अध्यात्म विद्या कैसे प्राप्त करें ?

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संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो 'श्रमणा वात रसना' के विषय पर आधारित है, जिसमें नव योगेश्वरों के जीवन और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति के मार्ग पर प्रकाश डाला गया है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार उन्होंने कठिन परिश्रम और त्याग से विद्या प्राप्त की। गुरु के महत्व और शिष्य के कर्तव्य पर भी जोर दिया गया है, जिसमें मन लगाकर सुनना, लिखना और पुनरावृत्ति करना शामिल है।

  • नव योगेश्वरों का जीवन और उनकी तपस्या
  • गुरु-शिष्य परंपरा का महत्व
  • विद्या प्राप्ति के लिए परिश्रम और त्याग

श्रमणा वात रसना: नव योगेश्वर

वीडियो की शुरुआत 'श्रमणा वात रसना' से होती है, जो नव योगेश्वरों के लिए श्रीमद् भागवत के एकादश स्कंध में आए हैं। ये भगवान ऋषभदेव जी के पुत्र और राजा भरत के भाई थे। 'श्रमणा' का अर्थ है श्रमपूर्वक अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना। लाखों वर्ष पूर्व, ये नव योगेश्वर दिगंबर थे, अर्थात वायु को ही वस्त्र मानते थे और संग्रह से दूर रहते थे।

ऋषभदेव के पुत्रों की दशा

ऋषभदेव जी के पुत्रों ने भी विद्या प्राप्ति के लिए कठिन परिश्रम किया और संग्रह से दूर रहे। आज के समय में, सहज रूप से सब कुछ प्राप्त करने की अपेक्षा की जाती है, जबकि प्राचीन समय में लोग कड़ी मेहनत और त्याग से विद्या प्राप्त करते थे। वे अपमान सहते थे और भूखे रहकर भी अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ते थे।

गुरु का महत्व और शिष्य के कर्तव्य

गुरु युक्ति, अनुभूति और दृष्टांतों के माध्यम से ज्ञान प्रदान करते हैं, जिससे शिष्य का मार्ग सुगम हो जाता है। प्रजापति ने सांकेतिक भाषा में उपदेश दिया, जिसे समझने में इंद्र को 101 वर्ष लग गए। गुरु को चाहिए कि वह स्पष्टीकरण के साथ पढ़ाए, जिससे शिष्य का भार हल्का हो जाए। वेदांत श्रवण से अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक पुण्य मिलता है, लेकिन वह किसी और जन्म में फलीभूत होता है।

विद्या प्राप्ति का सही तरीका

पढ़ने के लिए आने से पहले, छात्रों को आधा घंटा या एक घंटा परिश्रम करना चाहिए। सुनते समय मनोयोग पूर्वक सुनना चाहिए और भूलने की संभावना हो तो लिख लेना चाहिए। बाद में, अपने स्थान पर जाकर उसे देखना चाहिए, जिससे विद्या परिपुष्ट होती है। अध्यापक के न आने पर भी छात्र स्वयं पाठ पढ़कर क्लास ले लेते थे, क्योंकि वे पहले से ही पाठ पढ़कर आते थे।

अंतिम संदेश

इस प्रकार, 'श्रमणा वात रसना' के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि विद्या प्राप्ति के लिए परिश्रम, त्याग और गुरु के मार्गदर्शन का महत्व है। छात्रों को मन लगाकर सुनना, लिखना और पुनरावृत्ति करना चाहिए, जिससे उन्हें ज्ञान प्राप्त करने में सफलता मिले।

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Transcript

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0:00 श्रमणा वात रसना वात रसना नव योगेश्वरों के लिए श्रीमद् भागवत के एकादश स्कंध में आया वो कौन थे साक्षात भगवान ऋषक देव जी के पुत्र थे ज राजा भरत के भाइयों में थे नव योगेश्वर नव योगेश्वर लेकिन श्रमणा वात रसना लिखा है शणा माने श्रव श्रम पूर्वक उन्होंने अध्यात्मक ज्ञान प्राप्त किया था। उस समय लाखों वर्ष पूर्व नव योगेश्वर वात रसना माने दिगंबर थे। रसना वात रसना वायुद की जिनके रस वस्त्र अर्थात दिगंबर

0:46 भी थे। संग्रह परिग्रह से रहित थे। श्रमणाम बहुत परिश्रम करके उन्होंने अध्यात्म विद्या प्राप्त की थी। जब ऋषभदेव जी के पुत्रों की यह दशा थी कि श्रम करना पड़ा संग्रह परिग्रह से दूर रहे तब हम आप अगर सहज पके सो मीठा हो तो बात ठीक नहीं ना लेकिन हम लोग क्या करते हैं मालूम है बहुत परिश्रम करके बोटी बोटी गला गला के गाली सुन के क्या क्या अपमान सह के ये सब विद्या प्राप्त हुई है बहुत भूखे चक्कर आता था फिर भी पढ़ना नहीं छोड़ते थे। घर पे भोजन भी नहीं मिलता था बाबा होने के बाद। तो हम लोग फिर बहुत व्याख्या करके क्यों

1:33 बताते हैं? अपनी विद्या बगाड़ने के लिए नहीं। अगर गुरु युक्ति पूर्वक अनुभूति पूर्वक दृष्टांत पूर्वक बताते जाते हैं तो चेले का शिष्य का या पढ़ने वाले का मार्ग सुगम होता है या नहीं? नहीं तो आप देख लो चांद का आठवा अध्याय प्रजापति ने सांकेतिक भाषा में बोला उस सांकेतिक भाषा ने 101 वर्ष तक इंद्र को तप करा दिया विलोचन तो बीच में ही भाग गया क्या अपनी बात का स्पष्टीकरण नहीं किया ना तो कुछ का कुछ समझा उन्होंने समझते समझते समझते समझते समझने में 101 वर्ष इंद्र के लगा दिए

2:18 ठीक ठीक है। प्रजापति ने लगाया। विचन तो 32 के बाद ही भाग गया। इसका अर्थ क्या है? बहुत सा कार्य तो गुरु लोग शिष्य का स्वयं कर लेते हैं। मनन निध्यासन के बल पर अत्यंत स्पष्टीकरण के साथ अगर गुरु पढ़ावे तो शिष्य का भार हल्का हो जाता है। फिर भी शिष्य समझे कि हमको पाठ के बाद ना आगे देखना है ना पीछे तो पुण्य तो होगा। वेदांत श्रवण से भी अश्वमेध याग से भी अधिक पुण्य होता है। लेकिन किसी और जन्म में फलीभूत होगा। इस जैन वन में तो पढ़ने के लिए आने के पहले आधा घंटा एक घंटा परिश्रम अपनी ओर से करना चाहिए।

3:04 सुनते समय मनोयोग पूर्वक सुने। जो भूलने की संभावना हो तो लिख ले। उसके बाद फिर जाकर अपने स्थान पर उसको देखें तो विद्या परिपुष्ट होती। क्या हम पढ़ते थे तो जो भी अध्यापक नहीं आते थे वो चला देगा क्लास ले लेगा। कारण क्या था? वो पाठ पढ़ के आता था। 75% तो बिना पढ़ाए ही अपने आप समझ में आ जाता था। फिर गुरु जी ने पढ़ाया। उसके बाद जाकर फिर पढ़ता था। तो क्या हुआ सुनता था मन लगाकर जो नहीं समझ में आता पूछता था पहले पढ़ के आता था बाद में फिर पढ़ता था इस प्रकार से तो

3:50 हमने संकेत किया श्रवणा वात रसना

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