0:00 बच्चों आज हम अपनी पुस्तक भारत का संविधान सिद्धांत और व्यवहार का अध्याय संख्या तीन चुनाव और प्रतिनिधित्व का अध्ययन करने जा रहे हैं। चुनाव ये नाम आपने बहुत बार सुना होगा। चुनाव होते हैं। ग्राम पंचायत के चुनाव होते हैं। लोकसभा के चुनाव होते हैं। विधानसभा के चुनाव होते हैं। तो बहुत बार आपने इनके बारे में नाम सुना होगा। आपने देखा होगा आपने घर वालों को भी वोट देने के लिए जाते हुए। आपने चर्चा परिचर्चा सुनी होगी। फिर आपने परिणाम देखे होंगे कि इस बार बीजेपी है वह बहुत भारी बहुमत के साथ जीत गई। इस बार कांग्रेस पार्टी है वह भारी बहुमत के साथ जीत गई। तो इस प्रकार की चर्चाएं आपने सुनी होंगी। आज अपन राजनीति विज्ञान की दृष्टि से विस्तृत रूप से जानेंगे कि चुनाव क्या
0:46 होते हैं? क्या होता है? प्रतिनिधित्व है। किस प्रकार चुनाव लड़े जाते हैं और किस प्रकार से निर्धारण होता है जीत का और हार का और जीता हुआ व्यक्ति किस प्रकार से बाद में सत्ता में अपनी शासन व्यवस्था को संभालता है। तो चलिए आज अपन जानते हैं चुनाव और लोकतंत्र। एक छोटा सा टॉपिक है चुनाव और लोकतंत्र यानी कि लोकतंत्र के लिए लोकतंत्र के निर्माण के लिए चुनाव कितने आवश्यक हैं? क्या बिना चुनाव के भी लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की स्थापना की जा सकती है या फिर ऐसे शासन जहां पर लोकतांत्रिक शासन प्रणाली नहीं है क्या वहां पर भी चुनाव होते हैं किस तरह से संबंधित है एक दूसरे से चुनाव और लोकतंत्र
1:32 चलिए जानते हैं। देखिए इस अध्याय को पढ़ने के बाद में जैसे कि हमेशा अपन यह वाली बात करते हैं कि यह पूरा यह वाला पूरा चैप्टर जब आप पढ़ लेंगे तो आप किन-किन बातों को समझ पाएंगे। किन-किन बातों को जान पाएंगे? चुनाव की विभिन्न विधियों के बारे में आप जान पाएंगे। चुनाव की विभिन्न-भिन्न-भिन्न विधियां हैं। अलग-अलग देशों में चुनाव की अलग-अलग प्रणालियां अलग-अलग तरीके अपनाई गई हैं। तो कौन-कौन सी विधियां हैं चुनाव की इस बारे में आप जान पाएंगे। अपने देश की चुनाव व्यवस्था की विशेषताएं जान पाएंगे कि हमारे देश भारत में जो चुनाव व्यवस्था है उसकी क्या विशेषताएं हैं और क्यों वो व्यवस्था अपनाई गई है। क्यों हमने उसी व्यवस्था को उसी प्रणाली को उसी पद्धति को अपनाया इस बारे में आप जान
2:17 पाएंगे। आप जान पाएंगे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करवाने के प्रावधानों का महत्व है। क्यों हमारा देश या हमारा संविधान इस बात पर जोर देता है, इस बात का प्रयास करता है कि चुनाव निष्पक्ष होने चाहिए। क्या कारण हैं इसके? तो उन कारणों को आप जान पाएंगे। चुनाव सुधार होने पर होने वाली बहस की लगातार इतने सारे प्रावधान होने के बाद में प्रणाली निर्धारित होने के बाद में प्रतिनिधित्व निर्धारित होने के बाद में भी लगातार चुनाव सुधारों पर बहस होती है। लगातार चुनाव सुधार की गुंजाइश बनी रहती है। लगातार मुद्दे उठते हैं चुनाव प्रक्रिया में सुधार के चुनाव के प्रतिनिधित्व में सुधार के तो यह किस प्रकार की बहस है ये क्यों उठती है और क्या हो सकता है इसका
