0:00 हेलो फ्रेंड्स, बुक इंसाइडर पर आप सभी का स्वागत है। आज हम बात करने वाले हैं एटॉमिक हैबिट्स बाय जेम्स क्लियर बुक के बारे में। रात के करीब 11:00 बजे थे और अभय अपने छोटे से कमरे में बैठा मोबाइल स्क्रीन पर स्क्रॉल करता जा रहा था। हर दिन की तरह आज भी उसने सोच रखा था कि कल से सब बदललूंगा। वो जिम ज्वाइन करेगा, हेल्थी खाना खाएगा। अपने ड्रीम स्टार्टअप के लिए काम शुरू करेगा। लेकिन हर दिन की तरह आज भी सिर्फ सोच में ही रह गया। अभय कोई असाधारण इंसान नहीं था। बस एक नॉर्मल मिडिल क्लास फैमिली से था जो अपनी लाइफ में कुछ बड़ा करना चाहता था। लेकिन हमेशा एक ही बात सोच कर परेशान रहता था कि यार इतनी बड़ी जिंदगी है। इतना कुछ बदलना है।
0:45 कहां से शुरू करूं? और यही सोच-सच कर कुछ भी शुरू नहीं कर पाता था। फिर एक दिन उसके एक दोस्त निखिल ने उसे एक किताब दी एटॉमिक हैबिट्स बाय जेम्स क्लियर। शुरू में तो अभय को लगा कि यह भी कोई टिपिकल मोटिवेशनल बुक होगी जिसमें वही घिसेपिटे बातें होंगी। बिलीव इन योरसेल्फ नेवर गिव अप वगैरह। लेकिन जब उसने पढ़ना शुरू किया तो धीरे-धीरे उसे समझ में आने लगा कि यह किताब कुछ अलग है। इसमें छोटे-छोटे बदलावों की ताकत के बारे में बात की गई थी। जिनका असर धीरे-धीरे बढ़ता है और एक दिन बड़ी सक्सेस में बदल जाता है। किताब का पहला कांसेप्ट ही था एटॉमिक हैबिट्स यानी छोटे-छोटे हैबिट्स जो इतने छोटे हो कि उन्हें इग्नोर करना आसान हो लेकिन
1:30 उन्हें रोज करना शुरू कर दो तो उनका असर बहुत बड़ा होता है। अभय को यह बात बहुत जमी। उसने सोचा चलो एक्सपेरिमेंट करते हैं। इस बार परफेक्शन नहीं बस कंसिस्टेंसी पर फोकस करेंगे। अगले दिन सुबह उठते ही उसने कोई बड़ा गोल नहीं बनाया। बस यह तय किया कि हर दिन सुबह उठकर 5 मिनट स्ट्रेचिंग करेगा। सिर्फ 5 मिनट ना जिम जाना ना कोई हार्ड कोर रूटीन। बस 5 मिनट अपने शरीर को हिलाना डुलाना। पहले दिन बड़ा ऑकवर्ड लगा। पर उसने खुद से कहा, सिर्फ 5 मिनट की बात है। फिर जो चाहे कर लेना और यही सोचकर उसने 5 मिनट एक्सरसाइज की। धीरे-धीरे यह 5 मिनट 10 मिनट में बदल गए। फिर उसने सोचा अब जब बॉडी थोड़ी एक्टिव हो गई है तो दिन की शुरुआत एक
2:17 अच्छी किताब पढ़ने से क्यों ना की जाए। उसने हर सुबह 10 मिनट रीडिंग की हैबिट डाल ली। शुरू में उसे खुद पर हंसी आती थी कि इतने छोटे-छोटे स्टेप ले रहा हूं। लेकिन फिर उसे जेम्स क्लियर की एक बात याद आई। अदते स्वधार की संयुक्त ब्याज दर है। मतलब जैसे पैसे का इंटरेस्ट धीरे-धीरे बढ़कर एक दिन बड़ी रकम बन जाता है, वैसे ही हैबिट्स भी कंपाउंड होती हैं। अभय ने खुद को समझाया कि यह 10-10 मिनट के बदलाव ही एक दिन उसे उस इंसान में बदलेंगे जो वह बनना चाहता है। एक महीना बीत गया और वह बिना किसी स्किप के अपनी छोटी-छोटी हैबिट्स करता रहा। अब उसका माइंडसेट धीरे-धीरे बदलने लगा था। पहले जहां वह सोचता था कि बदलाव बढ़ा होना चाहिए तभी कुछ फर्क पड़ेगा। अब वह जान चुका था कि असली ताकत
3:03 कंसिस्टेंसी में है ना कि इंटेंसिटी में। फिर उसने एक और बदलाव किया। उसने रात को सोने से पहले मोबाइल चलाना बंद कर दिया। इसकी जगह उसने एक नोटबुक रखना शुरू किया। जिसमें वो अगले दिन के तीन छोटे-छोटे गोल्स लिखता था। जैसे 10 मिनट वॉक, एक गिलास पानी ज्यादा पीना, एक नया आईडिया सोचना अपने स्टार्टअप के लिए। धीरे-धीरे उसका कॉन्फिडेंस लेवल बढ़ने लगा। पहले जो काम उसे असंभव लगते थे, अब वह डबल लगने लगे। रीजन सिंपल था। वह उन्हें छोटे टुकड़ों में डिवाइड कर चुका था। एक बार उसके घर में शादी थी, सब लोग बिजी थे और रूटीन टोटली डिस्टर्ब हो गया। पहले के अभय को यह एक परफेक्ट एक्सक्यूज मिल जाता था। अब तो सब बिगड़ गया। फिर से शुरू करना मुश्किल है। लेकिन अब का अभय अलग था। उसने उस केओस में भी अपने 2 मिनट की हैबिट नहीं
3:50 छोड़ी। उसने खुद को याद दिलाया मिस वंस बट नेवर मिस ट्वाइस। यह बात उसके दिल में बस गई थी। एक दिन का ब्रेक चलता है, लेकिन दो दिन का ब्रेक बहुत जल्दी हैबिट को खत्म कर देता है। अभय की लाइफ अब बहुत ऑर्गेनाइज्ड नहीं थी, पर बहुत इंटेंशनल थी। वो हर काम सोच समझ कर रहा था। उसने सोशल मीडिया का यूज कम कर दिया था और स्क्रीन टाइम ट्रैक करना शुरू कर दिया था। यह सब उसने एक साथ नहीं किया था। हर हफ्ते बस एक नया छोटा चेंज ऐड करता था और पुराने को मेंटेन करता था। कुछ महीनों बाद उसके दोस्त उसे देखकर हैरान रह गए। तू तो बदल ही गया भाई। एक दोस्त ने कहा अभय हंसा और बोला कुछ नहीं यार। बस रोज 1% बेहतर बनने की कोशिश कर रहा हूं। दोस्तों को उसकी बात सुनकर लगा
