिर्फ बुद्धों, कबीरों और कृष्णों की बात सुनते हो क्योंकि तुम्हें उनकी बात पूरी तरह समझ में आ गई है। नासमझ तो घर वाले हैं। कुछ अच्छाइयां तो सब में होती हैं।
46:36 आज 4 घंटे से इसका भोपो बन गया। क्या बता रहा हूं? कुछ अच्छाइयों से मतलब इनका यही है कि कुछ कर्म तो उनके अच्छे हैं ना और कुछ कर्म बुरे हैं। चलो तुम बुरे वाले मत देखो क्योंकि चांद के धब्बे नहीं देखे जाते। उनके अच्छे वाले कर्म देख के उनका पांव छू लो। नहीं मैं वैसे नहीं छूता नहीं हूं मैं। अरे तुम नहीं इल्जाम लगा रहा कि तुमने छू दिया है। [हंसी] तुम्हारा पूरा मॉडल उखड़ा हुआ है। ये क्या होता है कि हर आदमी में कुछ अच्छाइयां और कुछ बुराइयां होती हैं। यह कौन सा लोग धर्म उठा लाए? देखो कोई भी आदमी भगवान नहीं होता। कोई भी व्यक्ति पूरी तरह सही नहीं होता। और बात सुनने में कितनी अच्छी लगती है। हमारी बात तो बिल्कुल ठीक बोली। हर व्यक्ति कुछ सही बातें बोलता है और कुछ गलत बातें बोलता
47:22 है। बोलता है कि नहीं बोलता है। हां ये बात तो बिल्कुल सही है। ये तो गजब हो गया। ना कोई भगवान होता, ना कोई शैतान होता। सब थोड़े अच्छे, थोड़े बुरे होते हैं। इट्स अ ग्रे जोन। डोंट डील इन बाइनरीज। और वेदांत पूरा बाइनरी ही सिखा रहा है कि दो ही केंद्र होते हैं या तो भ्रम के या स्पष्टता के और तुम मेरे पास लोक धर्म लेकर के चले आए बिल्कुल उसके दूत बनकर कि कुछ अच्छाइयां तो सब में होती है और वो अच्छाइयां तुमने कैसे देखी कि उन्होंने कभी कहा इधर आना बेटा क्या कैसा चल रहा है पढ़ाई लिखाई अच्छी चल रही है ले ये ले 500 रख
48:10 कुछ अच्छाइयां तो सब में होती हैं। लेट्स नॉट डील इन एब्सोल्यूट्स। लेट्स नॉट मेक अ गॉड आउट ऑफ एनीबॉडी। आई मीन लेट्स बी क्रिटिकल टुवर्ड्स एवरीबॉडी। सबने कुछ तो गड़बड़ करी होती है। मतलब समझ रहे हो क्या है? परमार्थ कुछ होता ही नहीं। जो है सो व्यवहार है। इसी के नाते तो मुझसे बहुत लोग नाराज हैं। कहते हैं गीता ठीक है पर कृष्ण ने भी काफी
48:56 गलतियां कर रखी हैं। आप उन गलतियों को एकनॉलेज किया करिए। आप तो गीता में जो कुछ लिखा है उसको सबको आप जस्टिफाई कर देते हो। अब आज जो आपसे बात करी मैंने यह अभी जब उनके हाथ पड़ने वाली है कहेंगे यह देखो इन्होंने गीता में वर्थ डाल दिए जो कृष्ण ने उसमें डाले नहीं थे ये तो पूरी जो पूरा श्लोक है वो कृष्ण की द्वैतात्मक भूल है और इसको इन्होंने बिल्कुल अद्वैत हम कहां तड़का लगा दिया भाई अगर गीता गीताकार एक है तो वो यह तो नहीं कर सकता ना कि एक श्लोक में कुछ बोलेगा एक में कुछ बोलेगा
49:45 कि करेगा और हम यह भी जानते हैं बार-बार कि देखे हुए को अनदेखा नहीं करा जा सकता कहा है कि नहीं तो जिसने एक बार स्थल की बात बोल दी अब अगर वो स्थल की बात भी बोले तो उसमें खोजो ये कि यह कहां पर है यह सूत्र है क्योंकि जिसने ने यह बोल दिया। अब वो ये अगर यह भी बोलेगा तो उसमें कुछ होगा। बहुत मुझे बात खुफिया लगी थी। एकदम कौंध गई थी। जब पढ़ा था कि उपनिषद में कि शिष्य पीछे पड़े गुरु से बहुत दिन से आपने कोई बात नहीं सेशन नहीं कुछ उपनिषद वगैरह सुनाइए। तो गुरु मुड़कर बोलते हैं कि जो तुमसे बोल रहे हैं ना मजाक में भी ये नहीं है वहां
50:30 पे मजाक में। वहां बस ये है कि जो भी बोल रहे हैं वही उपनिषद है। तुम ये क्यों सोच रहे हो कि कोई बिल्कुल हमने जब दार्शनिक व्याकरण में बात बोली हो मात्र तभी वो उपनिषद होती है। जो हमारी बात तुमको बहुत साधारण सी भी लग रही हो। वो साधारण तुम्हें तुम्हारी अविद्या के कारण लग रही है। तुम उसमें भी उच्चतम अर्थ खोज लेना। तो गीता में यदि कोई उच्चतम बात है तो मैं हर श्लोक को उच्चतम अर्थ ही दूंगा। मेरा काम यह थोड़ी है कि श्लोक को ले लूं और उसका जो साधारण सा अर्थ है आपके सामने रख दूं। आप यहां किसी साधारण चीज के लिए आए हो क्या? बोलो।
