0:00 हां हां इच्छम खामे रायम जपत्यम परिपत्यम भत्ते पाण विनय वया आवे सलावे उचास समास अंतर भाषा भाषा जय परिणम सुहवाम वाण अहम न जाणाम तस इच्छामि इच्छामि वंदेव है वंदाम इच्छा कारण संधि भगवान संधि इच्छा इच्छामिमा वंदे जा वंदाम इच्छा कारण भग वो
0:48 ले इच्छा इच्छामिस वंदे जा वंदा करणा प्रसाद करा जीता नमो सिं नमोण नमोणं नमो साहुंम नमोकार मंगलाणं चव परम भवई मंगलम जय जगजी वियाणं जग गुरु जगनंद जगना हो जग बंधु जय जगिया हो भय
1:35 जय सुया तेथ पश्चिम जय जय गुरुम जय महापा महावी सर्व प्रणाय सर्वदा दायनी सर्वलब्धि निधान श्री गौतम स्वामीने नम श्री सुध स्वामी नम अज्ञान ज्ञान जन नेत्रितम तस्मै श्री गुरुवे
2:23 धर्म भाग्यशाली बहुत-बत आशीर्वाद वंदामि साहिब जी प्रणाम सभी को आज 13 जून 2026 के दिन हमारी अभी तीसरी क्लास जो है वो भगवती सूत्र आगम वाचना की है। हम शतक नौ और उद्देशक पहला पढ़ रहे हैं जंबू द्वीप का। मैं विभा बहन से विनती करूंगी कि वो हमें लास्ट क्लास की समरी सुनाएं। विभा बहन। खूब-खूब धन्यवाद अलसा बहन। मध्य वंदामि साहिब जी और प्रणाम सभी को भगवती सूत्र के नौवें शतक के पहला उद्देश्य में जम्मू द्वीप के बारे में बताया है। लास्ट क्लास में साहिब जी ने हमें समझाया था कि 14 राज लोक में तीरछा लोक में जंबू द्वीप आया हुआ
3:09 है। उध उध लोक के देवलोक में असंख्य देवता रहेंगे। अधोक में असंख्य नारकी जीव रहेंगे और तीरछा लोक मनुष्य क्षेत्र में मनुष्य रहेंगे। हमारी आज की जो पृथ्वी है वह जंबू द्वीप है। 14 राजलोक का गोलाकार मध्य लोक का विस्तार एक राजलोक प्रमाण है। मध्य लोक में जंबू द्वीप और लवण समुद्र आदि शुभ नामों के असंख्य द्वीप समुद्र आए हुए हैं। वे सभी पूर्व की अपेक्षा से दो गुना विस्तार वाले और चूड़ी समान गोलाकार है। उन सभी के मध्य में 1 लाख योजन व्यास वाला थाली के आकार का जंबू द्वीप है। जिसके मध्य में 1 लाख योजन ऊंचाई वाला मेरु
3:55 पर्वत आया हुआ है। मेरु पर्वत की संभूत तालाब पृथ्वी से 900 योजन ऊपर और 900 योजन नीचे का प्रदेश मध्य लोक कहलाता है। 1 लाख योजन वाला जंबू द्वीप के चारों ओर वर्तुलाकार में लवण समुद्र है। उससे डबल 4 लाख योजन वाला धातकी खंड धातकी खंड से डबल व्यास वाला 8 लाख योजन का कालोददी समुद्र और कालोददी समुद्र से डबल व्यास वाला 16 लाख योजन विस्तार वाला पुष्कर द्वीप आया हुआ है। उसके चारों ओर असंख्य द्वीप समुद्र है। ऐसे असंख्य द्वीप समुद्र के अंत में आधे राजलोक प्रमाण स्वयंभू रमण समुद्र आया हुआ है। ढाई द्वीप 45 लाख योजन का मनुष्य क्षेत्र है। पृथ्वी के चारों ओर
4:40 समुद्र होने से उसे द्वीप कहा जाता है। जंबू द्वीप का अधिष्ठायक देव जंबू जंबू नामक देव है। मध्य में देव के निवास योग्य शाश्वत रत्नमय जामुन का वृक्ष होने से इस द्वीप का नाम जंबू द्वीप रखा है। यह एक त्रिकाल नित्य शाश्वत व्यवस्था है। नौवें अध्याय के पहले उद्देश्य में जंबू द्वीप में कौन सी नदियां है, कहां से निकलती है, इसका विवरण बताया हुआ है। बड़े-बड़े सरोवर में 1000 योजन लंबा और 500 योजन चौड़ा विस्तार में विशाल पद्म द्रह उससे दो गुना बड़ा महापद्म द्र तिगच्छ द्रह उससे डबल तिगच्छ केसरी द्रह महापुंडरिक द्रह और पुंडरिक द ग्रह आए हुए हैं। भरत क्षेत्र
5:25 के लघु हिमंत पर्वत पर आए हुए पद्म ग्रह से गंगा और सिंधु नदी उत्तर भरतार्थ से निकलकर दीर्घ वैताड्य पर्वत को भेदकर दक्षिण भरतार्थ में आती है। वहां 14,000 नदियां गंगा और सिंधु नदी में मिलकर लवण समुद्र में गिरती है। ऐसे ही ऐरावत क्षेत्र में पुंडरिक द्रव से प्रथम दक्षिणार्ध एरावत से रक्ता और रक्तावती से निकलकर 14,000 नदियों से मिलकर लवण समुद्र में गिरती है। इस प्रकार अंदर के प्रदेशों की चार नदियां 28,000 नदियों के साथ और दूसरी चार नदियां 56 56,000 नदियों से मिलकर लवण समुद्र में गिरती है। मेरु पर्वत की समुल भूतला
6:10 पृथ्वी से 7 90 योजन ऊंचाई पर ज्योतिषी देवलोक के तारे देवलोक शुरू होते हैं और वहां तारे आए हुए हैं। 800 योजन की ऊंचाई पर सूर्य 880 योजन की ऊंचाई पर चंद्र 884 योजन की ऊंचाई पर नक्षत्र, 887 योजन की ऊंचाई पर बुध ग्रह, 891 योजन पर शुक्र, 894 योजन पर गुरु, 897 योजन पर मंगल ग्रह और 900 योजन पर शनि ग्रह। इस प्रकार संपूर्ण ज्योतिष चक्र 110 योजन ऊंचाई और असंख्य द्वीप समुद्र प्रमाण लंबाई में है। तो जंबू द्वीप पे दो-दो सूर्य चंद्र 100 अह और लवण समुद्र में चार
6:57 चार-चार सूर्य और चंद्र धात्री खंड में 12 सूर्य 12 चंद्र कालो नदी में 42 सूर्य 42 चंद्र पुष्करावत द्वीप में 72 सूर्य और 72 चंद्र ऐसे ढाई द्वीप अर्थात 45 लाख योजन में मनुष्य लोक के अंदर सूर्य चंद्र आदि के विमान है। वह चर है जो घूमते हैं और चर अह उसे कचर कहा जाता है। ढाई द्वीप के बाहर असंख्य सूर्य चंद्र के विमान है वह स्थिर है। इसलिए उसे अचर कहा जाता है। जहां सूर्य चंद्र घूमते हैं, वहां दिन रात की व्यवस्था है और जहां सूर्य चंद्र नहीं घूमते हैं, वहां दिन रात नहीं होता है। तीसरे उद्देश्य शतक में अंतर्द्वीप की बात आती है। यह 56 अंतर्द्वीप लवण समुद्र के