4:37 कि वह मजाक कर रहा है। पर असल में वह यही कर रहा था हर दिन एक प्रतिशत सुधार। उसने अपनी एक पुरानी आदत भी छोड़ी नकारात्मक आत्मविचार। पहले वह खुद को ही अंडरएस्टिमेट करता था। मुझसे नहीं होगा। मैं लेजी हूं। मैं डिसिप्लिंड नहीं हूं। लेकिन अब उसने हर बार ऐसी सोच आते ही खुद से एक ही सवाल करना शुरू किया। क्या मैं आज 1% बेहतर बन सकता हूं? और जवाब अगर हां होता तो वह उस डायरेक्शन में एक छोटा कदम उठा लेता। स्टार्टअप का आईडिया भी अब धीरे-धीरे शेप लेने लगा था। उसने मार्केट रिसर्च शुरू की। छोटे स्केल पर ट्रायल ल्च किया और पहले 3 महीने में ही उसे कुछ अच्छे क्लाइंट्स मिलने लगे। वह शॉक्ड था कि इतने सिंपल छोटे स्टेप्स से इतने बड़े
5:22 रिजल्ट्स मिल सकते हैं। एक दिन उसने अपने कमरे की दीवार पर एक कोट लिखा। सफलता एक लक्ष्य नहीं है। यह एक प्रणाली है। एंड सिस्टम्स आर बिल्ट विद हैबिट्स। अब अभय को हर दिन बड़ा करने का प्रेशर नहीं होता था। अब उसे बस यह करना होता था कि अपने सिस्टम को फॉलो करें। यह सिस्टम उसे कहीं ना कहीं उस मंजिल तक ले ही जाएगा जहां वह जाना चाहता है। इस पूरे सफर में अभय ने जो सबसे बड़ा लेसन सीखा वो यही था। चेंज डजंट रिक्वायर मोटिवेशन। इट रिक्वायर्स क्लेरिटी एंड कंसिस्टेंसी। उसे अब मोटिवेशन की जरूरत नहीं थी। उसे बस यह क्लेरिटी चाहिए थी कि वह क्या हैबिट बना रहा है और कंसिस्टेंसी चाहिए थी उसे निभाने के लिए। अब अगर कोई उससे पूछता कि लाइफ चेंज कैसे हुई? तो वह कहता एक दिन
6:08 में कुछ नहीं बदला पर हर दिन थोड़ा-थोड़ा बदलता गया। यह है एटॉमिक हैबिट्स की पावर। छोटे-छोटे बदलाव जो दिखने में छोटे लगते हैं पर वक्त के साथ मिलकर एक बड़ा बदलाव बनाते हैं। जो लोग सोचते हैं कि उन्हें एकदम से सब कुछ बदलना है, वह अक्सर शुरू ही नहीं कर पाते। पर जो लोग बस 2 मिनट से शुरू करते हैं, वह एक दिन 2 घंटे तक भी पहुंच जाते हैं। अभय अब भी परफेक्ट नहीं है और शायद कभी होगा भी नहीं। लेकिन उसे अब परफेक्शन की जरूरत भी नहीं है। उसे चाहिए सिर्फ एक चीज प्रोग्रेस हर दिन, हर हफ्ते, हर महीने, बस थोड़ा-थोड़ा लेकिन लगातार। और यही है असली बदलाव की कहानी। एटॉमिक हैबिट्स की कहानी, अभय की कहानी जो शायद आपकी भी बन सकती है। सर्दियों की
6:55 सुबह थी, धुंध इतनी घनी थी कि खिड़की से बाहर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। अभय अपनी गर्म चाय का कप हाथ में लिए बालकनी में बैठा था। हाथ में मोबाइल था लेकिन आज वह स्क्रोल नहीं कर रहा था। बस सोच रहा था कि वह अब कहां पहुंचा है और कहां जाना चाहता है। पिछले कुछ महीनों में उसने खुद को बहुत बदलते देखा था। लेकिन अब वो एक और डीपर सवाल से जूझ रहा था। मैं कौन बन रहा हूं। अभय को अब समझ आने लगा था कि सिर्फ गोल सेट करना काफी नहीं होता। जैसे मैं 10 किलो वजन कम करना चाहता हूं या मुझे सक्सेसफुल बिजनेसमैन बनना है। यह सब आउटकम बेस्ड गोल्स होते हैं। लेकिन असली बदलाव तब होता है जब हम खुद से पूछते हैं मैं कौन बनना चाहता हूं। उसने अपने स्टार्टअप पर काम करना शुरू कर दिया था। कुछ
7:42 क्लाइंट्स भी जुड़ चुके थे। लेकिन एक दिन क्लाइंट से बहुत गंदी फीडबैक मिली। उसने साफ कहा तुम्हारा काम इमैच्योर लग रहा है। प्रोफेशनल टच मिसिंग है। पहले का अभय होता तो डीमोटिवेट होकर सब छोड़ देता। लेकिन अब उसने खुद से एक सवाल पूछा। अगर मैं एक रिस्पांसिबल एंटरप्रेन्योर बनना चाहता हूं तो मैं इस फीडबैक से कैसे डील करूंगा? यही आइडेंटिटी बेस्ड सोच थी। उसने आउटकम की परवाह नहीं की। बस खुद से जुड़ने की कोशिश की। वो सोचने लगा, क्या मैं ऐसा इंसान हूं जो मुश्किलों में पीछे हटता है या वो जो उनसे सीखता है? उसने अगले दिन से खुद की आइडेंटिटी रिीडफाइन करनी शुरू की। अब हर हैबिट सिर्फ किसी गोल को पाने के लिए नहीं थी बल्कि खुद को एक बेहतर इंसान बनाने के लिए थी। जैसे वह अब खुद से कहता मैं वो