51:16 तो गीता जो उच्चतम अर्थ रख सकती है और रखती है वह आपको देता हूं। पर इस प्रश्न का फ्रेमवर्क अगर मैं उठा लूं तो उसमें यही निकलेगा कि कृष्ण ने कुछ बातें तो बड़ी ऊंची करी है और कुछ बातें बड़ी ऑर्डिनरी करी है। इतना ही नहीं है। कुछ बातें तो शकुनी में भी बहुत बढ़िया है ना। तो बेटा जा शकुनी मामा के पांव छू के आ। भाई केंद्र बाइनरी ही होता है। एब्सोल्यूट ही होता है। और खुशी की बात यह है कि परमानेंट नहीं होता है।
52:02 रो मत कि कृष्ण को तो एब्सोलुटली हाई और हमें एब्सोलुटली लो बोल दिया। कह दो ठीक है अभी यहां है पर वहां हो सकते हैं और मैं कृष्ण को एब्सोलुटली हाई नहीं बोलता बहुत बार समझाया है मैं एब्सोल्यूटली हाई को कृष्ण बोलता हूं मैं गॉड इज ट्रुथ नहीं बोलता मैं ट्रुथ इज गॉड बोलता हूं और इन सब बातों में आप सब खूब फंसते होंगे यह कुछ बातें तो उधर भी गलत है ना। मान लो कुछ बातें इधर गलत है। चलो ठीक है 80 20 कर लेते हैं। उधर 80% सही है पर 20% तो हम भी सही है ना? फस मत जाना। गलत केंद्र से
52:47 जो किया जाएगा सब गलत होगा। बहुत पुराना उदाहरण है। बहुत बार दिया है पर अब तुम खड़े हो गए तो फिर दे देता हूं। एकदम मेरा खोपड़ा आउट है। ठीक है। एकदम पागल विक्षिप्त। अरे रुको पागल मैं हूं आप थोड़ी हो रुको [हंसी] रुक बोलिए बोलिए रुक रुक मेरा कर्म गलत था मेरा कर्म गलत था मुझे रोक दिया गया [नाक से की जाने वाली आवाज़] लगता है कि बाएं मुड़ा ये बाएं मुड़ने का कर्म गलत था इसलिए मुझे रोक दिया गया [गला साफ़ करने की आवाज़] हम्
53:43 [प्रशंसा] यह है तुम्हारा लोक धार्मिक मॉडल जिसके हिसाब से कुछ कर्म गलत होते हैं। तो कभी यह वाला कर्म गलत है तो इसको बदल लूंगा तो उधर वाला गलत होगा तो उसको उधर उधर अरे मैं ही गलत हूं मैं किधर भी जाऊं चारों दिशाएं गलत होंगी जो गलत आदमी है उसके लिए जरा भी कोई सहानुभूति नहीं वो जो कुछ कर रहा है सब गलत है क्या मैं इतना गलत हूं हां तू इतना गलत है हां तू इतना गलत है क्योंकि तू गलत है कर्म सही या गलत नहीं होते कर्ता सही है गलत होता है जब तू ही भीतर से बोराया हुआ है तो तेरा कोई भी कर्म ठीक कैसे होगा?
54:29 हां कभी कभार तेरा कोई कर्म ठीक लग सकता है। जैसे कहते हैं ना बंद घड़ी भी दिन में दो बार सही समय दिखाती है तो उसी तरीके से कभी कभार तेरा कोई कर्म सही प्रतीत हो सकता है। पर बस संयोगवश सही लग रहा है। तेरा केंद्र अभी भी गलत है। जब तेरे कर्म ठीक लग रहे हो तब भी तेरा केंद्र गलत है। तू तब भी गलत है। तो अन्याय नहीं कर रहे हम। अगर हम कह रहे हैं कि तू कुछ भी करे सब गलत होगा। धन्यवाद आचार्य जी। आपको खुशी होगी इस नाते जो हमारी अपनी ऐप है जिसमें हमारे गीता और बाकी सब कार्यक्रम चलते हैं। यहां पर बुद्ध हैं,
55:14 गीता है, उपनिषद है, अष्टावक्र हैं। यह मुझे मिले, मेरी जिंदगी बदली। ये तुम्हें मिलेंगे तुम्हारी जिंदगी भी बदलेगी। सच पूछिए तो मतलब लाखों नहीं तो कम से कम हजारों जिंदगियां तो हैं जो बिल्कुल बदली हैं। 2 लाख से अधिक गीता प्रतिभागियों के साथ जुड़े आचार्य प्रशांत ऐप पर। पहला महीना बिल्कुल फ्री गीता मिशन का पूरा एक्सेस। ऐप पर आपको मिलेंगे नियमित [संगीत] लाइव सत्र। हर दिन आचार्य प्रशांत के विशेष संवाद। गीता कम्युनिटी का एक्सेस, गीता परीक्षा, चयनित समाचार, ऑडियो बुक्स, कोर्ट्स और भी बहुत कुछ। Google Play स्टोर या Apple App स्टोर पर आचार्य प्रशांत सर्च करें और अभी डाउनलोड करें।
56:02 हम्म