7:43 अंदर होने से यह अंत द्वीप कहलाते हैं। यह सब अंतर्जी द्वीप की पृथ्वी पृथ्वी त्रिकाल नित्य शाश्वत है। यह द्वीप हिमवंत और शिखरी पर्वतों के उत्तर पूर्व दक्षिण पूर्व उत्तर पश्चिम दक्षिण पश्चिम ऐसे स्थित हुए स्थित है। तो साहिब जी आज आगे आप समझाएं हमें। बहुत बहुत बड़ी समरी कर दी आपने। समरी बहुत लंबी साहिब जी आगे से थोड़ा सा छोटा करूंगी। बहुत बहुत सरस बहुत सरस थैंक यू थैंक यू अब आज हम यहां पर भगवती सूत्र आगम का लव समुद्र वगह उसका मेजरमेंट वापस रिपीट
8:29 नहीं करते नौवे शतक का ये चौथा उद्देश्य चल रहा है अब यहां पर नाम दिया है इन्होंने अपनी तरह से अस्वच्छा केवली यहां पर असत ये शब्द इसका संस्कृत होता है। केवल ज्ञानी भगवान है और केवली भगवंत के होते हुए भी
9:17 जो लोग केवली के साथ चल रहे हैं ऐसे जो है अलग-अलग प्रकार से ये 10 जने ख्याल आया। अब इन 10 जनों के अंदर यह केवली भगवंत है। यह केवली भगवंत के श्रावक है। यह केवली भगवन की श्राविका है। यह केवली भगवन के उपासक जो साथ में है वो है। ये केवली भगवन की उपासिका श्राविका है। इसी तरह से केवली भगवान के पाक्षिक
10:06 है। ये केवली भगवान के पाक्षिक स्वयं बुद्ध है और इसी तरह से केवली भगवान के पाक्ष उपासिका है। अब यह केवली भगवान के जो है पाक्ष केवल भगवान के पास सिद्ध श्रावक श्राविका
11:21 बात यहां पर यह प्रश्न पूछा जा रहा है कि केवली भगवंत है और केवल ही भगवंत के साथ कोई विचरण करने वाले केवली भगवन के उनके श्रावक है, श्राविका है, उपासक है, उपासिका है, पाक्षिक है और स्वयं बुद्ध है। जिन्होंने स्वयं ही बोध प्राप्त किया है। तो हे भगवंत इन सबको जो है मान लो कि केवली की देशना ना सुनी हो तो भी क्या इनको ज्ञान दर्शन हो जाता है? क्या किसी को सम्यक दर्शन भी हो सकता है? एक तो दो वर्ग हो गए ध्यान में लीजिए तो यहां पर शब्द क्या लिया है असत्वा
12:10 बिना केवली भगवान की देशना सुने तो मतलब क्या हुआ कि दो वर्ग हो गए यहां पर अब इन दो वर्गों के अंदर आप ध्यान दीजिए एक वर्ग जो है इसके अंदर यह केवली भग भगवंत के पास से सुनने वाले और ये दूसरे जो है बिना सुने दो वर्ग के अंदर जो है यह केवली भगवंत के
12:55 पास रहकर उनकी देशना सुन के सम्यक दर्शन प्राप्त करें। बोध प्राप्त करे, दीक्षा भी लेवे, चारित्र भी ग्रहण करे, सब कुछ करें और एक वर्ग दूसरा ऐसा भी है केवली भगवन के साथ में रहे, पास में रहे लेकिन देशना नहीं सुन पा रहे हैं। कह रहे अब मान लो उनको आहार पानी के लिए जाना है। मान लो उनको विहार करके जाना है। मान लो आगे जाना है। मान लो वयावच में लगे हुए हैं। चला है कि नहीं? केवली भगवंत की आज्ञा भी हो गई या अन्य ग्रुप में जिसके साथ रहते गुरुओं की आज्ञा हो गई और फिर वह केवली भगवंत की देशना नहीं सुन पाए सुनी तो यहां राजगही
13:41 नगरी में महावीर स्वामी पधारे हैं और गौतम स्वामी महावीर को प्रश्न पूछ रहे हैं कि हे भगवन क्या ऐसा हो सकता है कि केवली भगवंत के पास में रहकर के भी देशना न सुनने वाले को भी सम्यक दर्शन हो सकता है। सुनने वाले को भी हो सकता है। ऐसा मति ज्ञान भी हो सकता है। श्रुत ज्ञान भी हो सकता है। अवधि ज्ञान भी हो सकता है। ऐसे करके अलग-अलग प्रकार के प्रश्न पूछे जा रहे हैं। अब इस विषय के अंदर समझिए कि इन विषयों के अंदर जिस जिस प्रकार से जैसे प्रश्न जो पूछे जा रहे हैं तो परमात्मा महावीर गौतम को उपदेश दे रहे हैं। अब कोई जीव यह जीव
14:28 जो भी है अब इनको बिना सुने ही हो लेकिन इनके कर्म इतने लघु कर्म होते हैं ये आप इनको लघुकर्मी बोलिए हकर्मी बोलिए आप जिस तरह से यह हकर्मी होते हैं अब यहां पर भयावत भी करें, सेवा भी करें, अन्य तरीके से भी अपनी कर्म निर्जरा कर सकते हैं। ख्याल है उनको भी मति ज्ञान श्रुत ज्ञान हो सकता है। और दर्शन मोहनीय आवरणीय कर्म का क्षयोपम खोने से उनको
15:16 सम्यक दर्शन भी हो सकता है। निषेध नहीं है। इनको होगा इनमें कोई ना नहीं है। अब रहा प्रश्न यह अगर यह भारी कर्मी जीव हो तो क्या करें? ख्याल आया इनको अगर ये भारी कर्म वाले जीव हो और केवली की देशना सुनने के बाद भी इनको सम्यक दर्शन नहीं हो रहा। केवली के पास भी आ जाए समवसरण में आ जाए देशना भी सुन ले लेकिन इनको नहीं हो पा रहा है और यह कई बार हकर्मी जीव होते हैं लघुकर्मी आत्मा होते हैं बिना देशना सुने