8:27 इंसान हूं जो हर दिन कुछ नया सीखता है। इसके लिए उसने रोज 15 मिनट कुछ नया पढ़ना शुरू किया। वह अब यह नहीं सोचता था कि मुझे एक महीने में यह किताब खत्म करनी है। बल्कि वह सोचता एक पढ़ने वाला इंसान हर दिन थोड़ा पढ़ता ही है। फिर उसने एक दिन खुद से कहा मैं डिसिप्लिंड आदमी हूं। और उस थॉट के साथ उसने हर सुबह उठकर अपने बिस्तर को सही से लगाना शुरू किया। यह कोई बड़ा काम नहीं था। पर यह एक सिग्नल था उसके सबकॉन्शियस माइंड के लिए। मैं ऐसा इंसान हूं जो अपने आसपास की चीजों का ख्याल रखता है। धीरे-धीरे उसकी सोच बदलने लगी। अब अगर कोई उससे कहता यार तू तो बड़ा समय पर उठने लगा तो वह हंसकर कहता क्योंकि मैं अर्ली राइजर बनना चाहता हूं। यानी अब वो हैबिट्स आउटकम की वजह से नहीं अपनी
9:14 आइडेंटिटी की वजह से बना रहा था। एक बार उसके दोस्त राहुल ने पूछा तू इतना कंसिस्टेंट कैसे रह लेता है? मुझसे तो कोई हैबिट टिकती ही नहीं। अभय ने मुस्कुरा कर जवाब दिया क्योंकि मैं हैबिट नहीं बना रहा। मैं खुद को नया बना रहा हूं। राहुल को यह बात समझ नहीं आई। उसने पूछा मतलब अभय बोला देख जब कोई कहता है कि मैं स्मोकर हूं लेकिन छोड़ने की कोशिश कर रहा हूं तो वह अभी भी खुद को स्मोकर ही मानता है। लेकिन जब कोई कहता है मैं नॉन स्मोकर हूं तब वह खुद को एक नई आइडेंटिटी दे देता है और उस आइडेंटिटी के हिसाब से उसके एक्शंस बदल जाते हैं। राहुल चुप हो गया। शायद पहली बार उसने इतनी गहराई से हैबिट और आइडेंटिटी को जोड़कर देखा था। अभय अब
9:59 खुद को एंटरप्रेन्योर की तरह बिहेव करने लगा था। भले ही उसका स्टार्टअप अभी बहुत बड़ा नहीं था। उसने अपनी लैंग्वेज बदल दी थी। अब वह कहता मेरा बिजनेस ना कि मेरा छोटा सा ट्राई। इस छोटे से बदलाव ने उसके कॉन्फिडेंस को बहुत ऊपर उठा दिया। उसने एक डायरी बनानी शुरू की जिसमें वह रोज खुद से एक सवाल पूछता। आज मैंने ऐसा क्या किया जो उस इंसान के करीब मुझे ले गया जो मैं बनना चाहता हूं। कभी जवाब होता मैंने क्लाइंट की बात ध्यान से सुनी और डिफेंसिव नहीं हुआ। कभी होता मैंने मोबाइल साइड में रखकर एक घंटे डीप वर्क किया। कभी-कभी कुछ नहीं होता और वो ऑनेस्ट रहता। आज मैं डिस्ट्रैक्टेड था लेकिन कल बेहतर बनूंगा। धीरे-धीरे उसकी यह सेल्फ रिफ्लेक्शन हैबिट बन गई। अब वो खुद से लड़ने के बजाय खुद से
10:45 जुड़ने लगा था। उसके अंदर का ट्रांसफॉर्मेशन अब बाहर दिखने लगा था। उसकी बॉडी लैंग्वेज कॉन्फिडेंट हो गई थी। उसने किसी को इंप्रेस करने के लिए नहीं बल्कि खुद से कनेक्टेड रहने के लिए ड्रेसिंग पर ध्यान देना शुरू किया। वह सोचता मैं एक डिसिप्लिन, प्रेजेंटेबल, रिस्पेक्टफुल इंसान हूं और मुझे उसी के अनुसार दिखना भी चाहिए। उसने एक बहुत ही सिंपल तरीका अपनाया। हर बार जब वह कोई काम करता, वह खुद से पूछता, क्या यह उस इंसान का काम है जो मैं बनना चाहता हूं? जैसे रात को अगर उसे 12:00 बजे तक स्क्रोलिंग करनी होती तो वह खुद से पूछता क्या एक काम और फोकस्ड इंसान ऐसा करेगा। अगर जवाब नहीं होता तो वह मोबाइल बंद करके सो जाता। यह सारे चेंजेस छोटे-छोटे थे। पर उन्होंने अभय की आइडेंटिटी को रीइंफोर्स किया। अगर
11:32 आपको हमारी फ्री समरी अच्छी लगती है तो आप हमारे चैनल को सब्सक्राइब कर सकते हैं। हमारी मेंबरशिप खरीद सकते हैं या हमें यूपीआई के थ्रू सपोर्ट कर सकते हैं। अब समरी पर वापस चलते हैं। अब वह सिर्फ बदलाव नहीं कर रहा था। वह बदलाव को जी रहा था। फिर एक दिन एक बड़ा मोमेंट आया। उसे एक प्रेस्टीजियस इवेंट में एंटरप्रेन्योर के रूप में इनवाइट किया गया था। उसके पास खुद का कोई फैंसी ऑफिस नहीं था। स्टाफ भी छोटा था। लेकिन फिर भी उसे बुलाया गया। क्योंकि लोग उसकी सीरियसनेस और वर्क एथिक को पहचानने लगे थे। उसने स्टेज पर जाकर जब माइक पकड़ा तो उसका पहला वाक्य था मैं यहां किसी बड़े अचीवमेंट की वजह से नहीं बल्कि अपनी आइडेंटिटी की वजह से खड़ा हूं। मैंने खुद को एक कमिटेड लर्नर और
12:17 एंटरप्रेन्योर मानना शुरू किया और वही बन गया। हॉल में तालियां बज रही थी और अभय की आंखों में चमक थी। वह जानता था कि उसकी जर्नी अभी लंबी है। लेकिन अब उसे कोई डाउट नहीं था कि वह कौन है। रात को जब वह घर लौटा तो उसने अपने नोटबुक में लिखा आइडेंटिटी पहले बनाओ रिजल्ट खुद आ जाएंगे। उस दिन के बाद उसने गोल सेटिंग से ज्यादा आइडेंटिटी बिल्डिंग पर ध्यान देना शुरू कर दिया। अब उसके लिए यह जरूरी नहीं था कि वह एक साल में कितना कमा लेगा। बल्कि यह जरूरी था कि वह एक ऐसा इंसान बने जो कंसिस्टेंटली वैल्यू देता रहे। प्रोक्रेस्टिनेट करता था। दूसरों को ब्लेम करता था और खुद को कंफ्यूज्ड फील करता था। आज का अभय उन सब चीजों से अलग था। वो शांत था, क्लियर था और सबसे जरूरी अपने डिसीजंस