3:04 समाधान इन सब की समझ आप जान पाएंगे पैदा कर पाएंगे इस अध्याय के अध्ययन के बाद। तो चलिए अपन आज फिर चल लेते हैं अपने आज के टॉपिक पर जो कि है चुनाव और लोकतंत्र कि चुनाव और लोकतंत्र किस तरह एक दूसरे से संबंधित है इस पर अपन अपना पहला सवाल लेते हैं कि क्या बिना चुनाव के लोकतंत्र कायम रह सकता है कि क्या ऐसा हो सकता है कि चुनाव ना हो और लोकतंत्र कायम रह जाए। अब देखिए चुनाव होता है हम किसको चुनते हैं चुनाव में। हम हमारे ऊपर शासन करने वाले, हमारे देश की सत्ता संभालने वाले व्यक्तियों को चुनते हैं। हमारे प्रतिनिधियों को चुनते हैं। सबसे पहले अपन लोकतंत्र के प्रकारों की बात करते हैं। लोकतंत्र के दो प्रकार हैं। एक है
3:50 प्रत्यक्ष लोकतंत्र और एक है अप्रत्यक्ष लोकतंत्र। प्रत्यक्ष लोकतंत्र में क्या होता है? चलिए अपन कल्पना करते हैं कि जैसे मान लीजिए आप अपनी कक्षा में हैं और आपके अपनी क्लास का जो मॉनिटर है उसका चुनाव आपको करना है। तो किस तरह से किया जाता है कि भाई कोई भी दो या तीन व्यक्ति खड़े हो जाते हैं जो मॉनिटर बनने के इच्छुक हैं। जो पहला मान लीजिए कि जिसका नाम राम है वो अपनी कक्षा में आप 60 बच्चे हैं हाथ खड़ा करवाया जाता है कि भई कौन-कौन राम को मॉनिटर बनाना चाहता है। तो मान लीजिए कि वहां पर उन्होंने 30 बच्चों ने हाथ खड़े किए जो कि राम को मॉनिटर बनाना चाहते हैं। दूसरा विजय है उसके लिए 25 बच्चों ने हाथ खड़े किए और तीसरा अजय है उसको केवल पांच बच्चों ने वोट दिया। तो इस तरह से सीधे तौर पर आपने अपनी पसंद बता
4:35 दी और राम को मॉनिटर बना दिया गया। यह हो गया प्रत्यक्ष लोकतंत्र कि जहां लोग संख्या में कम होते हैं और सीधे तौर पर वो अपनी राय बता देते हैं। वो अपनी महत्वाकांक्षा बता देते हैं। वो अपनी इच्छा बता देते हैं। अपनी पसंद बता देते हैं। लेकिन जब लाखों करोड़ों की आबादी हो जैसे कि हमारे हिंदुस्तान में है तो हम कैसे बताएं अपनी इच्छा सरकार से कि हम क्या चाहते हैं? हम कैसे बताएं अपनी समस्याएं कि हम जहां रह रहे हैं वहां क्या-क्या समस्याएं हैं? वहां हमारे आसपास गंदगी बहुत रहती है। हमारे स्कूल की व्यवस्था नहीं है। हमारे पेयजल की व्यवस्था नहीं है। हमारे बिजली की व्यवस्था नहीं है। ये सारी की सारी बातें हम सरकार तक कैसे पहुंचाएं? कैसे हम अपनी उम्मीदों को बताएं? कैसे हम अपनी अपेक्षाओं को बताएं कि हम सरकार से क्या
5:22 अपेक्षाएं रखते हैं। तो इसके लिए हम क्या करते हैं? जब भी चुनाव होते हैं, हम अपना प्रतिनिधि चुनते हैं और वह प्रतिनिधि हमारी बातों को, हमारी समस्याओं को वहां आगे जाकर सामने रखता है और बाद में हमारा ही चुना हुआ प्रतिनिधि वहां सरकार का एक अंग होता है और हमारी महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप वो वहां पर शासन व्यवस्था में अपना पदभार संभालता है। तो हो गया ना जनता का शासन। अब देखिए प्रत्यक्ष लोकतंत्र था वहां तो ठीक है सीधे-सीधे हमने अपनी महत्वाकांक्षा बता दी लेकिन अप्रत्यक्ष लोकतंत्र में जहां बात आती है प्रतिनिधियों को चुनने की तो यह जो प्रतिनिधियों को चुनने की विधि होती है ना यह कहलाती है चुनाव या निर्वाचन तो सहज जी