16:03 अन्य तरीके से भयावच आदि करते करते निर्जरा करने से इनको भी सम्यक दर्शन हो सकता है सम्यक ज्ञान हो सकता है मति श्रुत आदि का भी ज्ञान हो सकता है। ख्याल आया। अब इनके अंदर भी दूसरा वर्ग है। यह ए वर्ग है। यह बी वर्ग ऐसा है। यह लघु कर्म में हो तो इनको भी तो थोड़ा सा सुनने पर तुरंत बोध हो सकता है। थोड़ा सा सुनने पर भी जो है तुरंत इनको बोध हो सकता है। तो यहां पर देखिए निज्रा के भी अलग-अलग अनेक तरीके तो बताए कि
16:49 जिनके अंदर कर्म क्षय हो जाए। अब इनके अंदर कोई अगर ज्यादा भारी कर्मी वाला जीव हो तो क्या करेंगे? तो नहीं हो पाएगा। केवल ज्ञानी भगवान के पास रहना उनके साथ रहना फिर भी ना हो तो समझिए भाई साहब हमारी कमजोरी बहुत भारी एक दीपक है और दूसरा दीपक पास में आकर उसको स्पर्श करते ही दूसरा दीपक भी प्रज्वलित हो जाता है और अगर नहीं होता है तो फिर उसमें कोई ना कोई कमी जरूर है। केवली भगवंत की देशना सुनने बैठे हो फिर भी सम्यक दर्शन ना हो तो यह
17:36 सूचित करता है कि उस जीव की बहुत बड़ी भारी कर्मी परिस्थिति है उसके कर्म बहुत भारी कि वो नहीं कर पा रहा है। सोचिए इसलिए और कोई लघुकर्मी आत्मा होर्मी आत्मा हो अल्पकर्मी आत्मा हो तो बिना देशना सुने उनकी वयावत में उनकी सेवा में रहते हुए भी उनको जो है सम्यक दर्शन भी हो जाए बोध भी हो जाए सम ज्ञान भी हो जाए कोई ना नहीं दोनों तरीके हैं समझे कि नहीं इसके अंदर सब जीवो पर आधार करता है और जिन जीवो के भारी कर्म हो उन पर लक्ष्य रहता है। इसलिए अब आप देख लो कि महावीर स्वामी
18:21 के पास उनके 11 गंधत्व और 30 बरस तक गौतम स्वामी सुधर्मा स्वामी रहे। उनको केवल ज्ञान नहीं हुआ। लेकिन बाकी के नौ गणधर जो थे उनको महावीर स्वामी की उपस्थिति में ही केवल ज्ञान भी हो गया। वे यहां से राजगृह गए। वहां पर अनशन भी कर लिया। मोक्ष में भी चले गए। अगर यह दूसरे नौ गणधर जो गए उनकी आयुष देखने जाए तो किसी की कम है, किसी की ज्यादा है, किसी की कम है, किसी की ज्यादा है। अब आप सोच लीजिए क्योंकि सिर्फ 16 बरस की उम्र में प्रभा स्वामी ने दीक्षा ली थी महावीर स्वामी के पास। सिर्फ 16 बरस।
19:10 तो कितने छोटे थे। लेकिन फिर भी उनको जो है केवल ज्ञान गौतम स्वामी से पहले हो गया और महावीर स्वामी के निर्वाण के पहले यह मोक्ष में भी चले गए। दूसरे भी है। अब दूसरों को भी इसी तरह से हुआ। नौ गणधर चले गए ना। लेकिन महावीर स्वामी के पास 30 बरस तक भगवान की सेवा भयाव बस करने वाले देशना सुनने वाले गौतम स्वामी सुधर्मा स्वामी को महावीर स्वामी की विद्यमानता में पहले से केवल ज्ञान केवल दर्शन नहीं हो पाया अब नहीं हुआ तो नहीं हुआ लेकिन महावीर स्वामी का निर्माण होता है ढाई बजे और
19:56 5:00 बजे गौतम स्वामी को केवल ज्ञान हो जाता अब इसका कारण जब पूछा जाए तब यहां पर शास्त्रकार यह कहते हैं कि गौतम का महावीर पर मोह ज्यादा था। कहलाया गौतम का महावीर स्वामी के ऊपर इतना मोह था। मोह कहिए आप उसको प्रशस्त भाव का राग कहिए। क्या दोनों बात एक ही है? तो प्रशस्त भाव का यह राग जो था कि महावीर प्रभु बस वह परमात्मा को इतने समर्पित थे, इतने समर्पित थे, इतनी सद्भावना से तो इसके कारण जो है वो भगवान की भक्ति में थे, सेवा में तो ख्याल आया।
20:44 ये कभी प्रयत्न नहीं किया कि मुझे केवल ज्ञान केवल दर्शन हो जाए। एक बार अगर आपको केवल ज्ञान, केवल दर्शन हो जाते तो आप महावीर के समकक्ष हो जाते। उनको भी केवल ज्ञान केवल दर्शन है। आपको भी केवल ज्ञान केवल दर्शन हो जाए। तो उनके लेवल पर दोनों समान हो गए। फिर व्यवहार बदल जाता है। फिर आचार धर्म दोनों का बदल जाता है। तो वो प्रश्न यहां पर नहीं था। तो गौतम स्वामी को कोई अफसोस भी नहीं था। ख्याल आया कि नहीं? उनको कोई चिंता ही नहीं थी। उनको कोई अफसोस नहीं था कि मुझे नहीं हुआ है। लेकिन वो सबके लिए सहयोगी निमित्त अच्छा बनना चाहते थे। सबके प्रति जो है उनका सहयोग निमित्त इतना
21:30 अच्छा प्रबल रहा कि उनको कभी अफसोस नहीं रहा कि मुझे केवल ज्ञान केवल दर्शन नहीं हुआ है। कई बार पूछते भी थे तो महावीर उनको हिम्मत देते थे। गौतम होगा। आपको भी केवल ज्ञान होगा। आपको भी इसी भोग में मोक्ष होने वाला है। आप बेफिक्र निश्च ऐसी स्थिति के अंदर गौतम स्वामी को तो उसी रात में हो गया जिस रात में महावीर स्वामी का निर्माण हुआ कार्तिकी अमावस्या लेकिन सुधर्मा स्वामी को तो गौतम स्वामी के भी निर्माण के बाद अर्थात आठ बरस 12 बरस के बाद केवल ज्ञान केवल दर्शन हालांकि सुधर्मा स्वामी 100 बरस की आयु वाले थे तो
22:17 वो भी पीछे आठ तक भी केवल पर्याय में रहे। गौतम स्वामी 12 बरस तक केवली पर्याय में रहे। गौतम स्वामी को 80 बरस की उम्र में केवल ज्ञान हो गया था। लेकिन आयुष उनका 92 92 बरस का था। वहां तक बराबर रहे। ऐसे केवली पर्याय में भी 12 बरस रहे। अब सुधर्मा स्वामी रहे। आठ बरस तक वे भी केवली रहे। फिर बाद में 100 बरस का उनका आयुष पूरा हो गया। निर्वाण पाकर के मोक्ष में चले गए। अब ऐसी स्थिति के अंदर सबका अलग-अलग तरीका है। सब अपने अपने तरीके से क्योंकि कर्म का प्रमाण किसका है? कर्म का प्रमाण कम है कि ज्यादा है? और केवल ज्ञाना वर्णीय कर्म