13:04 में इंटेंशनल था। उसने महसूस किया कि आइडेंटिटी बेस्ड हैबिट्स की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह टेंपरेरी नहीं होती। जैसे अगर कोई सिर्फ 10 किलो वजन कम करना चाहता है तो वह वेट लॉस के बाद फिर से अपनी पुरानी हैबिट्स में लौट सकता है। लेकिन अगर कोई खुद को फिट पर्सन मानने लगता है तो वह हमेशा हेल्थ को प्रायोरिटी देगा। अभय ने यही प्रिंसिपल हर जगह अप्लाई किया। अब वह खुद से कहता मैं वह इंसान हूं जो कमिटमेंट्स निभाता है। मैं वह इंसान हूं जो हर दिन कुछ वैल्यूुएबल सीखता है। मैं वह इंसान हूं जो डिसिप्लिन को एंजॉय करता है। अब उसकी आइडेंटिटी ही उसकी हैबिट बन गई थी। इस पूरे जर्नी में उसने यह सीखा कि अगर हम सिर्फ रिजल्ट्स पर फोकस करेंगे तो वह कभी भी शॉर्ट टर्म हैप्पीनेस से
13:50 ज्यादा नहीं देंगे। लेकिन अगर हम अपनी आइडेंटिटी को अपग्रेड करेंगे तो वह हैबिट्स नेचुरली हमारे जीवन का हिस्सा बन जाएंगी। आज भी जब अभय अपने दिन की शुरुआत करता है तो किसी चेक लिस्ट से नहीं बल्कि इस सोच से करता है। आज मैं उस इंसान की तरह जिऊंगा जो मैं बनने की कोशिश कर रहा हूं। और यही माइंडसेट उसकी सबसे बड़ी ताकत बन गया है। क्योंकि जब आपकी आइडेंटिटी हैबिट्स को ड्राइव करती है तो मोटिवेशन की जरूरत नहीं पड़ती। बस जीना होता है जैसे आप पहले से ही वह इंसान हैं। रात के लगभग 9:00 बजे थे। अभय अपने छोटे से ऑफिस में बैठा अपनी नोटबुक के पुराने पन्ने पलट रहा था। इन पन्नों में पिछले कुछ महीनों की सारी प्लानिंग, एक्सपेरिमेंट्स और रिफ्लेक्शंस भरे पड़े थे। हर पन्ना जैसे
14:35 उसके खुद के एक नए वर्जन को दिखा रहा था। लेकिन आज वो सिर्फ पढ़ने नहीं बैठा था। बल्कि एक नई परेशानी का हल ढूंढने की कोशिश कर रहा था। कुछ हफ्तों से उसका एक नया गोल था डेली जर्नलिंग। उसे लगा था कि यह उसकी क्लेरिटी और सेल्फ अवेयरनेस बढ़ाने में मदद करेगा। शुरुआत में दो-तीन दिन सब सही चला लेकिन फिर वो कंसिस्टेंसी टूटने लगी। वो जानना चाहता था कि इस बार उसकी हैबिट टिक क्यों नहीं पा रही। तभी उसे याद आया एटॉमिक हैबिट्स में एक कांसेप्ट था द चार लॉज़ ऑफ बिहेवियर चेंज। क्यू, क्रेविंग, रिस्पांस और रिवॉर्ड। उसने सोचा क्यों ना इस फार्मूला को इस्तेमाल करके देखा जाए। अगली सुबह उसने खुद से कहा चलो इस हैबिट को बिहेवियर के इन चार लेयर्स में तोड़ते हैं। शायद यही
15:21 मेरी प्रॉब्लम सॉल्व कर दे। सबसे पहले था क्यू यानी वो सिग्नल जो किसी हैबिट की शुरुआत करता है। उसने सोचा मैं जर्नलिंग कब करता हूं? जवाब था जब रात को सब काम खत्म हो जाते हैं। लेकिन तब तक वह थक चुका होता है और अक्सर मोबाइल स्क्रोल करते-करते सो जाता है। तो उसने सबसे पहले क्यों बदलने का फैसला किया? अब वह जर्नलिंग सुबह करेगा जब माइंड फ्रेश रहता है और क्यों होगा उसके डेस्क पर रखा उसका फेवरेट पेन और नोटबुक जो अब तक दराज में बंद रहते थे। उसने दोनों चीजें बाहर डेस्क पर रख दी ताकि उन्हें देखकर उसे हर दिन वही काम याद आए। अब बारी थी क्रेविंग की यानी वो डिजायर जो हमें एक्शन लेने पर मजबूर करता है। उसने खुद से पूछा मुझे इस
16:06 हैबिट में किस चीज की क्रेविंग हो सकती है? उसे लगा उसे अपनी सोच को वर्ड्स में बदलने की क्रेविंग है। खुद को समझने की क्रेविंग है। लेकिन वह काफी एब्स्ट्रैक्ट था। उसे कुछ और इमीडिएट और अट्रैक्टिव चाहिए था। इसलिए उसने जर्नलिंग को थोड़ा क्रिएटिव बना दिया। अब वो सिर्फ प्लेन थॉट्स नहीं लिखेगा बल्कि हर एंट्री के साथ एक सिंपल डूडल भी बनाएगा। चाहे वह अच्छा बने या खराब। उसने सोचा यह फन एलिमेंट मुझे इसे करने के लिए पुल करेगा। और वाकई यह ट्रिक काम कर गई। अब बारी थी रिस्पांस की यानी एक्चुअल एक्शन जो हैबिट बनाता है। पहले जब वह जर्नलिंग करने बैठता था तो नोटबुक ढूंढना, पेन लाना, माइंड क्लियर करना यह सब उसे बोझ जैसा लगता था। अब उसने सब सिंपलीफाई कर दिया था। नोटबुक और पेन