6:09 इस प्रश्न का जवाब हमें मिल गया कि लोकतंत्र के लिए चुनाव होने आवश्यक हैं क्योंकि जब चुनाव होंगे तभी तो हम अपने प्रतिनिधि भेज पाएंगे और वक्तव पर होने भी आवश्यक हैं ताकि वक्त-वक्त पर हम अपने प्रतिनिधियों को चुन सकें उनको भेज सकें और हमारे ही नियमों के हमारे ही अपेक्षाओं के अनुरूप हमारी ही आशाओं के अनुरूप हमारी सरकार की शासन व्यवस्था चल पाई। इसी पर एक दूसरा प्रश्न भी है कि जहां लोकतांत्रिक शासन प्रणाली नहीं है, क्या वहां भी चुनाव हो सकता है? वहां चुनाव की क्या जरूरत है? लोकतांत्रिक शासन प्रणाली है नहीं। या तो एक व्यक्ति का शासन है या फिर एक पार्टी का शासन है। वहां जनता की महत्वाकांक्षा की तो कोई बात ही नहीं आती है। होगा वही
6:54 जो वह व्यक्ति चाहेगा या फिर वह पार्टी चाहेगी। वहां जनता की क्या अपेक्षाएं हैं? क्या हैं? क्या मांगे हैं? क्या समस्याएं हैं? क्या परेशानियां हैं? इससे कोई बहुत ज्यादा लेना देना नहीं होता है। तो फिर क्या वहां जरूरत है चुनाव की? वहां भी जरूरत होती है चुनाव की। इतनी अधिक आवश्यकता नहीं होती जितनी कि लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में लेकिन फिर भी ये लोग चुनाव करवाते हैं। क्यों करवाते हैं? क्योंकि ये शासक स्वयं को लोकतांत्रिक साबित करते हैं। मतलब कि ये जो शासक होते हैं ना भले ही वो तानाशाह हैं। भले ही वह जबरदस्ती सत्ता पर बैठ गए हैं। भले ही वो लोकप्रिय नहीं है। भले ही वह जनता की महत्वाकांक्षाओं पर नहीं खरे उतरते हैं। लेकिन फिर भी वह अपने आप को लोकतांत्रिक
7:42 साबित करना चाहते हैं। इसलिए वो चुनाव करवाते हैं और इस तरीके से चुनाव करवाते हैं कि चुनाव हो भी जाएं। वो अपने आप को लोकतांत्रिक साबित भी कर लें और उनकी सत्ता को भी कोई खतरा ना हो। इस तरह की प्रक्रिया अपनाई जाती है। जैसे कि मान लीजिए कोई व्यक्ति है उसने अपनी पार्टी बनाई और उसने कोई और पार्टी बनने की इजाजत ही नहीं दी। अपनी ही पार्टी में अपने ही दोस्तों को उसने रख लिया और अपने तीन दोस्तों को भेज दिया कि इन तीन में से आपको एक व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि चुनना है। हो गए ना चुनाव और फिर उसने बता दिया कि मुझे तो जनता ने चुनकर बैठाया है। अपने आप को लोकतांत्रिक साबित कर लिया और एक तरह से जनता चुनाव भी नहीं कर पाई। तो इस तरह से कि मतलब कि लोकतंत्र के लिए चुनाव