23:02 का क्षयोपशम नहीं होता है। क्षय ही होता है। बाकी के अन्य चार ज्ञानों का क्षयोपशम भी होता है और क्षय भी होता है। बोलिए रेखा ध्यान में बोलिए। सर केवल जानाव्य कर्म का शयोप नहीं होता है। खाली शय होता है। बाकी के चार कर्मों का शो पश भी होता है। क्षय भी होता है। मनावर श्रत वर्ण अवध बाकी के भी तो चार ज्ञान है ना तो ये वहां पर अलग अलग प्रमाण में है। उनके लिए कम ज्यादा क्षयोपशम करोगे क्षय उपसम इसलिए जिसका क्षपशम होता है उसके अंदर भेद प्रभेद एक से दूसरे में होता है जिनका
23:51 संपूर्ण क्षय हो जाता है क्षयोशम नहीं संपूर्ण क्षय वहां भेद नहीं रहता है वहां सभी एक शरीर के लेवल पर आ जाता है ऐसा आ रही है बात ध्यान में वंदना माता जी बोलिए ध्यान में नहीं आता विजय भाई ज्ञान है बोलो साहब जी आपने बताया जो बाकी के मति श्रुत अवधि ज्ञान का क्षय उपक्षम होते रहता है लेकिन केवल ज्ञान का एक ही क्षय ही होता है आगे बढ़िए बोलिए पन जी ख्याल में है क्षयोपशम होगा तो भेद प्रभेद कम ज्यादा
24:38 ज्यादा का रहेगा क्षायिक भाव से क्षय हो जाएगा तो भेद नहीं रहेगा फिर इक्विवेलेंट हो जाएंगे अब जैसे महावीर स्वामी को केवल ज्ञान हुआ चंदन माला को केवल ज्ञान हुआ मृगावती जी साध्वी जी को केवल ज्ञान हुआ शरीर से वो स्त्री शरीर धारी साध्वी जी है और ये पुरुष है तो केवल ज्ञान तो बिल्कुल क्षायिक भाव से हुआ है तो साध्वी जी होने पर भी चंदन बाला जी का मृगावती जी का केवल ज्ञान और महावीर स्वामी का केवल ज्ञान एक सर का एक जितना ही होता है कम ज्यादा नहीं होता बोलिए जी हां जी महाराज साहब आपने ये बताया कि जब केवल
25:27 ज्ञान होता है तो सभी का एक सरका होता है दे आर ऑल ऑन वन लेवल वेयर एस बाकी के चार ज्ञान जब उनका क्षयोक्षम होता है देन देन दे गो इनू डिफरेंट कैटेगरीज अब वहां कम ज्यादा होता है लेवल प्रमाण में किसी का कम किसी का ज्यादा किसी का कम किसी से किसी का ज्यादा ये रहना है लेकिन केवल ज्ञान तो जिस किसी को भी हो जाए कोई भी हो आपने सुना है इलाची कुमार को नृत्य करते हुए केवल ज्ञान हुआ उनका महावीर स्वामी का केवल ज्ञान ही सरी का रहेगा चाहे कोई भी हो मैंने एग्जांपल दिए साहब स्त्री देह धारी के जो चंदन बाला मृगावती जी सातवी जी थे वहां
26:15 केवल ज्ञान के लिए शरीर बाधक नहीं बनता है शरीर बीच में नहीं आता है केवल ज्ञान आत्मा को ही होता है और केवल ज्ञान हो जाने के बाद आत्मा पर कोई सिम्टम्स चेंज नहीं होते बोलिए हंसा जी ख्याल आ गया आपको हां साहब जी जब केवल ज्ञान होता है तब शरीर के ऊपर कोई भी सिम्टम्स दिखाई नहीं देते हैं क्योंकि शरीर में कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है कोई भी हो अब कई बार तो आप केवल ज्ञान हो गया उनको पहचान भी नहीं पाओ समझे कि इनको केवल ज्ञान हो लोग एक्सपेक्ट क्या करते हैं नहीं नहीं नहीं इनको केवल ज्ञान
27:00 हो गया तो बहुत कुछ चेंज आ जाएगा बहुत कुछ चेंज आएगा नहीं साहब शरीर शरीर है। शरीर जन्म से गर्भ में बना है। और शरीर जिस प्रकार का जैसा बना है वैसा ही रहेगा। शरीर में कोई केवल ज्ञान हो, केवल दर्शन हो, वितराग आ जाए, शरीर में कोई चेंजेस नहीं आते। ये तो नाम कर्म की रचना के हिसाब से जैसा शरीर बना है वैसा है। बस अब आत्मा के अंदर जो फर्क आने वाला है आत्म गुणों में जो कम ज्यादा होने वाला है वो स्वरूप उसके आवरणीय कर्म की निज्रा से ही संभव है। नहीं तो नहीं ये है फर्क समझ नहीं तो आवरणीय कर्म की
27:47 निजरा जिसके जितने प्रमाण में हो बस उनको देखना है अंदर से तो यह विशेषता यहां पर आ गई तो हे गौतम स्वामी पूछ रहे हैं भगवन असुत्वा केवल ज्ञानी को सुने बिना ही उनकी देशना सुने बिना ही क्या किसी जीव को सम्यक दर्शन में सम ज्ञान में फिर अन्य अन्य मति श्रव ज्ञान में किसी में कम ज्यादा फर्क होता है कि नहीं होता है समझे कि नहीं तो यहां पर केवली के वचन सुने अब यहां पर जिनेश्वर भगवान केवल ज्ञानी हो गए या तीर्थंकर हो गए सब अगर ये हम इनको लेते
28:33 हैं ये तीर्थंकर भगवान हो गए इनको केवल ज्ञान हुआ इनके केवली हो गए और बाकी के सब नहीं हुए वो केवल के पास रहने वाले हैं। ख्याल है आया कि नहीं? तो यहां पर यह प्रश्न पूछा कि भगवान शुद्ध बोधि का लाभ अभाव क्या यह जीव भी जो है सुनकर और ये बिना सुने ही अपने मिथ्यामय कर्म को कटा सकता है। सम्यक दर्शन प्राप्त कर सकता है। तब महावीर ने दोनों विकल्प दिए हो भी सकता है नहीं भी है। किसी किसी जीव को हो जाए, किसी जीव को ना