16:53 पहले से रेडी रहते थे और उसने एक फिक्स्ड फॉर्मेट बना लिया था। तीन लाइंस ग्रेटट्यूड, एक लाइन लेसन ऑफ द डे और एक डूडल। इससे उसे सोचने में ज्यादा एनर्जी नहीं लगती थी और रिस्पांस आसान हो गया। अब बचा रिवॉर्ड यानी उस हैबिट को रिपीट करने की वजह। पहले उसे जर्नलिंग के इमीडिएट बेनिफिट्स समझ नहीं आते थे। इसलिए उसने रिवॉर्ड सिस्टम खुद क्रिएट किया। हर जर्नलिंग के बाद वह खुद को एक स्टार स्टिककर देता था जो वह अपने वॉल कैलेंडर पर चिपकाता था। और हर सात स्टार पर वह खुद को एक छोटा सा रिवॉर्ड देता। कभी अपनी फेवरेट कॉफी, कभी एक नया बुकमार्क, कभी एक सोलो वॉक। यह सिंपल रिवॉर्ड्स ने उस हैबिट को और भी सेटिस्फाइंग बना दिया। यह चार स्टेप्स क्यू, क्रेविंग, रिस्पांस और
17:40 रिवॉर्ड मिलकर अब उसकी नई जर्नलिंग हैबिट को सपोर्ट कर रहे थे। उसने खुद को एक सिस्टम दिया था जिसमें मोटिवेशन की जरूरत ही नहीं थी। एक दिन उसके दोस्त राहुल फिर मिलने आए। उन्होंने कैलेंडर पर लगे स्टार स्टिकर्स देखे और पूछा भाई यह किंडर गार्डन वाली स्टिकर्स क्यों लगा रखी हैं? अभय हंसा और बोला, यही तो मेरी आइडेंटिटी का प्रूफ है कि मैं अपने स्मॉल विंस को सेलिब्रेट करना जानता हूं। राहुल को क्यूरियोसिटी हुई और उसने भी अभय से हैबिट फॉर्मेशन के बारे में जानना शुरू किया। अभय ने उसे समझाया, देख कोई भी नई हैबिट बनाने के लिए यह चार चीजें जरूरी हैं। सबसे पहले क्यूक्लियर और विजिबल होना चाहिए ताकि माइंड को सिग्नल मिले। फिर क्रेविंग होनी चाहिए। मतलब वो हैबिट खुद
18:26 में इतना इंटरेस्टिंग या मीनिंगफुल हो कि करने का मन हो। फिर रिस्पांस को आसान बनाना चाहिए। इतना सिंपल कि एक्सक्यूसेस ना मिले। और आखिर में रिवॉर्ड कुछ ऐसा जिससे ब्रेन को सिग्नल मिले कि यह एक्शन रिपीट करना चाहिए। राहुल ने सोचा मैं भी सुबह उठकर बुक पढ़ने की हैबिट बनाना चाहता हूं। अभय ने पूछा तो तेरे पास क्यों क्या होगा? राहुल बोला मेबी मैं बुक तकिया के पास रख दूं ताकि उठते ही दिखे। परफेक्ट अभय बोला क्रेविंग क्या होगी? राहुल थोड़ी देर सोच कर बोला यार मुझे लगता है मुझे थोड़ा इंस्पिरेशन चाहिए सुबह-सुबह। मे बी बुक पढ़कर मुझे एनर्जी मिलेगी। ग्रेट। रिस्पांस को आसान कैसे बनाएगा? बुक छोटी चैप्टर्स वाली लूंगा जिससे सिर्फ 5 से 10 मिनट में एक चैप्टर कंप्लीट हो जाए और
19:13 रिवॉर्ड हर बार पढ़ने के बाद मैं अपनी फेवरेट प्लेलिस्ट का एक गाना सुनूंगा। अभय मुस्कुराया और बोला अब तू भी बिहेवियर को डिजाइन कर रहा है फोर्स नहीं कर रहा। राहुल ने अगले ही दिन से इस हैबिट को अप्लाई करना शुरू किया। कुछ दिन बाद वह खुद आकर बोला, "भाई, यह चार लॉज़ मैजिक हैं यार।" अब लग रहा है कि मैं हैबिट्स को समझ रहा हूं। बस झेल नहीं रहा। अभय ने उसे याद दिलाया क्योंकि बिहेवियर चेंज कभी मोटिवेशन से नहीं डिजाइन से होता है। अभय ने अब इस फ्रेमवर्क को अपने बाकी हैबिट्स में भी अप्लाई करना शुरू कर दिया। जैसे सोशल मीडिया टाइम कम करने के लिए क्यू को एलिमिनेट किया। उसने Instagram को लास्ट स्क्रीन पर डाल दिया। क्रेविंग को रीडायरेक्ट किया। बोर्डम में वो जर्नलिंग या पढ़ना चुनता। रिस्पांस को हार्डर
19:58 बनाया। फोन में ऐप ओपन करने से पहले 10 सेकंड की डिले ऐप लगाई और रिवॉर्ड स्क्रीन टाइम कम होते ही वह खुद को ₹10 डेली पिगी बैंक में डालता जिससे महीने के अंत में वह अपनी फेवरेट चीज खरीद सके। अब उसे लगने लगा था कि हैबिट बनाना कोई टैलेंट नहीं बल्कि एक क्राफ्ट है जो कोई भी सीख सकता है अगर वह सही सिस्टम फॉलो करें। धीरे-धीरे उसने यह भी समझा कि यह चार लॉस सिर्फ अच्छी हैबिट्स के लिए ही नहीं बुरी हैबिट्स को ब्रेक करने के लिए भी काम आते हैं। बस उल्टा सोचने की जरूरत है। बुरी हैबिट तोड़नी है तो क्यू को इनविज़िबल बना दो। क्रेविंग को अनअट्रैक्टिव बनाओ। रिस्पांस को डिफिकल्ट बनाओ और रिवॉर्ड को अनसटिस्फाइंग। जैसे मोबाइल स्क्रोलिंग से बचने के लिए उसने फोन को दूसरे कमरे में
20:46 चार्ज पर लगाना शुरू किया। उसने सोशल मीडिया को ग्रे स्केल में रखा जिससे विजुअल्स डल लगे। उसने लॉक स्क्रीन पर रिमाइंडर लगाया, क्या यह काम तेरे उस इंसान को करीब ले जाएगा जो तू बनना चाहता है? और अगर कभी उसने टाइम वेस्ट किया तो उसे अपनी पिगी बैंक से ₹10 निकालकर पेनल्टी जार में डालने पड़े। इस प्लेफुल डिजाइन ने उसे बुरे बिहेवियर से भी दूर रखा। अब अभय के लिए हैबिट फॉर्मेशन एक बोरिंग डिसिप्लिन नहीं था बल्कि एक एक्साइटिंग एक्सपेरिमेंट था जैसे कोई साइंटिस्ट अपने ऊपर रिसर्च कर रहा हो। उसने अपनी जर्नी की एक नई नोटबुक शुरू की। नाम रखा बिहेवियर लैब। इसमें वो अपनी हर नई हैबिट को इन चार लेयर्स में डिवाइड करके टेस्ट करता। कभी सफल होता कभी नहीं। पर अब वह हार नहीं मानता क्योंकि उसे