8:29 आवश्यक है। लेकिन जहां लोकतांत्रिक शासन प्रणाली नहीं है, वहां पर शासक अपने आप को लोकतांत्रिक साबित करने के लिए चुनाव करवा लेते हैं। चलिए आगे देखते हैं अपन चुनाव के मूलभूत नियम कि ऐसे क्या नियम लेकर चला जाता है जिनके आधार पर चुनाव होते हैं। तो एक लोकतांत्रिक संविधान जहां जनता का शासन है, जहां जन कल्याण के लिए शासन है, वह चुनाव के लिए कुछ मूलभूत नियम बनाता है। यह नियम हमें क्या बताते हैं कि कौन मत देने के योग्य है? यानी कि मताधिकार किस-किस के पास होगा। कौन-कौन व्यक्ति वोट दे पाएंगे और कौन-कौन वोट नहीं दे पाएंगे। कौन चुनाव लड़ने के योग्य है? कौन-कौन चुनाव लड़ सकता है? और कौन चुनाव की
9:16 देखरेख करेगा? मतदाता अपने प्रतिनिधि कैसे चुनेंगे? मतलब कौन सा तरीका होगा उनका चुनने का? कौन सी प्रक्रिया अपनाई जाएगी? और मतगणना कैसे होगी? और प्रतिनिधियों का चुनाव कैसे होगा? और फिर बाद में मतगणना कैसे की जाएगी और मतगणना के बाद में प्रतिनिधियों को किस प्रकार से चयनित किया जाएगा? तो ये सारे के सारे सवाल और इन सवालों के जवाब होते हैं। उन जवाबों, जवाबों के आधार पर हमारी चुनाव प्रणाली और उसकी प्रक्रिया निर्धारित होती है। यहां जो यह पहले तीन सवाल हैं, वह हमारी निष्पक्ष चुनाव प्रणाली को दर्शाते हैं कि इससे हमारी चुनाव प्रणाली निष्पक्ष हो पाएगी कि कौन-कौन मत देने के योग्य है, कौन-कौन चुनाव लड़ने के योग्य है, चुनाव
10:03 की देखरेख कौन करेगा। इसके लिए एक संस्था का निर्माण किया जाएगा जो कि निष्पक्ष होगी जो कि चुनाव की देखरेख करेगी। मतदाता अपने प्रतिनिधि कैसे चुनेगा और मतगणना कैसे होगी। यह एक तरह से न्यायपूर्ण व्यवस्था प्रतिनिधित्व की होगी और यह न्यायपूर्ण व्यवस्था का निर्धारण करेंगे कि प्रत्येक समुदाय को प्रत्येक वर्ग को प्रतिनिधित्व मिल पाए सरकार के अंदर शासन के अंदर। तो यह चुनाव प्रणाली के मूलभूत नियम थे। इनके जवाबों के आधार पर किस तरह से चुनाव की प्रक्रिया होती है। कौन-कौन सी पद्धतियां होती हैं चुनाव की और किस तरह से उनकी मतगणना होती है और किस प्रकार से जो अल्पसंख्यक हैं जो पिछड़े हुए समुदाय हैं उनको भी प्रतिनिधित्व देने के
10:49 लिए संविधान में किस-किस प्रकार की व्यवस्थाएं की जाती हैं? इन सब बातों का अध्ययन करेंगे अपन आगे के वीडियो में। अभी इसके अपन कुछ सवाल लेते हैं। प्रत्यक्ष लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली से आप क्या समझते हैं? अपन ने चर्चा की थी अभी-अभी इसके बारे में कि क्या होती है प्रत्यक्ष लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली और अप्रत्यक्ष लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली का वास्तव में जनता का शासन होती है। अप्रत्यक्ष लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली जिसमें हम अपने प्रतिनिधि चुनकर भेजते हैं। हमारा चुना हुआ कोई व्यक्ति सरकार में जाकर शासन व्यवस्था में जाकर सत्ता में जाकर हमारी महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप कार्य करता है। लेकिन क्या ऐसी व्यवस्था को जनता का शासन
11:34 कहा जाएगा?