29:19 भी हो। दोनों बात बताई गई है सब जो यहां पर तो यह भी प्रिका यहां पर हे भगवान अब केवली आदि से शुद्ध अनारिता का ग्रहण या अग्रहण अब केवल ज्ञानी के पास रह रहे हैं कोई तो क्या कोई श्रावक बन जाए या कोई साधु बन जाए उनको अनगार धर्म वो स्वीकार ले साधु धर्म स्वीकार ले या फिर कोई श्रावक धर्म स्वीकार ले हां गौतम संभव है और नहीं भी है। तो जिन जीवों के अंदर ऐसे केवली भगवंत की वैव सेवा भक्ति आदि सभी प्रकार से जैसे उनकी कर्म निर्जरा हो
30:04 जाए और कर्म घटे तो उनके अंदर भी वही कक्षा आती है जो केवली को सुनकर के आ सुनना एक प्रकार है। देशना सुनना एक प्रकार है। लेकिन केवली केवल सेवा स्वाध्याय आदि अनेक प्रकार है। बात अगर रिजल्ट वही आके खड़ा रह जाए कि निर्जरा तो होनी ही होनी अगर निर्जरा बराबर हो जाती है तो उसका रिजल्ट उसी प्रकार से सही ढंग से आता है। अब यहां पर यह भी कहा केवली पर आदि से ब्रह्मचर्य वास का धारण अधारण जो है उसका कैसे करना हे गौतम केवली पाक्षिक की उपासिका से सुने
30:51 बिना ही क्या कोई जीव को व्रत पखंड वगरे धारण कर सकते हैं गौतम कोई कर सकता है कोई नहीं भी कर पाता है दोनों प्रक्रिया बताई गई है हां जिन जीवो का क्षयोपशम पहले से ज्यादा अच्छा हो चुका हो क्षयोप और वो जिनका क्षयोपशम ज्यादा अच्छा पहले से हो चुका हो तो उनके लिए जरूर फायदा है कि बाद में क्षायिक भाव से भी हो जाए क्योंकि यह सबके लिए अलग-अलग है। अब किसका क्षायिक भाव से कितना होता है? किसका क्षपशमिक भाव से कितने प्रमाण में होता है? यह सबका अलग अलग होता है। अब क्या
31:40 करेंगे? 100 में से 99% तो संसार में तो एक साथ में क्षाई करने वाले कम है। क्षायोपशमिक ही करने वाले तो क्षायोपशमिक के अंदर जिसका जो कर्म जितने प्रमाण में घटेगा उसका उतना गुण बढ़ेगा। और गुण बढ़ गया और वह गुण से व्यवहार करता है तो बड़ी बात है और गुण से ना करे व्यवहार और कर्म से व्यवहार करे तो मुश्किल फिर वहां कर्म का व्यवहार बदल जाएगा बढ़ जाएगा तो ये दोनों बात यहां पर सामने आई है हे भगवान केवली आदि से शुद्ध संयम ग्रहण अग्रहण अब केवली भगवंत पाक्षिक उपासिका से सुने
32:26 हुए बिना सुने बिना ही क्या कोई जीव शुद्ध संयम का संयत यतना करता है? हां गौतम कोई ऐसा स्वयं ही संयम ले सकता है और कोई नहीं भी लेते। दोनों बात की है। आपको मालूम है कि सूलीभद्र जी जो थे ऐसा अवसर आने पर वहां परिस्थिति संजोग देकर स्वयं ही उन्होंने अपनी तरफ से दीक्षा। साधु बन गए। बाद में जब देखेंगे तब गुरु महाराज मिलेंगे तब उनके पास फिर से वापस दीक्षा लेंगे। लेकिन एक बार इस समय केवल ज्ञान हो चुका है तो वे स्वयं ही दीक्षा ले लेते हैं। फिर कहां किसके पास लेने जाएंगे? ऐसा ना तो ये भी एक विधान यहां पर आता है।
33:15 संयम ग्रहण। अब संयम खाली दीक्षा के साथ ही संबंधित व्यवहार है ऐसा तो भी संयम के अंदर इंद्रिय संयम है और प्रकार के संयम है तो वो भी अलग प्रकार से है। ऐसी स्थिति में यहां पर जो है संजय जात शुद्ध संयम चारित्र ग्रहण अथवा पालन करके संयम समय संयम में लगने वाले अतिचार का परिहार करने के लिए यतना विशेष करता है। अब यह केवली आदि से संवर करना है। अनाचार का आचरण का अनाचरण करना है। हे भगवन प्रश्न पूछा जा रहा है क्या भग जो केवली भगवंतों
34:03 के पास में रहे साथ में रहे ये भी कोई कम मौका नहीं है भाई साहब बहुत बड़ा मौका है ख्याल आया बिल्कुल बिल्कुल सुवर्ण काल है आप जिसको कहते हैं ना कि ये ये पारस मणि है और ये सोना बन जाए लोहा सोहा बन जाए समझे लेकिन अगर पारस मणि को आपने कपड़े कपड़े के अंदर यू लपेट करके रखा है और फिर लाके सुबह स्पर्श कराओ तो नहीं भी होगा। तो यह क्या है? यह आवरणीय कर्म है। लोहे के ऊपर अपने आवरणीय कर्म इतने ज्यादा है कि सोने के डब्बे में साथ में रखने पर भी नहीं हो पा रहा है।
34:48 लोहे को जो है पारस मणि के साथ रखने पर भी नहीं हो पा रहा है। ऐसी स्थिति के अंदर दोनों है तो ये देखना पड़ता है। अब सभी जीव तो अलग-अलग है और सबके कर्म और ही अलग-अलग है। कभी भी किसी भी जीव के कर्म द्रव्य क्षेत्र काल भाव माप प्रमाण आदि से दूसरे के सरी के नहीं होता आ रहा है ख्याल में विजय बोलिए अरे किसी के भी दो लोगों के कर्म काल भाव क्षेत्र और द्रव्य से सरी के नहीं होते हैं हां एक सखे किसी के कर्म वो कम ज्यादा तो रह गए चाहे मां बेटा है तो
35:36 भी कम ज्यादा रहेगा। बाप बेटे हैं तो भी कम ज्यादा रहेगा। बहन बहन है तो भी कम ज्यादा रहेगा। भाई भाई है तो भी कम ज्यादा रहेगी। अब एक मां बाप की दो चार बेटियां हो दोनों चारों शादी करके अलग-अलग दिशा में अपने अपने तरफ से जाए तो क्या सभी एक शरीर के सुखी बनेगी? क्या संभव नहीं है ना? सभी एक शरीर के सुखी हो। सभी एक शरीर के सुखी बने। ये संभावना नहीं रहती है। क्यों नहीं रहती है? सबका अपना अपना कर्म तो रहेगा ना। अब किसी के कम ज्यादा कम ज्यादा करना। हम केवल भगवंत के सानिध्य में आ गए। अब मान लो उनके देशना भी सुन रहे समोसर में भी बैठे तो क्या सबकी निजरा एक सर की होगी?