21:31 प्रोसेस पर ट्रस्ट हो गया था। वह समझ चुका था हैबिट्स सिर्फ काम करने की टेक्निक नहीं बल्कि खुद को डिजाइन करने की आर्ट है। और इस आर्ट के चार रंग होते हैं क्यू, क्रेविंग, रिस्पांस और रिवॉर्ड। आज भी जब वह किसी नए गोल पर काम शुरू करता है, तो वह एक ही सेंटेंस लिखता है। डिजाइन दी हैबिट नॉट जस्ट दी आउटकम। और यहीं से उसकी नई कहानी शुरू होती है। हर दिन हर हैबिट के साथ। उस दिन रविवार था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी और अभय खिड़की के पास बैठा चाय की चुस्कियों के साथ अपनी नई हैबिट नोटबुक पलट रहा था। काफी दिनों से वह सेल्फ ग्रोथ की जर्नी पर था और अब उसे खुद पर एक अजीब सा कॉन्फिडेंस महसूस होने लगा था। उसने छोटे-छोटे बदलावों से बहुत
22:18 कुछ सीखा था। कंसिस्टेंसी, आइडेंटिटी बेस्ड हैबिट्स और बिहेवियर चेंज के चार लॉस। लेकिन अब वो एक नई चैलेंज को लेकर थोड़ा परेशान था। असल में पिछले कुछ दिनों से उसने मेडिटेशन की हैबिट शुरू करने की कोशिश की थी। सब कुछ पढ़ लिया था। बेनिफिट्स, टेक्निक्स, एप्स तक डाउनलोड कर ली थी। लेकिन फिर भी वह एक दिन करता और दूसरे दिन भूल जाता। कई बार तो उसे दिन के अंत में याद आता कि अरे आज तो मेडिटेशन करना था। उसने सोचा मैं इतनी सारी हैबिट्स में कंसिस्टेंट हो सकता हूं। तो मेडिटेशन क्यों नहीं हो पा रहा? उसी दिन शाम को वह एटॉमिक हैबिट्स की उसी सेक्शन पर वापस गया। जहां जेम्स क्लियर ने लिखा था मेक इट ऑब्वियस। उसने किताब के उस हिस्से को फिर से पढ़ा और एक चीज उसके दिमाग में सीधे
23:04 क्लिक कर गई। इंप्लीमेंटेशन इंटेंशंस और हैबिट स्टकिंग यानी हैबिट को वेग नहीं रखना बल्कि क्रिस्टल क्लियर प्लान बनाना। मैं कब, कहां और कैसे यह हैबिट करूंगा। अभय को समझ आ गया कि उसकी मेडिटेशन हैबिट की सबसे बड़ी प्रॉब्लम यही थी वेगनेस। उसने बस मन में सोचा था कि रोज मेडिटेशन करूंगा। लेकिन ना कोई फिक्स्ड टाइम था ना कोई फिक्स्ड जगह और जब तक कोई हैबिट अनक्लियर रहती है तब तक माइंड उसे इग्नोर करता रहता है। अगले दिन से उसने इंप्लीमेंटेशन इंटेंशन तैयार किया। मैं हर दिन सुबह 7:00 बजे जब मैं अपनी चाय पी लूंगा उसके तुरंत बाद 5 मिनट मेडिटेशन करूंगा अपने रीडिंग कॉर्नर में। अब हैबिट वॉक नहीं थी बल्कि स्पेसिफिक थी। क्यों भी सेट था चाय खत्म होना। टाइम भी फिक्स था
23:50 और जगह भी तय हो चुकी थी। अगले दिन उसने जैसे ही चाय खत्म की सीधे रीडिंग कॉर्नर में गया ऐप खोला और 5 मिनट का मेडिटेशन किया और सबसे मजेदार बात उसको याद रखने की जरूरत ही नहीं पड़ी क्यों ने खुद ही काम कर दिया। इस टेक्निक ने उसके लिए गेम बदल दिया। उसने अब हैबिट टैकिंग को भी एक्सप्लोर करना शुरू किया। वो सोचने लगा कि एकिस्टिंग हैबिट्स के साथ कौन सी नई हैबिट्स को जोड़ सकता हूं ताकि वह नेचुरली माइंड में बैठ जाए। उसने कुछ सिंपल स्टक बनाए। जब मैं रात को अपना टूथब्रश रखूंगा तभी मैं एक लाइन ग्रेटट्यूड जर्नल में लिखूंगा। जब मैं लैपटॉप बंद करूंगा शाम को तभी मैं 10 मिनट वॉक पर जाऊंगा। जब मैं बाहर से आकर शूज उतारूंगा तभी मैं एक गिलास पानी पऊंगा। इस तरह हर नई हैबिट
24:36 पुराने रूटीन से जुड़ती चली गई और उसे याद रखने का बोझ कम होता गया। क्योंकि माइंड को कुछ नया याद नहीं रखना पड़ा। बस पुराने हैबिट से एक नया एक्शन जोड़ना था। एक दिन उसका दोस्त राहुल फिर मिलने आया और बोला भाई अब तो तू एकदम रोबोट बन गया है। हर चीज टाइम पर करता है। अभय हंस पड़ा। रोबोट नहीं भाई बस सिस्टम वाला इंसान बन गया हूं। राहुल बोला मुझे भी टाइम पर पढ़ाई करनी है लेकिन ध्यान ही नहीं रहता। अभय ने पूछा तेरे रोज के कौन से हैबिट्स हैं जो तू कभी नहीं भूलता। राहुल बोला ब्रश करना, चाय पीना, फोन चेक करना। अभय ने कहा, बस वहीं पर स्टैक कर दे पढ़ाई की हैबिट। जैसे चाय पीते ही 10 मिनट पढ़ लेना या फोन चेक करने से पहले एक पेज पढ़ ले। राहुल को
25:22 आईडिया अच्छा लगा और उसने अगले दिन से ट्राई करना शुरू कर दिया। अभय अब हर हैबिट को ऑब्वियस बनाने पर ध्यान दे रहा था। उसने एक वाइट बोर्ड खरीदी और उसमें अपनी हैबिट स्टक्स लिखकर टांग दी ताकि वह हर सुबह उठते ही देख सके। अब जब वह हैबिट डिजाइन करता तो सबसे पहला सवाल खुद से यही करता। इस हैबिट का क्यू क्या होगा? अगर क्यू मजबूत है तो हैबिट का याद रहना और ट्रिगर होना ऑटोमेटिक हो जाता है। कुछ हफ्तों बाद उसने देखा कि मेडिटेशन की हैबिट अब उसके सिस्टम में इंटीग्रेट हो गई थी। अब वह चाय पीते ही बिना सोचे मेडिटेशन शुरू कर देता था। यही तो मैजिक था हैबिट स्टकिंग का। एक बिहेवियर से दूसरे बिहेवियर का नेचुरली जुड़ जाना। एक और मजेदार बदलाव उसने अपने एनवायरमेंट में किया। उसने अपनी फेवरेट बुक्स को घर के
26:09 ऐसे कोनों में रखना शुरू किया जहां उसकी नजर बार-बार जाती थी जैसे डाइनिंग टेबल, बेड साइड और इवन बाथरूम शेलफ पर भी। उसने जाना कि व्हाट यू सी इज व्हाट यू डू। अब फोन को दूर और किताबों को पास रखने से रीडिंग खुद ब खुद बढ़ने लगी। उसने खुद से कहा सही आदत को दिखाएं और गलत आदत को दिखाएं ना। और यही प्रिंसिपल उसने मोबाइल यूज़ पर भी लगाया। उसने डिस्ट्रैक्टिंग एप्स को दूसरे फोल्डर में डाल दिया और होम स्क्रीन पर केवल वो एप्स छोड़ी जो उसे ग्रोथ में मदद करती थी। जैसे किल, नोशन और मेडिटेशन ऐप। फिर उसने एक और कांसेप्ट अपनाया हैबिट एनवायरनमेंट। उसने खुद के लिए एक रीडिंग कॉर्नर बनाया जहां सिर्फ किताबें और एक आरामदायक कुर्सी थी। जैसे
26:55 ही वह वहां बैठता, उसका ब्रेन सिग्नल लेता। अब पढ़ने का टाइम है। यह प्लेस स्पेसिफिक क्यू उसे एक्शन में हेल्प करता था। उसने जाना कि एनवायरमेंट साइलेंटली हमारी डिसीजंस को शेप करता है। धीरे-धीरे उसके घर के हर कोने का एक पर्पस बन गया। स्टडी टेबल सिर्फ डीप वर्क के लिए, बेड सिर्फ सोने के लिए और सोफा कैजुअल टॉक्स के लिए। इससे हर हैबिट को एक फिजिकल क्यूसेस मिल गया और डिस्ट्रैक्शंस धीरे-धीरे कम होने लगे। अब उसके लिए मोटिवेशन की जरूरत नहीं थी। क्लेरिटी ही उसकी मोटिवेशन बन चुकी थी। उसे हर काम के लिए सोचना नहीं पड़ता था। बस उसके क्यूस अपने आप उसे सही डायरेक्शन में पुश कर देते थे। फिर एक दिन उसने खुद को मिरर में देखा और मुस्कुराया। वो अब एक ऐसा इंसान
27:42 बन गया था जो एनवायरमेंट को डिजाइन करता था ताकि हैबिट्स नेचुरली फॉलो हो। वो जानता था कि क्लेरिटी एक्शन को ट्रिगर करती है और वे एक सोच सिर्फ डिले करती है। आज भी जब कोई उससे पूछता तू हैबिट मेंटेन कैसे कर लेता है? तो वह जवाब देता मैं हैबिट्स नहीं बनाता मैं क्यूस बनाता हूं। क्यू ट्रिगर करता है क्रेविंग। क्रेविंग लीड्स टू रिस्पांस एंड रिवॉर्ड सील्स द डील। बस क्लेरिटी चाहिए कब, कहां और कैसे? उसकी जिंदगी अब क्यू बेस्ड लिविंग बन चुकी थी। इंटेंशनल, डिज़ और डिस्ट्रैक्शन फ्री। क्योंकि जब हैबिट्स ऑब्वियस होती हैं, तो उनका फॉलो होना मुश्किल नहीं होता। वह बस फ्लो हो जाती हैं। अभय की जिंदगी अब काफी बदल चुकी थी। उसकी सुबह काल और फोकस्ड
28:29 होती थी। दिन प्रोडक्टिव और रातें रिफ्लेक्टिव। उसने जो छोटी-छोटी हैबिट्स अडॉप्ट की थी वो अब उसकी आइडेंटिटी का हिस्सा बन चुकी थी। लेकिन एक आदत ऐसी थी जो बार-बार शुरू होकर टूट जाती थी एक्सरसाइज। उसने कई बार सोचा था कि उसे फिट रहना चाहिए। उसने रनिंग शूज भी खरीद लिए थे। कुछ YouTube वर्कआउट्स की प्लेलिस्ट भी रेडी थी और स्मार्ट वॉच में रिमाइंडर्स भी सेट कर दिए थे। लेकिन जब भी एक्सरसाइज का टाइम आता वो खुद को टालता रहता कल से पक्का शुरू करूंगा। एक दिन उसने खुद से सवाल किया मैं मेडिटेशन कर सकता हूं। जर्नलिंग कर सकता हूं लेकिन वर्कआउट क्यों नहीं हो पा रहा? जवाब साफ था। उसको यह एक्टिविटी बोरिंग लगती थी। मतलब वो हैबिट अट्रैक्टिव नहीं थी। उसे फिर से एटॉमिक हैबिट्स की एक पुरानी लाइन
29:15 याद आई। मेक इट अट्रैक्टिव। और इसी के साथ उसे याद आया टेंप्टेशन बंडलिंग का कांसेप्ट यानी किसी जरूरी लेकिन अनअपीलिंग हैबिट को किसी ऐसी चीज के साथ जोड़ देना जो हमें बहुत पसंद हो। उसने सोचा मुझे म्यूजिक सुनना बहुत पसंद है। खासकर बॉलीवुड और रीट्रो ट्रैक्स। तो क्यों ना वर्कआउट को म्यूजिक के साथ जोड़ दिया जाए। अगले ही दिन उसने एक वर्कआउट जलवा नाम की एक प्लेलिस्ट बनाई जिसमें उसके फेवरेट डांस नंबर थे। लेकिन सिर्फ इतनी बात से कुछ खास नहीं बदला। फिर उसने एक आईडिया ट्राई किया। मैं सिर्फ तभी अपने पसंदीदा गाने सुनूंगा जब मैं वर्कआउट करूंगा। यानी फेवरेट म्यूजिक सिर्फ तभी मिलेगा जब वह एक्सरसाइज करेगा। यह एक पावरफुल रिवॉर्ड बन गया। अब हर सुबह जब भी म्यूजिक सुनने