36:22 निमित्त सबको एक ही मिल रहा है। 1000 लोग बैठे हैं वहां पर और एक ही निमित्त सबको मिल रहा है। लेकिन एक शरीर की निर्जरा नहीं हो सकती है। एक शरीर का संवर भी नहीं हो सकता है। जीवो के अपने भाव परिणाम भी तो देखने की नहीं। उनकी अपनी आराधना उपासना उनके भाव परिणाम जो है उस पर आधारित है। अब किसी के भाव बहुत अच्छे उच्च कक्षा के तीव्र भाव है। किसी के भाव जो है बिल्कुल नहीं है। अब किसके कैसे भाव है? किसके परिणाम कैसे? परिणाम की धारा कैसी है? यह देखना है। फिर अगर आपके भाव परिणाम बनते हैं और फिर बीच
37:08 में कसाया आ के उसको तोड़ दे तो क्या करेंगे? फिर राग द्वेष बीच में आ जाए फिर कसा आदि भाव बीच में आ जाए तो बहुत बड़ा नुकसान होगा अनर्थ हो जाएगा समय के लिए ऐसी स्थिति के अंदर यहां पर सबके लिए अलग-अलग हेतु प्रमाण बताया गया है अब जो अलग-अलग हेतु प्रमाण बताया उसमें भी कौन किसके तो हे भग क्या कोई स्वयं ही जो है संवर भाव कर सकते हैं शुद्ध संवर कर सकते हां गौतम कुछ कर सकते हैं, कुछ नहीं भी कर सकते। कई बार देखिए हमारे लिए भी क्या है निमित्त होता है तो लोग धर्म करने के लिए तैयार हो जाते। अच्छा निमित्त है। परस आ
37:54 गए, पर्व आ गए, समसरी आ गई, मिलके होली आ गई तो एक एटमॉस्फियर खड़ा होता है तो उससे स्वयं इच्छा बन जाती है। और फिर वो स्वयं इच्छा जब बन जाती है तो प्रबल भाव से उनके करने में तैयारी हो जाती है। लेकिन अब सबके तो नहीं होता। एक ही निमित्त है। एक ही तीर्थंकर भगवान समर में देश हजारों लोग सुन रहे हैं। उनमें अंदर जो है पशु पक्षी भी है, देवी देवता भी है, मनुष्य स्त्री पुरुष भी है। सबके भाव एक शरीर के नहीं हो सकते। अच्छा क्यों नहीं हो सकते हैं? तो सबके अपने अपने दूसरे कर्म भी तो भारी है ना। सबके अपने अपने दूसरे भारी कर्म भी होते
38:42 हैं कि जिन कर्मों का उदय आने पर जो है उनके लिए वो परिस्थिति नहीं हो सकती है तो ये निश्चित है स्वाभाविक है लेकिन कई बार आपने देखा है कि बहुत लघु कर्म जिसको हम कहते हैं ना हलोकर्मी ऐसे लघुकर्मी अगर सब थोड़े से जो हो और सबके कर्म हल्के से छोटे से प्रमाण में चिपके हुए हो। आपने देखा है विजय भाई सुना होगा गौतम स्वामी जब चल रहे हैं तो उनको 1500 तापस आ गए वहां पर अष्टाप जी तीर्थ पर चढ़ते समय अब ये अष्टाप तीर्थ पर चढ़ रहे और अलग-अलग वहां पर तापस वगह बैठे वो
39:29 तपस्या कर रहे हैं। अलग-अलग सन्यासी या कोई योगासन करके तप कर रहे हैं। कोई क्या करके तप कर रहे हैं। कुछ सूर्य की आत्मा ले रहे लेकिन यहां गौतम स्वामी को जो है जिस तरह से लब्धि शक्ति जो प्राप्त हो गई कि वो सूर्य की किरणों को यूसी की तरह से पढ़ कर के चल ऐसी भी कक्षा उन्होंने की लेकिन यहां पर ये है कि सबके लिए तो एक तरीका नहीं हो सकता है। अब गौतम स्वामी बिहार के अंदर यह जो 1500 तापस है इनके सबके साथ चल रहे हैं और जो आगे पीछे हुए और 500 जने साथ में चलते चलते जो थोड़ा बहुत उपदेश गौतम स्वामी ने समझाया तो उसके कारण 500 जने को
40:19 गौतम स्वामी के समझाने थे ही सुनते सुनते सुनते उनको केवल ज्ञान हो गया मतलब क्या हुआ कि ज्ञान वन्य कर्म कर्म का दर्शनावर कर्म का मोहनी अंतराय का चारों कर्मों का संपूर्ण अक्षय हो जाए तो केवल ज्ञान केवल दर्शन हो सकता है स्वाभाविक है कोई निषेध नहीं किसी को निषेध नहीं अब रही बात ये कि आज पंचम काल का कलयुग है ये बड़ी बात काल का जो प्रतिबंध है यहां पर उसके कारण आज यहां भरत इरावत क्षेत्र में नहीं होता है लेकिन अगर हम यहां से पहले चौथे आर्य में जन्मे होते आज से 2552 साल पहले जन्मे होते और उस समय अगर हमने कुछ पुरुषार्थ कर
41:06 लिया होता और उस समय कर्मक्षय हो जाता और कर्मक्षय करके मोक्ष में चले जाते तो बात अलग थी अब नहीं जा पाए नहीं हो पाया यह बात अलग हो गई समझे कि नहीं तो दोनों प्रकार की बातें है अब यह कहते हैं केवली आदि से आनी बोधि का आदि ज्ञान उपार्जन अनुपाद मति श्रुत के अंदर मति ज्ञान के अंदर यह है आ बोध ज्ञान अब इसका क्या मतलब है आ बोधि का तो इन्होंने कहा कि केवली आदि से सुने बिना ही क्या कोई जीव शुद्ध अभिन बोध ज्ञान उपार्जन कर सकता है तब महावीर कह रहे हैं केवली आदि से सुने बिना कोई जीव
41:53 शुद्ध और बिल्कुल अभिनिवेशिक ज्ञान कुछ करता है और कुछ जीव नहीं कर सकते। समझे कि नहीं? जीवो के ऊपर अपने कर्म का प्रमाण तो रहता ही है। तो जिसके ऊपर कर्म का प्रमाण रहेगा तो महावीर सब ने साफ कह दिया कि मोहनी कर्म की 28 प्रकृतियां अब आई बात वर्ण अंतराय कर्म के तो इन सब की प्रकृतियां कितनी हो गई बोलिए वंदना माता जी किसके कर्म की कितनी प्रकृति मोहनिया कर्म की 28 ज्ञाना
42:39 के पांच पांच के पांच का नौ भूल जाओगे थोड़ा करिए बोले मीणा चलिए बोलिए मेरा नाना वर्णीय के पांच दशना वर्ण के नौ मोहनीय के 28 और अंतराय की पांच अब ये चारों कर्म के मिलकर के इतने 45 47 कर्म प्रकृतियां है ये स्टेप बाय स्टेप जाती
43:24 चले सबसे पहले मोहनीय कर्म का क्षय उपसम करना है और जितना मोहनीय कर्म का क्षय उपसम होते होते अंत में जाकर के वितरागता प्रकट होती है 12 गुणस्थान पर उसके बाद में ज्ञानावर की पांच दर्शनावर की नौ और अंतराय की पांच ये भी 19 प्रकृतियां बार गुणस्थान से 13वे गुणस्थ में जाते समय हो जाए अब उस समय उन पर निर्जरा इतनी हो जाए इतनी हो कि वो संपूर्ण क्षय होता है। मतलब वहां कर्म बाकी नहीं रहते हैं और फिर ते गुणस्थान पर आते केवल ज्ञान केवल दर्शन प्रकट हो जाते हैं। तो यहां पर ये हेतु बताया है दोनों तरीके से किसी को कम, किसी
44:11 को ज्यादा, किसी को हो सकता है, किसी को नहीं होता है। तो सबके कर्म देखने पड़ेंगे ना। अब कह रहे अभिन का निष्कर्ष यह है कि अभिन बोत ज्ञान अवधि ज्ञान मनो पर ज्ञान केवल ज्ञान इन पांच ज्ञानों का उपार्जन केवली आदि से सुने बिना भी वही कर सकता है और जिसके उस उस ज्ञान के आवरण रूप कर्म का क्षयोशम तथा क्षय हो गया हो अन्यथा नहीं कर सकते हैं समझे अब केवली आदि के इस प्रकार के सभी वचन जो भी हमने देखे हैं इनमें सबके अंदर कहा है तो ये केवली या
45:00 केवली पाक्षिक उपासिका और इसके साथ धर्म श्रवण के बिना ही क्या कोई जीव केवली प्रूप धर्म श्रवण लाभ करता है शुद्ध बोधी सम्यक दर्शन का प्राप्त करता है या कोई मुंडन कराकर अनकार साधु बन सकता है या कोई ब्रह्मचर्य का कारण कर सकता है या कोई संयम द्वारा संयत रहदात करता है और शुद्ध संवर में समृद्ध होता है। शुद्ध आधिक ज्ञान उत्पन्न हो करता है। या झूठ मन मन मनो प्रेम तथा केवल शुद्ध मनो प्रता केवल ज्ञान उत्पन्न करता है। अब देखिए सब जीव है संसार के अंदर लेकिन सबके अपने अपने
45:47 भाव परिणाम कैसे आज आपको लग रहा है कि नहीं कुछ भी नहीं भाव परिणाम इनके कुछ नहीं इनको कहां से ज्ञान हो जाएगा लेकिन कल देखो तो इनको भी ज्ञान हो जाता है हम रह जाते हैं और उनको रह जाता है क्यों ऐसा होता है वो इतने लघुकर्मी थे इतने लघुकर्मी थे कि थोड़ा सा छोटा सा आवरण इनका टिका हुआ था और वो थोड़े से निमितता से ट जाए अच्छी बात हो सकता है हमेशा के लिए जरूरी नहीं है कि किसी को दीक्षा लेकर के 22 परिस आएंगे फिर उपसर्ग आएंगे फिर उसको सहन करेंगे तब होगा ऐसा भी कुछ नहीं है साथ
46:33 ऐसा नहीं है जिस तरह से सबको अलग-अलग प्रकार से प्रमाण दिया गया उस प्रमाण के हिसाब से कम ज्यादा सबका होता है अब यहां पर लास्ट में यह भी बात आई कि केवली आदि से सुना विनय केवल ज्ञान की प्राप्ति वाले को विभंग ज्ञान एवं क्रमश अवधि ज्ञान प्राप्त होने की प्रक्रिया देखिए मति ज्ञान श्रत ज्ञान अवधि ज्ञान मनुष्य गति में है और देव गति में भी है नरक गति में भी है लेकिन वहां पर कई बार किसी को कैसा निमित्त चाहिए ना तो केवल ज्ञान प्राप्ति वाले को विभंग ज्ञान एवं अवधि ज्ञान प्राप्त हो सकता है तो यहां पर यह भी कह
47:19 रहे हैं कि जैसे छठ छट के पारने पर तप करते कर्म करते हुए सूर्य के प्रमुख लोहे के ऊंची करके और फिर आतापना भूमि में आतापना लेते हुए इस बिना धर्म श्रवण और केवल ज्ञान के बिना भी जो है करने वाले हैं। जीव की प्रकृति भद्रता से प्रकृति की उत्पादनता है। और इसलिए स्वाभाविक रूप से ही क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, कसाय आदि जो भी है इनकी मंदता होनी जरूरी है। बिल्कुल मंद मंदवत्ति के भाव में आने वाले होने चाहिए। ये कसाय इतने ज्यादा व्यक्त कसाय के रूप में नहीं भी होते हैं। और काम भो में