30:01 का मन होता तो वह खुद को याद दिलाता। पहले पुश अप्स फिर प्लेलिस्ट और धीरे-धीरे यह सिस्टम काम करने लगा। अब उसका माइंड यह सोचने लगा कि वर्कआउट मतलब फन, म्यूजिक और एनर्जी। उसने अपने छोटे से कमरे के एक कोने में मूवमेंट जोन बना लिया जिसमें योगा मैट, स्किपिंग रोप और एक ब्लूटूथ स्पीकर रखा। यह सेटअप दिखने में बहुत अट्रैक्टिव नहीं था। लेकिन उसके लिए यह एक वाइब बन गया था। धीरे-धीरे उसने और भी ट्रिक्स इस्तेमाल करना शुरू किया। जैसे वर्कआउट करते समय वह अपने फेवरेट पॉडकास्ट सुनने लगा जिसमें इंस्पायरिंग लोग अपनी सक्सेस स्टोरीज शेयर करते थे। उसे ऐसा लगता जैसे वह जिम में नहीं किसी सीक्रेट मास्टर क्लास में हो। इससे हैबिट बोरिंग नहीं बल्कि मोटिवेटिंग लगने लगी। एक दिन
30:49 उसका दोस्त राहुल फिर आया और उसने देखा कि अभय वर्कआउट के बीच में भी मुस्कुरा रहा था। राहुल बोला भाई तू तो जिम ना जाने के बावजूद भी इतना कंसिस्टेंट कैसे हो गया? अभय हंसकर बोला क्योंकि अब वर्कआउट पनिशमेंट नहीं है। पार्टी बन गया है। राहुल को यह कांसेप्ट थोड़ा अजीब लगा। लेकिन जब उसने देखा कि अभय हर दिन डांस, स्ट्रेचेस और पुश अप्स करते हुए फेवरेट सॉन्ग्स पर एंजॉय कर रहा है तो उसे यकीन हो गया कि यह तरीका काम करता है। अभय ने एक और पावरफुल चीज अपनी हैबिट जर्नी में शामिल की थी। पॉजिटिव इन्फ्लुएंस। उसने नोटिस किया कि उसके आसपास के लोग उसकी कंसिस्टेंसी से इंस्पायर हो रहे थे। धीरे-धीरे उसके दो-तीन दोस्तों ने भी उससे हैबिट टिप्स लेना शुरू कर दिया था। अब हर रविवार को वो एक स्मॉल हैबिट सर्कल चलाने
31:36 लगा था जिसमें उसके चार दोस्त वीडियो कॉल पर जुड़ते और अपने वीकली विस और स्ट्रगल्स डिस्कस करते। कोई अपनी रीडिंग हैबिट पर बात करता। कोई स्क्रीन टाइम घटाने पर। यह सर्कल उसका सपोर्ट सिस्टम बन गया था। उसने समझा सराउंडिंग योरसेल्फ वि पीपल हु ऑलरेडी प्रैक्टिस द हैबिट्स यू वांट टू बिल्ड कैन बी एक्सट्रीमली पावरफुल। अगर आप उन लोगों के बीच रहो जो फिटनेस डिसिप्लिन या सेल्फ ग्रोथ को सीरियस लेते हैं तो आपके लिए भी वही बिहेवियर नॉर्मल लगने लगता है। इसी सोच से प्रेरित होकर उसने ऑनलाइन एक फिटनेस चैलेंज ग्रुप ज्वाइन किया जहां लोग अपनी डेली प्रोग्रेस शेयर करते थे। उसने भी अपनी वर्कआउट सेल्फीज़ डालनी शुरू कर दी। और जब दूसरों से थम्स अप मिलने लगे तो मोटिवेशन और बढ़ गया। अब उसे हर दिन एक्सरसाइज करना सिर्फ इसलिए
32:22 अच्छा नहीं लगता था कि उसे म्यूजिक सुनना मिलता था। बल्कि इसलिए भी क्योंकि उसे एक सेंस ऑफ कम्युनिटी फील होती थी। जैसे वह अकेला नहीं है इस जर्नी में। उसने अपने मोबाइल वॉलपेपर पर एक कोट लिखा मेक इट इजी, मेक इट फन और मेक इट यू। अब उसकी हर हैबिट डिजाइन इसी प्रिंसिपल पर आधारित थी। एक और ट्रिक जो उसने अपनाई उसने अपने वर्कआउट को विजुअली ट्रैक करना शुरू किया। उसने एक वॉल कैलेंडर पर रेड क्रॉसेस लगाने शुरू किए। हर उस दिन जब वह एक्सरसाइज करता और जब लगातार सात रेड मार्क्स दिखते तो वह खुद से कहता कि यह चेन मत तोड़ो। यह स्मॉल विजुअल रिवॉर्ड ने उसकी हैबिट को और अट्रैक्टिव बना दिया। अब उसे मॉर्निंग रूटीन में एक्साइटमेंट होने लगी थी। वेक अप, चाय, मेडिटेशन, फिर फेवरेट सॉन्ग्स के
33:09 साथ एक्सरसाइज यह सब उसकी लाइफ का बेस्ट पार्ट बन गया था। और यह सब सिर्फ इसलिए पॉसिबल हुआ क्योंकि उसने हैबिट को अट्रैक्टिव बना दिया था। एक दिन उसने खुद से रिफ्लेक्ट किया। अगर कोई हैबिट बोरिंग लग रही है तो यह हमारी क्रिएटिविटी की कमी है। उस हैबिट की नहीं। अगर हम उसे अपने टेस्ट के हिसाब से डिजाइन कर लें तो वह सबसे एंगेजिंग बन सकती है। अब वो हर हैबिट से पहले खुद से पूछता हाउ कैन आई मेक दिस फन? अगर वह रीडिंग करता तो कोजी लाइटिंग और चाय के साथ। अगर वह जर्नलिंग करता तो फेवरेट पेन और डूडल्स के साथ। अगर वह डीप वर्क करता तो बैकग्राउंड में फोकस म्यूजिक और प्रॉपर डेस्क सेटअप के साथ। यह छोटे डिजाइन चेंजेस उस बोरिंग टास्क को मैजिकल बना देते थे। एक बार राहुल ने उससे मजाक
33:56 में कहा, तू हैबिट्स को इतना अट्रैक्टिव बना देता है कि लगता है कोई Netflix शो देख रहा हो। अभय ने जवाब दिया क्योंकि जब हैबिट्स बोरिंग नहीं होती तो एक्सक्यूसेस बचते ही नहीं। अब उसका फोकस सिर्फ सेल्फ डिसिप्लिन पर नहीं था बल्कि सेल्फ डिलाइट पर भी था। वह जान चुका था कि जब तक कोई हैबिट दिलचस्प ना लगे तब तक वह लंबे समय तक टिकती