48:05 अनासक्ति हो। चंद्रमा भद्रता विनीता विनीतता आदि से जो है गुणों से उसका जीवन हो ये बहुत जरूरी है। गुणाचार करने के बाद गुणों को उपार्जन करना बहुत आवश्यक नहीं तो मुश्किल हो जाएगा। गुण ही उपार्जन नहीं होंगे। आप गुणों को नहीं बढ़ा सके तो निर्जरा नहीं कर पाएंगे। आपको गुण बढ़ाना बहुत जरूरी है। अब यहां पर जो है क्षयोपसम अब शुभ दिवस शुभ परिणाम विशुद्ध लेणी विभव कर्मों के क्षम में अपाय मार्गणा और गवेशना करते हुए विभंग नामक अज्ञान उत्पन्न होता है। फिर उस उत्पन्न
48:51 हुए विभंग ज्ञान द्वारा उत्पन्न अंगुल के असंख्यात और उत्कृष्ट असंख्या हजार योजन तक जानना और देखता है। मतलब भले ही किसी को घर में बैठे श्रावक को भी इस प्रकार का ज्ञान दर्शन ज्ञान दर्शन हो जाए और फिर इनको जो है अवध अपनी अपनी तरह से इनको ज्ञान ज्ञान हो जाए अब वही बाह्य जगत के बाहरी लोगों के बीच में लाकर के उसका उपयोग व्यवहार करने जाओ किसी को हो किसी को ना हो किसी को हो किसी को ना हो ये सबके लिए रहता है अब यहां पर समुत ना
49:37 यहां पर विषय अब अवधि ज्ञानी के लेष्या ज्ञान आदि का निरूपण करेंगे यहां लेष्या थोड़ी चैप्टर बदल जाएगा बोलिए विजय भाई किसको पूछना है जी एवरीबडी प्लीज रे योर हैंड्स अगर आपका क्वेश्चन पूछना है तो पम्मी बहन यू कैन गो अहेड महाराज साहब व्हाट इज द मीनिंग ऑफ अभिन ज्ञान दैट वर्ड अवधि अवधि ज्ञान अभिनय बोध ज्ञान है वो ज्ञान का प्रकार अच्छा अभिनेषिक भाव कह रहे हैं हां जी
50:28 हां वंदना माता जी गो अहेड महाराज साहब इसका मतलब यह हुआ आज के उससे कि गुणों में आचरण करना तो काफी इंपॉर्टेंट है। मतलब एक सरल मेथड हो गया कि हम गुणों में आचरण करके भी काफी कर्म निचरा कर सकते। देखिए केवल ज्ञानी के साथ में रहना। उनकी भी सेवा फिर उसके साथ में उनके स्वाध्याय आदि निमित्त से रह के किस प्रमाण में आप निर्जरा कर सकते हो। मतलब रिजल्ट आना चाहिए कि निज्रा होनी महत्व की है। अब वो निज्रा आपको किसी को केवली की देशना सुनकर वही किसी को बिना देशना सुने हुए। अब देखो अब अगर सम्य दर्शन होगा तो मिथ्या तो
51:15 मोहनी कर्म का तो क्षप होगा तो ही होगा। बिना उसके तो नहीं होगा। और तीर्थंकर भगवान की देशना समवसर में चले तब देशना सुनकर के सम दर्शन प्राप्त करने वाले हजारों हो जाते उसमें पशु पक्षी भी आ गए देवी देवता भी आ गए मनुष्य भी आ गए सब भगवान की देशना इस प्रकार की है तो कई आत्माओं के परिणाम से महाराज आपने बताया कि इंद्रियों का संयम होता है वैसे जैसे दूसरे काइंड के भी संयम होते हैं तो उसका थोड़ा ज्यादा बताएंगे कुछ और भिक्षा लेना दीक्षा लेना साधु जीवन का संयम हो गया घर बैठे भी इंद्रियों का संयम कर सकते हो घर बैठे भी ब्रह्मचर्य का पालन
52:03 कर सकते हो गस्थ जीवन में रह के भी समिति गुप्ति आदि का पालन कर सकते हो गस्ती जीवन में रहकर पौष लेना भी संयम है सामयिक लेना भी संयम है व्रत वृद्धि में आना भी संयम है और कोई नमो अरिहंतानं नमो सिं नम नमो नमो सबसा नमो सब पापस मंगलम चस परम भव मंगलम मंगलम भगवान वीर मंगलम गौतम प्रभु मंगलम
52:49 धर्म मंगलम चतारी मंगलम अरिहंता मंगल सि मंगलम साहू मंगलम केवल प धो मंगलम चारी लोगत्तमा अरिहंता लोगत्तमा सिद्ध लोगत्तमा साम केवली पत्तम चारी शरणम पजाम अरहते शरणम पव सिद्ध शरणम पवजामि साहू शरणम पवजम केवली पत्तम शरणम पव सर्व मंगल मंगलम सर्व कल्याणकारम प्रधानम सर्व धर्म
53:36 जैनम जयती शासनम धर्मना जी महाराज खूब खूब आभार विजय भाई कल कल कल है कल क्लास नहीं जी वमी खूब खूब आभार भावना आज लेक्चर प्रवचन देखो आप सब ज देखो ये 100 में चार कम वाले हैं। 100 इयर्स में कम होने चार कम है और
54:24 96 में ये बैठे हैं। भावना तो है कि चलो सुनेंगे देखेंगे समझे पी बहन जी आप भी 100 पूरे करना है पर 100 पूरा कर हां हां अरे काका 100 पूरा करो मोटी महाराज आप भी 100 पूरे करना सिर्फ हमारे साथ रहना मैं 100 से ज्यादा कर 100 से भी ज्यादा कर लो आप तो चिंता मत करिए मेरे 100 नहीं हो ना तब तक आप रहना हमारे साथ अरे भाई सबको करने चाहिए कौन सी बड़ी बात है आज जब मैक्सिमम आयुष जितना मनुष्य भव का है उतना तो आगे जीवन जिए शांति से
55:10 अच्छा ही है ना सबका हो जाए तब तक तो आपको रहना ही पड़ेगा कई